रविवार, 23 मई 2021

आवारा सरकार

- गणेश पाण्डेय

(1)

जनता
सरकार बनाती ज़रूर थी
बनाए बिना मानती नहीं थी
लेकिन
बन जाने के बाद वह सरकार 
जनता की क्यों नहीं रह पाती थी
आखि़र
वह कौन बीच में आ जाता था
जिसके साथ सरकार हर बार भाग जाती थी
बेचारी
जनता हाथ मलती रह जाती थी
दिन-रात बच्चों के बारे में सोच-सोच कर
हलकान होती रहती थी
गऊ जैसी सीधी-सादी जनता कर भी क्या सकती थी
जो जिधर कहे अपनी सरकार ढूँढने चली जाती थी
किसी माई के थान पर किसी पीर-मुर्शिद के पास कहीं भी
और थक-हार कर वापस अपनी बस्ती में लौट आती थी।

(2)


जनता 
कोई एक थोड़े थी
कई शक्लों और कद-काठी में बँटी हुई थी
पहले का मुँह सबसे बड़ा था हिंदू था
दूसरा मुसलमान था तीसरा सिख था
चौथा ईसाई था पाँचवाँ घमंजा था
और इनकी सरकारें आवारा थीं
तरह-तरह के लिबास पहनती थीं
इत्र लगाती थीं गहने गढ़ाती थीं
किसी के भी साथ कभी भी भाग जाती थीं
कभी हिंदू की सरकार भाग जाती थी
तो कभी मुसलमान की कभी किसी की
सरकार मुँह अँधेरे भी भागती थी
तो कभी दिन दहाड़े भी भागती थी
जब सरकार भाग जाती थी
तो जनता के मुँहों से हवाईयाँ उड़ जाती थीं
जैसे यह सब
उसके साथ पहली बार हो रहा हो
जबकि उसके साथ हर बार यही होता था 
पहले से उसके राजनीतिक भाग्य में लिखा होता था
सरकार भागेगी तो कुछ दिन जनता रोये-धोयेगी
और जगह-जगह सरकार को ढूँढने के बाद 
अंत में रपट लिखाने थाने पर जाएगी।

(3) 

इतना बड्डा
हुजूम देखकर 
थानेदार की भौंहें फड़कने लगी थीं
कड़क आवाज़ में पूछा क्या माज़रा है,
हिंदू ने कहा हुज़ूर मेरी वाली भाग गयी 
मुसलमान ने कहा मेरी वाली भाग गयी 
फिर औरों ने भी कहा मेरी वाली भाग गयी
थानेदार ने झल्लाकर कहा -
अबे कुल कितनी भैंसें भाग गयीं
सबकी भैंसे एक साथ भागीं या भगायी गयीं
- नहीं, नहीं थानेदार साहब
भैंस नहीं हमारी सरकारें भाग जाती हैं
उनके भागने-भगाने की रपट दर्ज़ करो
थानेदार ने रोबीली आवाज़ से हड़काया -
क्या मैं तुम्हें पागल दिखता हूँ
अरे गधो सरकारें भी कहीं भागती हैं
हा हा हा हो हो हो
भागो यहाँ से तुम सब
भाँग खाकर आये या गाँजा पीकर
ऐसी सरकारें बनाते ही क्यों हो
जो किसी भी अड्डे-बड्डे के संग भाग जाएँ। 

(4)

पुरानी-धुरानी
हवेली उदास थी 
कनीज़ की कनीज़ दिखती 
कनीज़ चमेली उदास थी
फटेहाल नवाब साहब उदास थे 
तबलची उदास थे गवैये उदास थे
नचनिये-पदनिये उदास थे मतलब
हिंदी के कबी-सबी अम्पादक-संपादक
और अफ़सानानिगार वगैरह सारे
इनामी-सुनामी सब उदास थे
चाँदनी रात और सुरमई शाम
और सुर्ख़ आफ़ताब सब उदास थे
राजनीति की इस उदासी पर लिखी जा रही
कविताएँ उदास थीं कहानियाँ उदास थीं
दिन उदास था उजाला उदास था
चाय का प्याला और रसरंजन का गिलास
सब उदास था 
बहत्तर साल से ढहती हुई हवेली उदास थी
यहाँ तक कि उदासी भी उदास थी
हम सबकी बेग़म सरकार 
किसी साहूकार के साथ भाग गयी थीं।

(5)

जिन सरकारों को 
जनता के साथ घर बसाकर रहना नहीं आता
तो बनती ही क्यों हैं इंकार क्यों नहीं कर देतीं
शुरू में ही कह क्यों नहीं देतीं
कि हमें मुँह दिखाई में चंद्रहार चाहिए 
हमें रहने के लिए सोने के लिए
अच्छे से अच्छा सोने का महल चाहिए
नये ज़माने का एंटीलिया-फेंटीलिया से भी शानदार चाहिए 
दूल्हा तो सबसे अमीर चाहिए खानदान आला चाहिए
किसी चिरकुट निरहुआ घिरहुआ के साथ
उसकी टप-टप चूती झोपड़ी में नहीं रहना है।

(6)

यही वक़्त था सही वक़्त था
जब पुलिस की नाकामी के बाद
जासूस तिरलोकचन को लाया गया
जासूस ने अपना हैट उतारा
सिर खुजलाया आँखे मिचकाया
और बताया-
इसी सरकारी बंगले से 
इसी वजीर की कोठी फाँदकर
इसी चोर रास्ते से इसी सुरंग से
इसी आँख में पट्टी बंधी हुई 
किताब से मुँह छिपाकर 
सरकारें भागती रहती हैं
जासूस तिरलोकचन ने
ऐलान किया था कि उन्होंने 
भागी हुई सरकारों के बारे में
सब पता कर लिया है
कौन हैं जो ऐसी मनचली सरकारों को
भगाकर ले जाते हैं और ऐश करते हैं
ऐसे लोगों के खि़लाफ़ सारे सबूत हैं
सारे गवाह हैं मुकम्मल तैयारी है
हम इन्हें गिरफ़्तार कर सकते हैं
हम इन्हें हमेशा के लिए
सलाखों के पीछे डाल सकते हैं
जासूस तिरलोकचन ने
जनता की ओर देखा अपना हैट उतारा
पीठ पर हाथ ले जाकर सिर झुकाया
और अतिविनम्रता से कहा- 
बस एक बार ढंग से 
जनता का साथ देने वाली
सरकार आ जाय।




रविवार, 9 मई 2021

समय सीरीज़


- गणेश पाण्डेय

समय 
सब बीत जाता है
लेकिन कोई समय ऐसा भी होता है
जिसका बीतना ही नहीं दिखता है

पहाड़ की तरह 
ठहरा हुआ एक समय है 
कोई समय है सिर्फ़ तारीख़ बदलती है

किसी के 
जीवन का पहिया रुक जा रहा है
किसी का थर-थर काँप रहा है

इतना बुरा समय कभी नहीं देखा था
किसी घर का एक हरा-भरा स्वस्थ वृक्ष 
किसी रोगी के छींक भर देने से 
खड़े-खड़े दो दिन में सूख जा रहा है

बुज़ुर्ग बेचारे 
भय से धराशायी हो जा रहे हैं
उनकी नींद भी जैसे नींद की पनाह में हो
यह जीना भी मरने की तरह है

कोई मुँह पर ज़रा-सा खाँस भर दे 
तो बड़े-बड़े बाऊ साहब की सिट्टी-पिट्टी 
गुम हो जा रही है

एक उत्साही युवक
बड़े मान से अपने शुभ-विवाह का 
निमंत्रण-पत्र बाँटकर आ रहा है और वह
दो दिन बाद शोक में बदल जा रहा है

एक युवा पिता 
सारे एहतियात के बावजूद
बहुत डरा हुआ घर से निकलता है
और उसी तरह डरा हुआ घर लौटता है
स्नान करने कपड़े बदलने के बाद भी
अपनी लाड़ली को गोद में उठाकर
चूमने से डरता है

बड़े तो समझ रहे हैं 
कि यह सब उनके साथ हो क्या रहा है
बच्चे समझ नहीं पा रहे हैं कि समय 
उनके साथ कर क्या रहा है

हे समय 
बहुत कर ली मनमानी
अब अपना डोला बढ़ाओ
जाओ किसी और ग्रह पर डेरा डालो
मैं कहता हूँ हटो दफ़ा हो जाओ
खाली करो हमारे बच्चों की पृथ्वी।

2

ओह
फूलों में ख़ौफ़ है
हवाओं में निकल आए हैं
ज़हरीले डंक 

पंखुड़ियों तक में 
पैदा हो गया है जानलेवा ख़ौफ़
ख़ुद को अलग कर लिया है
दूसरे से

फूल सदमे में हैं
मंदिर में मंडप में गुलदस्ते में
यहाँ तक कि प्रेम का संदेश लेकर भी
जाने से मना कर दिया है

यह कैसा समय है
जिसे देखते ही कुम्हला जाता है 
फूल का मुख 
काँपने लगती है उसकी रूह
ताकती रहती हैं आँखें बगीचे में
कोई आए और मोड़ दे 
समय का रथ।

3

यह समय
किस लिए याद किया जाएगा
ट्रंप के जाने के लिए या फिर
मोदी के रह जाने के लिए

क्या यह समय
इतना छोटा है इतना तुच्छ है कि
किसी राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री के
आने-जाने के लिए याद किया जाएगा

यह समय
दुनिया का क्रूरतम समय है
जो लाखों फ़ौज़ियों के मारे जाने के लिए नहीं
असंख्य निर्दोष लोगों के मारे जाने के लिए 
याद किया जाएगा 

दोष राजा का था
और मारे गए अपनी हड्डियों से
अपनी मांस-मज्जा से अपने हाथों से
अपनी आँखों से और उनमें बसे
स्वप्न से सिंहासन बनाने वाले

जब मर रहे थे जन
असहाय असमय समूह में
राजा अपने महल में मगन था
चक्रवर्ती राजा बनने के स्वप्न देख रहा था
राजा को प्रजा के स्वप्न न दिखायी देते थे
न उसकी चीख़ें सुनायी देती थीं
वह अभी-अभी लौटा था आखेट से
तमाम हिरनों-हिरनियों और उनके शावकों का
शिकार करके

बाहर 
हर शहर, हर गाँव-गली में
मौत का सन्नाटा पसरा हुआ था
घरों के भीतर से सिसकियाँ 
और चूड़ियों के तोड़े जाने की आवाज़
बाहर आ रही थी

यह समय 
धरती और आकाश को एक कर देने वाले
इस रुदन के लिए याद किया जाएगा
कि राजा और दरबारियों की अद्भुत
जुगलबंदी के लिए याद किया जाएगा

राजा बूढ़ा था 
चाहे उसके केश और लंबी दाढ़ी पर
सृष्टि की सारी चांदनी उतर आयी थी
लेकिन उसका
माउथऑर्गन बजाने का अंदाज़ वही था

यह समय 
आख़िर किस लिए याद किया जाएगा
न प्रेम के लिए याद किया जाएगा
न फूलों के खिलने के लिए
न हवा के चलने के लिए 
न नदी के बहने के लिए
न राजा के पसीजने के लिए
न प्रजा का भाग्य बदलने के लिए

यह समय
प्रजा के दुर्भाग्य के लिए याद किया जाएगा
परिजनों-स्वजनों के 
असमय वियोग के लिए याद किया जाएगा
शवों के अनगिनत रह जाने और शव हो जाने के 
भय के लिए याद किया जाएगा

यह समय 
हिंदुत्व के उभार के लिए नहीं
राष्ट्र के नवनिर्माण के लिए नहीं
कोरोना से हार के लिए याद किया जाएगा।

4

गोरखपुर में बारिश हो रही है
कोलकाता में भी बारिश हो रही होगी
हैदराबाद भी भीग रहा होगा
चेन्नई की सड़कों पर जल का रेला होगा
क्या देश क्या परदेश हर जगह
सबका मौसम एक है सबकी मुश्किल एक है

देश और दुनिया में
घड़ी की सुइयाँ अलग-अलग हैं
कैलेंडर के पन्ने अलग-अलग हैं
कहीं भी किसी का भी समय
अलग नहीं है

बारिश एक जैसी हो रही है
बादल एक जैसे गरज रहे हैं
बिजली एक जैसी कड़क रही है
सब एक जैसे सहमे हैं
सब एक जैसे बिलख रहे हैं
सब एक जैसे चुप हैं

सब जगह
एक पिता है एक माँ है
एक भाई है एक पत्नी है 
एक जैसे बच्चे हैं
जीवन में कोई भी बुनियादी चीज़
अलग नहीं है

अच्छा समय सबको
एक जैसा हँसाता है गोद में उठाता है
होंठों पर एक जैसी मुस्कान जड़ देता है
सब एक जैसे प्रेम करते हैं
एक-दूसरे की क़द्र करते हैं
एक दूसरे का ख़याल रखते हैं

अच्छा समय
बहुत अच्छा होता है बहुत कोमल होता है
बुरा समय उसे छूभर दे तो मुरझा जाता है
जैसे आज दुनिया के सारे अच्छे समय
असमय झर गये हैं डाल से
धूल-धूसरित हो गये हैं

किसी बाग़ में किसी मैदान में
कोई रामलीला नहीं हो रही है
एक सचमुच का रावण-समय 
पृथ्वी की मुँडेर पर पैर रखकर 
अट्टहास कर रहा है
और इसके दर्प को चूर-चूर करने के लिए
कोई राम नहीं है कोई युद्ध नहीं है
कोई धर्म किसी काम का नहीं है

हर जगह एक अकेला मनुष्य है
अपने लोगों के लिए हाय-हाय करता
इधर-उधर भागता चीख़ता-पुकारता
समय के पैरों में अपना शीश
पटक-पटक कर फोड़ता

इस काल से जूझता
मारा-मारा फिरता हुआ कोई कवि
कितनी लंबी कविताएँ लिखेगा
और उन कविताओं में
काल के काल की कामना में
मंत्र का जाप करेगा।

5

वह भी एक समय था
जब अंग्रेज़ी दवाएँ मिलना तो दूर
तेतरी बाज़ार में दिखती तक नहीं थीं
कोई साठ साल पहले आज की तरह
बाज़ार कहाँ थे बस ग्रामसभाएँ थीं
जिला परिषद का एक आयुर्वेदिक
अस्पताल था मेरे घर से दूर था
जिसका चूरन बच्चों में बहुत मशहूर था
इसीलिए कंपाउंडर अनिवार्य रूप से
सभी बच्चों के चाचा थे और हम 
इसीलिए चूरन लेने जाते थे
वह एक आयुर्वेदिक समय था

जूड़ीताप हो
चाहे साधारण ज्वर
माँ दो घर छोड़कर पंसारी की दुकान से
वेदना निग्रह रस की पुड़िया लेकर आती
कहती फाँक लो और उसके बाद 
पानी की घूँट के साथ जादुई दवा भीतर
और थोड़ी देर में बुख़ार बाहर

वह भी एक समय था
जब चाहता था कि बुख़ार आए
तो बुआ आए ख़ूब सारा मुनक्का लेकर
और मैं खाता जाऊँ खाता जाऊँ
कभी-कभी शरीर पर कुछ दाने निकलने पर
कभी माँ बुआ मिलकर शीतला माता के गीत गातीं
नीम की पत्तियों का गुच्छा फिरातीं

प्राइमरी स्कूल में
चेचक का टीका लगाने वालों को
चाचा नहीं कहते थे छपहार कहते थे
उसे देखते भी नहीं थे आना सुनते ही
बस्ता छोड़कर भाग लेते थे
कई दिन स्कूल नहीं जाते थे
छपहार भी चकमा देकर आते थे
और हम बच्चों को एक बड़ी बीमारी से
इस तरह बचाते थे कि हमारी दुनिया
आख़िर चेचक के विषाणु से बच गयी

एक यह समय है
हमारी दुनिया थर-थर काँप रही है
सर्दी-बुख़ार-खाँसी से
कहाँ हो माँ कहाँ हो बुआ और बाबूजी 
आओ देखो 
पृथ्वी का सबसे उन्नत चिकित्साविज्ञान
आज तुम्हारी संततियों और उनकी
संततियों को आश्वस्त नहीं कर पा रहा है
बहुत बड़े-बड़े चिकित्सा संस्थान हैं
जिनकी कल्पना आप सबने नहीं की होगी
और ये सब नाकाफ़ी हैं

हम बच्चे थे
लेकिन उस वक़्त भी 
मुश्किलें कम नहीं रही होंगी
जमोगा माई का नाम सुना था
जिससे अनगिनत नन्हे दीप जन्म लेते ही बुझ जाते थे
रोती-बिलखती-सुबकती रह जाती थीं नयी-नयी माँएँ
टिटनेस की सुई भी आयी 
मनुष्य ने विजय पायी

रोग और मनुष्य का यह संघर्ष अनंत है
विषाणु और मनुष्य की जिजीविषा में
हमेशा मनुष्य की जीत हुई है
और होती रहेगी
यह संघर्ष लंबा हो सकता है
मनुष्य की कोशिश कभी कम नहीं होगी

हमारे पुरखों ने भी
इसी तरह डर कर लड़ कर और बच कर
हमें बचाया है हम भी अपनी संततियों को
उनकी संततियों को बचाएंगे

हमारी उदासी हमारा रोना
थोड़े दिनों की बात है सब दूर हो जाएगा 
पृथ्वी की हरी-भरी छाती पर हलचल होगी
फुटबॉल हॉकी क्रिकेट कबड्डी
और आइस-पाइस खेलते हुए हमारे बच्चे
इस दुनिया को फिर से 
जीवन के शोर से भर देंगे हम देखेंगे
हम ज़रूर देखेंगे।

6

यह नीम का नहीं समय का पेड़ है
जिसकी डाल में अब झूले नहीं पड़ते
सखियाँ जिस पर झूलती नहीं
भाभियाँ कजरी नहीं पातीं
जिसकी सींक से बुज़ुर्ग अब 
नहीं निकालते दाँतों में फँसे दुख
जिसकी छड़ी से कोई पिता अपने पुत्र को
मारता नहीं स्कूल जाने के लिए
यह मेरे बाबा का नाना का लगाया हुआ
नीम का पेड़ नहीं है
जिसकी छाया में जुड़ाते रहे हम
जिसके नीचे रातों में चैन से
सोते रहे हम
सुबह उठते ही जिसकी निंबोलियाँ
बीनते रहे हम

यह समय का पेड़ है नीम का नहीं
न यह दातून के काम का है न छाया के
न किसी राहगीर के सुस्ताने के काम का
सब इससे दूर भागते हैं
न कोई प्रेमिका 
इसके तने से टिककर खड़ी होती है
न कोई प्रेमी इसकी सख़्त छाल पर
अपना और अपनी प्रेमिका का 
नाम लिखता है

इस पेड़ पर
न चिड़ियों की चहचहाहट है
और न परिंदों का घोंसला
यह पृथ्वी का एक अभिशप्त पेड़ है
जिसकी पत्तियों से प्राणवायु नहीं
झर-झर-झर माहुर झरता है।

7

हे समय माता
शीश नवाता हूँ प्रसाद चढ़ाता हूँ
नारियल फोड़ता हूँ टीका लगाता हूँ
रक्षासूत्र बंधवाता हूँ 

धागा बाँधता हूँ 
पृथ्वी के एक-एक जन के जीवन की रक्षा के लिए 
एक-एक पुष्प की हँसी एक-एक मुस्कान
अच्छे-बुरे आस्तिक अर्द्ध आस्तिक नास्तिक 
सबके लिए

समय के इस प्रहार की धार को
मोड़ दो माता अपने बच्चों के लिए
समय से लड़ जाओ समय माता
हे समय माता भला समय
आप से बाहर कहाँ जा सकते हैं
एक बार उन्हें टोक दो रोक दो
उनकी बाँह पकड़ कर 
पीछे खींच लो

हे समय माता
जैसे पूर्वांचल की माताएँ
अपने बच्चों की छोटी-छोटी खुशियों के लिए
हलवा-पूड़ी की कड़ाही चढ़ाती हैं
मैं भी पृथ्वी के सभी बच्चों की रक्षा के लिए
नया समय आने पर कोरोना पर लिखी
अपनी लंबी कविताओं की कड़ाही चढ़ाऊँगा माँ।