सोमवार, 13 अप्रैल 2026

दिल्ली जाऊँगा

- गणेश पाण्डेय 

दिल्ली जाऊँगा
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मई-जून में 
दिल्ली में कितनी गर्मी रहती होगी 
वहाँ के लेखक बाहर धूप में 
निकलते होंगे या नहीं निकलते होंगे 
निकलते होंगे तो उनका माथा 
कितना गर्म रहता होगा 

सोचता हूँ गर्मियों में 
बच्चों के पास एनसीआर जाऊँ
जाऊँ तो सबसे पहले 
उस लेखक से मिलूँ
जिसका माथा हमेशा ठंडा रहता हो
और जो दिल्ली में रहकर भी 
सादादिल हो सादामिज़ाज हो
और जिससे मिलने के बाद 
आग बरसाती हुई दोपहरी में भी 
रूहअफ़ज़ा शर्बत पीने जैसी
ताज़गी मिलती हो

दूसरे लेखकों से मिलने के लिए 
कौन सा दिन और वक़्त सही होगा
किससे स्वागत की उम्मीद करूँगा
कौन मुँह लटकाकर मिलेगा 
किसे कुर्सी का घमंड होगा
किसे नहीं होगा
किससे मिलना ज़रूरी होगा 
किससे ग़ैर-ज़रूरी
किससे मिलकर 
वज़नी होकर लौटूँगा
किससे लुट जाऊँगा

किसी से मिलूँ तो कितना झुकूँ
कितना मुँह खोलूँ कितनी चाय पिऊँ
सुड़कूँ या ख़ामोशी से पिऊँ
नमकीन खाऊँ या नहीं खाऊँ

अव्वल तो मेट्रो में अकेले 
चढ़ नहीं पाऊँगा गिर जाऊँगा
कोई सामान चुरा लेगा
मोबाइल पर्स पानी की बोतल 

एक गमछे से इतनी बड़ी दिल्ली में 
ऐन दोपहरी में लू के थपेड़ों से 
कैसे बच पाऊँगा मुश्किल होगी 
फिर भी दिल्ली जाऊँगा

पहली बार गर्मियों में कुछ हफ़्ते
एनसीआर में रहने की मजबूरी हो 
तो मुझे क्या करना चाहिए 
और क्या नहीं करना चाहिए 
मदद करो ओ दिल्ली वालो
ओ दिल्ली आने-जाने वालो

इकहत्तर 
पार कर चुका हूँ 
एक बार दिल्ली के दिल को
एकदम से मेरे दिल से मिला दो
दोनों एक-दूसरे का सुख-दुख 
जान लें 

आग बरसती हो या पानी 
चाहे चलती हो आँधी
जब दिल्ली आऊँगा ही तो
दिल्ली के मज़े मुझे भी चखा दो 
लेखकों की रंगीन शामें महफ़िलें
और रक़्स दिखा दो दिखा दो
मुझे भी थोड़ी-सी 
पिला दो पिला दो पिला दो
उनकी तरह 
एक बूढ़ी रक़्क़ासा बना दो

लेकिन 
रक़्स ख़त्म होने के बाद 
देर रात मुझे रास्ता कौन बताएगा
मुझे मेरे बच्चों के पास 
कौन पहुँचाएगा
मेरी मदद कौन करेगा 
मैं वापस अपने ठिकाने पर अकेले 
देर रात कैसे लौट पाऊँगा

नहीं-नहीं मैं दिल्ली की
रंगीन रातों को देखने के लिए 
क़तई रुक नहीं पाऊँगा
दिन ढलने से पहले लौट आऊँगा।

                                           
                                                                                                   

बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

फ़रवरी सिर्फ़ एक महीना है तथा अन्य कविताएँ

- गणेश पाण्डेय 

बलई मिसिर एमए पीएचडी हिन्दी 
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न फूल की दुकानें थीं
न छिपकर बैठने की जगहें 
एक स्वेटर एक जूता तो था नहीं 
हवाई चप्पल पहनकर घूमते थे 
वहाँ न यूनिवर्सिटी थी न कॉलेज 
कितनी नदियों को पार करके 
कितनी मुश्किलों में हुई थी 
बलई मिसिर की पढ़ाई लिखाई
फिर तो जीवन में कभी 
फ़रवरी आयी ही नहीं 
जो आयी सीधे 
सूर्यमुखी बीबी आयी 
चार बच्चे आये
बेचारे 
बलई मिसिर तो जीवन में 
जनवरी की हाड़ कँपाती 
ठंड के पहाड़ से सीधे 
अप्रैल मई जून की आग में 
कूद पड़े थे
चारों तरफ़ 
आग ही आग थी 
न गुलमोहर न अमलतास 
न फ़रवरी न मार्च ओह 
जन्म-जनम के फ़रवरी-वंचित 
बलई मिसिर 
एम ए पी-एच डी हिन्दी।

फ़रवरी सिर्फ़ एक महीना है 
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मैं इसी महीने में 
उस नदी के पास गया था 
नदी उसी तरह बह रही थी 
नदी वही थी पानी नया था 

नये लड़के और लड़कियाँ 
तट पर हूबहू उसी तरह बैठे थे 
एक पैर जल में था एक तट पर

सूरज की किरणों से उनका 
चेहरा उसी तरह दमक रहा था 

सूरज डूब रहा है डूब जाएगा 
उन्हें पता नहीं था जैसे हमें 
पता नहीं था 

सूरज डूब जाएगा 
नदी का पानी बह जाएगा 
फूल मुरझा जाएगा 
कौन बताए उन्हें 

जीवन में 
फ़रवरी सिर्फ़ एक महीना है 
बीत जाएगा।

जगह वही है 
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यह पेड़ वह पेड़ नहीं है 
यह हरा है वह सूख गया था 
जगह वही है 
यह गुलमोहर नया है 
यह अमलतास नया है फूल नये हैं 
उस पर बैठी कोकिला नयी है 
उसका कंठ नया है 
उसकी पुकार नयी है 
दोनों का साहचर्य नया है 
यह फ़रवरी नयी है।

मेरी जान
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पार्क में सीमेंट की बेंच वही है 
कुर्ती उसी तरह लाल है छींटदार है 
और सलवार उतनी ही सफ़ेद 
लड़की नयी है लड़का नया है 
और बगल में खड़ी लाल बाइक 
नयी है 

सीमेंट की बेंच भी 
हमें कहाँ अलग होने से बचा पायी 
वह जगह भी हमें नहीं रोक पायी 
वह घास भी कहाँ हमें बाँध पायी 
जिस पर हम नंगे पैर चलते थे 
बिना कुछ बिछाये लेट जाते थे 
आसमान को निहारा करते थे 
आसमान भी हमें बचा नहीं पाया

समय का चाकू 
मज़बूत से मज़बूत जोड़ को
एक झटके में अलग कर देता है 
कोई नहीं बचा पाता है फ़रवरी भी
हम बचने के लिए बने ही नहीं थे 
हमें इसी तरह टूट-फूट जाना था
मिट्टी के राजा
और मिट्टी की रानी की तरह।



मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

गंगाजल तथा अन्य कविताएँ

- गणेश पाण्डेय

हमारा प्यार 
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तुम चाहती तो 
मेरा घर तोड़ सकती थी 

मैं तो चिता से भी उठकर 
तुम्हारे साथ भाग सकता था 

मैं चाहता तो 
तुम्हारा घर तोड़ सकता था 

तुम्हारे घर के आसपास
दीवारों पर तुम्हारा नाम लिखकर 

प्यार में कोई किसी को 
नुक़सान कैसे पहुँचा सकता है 

हम तो अपने प्यार को तमाम 
वक़्त के थपेड़ों से बचाते रह गये 

दिल के किसी पोशीदा तहखाने में 
यादों की संदूक में उसे रखा 

यही था यही था हमारा प्यार 
राख में बची हुई चिनगारी की तरह।

पोती पूछेगी 
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तीन दिन फोन पर बात नहीं हुई तो 
पोती ने कहा, बाबा कहाँ चले गये थे
बाबा ने कहा, मेरी तबीयत ख़राब थी 
पोती ने पूछा, तबीयत क्यों ख़राब थी
काश, उसके बाबा कभी बीमार न हों
काश, पोती की आँखों के सामने से 
उसके बाबा कभी ओझल ही न हों
पोती पूछेगी परेशान होगी।


फ़ज़ीहत के बाद 
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मुफ़्त सलाह देना 
समझदारी की बात नहीं थी 
नहीं देना चाहिए था कभी नहीं 
जहाँ मुफ़्त में देना बहुत ज़रूरी था 
वहाँ से भी बिना दिए चुपचाप 
हट जाना चाहिए पाँडे जी को 
अक़्ल आयी तो लेकिन तमाम
फ़ज़ीहत के बाद।

गंगाजल 
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बेटा 
दूसरे देश में नौकरी करता है
बुज़ुर्गवार कहीं गये ही नहीं 
यहीं पैदा हुए इसी मिट्टी में 
जवान हुए यहीं काम किया 
माँ-बाप की सेवा की 
बूढ़े हुए बीमारियाँ हुईं 
खाँसते-थूकते-जागते
बीतती है अब
सारी-सारी रात
बाबूजी की बनवायी बेंच पर 
तो कभी 
जिस आम के पेड़ को लगाया था 
उसके नीचे बैठकर 
रास्ता देखते-देखते दिन कटता है 
बेटा कभी आता है तो 
मरने के टाइम पर बिस्तर पर 
गू-मूत साफ़ करने के सपने 
दिखा जाता है 
बुज़ुर्गवार कभी नहीं पूछते
चारोधाम कब कराओगे 
बुज़ुर्गवार को अक्सर अपने 
बचपन की याद आती है 
किशोर जीवन की याद आती है 
पिता की याद आती है 
याद आता है अपने 
पिता का हाथ-पैर दबाना 
उनकी पीठ खुजलाना
नल के नीचे बैठाकर नहलाना 
बुज़ुर्गवार तो अपने 
बेटे की बड़ाई करते नहीं थकते 
बाहर रहता है दिरहम कमाता है 
उसकी कोई बुराई तो किसी से 
करते ही नहीं 
अलबत्ता 
जब कोई आसपास नहीं होता 
आसमान में देखकर कहते हैं 
मरते समय गू-मूत नहीं उठाओगे 
तो भी मर जाऊँगा बेटा 
कोई नहीं रोक पाएगा मरने से 
मरते समय क्या गू-मूत 
क्या गंगाजल 
जीते जी 
थोड़ा सा सुख मिल जाता तो
शायद थोड़ा और जी जाते।