रविवार, 27 जून 2021

स्त्री सीरीज़

-गणेश पाण्डेय

1

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भारतीय सास
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जो औरत
औरत नहीं होती है सास होती है
सास रहते हुए भी वह औरत चाहे तो 
उसके भीतर एक औरत ज़िदा रह सकती है
ऐसा होता तो कितना अच्छा होता 
संसार की सारी औरतों का मन 
कितना सुंदर होता

औरत तो औरत होती है
माँ भी होती है सास भी होती है
जब कोई औरत कम औरत होती है
तो माँ भी कम होती है और सास भी
कठोर

माँ जन्म देती है
सास बहू को जन्म नहीं देती है
लेकिन सास अच्छी हो तो बहू को
सिर्फ़ अपना बेटा ही नहीं नित आशीष
अपनी गोद और अपना आँचल भी
ज़रूर देती है 

कम औरत 
जब कठकरेजी सास होती है
तो बहू की हारी-बीमारी में
उसके लिए आए दूध और फल
तीन चौथाई आँखों से ओझल कर देती है
बेटे के सामने आदर्श सास बनकर
बहू के लिए सेब काटकर ले जाती है 
बेटे के बाहर जाने पर पूछती भी नहीं
बहू जी रही हो कि मर रही हो

ओह सासें भी
तरह-तरह की होती हैं
कुछ तो मोरनी जैसी होती हैं
नाचती रहती हैं नाचती रहती हैं
बहुओं के सिर पर
कुछ फ़िल्म की हीरोइनों की तरह
हरदम बनी-ठनी रहती हैं गोया बहू के संग
सौंदर्य प्रतियोगिता में भाग लेना हो
कुछ तो बिल्कुल सौत की तरह होती हैं
पत्लू से बाँधकर रखना चाहती हैं बेटे को
बहू को उसके साथ अकेले
कहीं जाने ही नहीं देतीं
और चला जाए तो दम पर दम
फोन करती रहती हैं
इंग्लिश मीडियम की सास हो 
चाहे हिंदी मीडियम की 
चाहे अँगूठा ही क्यों न लगाती हो
जिसे ख़ुद पर ज़रा -सा भी भरोसा नहीं होता है
चाहती है कि बेटे पर वर्चस्व कम न होने पाए
बहू के रंग में कुछ तो भंग पड़ जाए
ऐसी सासें प्रेम और प्रेमविवाह
दोनों की पैदाइशी शत्रु होती हैं
निन्यानबे फ़ीसद 
प्रेमविवाह की विफलता का मुकुट
इन्हीं के सिर पर सजता है
वैसे भारतीय सासों में
अंग्रेज़ी और हिंदी मीडियम की सासों को भी
भोजपुरी और अवधी में आते देर नहीं लगती है
जैसे हिंदी का सारा व्यंग्य बाण
इन्हीं के मुखारविंद से पैदा हुआ हो
इन्हें बेटे का घर बसे रहने में नहीं
बहू का घर उजड़ने में ख़ुशी होती है

भारतीय सासों के जंगल में टीवी पर
अशक्त सासों के पीटे जाने की ख़बरें
अब बिल्कुल विचलित नहीं करतीं
लगता है कि ज़रूर इसने कभी
अपनी बहू को ख़ूब सताया होगा
असल में इस देश में 
सासों की क्रूरता का लंबा इतिहास है
लोकगीतों और लोककथाओं में ही नहीं
हमारे समय में भी ऐसी सासें
अपनी-अपनी पारी खेल रही हैं
और अपने माँ-बाप से दूर बेटियाँ
पिस रही हैं रो रही हैं
रोज़ डर रही हैं
और ऐसी बदनसीब बेटियों के माँ-बाप
फोन की घंटी से भयभीत हो जाते हैं
राम जाने आज क्या किया होगा
डायन ने मेरी बच्ची के साथ

उफ़
वह औरत 
जो तनिक भी औरत नहीं है
न सिर्फ़ भारत की बल्कि
पृथ्वी की सबसे भयानक सास है
वह ज़रा-सा भी औरत होती
तो अपनी बहू को बेटी न भी समझती
तो कम से कम अपनी बहू तो 
समझती ही समझती
इस तरह किसी विदीर्णहृदय 
सुदूर निरुपाय पिता की बेटी को 
दासी न समझती वह भी समझ लेती
तो भी स्त्री तो समझती
अपने चरणों की धूल न समझती

ऐसी बहुओं के जीवन में
तिरस्कार के सिवा कुछ नहीं होता है
न प्यार न सुख न साज-सिंगार 
जिनके पति कान के कच्चे होते हैं
और जिनके लिए माँ की हर बात
पत्थर की लकीर होती है

सभी बेटे ऐसे नहीं होते हैं
तमाम बेटे माँ-बाप की भी आलोचना
ख़ूब करते हैं उनसे बहस करते हैं
उनकी कमियाँ बताते हैं
जिनके पति ऐसे नहीं होते हैं
जिनके पिता प्रभावशाली नहीं होते हैं
और जो कमज़ोर घरों से आती हैं
उन बहुओं का भाग्य ऐसी ज़ालिम सासें
अपने बाएँ पैर के अँगूठे से लिखती हैं।


2

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राग दौहित्री
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सद्यःप्रसूता
बेटी के कंधे पर 
उसकी नवजात आत्मजा
कोमलांगी अति गौरांगी
जैसे शस्यधरा के कंधे पर 
नयी-नयी बनी नन्ही पृथ्वी
यह सब देखना 
सबको नसीब नहीं होता

बोलती हुई पृथ्वी की आँखों से
निःशब्द सुनते चले जाना
ब्रह्मांड के अख़ीर तक
और फिर वापस लौट आना
बोलती हुई आँख की पुतली में
उसी में समा जाना
नाना नाना नाना
और कोई शब्द नहीं

उसकी एक नन्ही पंखुड़ी जैसी
स्मिति में ग़ुम हो जाना क्या होता है
सब कहाँ जान पाते हैं कहाँ छू पाते हैं 
अपने जीवन में इतना कुछ
इसके आगे निस्सार है 
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री का पद
चाहो तो प्रधानमंत्री जी से पूछ लो 
चाहे मुख्यमंत्री जी से पूछ लो
ईश्वर जिससे प्रसन्न होते हैं 
उसे यह नयी दुनिया दिखाते हैं
उसे सचमुच का मनुष्य बना देते हैं

बाक़ी आज की राजनीति क्या है
और साहित्य तो कुछ है ही नहीं
जो है सब एक गोरखधंधा है

मेरे लिए आज
मेरी बेटी की बेटी सबकुछ है
मेरी बेटी की आकृति है छवि है
उसकी रूह है उसकी आवाज़ है
मेरे कानों में मेरी आँखों में
मेरे घर के हर हिस्से में
आँगन में छत पर अहर्निश 
बजती हुई यह नन्ही-सी 
मद्धिम-सी प्यारी-सी आवाज़ 
मेरे जीवन के पुराने संतूर पर 
नई सुबह का एक राग है
राग दौहित्री।


3

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मायका
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बेटी 
आज मायके में आयी है
माँ को उसकी नवासी सौंपकर
तीसरे पहर से सो रही है जैसे
युगों की नींद लेकर आयी हो

रात हो गयी है 
ज़्यादा रात हो गयी है
पिता को न भूख लगती है न प्यास
बेटी जागेगी तो पहले उससे करेंगे बात
फिर उसी के साथ खाएंगे कौर-दो कौर

भाई चुप है 
कुछ नहीं बोलता है
पिता व्यथित हैं कुछ नहीं कहते
जैसे उनके हृदय पर मद्धिम-मद्धिम
आरी जैसी कोई चीज़ चल रही हो
बेटी बिना मिले सोने चली गयी है

माँ
नवासी को बैठक में लाती है
नाना की गोद में रख देती है
नवासी नाना को देख मुस्काती है
नाना उसे देख जी उठते हैं।

4

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दहेज में हिमालय 
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माँओ
तुम्हारी बेटियाँ
डलिया-मौनी बनाना न सीखें
चादर और तकिए पर कढ़ाई न सीखें
अनेक प्रकार के व्यंजन बनाना न सीखें
भरतनाट्यम चाहे सुमधुर गायन न सीखें
तो तनिक भी अफ़सोस मत करना

माँओ
अपनी बेटियों को विदा करने से पहले
उन्हें बहुत पौष्टिक चीज़े खिलाना
जितना दूध बेटे को देना उससे ज़्यादा उन्हें
उनके हाथ-पाँव हाकी की तरह ख़ूब
मज़बूत करना सिर्फ़ खेलने के लिए नहीं
बड़ी से बड़ी मुसीबत से पार पाने के लिए 

माँओ
तुम्हारी बेटियाँ
सजने-सँवरने में मन न लगाएं
क्रीम-पावडर होंठ लाली न लगाएँ
तो उन्हें सुंदर दिखने का ज्ञान
मत देने बैठ जाना

माँओ
तुम्हारी बेटियाँ
पढ़ने में मन लगाएँ तो उनकी
चुटिया कसके ज़रूर खींचना
गदेली से उनके गाल पूरा लाल कर देना
हेडमास्टर से अधिक सख़्ती करना

माँओ
दहेज जुटाने में अक़्ल से काम लेना
ऐसी चीज़ें देना जिसे आग जला न सके
पानी गला न सके चोर चुरा न सके
और शत्रु जिस पर विजय न पा सके
प्रतिभा और योग्यता का ऐसा हिमालय
बेटियों के ससुराल को भेंट करना
जिसे वे तोड़ न सकें।

5

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कारागृह
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बिटिया
आदमियों के इस जंगल में
अकेले जीना चाहे बच्चे को पालना
थोड़ा मुश्किल ज़रूर है
नामुमकिन नहीं

तुम्हारा पति 
तुम्हें महत्वहीन समझे
घर को सिर्फ़ अपना समझे तुम्हारा नहीं
सारे फ़ैसले ख़ुद करे तुम्हें पूछे तक नहीं
तुम्हारा पैसा तुमसे छीन ले

तुम्हारा शौहर कहे
कि सास-ससुर से पूछे बिना
तुम अपने मायके नहीं जा सकती
तो समझ लो कि तुम एक जेल में हो
तुम्हारा पति प्रेमी नहीं एक जेलर है
और तुम उम्रक़ैद की सज़ा भुगत रही हो

बिटिया
भगवान न करे 
कि ऐसा कुछ किसी के जीवन में घटे
लेकिन ऐसा कुछ हो ही तो डरना मत
अपने माँ-बाप से एक-एक बात करना
भाई से कहना ये सब तुम्हारे साथ होंगे

बिटिया
इस सामाजिक कारागृह के 
सींखचों को तोड़ना ही होगा
ऊँची चहारदीवारी को ढहाना ही होगा
तुम्हें बाहर खुली हवा में साँस लेना होगा
तुम्हें जीना होगा बिटिया अपने लिए
अपने बच्चों के लिए।

6

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बहू का तराना
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सास जी सास जी 
ऐसा ना सोचें आप जी 
केवल लड़कों के होते हैं 
माँ-बाप जी

सास जी सास जी
लड़कियों के भी होते हैं माँ-बाप जी 
ऐसा नहीं समझेंगी तो फूँक दूँगी 
सास जी

सास जी सास जी
पैर से मसलने की सासगीरी छोड़कर
माँ बन जाएंगी तो भला करेंगे
राम जी

सास जी सास जी
आप भी बहू थीं यह भूल जाएंगी
तो चक्कू मारूँगी हँसिए से काटूँगी
सास जी

सास जी सास जी
पढ़-लिखकर दिमाग़ में गोबर भर लेंगी 
तो सबके सामने इज़्ज़त उतार दूँगी 
सास जी

सास जी सास जी
रूल नहीं करेंगी डायन नहीं बनेंगी 
राम भजेंगी तो पूजा करूँगी आपकी
सास जी।

7

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यहाँ सब तुम्हारा है
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हे बेटी
ससुराल में
कोई बड़ा-बुज़ुर्ग
कुछ समझाए चाहे सिखाए
तो उसे सिर माथे लगाना

कोई ऐसा 
आदरणीय बुज़ुर्ग
अकारण डाँटने-फटकारने लगे 
चाहे बात-बात पर अपमानित करे
चाहे नीचा दिखाए चाहे ताने दे
किसी बेजा चीज़ के लिए
मज़बूर करे
तो उसका आदर-फादर करना
छोड़-छाड़कर पहली ट्रेन से
चाहे पहली जहाज से उड़कर
अपने घर लौट आना

यहाँ 
तुम्हारा घोंसला 
उसका एक-एक तिनका
बिल्कुल वैसे का वैसा है
तुम्हारा कमरा 
तुम्हारी आलमारी
तुम्हारी मेज़ तुम्हारी किताबें
तुम्हारा गुलदस्ता तुम्हारी पेंटिंग
सब जस का तस हैं
तुम्हारी माँ तुम्हारी बहन
तुम्हारे पिता और भाई का
दिल कलेजा कंधा और बाहें
सब वही हैं

यहाँ क्या है जो तुम्हारा नहीं है
धरती और आसमान
सब तुम्हारा है।

8

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बहादुर बेटियो
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कोई ऐसा मिले
जो तुम्हारे बच्चे का बुरा चाहे
तो उसे पहले प्यार से समझाना

फिर भी नुक़सान पहुँचाना चाहे
तुम्हारे बच्चे को सुई चुभोना चाहे
तो तुम भी चाकू निकाल लेना

फिर भी न माने दुष्ट
तुम्हारे बच्चे पर चाकू चलाना चाहे
तो तुम तलवार निकाल लेना

फिर भी न माने
तो जान की बाज़ी लगा देना
उस राक्षस को चीरफाड़ देना

ओ पृथ्वी की बहादुर बेटियो
संसार उदाहरणों से भरा पड़ा है
माँएँ कैसे बाघ से लड़ जाती हैं।

9

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पिता की सीख
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मैंने 
अपने समय के कई सूर्य को 
असमय ढलते हूए देखा है बेटी
उन्हें बादलों में घिरते हुए देखा है

मेरी बेटी एक से एक तप्तसूर्य को 
चंद्रमा होते जग को शीतल करते देखा है
बेटी मैंने विशाल पर्वत के सीने से 
मीठे पानी का सोता फूटते हुए देखा है

मैंने लोहे को 
मोम की तरह पिघलते हुए देखा है बेटी
मैंने निष्ठुर सास को भी माँ की तरह
अपनी बहू को कलेजे से चिपकाकर 
आँचल की छाँव देते हुए देखा है

मेरी बेटी 
समय और परिस्थितियों के थपेड़े 
बड़े-बड़े ग्रंथों से भी बड़ी सीख देते हैं
कई बार सास के भीतर का डर 
उसे सख़्त बनाता है और डर का क्या है 
जितनी जल्दी घर बनाता है उसी तरह
दबे पाँव वापस अपने देश लौट जाता है
मेरी बेटी लगता है थोड़ा वक़्त लगता है
समय बदलता है मन बदलता है।

10

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सुख
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बेटी 
तुम्हारी कलाई में 
यह सुनहला कंगन
बहुत अच्छा लगता है

तुम्हारे सुंदर गले में 
यह बड़ा-सा मंगलसूत्र
और भी अच्छा लगता है

तुम्हारी आँखों की अपूर्व चमक
दमकते हुए ललाट पर सुर्ख़ बिंदी
और लाल-लाल होंठों पर लाल मुस्कान
बहुत अच्छी लगती है

तुम्हारी गोद में बेटी
खिल-खिल करती दौहित्री की
किलकारी सबसे अच्छी लगती है
सृष्टि की सबसे सुंदर कलाकारी लगती है

एक साधारण 
भारतीय पिता के लिए 
इस सुख से ज़्यादा अच्छा 
और क्या हो सकता है।





रविवार, 23 मई 2021

आवारा सरकार

- गणेश पाण्डेय

(1)

जनता
सरकार बनाती ज़रूर थी
बनाए बिना मानती नहीं थी
लेकिन
बन जाने के बाद वह सरकार 
जनता की क्यों नहीं रह पाती थी
आखि़र
वह कौन बीच में आ जाता था
जिसके साथ सरकार हर बार भाग जाती थी
बेचारी
जनता हाथ मलती रह जाती थी
दिन-रात बच्चों के बारे में सोच-सोच कर
हलकान होती रहती थी
गऊ जैसी सीधी-सादी जनता कर भी क्या सकती थी
जो जिधर कहे अपनी सरकार ढूँढने चली जाती थी
किसी माई के थान पर किसी पीर-मुर्शिद के पास कहीं भी
और थक-हार कर वापस अपनी बस्ती में लौट आती थी।

(2)


जनता 
कोई एक थोड़े थी
कई शक्लों और कद-काठी में बँटी हुई थी
पहले का मुँह सबसे बड़ा था हिंदू था
दूसरा मुसलमान था तीसरा सिख था
चौथा ईसाई था पाँचवाँ घमंजा था
और इनकी सरकारें आवारा थीं
तरह-तरह के लिबास पहनती थीं
इत्र लगाती थीं गहने गढ़ाती थीं
किसी के भी साथ कभी भी भाग जाती थीं
कभी हिंदू की सरकार भाग जाती थी
तो कभी मुसलमान की कभी किसी की
सरकार मुँह अँधेरे भी भागती थी
तो कभी दिन दहाड़े भी भागती थी
जब सरकार भाग जाती थी
तो जनता के मुँहों से हवाईयाँ उड़ जाती थीं
जैसे यह सब
उसके साथ पहली बार हो रहा हो
जबकि उसके साथ हर बार यही होता था 
पहले से उसके राजनीतिक भाग्य में लिखा होता था
सरकार भागेगी तो कुछ दिन जनता रोये-धोयेगी
और जगह-जगह सरकार को ढूँढने के बाद 
अंत में रपट लिखाने थाने पर जाएगी।

(3) 

इतना बड्डा
हुजूम देखकर 
थानेदार की भौंहें फड़कने लगी थीं
कड़क आवाज़ में पूछा क्या माज़रा है,
हिंदू ने कहा हुज़ूर मेरी वाली भाग गयी 
मुसलमान ने कहा मेरी वाली भाग गयी 
फिर औरों ने भी कहा मेरी वाली भाग गयी
थानेदार ने झल्लाकर कहा -
अबे कुल कितनी भैंसें भाग गयीं
सबकी भैंसे एक साथ भागीं या भगायी गयीं
- नहीं, नहीं थानेदार साहब
भैंस नहीं हमारी सरकारें भाग जाती हैं
उनके भागने-भगाने की रपट दर्ज़ करो
थानेदार ने रोबीली आवाज़ से हड़काया -
क्या मैं तुम्हें पागल दिखता हूँ
अरे गधो सरकारें भी कहीं भागती हैं
हा हा हा हो हो हो
भागो यहाँ से तुम सब
भाँग खाकर आये या गाँजा पीकर
ऐसी सरकारें बनाते ही क्यों हो
जो किसी भी अड्डे-बड्डे के संग भाग जाएँ। 

(4)

पुरानी-धुरानी
हवेली उदास थी 
कनीज़ की कनीज़ दिखती 
कनीज़ चमेली उदास थी
फटेहाल नवाब साहब उदास थे 
तबलची उदास थे गवैये उदास थे
नचनिये-पदनिये उदास थे मतलब
हिंदी के कबी-सबी अम्पादक-संपादक
और अफ़सानानिगार वगैरह सारे
इनामी-सुनामी सब उदास थे
चाँदनी रात और सुरमई शाम
और सुर्ख़ आफ़ताब सब उदास थे
राजनीति की इस उदासी पर लिखी जा रही
कविताएँ उदास थीं कहानियाँ उदास थीं
दिन उदास था उजाला उदास था
चाय का प्याला और रसरंजन का गिलास
सब उदास था 
बहत्तर साल से ढहती हुई हवेली उदास थी
यहाँ तक कि उदासी भी उदास थी
हम सबकी बेग़म सरकार 
किसी साहूकार के साथ भाग गयी थीं।

(5)

जिन सरकारों को 
जनता के साथ घर बसाकर रहना नहीं आता
तो बनती ही क्यों हैं इंकार क्यों नहीं कर देतीं
शुरू में ही कह क्यों नहीं देतीं
कि हमें मुँह दिखाई में चंद्रहार चाहिए 
हमें रहने के लिए सोने के लिए
अच्छे से अच्छा सोने का महल चाहिए
नये ज़माने का एंटीलिया-फेंटीलिया से भी शानदार चाहिए 
दूल्हा तो सबसे अमीर चाहिए खानदान आला चाहिए
किसी चिरकुट निरहुआ घिरहुआ के साथ
उसकी टप-टप चूती झोपड़ी में नहीं रहना है।

(6)

यही वक़्त था सही वक़्त था
जब पुलिस की नाकामी के बाद
जासूस तिरलोकचन को लाया गया
जासूस ने अपना हैट उतारा
सिर खुजलाया आँखे मिचकाया
और बताया-
इसी सरकारी बंगले से 
इसी वजीर की कोठी फाँदकर
इसी चोर रास्ते से इसी सुरंग से
इसी आँख में पट्टी बंधी हुई 
किताब से मुँह छिपाकर 
सरकारें भागती रहती हैं
जासूस तिरलोकचन ने
ऐलान किया था कि उन्होंने 
भागी हुई सरकारों के बारे में
सब पता कर लिया है
कौन हैं जो ऐसी मनचली सरकारों को
भगाकर ले जाते हैं और ऐश करते हैं
ऐसे लोगों के खि़लाफ़ सारे सबूत हैं
सारे गवाह हैं मुकम्मल तैयारी है
हम इन्हें गिरफ़्तार कर सकते हैं
हम इन्हें हमेशा के लिए
सलाखों के पीछे डाल सकते हैं
जासूस तिरलोकचन ने
जनता की ओर देखा अपना हैट उतारा
पीठ पर हाथ ले जाकर सिर झुकाया
और अतिविनम्रता से कहा- 
बस एक बार ढंग से 
जनता का साथ देने वाली
सरकार आ जाय।




रविवार, 9 मई 2021

समय सीरीज़

- गणेश पाण्डेय

1

समय 
सब बीत जाता है
लेकिन कोई समय ऐसा भी होता है
नहीं दिखता है जिसका बीतना 

पहाड़ की तरह 
ठहरा हुआ एक समय है 
कोई समय है सिर्फ़ तारीख़ बदलती है

किसी के 
जीवन का पहिया रुक जा रहा है
किसी का थर-थर काँप रहा है

इतना बुरा समय कभी नहीं देखा था
किसी घर का एक हरा-भरा स्वस्थ वृक्ष 
किसी रोगी के छींक भर देने से 
खड़े-खड़े दो दिन में सूख जा रहा है

बुज़ुर्ग बेचारे 
भय से धराशायी हो जा रहे हैं
उनकी नींद भी जैसे नींद की पनाह में हो
यह जीना भी मरने की तरह है

कोई मुँह पर ज़रा-सा खाँस भर दे 
तो बड़े-बड़े बाऊ साहब की सिट्टी-पिट्टी 
गुम हो जा रही है

एक उत्साही युवक
बड़े मान से अपने शुभ-विवाह का 
निमंत्रण-पत्र बाँटकर आ रहा है और वह
दो दिन बाद शोक में बदल जा रहा है

एक युवा पिता 
सारे एहतियात के बावजूद
बहुत डरा हुआ घर से निकलता है
और उसी तरह डरा हुआ घर लौटता है
स्नान करने कपड़े बदलने के बाद भी
अपनी लाड़ली को गोद में उठाकर
चूमने से डरता है

बड़े तो समझ रहे हैं 
कि यह सब उनके साथ हो क्या रहा है
बच्चे समझ नहीं पा रहे हैं कि समय 
उनके साथ कर क्या रहा है

हे समय 
बहुत कर ली मनमानी
अब अपना डोला बढ़ाओ
जाओ किसी और ग्रह पर डेरा डालो
मैं कहता हूँ हटो दफ़ा हो जाओ
खाली करो हमारे बच्चों की पृथ्वी।

2

ओह
फूलों में ख़ौफ़ है
हवाओं में निकल आए हैं
ज़हरीले डंक 
पंखुड़ियों तक में 
पैदा हो गया है जानलेवा ख़ौफ़
ख़ुद को अलग कर लिया है
दूसरे से
फूल सदमे में हैं
मंदिर में मंडप में गुलदस्ते में
यहाँ तक कि प्रेम का संदेश लेकर भी
जाने से मना कर दिया है
यह कैसा समय है
जिसे देखते ही कुम्हला जाता है 
फूल का मुख 
काँपने लगती है उसकी रूह
ताकती रहती हैं आँखें बगीचे में
कोई आए और मोड़ दे 
समय का रथ।

3

यह समय
किस लिए याद किया जाएगा
ट्रंप के जाने के लिए या फिर
मोदी के रह जाने के लिए
क्या यह समय
इतना छोटा है इतना तुच्छ है कि
किसी राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री के
आने-जाने के लिए याद किया जाएगा
यह समय
दुनिया का क्रूरतम समय है
जो लाखों फ़ौज़ियों के मारे जाने के लिए नहीं
असंख्य निर्दाष लोगों के मारे जाने के लिए 
याद किया जाएगा 
दोष राजा का था
और मारे गए अपनी हड्डियों से
अपनी मांस-मज्जा से अपने हाथों से
अपनी आँखों से और उनमें बसे
स्वप्न से सिंहासन बनाने वाले
जब मर रहे थे जन
असहाय असमय समूह में
राजा अपने महल में मगन था
चक्रवर्ती राजा बनने के स्वप्न देख रहा था
राजा को प्रजा के स्वप्न न दिखायी देते थे
न उसकी चीख़ें सुनायी देती थीं
वह अभी-अभी लौटा था आखेट से
तमाम हिरनों-हिरनियों और उनके शावकों का
शिकार करके
बाहर 
हर शहर, हर गाँव-गली में
मौत का सन्नाटा पसरा हुआ था
घरों के भीतर से सिसकियाँ 
और चूड़ियों के तोड़े जाने की आवाज़
बाहर आ रही थी
यह समय 
धरती और आकाश को एक कर देने वाले
इस रुदन के लिए याद किया जाएगा
कि राजा और दरबारियों की अद्भुत
जुगलबंदी के लिए याद किया जाएगा
राजा बूढ़ा था 
चाहे उसके केश और लंबी दाढ़ी पर
सृष्टि की सारी चांदनी उतर आयी थी
लेकिन उसका
माउथऑर्गन बजाने का अंदाज़ वही था
यह समय 
आखि़र किस लिए याद किया जाएगा
न प्रेम के लिए याद किया जाएगा
न फूलों के खिलने के लिए
न हवा के चलने के लिए 
न नदी के बहने के लिए
न राजा के पसीजने के लिए
न प्रजा का भाग्य बदलने के लिए
यह समय
प्रजा के दुर्भाग्य के लिए याद किया जाएगा
परिजनों-स्वजनों के 
असमय वियोग के लिए याद किया जाएगा
शवों के अनगिनत रह जाने और शव हो जाने के 
भय के लिए याद किया जाएगा
यह समय 
हिंदुत्व के उभार के लिए नहीं
राष्ट्र के नवनिर्माण के लिए नहीं
कोरोना से हार के लिए याद किया जाएगा।

4

गोरखपुर में बारिश हो रही है
कोलकाता में भी बारिश हो रही होगी
हैदराबाद भी भीग रहा होगा
चेन्नई की सड़कों पर जल का रेला होगा
क्या देश क्या परदेश हर जगह
सबका मौसम एक है सबकी मुश्किल एक है
देश और दुनिया में
घड़ी की सुइयाँ अलग-अलग हैं
कैलेंडर के पन्ने अलग-अलग हैं
कहीं भी किसी का भी समय
अलग नहीं है
बारिश एक जैसी हो रही है
बादल एक जैसे गरज रहे हैं
बिजली एक जैसी कड़क रही है
सब एक जैसे सहमे हैं
सब एक जैसे बिलख रहे हैं
सब एक जैसे चुप हैं
सब जगह
एक पिता है एक माँ है
एक भाई है एक पत्नी है 
एक जैसे बच्चे हैं
जीवन में कोई भी बुनियादी चीज़
अलग नहीं है
अच्छा समय सबको
एक जैसा हँसाता है गोद में उठाता है
होंठों पर एक जैसी मुस्कान जड़ देता है
सब एक जैसे प्रेम करते हैं
एक-दूसरे की क़द्र करते हैं
एक दूसरे का ख़याल रखते हैं
अच्छा समय
बहुत अच्छा होता है बहुत कोमल होता है
बुरा समय उसे छूभर दे तो मुरझा जाता है
जैसे आज दुनिया के सारे अच्छे समय
असमय झर गये हैं डाल से
धूल-धूसरित हो गये हैं
किसी बाग़ में किसी मैदान में
कोई रामलीला नहीं हो रही है
एक सचमुच का रावण-समय 
पृथ्वी की मुँडेर पर पैर रखकर 
अट्टहास कर रहा है
और इसके दर्प को चूर-चूर करने के लिए
कोई राम नहीं है कोई युद्ध नहीं है
कोई धर्म किसी काम का नहीं है
हर जगह एक अकेला मनुष्य है
अपने लोगों के लिए हाय-हाय करता
इधर-उधर भागता चीख़ता-पुकारता
समय के पैरों में अपना शीश
पटक-पटक कर फोड़ता
इस काल से जूझता
मारा-मारा फिरता हुआ कोई कवि
कितनी लंबी कविताएँ लिखेगा
और उन कविताओं में
काल के काल की कामना में
मंत्र का जाप करेगा।

5

वह भी एक समय था
जब अंग्रेज़ी दवाएँ मिलना तो दूर
तेतरी बाज़ार में दिखती तक नहीं थीं
कोई साठ साल पहले आज की तरह
बाज़ार कहाँ थे बस ग्रामसभाएँ थीं
जिला परिषद का एक आयुर्वेदिक
अस्पताल था मेरे घर से दूर था
जिसका चूरन बच्चों में बहुत मशहूर था
इसीलिए कंपाउंडर अनिवार्य रूप से
सभी बच्चों के चाचा थे और हम 
इसीलिए चूरन लेने जाते थे
वह एक आयुर्वेदिक समय था
जूड़ीताप हो
चाहे साधारण ज्वर
माँ दो घर छोड़कर पंसारी की दुकान से
वेदना निग्रह रस की पुड़िया लेकर आती
कहती फाँक लो और उसके बाद 
पानी की घूँट के साथ जादुई दवा भीतर
और थोड़ी देर में बुख़ार बाहर
वह भी एक समय था
जब चाहता था कि बुख़ार आए
तो बुआ आए ख़ूब सारा मुनक्का लेकर
और मैं खाता जाऊँ खाता जाऊँ
कभी-कभी शरीर पर कुछ दाने निकलने पर
कभी माँ बुआ मिलकर शीतला माता के गीत गातीं
नीम की पत्तियों का गुच्छा फिरातीं
प्राइमरी स्कूल में
चेचक का टीका लगाने वालों को
चाचा नहीं कहते थे छपहार कहते थे
उसे देखते भी नहीं थे आना सुनते ही
बस्ता छोड़कर भाग लेते थे
कई दिन स्कूल नहीं जाते थे
छपहार भी चकमा देकर आते थे
और हम बच्चों को एक बड़ी बीमारी से
इस तरह बचाते थे कि हमारी दुनिया
आखि़र चेचक के विषाणु से बच गयी
एक यह समय है
हमारी दुनिया थर-थर काँप रही है
सर्दी-बुख़ार-खाँसी से
कहाँ हो माँ कहाँ हो बुआ और बाबूजी 
आओ देखो 
पृथ्वी का सबसे उन्नत चिकित्साविज्ञान
आज तुम्हारी संततियों और उनकी
संततियों को आश्वस्त नहीं कर पा रहा है
बहुत बड़े-बड़े चिकित्सा संस्थान हैं
जिनकी कल्पना आप सबने नहीं की होगी
और ये सब नाकाफ़ी हैं
हम बच्चे थे
लेकिन उस वक़्त भी 
मुश्किलें कम नहीं रही होंगी
जमोगा माई का नाम सुना था
जिससे अनगिनत नन्हें दीप जन्म लेते ही बुझ जाते थे
रोती-बिलखती-सुबकती रह जाती थीं नयी-नयी माँएँ
टिटनेस की सुई भी आयी 
मनुष्य ने विजय पायी
रोग और मनुष्य का यह संघर्ष अनंत है
विषाणु और मनुष्य की जिजीविषा में
हमेशा मनुष्य की जीत हुई है
और होती रहेगी
यह संघर्ष लंबा हो सकता है
मनुष्य की कोशिश कभी कम नहीं होगी
हमारे पुरखों ने भी
इसी तरह डर कर लड़ कर और बच कर
हमें बचाया है हम भी अपनी संततियों को
उनकी संततियों को बचाएंगे
हमारी उदासी हमारा रोना
थोड़े दिनों की बात है सब दूर हो जाएगा 
पृथ्वी की हरी-भरी छाती पर हलचल होगी
फुटबॉल हॉकी क्रिकेट कबड्डी
और आइस-पाइस खेलते हुए हमारे बच्चे
इस दुनिया को फिर से 
जीवन के शोर से भर देंगे हम देखेंगे
हम ज़रूर देखेंगे।

6

यह नीम का नहीं समय का पेड़ है
जिसकी डाल में अब झूले नहीं पड़ते
सखियाँ जिस पर झूलती नहीं
भाभियाँ कजरी नहीं पातीं
जिसकी सींक से बुज़ुर्ग अब 
नहीं निकालते दाँतों में फँसे दुख
जिसकी छड़ी से कोई पिता अपने पुत्र को
मारता नहीं स्कूल जाने के लिए
यह मेरे बाबा का नाना का लगाया हुआ
नीम का पेड़ नहीं है
जिसकी छाया में जुड़ाते रहे हम
जिसके नीचे रातों में चौन से
सोते रहे हम
सुबह उठते ही जिसकी निंबोलियाँ
बीनते रहे हम
यह समय का पेड़ है नीम का नहीं
न यह दातून के काम का है न छाया के
न किसी राहगीर के सुस्ताने के काम का
सब इससे दूर भागते हैं
न कोई प्रेमिका 
इसके तने से टिककर खड़ी होती है
न कोई प्रेमी इसकी सख़्त छाल पर
अपना और अपनी प्रेमिका का 
नाम लिखता है
इस पेड़ पर
न चिड़ियों की चहचहाहट है
और न परिंदों का घोंसला
यह पृथ्वी का एक अभिशप्त पेड़ है
जिसकी पत्तियों से प्राणवायु नहीं
झर-झर-झर माहुर झरता है।

7

हे समय माता
शीश नवाता हूँ प्रसाद चढ़ाता हूँ
नारियल फोड़ता हूँ टीका लगाता हूँ
रक्षासूत्र बंधवाता हूँ 

धागा बाँधता हूँ 
पृथ्वी के एक-एक जन के जीवन की रक्षा के लिए 
एक-एक पुष्प की हँसी एक-एक मुस्कान
अच्छे-बुरे आस्तिक अर्द्ध आस्तिक नास्तिक 
सबके लिए

समय के इस प्रहार की धार को
मोड़ दो माता अपने बच्चों के लिए
समय से लड़ जाओ समय माता
हे समय माता भला समय
आप से बाहर कहाँ जा सकते हैं
एक बार उन्हें टोक दो रोक दो
उनकी बाँह पकड़ कर 
पीछे खींच लो

हे समय माता
जैसे पूर्वांचल की माताएँ
अपने बच्चों की छोटी-छोटी खुशियों के लिए
हलवा-पूड़ी की कड़ाही चढ़ाती हैं
मैं भी पृथ्वी के सभी बच्चों की रक्षा के लिए
नया समय आने पर कोरोना पर लिखी
अपनी लंबी कविताओं की कड़ाही चढ़ाऊँगा माँ।





शनिवार, 6 मार्च 2021

एक बूढ़े की प्रेमकथा

- गणेश पाण्डेय

बुढ़ापे में
जब-जब थाली धुलता हूँ
तो देखता रहता हूँ उसमें
प्रियतमा का झिलमिल मुख

आटा गूँथता हूँ
तो लगता है किसी 
कमनीय देह को छू रहा हूँ
किसी की हथेलियाँ
मेरी हथेलियों से खेल रही हैं

रोटी बेलता हूँ
तो लोई बनाने से बेलने
और तवे पर रखने तक
किसी की चूड़ियाँ संग-संग
बजती हैं बजती रहती हैं

गर्म तवा
उँगलियों से छूभर जाए
तो लगता है कि किसी के
तप्त होंठ हैं
बेध्यानी में प्रायः छू जाता है

सब्जी काटता हूँ
तो अक्सर चाकू की धार से
छू जाती हैं उँगलियाँ
लगता है किसी की आँखों को
छू लिया है

जब 
रोटी और सब्जी
लेकर खाने बैठता हूँ
तो झर-झर बहने लगती हैं 
दो बूढ़ी आँखें
तुम्हे सामने देखकर

ऐसा क्यों होता है
मेरी परिणीता मेरी मीता
मेरी कुसुमलता 
चाहे जीवन में 
लाख बेकदरी की हो
अब तुम्हारे बिना एक पल
रहा नहीं जाता है

कब आओगी
अब जब भी आओगी
बर्तन मैं धुलूँगा रोटी मैं बनाऊँगा
तुम्हारी वेणी चाँदनी के फूलों से
मैं सजाऊँगा।











शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

सोने की चिड़िया तथा अन्य कविताएं

- गणेश पाण्डेय

सोने की चिड़िया
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यह 
इस देश की विशेषता है
इसे बुरे लोगों ने ही अच्छा बनाया है
अंग्रेजों ने कितना विकास किया
रेल छापाखाना टेलीफोन स्कूल कालेज
ओह तमाम नयी-नयी चीज़ें लेकर आए

उन बुरे लोगों के जाने के बाद
दूसरे लोग आए जो हमारे अपने थे
उनसे किसी भी मामले में कम न थे
बड़े-बड़े कल-कारखाने 
चौड़ी-चौड़ी सड़कें तमाम हवाईअड्डे
जमींदारी ख़त्म खेतों की हदबंदी
रुपया कमाने की कोई पाबंदी नहीं
और राममंदिर का ताला भी खुलवाया
ढहाने वालों ने गुम्बद भी ढ़हाया
हमारे अपने लोगों ने कितनी सुंदरता से
सरकार चलाया और किस सरकार ने
दंगा और क़त्लेआम नहीं कराया
विकास तो अंग्रेजों से कम नहीं हुआ

राजनीति में बुरे लोग नहीं होते
तो लोगों को न तन ढकने के लिए 
एक जोड़ा वस्त्र मिलता
न जीने के लिए मुट्ठीभर अन्न
यह सब इसी देश में संभव है 
कि बुरे लोगों से जनता किस तरह
अच्छा काम कराती है

बुरे लोग ही
इस देश को आगे और अच्छा बनाएंगे
बस इस सरकार के जाने की देर है
आने वाले प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री
इस देश और प्रदेश को 
सोने की चिड़िया बनाने के लिए
जादू की छड़ी लेकर तैयार बैठे हैं
वह सोने की चिड़िया 
कितनी ऊँचाई पर उड़ेगी
जनता के हाथ आएगी या नहीं
यह सब एक मामूली कवि
कैसे बता सकता है!

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पेशा
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जैसे 
दाएँ हाथ का अपना पेशा है
उसी तरह बाएँ हाथ का भी अपना पेशा है

राजनीति करने वाले ही नहीं
साहित्य में अनीति करने वाले भी
इसी पेशे में हैं।

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पार्टी
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ओह 
सिर्फ़ अमुक पार्टी बुरी है
चरित्रहीन है क्रूर है हत्यारी है
तो इसे इसके चुनने वालों समेत 
ले जाओ जंगल में छोड़ आओ
जाओ जल्दी करो मैं मना नहीं करता

अमुक पार्टी ही
सच्चरित्र है पवित्र है परोपकारी है 
जनतारिणी है मोक्षदायिनी है
ईश्वर की गोद से उतरी पार्टी है तो इसे
अगले चुनाव में सरकार में लाने के लिए 
रूठे हुए लोगों को जंगल से बुलाओ
गला फाड़- फाड़कर पुकारो-चिल्लाओ
उन्हें मनाओ न मानें 
तो उनकी मर्जी की पार्टी बनाओ
मैं भर्ती होने के लिए तैयार बैठा हूँ।

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राजनीतिक रोटियाँ
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किसी वयस्क लोकतंत्र में
कोई आंदोलन हो प्रदर्शन हो अनशन हो 
उसमें पूरी शुचिता तो होती ही होगी
भला किसी जन आन्दोलन में राजनीतिक पार्टियां 
अपनी रोटी क्यों सेंकना चाहेंगी
अपने महान भारत में तो
बिल्कुल नहीं!

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अकाट्य सत्य
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नहीं-नहीं 
न्याय मूल्य सिद्धांत आदर्श वगैरह की 
बात करने वाले बेईमान नहीं हो सकते हैं

यह हमारे समय का अकाट्य सत्य है
क्यों साहित्य-प्रवर विचार-श्रेष्ठ आचार्य
बोलो शिष्यो बोलो 
बोलो अनुकरणकर्ताओ

अलबत्ता हाँ-हाँ पक्का
बेईमान तो इन पर शक करने वाले होंगे
क्यों साहित्य-राजन!

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वैचारिक शत्रुता
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शत्रुता
और राजनीतिक विवेक में
क्या फ़र्क है जानते हो वत्स

विवेक 
किसी भी व्यक्ति और दल के
गुण-दोष की बिना किसी भेदभाव के
पहचान करता है

इन्हें देखो 
शूकर नहीं हमारे समय के लेखक हैं
वैचारिक शत्रुता में कर क्या रहे हैं
शत्रु के नाश के लिए गंदा खा रहे हैं।


.........................................................................
ऐतिहासिक विदाई
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राजनीति
और साहित्य से
आदर्शों की विदाई

कब से शुरू हुई
और कब पूरी हुई
प्रक्रिया

कुछ याद है आपको
आचार्यप्रवर विचारप्रमुख
साहित्य-राजन!

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हमारे बच्चे
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महान विचार भी
आदर्शों की शवयात्रा में
अपने कंधे सौंप चुके हैं

अब ये
अपने हथियार 
और अपने विचारों का बोझ
रखेंगे कहाँ

बेचारे विचार
धूल में मिल जाएंगे
ऐसे खो जाएंगे कि फिर

सदियाँ ढूँढती रह जाएंगी
हमारी पीढियां हमारी नस्लें
ओह हमारे बच्चे कैसे जिएंगे।

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भय 
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ओह
इतना भय तो
मृत्युदण्ड में भी नहीं होता होगा

जितना
आज हिन्दी के लेखकों में है
वे अपनी मर्जी का लघुकार्य भी
नहीं कर सकते हैं

अपनी मर्जी का
लिखना और बोलना तो दूर
वे धारा के विरुद्ध छींक तक नहीं सकते हैं

जनमुक्ति का भार
और विचार का प्रभार
इन्हीं के सिर पर है 

ये पैदा हुए ही हैं
एक सुरक्षित और जोखिममुक्त 
गिरोह में रहने के लिए

ये देश के लिए जीने की
बात तो करते हैं लेकिन जी नहीं पाते हैं
इनके भय का नगाड़ा इनके पिछवाड़े 
बजता रहता है बजता ही रहता है।

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हाथी के पैरों से कुचल दी जाएंगी
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मेरे
राजनीतिक विचार
अपने समय के लेखकों से
रत्तीभर भी मेल नहीं खाते हैं

शायद
उन्हें भय है कि विचार की जगह
विवेक चुनेंगे तो उनके भविष्य को
गोली मार दी जाएगी

उन्हें भय है
कि उनकी कविताएँ
अपने समय के आलोचकों के
हाथी जैसे पैरों से कुचल दी जाएंगी

भला ऐसे लेखकों के विचारों से
किसी स्वाधीन लेखक के विचार
कैसे मेल खा सकते हैं।