रविवार, 8 जून 2014

खूब मिले गुरुभाई

-गणेश पाण्डेय

प्रिय शिष्य होना सबके भाग्य में नहीं होता है। प्रिय शिष्य बहुत अच्छा भी हो सकता है और बहुत खराब भी। जाहिर है कि यहाँ अच्छा योग्य के अर्थ में है। अच्छा शिष्य अपने गुरु का मान बढ़ाता है तो खराब शिष्य घटाता है। मान बढ़ाने से आशय गुरु के काम को आगे ले जाने से है, न कि फूलमाला पहनाने और हरवक्त जयकार करने से है। खराब शिष्य तो ऐसे-ऐसे मौकों पर गुरु का नाम ले लेते हैं, जहां नहीं लेना चाहिए। गुरु का मान कहीं कम हुआ हो तो भी उसे सार्वजनिक उस दशा में नहीं करना चाहिए कि अपमान का प्रतिकार होने की जगह और बढ़ जाय। दुर्भाग्यवश मैं यहां प्रिय शिष्य नहीं बन पाया तो इसमें दोष किसी गुरु का नहीं था, मुझमें ही रही होगी कोई कमी। कुछ गुण कम रहे होंगे, उनसे जो प्रिय थे। भले मैं कुछ अच्छा नहीं कर पाया, पर कुछ गुरुओं का कुछ प्रेम तो मुझे भी मिला। गुरु कभी मुक्तमन या स्वेच्छा से किसी खराब से खराब शिष्य को अप्रेम नहीं देता है। मनुष्य जीवन में ऐसे क्षण कभी भी और कही भी आ सकते हैं, जब कोई बड़े से बड़ा ज्ञानी भी एक क्षण के विवेक से शिथिल हो जाय। चूक कहां नहीं होती है। चूक को मैं पाप नहीं मानता। हां जानबूझकर हो तो बुरा मानता हूँ, पर मेरे जीवन में ऐसी कोई बात किसी गुरु की ओर से रही हो, मुझे स्मरण नहीं। यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे शोध में गुरु के रूप में श्रद्धेय रामदेव शुक्ल जी मिले। आज स्मरण कर रहा हूं तो इस प्रयोजन के साथ कि इधर कुछ लोगों ने जानबूझकर उन्हें दुख पहुंचाने के लिए उनके नाम का उल्लेख मेरी गुरु सीरीज की कविताओं के साथ किया है। विभाग में जब भी ऐसी कोई बात आयी तो मैने तुरत प्रतिवाद किया कि नहीं ऐसी बात नहीं, मेरे तो दस गुरु हैं। आशय यह कि किसे कविताओं में ढँ़ूढ़िएगा ? यह भी स्पष्ट करता कि यह कविता तो सत्ता के प्रतिरोध में है। सत्ता चाहे अकादमिक दुनिया की हो या समाज, धर्म या राजनीति, किसी भी दुनिया की। मैं मजाक में भी किसी को अपने गुरु के बारे में ऐसा कुछ कहते पसंद नहीं करता था। मेरी आखों से अपने गुरु रामदेव जी का वह पोस्टकार्ड कभी ओझल नहीं होता, जब उन्होंने मेरे जीवन में आयी एक दुख की घड़ी में लिखा था कि तुम पैसे की चिंता मत करो, शोधप्रबंध जमा हो जाएगा, आ जाओ। भला ऐसे गुरु के प्रति कभी असम्मान का भाव मन में आ सकता है ?
     साहित्य में कुछ करने की वजह से सभी गुरुओं के साथ एक लोकतांत्रिक या कह लें कि आलोचनात्मक रिश्ता भी बना। यह आलोचनात्मक दृष्टिकोण केवल साहित्य संबंधी सहमति या असहमति को लेकर होता है। यहां भटकने का खतरा है, इसलिए उस बेहद जरूरी हस्तक्षेप के लिए ध्यान खींचना चाहूंगा कि गुरु सीरीज के बारे में आचार्यगण ऐसी किसी नासमझी की बात न करें कि यह अमुक पर है या अमुक पर। उस सीरीज में एक कविता है-गुरु से बड़ा था गुरु का नाम-
गुरु से बड़ा था गुरु का नाम
सोचा मैं भी रख लूँ गुरु से बड़ा नाम
कबीर तो बहुत छोटा रहेगा
कैसा रहेगा सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
अच्छा हो कि गुरु से पूछूँ
गजानन माधव मुक्तिबोध के बारे में।
पागल हो, कहते हुए हँसे गुरु
एक टुकड़ा मोदक थमाया
और बोले-
फिसड्डी हैं ये सारे नाम
तुम्हारा तो गणेश पाण्डेय ही ठीक है।
   इस कविता में जिस गुरु के बड़े नाम का उल्लेख है, उसके लिए ऐसे नाम की ओर देखने की जरूरत क्यों नहीं हुई, जिसके नाम में सबसे ज्यादा अक्षर हों या शब्द हों। विश्वनाथ जी का नाम बड़ा है ही, फिर उन्हें लक्ष्य क्यों नहीं किया गया ? क्या इसलिए कि उन्हें ऐसी असहज स्थिति में उनकी टीम के छुटभौये उन्हें खड़ा करेंगे तो उनका मान घट जाएगा ? मेरे कहने का आशय यह नहीं कि है कि उन्हें देखें। यह इस कविता के साथ अन्याय है कि आप उसे किसी व्यक्ति के साथ जोड़कर देखें। अन्याय ही नहीं, बल्कि कमअक्ली भी। विश्वनाथ जी में कुछ अच्छा है तो कुछ खराब भी। सबके साथ ऐसा होता है। कई बार मैं ऐसे खराब को आंतरिक विवशता के रूप में देखता हूं। जीवन में ऐसा बहुत कुछ होता है कि हम अपने प्रिय या अत्यंत उपयोगी के लिए बहुत योग्य को भी दूर रखते हैं। ऐसी दुर्बलता कहाँ नहीं है ? आंतरिक विवशताओं के विस्तार में नहीं जाना है। हाँ, वहाँ जरूर विरोध होता जब आप ऐसे अपात्र को अपने साहित्यिक उत्तराधिकारी की जगह देने लगते हैं। इस शहर में कोई कविसीढ़ी बनी, कोई कविक्रम बना तो किसे कहाँ रखेंगे ? जाहिर है कि कोई इसमें कोई बड़ा उलट-फेर नहीं कर सकता है ? कोई लाख उछल-कूद करे, लेकिन जब बाहर से आने वाले पचास से कम उम्र के साधारण कवियों को कवि के रूप में बहुत आदर देगा तो किस मुँह से और किस ताकत से मुझे या किसी को फूंककर उड़ा देगा ? मैं अधिक महत्व का अधिकारी नहीं हूँ। कोई किसी को न तो बड़ा बना सकता है, न छोटा। काम खुद बोलता है। काम का बोलना बेवकूफी का बोलना या मुँह इत्यादि का बोलना नहीं होता है। यह सब इसलिए कह रहा हूँ कि गणेश पाण्डेय तो शुरू से ही विरोध का अभ्यस्त है, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई उसे क्या कहता है, उसे फर्क तब पड़ता, जब उसका काम बोलता नहीं। मेरे बारे में जो बोलना है, सब बोल सकते हैं। जहाँ जरूरी होगा कुछ कहूँगा, जहाँ नहीं जरूरी होगा, बताकर अलग हो सकता हूँ। हाँ यह जरूर चाहता हूं कि मुझे छोटा बनाने में अपनी सारी शक्ति खर्च करने वाले आचार्य या लेखक-अलेखक किसी एक गुरु को पीड़ा पहुंचाने का काम और किसी की महानता के गुण गाने का काम न करें। बंद करें यह सब। इसलिए गुरु सीरीज की कविताओं से भयभीत रहने वाले लोग उस कविता को जितना चाहें बदनाम करें, बस उस कविता के नाम पर किसी गुरु को पीड़ा न पहुँचाएँ। ऐसा इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि महान बनने की कोशिश कर रहा हूँ। अपनी कविता के बारे में मैं बेहतर नहीं बता सकता तो और कौन बताएगा ? सच तो यह कि गुरु सीरीज की कविताओं में सतह के नीचे की सारी हलचल के केंद्र में तो गुरुभाई हैं, हिन्दी के असली कापुरुष तो यही हैं, पर इतनी हिम्मत उन लोगों में कहाँ हैं कि वे लोग बताएं कि कौन-कौन हैं और हिन्दी की दुनिया में उनका असली चरित्र क्या है ? वे बता नहीं सकते हैं, क्यों कि वे खुद उसी टीम का हिस्सा हैं -
कैसे हो सकता था
कि जो गुरु के गण थे, नागफनी थे
जड़ थे, कितने कार्यकुशल थे।
आगे रहते थे, निकट थे इतने
जैसे स्वर्ण कुंडल, त्योरियाँ, हाथ।
क्या खतरा था उन्हें मुझसे
तनिक भी दक्ष नहीं था मैं
निकटता का पाठ मेरे कोर्स में था ही नहीं।
क्यों रोकते थे वे मुझे कुछ कहने से
जरूर हुई होगी कोई असुविधा
इसी तरह वैशम्पायन के गुरुकुल में
याज्ञवल्क्य से।
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खूब मिले गुरुभाई
सन्नद्ध रहते थे प्रतिपल
कुछ भी हो जाने के लिए
मेरे विरुद्ध।
बात सिर्फ इतनी-सी थी
कि मैं कवि था भरा हुआ
कि टूट रहा था मुझसे 
कोई नियम
कि लिखना चाहता था मैं 
नियम के लिए नियम।
   बहरहाल मैं अपनी कविताओं की व्याख्या नहीं करना चाहता। जानबूझकर किसी एक गुरु को दुखी करने की कोशिश के विरुद्ध बस हस्तक्षेप करना था, सो कर रहा हूँ। क्योंकि कुछ लोग  काव्यानुभव और जीवनानुभव की बात तो करते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि काव्यानुभव कोई आकाश से नहीं झरते हैं, जीवनानुभव की गीली मिट्टी ही पककर काव्यानुभव बनती है। असल में ये आचार्य ऐसे कवियों की पूजा अधिक करते हैं, जिनके पास अपना जीवनानुभव कम होता है, बाहर के काव्यानुभव को ही अपने परिवेश में ढ़ाल लेते हैं। आज हिन्दी के बड़े समझे जाने वाले कितने कवियों के पास ऐसी कविताएँ हैं, जिन्हें लिखने में कोई जोखिम रहा हो। जीवनसंघर्ष में जिन्होंने साहित्य की स्थानीय सत्ताओं और केंद्रों का विरोध किया हो। प्रमोटी कविसंघ के सदस्य या अध्यक्ष न रहे हों ? यह सब इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि ऐसा करने से कोई बड़ा कवि बन जाता है, इसलिए कह रहा हूँ कि बड़ों के पीछे-पीछे चलने वाले छुटभैये उनकी उन कमजोरियों को भी जान सकें जो छिपाकर रखी जाती हैं। ये आचार्य न तो कविता की आंतरिक संगति या तर्क को समझ पाते हैं और न कविता की शक्ति को। इन्हें यह भी नहीं पता होता है कि किसी छोटे दुख से भी बड़ी या अच्छी कविता संभव हो सकती है और किसी बड़े दुख की कविता भी खराब बन सकती है। जिनके पास खुद की कोई भाषा नहीं होती, वह भला किसी लेखक की भाषा को कैसे जान सकता है। 
      मित्रो अघाये हुए लोगों की भाषा और रोटी के लिए संघर्ष करने वालो की भाषा का फर्क समझना चाहिए। मैंने भले खराब कविताएँ लिखी हों, पर किसी की गोद में या चरणों में बैठकर यह सब निश्चिंत भाव से नहीं किया है। कहीं कहा है कि यह सब एक हाथ में हिन्दी के राक्षसों से लड़ने के लिए तलवार और दूसरे हाथ में कलम लेकर कविताई की है। कई साल संघर्ष किया है। विश्वविद्यालय में दूसरा शिक्षक संगठन खड़ा किया, एक नहीं तीनबार स्कूटर दुर्घटना में मरने से बचा। मैं भी अमुक जी या ढमुक जी का पिछलग्गू या लठैत बन जाता तो साहित्य में भी कुछ हलवा-पूड़ी पाता रहता। कहना जरूरी है कि हिन्दी के आचार्य लठैत बनना अधिक पसंद करते हैं, वीर बनना कम। लठैत बनकर दाना-पानी और आफत से छुटकारे की पक्की व्यवस्था रहती है। जिसका चाहो सर फोड़ दो। कोई स्वाधीन लेखक हो या चोर-उचक्का, क्या फर्क पड़ता है। बस मालिक के सामने दुम दबी रहनी चाहिए। मालिक का नाम लेते रहना चाहिए। वीर मूल्यजीवी होता है। किसी अर्थपूर्ण मकसद के लिए संघर्ष करता है। साहित्य के अँधेरे को दूर करने के लिए। गंदगी साफ करने के लिए, न कि गंदगी करने के लिए। मुझे एक वीर का क्षणिक जीवन भी प्रिय है, किसी का लठैत बनने से अच्छा है, चुल्लूभर पानी की खोज करना। साहित्य में कभी किसी के साथ संबंध निभाने के लिए समझौता नहीं किया। अरविंद त्रिपाठी मेरे मित्र हैं, उनकी कमियों पर भी खुलकर कहा और उन्होंने कभी भी अवयस्क या अलोकतांत्रिक व्यवहार नहीं किया। इसलिए कि अरविंद जी लेखक हैं, हिन्दी के अहंकारी आचार्य नहीं। किताबों के रटने का अहंकार नहीं, रचने का अभिमान है, बल्कि आश्वस्ति है। एक लेखक कभी जीवन की आपाधापी में आंतरिक विवशता की वजह से निकृष्ट पर बहुत उपयोगी लोगों के साथ जुड़ा रह सकता है, लेकिन अगर वह सच्चा लेखक है तो उस निकृष्ट व्यक्ति की नाराजगी के बावजूद किसी सच्चे लेखक से रिश्ते की एक खिड़की जरूर अपने पास रखता है। गुरुओं में भी ऐसे लेखक हों तो आश्चर्य नहीं। उदाहरण के लिए बाहर जाने की जरूरत नहीं। अलबत्ता यहाँ सब लेखक ऐसे नहीं हैं। ज्यादातर लेखक साहसी नहीं हैं। विश्वविद्यालय के आचार्यों से बहुत डरते रहे हैं। शायद यह देश का पहला शहर होगा जहाँ के लेखक अपने शहर के अलेखकों से डरते होंगे। लेखक बनना उतना ही अच्छा है जितना अच्छा एक शिक्षक बनना है या एक अच्छा पाठक बनना है, लेकिन अलेखक बनकर साहित्य के परिसर में लठैती करना सबसे खराब काम है। ये अलेखक कई बार आयोजक, प्रशंसक इत्यादि की भूमिका में शहर के लेखकों को प्रभावित करने लगते हैं। शहर के वे लेखक जो भीतर से कमजोर होते हैं, साहित्य की स्थानीय सत्ता और उसके लठैतों के डर में जीने लगते हैं। हजार डर होते हैं, ऐसे लेखकों के पास, हाय ये मेरा नाम नहीं लेंगे, हाय ये मुझे कविता पढ़ने के लिए नहीं बुलाएंगे, इत्यादि। हद तो यह कि ऐसे भयभीत लेखक शहर की साहित्यिक वरिष्ठता साहित्य में काम से तय नहीं कर पाते, बल्कि विश्वविद्यालय की नौकरी की वरिष्ठता को ही प्रमाण मानने लगते हैं। हद है या नहीं ? जाहिर है, ऐसे लेखक भला किसी निडर लेखक को क्यों पसंद करेंगे ? बहरहाल उनसे कोई शिकायत नहीं कि उन्होंने साहस का पथ क्यों नहीं चुना, लेकिन संतोष की बात यह है कि इसी शहर में कुछ ऐसे लेखक भी हैं जो एक सीमा में ही सही अपने हिस्से का सच कहने की कोशिश करते हैं। उनसे मिलकर अच्छा लगता है, उनसे बात करके अच्छा लगता है। अब ऐसे लोगों के विरोध से कोई फर्क नहीं पड़ता, जो खुद विरोध के काबिल नहीं हैं। कभी-कभी अपने जीवन को लेकर यह अनुभव जरूर होता है कि आखिर मुझे यहाँ कैसा जीवन मिला जो पाता ही आया विरोध-धिक जीवन जो पाता ही आया विरोध। ऐसी पंक्ति की रचना करने वाले महान लेखकों के चरणों की धूल भी नहीं हूँ मैं, लेकिन जीवन तो यहाँ कुछ-कुछ वैसा ही जिया। वीरता का एक कण भी कहीं पा सका तो बहुत है। उसी कण के सहारे कट जाएगी जिन्दगी। मुझे अपनी कविता से कोई पुरस्कार नहीं चाहिए।
    कविताएँ हमेशा पुरस्कार ही नहीं दिलातीं। कभी-कभी दण्ड भी दिलाती हैं। जब्त कर ली जाती हैं या जेल होती है। मैं जानता हूँ कि अपने पहले संग्रह में गुरुसीरीज की कविताओं की वजह से साहित्य की दुनिया में मुझे वनवास का दण्ड मिला है तो सिर माथे पर। कौन कहता है कि कविताएँ कुछ नहीं करती हैं ? कमजोर कवियों की कविताएँ अलबत्ता कुछ नहीं करती हैं। बहुत हुआ तो पुरस्कार की सूली पर लटक जाती हैं, बस।







मंगलवार, 20 मई 2014

बाबू बोलता प्रसाद राय का निजी काव्यशास्त्र

-गणेश पाण्डेय

कई दिनों से माठा कर दिया है। बोलते है तो बोलते ही रहते है, बिना कुछ विचारे। यह नहीं सोचते कि थूक किस पर रहे हैं, जिस पर थूक रहे हैं, उसके नीचे तो नहीं खड़े हैं कि ऊपर थूकते समय सारा का सारा थूक अपने ही मुंह पर पड़ रहा है। चूंकि हिन्दी में ऐसे थुक्काचार्यों की कमी नहीं है, जो बिना कोई काम किये दूसरे को छोटा बनाने के लिए व्यग्र रहते हैं। हिन्दी के पत्रकार भी कम महाचूतियापा नहीं करते हैं, ऐसे बोलता प्रसाद राय जैसे लोगों को अपने अखबार की शोभा बनाते रहते हैं, इसलिए ऐसे लोग लेखक की कुर्सी पर बिना टिकट बैठ जाते हैं और बैठे रहते हैं। साहित्यकार बने फिरते हैं। चूंकि यह एक प्रवृत्ति है, इसलिए एक ऐसे ही बोलता प्रसाद राय की अनमोल और अखण्ड, बल्कि वज्रमूखर्तापूर्ण बातों की चर्चा इस कथा में।
      बोलता प्रसाद राय चूंकि धज के मामले में डायनासोर से तनिक ही कम हैं और नासमझी के मामले में मूसक प्रसाद के सगे छोटे भाई, इसलिए उनकी बातों से तनिक भी नाराज न होते हुए हजार व्रत कथाओं की तरह बोलता प्रसाद राय की एक कथा कहता हूं। बोलता प्रसाद राय क्षण-प्रतिक्षण एक स्वप्न देखते रहते हैं कि जब वे हिन्दी के हमारे समय के बाहर और यहां के सभी बड़ों के अंगरखे के भीतर घुसे रहते हैं तो वे गोबर गणेश नाम के इस शहर के लेखक से बड़े क्यों नहीं ? क्या हुआ जो गोबर गणेश के पास चार कविता संग्रह है, एक कहानी की किताब है, दो उपन्यास है, आलोवना की एक किताब है और ढ़ेर सारे पठनीय लेख हैं, गोबर गणेश का कोई गॉडफॉदर तो नहीं है, वह किसी लेखक संगठन इत्यादि में तो नहीं है, साहित्य की सत्ताओं का फेरा तो नहीं लगाता है, फिर कैसे बोलता प्रसाद से बड़ा है ? क्यों बड़ा है? बोलता प्रसाद ने अपने जीवन काल में बाहर और यहां के लेखकों की हजार धोतियों, पाजामों इत्यादि को धुला है और नगर संचालक के रूप में विख्यात हैं, अपने संस्थान के प्रभावशाली लोगों के रत्नों में शुमार है तो गोबर गणेश से श्रेष्ठ क्यों नहीं ? क्यों इस आभासी दुनिया में लोग गोबर गणेश को मान देते हैं, प्यार करते हैं और उसे नहीं पूछते हैं ? उसे गोबर गणेश के गद्य से परेशानी है कि बिना अपने समय के किसी महान या महानों का अंगरखा इत्यादि धुले ऐसा गद्य लिखता है ? उनकी मुश्किल यह है कि उन्होंने हिन्दी आलोचना के बीज शब्दों की कई किताबों को घोलकर पी रखा है और निरंतर उन्हीं शब्दों की उल्टी करता रहते है और लोग हैं कि उन्हें आलोचक नहीं समझते हैं। उन्हें आलोचक अरविंद त्रिपाठी के समकक्ष या उनसे अधिक क्यों नहीं जाना जाता ? दिल्ली के एक वर्तमान महाकवि का स्थानीय प्रधान सेवक होने के बावजूद काव्यालोचक की कुसी उन्हें  क्यों नहीं मिली ? आलोचना का बच्चा पुरस्कार भी क्यों नहीं मिला ? क्यों गोबर गणेश संस्थान के प्रभावशाली आचार्यों के पीछे-पीछे बोलता प्रसाद राय की तरह दुम दुबाकर नहीं चलता है ? इसी तरह के हजार दुख हैं बोलता प्रसाद राय के। यह भी कि बोलता प्रसाद के सामने बाहर के अच्छा लिखने वालों की तारीफ क्यो ंकर देता हूँ ? क्यों कह देता हूँ कि अमुक विषय पर बोलता जी, शिरीष और अशोक जैसे युवा आपसे खराब नहीं बोलेंगे ? आशय यह कि आपसे अच्छा बोलेंगे। पाठक स्वयं जान सकते हैं कि कुंठा और हताशा की मनोदशा में किस तरह के लोग रहते हैं ? सोचिए कि कहीं किसी जगह एक युवा कवयित्री के संग्रह पर मैं दो शब्द कह रहा हूँ, कुछ अच्छा कह रहा हूँ। अलबत्ता इस माध्यम पर आठ-दस दिन अनुपस्थित रहने के बारे में भी थोड़ा-सा सफाई जैसा कुछ और वह भी कोष्ठक में कहकर आगे बढ़ जा रहा हूँ। कवयित्री की कविताएँ रख रहा हूँ। ध्यान दीजिए कि ऐसे ही एक बोलता प्रसाद राय उस पोस्ट पर फाट पड़ते हैं हरहराकर दौड़ते हुए साँड की तरह। न जगह देखते और न अवसर, बहुत अपमानजनक भाषा में शास्त्रार्थ शुरू कर देते हैं। कहते हैं कि पाण्डेय जी टेबल पर मुक्का मार-मारकर बात करने की मनोदशा में न पहुँच जाएँ तो कुछ अर्ज करना चाहता हूँ। शुरू में ही पाण्डेय जी को मनोरोगी कहते हैं, असामान्य कहते हैं। नासमझ और असंयत कहते हैं। सोचिए भला कैसा लगेगा ? अर्ज भी साहब बिल्कुल साँड़ाना अंदाज में करते हैं कि बताइए कि अनगढ़ता कविता की लय में कभी-कभी वेग को तीव्र करके कविता के सौदर्य को बढ़ाती कैसे हैं ? आगे दूसरी टिप्पणी में ज्ञान-मीमांसा की बात करते हैं। उन्हें संदर्भ चाहिए, फुटनोट चाहिए। जैसे मैं उस कवयित्री की किताब पर शुभकामना के शब्द नहीं कोई शोधपत्र लिख रहा हूँ। बहरहाल वह भी बुरा तो था पर ज्यादा बुरा नहीं था, लेकिन सबसे बुरा यह था कि उन्होंने एक पंक्ति में जानने की गरज से यह नहीं पूछा। अपने ज्ञान से साँड की तरह उठाकर पटक देने के लिए कि लो मैं काव्यशास्त्र पढ़ाता हूँ तो मैंने कुछ पढ़ रखा है, लय को जानता हूँ। यह बात कितनी बेवकूफी की है कि कोई अध्यापक यह सोचे कि वह लय जानता है और कवि जो कविता करता है वह उससे कम लय जानता है या उसके सामने घास छीलता है, पानी भरता है। जबकि अहंकार में डूबे बोलता प्रसाद राय जैसे लोग यह नहीं जानते हैं कि लय ही नहीं हिन्दी कविता  और आलोचना की भाषा को वे कवि ऐसे बोलता प्रसाद राय जैसे लोगों से बेहतर जानते हैं, वे कवि भी जिन्होंने विद्यार्थी के रूप में हिन्दी की विधिवत या संस्थागत शिक्षा नहीं ली है। इतना ही नहीं विज्ञान के विद्यार्थी रह चुके हिन्दी के कई युवा कवि ऐसे बोलता प्रसाद राय जैसे लोगों से अधिक हिन्दी संवेदना और काव्यशास्त्र जानते हैं। अधिक यहां भूसे के मंडीले के अर्थ में नहीं है। गुणवत्ता के अर्थ में है। हो सकता कि नाम भी पूछा जाए कि बताइए कौन युवा कवि है जिसकी हिन्दी कविता और आलोचना की समझ ऐसे बोलता प्रसाद राय जैसे लोगों से अच्छी है। उदाहरण माँगने वालों के लिए पहले से एक उदाहरण दे देना चाहिए। दूर का नहीं भाई, यहीं का बिल्कुल पास का। अपने विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातकोत्तर करने वाले युवा कवि नील कमल का नाम लेता हूँ और कहता हूँ कि इस कवि के पास कविता की भाषा की समझ ही नहीं, आलोचना की भाषा की समझ भी बोलता प्रसाद राय जैसे लोगों से बहुत अच्छी है। नील ही नहीं, और भी है। केशव तिवारी कामर्स के विद्यार्थी रहे हैं, अशोक अर्थशास्त्र के, पर क्या ये कविता की भाषा और आलोचना की भाषा बोलता प्रसाद राय जैसे आचार्यों से कम जानते हैं ? हिन्दी के समकालीन परिसर में ही युवा कवियों में अरुण देव, शिरीष कुमार मौर्य, जितेंद्र श्रीवास्तव, महेश पुनेठा आदि की समझ और भाषा ऐसे आचार्यों से अच्छी है। जबकि ये नाम बोलता प्रसाद राय जैसे लोगों से कोई दस-पन्द्रह साल छोटे हैं।  उम्र में काफी छोटे और शिष्य, यहीं अपने विभाग के दीपक प्रकाश त्यागी की ही आलोचना की भाषा ऐसे बोलता प्रसाद राय जैसे आचार्यों से कहीं अधिक अच्छी है। समझ भी। संपादक के रूप मेंं कृतियों की अच्छी पहचान है। दुर्भाग्य यह कि साहित्य में झोलाछाप आलोचकों और आलोचना के दलालों का धंधा ऐसे ही बोलता प्रसाद राय जैसे लोगों की वजह से चल निकला है। कुछ और अच्छा और मूल्यवान लिखने की जरूरत ही क्या है जब स्थानीय पत्रकार कोई लेख देखे बिना ही युवा आलोचक के रूप में नाम छापने लगते हैं और अखबार में नाम देख-देखकर यह भ्रम हो जता है कि मैं तो आलोचक बन गया। अखबारों में नाम और बड़े नामों के सेवक पद का मद सिर पर चढ़कर बोलता है। किताब रटने के अहंकार में डूबे बोलता प्रसाद राय जैसे कुछ लोग तभी उस सुंदर पोस्ट को तहस-नहस करने की साँड़ाना कोशिश करते हैं। असल में ऐसे साँड़ो के पुट्ठे पर मालिकों के नाम खुदे होते हैं। कई-कई नाम खुदे होते है। वे अपने उत्पात से अपने मालिकों के नाम भी रोशन करते हैं। भला बताइए कि उस युवा कवयित्री की पोस्ट में गोबर गणेश की कविता से क्या लेना-देना था। मैंने खुद ही खुद को गोबर गणेश कहा है कि वे क्या कहेगें जो गोबर से भी कमतर हैं। गोबर गणेश दरअसल ‘नरक का कवि हूँ’ कविता में आता है-

जिस नरक का कवि हूं
जिस शहर का कवि हूं
कई लालाओं का खसरा-खतौनी है
तो कई पंडिज्जियों का पोथी-पत्रा
कई बंदों की इबादतगाह है
कई ठगों का हिंदीबाजार है
कई का उर्दूबाजार
लालाजी हां
पंडिज्जी हां
नरक का कवि हूं तो हूं
कुछ भी नहीं हूं तो क्या
गोबर का गणेश हूं तो क्या
हूं तो हूं नरक का कवि हूं
लालाजी नहीं हूं तो क्या
पंडिज्जी नहीं हूं तो क्या
पानीपांड़े हूं तो क्या
हूं तो हूं
खुश तो हूं
नरक का कवि होने पर
यहां से वहां तक सिरपर
दुनियाभर का मैला ढ़ोने पर
लो देख लो लालाजी
हां-हां पंडिज्जी देख लो गौर से
खड़ा तो हूं सामने
थोड़ा-सा मैला निकालकर
चंदन की जगह पोत लो
लालाजी हां
पंडिज्जी हां।
         जानता था कि एक दिन नरक के ये बोलता प्रसाद राय जैसे आचार्य कहेंगे कि गोबर गणेश हूँ। गनीमत यह कि पंडिज्जी और लाला जी ने अपने मुखारविन्द से अभी ऐसा तो नहीं कहा, लेकिन आचार्य बोलता प्रसाद राय ने आखिर ऊचे सुर में अंग-अंग से बोला। बोला कि गोबर गणेश की कृतियाँ मेलाघुमनी टाइप हैं। कहा कि गोबर गणेश साहित्यकार नहीं है। साहित्यकार एक बड़ा मूल्यवाची शब्द है और उसकी मूल आत्मा की दृष्टि से गोबर गणेश साहित्यकार नहीं हैं। इतने पर भी आचार्य चुप नही हुए, कहा कि गोबर गणेश क्या उनके कई पूर्वज लोग भी इसके लिए उपयुक्त नहीं बैठते। मैंने सोचा भाई चलो बोलता प्रसाद राय से ही पूछ लते हैं कि यहाँ के विश्वनाथ जी, रामदेव जी, अनंत जी इत्यादि साहित्यकार हैं या नहीं ? कविता में मेरे यहां के पूर्वज देवेंद्र कुमार साहित्यकार थे या नहीं ? मेरी तो कविता ही है-
कई कवि देखे
कई तरह के कवि देखे
कोई मधुकर था यहाँ
कोई काला था कोई दिलवाला
कोई परमानंद कोई विश्वनाथ।
देवेंद्र कुमार को यहीं देखा
अपनी हीर कविता के लिए राँझा बनते।
यहीं देखा फक्कड़ अनंत को
क्विता राधा को देखते और देखते रह जाते।
यहीं जाना मैंने
क्या होता है कविता के लिए मर मिटना। (1996)
  कहना यह है कि क्या आलोचना के लिए मर-मिटना जरूरी नहीं होता है। आलोचना के लिए मर-मिटने का मतलब पुरानी शब्दावली और लहजे को पीकर वमन करते रहना नहीं है। आखिर छोटे सुकुल आलोचना की टोनहिन क्यों कहते हैं ? आचार्य बोलता प्रसाद राय को तो छोटे सुकुल से भी बहुत ईर्ष्या है। पहले मेलाघुमनी टाइप कृतियों की बात। छूट न जाए। राय साहब ने अपनी दिव्य दृष्टि से मेरी कृतियों को मेला घुमनी टाइप कहा है। जानना चाहता हूँ कि उनके गॉडफादर के गॉडफादर विश्वनाथ जी की कृतियाँ भी फिर तो मेला घुमनी टाइप हुईं या नहीं ? उनकी कृतियाँ महान कैसे हुईं ? विश्वनाथ जी हों या अनंत जी या खुद मैं महान कवि नहीं हैं, लेकिन मेलाघुमनी टाइप भी नहीं हैं। कम से कम अपने बारे में दावे के साथ कहता हूँ कि तीस-पैंतीस वर्ष हुए मैंने इस शहर में एकल काव्यपाठ नहीं किया है। ऐसा इसलिए कि दृश्य पर तमाम मूर्खताएँ होती रहीं हैं। कविता से प्यार करता हूँ। उन जगहो पर रहना पसंद नहीं करता जहाँ आप जैसे लोग कविता का अपमान करते हों। देवेंद्र कुमार बंगाली आज जीवित होते तो जापानी बुखार पर कविता पहले उन्होंने ही लिखा होता, मुझसे भी अच्छा लिखा होता। मैंने उनका छोड़ा हुआ काम किया है। बाबू बोलता प्रसाद राय आपने किसका काम आगे बढ़ाया है ? रामचंद्र तिवारी का या परमानंद श्रीवास्तव का  ? किया क्या है ? कुछ किया भी है या साहित्य में मुहल्ला स्तर की लफंगई की है ? लफंगई भी ऐसी कर पाए हैं कि मैनेजर पाण्डेय ने जैसे छोटे सुकुल के लेख पर आलोचना में कहा कि यह अब तक की हिन्दी आलोचना की सबसे बड़ी लफंगई है, ऐसा कुछ कहें ? जिसके अपनें हाथ होते हैं, वह अच्छा या अच्छाबुरा दोनों कर सकता। जिसके पास अपने हाथ नहीं होते हैं अर्थात अपनी भाषा नहीं होती है, आलोचना के मुहावरे नहीं होते हैं, अपनी शैली नहीं होती है वे आलोचना के नाम पर केवल भूसा छाप प्लास्टिक की आलोचना लिखते हैं। बेजान, बेस्वाद। ऐसे कई नकली आलोचक लोग हैं। असली आलोचना की भाषा पठनीय और सर्जनात्मक तथा आलोचक की छापयुक्त होती है। चाहे रामचंद्र शुक्ल की आलोचना भाषा हो या रामविलास शर्मा या नामवर जी की। सब साफ-साफ लिखते हैं। जलेबी नहीं बनाते हैं। बताइए साहब, मेरी कविताएँ मेलाघुमनी हैं। मेरा रीफ उपन्यास मेला घुमनी है! जिस पर शिरीष ने भावुक होते हुए एसएमएस किया कि ‘‘अधबिच में हूँ पर आने को रोक नहीं पा रहा हूँ।’’ दुख बोलता प्रसाद राय जैसे लोगों पर उतना नहीं जितना विश्वनाथ जी पर है कि आखिर आप के उपरत्नों मे ऐसे लोग क्यों हैं ? क्यों आपके नवरत्न अपने नवरत्नों में ऐसे लोगों को शामिल करते हैं जो स्वाभिमानी लेखकों का अपमान करते हैं ? ऐसे लोग आलोचक क्या आलोचना का द्वारपाल भी नहीं बन सकते जो निष्ठापूर्वक अपना काम करने वाले लेखकों का अपमान करते हैं। साहित्य की मुश्किल यह कि जिनके पास बचपन में करधन में आगे पहनने वाली चाँदी की एक गुल्ली टाइप चीज भी नहीं है वे आलोचना का शेर बनना चाहता हैं। किताबें तो दूर जिनके पास एक ढ़ंग का लेख तक नहीं है, जिसे विश्वनाथ जी ने पढ़ा हो।
     उस सुंदर पोस्ट पर टपक पड़ने वाले महाशय को समझाने के लिए पहली टिप्पणी है- आप मुझसे उम्र में सात साल छोटे हैं पर विद्या की दुनिया में काफी बड़े हैं। बहुत पढ़ा है आपने। एक गणेश पाण्डेय को छोड़कर इस शहर और बाहर के सभी समकालीन लेखकों को पढ़ा है। मैं तो आज की तारीख में यहाँ कुछ भी नहीं हूँ। मैंने कुछ किया ही नहीं है। मुझे छोड़कर आप सब ने सारा काम किया है। यह सब इसलिए कह रहा हूँ कि मुझे आपके समक्ष या आप जैसे आचार्यों के समक्ष अपने को रखने की जरूरत नहीं अनुभव करता। विश्वनाथ जी भी-जिनकी टीम में आप जैसे कई लोग हैं-मुझे यह नहीं कहेंगे कि मैं आप सभी आचार्यों से प्रमाणपत्र लूँ। आप पूछ लें यदि वे कह दे ंतो मैं उसी तरह निवेदन करूँ, जैसा आपने अपने नितांत सर्जनात्मक और मौलिक आलोचनात्मक गद्य में किया है। पहले मैंने भी अनुभव किया कि आपको कुछ न कहूँ और हँसकर टाल जाऊँ, पर यह भी लगा कि ऐसा करना आपके प्रति अनादर होगा, इसलिए एक शब्द कह रहा हूँ। दो शब्द इसलिए नहीं कि आपने पहली बार कुछ कहा है और पूरा दो शब्द कहा है। पूरा का पूरा दो अविस्मरणीय शब्द। आपके दो शब्द के उत्तर में सिर्फ एक शब्द। इसकी भी जरूरत नहीं थी, काम सिर्फ इस एक कविता से चल जाता, जो आपके समक्ष रखने की गुस्ताखी कर रहा हूँ। हाँ, दूसरी बार भी कुछ कहिएगा तो भी पच्चीस वर्ष के आपके जीवन  को देखने के बाद भी आपका सम्मान करूँगा। तीसरी बार निवेदन जरूर करूँगा। टूटा-फूटा। कविता देखें-पहले संग्रह की कविता है, पर आज भी कुछ कहती है-शीर्षक है- ‘‘वे युवा थे, पटु थे, आलोचक थे’’-
वे कोई हीरामन नहीं थे
जायसी नहीं थे वे कोई
कुछ भी नहीं थे वे
साफ-साफ।
कभी दिखते थे पट्टू जैसे
करते मृदु संभाषण
कभी तो लगते थे चुकंदर जैसे
अति विशिष्ट।
वे जहाँ-जहाँ जाते थे
जिस संगोष्ठी में, जिस समारोह में
अपना पिजड़ा साथ ले जाते थे
एक बाहर, एक भीतर।
असल में, उन्हें दो से कम
कुछ भी नहीं चाहिए था
दो जीवन, दो जबान, दो नाव
दो निष्ठा, दो से अधिक मैना।
वे युवा थे
पटु थे, राघव चेतन के रिश्ते में थे
रहते थे खबरों में शीर्ष पर
और उतने ही सक्रिय।
जबकि उनके पास
कुछ भी नहीं था उनका अपना
यहाँ तक कि उनकी वह कंठस्थ
भाषा भी।
असाधारण यह, कि
इसी शहर ने दिया था उन्हें
प्रज्ञा च्युत मान।
इसी के साथ स्नेह और आशीष का दोना भी। फेंक दीजिएगा तो भी बुरा नहीं मानूँगा। वे माने नहीं। फिर कुछ कहा। फिर कहना ही पड़ा- मैंने ऊपर कहा था कि विश्वनाथ जी से पूछ लीजिए कि आप जैसे आचार्य को कुछ बताने की जरूरत है या नहीं, लेकिन आपने पूछा नहीं। शायद आपको साहित्य में बिना कुछ मूल्यवान किये ही विश्वनाथ जी से बड़ा होने का भ्रम है। ऐसा इसलिए कहा था कि उन्हें इतना तो पता ही होगा कि आपका काम और मेरा काम किस प्रकार का है। वे जरूर कोई एक शब्द आपसे कहेंगे। आप तो खुद ही आत्ममुग्धता के शिकार हैं। साहित्य के अध्यापक हैं और यह नहीं जानते हैं कि आज का आलोचक किन शर्तों पर किसी का नाम लेता है और क्यों नहीं लेता है। इसी शहर के किन-किन लेखकों-अलेखकों ने किन-किन आलोचकों का चरणरज लिया है। आपसे बात करना इसलिए तकलीफदेह है कि आपने पहले खुद बड़े-बड़े आलोचकों और कवियों के साथ रहने के बाद आज की तारीख तक कुछ (अविस्मरणीय) नहीं किया है। यह कहता नहीं, लेकिन सिर्फ उदाहरण देने के लिए उल्लेख कर रहा हूँ। कहने का आशय यह कि साहित्य की दुनिया में अक्सर कई लेखक अपने समय में अपनी शर्तों अर्थात दूसरों का पाजामा-धोती साफ न करने की जिद की वजह से कई बार चर्चा और पुरस्कार की दुनिया से दूर रहते है। आप जैसे लोग यह मान ही नहीं सकते हैं कि आज साहित्य में कहीं कोई महाभ्रष्टाचार है। भला वे क्यों ऐसा मानेंगे, जो बिना टिकट उस रेल में सफर कर रहे ह, जिसमें उन्हें नहीं होना चाहिएं। मेरा कहा हुआ सबके सामने है। अपने बारे में भी मंथन कीजिए कि आपका कहा हुआ किसके सामने है ? विश्वनाथ जी के सामने है या नहीं ? मैंने विश्वनाथ जी और परमानंद जी की भी आलोचना की है, लेकिन तब जब कुछ टूटा-फूटा कर लिया है। आपको खुद के मूल्यवान और क्रांतिकारी लेखन को सामने लाना चाहिए। जरूर आपके पास मौलिकता का कोई अक्षयभंडार होना चाहिए, जिसे दुर्भाग्यवश  अब तक देखा नहीं जा सका है और जो देखा गया है, वह मेरी समझ से साहित्य का भयानक है। साहित्य का आत्मसंघर्ष तो आप जैसे लोगों के पास है, हम लोगों के पास भला क्या है ? कुछ कहना तो नहीं चाहिए, फिर भी कह रहा हूँ कि जो दूसरों की बेईमान चर्चा और तिकड़मी पुरस्कार की वजह से किसी को बड़ा समझते हैं वे लोग साहित्य के कीट-पंतग होते हैं। जो खुद की आँख से साहित्य को देखते हैं वे सच्चे आलोचक होते हैं। दुर्भाग्यवश आपने इसे नहीं समझा है। आपने इसे भी नहीं समझा है कि जब दिल्ली के आलोचना के दरबार में कोई बच्चा पैदा कर दिया जाता था तो यहां के आलोचकों को डिठौना लगा कर दे दिया जाता था और वे दाई की तरह उसका पालन-पोषण करते थे। मैं तो पचास की उम्र के बाद दिल्ली गया। गोरखपुर में किस तरह का जीवन जिया हूँ उसे देखने की आँख आपके पास होती ही तो आप वह नहीं कहते जो कह रहे हैं। आप जिसे आत्मप्रचार कह रहे हैं, उसके बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं है। मेरा एक लेख ‘आत्ममुग्धता का संसार’ देख सकते हैं। कई लेख हैं, एक तो ‘साहित्यिकमुक्ति का प्रश्न उर्फ इस पापागार में स्वागत है संतो’ ही है। असल में आप खुद अभी साहित्य के पुरस्कारवाद और पीछेचलवाद के प्रभाव क्षेत्र में हैं। कुछ कहना नहीं है, इसलिए कुछ कह नहीं रहा हूँ। सबसे कहा भी तो नहीं जाता है। फिर अगली टिप्पणी में कहना पड़ा-ऊपर काफी कुछ है। मेरी एक सीमा यह है कि आपसे उम्र में थोड़ा बड़ा हूँ, इसलिए अधिक कुछ नहीं। र्प्याप्त है। बस अंत में आपके के ही इस कथन पर आपका ध्यान ले जाना चाहूँगा कि साहित्य पढ़ाने वाला अपने को साहित्यकार समझने लगता है। आप ऐसा समझते हैं कि आप साहित्यकार हैं और मैं नहीं हूँ तो मुझे कुछ नहीं कहना है। क्यों कहूँगा, क्यों कि आप जैसे लोग साहित्यकार होंगे तो जाहिर है कि मेरे जैसे लोग साहित्यकार नहीं होंगे। इस शहर के बारे में आज तक कम नहीं कहा है, कहना कुछ-कुछ आता भी है। पहले कह  चुका हूँ कि सबसे कुछ कहा नहीं जाता है। रहा सवाल आपका तो विनम्रतापूर्वक, बल्कि शीश झुकाकर कहता हूँ आपको अपने बारे में अच्छा कहने के लिए सौ जन्म में योग्य समझना मेरे लिए मुश्किल है, पर हाँ, कम से कम इस जन्म में आपको अपने (मेरे) बारे में बुरा तक कहने के योग्य नहीं समझता। आप चाहें तो इत्मीनान के लिए विश्वनाथ जी से पूछ लें कि आप मुझे बुरा कहने के योग्य हैं। एक मजेदार संदर्भ यह कि उसी पोस्ट पर जब समीर कुमार पाण्डेय ने कुछ कहा तो उसके नाम की स्पेलिंग पर आ गये। साहित्य रट लेने से साहित्य का संस्कार और विवेक नहीं आता। साहित्य जीने से आता है। एक साधारण व्यक्ति भी जानता है कि नाम और नाम की स्पेलिंग माता-पिता रखते या लिखते हैं या स्पेलिंग बनाने-बिगाड़ने का काम स्कूल के पंडिज्जी करते हैं। क्या बोलता प्रसाद राय जैसे लोग जन्म लेते ही अपने नाम की वर्तनी शुद्ध करते हैं। समीर से कहा कि नाम बदलना चाहिए था। भला मैनेजर पाण्डेय से क्यों नहीं कहा कि नाम बदलना चाहिए था, अंग्रेजी में है या हिन्दी में प्रबंधक पाण्डेय करना चाहिए था। हजारी प्रसाद द्विवेदी से भी कुछ कहना चाहिए था। धूमिल, जवरीमल पारख, जितेंद्र कुमार आदि बहुत से लोगों से कहना चाहिए था। बहरहाल यह सब कहता नहीं, यदि बिना किसी दुर्भावना के सीधे-सीधे अनगढ़ता से लय में वेग की तीव्रता को लेकर खुलेमन से कुछ जानने की निर्मल इच्छा व्यक्त की गयी होती। बहुत आसान था उत्तर देना, पर शुरू में ही मेज पर मुक्का मार-मार कर जोर-जोर से बोलने वाले मनोरोगी के रूप में मेरा स्वागत किया गया, मेरी कृतियों को मेला घुमनी कहा गया, साहित्यकर्मी पद से वंचित किया गया, दो दिनों से भाग रहे हैं कहा गया, तो आखिर मैं क्या करता, यह सब न कहता ! क्या समय आ गया है, एक समय में नामवर जी बोलते थे तो जादू छा जाता था, उनकी अपनी भाषा होती थी, सत्यप्रकाश मिश्र बोलते थे या मैनेजर पाण्डेय बोलते हैं तो श्रोता की आँख में आँख डाल कर बोलते हैं, लगता ही नहीं था सामने बोलने की कोई मशीन है, जैसे खुद वाणी ने रूप धर लिया हो, जो बोलने की मशीन बन जाते हैं, उनकी कोई और पहचान नहीं बन पाती है, कोई नाम नहीं हो पाता है, अच्छा-खास आदमी सिर्फ बोलने की मशीन बन जाता है। जाहिर है कि ऐसी मशीनों के ही नाम बोलता प्रसाद राय होते हैं, किसी सचमुच के आदमी के नहीं। अच्छे लेखक की निजी छाप कलम पर ही नहीं, जुबान पर भी होती है। अंत में अनगढ़ता से लय में तीव्रता के बिन्दु का सवाल तो उनके ही सबसे प्रिय कवि केदार जी के सामने धूमिल का नाम लेता हूँ। एक में कविता की कीमियागीरी है तो दूसरे में अनगढ़ता। देखें कि धूमिल की कतिता में कितना वेग (बल) है। अंत में अपनी ही एक अनगढ़ कविता दूसरे संग्रह से ऐसे ही दिनों और इसी शहर के लिए लिखी गयी, तनिक बल इसमें भी है-‘जहाँ’
अच्छा हुआ
कि मैं वहाँ कम जाना गया
जहाँ थोड़े-से आदमी रहते थे
और चूहे बहुत ज्यादा।














रविवार, 18 मई 2014

टेंघती हुई अम्मा क्या चाहती है

-गणेश पाण्डेय

पके हुए आम हैं बाऊ जी
कुछ ठीक नहीं

ज्यों कोई पत्ता खड़केगा
बगिया की चुप्पी तोड़ते हुए
कंपकंपी छूटने लगेगी अम्मा को

अम्मा की धँंसी हुई और पियराई
आंखों में झाँक सको तो देखो
पके हुए मोतियाबिंद को भेदते हुए
घरेलू लड़ाइयों का जुझारू इतिहास

पेड़ की जड़ों में पानी देती हुई
जवानी के दिनों की हँसमुख
और छपेली साड़ियों की शौकीन अम्मा
किस गली में चंपत हो गयी अचानक

यह कौन है टेंघती हुई अम्मा
क्या चाहती है

पूछो-पूछो अपनी जेब से पूछो
अम्मा की गिरवीं पाजेब से पूछो

तिजोरी के आगे बेचारी पाजेब
अपना दुखड़ा सुनाये भी तो
सावजी की मर्जी के खिलाफ
भला कैसे हो सकती हैं तिजोरियां
टस से मस।

(1982)




मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

कुछ कविताएं/

-गणेश पाण्डेय


उठा है मेरा हाथ

मैं जहाँ हूँ
खड़ा हूँ अपनी जगह
उठा है मेरा हाथ।

रुको पवन
मेरे हिस्से की हवा कहाँ है।

बताओ सूर्य
किसे दिया है मेरा प्रकाश।

कहाँ हो वरुण
कब से प्यासी है मेरी आत्मा।

सुनो विश्वकर्मा
मेरी कुदाल कल तक मिल जानी चाहिए
मुझे जाना है संसद कोड़ने।

(1996)


पूरे शरीर से


कई बार पसीजती हैं हथेलियाँ
कहना चाहती हैं कि बस
मुझे विदा करोे

कई बार दृश्य के विरुद्ध
उद्यत होती हैं 
आँखें

कई बार उठते हैं हाथ
कि पूरा चाहिए, अपना
राज्य

कई बार बाजार से लौटकर
सीधे लाम पर जाना चाहते हैं
पैर

कई बार मचलता है मेरा दिल
और पूरे शरीर से होती है
बम होने की इच्छा।

(1996)



मुहावरे


तुम्हारी आँखें, तुम्हारी भुजाएँ
तुम्हारे पैर, तुम्हारी छाती
और तुम्हारा सिर
कुछ नहीं लेंगे वे

तुम्हारे बारे में गोपनीय सूचनाएँ
सामरिक महत्व के ठिकानों के पते 
और साथियों के नाम
कुछ भी नहीं लेंगे वे

वे आएँगे तुम्हारे बीच
कोई भी रूप धर कर
उठाएँगे तुम्हारे मुहावरे
और सब ले लेंगे।

(1993)

दरअसल वे पिछड़े थे

जिनके पास पीने भर का साफ पानी नहीं था
जिनके पास दो जून का मनचाहा अनाज नहीं था
जिनके पास मुर्दे की तरह लेटने भर की जगह नहीं थी
जिनके पास नियम में छेद करने का कोई औजार नहीं था
जिनके पास जीने भर का कुछ भी नहीं था
जिनका कभी किसी संसद में आना-जाना नहीं था
जिनके लिए किसी भी तरह का बाजार
एक लंबी और अंतहीन दौड़ का डरावना सपना था
सबसे खराब बात यह कि जिनके पास कोई खतरनाक
शब्द नहीं था
दरअसल वे पिछड़े थे।
वे पिछड़े थे कि उनके प्रतिनिधि तनिक भी नहीं पिछड़े थे ।


(1996)





गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

बेताब हो रहे हैं नब्बे करोड़ पुरवे

-गणेश पाण्डेय

मेरे शरीर के आँवें में
बेताब हो रहे हैं नब्बे करोड़ पुरवे
दुनियाभर के होंठो को  चूमने के लिए

निकल पड़ना चाहता हूँ चाय की गंगा लेकर
गाँव-गाँव, कस्बा-कस्बा, शहर-शहर

यहाँ-वहाँ, इस पर-उस पर
पूरे आसमान पर लिख देना चाहता हूँ चाय
गरुड़ की पीठ पर बैठ कर

मठाधीशों और इमामों के अँगरखे पर
छिड़क देना चाहता हूँ एक सौ आठ बार चाय

हृदय की अँगीठी पर
रक्त और धड़कनों की मिठास से बनी चाय

सबको पिलाना चाहता हूँ गरमागरम चाय
और सबसे मिलाना चाहता हूँ हाथ

हवाओं में भर देना चाहता हूँ चाय की आदिम गंध
सुनाना चाहता हूँ सबको भीतर के तारों पर
चाय का संगीत।

(1993)




सोमवार, 14 अप्रैल 2014

लेखक होने का अर्थ

-गणेश पाण्डेय

     कोई पांच दिन लेखक होने की अपनी ज्यादा और दूसरों की बहुत कम मूर्खता से दूर रहा। कहें कि पूरी तरह मुक्त रहा। यह मुक्ति बड़ी प्रतिकर थी। न कोई मोदी, न कोई राहुल, न कोई मुलायम न कोई आजम, न अमुक-ढ़मुक लेखक जी लोग। बेटियों के पास उनकी यूनिवर्सिटी और इंस्टीट्यूट के परिसर में और उनके साथ एक-एक क्षण। बीच-बीच में फोन आते तो हां-हूं, नहीं और बाद में कह कर काटता रहा। सच आप माने या न माने पिता का पद लेखक के पद से ही नहीं, पृथ्वी के बड़े से बड़े पद से बड़ा होता। आप न माने, आपकी मर्जी और लेखक होने की आपकी महानता का आदर फिर भी करूंगा, पर विनम्रता के साथ यह भी कहूंगा कि हम जो पैदा हुए हैं तो किस काम के लिए ? हमारा नैसर्गिक दायित्व क्या है ? पिता होना अर्थात सृष्टि को चलाना या प्रधानमंत्री होना ? हम कहीं नौकरी करते हैं या कोई व्यवसाय करते हैं या कृषि का कार्य करते हैं तो अपने घर-परिवार के लिए ही। लेकिन हम सिर्फ अपने घर-परिवार के लिए सब नहीं करते हैं, कुछ दूसरों के घर-परिवार के लिए भी करते हैं। हम एक साथ परिवार और समाज के सदस्य होते हैं। परिवार तो अपने आप में समाज की एक इकाई है ही। बहरहाल कहना यह कि पूरी तरह बच्चों के साथ रहा पांच दिन। इस बीच फेसबुक की राजनीति विषयक टिप्पणियों अर्थात फेसबुकी पत्रकारिता से दूर रहा। दूर तो सचमुच के अखबार से भी रहा। बमुश्किल दो-चार मिनट टीवी से आमना-सामना हुआ। नही ंके बराबर। 
    हां, भले हमें राजनीति से दूर रहना कभी प्रीतिकर लगे, लेकिन सच्चाई यह है कि राजनीति का प्रभाव सब पर पड़ता है। मनुष्य तो मनुष्य, सचमुच के पशुओं पर भी। उसके निर्णय और उसकी नीतियां, हमारे बच्चों के भविष्य को प्रभावित करती हैं। कहना चाहिए कि सबके बच्चों को प्रभावित करती हैं। इसलिए अपने समय की राजनीति की अनदेखी बड़ी ना समझी है। देखना तब अच्छा होता है, जब हम ठीक से देखें। सम्यक। आगे देखें, नीछे न देखें या दायें देखें और बायें न देखें तो इस देखने का वह प्रतिफल नहीं मिलेगा जो पूरा देखने पर मिलेगा। यह इसलिए कह रहा हूं कि फेसबुक पर कभी-कभी राजनीति के पंडितों के विचार और तर्क इत्यादि से अरूचि पैदा हो जाती है। छाछठ-सड़सठ साल में भी इस देश से गरीबी दूर नहीं हुई। असमानता जस की तस है। बीच में एक मष्यवर्ग जरूर थोड़ा फैल गया है, पर वह पूरा देश नहीं है। कुछ नौकरी वाले लोग कुछ सुविधाएं और अवसर पा गये हैं, कुछ दूसरे लोगों को भी तलछट से कुछ मिल गया होगा, पर देश की बुनियादी समस्याएं जस की तस हैं। पूरे पांच दिन मैं जहां-जहां गया, मध्यवर्ग के बाहर की दुनिया मेरा पीछा करती रही। यात्रा में गरीबी मेरे साथ यात्रा करती रही। कण-कण में दिखी गरीबी। हर जगह झुग्गी-झोपड़ी और बेघर लोग दिखे। समतल हो या पहाड़, गरीबी का घर हर जगह दिखा। मिट्टी के कच्चे घर, छत फूस की। कोई दरवाजा नहीं, न किस्मत का, न पैसे का, न व्यवस्था का...शुरू में इसीलिए लेखक होने की मूर्खता का जिकर किया है। क्या विख्यात मोदी जी के आने से, इस देश में सम्पन्नता या खुशहाली आ जाएगी ? आएगी तो किस वर्ग के लिए ? क्या कुख्यात मोदी जी के न आने से गरीबी उड़नछू हो जाएगी ? बेरोजगारी दूर हो जाएगी ? अपराध मिट जाएंगे ? क्या हिंदी का बड़े से बड़ा लेखक आज चुनाव लड़ने में सक्षम है ? एकाध करोड़ खर्च कर सकता है ? फिर यह मूर्खता लेखक क्यों करे कि बस यह नहीं ? लेखक को यह नहीं कहना चाहिए कि यह, यह, यह, यह सब नहीं ? पार्टियां पवित्र हैं, व्यक्ति खराब ? यहां तक भी बहुत बुरा नहीं, चलो किसी एक का विरोध कर लो, लेकिन क्या यह चुनाव से पहले मान लिया है कि किसे देश का नेता बनना है ? पक्का है ? कोई और दृश्य नहीं हो सकता है, यह नहीं हो सकता है कि पार्टी में ही कुछ ऐसा हो जाए कि किसी और को नेता बनाना पड़ जाय ? उस स्थिति में आपके आकलन का क्या होगा ? चलो वह न बने तो जो अब तक रहा है, वही आ जाए तो बुनियादी समस्याएं हल हो जाएंगी ? पिछले छाछठ सालों में किसका-किसका पेट फूला है ? विपन्न तो आज भी जस का तस है। स्त्री आज भी उतनी ही असुरक्षित है। असुरक्षित भी और असमानता की शिकार भी। जिसे भी चुनते हैं कि जाओ जरा हाकिम से बात करो कि क्यों व्यवस्था ऐसी है ? वह जाता है बात करने और खुद हाकिम बन जाता है-

‘ऐसा क्यों है वहाँ 
बिजली नहीं है वहाँ 
रास्ता नहीं है, पानी नहीं है शुद्ध
कोई आदमी नहीं है वहाँ
जो कर सके हाकिम से बात।
हर बार मत के भाड़े पर
वे बुलाते हैं जिस आदमी को
वही हाकिम हो जाता है।’’ 
(वे बुलाते हैं जिस आदमी को / ‘जल में’ से)
 
       आप लेखक जी लोग कहते हैं कि इसको नहीं ? अरे भाई मैं जानना चाहता हूं कि किसको ? बताते क्यों नहीं कि फिर किसको ? मैं अच्छी तरह अनुभव करता हूं कि किसी अमुक जी के आने से यह देश सोने की चिड़िया नहीं होने जा रहा है, चलो मान लूं कि सोने की चिड़िया हो भी जाए तो वह चिड़िया घुरहू-निरहू की फूस की झोपड़ी में वास नहीं करेगी ? वह वास या उपवास का नाटक जो भी करेगी अमीर-उमरा की कोठी में ही करेगी। चुनाव के पहले हो या बाद में नेता जी लोग कहते कुछ और हैं, करते कुछ और हैं। कहते हैं कि चोर को पकड़ने का कानून बनाएंगे और पीछे से उसी में बचने का रास्ता भी निकाल देंगे। कहते हैं कि गरीबी दूर करंेगे और अमीरो की अमीरी और बढ़ाने का रास्ता निकाल देंगे। परिवर्तन का स्वांग करने वाली पार्टी भी जाति और धर्म के आधार पर चुनाव लड़ती है। हर दल राजनीति के हम्माम में एक-सा है-

‘‘फिर उपराये
नये-नये छपहार
घुसकर, घर-घर
खोज-खोज कर 
आजू-बाजू, छाती-पुट्ठ
अंग-अंग पर छापा जीभर
टीका।
उल्टा टीका, सीधा टीका
छोटका टीका, बड़का टीका
माई का टीका
चाई का टीका
फिर भरमाये
हँस-हँसकर छपहार।
अन्न मिलेगा, पुन्न मिलेगा
राज मिलेगा, पाट मिलेगा
सरग मिलेगा धरती पर
चेहरा-चेहरा फूल खिलेगा
फिर बतियाये
हाथ पकड़ छपहार। 
तंबू लेकर, भोंपू लेकर
सर्कस लेकर, जोकर लेकर
फिर फुसलायें
बड़े-बड़े छपहार।’’
(छपहार / ‘जल में’ से)
 
      मित्रो! यह देश कोई प्राइमरी स्कूल नहीं है और न जनता प्राइमरी की विद्यार्थी कि जैसे हम छपहार के आने की झूठी सूचना से भी भयभीत होकर प्राइमरी स्कूल से भाग जाया करते थे, आज के राजनीतिक छपहारों को विभिन्न मुद्राओं में साक्षात देखकर भाग जायें....तब के छपहार हमें बीमारी से बचाने के लिए टीका लगाते थे, ये जनता को फँसाने के लिए...सच तो यह कि ये राजनीतिक छपहार जनता को अभी भी प्राइमरी का विद्यार्थी ही समझते हैं। समझ की जगह डर पैदा करने वाले लेखक जी, संपादक जी, बुद्धिजीवी जी इत्यादि को क्या कहें...ये इस बड़े सच को क्यों पीठ दिखाते हैं कि जो एक कर रहा है और जिस लिए कर रहा है, दूसरा भी वही कर रहा है। जिन्हें जनता की शक्ति और सत्ता में विश्वास है वे जानते हैं कि जनता आसमान से विकल्प नहीं ला सकती है। मौजूद विकल्पों में से ही उसे कभी इस पार्टी को तो कभी उस पार्टी को चुनना होता है। विकल्प, परिवर्तन और चुनावसुधार के लिए जनता ने किसी बिल्कुल नये या पुराने दल को कोई ठेका नहीं दिया है। विचार, साहित्य और कला की दुनिया के लोगों की भी कुछ जिम्मेदारी बनती है...दुख इस बात का है कि लेखक जी लोग भी पार्टी कार्यकर्ता की तरह प्रतिद्वन्दी पार्टी को चोर है कहते हैं। इस बार तो पार्टी को भी नहीं, सिर्फ किसी एक व्यक्ति को कह रहे हैं। जबकि सब वैसे ही हैं, सत्तालोलुप। कौन है भाई जो सत्ता लोलुप नहीं है ? कौन है जो दमदार विपक्ष बनाना चाहता है ? कौन है ? जब लक्ष्य किसी तरह सत्ता प्राप्त करना होगा तो जायज-नाजायज सब हथकंड़े अपनाए जाएंगे। बात तो तब बनेगी जब लक्ष्य परिवर्तन का हो, सत्ता हस्तांरण का नहीं। इस बात तक पहुंचने में कई सदियां बीत जाएंगी, लेकिन एक लेखक क्या सिर्फ अपने समय से संवाद करता है ? क्या उसकी आवाज रह नहीं जाती है ? क्या बाद में उसे सुना नहीं जाता है ? बहरहहाल फेसबुक पर जिंदाबाद या मुर्दाबाद के नक्कारखाने में तूती की यह आवाज रह जाएगी या नहीं, नहीं जानता। यह ठीक है कि अपने समय में आंख मूंद कर नहीं रहा जा सकता है, जो सामने है, उसका विरोध या समर्थन किया जा सकता है, बल्कि कहना चाहिए कि करना ही चाहिए, लेकिन लेखक सिर्फ अपने समय का मशालची नहीं होता है, उसकी मशाल आगे भी जाती है और राजनीति के आगे तो उसे होना ही चाहिए।




रविवार, 6 अप्रैल 2014

छपहार

-गणेश पाण्डेय

फिर उपराये
नये-नये छपहार
घुसकर, घर-घर
खोज-खोज कर 
आजू-बाजू, छाती-पुट्ठा
अंग-अंग पर छापा जीभर
टीका।

उल्टा टीका, सीधा टीका
छोटका टीका, बड़का टीका
माई का टीका
चाई का टीका
फिर भरमाये
हँस-हँसकर छपहार।

अन्न मिलेगा, पुन्न मिलेगा
राज मिलेगा, पाट मिलेगा
सरग मिलेगा धरती पर
चेहरा-चेहरा फूल खिलेगा
फिर बतियाये
हाथ पकड़ छपहार। 


तंबू लेकर, भोंपू लेकर
सर्कस लेकर, जोकर लेकर
फिर फुसलायें
बड़े-बड़े छपहार।




वे बुलाते हैं जिस आदमी को

बिजली नहीं है वहा
रास्ता नहीं है, पानी नहीं है शुद्ध
कोई आदमी नहीं है वहाँ
जो कर सके हाकिम से बात।
हर बार मत के भाड़े पर
वे बुलाते हैं जिस आदमी को
वही हाकिम हो जाता है।


(‘जल में’ से)