शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

कवि की हत्या

- गणेश पाण्डेय

गोरखपुर में मेरी आँखों के सामने ही एक कवि की हत्या कर दी गई और मैं उस कवि को कविता और कवि के हत्यारों के पास जाने, बल्कि उन सबके साथ रहने से रोक नहीं पाया। दरअसल हत्यारों की वह मंडली थी ही ऐसी, जिसमें सरदार से अधिक किसी भी प्रतिभा वाले का मरना तय था। मरने की विधि ओैर प्रकार सब बहुत स्वाभाविक होता था। कोई माई का लाल कह नहीं सकता था कि हत्या की गयी है। सब समझते कि अपने आप मर गया है। यह न लगे कि हत्या की गयी है। यह भी न लगे कि ख़ुदकुशी की गयी है। कोई दुर्धटना, लूट, ज़हरखुरानी या रंजिश वगैरा, ंकोई वजह कहीं दिखे ही नहीं। वे सब अधिक प्रतिभा वाले को अचानक झटका देकर नहीं मारते थे, धीमा ज़हर देते थे। इतना धीमा ज़हर देते थे कि सत्तर-पचहत्तर पार करने के बाद साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने का उसका नंबर आए, तब उसे और शहर के बाक़ी लोगों को पता चले कि अरे अकादमी का अध्यक्ष तो उस कवि को कवि ही नहीं मानता है। मृत कवि मानता है। सार्वजनिक रूप से कहना भी शुरू कर देता, जिससे उस पर लांछन न लगे कि जो प्रतिभाशाली कवि उसके बहुत निकट होता है, उसके गैंग में होता है, कोई पैंतालीस-पचास साल गैंग की सेवा में देता है, सरदार का फ़रमाबरदार होता है, वह उसकी हत्या कर देता है। इसलिए कि वह उससे अधिक प्रतिभाशाली होता है। जिस प्रतिभाशाली कवि की बात कर रहा हूं, उसके केस में भी यही हुआ था। 

      इस हत्याकांड से बहुत पहले की, इस कवि की बहुत अच्छी याद से बात फिर से शुरू करते हैं। मैं उन दिनों अपने प्यारे तेतरी बाज़ार में रहता था। जो अब सिद्धार्थनगर जनपद का मुख्यालय है। उससे कोई दस किलोमीटर दूर उस्का बाज़ार में एक कवि सम्मेलन का आयोजन था। जिसमें शामिल होने के लिए तेतरी बाज़ार से जाने वालों में डॉक्टर सच्चिदानन्द मिश्र, डॉक्टर अबू शहमा सिद्दीकी, मैं और मेरी उम्र के कुछ और युवा कवि शामिल थे। कविता पढ़ने और कविता लिखने के लिए किन-किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, उसी समय पता चला। हम उपलब्ध कराई गई जिस जीप में सवार होकर कविता पढ़ने के लिए उसमें बैठकर जा रहे थे, रास्ते में ही उसने हमारे छक्के छुड़ाने शुरू कर दिए। थोड़ी दूर चलती, फिर बंद हो जाती और इस तरह कोई पाँच-छः बार मैं और दूसरे युवा कवि मित्र धक्का देते फिर जीप स्टार्ट होती। चूँकि डॉक्टर सच्चिदानन्द मिश्र मेरे प्रथम साहित्य गुरु थे और डॉक्टर अबू शहमा सिद्दीकी उनके मित्र थे, इसलिए ज़ाहिर है कि धक्का देने का काम हमें ही करना था। इस बीच कविता-सविता भूलकर यह सोचता रहा कि अभी और कितनी बार धक्का देना पड़ेगा। ख़ैर, कविता के लिए धक्का देने का अंत तो अभी नहीं हुआ था, लेकिन हम सब उस शामियाने में पहुँच गए थे, जहाँ मंच पर चटक रोशनी में कवि गण बैठे हुए थे और बस सरस्वती वंदना पढ़ने के लिए कोई कवि खड़ा ही हुआ था। हम भी मंच पर बैठे। मुझ पर जीप के धक्के का असर आज तक इतना है कि मैं भूल गया हूँ कि मैंने उस कवि सम्मेलन में अपनी कौन सी कविता पढ़ी थी। ख़ैर, ग़ज़ब तब हुआ और मेरी चेतना तब वापस लौटी, जब गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से आए प्राध्यापक अनन्त मिश्र कविता पढ़ने के लिए माइक के सामने खड़े हुए। क्या सुदर्शन मुखमंडल था, क्या लंबी धज थी, क्या गोरा रंग था, फुल्ले-फुल्ले गाल का ज़िक्र तो अभी किया ही नहीं और ज़ुल्फ़ें किसी हीरो की तरह। आवाज़ जैसे दिलीप कुमार की तरह। खनकती हुई। उठती-गिरती हुई। एक-एक शब्द पर जैसे किसी फ़िल्म के सुकोमल नायिका के सुंदर पैर ठिठक-ठिठक जाते हों। उस कवि की एक ही कविता ‘पगड़ी’ मुझे घायल करने के लिए काफ़ी थी। यह कहने में कोई संकोच नहीं कि उस रात वह कवि मेरे लिए कविता का हीरो था। फ़िल्म थोड़ी लंबी है, इसलिए थोड़ा-थोड़ा और आगे-पीछे करके बताता चलूँगा। फ़िल्मों के अंतिम दृश्य में जैसे कुछ हीरो मर जाते हैं, जैसे ‘आनंद’ फ़िल्म में आनंद को, बाबू मोशाय बचा नहीं पाता है। कुछ-कुछ वैसी ही कहानी उस कवि की और उससे मेरे रिश्ते की है। मैं भी कहां बचा पाया, अनंत मिश्र को। गोरखपुर के अपने समय के कवियों पर बहुत पहले की मेरी एक बहुत छोटी कविता है- 

यहीं देखा
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कई 
कवि देखे
कई तरह के 
कवि देखे
कोई मधुकर था यहाँ
कोई काला था, कोई दिलवाला
कोई परमानंद, कोई विश्वनाथ।

देवेंद्र कुमार को यहीं देखा
अपनी हीर कविता के लिए राँझा बनते।

यहीं देखा फक्कड़ अनन्त को
कविता राधा को देखते और देखते रह जाते।

यहीं जाना मैंने 
क्या होता है कविता के लिए मर मिटना।

    देवेंद्र कुमार कविता के अनन्य प्रेमी थे। वह अपनी कविता की बहुत इज्जत करते थे, उसे दूसरे कवियों की तरह ले जाकर दिल्ली के बाजार में खड़ा नहीं कर देते थे। आओ मेरी कविता की अदा देखो, कमर देखो, लिपिस्टिक देखो, काजल देखो, गोरी-गोरी कलाई देखो, आओ घूंघट उठाकर देखो, नथ उतारकर देखो। मेरी कविता को ले लो, मुझे साहित्य अकादमी पुरस्कार दे दो। वे अपनी कविता से बहुत प्रेम करते थे। उसकी इज्जत का कभी सौदा नहीं करते थे। अपने सीने से लगाकर रखते थे। एक-एक शब्द सुई-धागे से ख़ुद सिलते थे, किसी दर्जी के पास नहीं जाते थे। देवेंद्र कुमार इस लेख के मुख्य विषय नहीं हैं। कविता में नाम आया है और अनन्त मिश्र से उनका प्यारा रिश्ता रहा है, इसलिए कुछ कह गया। अनन्त मिश्र को देवेन्द्र कुमार अपने बाद इस शहर के सबसे अधिक संभावनाशील कवि के रूप में देखते थे। संत कबीर छात्रावास के कमरा नंबर सात में देवेंद्र कुमार अक्सर आते थे। उनके दफ़्तर जाने और दफ़्तर से लौटने का रास्ता ही वही था। उनका दफ़्तर पास में था। कभी मैं उनकी तरफ़ निकल जाता था। देवेन्द्र कुमार, मुझसे अनन्त मिश्र की ग़ैरमौजूदगी में कहते थे कि अनन्त मिश्र बहुत अच्छा लिखते हैं। कविता की वजह से निकटता स्वाभाविक थी। परीक्षाओं में अनन्त जी की ड्यूटी मेरे कमरे में लगती या आसपास, अनन्त जी जब भी गदेली पर तम्बाकू रखकर चूना मिलाते, एक बार मेरी ओर देख लेते और उत्तरपुस्तिका से एक क्षण के लिए मेरा ध्यान भंग करके हथेली मेरी ओर बढ़ा देते। उन दिनों मेरे लिए यह कितना अच्छा था, इस समय बता नहीं सकता। प्रसंग अनन्त जी की कविता का है। हालाँकि बाद में बच्चों ने पान-तम्बाकू सब छुड़ा दिया। ख़ैर।


    वह बहुत अच्छा लिखने वाला कवि कब विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के षड्यंत्र का शिकार हुआ, यह बहुत बाद में पता चला। अनन्त जी, जब अस्सी के पास पहुँचे। उनके जन्मदिन पर आयोजित एक भव्य समारोह में विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने सार्वजनिक रूप से अनन्त जी कविताओं को तुरंता कहा, अधपकी कहा, कच्ची कहा। अलबत्ता शब्द दूसरे थे, लेकिन आशय यही था। ओह, यह सब अनन्त जी के लिए कितना तकलीफ़देह रहा होगा। इस समय जब कविता की जान लेने के सौ तरीक़े का यह चौथा अध्याय लिख रहा हूँ, अस्वस्थ हूँ और बहुत दुःख का अनुभव कर रहा हूँ। मेरी तबीयत ख़राब हो गई थी, सिस्टॉलिक ब्लड प्रेशर काफ़ी बढ़ गया था। अलग से ब्लड प्रेशर कम करने की दवा दी गई। अभी भी डरा हुआ हूँ। नाश्ते में नमक बिल्कुल कम लेना है। बच्चों को पता नहीं है कि लैपटॉप छूने की मनाही है तो मोबाइल पर क्या लिख रहा हूँ। ख़ैर। सबकुछ माता सरस्वती के हवाले छोड़कर आलोचक-धर्म का निर्वाह कर रहा हूँ। किसी को तो साहित्य का सच पूरा का पूरा कहना पड़ेगा। आज जब हिन्दी के आलोचक, हिन्दी का काम करने की जगह गांधी और नेहरू पर पोथा लिख रहे हैं, चाहे विमर्श-विमर्श खेल रहे हैं, मैं वह सब लिख रहा हूं, जो शायद कभी लिखा नहीं जाता। यों तो अनन्त जी के कुछ शागिर्दों ने उन पर कुछ लिखा भी है, तो बहत औसत। न डूबकर लिखा है, न उनकी कविता का सच लिखा है। सेहत की वजह से अनन्त जी की तमाम कविताओं पर लिखने की स्थिति में नहीं हूं। वैसे भी किताब के विषय को ध्यान में रखकर जो बहुत ज़रूरी है, कह रहा हूं। कवि की हत्या कैसे की गयी, किसने की, यह सब बताने से पहले आपकों कवि की दुनिया में ले चलना ज़रूरी है। असल में किसी भी कवि की किसी भी कविता के संसार में प्रवेश करने से पहले कवि के व्यक्तित्व और उसकी निजी दुनिया का साक्षात्कार जरूरी होता हैं तभी हम किसी कवि को और उसकी कविता को पूरी तरह खोल पाते हैं। अनन्त जी की एक बहुश्रुत कविता मकान को आलोचक अरविंद त्रिपाठी अभाव की कविता के रूप में देखते हैं, लेकिन मुझे यह कविता एक प्रेम कविता के रूप में दिखती है-
मकान
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आदमी के ऊपर छत होनी ही चाहिए
वह घरेलू महिला
हमेशा मिलने पर कहती है
उसका बंगला नया है
उसके नौकर उसके लान की सोहबत ठीक करते हैं
और वह अपने ड्राइंगरूम को
हमेशा सजाती रहती है।
मैंने नीले आसमान के नीचे
खड़े हो कर अनुभव किया
कि छत मेरे सिर से शुरू होगी
या मेरे सिर के कुछ ऊपर से
जब मैं मकान बनाऊँगा,
अब मैं मकान हो गया था
और मेरी इंद्रियाँ जँगलों की तरह
प्रतीक्षा करने लगी थीं
मैंने सोचा
यह रहे मेरे नौकर-चाकर
मेरे हाथ और पाँव
यह रहा मेरा दरवाजा मेरा चेहरा
यह रहा मेरा डायनिंग रूम
मेरा पेट
यह रहा मेरा खुला हुआ बरामदा
मेरी छाती
यह रहे कैक्टस कँटीले
मेरी दाढ़ी-मूँछ
और यह रहा मेरा दिल
मेरा ड्राइंगरूम
मैंने पूरा मकान मिनटों में
खड़ा कर लिया था,
और अब मैं आराम से
सैर पर जा सकता था
जेब में मूँगफली भरे हुए
और चिड़ियों से मुलाकात करते हुए।

    इस कविता की एक-एक ईंट अलग करके देखें, उसकी नींव तक जाएँ, नींव की एक-एक ईंट निकालें और उसकी निर्मित में छुपे ख़ज़ाने को खोलें। वह घरेलू महिला हमेशा मिलने पर कहती है। वह हमेशा क्यों मिलती है या मिलने पर हमेशा मकान बनाने की बात क्यों करती है। कहना चाहिए कि वह क्यों चाहती है कि उसके पास एक छत होनी ही होनी चाहिए। वह ऐसे ही दरबदर मारा-मार न फिरे।
आखिर वह गृहिणी कौन है, उससे उसका कया रिश्ता है। वह कब से उस घर की गृहिणी है, मालकिन है, अपने नौकर-चाकर पर हुक्म बजाती है और सारा दिन घर की सजावट और ख़ुद को क़ीमती इत्र-फुलेल वगैरा से सजाने-सँवारने में लगी रहती है। गृहिणी होने के पहले क्या थी? किसी विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की छात्रा थी, उसकी सहपाठी थी। क्या थी, क्यों हमेशा उसे मकान बनाने के लिए कहती है? कोई ऐसे ही किसी को हमेशा कुछ भी कहता है? वह घरेलू महिला, जब न धरेलू थी और न महिला, बल्कि युवती थी, तब कितनी सुंदर थी, इतनी ही सुंदर थी या इससे अधिक? कोई तो मन ही मन चाहता रहा होगा, जैसे प्रकटप्रेमी रहा होगा? किसकी प्रेमिका रही होगी, यह रूपगर्विता धनाढ्य स्त्री? कई बार प्रेम में ऐसा भी होता है कि कोई सखी अपनी सखी के भूतपूर्व प्रेमी से अप्रकट प्रेम करने लगती है। कई बार ऐसा भी होता है कि कोई आहत प्रेमी, प्रेम की पीर से उबरने के लिए किसी अन्य स्त्री में अपना प्यार ढूँढने लगता है। प्रेम के विराट आश्रय से बाहर कर दिया गया प्रेमी किसी अन्य स्त्री से प्रेम का एक टुकड़ा छत चाहने लगता है, जिसमें ज़िंदा रह सके। कभी मिलता है, कभी नहीं मिलता है। साधारण प्रेमियों के लिए कई बार प्रेम आयी-गयी बात हो सकती है, लेकिन घनानंद से लेकर आज तक के सभी कवियों के लिए तो नहीं, क्योंकि आज के अधिकांश कवि व्यभिचारी होते हैं, कुछ कवि होते हैं, जो अपने प्रेम को भूल नहीं पाते हैं। बहुत पहरा न हो और प्रेम सार्वजनिक न हो पाया हो तो मिलने की भी कोशिश करते हैं। जिनका प्रेम सार्वजनिक हो जाता है, दोस्त-यार कवि की पत्नियों को भी बता देते हैं, उनके प्रेम की पीर घनानंद से भी बड़ी होती है। ख़ैर, तो थोड़ी देर के लिए मान लें कि इस कविता की गृहिणी, कविप्रिया है या कविप्रिया की प्रतिमूर्ति है, छाया है, तो अर्थ का एक अनन्त आकाश खुलता है। कविता में गृहिणी अपने नौकर-चाकर या मुनीम और ख़ज़ांची या रसोई का काम देखने वाले महाराज से नहीं कहती है कि आदमी के सिर पर एक छत होनी चाहिए। वह तो उस बेरोज़गार या अल्पआयवर्ग के प्रेमी युवक से कहती है, जो उससे मिलने आता रहता है। कहना चाहिए कि देखने के लिए आता रहता है। वह युवक कवि भी हो सकता है या कोई और युवक भी हो सकता है, जिसकी काया में कवि कल्पना की दुनिया में परकाया प्रवेश करता है। वह सुंदर और धनाढ्य महिला चाहती है कि यह प्रेम का मारा युवक सड़कों पर आवारा मारा-मारा न फिरे, शायद मजाज लखनवी की तरह या किसी और की तरह, इसलिए इसका पक्का अपना ठौर-ठिकाना हो। किराए के मकान का मालिक रोज़-रोज़ इसे तंग न करे। इसका अपना एक मकान हो। एक छत हो। वह सुंदर स्त्री प्रेम की छत-वत की दुनिया से बाहर निकल चुकी है, दुनियादारी को निकट से देख रही है। पैसा ही उसके समय का सत्य है। प्रेम-व्रेम या पार्टटाइम प्रेम, दिल बहलाव है। किसी कवि का किसी स्त्री को दिया गया एक घंटे का ट्यूशन। आओ-बैठो, चाय पिओ और घर जाओ। यह तो कवि का बावलापन है, जो इस थोड़ी देर की परायी दुनिया को अपना समझकर उसके पास चला जाता है। रोज़-रोज़ वह स्त्री समझाती है कि कुछ उद्योग करो ईंट-बालू-सीमेंट का घर-वर बनाओ। जीवन जीने के लिए एक भौतिक छत की ज़रूरत होती है। कल्पना की छत फूल-पत्तियों और किसी मुखड़े से बनाकर उसमें अपनी आँखें रखने भर की भी जगह नहीं पाओगे, ख़ुद को और अपने बाल-बच्चों को कहाँ रखोगे। कवि को उस स्त्री की बात कुछ-कुछ समझ में आती है, लेकिन कवि कल्पना की दुनिया से पूरी तरह बाहर निकल जाए, यह उस कवि के लिए संभव नहीं है। प्रेम का मारा कवि है। वह चाहता तो है कि उसका मकान हो, लेकिन फाँकामस्ती के दौर में संभव कैसे हो सकता है। यह कवि कोई ग़ालिब तो है नहीं कि क़र्ज़ की मय की तरह, मकान बनाने के लिए क़र्ज़ मिल जाए। ओह, कितना साधु, संतोषी और आत्मसंचयी है कवि। न किसी सेठ का ताला तोड़ने की बात करता है, न सेठानी के आभूषण चुराकर महल बनाने की बात सोचता है। उसे पता है कि ग़ालिब की तरह उसकी भी फाकामस्ती एक दिन रंग लाएगी-
क़र्ज़ की पीते थे मय, लेकिन समझते थे कि हाँ 
रंग लाएगी हमारी फाकामस्ती एक दिन।
      इस कविता में कवि क़र्ज़ की शराब नहीं पी रहा है, कहना चाहिए कि उसके पास इतना भी क़र्ज़ का पैसा नहीं है कि कोई क़ीमती चीज़ खा-पी सके। दो पैसे की मूँगफली और चुटकी भर नमक का संसार ही उसका संसार है। उसे मय का नशा नहीं चाहिए, वह तो प्रेम के नशे में सिर से पैर तक डूब जाना चाहता है, बेसुध होकर गिर पड़ना चाहता है, प्रिया के संग लेट जाना चाहता है। दरअसल वह अपनी प्रियतमा को ईंट-गारे के घर में नहीं, अपने भीतर, अपने सीने में, हृदय के तल में और उसकी धड़कनों के बीच, उसे बैठाएगा, उसका शृंगार करेगा, उसे प्यार करेगा। इसीलिए वह अपनी देह को मकान में बदलते समय दिल को डराइंगरूम बनाता है। जिसमें बैठकर उसकी प्रिया उससे बातें करें और कभी बाहर जाए ही नहीं।  
      सवाल उठता है कि कवि उस सुंदर और धनाढ्य महिला से, जो उसकी प्रेमिका या उसकी प्रेमिका की सखी या कोई नयी-नयी प्रेमिका हो सकती है अर्थात जिससे उसका प्र्रेम का रिश्ता है, उससे क़र्ज़ लेकर मकान क्यों नहीं बना लेता! यह सवाल बहुत आसान नहीं है। कई पेंच हैं। बस इतना समझ लीजिए कि कोई गृहिणी इतनी स्वतंत्र नहीं होती है कि गृहस्वामी को बताकर या छुपाकर कुछ कर सके। धनाढ्य वर्ग तो पैसे से पैसा कमाता है। गृहिणी थोड़ा बहुत गाहे-बगाहे कुछ मदद तो कर सकती है, लेकिन किसी अल्पआयवर्ग के कवि के लिए न ताजमहल बनाकर दे सकती है, न कोई साधारण मकान। ऐसे में कवि बेचारा ज़मीन पर मकान नहीं बना पाता है तो कल्पना की ज़मीन पर अपनी देह को ही मकान में बदलकर इस दायित्व से मुक्त हो जाता है। कवि और कर भी क्या सकता है, कोई धन्नासेठ तो है नहीं, जो रुपये और हीरे-जवाहरात जगह-जगह धरे हों, जेब में नोटों की गड्डियाँ लेकर चलता हो। वह जेब में मूँगफली लेकर सड़कों पर आवारा मारा-मारा फिरने वाला कवि है। असल में यह उन दिनों की भी कविता है, जब बैंकों से बहुत आसानी से गृहऋण सुलभ नहीं था। दस तरह की दिक़्क़तें होती थीं। यह एक साधारण मनुष्य के मकान न बना पाने की कविता अर्थात धन के अभाव की कविता है तो दूसरी ओर उस कवि की कविता है, जिसके पास कल्पना और प्रकृति के संसार का अकूत धन है। प्रेम के आकाश में उड़ती हुई चिड़ियों को निहारते चला जा रहा है। 

    इस कविता को आध्यात्म और योग के चक्रों से जोड़कर देख पाना मेरे लिए संभव नहीं है। केवल ‘इंद्रियों’ शब्द के आधार पर दूर की कौड़ी लाना असंभव है। गृहिणी भी माया नहीं लगती। कवि भी आध्यात्मिक मुक्ति नहीं ढूँढता है। मुक्ति तो किसी तरह की नहीं ढूँढता है। ऐसा करना एक अच्छी प्रेम कविता की हत्या करना होगा। भला आधुनिक काल का कोई कवि मूलाधार, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्ध चक्र, आज्ञा चक्र, सहस्रार चक्र के चक्कर में क्यों पड़ेगा! यह अनन्त जी की साधारण सी दिखने वाली कविता, एक फक्कड़ कवि की असाधारण आशय की कविता है। हर कवि, अपनी कविता का निष्कर्ष अपने स्वभाव के अनुसार रखता है। ज़रूरी नहीं कि हर कवि अभाव को क्रांति में बदल दे। 

     अनन्त मिश्र का स्वभाव, देवेन्द्र कुमार बंगाली के स्वभाव से एक हद तक ही मेल खाता है। दोनों साधु-स्वभाव के है। देवेन्द्र कुमार बंगाली की कविता में चिंगारियाँ फूटती हैं। देवेन्द्र कुमार का स्वभाव साधु था, लेकिन विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के अनुयायी नहीं बने। एक स्वतंत्र कवि-व्यक्तित्व था उनका। केदारनाथ सिंह से उनके मधुर संबंध थे, लेकिन अनुयायी उनके भी नहीं थे। अनन्त जी की मुश्किल यह थी कि वे विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के बिना साहित्य में एक डग भी नहीं भरते थे। शायद उनके स्वभाव में ही धीरे चलने का, पीछे चलने का तत्व शामिल हो गया था। गोरखनाथ की तरह ‘हबकि न बोलिबा, ठबकि न चालिबा, धीरैं धारिबा पांव।’ की स्थिति में पहुँच गए थे। फिर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जैसे तेज़ चलने वाले, गरब करने वाले घमंडी मानुष के साथ अनन्त जी का कवि कैसे नाभिनालबद्ध हो गया!  अनन्त मिश्र जीवन की भागती सड़कों पर जहाँ-जहाँ पुल कमज़ोर थे, अंधे मोड़ थे, अपनी कविता ‘कृपया धीरे चलिए’ में चेतावनी तख़्ती पर लिखे हुए इन तीन शब्दों की तरह तेज़ रफ़्तार में भागती दुनिया को समझाने के लिए खड़े थे और कोई समझ नहीं रहा था। विश्वनाथ जी के कान के पास उनका मुख का और विश्वनाथ जी सुनकर भी सुन नहीं रहे थे। विश्वनाथ जी को महाकाव्य नहीं लिखना था, साहित्य की सत्ता के सिंहासन पर बैठना था। उन्हें न तो देवेंद्र कुमार बनना था, न गोबर गणेश, उन्हें तो बादशाह सलामत बनना था। अनन्त जी साहित्य में विश्वनाथ जी के पीछे-पीछे कृपया धीरे चलिए का बोर्ड बनकर चलते रहे। विश्वनाथ जी साहित्य में दंद-फंद वाले आदमी थे, उन्हें सब जल्दी चाहिए था और इसके लिए हज़ार जतन करते थे। उन्हें विद्यानिवास मिश्र से बड़ा बनना था, विद्यानिवास मिश्र साहित्य अकादमी का चुनाव हार गए थे, तो इन्हें जीतना था, विद्यानिवास जी को पद्मश्री मिली, तो इन्हें भी लेना था, विद्यानिवास जी सांसद मनोनीत हुए, इन्हें भी होना है; लेकिन क्या विद्यानिवास जी के ललित निबंधों की तरह कुछ भी इनके पास कविता और आलोचना में अविस्मरणीय है?  यहाँ विश्वनाथ जी मुख्य विषय नहीं हैं। अनन्त मिश्र हैं, लेकिन अनन्त मिश्र के कवि की हत्या में जिस शख़्स का प्रमुख हाथ है या कह लें कि जो मास्टर माइंड है, निश्चय ही विश्वनाथ जी हैं। मुझे याद है, कैसे हिन्दी विभाग के स्टाफ़ रूम में अनन्त जी की चुटकुने पर लिखी कवितानुमा कुछ पंक्तियों पर विश्वनाथ जी की टीम के सदस्य भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगते थे, उनका परम प्रिय शिष्य जो विश्वनाथ जी का सबसे प्रिय हो गया था, अनन्त जी को महाकवि और उस चुटकुने पर लिखी कविता को महाकाव्य बताने लगता था। विभाग में नियुक्त होने के दो-तीन साल बाद ही मैं अनन्त जी से कहने लगा था कि आप विश्वनाथ जी का साथ छोड़िए। दस्तावेज़ की तरह अपनी पत्रिका निकालिए। अनन्त जी सुनते और फिर दूसरी बात करने लगते। एक आज का दिन है, अनुभव करते होंगे कि उनके गैंग से अलग रहकर मैंने कितना अच्छा किया। विश्वनाथ जी के साथ-साथ अनन्त जी ने देशभर में न जाने कितनी यात्राएँ की होंगी, ज़ाहिर है अपने पैसे से। बाद में अकादमी में विश्वनाथ जी के पदाधिकारी होने पर अलबत्ता उन्होंने अकादमी के आयोजनों के निमित्त कुछ यात्राएँ कराईं। क्या विश्वनाथ जी ने अनन्त जी की कविताओं में कभी कुछ कमी का अनुभव किया? उसे ठीक करने की कोशिश की? यदि कोई कमी नहीं थी तो दस्तावेज में उनकी कविताओं पर दो-चार लेख छपवाए? ख़ुद उन पर लंबा संपादकीय लिखा? उनकी षष्ठी पूर्ति पर दस्तावेज का कोई खास अंक निकाला? पचहत्तर का होने पर अनन्त जी पर कोई विशेषांक निकाला? साहित्य अकादमी में पन्द्रह साल राज करने के बावजूद अनन्त जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार दिलाने की कोशिश की?  अनन्त मिश्र, अनामिका, बद्री, गगन गिल वगैरा से बहुत कमज़ोर कवि थे? उनकी कविताएँ मौलिक नहीं थीं? स्तरीय नहीं थीं? अनामिका, गगन गिल वगैरा हमारे समय की कविता महारानियां थीं और अनन्त मिश्र उनके महल के दरबान? बद्री कविता का युवराज था और अनन्त मिश्र, बद्री के घोड़ों की देखभाल करने वाले सईस? ये सब असली कवि थे और अनन्त मिश्र नक़ली कवि थे? क्यों अनन्त मिश्र के कवि को विश्वनाथ जी ने धीमा ज़हर देते-देते एक दिन मार दिया। दृश्य से ओझल कर दिया? यह विश्वनाथ जी की खास अदा है, अपने से अधिक प्रतिभाशाली कवियों को मार देने की। अस्सी में पहुँचे अनन्त मिश्र के जन्मदिन के भव्य आयोजन में सबके सामने माइक पर विश्वनाथ जी ने अनन्त जी को अच्छा कवि नहीं कहा। पहले ड्राफ्ट का कवि कहा। अभिधा का कवि कहा गया। क्या अनन्त जी की कविताएँ कूड़ा हैं? ऐसा है, तो मैं अनन्त जी की कविताओं पर क्यों लिख रहा हूँ! दरअसल विश्वनाथ जी कभी चाहा ही नहीं कि दस्तावेज़ से गोरखपुर का कोई कवि उनसे बड़ा हो जाए। नामवर सिंह ने आलोचना से धूमिल को चमकाया, लेकिन विश्वनाथ जी ने अनन्त के कवि को सीमाओं में बाँध दिया। उन्हें चमकाया नहीं, धूमिल किया। अनन्त जी की मूल समस्या यह थी कि अकेला होना उनके लिए अधिक सर्जनात्मक होने का सबब नहीं था, बल्कि उनमें भय उत्पन्न करता था। साहित्य में जो लेखक अकेला होने का जोखिम नहीं उठा सकता है, वह अपने समय का बड़ा लेखक नहीं हो सकता है। जो चुनौती दे नहीं सकता और स्वीकार नहीं कर सकता, वह बड़ा काम नहीं कर सकता है। हमारे समय में कोई बड.ा लेखक है ही नहीं। ये सब साहित्य अकादमी पाने वाले चिरकुट लेखक हैं। पुरस्कार के बिना न दो कदम चल सकते हैं, न जी सकते हैं। इनपया सबके आगे या पीछे से पुरस्कार हटा दो तो सब कौड़ी के हैं। कम से कम अनन्त जी के साथ ऐसी बात नहीं। देवेंद्र कुंमार के साथ ऐसी बात नहीं थी। जिस कवि में कुछ मौलिक होता है, वह पुरस्कार के पीछे नहीं भागता है। विश्वनाथ जी में कुद मौलिक नहीं था, इसलिए पुरस्कार के पीछे एक सौ बीस किलोमीटर की रफतार से भागते थे। अनन्त जी के भीतर उनका अपना सब असली था। घी का लड्डू। बावजूद इसके अनन्त जी आज हमारे सामने चेतावनी तख्ती की तरह खड़े हैं- कृपया धीरे चलिए!
‘जहाँ-जहाँ पुल कमजोर थे
जहाँ-जहाँ जिंदगी की
भागती सड़कों पर
अंधा मोड़ था
त्वरित घुमाव था
घनी आबादी को चीर कर
सनसनाती आगे निकल जाने की कोशिश थी
बस्ता लिए छोटे बच्चों का मदरसा था
वहाँ-वहाँ लोकतांत्रिक बैरियर की तरह
मुझे लिखा गया
’कृपया धीरे चलिए’
आप अपनी इंपाला में
रुपहले बालोंवाली
कंचनलता के साथ सैर पर निकले हों
या ट्रक पर तरबूजों की तरह
एक-दुसरे से टकराते बँधुआ मजदूर हों
आसाम, पंजाब, बंगाल
भेजे जा रहे हों
मैं अक्सर दिखना चाहता हूँ आप को
’कृपया धीरे चलिए’
मेरा नाम ही यही है साहब
मैं रोकता नहीं आपको
मैं महज मामूली हस्तक्षेप करता हूँ,
प्रधानमंत्री की कुर्सी पर
अविलंब पहुँचना चाहते हैं तो भी
प्रेमिका आप की प्रतीक्षा कर रही है तो भी
आई.ए.एस. होना चाहते हों तो भी
रुपयों से गोदाम भरना चाहते हों तो भी
अपने नेता को सबसे पहले माला
पहनाना चाहते हों तो भी
जिंदगी में हवा से बातें करना चाहते हों तो भी
आत्महत्या की जल्दी है तो भी
लपककर सबकुछ ले लेना चाहते हों तो भी
हर जगह मैं लिखा रहता हूँ
’कृपया धीरे चलिए’
मैं हूँ तो मामूली इबारत
आम आदमी की तरह पर
मैं तीन शब्दों का महाकाव्य हूँ
मुझे आसानी से पढ़िए
कृपया धीरे चलिए।
      कविता की दुनिया में धीरे-धीरे चलने वाला यह कवि, सबसे कहता है कि अपनी हवस की रफतार कम करो। चीजों को पाने की नैसर्गिक गति का पालन करो। गर्यादा में रहो, सीमा में चलो, यह दुनिया तम्हारे लिए ही तो है, ठहरकर देखभाल कर चलो। अच्छा करना तो अच्छे से करो, बुरा करना है तो भी कोशिश करो कि अच्छे से करो। दूसरों के सिर पर पैर रखकर आगे मत बढ़ो। कवि सबको दुर्धटना से बचने की सीख देता है, दूसरों पर गाड़ी चढ़ा देने से बचने की सीख देता है। यहां तक कि प्रेमिका प्रतीक्षा कर रही है, तो उससे भी मिलने के बहुत तेज रफतार में मत भागो कि उसका प्यार छिन जाए। असल में यह कवि सबको बचाने वाली कविता लिखता है। कवि और कविता, दोनों को बचाने वाली कविता। यह कवि ऐसा कवि है, जो महाकाव्य तो नहीं लिखता है, लकिन हमारे समय की कविता में जो ख़ुद एक महाकाव्य की तरह खड़ा है, अपने मूल्यांकन की प्रतीक्षा में। हमारे समय की आलोचना में 99़ प्रतिशत से ज्यादा आलोचना प्राध्यापकीय है, अतिप्रशंसामूलक है, ठस है, झूठ बोलती है और आज का आलोचक मशहूर लेखकों के मल-मूत्र को भी महान रचना और महान आलोचना कहता है। प्रकाशक जानता है कि हिन्दी के पाठक और लेखक कितने बड़े मूर्ख हैं, कुछ भी खरीद लेगे। आलोचना के नाम पर आलोचक की पाद भी अगर किताब में बंद करके बेचेंगे, तो उसे भी ख़रीद लेगे। बिक ही रहा है। आज कौन आलोचना लिख रहा है? आलोचना जब लीद में बदल जाएगी, तो सोने की रचना भी उसमें छिप जाएगी। जैसे गद्य को जीवन संग्राम की भाषा कहा गया है, उसी तरह आलोचना भी रचना के संघर्ष को सामने लाने वाली मर्दाना भाषा है। लेखक के आत्मसंघर्ष को कोई आलोचक छू नहीं सकता है, तों स्त्रैण आलोचक है। आलोचना के इस अंधकार में कई स्वाभिमानी लेखकों की पगड़ी अलक्षित है। अंधेरे में है। बुरे से बुरे समय में भी कुछ अचछे लोग आते है। यह सृष्टि का नैसर्गिक नियम है। साहित्य का भी नियम यही है। लोग आएंगे, अनन्त मिश्र का मूल्यांकन करेंगे। मैं यहां उनके पूरे काव्य-संसार की विवेचना नहीं कर रहा हूं। मैं तो अनन्त मिश्र के कवि के हत्याकांड की विवेचना करने वाला किसी थाने के पुलिस अधिकारी की तरह विवेचना करने के उपरांत चार्जशीट पेश कर रहा हूं। दरअसल यह हिन्दी कविता का इकलौता हत्याकांड नहीं है। कई कवियों के कवि और उनकी कविताओं की हत्या इसी तरह की गयी है। हत्या की विधि और प्रकार में अंतर हो सकता है। दुर्भाग्य यह कि जैसे गोरखपुर के आलोचकों को अनन्त मिश्र की चिंता नहीं थी कि कैसे उनके कवि की हत्या करके किसी खाई में फेंक दिया गया है, उसी तरह देशभर में ऐसे ही हुआ है। हमारे समय के हिन्दी के आलोचकों को दंडित किया जाना चाहिए। गोखपुर में सौभाग्यवश मेरा कवि बच गया, योजना तो उसके लिए भी बनायी गयी थी, कि उस कवि को गुप्त कवि बनाकर मार दो, कोई जानने ही न पाए कि गणेश पाण्डेय भी कविता लिखता है। मेरी पीठ में मेरे धनिष्ठ मित्र ने ही खंजर घोंपा कि शहर का हिन्दी का डान ख़ुश होगा, उसे बख्शीश देगा। दिया भी। ख़ैर। बात अनन्त मिश्र की कविता की, उनके कवि कि सिर की पगड़ी की, जिसे तार-तार किया गया। अनन्त जी की कविता पगड.ी की घुंघली सी याद है। कवि कहता है कि मेरी पगड.ी मत उछालो, मैं अपनी पगड़ी तुम्हारे कदमों में रख दूंगा। यह पगड़ी दरअसल हर मनुष्य के स्वाभिमान की पगड़ी है, उसका मस्तक है, पगड़ी माथा है, उसका वुजूद है, उसकी लाज है। एक मनुष्य और एक मनुष्येतर प्राणी में मूल्य का अंतर है, विचार का अंतर है, मर्यादा का अंतर है, एक के पास है और दूसरे के पास नहीं है। जब कोई मनुष्य, दूसरे मनुष्य को नंगा करता है, तो वह बहुत आहत होता है। किसी का सम्मान कोई छीनता है, तो कभी कोई दुखी होता है तो कोई पलटकर जवाब देता है। साहित्य में दुर्भाग्यवश प्रतिरोध का बुलडोजर नहीं है, उसे राजनीति में किराए पर लगा दिया गया है। हिन्दी के बेईमानो, निर्लज्जों और गुंडों के समय में न जाने कब तक सीधे-सादे कवियों की पगड़ी मठाधीशों के पैरों में पड़ी रहेगी। गोरखपुर में कुछ दूसरे कवि भी हैं, जिनकी पगड़ी विश्वनाथ जी के पैरों में पड़ी हुई है। फिलहाल अनन्त जी की कविताएं पढ़ी जाएं और इस नजरिए से पढी जाएं कि ये मौलिक कविताएं हैं। विश्वनाथ जी की कविताएं बनावटी हैं, विश्वनाथ जी खुद बनुआ कवि है। दिल्ली तो बनुआ लेखकों की खान है। जो जितना दिल्ली जाता है, उतना ही नकली कवि है, नकली लेखक है। आज हिन्दी कविता आलोचना में मौलिकता को हेय दृष्टि से देखा जाता है। ज़ाहिर है, मौलिकता को हेय दृष्टि से देखने वाले हिन्दी के लेखक नहीं हैं, कीट-पतंग हैं। 











शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

साहित्य का पर्यावरण

- गणेश पाण्डेय 

’सफेद सागर‘ में अजय आहूजा को देखकर मुझे हिन्दी के किसी योगेन्द्र आहूजा की याद नहीं आई हिन्दी में अजय जैसा कोई और आहूजा हो ही नहीं सकता। साफ़ करता चलूं कि योगेन्द्र आहूजा का इस लेख से कोई सबंध नहीं है-न वे मुझे जानते हैं, न मैं उन्हें-सिवाय आहूजा उपनाम-साम्य के। याद किसकी आयी, सबसे पहले हिन्दी के पाकिस्तानी बंदूकबाजों की, उनके गैंग की, उनकी दहशत की, उनकी हरामजदगी की, उनके धोखे और षड्यंत्रों की। हिन्दी की दुनिया को अपवित्र करने वाले उनके कारनामों की याद आयी। याद तो माता सरस्वती और उनके वरदपुत्र निराला की भी आयी, थोड़ी-थोड़ी अपने कारनामों की भी याद आयी। हिन्दी के पाकिस्तानी इरादे वाले जनरलों की याद आयी, जिनपर अजय आहूजा की तरह पिछले चालीस साल से बम गिराए हैं और अब तक हिन्दी की फौज से रिटायर नही हुआ हूँ। अलबत्ता चाहता हूँ कि अजय आहूजा की तरह मैं भी रिटायर होने की जगह हिन्दी के देश के लिए शहीद हो जाऊँ। कोई हिन्दी का पाकिस्तानी मेरे हाथ बांधकर पीछे से मेरे भेजे में गोली उतार दे। इस वक्त एक कामेडी फिल्म वेलकम की याद आ रही है, केवल मनोरंजक फिल्म है, साहित्य से उसका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है, जैसे बुजुर्ग जासूसी लेखक सुरेंन्द्र मोहन पाठक के किसी जासूसी उपन्यास का साहित्य से कोई लेना-देना नहीं है। तो भाइयो, कहनो और बच्चो, वेलकम के उदय की याद इसलिए आयी कि उसके उदय कंट्रोल- कंट्रोल वाले डायलाग की याद आयी। इस समय हिन्दी की दुनिया में दो उदय काम कर रहे हैं। एक मेरे थोड़ा दूर के रिश्तेदार के रिश्तेदार की तरह दूर के साहित्यिक मित्र उदय प्रकाश, दूसरे मेरे  उपन्यास जंकामंका गैंग के नायक उदय शंकर शुक्ल उर्फ उदय सर। इस नाम-साम्य की भी कहानी है, इस पर बाद में। फ़िलहाल इस समय उदय सर का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर है। असल में हिन्दी के पाकिस्तानी दहशतगर्दों को देख-देखकर ‘जंकामंका गैंग’ के उदय सर को इतना गुस्सा आ रहा है कि, वेलकम के मजनूँ और हिन्दी आलोचना के छोटे सुकुल की तरह कहना चाहता हूँ कि कंट्रोल-कंट्रोल उदय कंट्रोल। लिखने में ग़ुस्सा जितना कंट्रोल में हो उतना ही अच्छा। देखिए अब तक तो लेख की ढंग से शुरुआत भी नहीं हुई है और आप लोग पता नहीं क्या सोच रहे होंगे। शायद यही कि किसी गाँजा पीकर जहाज उड़ाने वाले की तरह गाँजा पीकर ‘कविता की जान लेने के सौ तरीक़े’ नाम की आलोचना की किताब का यह हिस्सा लिख रहा हूँ। इससे पहले कि बात और बिगड़ जाए, इसे बनाते हैं।          
         तो मित्रो हिन्दी कविता के संसार में या-कविता में पहले की तरह साहित्य की सभी विधाओं को शामिल करते हुए- कहें कि साहित्य के संसार में इस समय दो दुनिया दिखती है। एक सतह के ऊपर है, दूसरी नीचे। नीचे की दुनिया हिन्दी के साधंकों की दुनिया है, साधुओं की दुनिया है, तपस्वियों की दुनियां है, मुनिवरों की दुनिया है। यहां देवेन्द्र कुमार की याद आ रही है, जिन्हें केदारनाथ सिंह मुनिवर ही कहते थे। सचमुच देवेन्द्र कुमार साधु कवि थे। सतह पर कोई उछलकुद नहीं, कोई भागदौड़ नहीं, कोई पुरस्कार नहीं, कुछ भी ऐसा नहीं, जो अशोभनीय हो। देवेन्द्र कुमार की कविता में बारूद भले हो, लेकिन उनका जीवन ऐसा जैसे -उनके ही एक टुकड़े की तरह- पर्वत के सीने से झरता हो झरना। देवेन्द्र कुमार ने साहित्य के किसी मुक्तिसंग्राम में इसलिए भाग नहीं लिया, कि उस समय के साहित्य का पर्यावरण, इतना प्रदूषित नहीं हुआ था, इतना विषाक्त नहीं हुआ था, मुक्तिबोध और उससे पहले निराला ने साहित्य के पर्यावरण-प्रदूषण पर इतना ज़ोरदार हमला नहीं किया था, क्योंकि उनके समय में इंटरनेट नाम की जादुई दुनिया नहीं पैदा हुई थी। कोई रोज़-रोज़ का मुक्तिसंग्राम शुरू नहीं हुआ था। यह तो कुछ-कुछ मेरे हिन्दी विभाग में आने और हिन्दी के राक्षसों से डायरेक्ट दो-दो हाथ करनें के बाद नये सिरे से शुरू हुआ था बाद में विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के साहित्य अकादमी में जाने और अशोक वाजपेयी के फाउंडेशन बना लेने के बाद विस्फोटक रूप में आया। हालाँकि नामवर सिंह और राजेंद्र यादव जैसे लोगों ने पहले से ही लेखकों को अपने-अपने तरीक़े से बड़े पैमाने पर क्रीतदास बनाना शुरू कर दिया था। आज तो पुछिए मत, अशोक वाजपेयी जाते-जाते अपनी सारी कलाओं, शक्तियों और फंड-संड और पीछे चलने वाली बंदूकबाजों की फौज के साथ हिन्दी के हर कोने-अंतरे में हिन्दी का सबसे तेज़ जहर फैलाकर जाना चाह रहे हैं। ये अपने पीछे चलने वाले लेखकों के दिमाग को इमामदस्ते में कूटकर खूब जहरीला बना देते हैं। असल में सतह के ऊपर की साहित्य की दुनिया में कितना भी मथो, अमृत नहीं निकल सकता है, जब भी निकलेगा, सिर्फ विष निकलेगा। अमृत के लिए सतह के नीचे शोर-शराबे, इनाम-इकराम, नाच-गाने से दूर रहकर साहित्य की साधना करना होता है। इसका मतलब यह नहीं कि सतह के नीचे जीने वाले लेखक उस अमृत के लिए सतह के नीचे जाते हैं, जिसे पीकर अमर लेखक बन जाएँ, कालजयी हो जाएँ, न-न अमर होने की इच्छा तो उनमें होती ही नहीं है, अमर होने की इच्ठा होती तो साहित्य अकादमी के अध्यक्ष की धोती साफ़ कर रहे होते, जाँघिया धुल रहे होते, पतलून साफ़ कर रहे होते। फ़ाउंडेशन बाबा के पाजामे का नाड़ा खोल रहे होते। अकादमी और भाभूअ के लिए नाक रगड़ रहे होते। ज्ञानपीठ के लिए पेट के बल लेट रहे होते। असल में्रं सतह के नीचे का जीवन, उन्होंने साहित्य की एकांत साधना के लिए चुना। इसलिए कि वे कविता या साहित्य के स्वच्छ पर्यावरण में सांस लेकर अपना योगदान कर सकें, इसलिए सतह के नीचे धूनी रमा कर बैठ जाते है। अमृत, यहां साहित्य के बड़े मूल्य, लेखक के स्वाभिमान के अर्थ में है और विष लेखक के अहंकार के।       
      अमृत वर्ग में, स्वाभिमान के साथ साहस, ईमान, नैतिकता, वीरता, करुणा जैसे और भी साहित्यिक मूल्य आते हैं। साहित्यिक मूल्य भी आसमान से नहीं आते हैं, हमारे जीवन मूल्यों से छनकर लेखक के जीवन के मूल्य बन जाते हैं। विष वर्ग में केवल अहंकार ही नहीं, लेखक की दासता, धूर्तता, बेईमानी, चापलूसी, छल, षड्यंत्र, पुरस्कार, गैंग, संगठन आदि भी आते हैं, जो साहित्य के परिसर को उतना ही विषाक्त बनाते हैं। कैसे किसी लेखक को साथ रखकर कर उसकी साहित्यिक हत्या कर दी जाती है, इस पर पूरा अध्याय आगे की किसी किस्त में। यहां केवल अहंकार के विस्फोट तथा उससे जुड़ी अन्य दुष्प्रवृŸायों की कथा। कुछ कथाएँ, ऐसी होती हैं, जिन्हें कहना ख़तरे से ख़ाली नहीं होता है। फिर भी जोखिम उठाने वाले लेखक हर दौर में होते हैं। यह अलग बात है कि आज की आलोचना में गोरखपुर को छोड़िए दूर-दूर तक कहीं नहीं दिखते हैं। साहित्य में ख़तरे उठाने का मतलब है, यश और पुरस्कार के अवसर गँवाना ही नहीं है, सेहत से भी हाथ धो देना है। मुझे ही देख लो। दस तरह की बीमारियां मोल ली है। 
      जीवन में कई बार ऐसी स्थिति आती हैं जब गुंडो से लड़ाई करने की जगह बच-बचाकर निकल जाते हैं या गुंडे ने हद पार कर दी, तो पुलिस के पास जाते हैं; लेकिन साहित्य में पुलिस नहीं होती है, इसलिए किसी को बोलने का जोखिम खुद उठाना पड़ता है। नुक़सान उठाना पड़ता है। साहित्य के इन गुंडों की निर्मिति में भी साहित्य में आपराधिक प्रंवुŸा के लेखकों और अलेखकों के साथ भीरु लेखकों का उसी तरह हाथ होता है, जैसे समाज में। इकहŸार-बहŸार साल के किसी बूढ़े के पास साहित्य में बच-बचाकर किसलिए जीना है? जीवन के आखिरी ओवर मे ंतो और भी डर नहीं होना चाहिए। विडम्बना यह कि साहित्य में जिन बच्चों के लिए हम जोखिम उठाते हैं, जान देते उन्हें इससे कोई मतलब नहीं कि कोई उनके भविष्य के लिए लड़ रहा है, वे तो साहित्य की टाफी खाने में मगन हैं। एक ईमानदार लेखक केवल राजनीति के बुरे लोगों पर ही नहीं लिखता, साहित्य के बुरे लोगों की भी धज्जियाँ उड़ाता है।

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    जाहिर है साहित्य में स्वाभिमान आक्सीजन है और अहंकार कार्बनडाइआक्साइड। अब यह प्रश्न स्वाभाविक है कि साहित्य में स्वाभिमान की पहचान कैसे करेंगे? किसी समारोह में अशोक वाजपेयी मुख्य अतिथि के रूप में बुलाए गए हों और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला से उस समारोह की अध्यक्षता करने के लिए कहा जा रहे हो या युवा लेखक अविनाश मिश्र किसी कार्यक्रम में मुख्य अतिथि हो और नामवर सिंह से अध्यक्षता के लिए कहा जा रहा हो, तो यह साहित्य की संस्कृति के विरुद्ध होगा। शिष्टाचार के विरुदध होगा। इस दृश्य को देखकर स्वाभिमानी लेखक को वहाँ से उठकर चले जाना चाहिए या पहले से पता हो तो जाना ही नहीं चाहिए। गोरखपुर शहर का एक उदाहरण देता चलूँ। गोरखपुर लिटफेस्ट में हर साल उसके उदघाटन सत्र में विश्वनाथ प्रसाद तिवारी अध्यक्षता करते रहे हैं। कह सकते हैं कि गोरखपुर लिटफेस्ट के डीह बाबा रहे हैं। वे अपने साथ अपने एक प्रिय शिष्य को हर बार विशिष्ट अतिथि ज़रूर बनाते थे और उस शिष्य के तमाम गुरु नीचे-सामने सभागार में बैठकर उसका भाषण सुनते थे। कहानियाँ और भी हैं। कहना यह है कि यह सब साहित्य का वीभत्स है। साहित्य की संस्कृति को, परंपरा को, शिष्टाचार को, तार-तार करने वाला दृश्य होता था। मैंने विरोध किया, उसके बाद लिटफेस्ट का यह अशोभन बंद हुआ। इस प्रसंग को देने का मतलब सिर्फ यह बताना है कि लेखक का स्वाभिमान सिर्फ उसके मान-सम्मान तक सीमित नहीं है, लेखक का स्वाभिमान अपनी सीमा का विस्तार करता है, उसमें सभी लेखकों का मान-सम्मान, लेखक और साहित्य की गरिमा की रक्षा का उपक्रम शामिल होता है। वह किसी भी लेखक के अपमान से आहत होता है। विरोध करता है। ठीक वैसे ही जैसे कोई ईमानदार लेखक सिर्फ अपने साथ नहीं, किसी भी लेखक के साथ होने वाले अन्याय का विरोध करता है। मठाधीशों की पालकी नहीं ढोता है। चँवर नहीं डुलाता है। चापलूसी नहीं करता है। हिन्दी की दुनिया में लेखक कितना गिर गया है, यह इस उदाहरण से जान सकते हैं कि अपनी किताबों के छपने-छपाने की बात छोड़िए, रिव्यू तक के लिए नाक रगड़ता है, संपादक की ख़ुशामद करता है। रिव्यू करना-कराना, पहले प्रकाशक और उसके संपादक का काम होता था, अब लेखक ख़ुद ही ले दही-ले दही करता फिरता है। रिव्यू के लिए मरे जाते लेखकों से भला अच्छे साहित्यिक जीवन की कल्पना कैसे की जा सकती है? चमत्कार यह कि उसके पास रीढ़ की हड्डी होती नहीं है और स्वाभिमानी लेखकों के विरुद्ध साजिश करता फिरता है। स्वाभिमानी लेखक इन सब क्षुद्रताओं में नहीं फँसता, वह तो साहित्य में निर्मल, निर्भय जीवन जीता है, साहित्यिक जीवन हो या लिखने की मेज, हर जगह निर्भय होता है। जो लेखक निर्भय होते हैं, जिन लेखकों में स्वाभिमान होता है, वे लेखक के रूप में अपनी गरिमा, अपने मान-सम्मान के साथ साहित्य के उच्च मानमूल्यों की रक्षा के लिए तत्पर होते हैं।
     एक स्वाभिमानी और स्वाधीन लेखक की बडी मुश्किल यह है कि वह साहित्य की दुनिया मे ंहमेशा सच के साथ होता है और उसके सामने उसके विरोध में साहित्यिक मूल्यों से च्युत मठों, लेखक संगठनो और साहित्य के दूसरे ंशक्तिकेंद्रों के बँधुआ लेखक होते हैं। जरा-सा उनके पक्ष को, उनके मठ को, संगठन को, उनके भ्रष्ट आदर्शोंं को, उनके अवसरप्रदाताओं, पुरस्कारदाताओं और प्रशंसकों की तीव्र आलोचना कर दो , तो बिलबिलाकर बिल से बाहर निकल आते हैं। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि आज साहित्य के ंशक्तिकेंद्रों, लेखक संगठनों और अशोक वाजपेयी से जुड़े हुए लेखकों-जिनमें हमारी बहन और बेटियों जैसी लेखिकाएँ भी शमिल है और मैं जिनपर बहुत ख़फ़ा हूँ- के जीवन में न कोई साहित्यिक मूल्य है, न अपनी मिट्टी की लाज, न अपने माँ-बाप की शर्म। छोटी-छोटी चीज़ों के लिए सदाचरण की राह छोड़ देना दुखद है। पुरस्कार प्यारा है, मंच प्यारा है, जलसे में नाचना प्यारा है, जिसके लिए यह सब प्यारा है, लेखक का स्वाभिमान नहीं प्यारा है, स्वाधीनता नहीं प्यारी है, मिह्नी की लाज नहीं प्यारी है, मैं उन लेखकों और लेखिकाओं को प्रेम नहीं करता। वे माता सरस्वती के बच्चे नहीं हैं। कबीर के बच्चे नहीं हैं, निराला के बच्चे नहीं है, मुक्तिबोध के बच्चे नहीं हैं, हिन्दी के  बच्चे नहीं है। कितने शर्म की बात है कि इनमें से तमाम लेखक नोबेल पाने वालों, बुकर पाने वालों के बच्चे है। साहित्य में इनकी माँ माता सरस्वती नहीं है, कोई अरुंधति राय नाम की बुकार पाने वाली लेखिका इनकी नई सरस्वती माता है। एक बार विष्णु नागर ने अरुंधति के बारें में दिलचस्प बात कही। छम्मकछल्लो मुहावरे का बेहतरीन इस्तेमताल किया। उन्होंने कहा- गणेश जी कमियाँ ही ढूंढने लगेंगे तो फिर यह सिलसिला अंतहीन है। बुकर के बाद अंग्रेजी लेखक का जो जलवा होता है,उसका भारतीय ज्ञानपीठ पानेवाले लेखक को भी अंदाजा नहीं हो सकता। आज अरुंधती चाहतीं तो भारत के हाईसर्किल में छम्मकछल्लो बनकर घूम सकती थीं। उन्हें बस्तर के सघन इलाकों में घूमकर लिखने, नर्मदा आंदोलन को नजदीक से देखकर बड़े बाँधों के खिलाफ लिखने की जरूरत नहीं होती। और ये बातें कहने की जरूरत नहीं होती। वह भी अमेरिका-ब्रिटेन में आराम की जिंदगी गुजारकर हमें उपकृत करने यदाकदा आ सकती थीं। असल में विष्णु नागर की वैचारिक प्रतिबद्धता उन्हें ऐसा सोचने और मानने के लिए विवश करती है। हिन्दी में ऐसे बहुत से लेखक हैं जो अरुंधति के सर्जानात्मक लेखन की जगह किसी राजनीतिक या सामाजिक एक्टिविस्ट
के रुप में उनके कार्यों के आधार पर उन्हें बड़ा लेखक क्यों नहीं मान लेते हैं। एक तो गोरखपुर की हैं, जो इन दिनों लखनउ में रहती है, दूसरी भी गोरखपुर की है और देहरादून में रहती है। अरुंधति को अतिरिक्त महत्व क्यों? क्या भारत के स्वाधीनता संधर्ष से बड़ा काम कर रही हैं? आजादी की लड़ाई में सभी लेखकों ने भाग लिया था, क्या वे सभी लेखक बड़े लेखक के रुप में प्रतिष्ठा प्राप्त कर सके? सवाल यह है कि आप अरुंधति के किस लेखन को क्या मूल्य देंगे? हमारे गोरखपुर की एक लेखिका अरुंधति के पहले से राजनीतिक कार्यकर्ता का काम करती रही हैं। जुलूस-धरना, संधर्ष में आगे रही हैं, लेकिन क्या उनके लेखन से इतर उनके राजनीतिक एक्टिविज्म के आधार पर उन्हें बड़ी कवयित्री मान लिया गया? हिन्दी में भला राजनीतिक एक्टिविज्म कों आलोचना की कसौटी कभी माना गया है? कभी नहीं। साहित्य में हमारा ध्यान साहित्यिक एक्टिविज्म की तरफ जाना चाहिए। देखना चाहिए कि लेखक ने साहित्य के अँधेरे के विरुद्ध कहाँ आवाज उठाने का काम किया है? साहित्य के शक्तिकेंद्रों की आलोचना की है? अरुंधति ने ऐसा कुछ किया है? दरअसल यह सब कुछ और नहीं, पुरस्कार का आतंक है। बुकर का आतंक है। कहना चाहिए कि प्रकाशक द्वारा प्रायोजित आतंक है। 
     राजकमल प्रकाशन ने अनुवाद की गई किताबों की बिक्री बढ़ाने के लिए न सिर्फ बुकर का हौवा खड़ा किया, हिन्दी के पाठकों को आतंकित करके अपने स्टाल पर भीड़ जुटाई। चलिए यहाँ तक भी धंधा था, लेकिन राजकमल और उनके पुस्तक-संपादको और आलोचना  पत्रिका के संपादकों को अरुंधति राय को हिन्दी में माता सरस्वती की जगह प्रतिष्ठित करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए थी। यह साहित्यक अपराध है। राजकमल के पुस्तक-संपादकों और आलोचना पत्रिका के संपादकों की, क्या साहित्यिक हैसियत है? आलोचना के संपादक नामवर सिंह होते, तो बुकर पाने की वजह से अरुंधति का इंटरव्यू करने के लिए उनके पास जाते? राजेंद्र यादव जाते? नोबेल पाने के बाद भी नामवर सिंह और राजेंद्र यादव, अरुंधति का इंटरव्यू करने के लिए नहीं जाते। आलोचना पत्रिका के ये स्वाभिमानच्युत आज के संपादक हिंदी समाज को साहित्य पढ़ाएँगे, हिन्दी के लेखकों को साहित्य लिखना सिखाएँगे? अगर किसी प्रकाशक या उसके पुस्तक संपादक को अहंकार है कि वह हिन्दी साहित्य की धारा को मोड़ सकता है, कालजयी लेखक पैदा कर सकता है, जिस कूड़े को छाप देगा, महान हो जाएगा, तो भाई प्रकाशक महोदय आप ख़ुद कोई किताब लिखकर या किसी से अपने नाम लिखवाकर, अपने नाम से छापकर महान लेखक क्यों नहीं बन जाते हैं? अपनी प्रतिनिधि कविताएँ छाप लीजिए, अमर हो जाइए। सच तो यह है कि प्रकाशक को पता है कि हर लेखक यशःप्रार्थी है। यश के कीड़े ने उसे काटा है। वह पीछे-पीछे चलेगा। बुकर पाने के बाद भी पीछे चलेगा। प्रकाशक सिर उठाकर चलेगा, पुरस्कृत लेखक सिर झुकाकर चलेगा। लेखक का अहंकार, प्रकाशक के सामने, मठाधीशों के सामने, किसी दरबार में बर्फ़ की तरह पिघल जाता है। वह तो उन लोगों के सामने अहंकार का प्रदर्शन करता है, जो उसके रास्ते के पथिक नहीं हैं, उसके रास्ते के विरोधी हैं या उसके रास्ते पर उससे बहुत पीछे हैं। ज़ाहिर है, लेखक का स्वाभिमान नहीं टूटता है, अहंकार हज़ार बार टूटता है। जैसे मैं ही किसी भी लेखक के अहंकार को तोड़ देता हूँ। यह मेरी नहीं, मेरे साहित्यिक मूल्यों की शक्ति है। मैं तो ख़ुद बहुत छोटी चीज़ हूँ। साहित्य का एक मामूली कार्यकर्ता। साहित्य में साहित्य के एक्टिविस्ट की जगह होनी चाहिए।
     लेखक, हर प्रकाशक के लिए उसका बिकने वाला सामान है, कोई जीता-जागता स्वाभिमानी मनुष्य नहीं। वह जब चाहेगा, जैसे चाहेगा, लेखक को उसके इशारे पर उठना-बैठना होगा। जैसे पशु-बाजार में बैल खड़े कर दिए जाते हैं, लेखक और लेखिकाओं को खड़ा कर दिया जाता है। प्रकाशक हालाँकि लेखकोंं का लेखक कहता तो जरूर है, लेकिन सच्चाई यह होती है कि लेखक, प्रकाशक का विक्रय प्रतिनिधि होता है। प्रकाशकों के पास विक्रय प्रतिनिधि ही नहीं कुछ दलाल भी होते हैं। ये दलाल लेखकनुमा तो होते हैं, इनका मुख्य काम अनुवाद करने का होता है। इनका अनुवाद, महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियों का या कालजयी कृतियों का अनुवाद नहीं होता है, अपने समय के बेस्टसेलर लेखकों और उनकी लोकप्रिय लेखन का अनुवाद होता है। कह सकते हैं कि ये शिवदान सिंह चौहान से लेकर शिवकिशोर तिवारी तक, साहित्यिक कुतियों का अनुवाद करने वाले नहीं होते है। इनका अनुवाद का काम अमृत राय के अनुंवाद की तरह सर्जनात्मक लेखन के बराबार नहीं होता है, ये सिर्फ प्रकाशकों के दलाल होते हैं, चुत्थड़ अनुवादक। ठस अनुंवाद करते हैं। इनके पास खुद साहित्य की उन्नत सर्जनात्मक भाषा नहीं होती है। शिवदान सिंह चौहान ने जैसे दोस्तोयेव्सकी, मैक्सिम गोर्की, पुश्किन, लेव तोलस्ताय, इवान तुर्गनेव, चेखव, कवकटा ह्यूगो, मोपासां, चार्ल्स डिकेंस, अल्वेयर कामू आदि महत्वपूर्ण लेखकों की कालजयी कृतियों का अनुवाद किया है या अमृतराय ने कम अनुवाद किया है, लेकिन बहुत महत्वपूर्ण किया है, स्पार्टाकस का अनुवाद आदिविद्रोही पाठक के जेहन पर छा जाता है, लगता है कोई मूल कृति पढ़ रहे हैं। अच्छे अनुवादकों की एक शृंखला है। आज के अनुवादक मशीनी अनुवादक हैं, बल्कि कहिए कि प्रकाशकों द्वारा पोषित अनुवादक है। मैं यह नहीं कहता कि प्रकाशक का धंधा बंद हो जाए, उसकी दुकान बंद हो जाएगी तो दूसरी साहित्यिक महत्व की मूल कृतियाँ कैसे छपेंगी, लेकिन इतना ज़रूर हो कि आज का पेशेवर अनुवादक तो समझे ही, प्रकाशक भी जरूर समझे कि उसके लिए मूल लेखक से अधिक महत्व, इन दोयम दर्जे के अनुवादकों का न हो, वह उनके कान में हमारे समय के महत्वपूर्ण मूल लेखकों के बारे में उल्टी-सीधी बात करने की जुर्रत न करे। अनुवाद में करियर बनाना है, तो बाजारू किताबों के अनुवाद से सम्मान नहीं मिलेगा, तब तो फिर वह अनुवाद का सुरेंद्र मोहन पाठक बनकर रह जाएगा। हमारे बीच कुछ बहुत संकोची लेखक और अनुवादक है। संकोची से आशय लिटफेस्ट के और दूसरे मंचों पर बहुत उछलकूद न करने वाले, जैसे शिवकिशोर तिवारी। शिवकिशोर तिवारी ने जेम्स ज्वायस की कई कहानियों का अनुवाद किया है, लेकिन वे प्रकाशकों के दरबार में जाकर अपने से पच्चीस-तीस साल छोटे पुस्तक-संपादकों के सामने हाथ जोड़कर खड़े तो नहीं हो सकते है। कर्ण सिंह चौहान ने लूकाच, हावर्ड फास्ट की आलोचनात्मक कृतियों का ही नहीं, पाबलो नेरुदा की जीवनी का भी अनुवाद किया है। इसलिए हे बाज़ारू अनुवादक महोदयों, अपने से वरिष्ठ लेखकों को, प्रकाशक की निकटता दिल्ली के नित्य परिक्रमाकार होने के आधार पर अपमानित मत किया कीजिए। जो जोग साहित्य की मुख्यधारा की मछलियाँ या रंगीन मछलियाँ नहीं हैं, हमेशा छपाक-छपाक करने वाले तैराक भी नहीं है, दिल्ली में रहकर भी बहुत उछलकूद नहीं करते हैं या जो साहित्य की मैली मुख्यधारा के तीव्र आलोचक हैं, उनकी ईमानदारी, उनकी निडरता, उनके स्वाभिमान, उनके आत्मसंधर्ष का चाहे तनिक भी सम्मान मत कीजिए, लेकिन उनके मुँह पर थूकिए मत। उनके स्वाभिमान को चुनौती मत दीजिए। उनके हाथ में साहित्य के अमृत का प्याला है और आपके हाथ में क्या है? साहित्य की परंपरा के दर्पण में ख़ुद को देखिए महाराज, कहीं आप विषधर की तरह तो नहीं दिख रहे हैं?

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एक ओर साहित्य में विषधरों का प्रभाव बढ़ता जा रहा था, साहित्य के मान-मूल्यों का टाइटैनिक उनकी कप्तानी में ही डुबना शुरू कर चुका था, दूसरी ओर पहले कप्तान नामवर सिंह साक्षात्कारों में कहते जा रहे थे- साहित्य में कोई गिरावट नहीं है। जैसे हम कमोड़ पर बैठकर ख़ुद की बदबू का अनुभव नहीं कर पाते हैं, उसी तरह साहित्य के सिंहासन के कमोड़ पर बैठकर हिन्दी के लेखक अपनी बदबू पर ध्यान नहीं देते हैं। चाहे सब किया धरा उनका ही है। साहित्य में गिरावट की आँधी मेरे मानने से उसी दौर में आयी, जब भजनलाल के मशहूर ’सरकार बदल’ से राजनीति में गिरावट की आँधी आयी। उसी तरह साहित्य में नामवर जी के युवा पुरस्कारों और लोकार्पणों के अभियान से भारी गिरावट आयी। हालाँकि जब किन्हीं मुकेश कुमार ने एक इंटरव्यू में नामवर जी से साहित्य में गिरावट के बारे में सवाल किया, तो उनका कहना था-’राजनीति में गिरावट बहुत आयी है, उसकी तुलना में साहित्य में कोई गिरावट नहीं आयी है। अपने समय के साहित्यिक परिदृश्य से इतना आशान्वित थे कि यह भी कहा कि संभव है आगे की पीढ़ियाँ हमारे समय को वैसे ही मान दें, जैसे हम साहित्य के अतीत को देखकर करते हैं।  
      ओह नामवर जी को अपने ठीक बाद की पीढ़ी और उसके ठीक बाद की पीढ़ी का पालकी ढोना, नागिन डांस करना, धोती फींचना, यह सब दिखा नहीं या इस साहित्य की दूसरी और लज्जाजनक परंपरा से उन्हें सुख मिला! नामवर जी ने छायावाद पर अच्छा लिखा, लेकिन क्या आलोचना पत्रिका में जो कतरनबाज़ी और कबूतरबाज़ी वाले लेख उन्होंने छापे, उसी तरह मौलिक था, भाषा उसी तरह पारदर्शी थी? अपने पीछे चलने वालों को कैसा आलोचक बनाया? आलोचक बनाया या विमर्शकार बनाया? कविता में जो किया, वह भी सामने है। मैं इसमें नामवर जी की उतनी ग़लती नहीं देखता हूँ, वे अपने वक़्त के बादशाह थे, चँवर डुलाने वालों को भला, कबीर की तरह जलते हुए चैले से दाग़ कैसे देते? चापलूसी और तालियों की गड़गड़ाहट किसका दिमाग़ ख़राब नहीं कर देती है। यह सब इतना सुख पुरखों को कहाँ मिला था? रामचंद्र शुक्ल, हज़ारी प्रसाद द्विवेदी आदि को ऐसा सुख कहाँ मिला था? काश आलोचना के हमारे बुजुर्ग भी भले नामवर सिंह की तरह आलोचक कम रहे होते, लोकार्पणकार रहे होते, उन्होंने भी देशभर में आशीर्वाद बाँटने का धंधा किया होता, तो निश्चय ही उन्हें भी नामवर की तरह, आलोचना का स्वर्ग-सरीखा अद्वितीय सुख प्राप्त हुआ होता। बहरहाल, अब नामवर जी नहीं हैं, जब थे, तो ‘कविता का चाँद और आलोचना का मंगल’, साहित्य की मुक्ति का प्रश्न उर्फ़ इस पापागार में स्वागत है संतो वग़ैरा मैं लिख चुका था, नामवर जी की बेईमानियों पर सवाल भी कर रहा था। ‘कविता का चाँद और आलोचना का मंगल’ लेख में उनसे यह भी पूछा था कि छंद में जादू है, तो केदार जी गीतों से आये हैं, फिर से छंद में लिखकर धड़ाक से महाकवि क्यों नहीं बन जाते? बाद में नामवर जी पर हमला करने वाले उनके एक भ्रष्टशिष्य के लिखे पर ज़बरदस्त लेख ’आलोचना का सच उर्फ़ आलोचना क्या नहीं है’ लिखा था। जो अपनी शोधछात्रा से संबंध बना ले। पत्नी को त्याग दे, उसे क्या कहेंगे! हिन्दी के लेखकों में इस तरह की चारित्रिक दुर्बलता आम बात है। बहरहाल, उस लेख में मैंने बताया था कि नामवर जी की आलोचना किस बात के लिए न करो और किस बात के लिए करो। नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी ने भारत भूषण अग्रवाल पुंरस्कार के ज़रिए हिन्दी की दुनिया में जो गंदगी फैलाई, उसे साफ करने के लिए स्वयं रामचंद्र शुक्ल भी आ जाएँ तो भी सौ साल में साफ कर पाना मुश्किल होगा। इन पुरस्कारों ने लेखकों का दिमाग खराब कर दिया है। जिन युवाओं के लिए इस पुरस्कार को शुरू किया गया था, पुरस्कार के रथ पर बैठते ही वे कविता के विश्वविजय पर निकल पड़े। अभी भी कोई भी पुरस्कार के रथ से उतरा नहीं है। पाँच सौ रुपये के इस पुरस्कार ने अकेले हिन्दी में जितनी गंदगी फैलाई उतनी तो साहित्य अकादमी के पुरस्कार ने भी नहीं फैलाई। कम ही फैलाई। पहले भी ऐसा था कि पाने वाला खुद को कविता का स्टार समझने लगता था, लेकिन आज तो यह पागलपन और भी बढ़ गया है कि इसे पाते ही अपने आप को कविता का सुपर स्टार समझने लगा है। हालाँकि पहले के पुरस्कृतों में से एक अरुण कमल पिछले दिनों परमानंद श्रीवास्तव के अवदान और महत्व पर केंद्रित दो दिवसीय संगोष्ठी में गोरखपुर आए। उस संगोष्ठी के अख़ीर में एक सत्र कविता पाठ का भी था। अध्यक्षता नरेश सक्सेना भले कर रहे थे, लेकिन मंच पर अरुण कमल की हैसियत सिनेमा के सदी के महानायक वाली हैसियत जैसी ही थी। उनकी बुराई नहीं कर रहा हूँ, अरुण कमल से पुरानी जान-पहचान है। जब भी मुलाकात हुई है, बहुत सहजता से बातचीत हुई है, लेकिन प्रसंगवश उनसे हुई चूक को भारत भूषण पुरस्कार और साहित्य अकादमी पुंरस्कार के आलोक में रखकर देख रहा हूँ। संदेह पैदा हो रहा है कि अब उनमें कहीं कोई घमंड तो नहीं आ गया है? अरुण कमल मंच पर बैठे हुए थे, शेष कवि जो उस मंच पर उस दिन सचमुच शेष कवि लग रहे थे, कविताएँ पढ़ते जा रहे थे। स्वप्निल श्रीवास्तव, अष्टभुजा शुक्ल, बोधिसत्व आदि अपनी कविताएँ पढ़ चुके तो संचालन कर रहे भारतभूषण प्राप्त युवाकवि, मुझे तब पता चला कि युवाकवि भारतभूषण प्राप्त है, जब उसने उत्साह में कहा कि इस मंच पर पाँच भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार प्राप्त कवि बैठे हुए हैं और संचालक ने वरिष्ठता क्रम में अध्ष्क्षता कर रहे नरेश सक्सेना से पहले अरुण कमल को कविता पाठ के लिए आमंत्रित किया। अरुण कमल आए, उन्होंने अपनी कविता की जगह परमानंद श्रीवास्तव की एक कविता का पाठ किया और वापस जाकर शेष कवियों की पंक्ति में जा बैठे। प्रश्न यह कि उन्हें परमानंद जी की कविता का ही पाठ करना था, तो पहले से संचालन कर रहे युवा कवि कों बताया क्यों नहीं था और ऐसा कोई बड़ा काम करना था, तो पहले से प्रस्ताव क्यों नहीं किया कि सभी कवि परमानंद जी की एक-एक कविता का पाठ करें। मैं मंच पर होता, तो अरुण कमल बिना अपनी कविता पढ़े, चले जाते? एक कविता परमानंद जी की पढ़ते तो एक कविता अपनी पढ़ते। हाथ पकड़कर खींच लेता, फिर से पोडियम पर ले जाता और कहता कि जिन कवियों ने कविता पढ़ी है, उनका अपमान मत कीजिए। नरेश सक्सेना तो अध्यक्षता कर रहे थे। आदेश नहीं दे सकते थे? स्वप्निल श्रीवास्तव और अष्टभुजा शुक्ल, बोधिसत्व वगैरा की, अरुण कमल के सामने हैसियत ही क्या है? अरुण कमल से मेरे संबंध ख़राब नहीं हैं, लेकिन क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं करूँगा! अरुण कमल ने मज़ाक में ही सही, संगोष्ठी के संयोजक से केवल भाषण का सट्टा कहकर ऐसे आयोजनों का सच कह दिया। क्या नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, ऐसे आयोजन कराते रहते थे, रथ यात्राएँ निकालते रहते थे, पुरस्कार का धंधा करते थे कि लेखक का काम करते थे? एक लेखक को आयोजक एक बार बनना चाहिए, दो बार तीन बार चार बार बनना चाहिए; बार-बार आयोजन कराते रहने से, आजीवन आयोजक नहीं बन जाना चाहिए। आजीवन आयोजक बनने का मतलब है, साहित्य का धंधा। तो मैं बात कर रहा था, लेखक के स्वभिमान और अहंकार की? अरुण कमल को कविता पाठ करने वाले कवियों, उनमें भी शेष चार भारतभूषण अग्रवाल प्राप्त कवियों से ख़ुद को अलग नहीं करना चाहिए था। क्या इसलिए ख़ुद को अलग किया कि भले अध्यक्षता नरेश सक्सेना कर रहे थे, लेकिन अकादमी पुरस्कार प्राप्त केवल अरुण कमल थे या हिन्दी के देश में उनकी डिमांड नरेश सक्सेना से अधिक है या तुरत अशोक वाजपेयी को इक्कीस लाख का विवादित पुरस्कार देकर लौटे थे। क्या लेखक की डिमांड का उसके दिमाग़ से कोई कनेक्शन है? दिमाग़ ख़राब हो जाता है? दूसरी ओर नरेश सक्सेना जैसे कवि हैं, हिन्दी कविता की दुनिया में आलू की गति को प्राप्त हैं, कहीं भी कभी भी सुलभ, किसी भी स्थिति में रख दो, सब स्वीकार है। आज लेखकों के बीच एक ओर स्वाभिमान की कमी का संकट है तो दूसरी ओर अहंकार का प्राचुर्य है। पुरस्कार के आतंक का हाल पूछिए मत। जब काव्य सत्र का संचालन कर रहे बच्चे ने कहा कि इस समय मंच पर पाँच भारतभूषण अग्रवाल प्राप्त कवि हैं तो शायद वह बच्चा कविता की दुनिया में देवताओं की कोई पंक्ति देख रहा था, नक्षत्रों का कोई समूह देख रहा था। द्विज कवियो का कोई मंडल देख रहा था, जिसमें अभी-अभी वह शामिल हुआ है।
     पहले भी कह चुका हूँ कि भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार ने युवा कविता को कविता-भ्रष्ट करने का काम किया है। हिन्दी की सरस्वती तक के मुँह पर कालिख पोतने का काम किया है। दुर्भाग्यवश उस काम में भी मेरे आभासी मित्र उदय प्रकाश शामिल रहे है। यह चुक उनसे कैसे हुई, क्या पोएट्री मैनेजमेंट की भाषा, उनकी काव्यभाषा की तुलना में हिन्दी कविता के लिए अधिक थी उपयोगी थी, उसकी संवदेना, उदय प्रकाश की कविता की संवेदना से बेहतर थी? क्या ठीक पहले शुभमश्री नाम की कवयित्री ने सरस्वती पर भिन्न रुचि की कविता नहीं लिखा था, जो साहित्य के गंभीर पाठकों के लिए जुगुप्सापूर्ण नहीं थी, जिसमें माता सरस्वती की रोमावलियुक्त श्यामवर्णी योनि का वर्णन नहीं किया था? जिसे जानकीपुल के संपादक ने छापा था, क्या उस कविता को देखकर उस पुल से कविता की जानकी, पानी में छलांग नहीं लगा ली होंगी? उदय प्रकाश को देखना चाहिए था। हम लोग हिन्दी के बच्चे है, कोई रोबोट नहीं। भले हमारे भावबोध, काव्य-विचार और नैतिक-दृष्टि में और आज की पीढी के सोचने और देखने में अंतर हो, फिर भी हमें कहना चाहिए कि कविता की परंपरा के भीतर से ही कोई नई बात पैदा होती है। निराला की कविता है, वर दे वीणा वादिनी। निराला के लिए सरस्वती क्या हैं, यह कोई कहने की बात नहीं है, सब को पता है। सरस्वती उनके लिए माँ हैं, देवी हैं; मेरे लिए भी वही हैं, हिन्दी भाषी समाज के लिए भी वही हैं। हिन्दी के तमाम कवियों के लिए माँ हैं, देवी हैं। जिन बच्चों या हिंदी के प्राध्यापकों या संपादकों के पास कविता की परंपरा की समझ नहीं है, उनके लिए सरस्वती, देवी नहीं, कुछ और हों, तो कम से कम मैं सहमत नहीं हो सकता। उदय प्रकाश कैसे सहमत हुए होंगे, यह तो वही बता सकते है।
     नये बच्चों को इस तरह भी परंपरा को देखना चाहिए। मुझे ख़ुद सरस्वती की शक्ति का पता नहीं होता, तो मैं हिन्दी के दो कौड़ी के मठाधीशों को हिन्दी का महाबली समझता और उनकी सेवा करता, उनकी पालकी ढोता, उनकी पूजा करता। सरस्वती की महिमा का मुझे पता था। सरस्वती मेरी एक कविता ‘अथ आलोचक कथा’ में आईं। उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया और आलोचना का खड्ग उठाने के लिए कहा। कविता देखते चलेंः 
‘ शुभ्रवसना वीणावादिनी ने वीणा बजाकर
मुझे गहरी नींद में जगाया और सिरहाने आकर
मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए
माँ की तरह मुस्काईं
बहुत दिनों बाद सपने में माँ आई
पूछा- काहेक रोवत हौ के मारिस है
फिर माँ ने ही कहा- तूड़िदेव ओकर हड्डी-पसली   
उसके बाद माँ अन्तर्धान हो गयीं’
    कविता में आगे आलोवक बनने की वजह पर बात की गयी है। वह सब छोड़ता हूँ, लेकिन पूछने की इच्छा है आज के किन-किन आलोचकों, कवियों, कथाकारों, संपादकों के सपने में माता सरस्वती आयी होंगी? उदय प्रकाश के सपने में आई होंगी? प्रभात की पीढी तो सपने में पुरस्कार और नोट देखती होगी, मंच, माइक, माला और लिटफेस्ट देखती होगी। हालांकि मंचों पर उदय भी अधिक दृश्य होते हैं, लेकिन उनके पास प्रतिभा है। अधिक प्रतिभा है। उनके सामनें प्रभात जैसे तमाम संपादकों के पास कितनी प्रतिभा है? प्रतिभा कोई छिपी हुई चीज नहीं है। युवा दिनों में ही दिख जाती है। कवि, आलोचक, कथाकार, संपादक, सबमें दिखती हैं। युवा दिनों में ही कवि में आग तो नहीं दिख सकती और युवा दिनों में ही उसे सूरज का गोला हो भी नहीं जाना चाहिए; अलबत्ता चिनगारियाँ ज़रूर दिख जाती हैं। जैसे गुरु सीरीज़ में दिखी थीं। पाठक सोच रहे होंगे कि उदय प्रकाश की बात करते-करते मैं क्यों आ जा रहा हूँ। असल में यह नये तरह की आलोचना है। अभी और लोग भी आ सकते हैं, लेकिन थोड़ा रुककर। बात अधिक प्रतिभा और कम प्रतिभा की। उदय प्रकाश शुरू में ही अपनी प्रतिभा से रूबरू कराते हैं। शुरुआती कहानियाँ हों या आज की। कविताएँ भी पहले संग्रह से ही ध्यान खींचती हैं। इधर क्या हुआ, दिदिया लिखने वाले कवि को पोएट्री मैनेजमेंट पसंद आ गई, यह तो वही जानते होंगे। जानकीपुल के संपादक ने सरस्वती वाली कविता क्यों छापी, यह पुछने से कोई फायदा इसलिए भी नहीं है कि संपादक को रचनाओं से कुछ भी लेना-देना नही है। बस मन की तरंग है, कुछ भी छाप देना है। उनके लिखे और रचनाओं के चयन ने कभी प्रभावित नहीं किया। आशय यह कि उनके लेखन से ही नहीं, संपादन से भी निराश हुआ। मुझे माफ करें तो कहना चाहूँगा कि उनमें प्रतिभा का नहीं, अहंकार का भंडार है। जहाँ तक मुझे याद है, जानकी पुल के लिए मैंने अपनी कविताएँ नहीं भेजी हैं। समालोचन की भाषानीति से दुखी होकर, उससे भी संबंध नहीं रहा। एक संपादक बहुत अच्छी रचना छाप पाए या न छाप पाए, जिस कमज़ोर रचना को छाप रहा है, उसे महान बताने की ग़लती न करे। मौसम वाली कहानी ऐसी ही कहानी है। बहुत अच्छी कहानी हो सकती थी, आधी दूरी तक लगा भी कि बहुत अच्छी कहानी पढ़ रहा हूं, लेकिन आधा रास्ता पार करने के बाद, मेरे जैसे पाठक का दिल टूट गया। किसी कहानी की ऐसी प्रशंसा कीजिए कि मैं भी धोखा खा जाऊँ और देखना शुरू करूँ तो आधा पार करते ही दिल टूट जाए। पाठक का दिल ही नहीं, संपादक की मूरत भी टूट जाती है। हाल में अलका सरावगी का एक इंटरव्यू सरसरी तौर पर देखा और उससे भी दिल टूट गया, यतीश कुमार को ज्ञानेंद्रपति का हिन्दवी के लिए इंटरव्यू करने वाले बहुत कम उम्र के कुशाग्र अद्वैत से इंटरव्यू करना सीखना चाहिए। इसमें सारा दोष यतीश कुमार का नहीं है, अलका सरावगी को तो कथाकार होने के नाते इंटरव्यू में कथारस घोलना चाहिए था। यह संपादक की अति प्रशंसा थी, जिस वजह से सरसरी तौर पर ही सही देखना हुआ। असल में यह मेरी सीमा हो सकती है या अज्ञानता कि मुझे उनके लेखन और संपादन से अधिक व्यावसायिक अनुवाद-कर्म पर ध्यान जाता है। इधर के हिन्दी के किसी लेखक ने इतनी किताबों का अनुवाद किया हो, जो उसके लिखे से अधिक हों, ध्यान नहीं जाता। अनुवाद उन्होंने अमृत राय की तरह हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने के लिए किया है या प्रकाशकों के फ़ायदे के लिए अपने समय की बहुत बिकने वाली किताबों का किया है, यह तो वही जानते होंगे। यह संदर्भ इसलिए, क्योंकि यह हिन्दी साहित्य के लिए एक ख़तरनाक स्थिति है कि हिन्दी का कोई लेखक, प्रकाशकों को इतना अधिक फ़ायदा पहुँचने वाला हो जाए कि वह प्रकाशकों का लाड़ला बन जाए। उनके कान भरने लगे। ईमानदार, स्वाभिमानी और आत्मसंघर्ष वाले लेखकों का नुक़सान करने लगे। दूसरे रास्ते से चमकने वाले लोग कभी नहीं चाहेगे कि साहित्य में कोई ऐसा भी हो, जिसने नामवर, अवा वग़ैरा की पालकी न ढोईं हो, चरणरज न लिया हो। ऐसे बहुत से लेखक या कम लेखक इसी तरह के हैं, जिनके जीवन में कोई साहित्यिक मूल्य नहीं है। मैंने तो ऐसे लेखकों को स्वाभिमानी लेखकों को तमाम बुरा-भला कहते देखा है। नहीं-नहीं, बुरा कहते तो कोई बात नहीं थी। कुंठित कहकर डायरेक्ट मुंह पर कालिख पातने का भाव होता है।
    जहाँ तक मुझे याद है, विष्णु नागर ने भी एकाधिक बार उन लेखकों को कुंठित कहा है, जो हिन्दी के मठाधीशों का पर्दाफाश करते थे। उन्होंने मेरा नाम लेकर तो कभी मुझे कुंठित नहीं कहा है, लेकिन कहा है। मैंने उसी समय एक कविता लिखी ‘कुंठित है कुंठित है कुंठित है’। अपनी ही कविता बार-बार नहीं दूँगा। बात किसी भी लेखक को कुंठित कहने की। एक बार पटना के एक मनोचिकित्सक कवि से मैंने पूछा था कि हिन्दी में कुंठित किसे कहेंगे और कुंठा पुरस्कार और यश न पाने की होगी या किसी और चीज़ की? असल में जानना चाहा कि यह सब मेरा रास्ता नहीं था, चापलूसी नहीं की, चरणरज नहीं लिया, पुरस्कार के लिए शीर्षासन नहीं किया, जब मैंने यह सब चाहा ही नहीं तो कुंठा किस बात की? उन्होंने कुछ बताया नहीं, जवाब नहीं दिया, लेकिन मुझे सच पता है। जवाब इसलिए नहीं दिया कि यह सब उन्हें भी चाहिए था। विष्णु नागर ने हालाँकि बाद में स्वीकार किया कि साहित्य की सŸाओं का विरोध करने वालों को कुंठित कहना आम बात है। क्या समय आ गया है, साहित्य की सŸाओं की पालकी ढोना, उनके दरबारों में नाच-गाने का प्रोग्राम करना कुंठित होना या लेखक की गरिमा के सिंहासन से गिरना नहीं है और साहित्य की भ्रष्ट सŸाओं का, जो साहित्य में अँधेरा छोड़ते है, उनका विरोध करना, हिन्दी का मालपुआ खाने की जगह, हिन्दी के लिए संधर्ष करना कुंठित होना है? लेखिकाएँ भी अपनी सीमा लाँध गई हैं। मैं नहीं समझता कि महादेवी वर्मा आज होती तो अशोक वाजपेयी के दरबार में नाचने-गाने का प्रोग्राम करतीं, उनसे सटकर फोटो खिंचवाती। महादेवी वर्मा का नाम ले रहा हूँ, इसलिए बड़ी मर्यादा में कुछ कह रहा हूँ। अशोक वाजपेयी के शिविर की इन लेखिकाओं का नाम नहीं ले रहा हूँ। स्वाभिमानी लेखकों का कुंठित कहने वाली एक युवा लेखिका तो बिहार के एक मेरे दिवंगत मित्र आलोचक रेवती रमण की शिष्या है। जाहिर है, लेखक और लेखिकाएँ निराला और महादेवी वर्मा के साहित्यिक वंशज नही हैं। तो हिन्दी की दुनिया में किस छिछोरे के बेटे या बेटियाँ हैं?
      दिल्ली के या केंद्रित लेखक या लेखिका का आचरण ही नहीं, दिमाग़ भी ख़राब हो जाता है। इस पहलू में प्रकाशक है, पुस्तक-संपादक है और दूसरे पहलू में अवा जैसे एकाधिक बादशाह सलामत, तो दिमाग़ ख़राब होने की गारंटी है। होना तो यह चाहिए था कि दिमाग़ ठंडा करके साहित्य की परंपरा और साहित्यिक जीवन की परंपरा का अवगाहन करते या करतीं; कहाँ बता रहे या रही हैं कि आज साहित्य के परिसर में कौन अच्छा है और कौन कुंठित है। मैं अपनी ओर से इन लोगों को कुछ न कहूँगा, न अपनी कविता उद्घृत करूँगा। अज्ञेय की इन पंक्तियों को उद्धृत करूँगाः
‘’अच्छी कुंठारहित इकाई 
साँचे ढले समाज से
अच्छा 
अपना ठाठ फकीरी 
मँगनी के सुख साज से’’ 
       आज दो रास्ते हैं। साहित्य के सच के रास्ते पर चलिए या झूठ के रास्ते पर। यह दोनों रास्ते सिर्फ़ अलग-अलग ही नहीं हैं, दोनों के तल अलग-अलग हैं। साहित्य की एक दुनिया सतह पर है। जहाँ झूठ का तिलिस्म और ज़बरदस्त रोशनी है, ख़ूब दौड़-धूप है, ख़ूब तिकड़म, ख़ूब दरबारबाजी, ख़ूब गैंग-सैंग, लिखो कम चाहे महाख़राब, लेकिन दिखो ख़ूब, नाचो-गाओ, हिलो-हिलाओ ख़ूब। ओह जैसे साहित्य की दुनिया यही है, बाक़ी श्मशान। दूसरी दुनिया सतह की दुनिया से नीचे है, गहराई में, कम शोर-गुल में, कम हलचल में, जहाँ चुपचाप साहित्य-साधना करो। ख़ून-पसीना जलाओ। जोखिम उठाओ। सतह से नीचे गिरने वाली गंदगी हटाओ। रोज़ नहाओ-धोओ। माता सरस्वती की पूजा करो, अगरबत्ती जलाओ और लिखने बैठ जाओ। एक हाथ से लिखो, दूसरे हाथ से सतह के नीचे और ऊपर के ख़तरों से लड़ो। ऊपर संघर्ष नहीं है, दौड़ है। नीचे संघर्ष। जीवन का और साहित्य का। जो सतह के ऊपर हैं, वहाँ किसी से किसी की कोई चुनौती नहीं है। जो सतह के ऊपर के लेखक हैं, उनके पास उड़ान भरने के लिए जहाज़ और हेलिकॉप्टर हैं। पनडुब्बियाँ भी हैं, जिसमें बैठकर सतह के नीचे आकर साहित्य-साधना करने वालों पर आक्रामण करते हैं। वे नहीं चाहते कि कोई साहित्य के किसी अलग रास्ते का मुसाफ़िर हो। ऐसा कोई पाया गया, तो पहले तो उसके विरुद्ध षड्यंत्र करते हैं और उसके लिखने को, बोलने को रोक नहीं पाते हैं, तो उसके मुँह पर थूकना शुरू कर देते हैं। उसे नंगा करने लगते हैं। असल में हमारे समय में ऐसे दो तरह के लेखक होते हैं, जिनकी मिट्टी अलग-अलग होती है। सतह के ऊपर का लेखक अहंकार की मिट्टी से बना होता है, स्वाभिमान या वीरता की मिट्टी से नहीं। सतह के लेखकों में अहंकार का उदाहरण देना हो, तो हाल ही का उदाहरण प्रभात का हैं। पिछले दिनों प्रभात ने धड़ल्ले से, जैसे हिन्दी साहित्य उनकी कोई पुश्तैनी चीज़ हो, जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के एक रिटायर्ड प्रोफ़ेसर महेंद्रपाल शर्मा को, जो उनसे उम्र में कोई पन्द्रह साल बड़े होंगे, सोशलमीडिया पर कहा-शर्मा तू किसकी चमचागीरी कर रहा। मैंने कहा-यह ठीक बात नहीं। जब हमारे पास बहस के लिए तर्क और तथ्य नहीं होते हैं तो तू-तड़ाक करने लगते हैं। प्रभात रंजन ने मेरी इज़्ज़त की ऐसी-तैसी करते हुए कहा-और क्या करूँ पाँडे, उम्र का लिहाज़ करूँ? पाँडे जी की जगह पाँडे कहकर उम्र का लिहाज़ छोड़ दिया। मैंने कहा- ओह, इतना अहंकार? बनना था मनोहर श्याम जोशी और बन गए गालीबाज! उम्र का लिहाज़ मत करो, अपनी साहित्यिक यात्रा के बारे में विचार करो। क्या किया, क्या पाया? पहले कुछ ऐसा कर लेते कि लोग कहते कि प्रभात पैदा नहीं हुए होते तो यह लिखा नहीं गया होता, उसके बाद किसी को कुछ भी कहते। फिर प्रभात रंजन ने कहा- अहंकार कहाँ से आ गया पांडेय जी। आप एक कुंठित लेखक हैं। अच्छी बात यह कि पाण्डेय के साथ जी लगा दिया और बुरी बात यह कि लेखक के पहले कुंठित जोड़ दिया। इस तरह इस बार पांडेय में जी लगाकर मेरे अब तक के संघर्ष के मुँह पर कुंठित कहते हुए थूक दिया। फिर मैंने कहा- प्रभात रंजन जी, बहुत कड़ा लिख सकता था, लेकिन बहुत सोचा और पाया कि आप अकेले ऐसे नहीं हैं, और भी लोग हैं। साहित्य की विशाल मुख्यधारा है। उसमें आप कोई बड़ी स्थिति में तो हैं नहीं। मुख्यधारा के उदय प्रकाश या मदन कश्यप जैसे मित्रों की स्थिति में भी नहीं हैं। फिर कुछ और कहने का इरादा फ़िलहाल छोड़ दिया है। अलबत्ता एक बात ज़रूर कहना चाहता हूँ कि आप में अहंकार बहुत आ गया है, आपने अस्सी के आसपास के शिवकिशोर तिवारी के सामने अहंकार का प्रदर्शन किया है। उनसे यह कहकर कि मुझे अन्फ्रेंड कर दीजिए। आशय यह कि आप साहित्य में इतने बड़े हो गए हैं कि आपको उनकी या मेरे जैसे लोगों ज़रूरत नहीं है। छोटा हो या बड़ा कोई लेखक इस तरह का अहंकार दिखाता है, तो उचित नहीं मानता। ऊपर जो संवाद दिया गया है, वह प्रभात को एक व्यक्ति के रूप में दिखाने के लिए नहीं है, बल्कि साहित्य के पर्यावरण को दूषित करने वाली एक प्रवृत्ति के रूप में है। प्रभात अकेले ऐसे नहीं है। बोधिसत्व को लगता है कि कुंठा का ठेका गोरखपुर में गणेश पाण्डेय ने ले रखा है, उनकी दिव्य दृष्टि में विश्वनाथ प्रसाद तिवारी संत हैं्! हद है, जो अकादमी में बुला ले, फाउंडेशन के किसी आयोजन में बुला ले या किसी मुहल्ले के आयोजन में बुला ले तो बुलाने वाला संत है। गणेश पाण्डेय तो ऐसे ही बेवकूफी में हिन्दी के लिए लडाई लड़ रहा है। अरे भाई नामवर सिंह से लेकर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी तक की धोंती फींचने से लेखक की कुंठा मर जाएगी? मैं किसका-किसका चूतड़ धुल दूं, तो कुठा नहीं रहेगी? अशोक वाजपेयी का धुलने वाले अकुंठ हैं? तो क्यों नहीं हिन्दी की दुनिया में मर्दाना काम किया है? क्या लिखा है? मुख्यधारा में ऐसे लेखकों की भरमार हैं, जो हिन्दी के आहत होने पर तनिक भी दुखी नहीं होते है, लेकिन होरिलवा के फूफा मेरा मतलब उनके सैंया आहत हो जाए्र तो रोना-धोना शुरू कर देते है। कुछ तो ढेला फेंकने लगते हैं, गोबर की हडिया फेंकने लगते है। कुछ तो लूगा उठाकर नाचने लगते है, यही हिन्दी की मुख्यधारा है।ं मुख्यधारा में जो भी लेखक सक्रिय हैं, मुख्यधारा की तीव्र आलोचना को बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। जो लेखक अकादमी के भक्त होंगे, जो अवसर पाते होंगे, अकादमी की आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सकते। जो लेखक रज़ा फ़ाउंडेशन से चार अवसर पाते होंगे या अशोक वाजपेयी से आर्थिक सहयोग या कोई अन्य सहयोग पा चुके होंगे, उनकी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। भीतर-भीतर कुढ़ते हैं और किसी दिन रसरंजन की तरंग में सारी घृणा बाहर आ जाती है। प्रभात रंजन के बारे में जब विचार करना शुरू किया तो वे मेरे लिए पन्द्रह साल छोटे (भाई) नहीं रह गए थे, एक प्रवृत्ति बन चुके थे। दिल्ली के साहित्य के आकाश को अपनी प्रवृति से ढाँप रहे थे। कालिख पोत रहे थे। विचार करना शुरू किया तो लिखने की मेज पर सहसा प्रभात अहंकार का पर्याय बन चुके थे। गोपेश्वर सिंह को भी उन्हें उनके सामने कहा- आप छद्म लेखक हैं। ऐसे ही उलझने वाली बातें करना उनका स्वभाव बन गया है। उनका लहजा बताने लगा है कि अहंकार उनके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बन चुका है। गोपेश्वर सिंह अच्छे आलोचक हैं या कम आलोचक या आलोचक ही नहीं हैं, यह बाद की बात है, पहले गोपेश्वर को छद्म लेखक कहने वाले के पास गोपेश्वर की तरह कोई एक आलोचनात्मक लेख तो होना चाहिए। शिवकिशोर तिवारी ने मुक्तिबोध पर जो लेख लिखा, वैसा कोई लेख उनके पास है? मैं किसी की आलोचना करता हूँ तो मेरे पास पहले उस लेखक सामने खड़े होकर बात करने की पात्रता है। कविता में आलोचना में, उपन्यास में काम किया है। सूप बोले तो बोले तो चलनी क्या बोले मुहावरा इसी स्थिति के लिए है। पहले हिन्दी विभाग में चुपचाप रामचंद्र तिवारी, परमानंद श्रीवास्तव, गिरीश रस्तोगी, रामदेव शुक्ल, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी वग़ैरा की बातें सुनता था। गुरु सीरीज लिखने के बाद खुद पर भरोसा मजबूत हुआ। फिर भी कम बोलता था। अशोक वाजपेयी विभाग में आते थे, विभाग के कार्यक्रम में सभा को संबोधित करते थे, तो उन्हें टोकता नहीं था कि हजार कविताएँ हो गयी हैं तो धड़ाक से निराला क्यों नहीं हो जाते, ससुरा उनका तकिया कलाम है, तो इसके लिए उनकी जुबान नहीं पकड़ लेता था। अशोक वाजपेयी में लाख बुराई हो, हिन्दी साहित्य में चाहे जितना अँधेरा फैलाया हो, भारत भूषण पुरस्कार से चाहे हिन्दी के युवाओं को पथभ्रष्ट किया हो, साहित्य अकादमी और हिन्दी के पूँजीपतियों के विरुद्ध संधर्ष करने की जगह ख़ुद रजा फाउंडेशन बनाकर वही सब काम करने लगे हों, लेकिन मैं यह कैसे कह सकता हूँ कि अशोक वाजपेयी लेखक नहीं हैं, छद्म लेखक हैं, झूठ-मूठ के लेखक हैं। मैं उनके चमचों की तरह उन्हें मुक्तिबोध जैसा मान तो नहीं दूँगा, उनकी पूजा तो नहीं करूँगा, उनके दरबार में नाचूँगा नहीं, लेकिन उनकी कविता और आलोचना को कूड़ेदान मे ंतो नहीं डाल दूँगा। अशोक वाजपेयी ने कविता और आलोचना में जो और जितना काम किया है, उसका मूल्य तो उन्हें दूँगा ही या सारे नंबर काट दूँगा! विश्वनाथ जी, अशोक जी वगैरा की काफ़ी आलोचना करता रहा हूँ, लेकिन किसी सभागार में ये लोग या इनमें से कोई मेरे सामने खड़ा हो जाएगा, तो क्या मैं उन्हें नमस्कार करता हुए खड़ा नहीं हो जाऊँगा। उन्हें आदर नहीं दूँगा? यह साहित्य का संस्कार है। इसे आना चाहिए। प्रभात को भी आना चाहिए। हिन्दी की दुनिया में गंभीर लेखक की छवि, लोकप्रिय लेखकों को आदर्श मानने से या उन्हीं जैसा बनने से नहीं आएगी। हिन्दी साहित्य की परंपरा में गहरे उतरना होगा। एक पहलू में अशोक वाजपेयी होगे, दूसरे में सुरेंद्र मोहन पाठक, यह दृश्य ही गंभीर साहित्य का नहीं है। लेखक के रूप में प्रभात रंजन की कोई गंभीर छवि, मेरे मन में बनी ही नहीं। वे मुझे कभी प्रतिभा के मामले में उम्र में अपने से काफी छोटे अविनाश मिश्र के आसपास भी नहीं दिखे। जब-जब देखा उन्हें हिन्दी के आशु अनंवादक के रूप में देखा। दिल्ली के लगभग सभी बड़े प्रकाशकों से उनके नैकटृय को देखा। लगा कि अरे, साहित्य में काफ़ी जगह घेरने वाले प्रभात का मुख्य काम अनुवाद का है, दूसरे काम गौण। फिर विचार के क्रम में यह प्रश्न कौंधा कि संपादक के रूप में भी इन्होंने कविता को नुक़सान पहुँचाया है। ऊपर कहा ही है। इस तरह यह बताना ज़रूरी है कि साहित्य में आज एक नहीं, कई ऐसे लोग हैं, कविता को नुक़सान पहुँचा रहे हैं। मुझे लगा कि अगर साहित्य के पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाने वाली प्रवृत्ति पर मैं कुछ नहीं कहूँगा, तो कोई नहीं कहेगा। मैं चला जाऊँगा तो यह प्रवृत्ति रेखांकित हुए बिना रह जाएगी। साहित्य का सच कहने का रास्ता चुना है तो कोई फूल नहीं भेंट करेगा, लोग नाक-भौं सिकोड़ेंगे, छी-छी कहेंगे, गालियाँ दी जाएंगी मुझे गोबर गणेश कहा जाएगा। टट्टी लिखता हूँ, छेरता हूँ, कहा जाएगा। यह सब मुझे पहले ही कहा जा चुका है। गालियाँ तो अब इस कान से सुनता हूँ, उस कान से निकल जाती हैं। साहित्य के जिस रास्ते पर हूँ, उसके जोखिम को जानता हूँ।
       मेरे बारे में आमतौर पर अच्छा नहीं लिखा जाता है, बल्कि कहना चाहिए कि अच्छा तो अच्छा, बुरा भी ढंग का नहीं लिखा जाता है। एक बार लेखकों का पोस्टमार्टम करते हुए एक लेख लिखा था, जिसे मैनेजर पाण्डेय ने ‘आलोचना‘ पत्रिका में लिखे अपने लेख में हिंदी आलोचना की सबसे बड़ी लफंगई कहा था। अब उस तरह के लेख नहीं लिखता, लेकिन उससे ली गई कुछ सीख हर लेख में रखता हूँ। बुरा भी लिखना है, तो ख़राब मत लिखो। ख़राब भी लिखो तो बहुत अच्छा लिखो। साहित्य के बारे में है, तो उसे बहुत साहित्यिक बना दो। जैसे कविता में उचित शब्दों की खोज करते हो, उसी तरह गद्य में भी शब्दों का चुनाव साहित्यिक हो। जैसे किसी को हिन्दी का, या अशोक वाजपेयी का या प्रकाशकों का दलाल कहना हो तो विचार करो कि यह शब्द घिस गया है, बिचौलिया शब्द भी कम अच्छा रहेगा। यह लिखो कि अमुक, अमुक का एजेंट है। यह कहते ही, जिसे दलाल कह रहे हो, उसकी इज़्ज़त थोड़ी बढ़ जाएगी। यह सब करने के लिए कविता का संस्कार ज़रूरी है। ऐसा कुछ न भी हो पाए तो कोई बात नहीं। जैसे अब तक काम चलाया है, आगे भी चलाओ। सवाल करना हो तो यह स्तरीय सवाल ज़रूर करना कि अहंकार पर लिखने की क्या ज़रूरत थी? अहंकार किसमें नहीं है? पाँच सौ रुपये का पुरस्कार पाते ही अहंकार आ जाता है। अहंकार भी आज साहित्य में पुरस्कार की तरह स्वीकार्य है, फिर किसी के अहंकार पर चोट क्यों? अपना जवाब पहले ही बता दूँ। अहंकार, साहित्यिक मूल्यों से बड़ा हो जाएगा, तो अहंकार जी को आईना दिखाना होगा। साहित्य में किसी भी लेखक या अलेखक का अहंकार, किसी लेखक के स्वाभिमान और आत्मसंघर्ष से बड़ा नहीं हो सकता है। उसे अपनी सीमा में रहना होगा। इसलिए नहीं कि मेरा स्वाभिमान और आत्मसंघर्ष बड़ा है, बल्कि इसलिए कि कल को कोई सतह के नीचे रहकर देवेंद्र कुमार जैसा कोई साधु कवि कविता की साधना कर रहा हो तो सतह के ऊपर ऊछलकूद करने वाला कोई अहंकारी पत्थर न मारे। कुंठित न कहे। बुज़दिल न कहे, नगरबहिष्कृत न कहे, अपुरस्कृत न कहे, अप्रतिष्ठित न कहे। मैंने किसी के स्वाभिमान को टूटते हुए नहीं देखा। अहंकार टूटते हुए देखा है। साहित्य में भी जिन्हें अपने ज़माने का ख़ुदा होने का भ्रम हो गया था, उनके अहंकार को सिर्फ टूटते हुए ही नहीं देखा, कहीं-कहीं तो स्वाभिमानी लेखक की चोट से खंड-खंड होते हुए देखा है।


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कम उम्र के लेखकों में ही नहीं, काफी अधिक उम्र के लेखकों में भी अहंकार ख़ूब है। और तो और विचारधारा की जड़ता के सिंहासन पर बैठे लोगों में भी बहुत अहंकार है। पहले कोटा के पुराने मार्क्सवादी लेखक का क़िस्सा सुनिए। वे भी अशोक वाजपेयी की तीव्र आलोचना से आहत थे। मुझे मेरे जवार के कामरेड दयाराम के जमाने के भटके हुए मार्क्सवादी लगे। कामरेड दयाराम के साथ अक्सर चाय की दुकान पर गपशप होती थी, वे विधानसभा का चुनाव हार चुके थे। फिर भी वे इसी रास्ते से आगे बढ़ना चाहते थे। काफी पहले की बात है। वे कहते थे कि बाँस से तोप का मुकाबला नहीं किया जा सहता हैं। उनका इशारा सेना और सुरक्षा बलों को लेकर था। वे ठीक सोचते थे। चुनाव का रास्ता ही अतंतः सही रास्ता है। जनता जो निर्णय लेती है, लोकतंत्र उससे चलता हैं। कोई चार दिन का बच्चा जंतरमंतर पर खड़ा हो जाएगा, भीड़ जुटा लेगा, उससे न व्यवस्था बदलेगी, न सरकार। यह काम जनता को करना है। जनता हर पाँच साल में अपना काम करती है। तम्हें लगता है कि जनता नासमझ है, तो जंतरमंतर पर नहीं, उसके पास जाओ। शहरों में सभागारों में नौटंकी मत करो। गालियाँ मत दो। गाँव-गाँव जाओ। जनता को समझाओं कि तुम जिसे बेहतर समझते हो उस सरकार को लाए। तुम्हें लगता है कि पिछली पार्टी दूध की धुली है, तुम्हारी पार्टी आजमाई नहीं गयी है, जनता उसे देखे, तो जाओ चुनाव मे उतरो। हिन्दी के लेखक हो व्यवस्था उलट-पलट देना चाहते हो तो मेरी तरह पाठक प्रथम का आंदोलन चलाओ। जंतरमंतर पर भी भरोसा करो, मना नहीं करता, लेकिन पहले जनता के बड़ हिस्से को हिन्दी का पाठक तो बनाओ। जब तक पुरस्कार प्रथम होगा, साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रथम होगा, बुकर प्रथम होगा, उत्सव प्रथम होगा, आलोचक प्रथम होगा, प्रकाशक प्रथम होगा, पुस्तक संपादक प्रथम होगा, संपादक प्रथम होगा, मठाधीश प्रथम होगा, साहित्य अकादमी प्रथम होगी और अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं में अपनी कृतियों का अनुवाद कराना प्रथम होगा, तुम जनता के पास नहीं पहुँच सकते। प्रकाशक का काम किताब बेचना है, जनता पढ़ती है या नहीं, इससे उसे मतलब नहीं है। उसके पाठक कौन हैं? लेखकों यह तुम्हारा काम है कि हिन्दी भाषी जनता के घर-आँगन में पहुँचो। पाठक प्रथम का आंदोलन चलाओ। सरकार बदलने का काम राजनीति के खिलाड़ियों पर छोड़ दो। दुर्भाग्य यह कि आज महेंद्र नेह जैसे निष्ठावान मार्क्सवादी लेखकों को लगता है कि लेखक संगठन अशोक वाजपेयी की पूजा करेंगे, प्रकाशकों की पालकी ढोएंगे, पुस्तक संपादकों के साथ गैंग बनाएंगे और इस रास्ते से इस दुनिया को हिन्दी की दुनिया को बेहतर बनाएंगे तो उनकी इस नासमझी को कार्ल मार्क्स भी दुरुस्त नहीं कर सकते है। बहरहाल राजनीति की बात से आगे, साहित्यनीति की बात करते हैं। तो महेंद्र नेह ने भी अशोक वाजपेयी की तीव्र आलोवना से आहत होकर कहा-इसमें पांडे सांडे के फ्रस्ट्रेशन के अलावा क्या नया है? पांडे जी कितने भी शब्दों को भदेस अलंकारिक भाषा में गरिया लें, रहेंगे। गणेश ही=... बेचारे भाषा का नया संस्कार बनाने चले हैं, सृजन की दुनिया इतनी हलकी नहीं है कि वह इस तरह की टोटके बाजियों से विचलित हो जाएं। फिर मैंने कहा- आपको कोई ग्रंथ, कोई दार्शनिक, कोई भगवान, कोई विचारक विचलित नहीं कर सकता है। आप में पाषाण जितनी दृढ़ता है, आपका लक्ष्य एकदम स्पष्ट है, आपको इधर-उधर, ऊपर-नीचे कहीं देखना ही नहीं है। विचारधारा के सच्चे अर्जुन हैं, मछली की आँख देखते रहिए, समुद्र को देखेंगे, अपने समय को देखेंगे तो विचलित हो जाएँगे। भगवान न करें कि आप जैसे लोग विचलित हों। कबीर ने कहा ही है-
सुखिया सब संसार है, खावै अरु सोवै
दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै।
आपको मुक्तिबोध विचलित नहीं कर पाए, उनके आईने में हिन्दी के पतनशील लेखकों का चित्र आप नहीं देख पाए, तो अब इस उम्र में और कहीं क्यों और क्या देखेंगे। आँखें खोलिए ही मत। सब सुंदर है, हिन्दी का जग सुंदर है।
     क्या बात है! कोई ऐसा सुंदर लेखक मिला तो, जिसे अपने समय की साहित्य की दुनिया बहुत स्वच्छ, बहुत पवित्र, बहुत गरिमामय दिखती है। आपकी आँखें कैसी हैं, ओह आपको आज का हिन्दी का हर लेखक बहुत चरित्रवान दिखता है, जिसका आचरण  अनुकरणीय है, जो हिन्दी का देवता है,  कोई दुर्बलता उसमें दिखाई ही नही देती है! आपकी भूरि-भूरि प्रशंसा करना चाहता हूँ, बहुत निष्ठावान, बहुत प्रतिबद्ध लेखक हैं, आपको कोई डिगा नहीं सकता है। आपकी आँखें अहर्निश केवल बेहतर दुनिया का स्वप्न देखने के लिए बनी हैं, आपके आसपास, आपके पक्ष और आपके विचारधारा के संसार के यथार्थ को देखने की आपको क्या ज़रूरत है! यह सब आपके दुश्मन देखें। मूँदहुँ आँख कतहुँ कुछ नाहीं! 
      आप बहुत सही व्यक्ति मिले हैं। थोड़ा सा ज्ञान देते जाइए। साहित्य के परिसर में फ़्रस्ट्रेशन किसे कहते हैं, कोई परिभाषा दे सकें तो बड़ी कृपा होगी? पालकी ढोने की तीव्र इच्छा हो, दरबार में या मंच पर नाचने की तीव्र इच्छा हो, पुरस्कार की तीव्र इच्छा हो, मशहूर होने के लिए मरा जा रहा हो; और यह सब करने के लिए अवसर न मिल पा रहा हो, अवसर पाने की कोई संभावना शेष न रह गयी हो और ऐसे में उसका दिमाग़ पटरी से उतर गया हो, तो इसे फ़्रस्ट्रेशन कहेंगे या जिसमें ऐसा कुछ हो ही नहीं, जो साहित्य की दुनिया को बेहतर बनाने के लिए संघर्ष करता है, उसमें फ्रस्ट्रेशन होता है? साहित्य में  फ्रस्ट्रेशन आखि़र है क्या? मैं आपकी सीमा जानता हूँ, फिर भी पूछ रहा हूँ, क्या पता कुछ ज्ञान मिल ही जाए! 
ओह इस तरह के और लोग भी हैं दुष्यंत ने भी ऐसे लागों के लिए खूब कहा है-
न हो क़मीज़ तो पाँवों से पेट ढक लेंगे 
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए।
हिन्दी की दुनिया में जिसके पास एक पैसे का भी पुरस्कार नहीं है, जो किसी साहित्य उत्सव के मंच पर नहीं होता है, जिसकी रचना कोई प्रकाशक नहीं छापता है, वह भी इन पुरस्कारवादियों, लिटफेस्टवादियों, अनुवादवादियों और साहित्य के शक्तिकेंद्रो का दासानुदास है। कभी-कभी लगता है, मूर्खता और अहंकार जुड़वाँ हैं। भगत सिंह और उनके साथी या उनके समय के क्रांतिकारियों का क्या लक्ष्य था? आज़ादी! और उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हुई, तो सवाल यह है कि वे लोग जो कुछ कर रहे,थे वह सब फ्रश्ट्रेशन (कुंठा) था? यह सवाल इसलिए कि आज हिंदी साहित्य में जो लोग अँधेरे के खि़लाफ़ लड़ रहे हैं, वह उनकी कुंठा है? हिन्दी के परिसर में कुंठा क्या है? मैं या कोई जो अवा-सवा के दरबार में नाच-गाने का प्रोग्राम नहीं करता है, कुंठित है? जो कोई भी साहित्यिक पुरस्कार नहीं लेता है, कुंठित है? जो  बार-बार दिल्ली नहीं जाता है, कुठित है? जो नामवर सिंह से लेकर अपने-अपने शहर के चुत्थड़ों तक की पालकी नहीं ढोता है, कुंठित है? क्या हमारे समय में कुंठित होने की परिभाषा बदल दी गयी है? जो स्वाभिमानी है, वह कुंठित है? जो साहित्य की किसी भी भ्रष्ट सत्ता से डरता नहीं है, वह कुंठित है? जो दस जगह नाचने की जगह अपने ठीहे पर बैइकर साहित्य की साधना करता है, कुंठित है? जो साहित्य के मठाधीशों औा उपमठाधीशों के सुबह-शाम चूतड़ नहीं धुलता है, कुंठित है? बताओ भाई, बोलो? पहले अपने गिरेबान में देखकर तब किसी को कुछ कहना चाहिए। दिल्ली में रहने का अहंकार बिल्कुल नहीं होना चाहिए। कोई कमतर लेखक हिन्दी के अपने समय के किसी विद्रोही लेखक को अपने जैसी स्थिति में नहीं कर पा रहा है, उसके तेज को, उसके साहस को, उसके तर्कों को, उसके प्रहार को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है, तो उस विद्रोही कवि को कुंठित है कहकर, मार देगा? उसमें इतनी शक्ति संभव है, शक्ति होती तो पालकी ढोने का काम क्यों करता? जिसे बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हो यह उसकी गलती नहीं है, खुद को उन्नत करो, वीर बनो, वीर नहीं बन सकते, तो हिन्दी के पुरखों से वीरता के कण लो, उनके जैसा बन नहीं सकते तो कम से कम उनके रास्ते पर चल तो सकते हो। ऐसा कुछ नहीं कर सकते हो, तो कम से कम घमंड तो मत ही करो। घमंड की आग ईर्ष्या की आग से तेज होती है, इस आग में जल जाओगे। फिर अवा हो या हवा, कोई नहीं बचा पाएगा। विष्णु नागर को देखो, गणेश पाण्डेय के खिलाफ कविता नहीं लिखते हैं। साहित्य की किसी भ्रष्ट सत्ता के विरोध में कविता नहीं लिखते है। तुम तो एक गणेश पाण्डेय को बर्दाश्त नहीं कर सकते हो, विष्णु नागर देश की सबसे बड़ी सत्ता को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। उनका स्तर तुमसे बड़ा है। यह विष्णु नागर का घमंड नहीं है कि देश की सबसे बड़ी सत्ता को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं, उसके खिलाफ कविता लिखते जा रहे हैं, दरअसल वह अपनी राजनीतिक पार्टी के लिए खुलकर खेल कर रहे हैं। कहने वाले कह सकते हैं कि अशोक वाजपेयी की लाइन को मजबूत करने के लिए खेल रहे हैं या परोक्ष रूप से उनके लिए ही खेल रहे हैं। यह अलग बात है कि वे इस खेल से अपनी कविता को कमजोर कर रहे हैं। दरअसल विष्णु नागर के सामने न घमंड का संकट है, न मूर्खता का, बल्कि ईमान का संकट है। कोई लेखक जीवन में बेईमानी करता है, तो कभी कुछ देर के लिए या हमेशा के छिप भी सकती है, लेकिन कविता में की गयी छोटी से छोटी बेईमानी भी नहीं छिप पाती है। उनकी मोदी विषयक कविताओं को देखिए। जब आदमी बेईमानी के रास्ते पर चलप पड़ता है तो दूर तक चलता चला जाता है, पीछे मुड़कर नहीं देखता है। मोदी विषयक कविता में वे एक कविता में लिखते हैं-
मोदी के घर में उसके कई सेवक है 
उसका वहां कोई भाई कोई बहन नहीं है
उसके आंगन में खेलता कोई बच्चा नहीं है

ध्यान देने की बात है कि क्या विष्झा नागर को यहां यह नहीं कहना चाहिए था कि न तो परिवारी जन घर में हैं, न उनकी पार्टी में। न कोई भाई या बहन या मां संसद में सदस्य है, लेकिन ऐसा लिखते तो यह बात विष्णु नागर की पार्टी के खिलाफ चली जाती। असल में उनके निशाने पर केवल एक पार्टी है, बल्कि कहना चाहिए कि केवल एक राजनेता है। मैं साहितय की सत्ता का विरोध करता हूं तो सबका करता हूं। आगे देखिए विष्णु नागर लिखते हैं-
किसी दिन उसे उलटी आ जाए
तो उसकी पीठ सहलाने वाला कोई नहीं है
ध्यान यहां भी दीजिए कि राहुल के साथ भी तो यही स्थिति है, लेकिन बिष्णु नागर को मूतबूत विपक्ष की चिंता नहीं है, सारे विपक्षी दल एक हो जाएं, इसकी चिंता नहीं है, सारे लेखक संगठन एक में मिल जाएं, इसकी भी चिंता नहीं है, उनकी चिंता में केवल यह है कि मोदी हट जाएं, राहुल आ जाएं। यह एक कवि की ईमानदारी नहीं है। एक ईमानदार कवि इतना दृष्टिहीन नहीं हो सकता है कि किसी चलती हुई गाड़ी से चालक को इसलिए हटाना चाहे कि वह उसकी पार्टी का नहीं है। कांग्रेस पार्टी का एक कार्यकर्ता ऐसा चाह सकता है, लेकिन एक कवि को राजनीति को समग्रता में देखना होता है। मेरी कविता ‘सबद एक पूछता’ में राजनीति के परिदृश्य को समग्रता में देखने की कोशिश की गयी है। विष्णु नागर ऐसी कोशिश नहीं करते है। कविता में की गयी बेईमानी, सिर्फ कवि का ही नुकसान नहीं करती है, बल्कि अपपने समय कविता का भी नुकसान करती है। दरअसल वे मोदी विषयक अपनी कविताओं में कविता नहीं, भड़ास लिख रहे है। 
     अशोक वाजपेयी के भक्त उन्हें हमारे समय की कविता का भगवान मानते हैं। मज़े की बात यह कि भगवान अशोक ने अपने भक्तों को कविता और भड़ास में फ़र्क़ करना नहीं सिखाया है। जबकि उनके शिविर या छत्रछाया से दूर रहने वाले लोगों को पता है। कैलाश नीहारिका को भी यह फ़र्क़ मालूम है। तभी तो मेरी कविता ‘सबद एक पूछिबा’ पर, जिसे विष्णु नागर को पढ़ने के लिए ख़ासतौर से पोस्ट किया था, नीहारिका जी कहती हैं- सीने में धधकती आग को रचनात्मक ऊर्जा में बदलने और भड़ास निकालने का फ़र्क समझाती है यह कविता। कवि ने अदभुत धैर्य से अपने साधनहीन समाज को क्रूर राजनीतिक विद्रूपता के हाथों कुचले जाने की विभीषिका को बेजोड़ खरी शिद्दत से उजागर किया है। प्रणाम !’ दूसरी ओर शिवकिशोर तिवारी विष्णु नागर की मोदी विषयक कविताओं पर कहते हैं- विष्णु नागर की कविताएं मैंने भी देखीं-देहाती टाइप की रंड़हो पुतहो है। उनकी मंडली मे यह सब पसंद किया जाता होगा। शिवकिशोर तिवारी ने उचित कहा है। विष्णु नागर की साहित्यिक मंडली भी, कांग्रेस भक्त है। यह कांग्रेस न वह कांग्रेस है, न आज कोई श्रीकांत वर्मा है। वैसे भी श्रीकांत वर्मा ने दूसरे राजनेताओं का मज़ाक़ उड़ाने के लिए उन पर कविताएँ नहीं लिखी थीं। जगह बनाने के लिए कोई ऐसा-वैसा काम नहीं किया था। आज हिन्दी के लेखक जिस तरह थोक में कांग्रेसी हुए हैं, उन्हें देखकर मेरा भी मन कर रहा है कि किसी पार्टी में शामिल हो जाऊँ, लेकिन कोई मुझे अपनी पार्टी में शामिल ही नहीं कर रहा है। एक लेखक को अपनी दलीय राजनीतिक निष्ठा को कभी भी लिखने की मेज पर कुंडली मार कर बैठ नही जाने देना चाहिए। हिन्दी में बहुत अच्छी राजनीतिक कविताएं लिखी गयी हैं, लेकिन उन्हें लिखने वाले बेईमान लेखक नहीं थे। मुक्तिबोध आज होते तो आज की राजनीति को समग्रता में नहीं देखते? अशोक वाजपेयी राजनीतिक रूप से कहीं सेटल हो जाएं, राजदूत हो जाएं, राज्यपाल हो जाएं, कोई भी बड़ा पद पा जाएं और मंडली का कारोबार थोड़ा और बेहतर हो जाए, मुक्तिबोध अपनी दृष्टि को इतना संकुंचित नहीं करते। जाहिर है, वे बार-बार आजमाई गयी पार्टियों से अलग सोचते। किसी पार्टी का अंधभक्त नहीं बनते। साहित्य की किसी मंडली, गैंग, लेखक संगठन वगैरा के भी अंधभक्त नहीं बनते। वे ईमान की बात करते। 


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    आज ईमान, स्वाभिमान, साहस, धीरज, सच्चाई, न्याय जैसे तमाम मूल्यों के लिए लेखक के जीवन में कोई जगह नहीं है। वह मठाधीश का चूतड़ धुलता है और इस बात पर घमंड करता है। गणेश पाण्डेय की जगह हिन्दी के पुरखे भी आकर साहित्य के भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठाएँ, अशोक वाजपेयी को साहित्य में गंदगी फैलाने वाला कहें तो अवा के राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर के चापलूस, उनका मुँह तोड़ देना चाहेंगे। उन्हें उस हिंदी की फ़िक्र नहीं है, जो आईसीयू में है। जिसके गले से घरघराहट की आवाज़ आ रही है। इन अहंकारियों और बेईमानों को कुछ नहीं सुनाई दे रहा है, न कुछ दिखाई दे रहा है। वे पुरस्कार के आसन से नीचे उतरकर साहित्य का सच देखना ही नहीं चाहते कि आज हिन्दी किन मुश्किलों से गुज़र रही है। हिन्दी के पाठकों का पलायन हो रहा है, नये पाठकों का जन्म नहीं हो रहा है, जो नये पाठक पैदा हो भी रहे हैं, तो हिन्दी के गंभीर साहित्य के आँगन में नहीं। वे तो लोकप्रिय लेखकों की झोली में फाट पड़ रहे हैं। अशोक वाजपेयी हों या अशोक महेश्वरी, इन्हें पता नहीं कि रज़ा फाउंडेशन और राजकमल के उत्सव के मंचों पर हिन्दी का समस्त संसार नहीं है। एक छोटा हिस्सा है। पुरस्कार की धुन और रज़ा फाउंडेशन के पैसे की खनक पर मस्तानी चाल में कैटवॉक करने वाले लेखक, असली लेखक नहीं हैं। पुरस्कार, चर्चा, मंच, माइक, माला वाले लेखक, नक़ली लेखक हैं। इन्होंने वह नहीं लिखा है, जो नये पाठक संसार को हिन्दी के गंभीर साहित्य के आँगन में खींच लाए। उसके जन्म पर गंभीर साहित्य के आँगन में सोहर गाए जाएँ। जिस आँगन में पुरस्कार मिलने पर सोहर गाए जाएँगे और पब्लिकेशन हाउस हारमोनियम और ढोलक बजाएगा, तिलक लगाएगा, उस आँगन में हिन्दी के पाठकों की नई पौध नहीं आएगी। आएगी भी तो लौट जाएगी। उसे पुरस्कार की चाँदी नहीं, हिन्दी का दूध चाहिए, प्रसाद चाहिए, प्यार चाहिए। प्यार पर ज़बरदस्त किताबें चाहिए। छः सौ पेज का उपन्यास अशोक महेश्वरी आज ख़ुद पढ़ने की स्थिति में हैं? किसी भी दिन पूरा दैनिक अख़बार पढ़ते हैं? नया पाठक फासिस्टों के विरोध में लिखी कविताओं का अचार डालेगा? कविता, कवि की निजी सम्पत्ति नहीं है। जिसमें वह तहख़ाने पर तहख़ाने, सुरंगें और ऊपरी मंज़िल में भूलभुलैया वग़ैरा बनाये। ऐसा करने वाले सावधान हो जाएँ, कविता को बाँदी न समझें। कविता का कोई बिगड़ैल कार्यकर्ता पीट देगा, कोई न पीटे तो भी वक़्त पीटकर पटरा कर देगा। सोचिए आज कोई ऐसी कविता लिखता है, जिसे समझने के लिए शब्दों के अर्थ फ़ुटनोट में देखने की ज़रूरत पड़े, दस लाइन की कविता में बीसियों शब्दों के अर्थ देखने पड़े, तो ऐसी कविता के साथ तो सलूक बुरा होगा ही, कवि के साथ कितने डिग्री का सलूक होना चाहिए? अरे भाई, पूछना तो पड़ेगा कि कवि जी कविता लिख रहे हैं या जलेबी छान रहे हैं। कविता के साथ कवि के इस बुरे बर्ताव के लिए क्या सज़ा हो? सच तो यह कि शब्दकोशी कवि हिन्दी के आंतकवादी हैं। अशोक महेश्वरी को भी सोचना चाहिए कि उन्हें खुद पढ़नी हों तो कैसी कविता पढ़ेंगे? राजकमल प्रकाशन साहित्य की दुकान है, मार्क्सवाद की दुकान नहीं है। मार्क्सवादी कविता हिन्दी की कुल कविता नहीं है। दुकान में मेल का एक आइटम है, सारी दुकान नहीं। लोक में कबीर, तुलसी, सूर, मीरां  की सहज कविता मौजूद है या कठिन कविता? यह बिना किसी शब्दकोश और साहित्यकोश के समझ में आने वाली कविता है या संस्कृत और फ़ारसी के कठिन शब्दों को ठूँसकर महान बनने के चक्कर में लिखी गयी कविता है? क्या कठिन कविता का प्रेत बनकर आज ज़रूरी कवि होना संभव है, कुछ कवि महाकवि बनने की असाध्य एषणा और मूर्खतावश अपनी काव्यभाषा को दुरूह बनाते हैं? ऐसे कवि  हिन्दी के पाठकों की पीठ में छुरा घोंपते हैं। ऐसे कवियों के प्रशंसकों की अक़्ल पर भी पत्थर पड़ा हुआ है, जिन्हें ’शब्दकोशी कवियों’ से न सिर्फ़ प्रेम है, ऐसे कवियों को महान समझने की बीमारी भी है। आलोचक और संपादक को पाठक का वकील होना चाहिए, नक़ली कवियों का दलाल नहीं। अंत में यह कि हिन्दी साहित्य में महान लिख दिया गया है, बाक़ी नहीं है। लिखना ही चाहते हैं या लिखे बिना रह नहीं सकते हैं, तो अपने समय का बहुत ज़रूरी लिखिए, सही भाषा में लिखिए। 
     अशोक महेश्वरी को यह भी सोचना चाहिए कि लेखक संगठन पाठक पैदा करेगा या कार्यकर्ता या चापलूस? आलोचना पत्रिका, नये पाठक पैदा करेगी? या मार्क्सवादियों के अहंकार और मूर्खता को पुष्ट करेगी? आलोचना को लेखक संगठनों से जुड़े संपादक नहीं, साहित्य में नीर-क्षीर विवेक वाले संपादक चाहिए। नये पाठकों के बारे में ये बड़े पब्लिकेशन हाउस ढंग से सोचेंगे नहीं तो चालीस-पचास साल बाद बहुत मुश्किल होगी। कई तरह की चुनौतियां, गंभीर साहित्य छापने वाले सिर्फ राजकमल ही नहीं, वाणी प्रकाशन और दूसरे तमाम बड़े प्रकाशनों के सामने पैदा होंगी। आज बिल्कुल नये प्रकाशक लोकप्रिय लेखकों की किताबें छापकर चुनौती दे भी रहे हैं। हिन्द युग्म से लोकप्रिय साहित्य की एक आँधी चली है। गंभीर साहित्य छापने वाले राजकमल, वाणी आदि बड़े प्रकाशनों को ध्यान देना होगा कि पाण्डुलिपियों के चयन में मामले में उनके यहां कुछ गलत तो नहीं हो रहा है। संबंधों और पुस्तक संपादकों की मिलीभगत से कमजोर और ठस किताबें तो नहीं छप रही है। कृतियों की भाषा, सम्प्रेषणीय है या नहीं। पाठक के दिल तक पहुंचती है या नहीं। जटिल और नीरस तो नहीं है। तमाम कृतियों के साथ ऐसी समस्या है। सामने एक नई आँधी है। सुरेंद्र मोहन पाठक के दौर की आँधी नहीं है। बिल्कुल नई आँधी है और उसका तौर-तरीक़ा नया है। नया प्रकाशक पटना में अपने लेखकों की किताबों को जन-जन, ख़ासतौर से जेन जी तक ले जाने के लिए जी जान लगा दे रहा है। एक बिलकुल नयी खिड़की दिख रही है। पटना में हाल ही में एक जलसे में ऐसा 8माहौल था कि कोई भी बुजुर्ग थोड़ी देर के लिए युवा हो जाए, पुराने से नया हो जाए, उसी जलसे में नरेश सक्सेना माउथआर्गन बजा रहे थे। उसी जलसे में एक लोकप्रिय युवा लेखक मृणाल नीलोत्पल आर्केस्ट्रा पर बाकायदा सोहर गा रहा है- 
‘‘भूअर भूअर बाल रे होरिलवा के /फूलल फूलल गाल रे होरिलवा के /बबुआ के बूआ हई छेना के मिठाई /फूफा करिया रसगुल्ला होरिलवा के’’
    एक बड़ी चुनौती पैदा हुई है। भीड़ देखिए। जेन जी या बिल्कुल नये पाठक झूम रहे है। यह समय हिन्दी साहित्य के लिए खतरे की घंटी है। पुराने प्रकाशक नई आहट को समझेंगे नहीं, तो हिन्दी का नुकसान होगा। उन्हें पाठकों तक पहुंचना होगा। हिन्दी में साहित्य छापने वाले, राजकमल समूह, वाणी प्रकाशन समूह और दूसरे प्रकाशकों को सचेत हो जाना चाहिए, अपने-अपने पुस्तक-संपादकों और सलाहकारों के दिमाग से सोचना बंद कर देना चाहिए। संपादकीय विभाग के लोग राजकमल जैसे बड़े प्रकाशन के आयोजनों को मजाक बना दे रहे हैं। मंच पर दस साल बड़ी लेखिका अपने से दस साल छोटे कवि के संग्रह पर उसका इंटरव्यू कर रही है। बात कर रही है। दस साल बड़़ा लेखक यही काम दस साल छोटे लेखक के साथ कर रहा है। जावेद अख्तर पुरुषोत्तम अग्रवाल से दस साल बड़े तो होंगे ही। प्रत्यक्षा भी अरुण से नौ-दस साल बड़़ी होंगी। मंच के लिए पागल ल्रेखक कुछ भी करने के लिए तैयार हैं। आज साहित्य के मंचों पर शिष्टाचार, छोटे-बड़े का लिहाज, कोई सामाजिक मूल्य नही ंरह गया है। आज जितना संकट पाठकों और साहित्य के भविष्य का है, वह अचानक आसमान से नहीं फाट पड़ा है। लेखक के जीवन में मूल्यों की अनुपस्थिति से जुडा हुआ है। एक उदाहरण देकर अपनी बात खत्म करूंगा। पिछली दिल्ली यात्रा में एक प्रकाशक से प्रीतिकर बातचीत हुई। कहानी है, लेकिन कहानी नहीं सुना रहा हूं। सिर्फ यह बता रहा  हूं कि उस अच्छी बातचीत में मैंने कहा कि कोई अच्छा लिखेगा या बहुत अच्छा लिखेगा, तो सौ बार यहां क्यों आएगा! आशय यह कि खराब लिखने वाले प्रकाशकों के दुकान की मिट्टी खन डालते है। पुस्तक संपादकों की चापलूसी करते हैं। जाहिर है, जब यह सब होगा तो उससे हिन्दी साहित्य प्रभावित होगा। कुछेक बड़े प्रकाशकों के लिए कुछ लेखक बाकायदा दलाल की भूमिका में दिखते हैं। उनके कान भरते है। स्वाभिमानी लेखकों के विरुद्ध साजिश करते हैं। जाहिर है कि स्वाभिमानी लेखक साहित्य की इस इस घुड़दौड़ से बाहर रहना पसंद करेंगे। स्वाभिमानी लेखक रजा फाउंडेशन के आयोजन में जाने के लिए या उनसे दस फायदे के लिए अशोक वाजपेयी को भी अपना पिताश्री नहीं बनाएगा। असल में स्वाभिमान का एंकांतवास और अहंकार का नंगा नाच आज साहित्य के पर्यावरण की सबसे बड़ी समस्या है। स्वाभिमान के अमृत को बचाने की चिंता बड़ी चिंता है। स्वाभिमान अपने ठीहे पर बैठा हुआ है और नाचने-गाने का प्रोग्राम करने का घमंड हिन्दी साहित्य की पूरी दुनिया कों फतह कर रहा हैं। ऐसा दृश्य पैदा कर रहा है कि असली हिन्दी साहित्य वही है। जबकि ऐसा है नहीं।       





गुरुवार, 30 जुलाई 2026

हिन्दू और हिन्दी कविता के शत्रु

- गणेश पाण्डेय

शुरू में ही स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं धर्म के सकारात्मक पहलू की इज़्ज़त करता हूँ। कोई भी धर्म हो। धर्म मनुष्य के उन्नयन का मार्ग है। धर्म का काम मनुष्य और मनुष्य में भेद करना नहीं है। धर्म का काम राजनीति करना नहीं है। भक्तिकाल में भक्ति किसी की सरकार को गिराने या बनाने का ज़रिया नहीं है। भक्तिकाल में जिस मुक्ति की बात की गई है, वह कोई साधारण मुक्ति नहीं है, असाधारण है। आध्यात्मिक मुक्ति है। उस मुक्ति के लिए धर्म का नकारात्मक इस्तेमाल नहीं किया गया है। न धर्म की राजनीति की गई है, न धर्म को दंगा-फसाद का ज़रिया बनाया गया है। इसी काल में सामाजिक मुक्ति की भी बात की गयी। धर्म के आडम्बर और अंधविश्वास की तीव्र आलोचना की गयी। भक्तिकाल के कवियों के सामने कविता के बहुत ऊँचे उद्देश्य थे। वे कवि न तो पाँच सौ रुपये के भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार के लिए कविता लिख रहे थे, न साहित्य अकादेमी के लखटकिया पुरस्कार के लिए, न उन्हें किसी लिटफेस्ट के मंच पर पहुँचने की जल्दी थी, न किसी लेखक संगठन या रज़ा फाउंडेशन में भर्ती होने की। वे आज के दो कौड़ी के चुत्थड़ साहित्य-प्रभुओं को जानते ही नहीं थे। साहित्य के केंद्रों में मत्था टेकने नहीं पहुँव जाते थे। दो कौड़ी के जलेस, प्रलेस, जसम की चटाई पर बैठने के लिए मरे नहीं जाते थे। इन लेखक संगठनों के पदाधिकारियों, हाथी जैसे राजकमल प्रकाशन के घोडे जैसे पुस्तक संपादकों और आलोचना पत्रिका और उसके कविता के कातिल संपादकों को भी नहीं जानते थे। वे तो सच्चे शब्द-साधक थे, जीवन की उच्चतर भाव-भूमि के प्रेमी। वे तो सपने में भी नहीं सोच सकते थे कि कभी किसी दौर में युवा कवियों को कविता की सही राह दिखाने की जगह गुमराह भी किया  जा सकता है।  
     क्या कविता का काम किसी एक धर्म और किसी एक जाति को नायक और दूसरे को खलनायक बनने का है क्या यह सच है की कोई एक खास धर्म है या कोई एक खास जाति है जिसमें आक्रामकता है, सांप्रदायिकता है, कट्टरता है और दूसरी जाति बिल्कुल दूध की धुली है? क्या ऐसा है? जाहिर है कि ऐसा नहीं है। ऐसा नहीं है कि अल्पसंख्यक बहुत बुरे हैं और बहुसंख्यक बहुत अच्छे हैं या बहुसंख्यक बहुत बुरे हैं और अल्पसंख्यक बहुत अच्छे हैं। ऐसा मानना दृष्टिहीनता और ईमान की सीमा का परिचायक है। जाहिर है कि ऐसा मानने वाला लेखक, लिखने की मेज पर स्वतंत्र नहीं होता है बल्कि जिस लेखक संगठन से जुड़ा होता है, उसके कार्यकर्ता के रुप में काम कर रहा होता है। उसे पता ही नहीं होता है कि विचारधारा पहले भी थी, लेखक पहले भी थे। क्या रामविलास शर्मा मार्क्सवादी समझ नहीं रखते थे? रामविलास शर्मा को छोड़ो। कबीर तो मार्क्स से बहुत पहले ही पैदा हो गए थे? और आज क्या लेखक संगठनों से दूर मार्क्सवादी समझ वाले या प्रगतिशील दृष्टिसंपन्न लेखक नहीं हैं?
       ओह, कितने ऐसे आलोचक हैं जो सचमुच साहित्य का सच फटकार कर कहना चाहते हैं या कह सकते हैं मुझे तो देखने में आता है कि हिंदी के अधिकांश आलोचक साहित्य का सच कहने की पात्रता ही नहीं रखते हैं रचना के सच और आलोचना के सच से उनका कोई वास्ता ही नहीं हैं वे झूठ के पुतले हैं। ऐसे मुश्किल वक्त में एक ईमानदार आलोचक का क्या काम है? वही जो कभी कबीर जैसे कई का काम था। लटृठ उठाओ और बरसाओ तब से बेईमान समझेंगे। यह बातों से नहीं समझेंगे। डांटना-डपटना पड़ेगा, फटकारना पड़ेगा तब शायद कुछ समझें। 
    पिछले 50 साल की आलोचना संबंधों के आधार पर लिखी गई आलोचना है। मैंने एक बार अपने एक आलोचक मित्र से कहा कि तुम जिस रास्ते पर हो उसे रास्ते पर परमानंद श्रीवास्तव से आगे नहीं जा सकते हो, अगर तुम्हारी सीमा वही है अगर तुम्हारा उद्देश्य वही है अगर तुम्हारी क्षमता वही है तो फिर तुम गादर बैल हो, मेरे साथ नहीं चल सकते। हालाँकि परमानंद श्रीवास्तव कोई मील का पत्थर नहीं हैं, बल्कि उनका उदाहरण आलोचना की सीमा को बताने के लिए है। परमानंद जी ने मुझे पढ़ाया है। बहुत अच्छे अध्यापक थे। गोरखपुर के हिन्दी विभाग के संदर्भ में आसपास के लेखकों में दो बहुत अच्छे और बहुत ख़राब अध्यापकों का नाम उदाहरण के रुप में देना हो तो अच्छे में परमानंद श्रीवास्तव का नाम लूँगा और ख़राब में विश्वनाथ प्रसाद तिवारी का। विश्वनाथ जी पर कहीं और किसी और प्रसंग में याद करेंगे। यहाँ बात परमानंद जी की। परमानंद जी की आलोचना भाषा जहाँ पूर्वार्द्ध में जलेबी जैसी गोल-गोल घुमावदार है, वहीं उत्तरार्द्ध में वे अपनी आलोचना की भाषा को माँजते हैं, लेकिन आलोचना के सरोकार वही रहते हैं। वही संबंधों के आधार पर की गयी प्रशंसामूलक आलोचना। आगे चलकर सभी नये आलोचकों ने भी प्रशंसामूलक आलोचना की पताका फहराने का काम किया। कुछ ने तो ऐसी बंद अर्थात जपाट भाषा में प्रशंसामूलक आलोचना लिखते समय आलोचना की ही नहीं, जिसकी कविता की आलोचना की है, उसकी भी टाँगे तोड़ दी है। सविता सिंह की कविताओं पर रविरंजन का मनोरंजन देख सकते हैं। सुना है, उन्होंने कई मामूली से भी नीचे के कुछ और कवियों पर ए आई की कृपा से ़त्रैलोक्य-विकंपित आलोचना लिखी है। दस पंकि्ंतियों बहुत औसत कविताओं पर सौ-सौ पेज की आलोवना जैसी चीज़ लिखी है। इतना फैलकर तो रामविलास शर्मा ने निराला की कवितओं पर नहीं लिखा है। उदाहरण भी देते चलना ज़रूरी होता हैं। ख़ैर। आगे बढ़िए। आलोचना के धर्म पर बातें भी होंगी, लेकिन कविता में आतंकवादियों की तरह घुसपैठ करने वाले धर्म के ख़तरनाक रंग पर बात करना इस ममय सबसे ज़़रुरी है।
  कोई कवि हिन्दुओं की माँ-बहन करने लगे या कोई बिल्कुल नया कवि हामिद की तरह इस उम्र में कविता के मेले में चिमटा ख़रीदने की समझदारी दिखाने जगह जालीदार टोपी पहनकर ंअरबी-फारसी के कठिन शब्दों की तलवार चमकाने लगे या हिन्दुओं की स्त्रियों नंगा करने लगे तो उस पर बोलना बहुत ज़रुरी है। कविताओं पर ऐसे ही बोलकर आगे बढ़ जाना और उदाहरण न देना बेईमानी होगी। ज़ा़हिर है कम से कम किसी एक कवि का नाम भी देना ज़़रुरी होगा। संयोग देखिए, नाम की पर्ची भी निकली तो राजकमल प्रकाशन के संपादकीय विभाग के एक सदस्य की। नही-नहीं, मैं सत्यानंद निरूपम का नाम नहीं ले रहा हूँ। पता नहीं वे कुछ लिखते भी हैं या नहीं, उन्हें तो मैं हिन्दी के अलेखक के रुप में जानता हूँ। हिन्दी में उनके काले कारनामों पर फिर बात करेंगे। यहाँ आर चेतनक्रांति और उनकी एक कविता ‘हिन्दू देश में यौन क्रांति’ पर बात करुँगा। हिन्दी के बड़े संयोगों में से एक संयोग और राजकमल प्रकाशन के नाम है। असल में जिस ‘शोकनाच’ सुंग्रह में ‘हिन्दू देश में यौन क्रांति’ कविता शामिल है। यह कविता निश्चय ही हिन्दू-विरोधी कविता है। हिन्दुओं को लज्जित करने वाली कविता है। हिन्दुओं की माँ-बहन करने वाली कविता है। इस कविता को देखने के बाद कोई भी ईमानदार आलोचक ख़ुद को ग़़ंस्सा होने से रोक नही सकता। इसका मतलब यह नहीं कि किसी कवि को नुकसान पहुँचाने के लिए ऐसा कह रहा हूँ। यहाँ सिर्फ ऐसी कविताओं से बनने वाली प्रवृŸा पर चोट करना है। आर चेतनक्रांति को राजकमल प्रकाशन की नौकरी से बर्ख़ास्त करने की माँग करना उद्देश्य नहीं है। जैसा कि कुछ अपराधी प्रवृŸा के लेखकों ने पिछले दिनों अविनाश मिश्र के संदर्भ में किया था। मैं न तो राजकमल प्रकाशन का शत्रु हूँ, न राजकमल प्रकाशन के संपादकीय विभाग के सदस्यों का शत्रु हूँ। अलबŸा, यह ज़रूर चाहता हूँ कि अशोक महेश्वरी इस बात पर ध्यान दें कि उनकी छवि कैसी बन रही है? क्या उन्होंने जानबूझकर अपने प्रकाशन की हिन्दू-विरोधी छवि बनने दी है? बहरहाल आर चेतनक्रांति की कविता ‘हिन्दू देश में यौन क्रांति’ देखिएः
हिन्दू देश में यौन-क्रांति
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मर्दों ने मान लिया था
कि उन्हें औरतें बाँट दी गईं
और औरतों ने
कि उन्हें मर्द
इसके बाद विकास होना था
इसलिए
प्रेम और काम, और क्रोध और लालसा और स्पर्द्धा,
और हासिल करके दीवार पर टाँग देने के पवित्र इरादे के पालने में
बैठकर सब झूलने लगे
परिवारों में, परिवारों की शाखाओं में
कुलों और कुटुंबों में जातियों-प्रजातियों में
विकास होने लगा
जंगलों-पहाड़ों को
म्याऊँ और दहाड़ों को
रौंदते हुए क्षितिज-पार जाने लगा
इतिहास के कूबड़ में
ढेरों-ढेर गोश्त जमा होने लगा
पत्थर की बोसीदा किताब से उठकर डायनासोर चलने लगा
कि यौवन ने मारी लात देश के कूबड़ पर और कहा
रुकें, अब आगे का कुछ सफ़र हमें दे दें
पहले स्त्री उठी
जो सुंदर चीज़ों के अजायबघर में सबसे बड़ी सुंदरता थी
और कहा, कि पेडू में बँधा हुआ यह नाड़ा कसता है
कि क़ीमतों का टैग आप कहीं और टाँग लें महोदय
इस अकड़ी काली, गोल गाँठ को अब मैं खोल रही हूँ
सुंदरता ने असहमति के प्रचार-पत्र पर
सोने की मुहर जैसा सुडौल अँगूठा छापा और नाम लिखाकृअतृप्ति
कूबड़ थे जिनमें अकूत धन भरा था
कुएँ थे जिनमें लालसा की तली कहीं न दिखती थी
पर सुंदरता का दावा न था कि वह इस असमतलता को दूर करेगी
इरादों की ऋजुरैखिक यात्रा में वह थोड़ी अलग थी
उसने एक नई धरती की भराई शुरू की
जो सितारे की तरह दिखती थी
चाँद की तरह
जिसकी मिट्टी में गुरुत्व नहीं था
जिसके ऊपर, नीचे, दाएँ, बाएँ आसमान था
तो भी घर-घर में एक इच्छा जवान होती थी
कि बेशक अमेरिका के बाद ही
पर एक दिन हम भी वहाँ जाकर रहेंगे
आँगन-आँगन कामना का इस्पात घिसता था
बुझी-गीली राख में रात-दिन
और तश्तरी की धार तेज़ होती जा रही थी
तश्तरी घूमती थी और काटती थी
घूम-घूमकर काटती कतरती थी ककड़ियों-खरबूजों की तरह
हिंदू देश में हिंदुओं को
अपनी सांस्कृतिक दुविधाओं में खड़े
वे खच-खच कटते थे
अपनी विविधताओं में बुझे मोतियों से जड़े
धर्म के सुविधाजनक-उपेक्षित पिछवाड़े पड़े
वे चमार, लुहार, कुम्हार
ब्राह्मण, बनिये, सुनार
कहीं न थी पूरी तलवार
केवल धार
सड़क पर चिलचिलाती धूप में लहराती
निमिष-भर को दिखती
और खरबूजों-तरबूजों की तरह फले-फूले
और पाला खाई टहनियों-से सूखे-तिड़के
मर्दों के मेदे में उतर जाती
मनु का देश काँखता खड़ा रह जाता
और वह अगली धूप में पहुँच जाती
सारे पांडव, सारे कौरव, सारे राम, सारे रावण
अपने रचयिताओं को पुकारते युद्ध से बाहर हुए जाते थे
दूर खड़े अपने हथियार चमकाते
चरित्रवान आत्माओं को जगाते कहते,
यौवन ने मचा दिया ध्वंस
कल तक कैसे शांत खड़ी लहराती थी संयम की फ़सल
आह, इतने आक्रामक तो न थे हिंदू आदर्श
ये तो रास्ता छेंककर खड़ी हो जाती है
ये कौंधती टाँगें,
ये सुतवाँ नितंब, ये घूरते स्तन, ये सोचती-सी नाभि
सर्वत्र प्रस्तुत कि जैसे हाथ बढ़ाओ, छू लो, खा लो
पर इरादा कर बढ़ो तो... अरे सँभालो...
यही क्या हिंदू सौंदर्य है!
चकित थे हिंदू
बलात्कार की विधियाँ सोचते, घूरते, घात लगाए, चुपचाप देखते, सन्नद्ध
कि भीम के, द्रोण के देश में जनखापन छाया जाता है
कि एक ही आकृति में स्त्री आती है और पौरुष जाता है
कि दृश्य यह अद्भुत है
पूछते विधाता से हाथ जोड़कर प्रार्थना में
और शाखा में पवन-मुक्तासन बाँधकर संचालकजी से
कि इस दृश्य का लिंग क्या है, प्रभो! 

   इससे पहले कि मैं इस कविता पर कुछ और कहूँ, वरिष्ठ आलोचक शिवकिशोर तिवारी, इस कविता को किस नज़रिए से देखते हैं, आप भी देखिए- ‘आज एक मित्र ने यह कविता भेजी। आपको खुफिया तौर पर बता रहा हूँ , यह कविता काक्रोच जनता पार्टी का दस्तावेज है। आदिकाल से लेकर इस काल तक का वर्णन इस कविता में किया गया है। यह वर्णन हिन्दू जाति पर केन्द्रित है, अर्थात् विवाह- संस्था, परिवार, क्लैन, कास्ट आदि की अवधारणाएं केवल हिन्दुओं में पैदा हुईं। फिर कैपटलिज्म भी पहले हिन्दुओं में आया - “ इतिहास के कूबड़ में ढेर-ढेर गोश्त’। फिर क्रांति आई जिसका उपोद्घात हिन्दू नारियों के नाड़ा खोलने से हुआ। फिर स्त्री-पुरुष की बायनरी खतम हो गई; जैसे चेतन नामक मर्द और क्रांति नामक स्त्री गड्डमड्ड हो गये - तब काक्रोच आन्दोलन का जन्म हुआ - हमारा लिंग, हमारी च्वाइस! इस तरह हिन्दुओं को ठीक कर दिया गया। अब आर एस एस वाले परेशान हैं!’ असल में तिवारी जी का यह कथन दो मित्रों के बीच कुछ-कुछ गंभीर और कुछ-कुछ व्यक्तिगत बातचीत जैसा है। उन पर अधिकार है। जानता हूँ, तिवारी जी की साहित्य-निष्ठा और शुभचिंता असंदिग्ध है। मेरा ध्यान तिवारी जी के इस हिस्से पर है कि आदिकाल से लेकर इस काल तक का वर्णन इस कविता में किया गया है। यह वर्णन हिन्दू जाति पर केन्द्रित है, अर्थात् विवाह- संस्था, परिवार, क्लैन, कास्ट आदि की अवधारणाएं केवल हिन्दुओं में पैदा हुईं। फिर कैपटलिज्म भी पहले हिन्दुओं में आया - “ इतिहास के कूबड़ में ढेर-ढेर गोश्त’। फिर क्रांति आई जिसका उपोद्घात हिन्दू नारियों के नाड़ा खोलने से हुआ। 
   मुझे भी कहना यही है कि यह कविता हिन्दुओं पर केंद्रित है। हिन्दू स्त्रियों के विरोध लिखी गयी है, बल्कि कहना चाहिए कि इस कविता में हिन्दू स्त्रियों की भयंकर तौहीन की गयी है। हिन्दू स्त्रियों को इस कविता में नंगा कर दिया गयाः
‘यौवन ने मारी लात देश के कूबड़ पर और कहा
रुकें, अब आगे का कुछ सफ़र हमें दे दें
पहले स्त्री उठी
जो सुंदर चीज़ों के अजायबघर में सबसे बड़ी सुंदरता थी
और कहा, कि पेडू में बँधा हुआ यह नाड़ा कसता है
कि क़ीमतों का टैग आप कहीं और टाँग लें महोदय
इस अकड़ी काली, गोल गाँठ को अब मैं खोल रही हूँ

ये कौंधती टाँगें,
ये सुतवाँ नितंब, ये घूरते स्तन, ये सोचती-सी नाभि
सर्वत्र प्रस्तुत कि जैसे हाथ बढ़ाओ, छू लो, खा लो
पर इरादा कर बढ़ो तो... अरे सँभालो...
यही क्या हिंदू सौंदर्य है!’
आगे कवि हिन्दूओं के पवन-मुक्तासन पर ख़ास बल देता हैः
‘चकित थे हिंदू
बलात्कार की विधियाँ सोचते, घूरते, घात लगाए, चुपचाप देखते, सन्नद्ध
कि भीम के, द्रोण के देश में जनखापन छाया जाता है
कि एक ही आकृति में स्त्री आती है और पौरुष जाता है
कि दृश्य यह अद्भुत है
पूछते विधाता से हाथ जोड़कर प्रार्थना में
और शाखा में पवन-मुक्तासन बाँधकर संचालकजी से
कि इस दृश्य का लिंग क्या है, प्रभो!’

हद है कि कवि के दिमाग़ में हिन्दू पुरुष और स्त्रियाँ तो घुसी ही घुसी हैं, शाखा संचालक जी की पाद भी घुस गयी है। शायद कवि कहना चाहता है कि यह संसार की एकमात्र पाद है, कोई और ऐसी पाद नहीं पाद सकता। शायद कवि यह कहना चाहता है, कामरेड कभी ऐसी पाद नहीं पादते। हिन्दी के मार्क्सवादी लेखक और लेखक संगठन के लोग ऐसी पाद कभी पाद ही नहीं सकते है। मतलब यह कि संचालक जी की पाद, पाद है, बाकी सब इत्र छोड़ते हैं। अरे भाई मैंने हिन्दी की दुनिया में हिन्दी के मार्क्सवादी लेखकों को सबसे ख़तरनाक हवा छोड़ते हुए देखा है। हिन्छी की दुनिया बस्सा रही है। सूप बोले तो बोले चलनी क्या बोले जिसमें बहŸार छेद। इस पाद-विचार की ज़रूरत यह बताने के लिए पड़ी कि लेखक अपने गिरोह, अपने गैंग में प्रतिष्ठा अर्जित करने के बहुत प्याज खाने लगता है। आँख, कान, मुँह, हर जगह से मार्क्सवादी प्याज खाने लगता है। हिन्दुओं को जितनी गाली दो, जितना बुरा कहो, उतना ही सम्मान मिलेगा, अवसर मिलेगा, लेखक संगठनों का प्यार मिलेगा। हिमाकत देखिए, हिन्दुओं की यौन-क्रांति दिखती है, अन्य धर्मों की यौन-क्रांति नहीं। जैसे नितंब, स्तन, नाभि आदि अंग किवल हिन्दू स्त्रियों के शरीर में होते हैं, बाकी अन्य धर्मों स्त्रियों के के शरीर में इनकी जगह लोहा-लक्कड़ होता है।
     हिन्दू विरोधी मार्क्सवादी लेखकों ने कविता की हत्या करने से पहले अपने कव्यविवेक की हत्या की है। हिन्दी कविता के भविष्य की हत्या की है। नये कवियों के भविष्य की हत्या की है। कोई कवि तत्सम के कुछ शब्द अपनी कविता में ले आए तो, उसे दौड़ा लेंगे और कोई मुसलमान कवि अरबी-फारसी हिन्दी में लाए तो उसका स्वागत करेंगे। मेरा मतलब आमफहम शब्दों को लाने से नहीं है। अरबी-फारसी के कठिन शब्दों को लाने से है। बिल्कुल युवा कवि अदनान कफील दरवेश का नाम लेना नहीं चाहता था, लेकिन हिन्दी कविता के साथ दिल्ली का एक गैंग जो कर रहा है, उसे बताने के लिए उदाहरण के रूप में नाम लेना पड़ रहा है। मैं इस युवा कवि की प्रतिभा पर संदेह नहीं कर रहा हूँ, बल्कि यह देख रहा हूँ कि उसकी कविता में क्या दिक्कत पैदा हो रही है। उसे हिन्दी के रंग में रंगने से कौन रोक रहा है। उसकी कविता में एक ओर बोली के बहुत प्यारे शब्द- नइहर, सईंतते, सम्हारते, लीपते आते हैं तो दूसरी ओर अरबी-फ़ारसी के कठिन शब्द- बोसीदा, फलक बोस, सब्ज बुर्ज, जाँ-कनी, अजदहा, बयाज, मुलव्विस, शीरफाम, रूहखस मकीन, मुतवज्जेह, नशेब, सरगोशिया, क़दीमी, आहन, क़िबला आदि, मुहावरे में कहूँ तो हजारों। कहना ज़रूरी है कि अरबी-फ़ारसी के कठिन शब्दों की भरमार, अदनान की एक मुस्लिम कवि की छवि बनाते हैं। अदनान को इससे बचने की ज़रूरत है। हिन्दूपन और मुसलमानपन, जीवन में हो तो ठीक, कविता में नहीं। जालीदार टोपी लगाइए या शिखा रखिए, चलेगा। हाँलाकि र्घामक होते हुए भी प्रगतिशील हुआ जा सकता है। लोग होते ही हैं। कविता में, ख़ासतौर से उसकी भाषा में हिन्दूपन और मुसलमानपन की गुंजाइश नहीं है। अशोक वाजपेयी जैसे कविता के जरजरात शत्रु की कविताओं में तत्सम की अति, मेरा मतलब हिन्दूपन को पसंद नहीं करता। विडम्बना कहिए या मार्क्सवादी लेखकों की मूर्खता, ऐसे व्यक्ति को अपना नायक बना लेते हैं, प्रतिरोध का नायक बना लेते हें। हद है। बहरहाल बात कविता की भाषा में हिन्दूपन और मुसलमानपन की कर रहा हूँ। भाषा कोई बिना दरवाजे और बिना खिड़कियों का भुतहा मकान नहीं है। उसमें दूसरी भाषाओं के शब्दों की आवाजाही होती है, लेकन उन शब्दों की जो लोक के रास्ते से आते है। हिन्दी में ढलकर आते है। इन युवा कवियों को अपने मुसलमानपन से बचने की जरूरत है। अरबी-फारसी के कठिन शब्दों का आतंक फैलाने से बचने की जरूरत है। हिन्दी को ग़ालिब जैसे कवि की ज़रूरत नहीं है, जायसी , रसखान, रहीम वगैरा जैसे कवियों की ज़रूरत है। जो हिन्दी में आए तो हिन्दी के रंग में रंग जाए। लगे ही नहीं कि कोई और है। जायसी की अवधी, तुलसी की अवधी से कम नहीं है। फ़िराक़ भी उर्दू में काम करते हैं तो हिन्दी के कठिन शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते हैं-
तमोलियों की दुकानें कहीं कहीं हैं खुलीं
खड़ा है ओस में चुपचाप हर सिंगार का पेड़ 
दुल्हन हो जैसे हया की सुगंध से बोझल

  कवियों को कविता से ही नहीं, कथाभाषा से भी  सीखना चाहिए। कैसे राही मासूम रज़ा ने आधागाँव उपन्यास में कथाभाषा को समृद्ध किया है। उर्दू और भोजपुरी के मेल से कमाल किया है। मीठी ज़बान उर्दू में मीठी बोली भोजपुरी को मिलाकर कैसे चकित करते है। श्रीलाल शुक्ल के रागदरबारी में ट्रक के वर्णन और केदारनाथ सिंह के एक टूटा हुआ ट्रक को एक साथ रखकर देख सकते हैं। भाषा की दृष्टि से नहीं। किसी कविता के स्रोतों की पड़ताल की दृष्टि से। असल में अब सीखना बंद हो गया, मशहूर होने की लालसा ने युवा कवियों को एक अंधी दौड़ में दौड़ते-दौड़ते  खत्म हो जाने के लिए छोड़ दिया गया है।
    मुश्किल यह है कि अदनान जैसे तमाम नए कवि पुरस्कार, अवसर और चर्चा के लिए लेखक संगठनों और साहित्य के शक्तिकेंद्रों की ओर जाते हैं और फिर कभी अपनी मिट्टी में लौट नहीं पाते हैं। अदनान ही नहीं, चेतनक्रांति जैसे तमाम कवि भी इन्हीं लालसाओं की वजह से अपने काव्यविवेक को तजकर लेखक संगठनों की शरण में चले जाते हैं। बड़ा और बड़ा कवि बनने की लालसा में फँस जाते हैं। लेखक संगठन वालों को ऐसे ही वरिष्ठ और युवा लेखक चाहिए, उनकी दुकान चलाने के लिए। उदाहरण देकर बात करनी हो, तो कहना चाहूँगा कि आलोचना के संपादक आशुतोष कुमार बहुत प्यार से भी ऐसे कवियों को डाँट नहीं सकते हैं, कुछ समझा नहीं सकते हैं। क्योंकि यह उनकी रणनीति का हिस्सा नहीं है। उन्हें कविता की भाषा से कुछ लेना-देना नहीं है। आलोचना में एक दूसरे संपादक हैं संजीव कुमार, उनके बारे में कम जानता हूँ; बहुत कम, अलबत्ता इतना जानता हूँ कि अरुंधति राय के भक्त हैं। उनका इंटरव्यू लिया है। शायद सत्यानंद निरुपम के साथ। अरुंधति जी ने हिन्दी को क्या दिया है, हिन्दी में उनका योगदान क्या है, हिन्दी के लिए अनिवार्य क्यों हैं? बुकर पाने के पहले से उनकी पूजा हिन्दी में शुरू हुई है या बाद में ? ओह ये कैसे जाहिल हिन्दी में आ गए हैं, हिन्दी के धंधे में आ गए है, पुरस्कार से लेखक का कद तय करते हैं। अरे मूखों, हिन्दी या किसी भी भाषा की परंपरा में कृतियों और लेखक के मूल्यांकन के लिए पुरस्कार को कसौटी नहीं माना गया है। सत्यानंद निरुपम जैसे पुस्तक-संपादकों ने पुरस्कार का इतना बड़ा हव्वा खड़ा कर दिया है कि जो पुरस्कृत लेखक है, वही बड़ा लेखक है, वही जीवित है, कालजीवी है। बुकर तो बुकर, साहित्य अकादमी पुरस्कार उनके लिए तोप है, है तो भारतभूषण पुरस्कार भी तोप ही का पुरस्कार । भारतभूषण पुरस्कार पा गया, तो कविता संग्रह छाप दो। हद है। कविता की समझ नहीं है, आलोचना की समझ नहीं है, उपन्यास की समझ नहीं है, पुरस्कार की समझ से राजकमज प्रकाशन समूह का धंधा चल रहा है। हिन्दी को कौन नुक़सान पहुँचा रहा है, यह कुछ-कुछ जानता हूँ। हिन्दी कविता का टेंटुआ, ऐसे ही संपादकों के पंजे में फँसा हुआ है। पिछले पन्द्रह वर्षों में जिस तरह के पुस्तक-संपादकों का प्रादुर्भाव हुआ है, ये हिन्दी कविता ही नहीं, हिन्दी आलोचना और उपन्यास की भी जान लेकर मानेंगे। एक ओर राजकमल प्रंकाशन समूह के पुस्तक संपादकों, आलोचना पत्रिका और लेखकसंगठनों से जुड़े कुछ लोगों का गैंग है, तो देशभर में फैले लेखक संगठनों से जुड़े लेखकों का भय, उनका साहित्य-विवेक च्युत होना, पुंरस्कार और चर्चित होने की तीव्र लालसा ने उन्हें हिन्दीद्रोही बना दिया है। मुश्किल यह कि जो नये कवि उनके साथ हैं, उनकी कमियों को दूर करने, उन्हें और सजाने-सँवारे की ज़िम्मेदारी भी उन्हीं पर है। जबकि यह सब करने की स्थिति में वे आज नहीं हैं। कहना उन्हें चाहिए था, कह मैं रहा हूँ। प्यार से डाँट मैं रहा हूँ, यह काम उन्हें करना चाहिए था। संपादक की ज़िम्मेदारी बहुत बड़ी है, आज महावीर प्रसाद द्विवेदी सरस्वती निकाल रहे होते, मैथिलीशरण गुप्त जैसे कवियों से कविता का पथ सँवार रहे होते, अरुंधति के पीछे इसलिए नहीं भागते कि बुकर मिला है और बुकर मिलने से देश की सबसे बड़ी लेखक हो गई हैं। मैं अरुंधति का विरोधी नहीं हूँ, उनका शत्रु नहीं हूँ, लेकिन हिन्दी के लेखकों के हिस्से का मान उन्हें दे दिया जाए, यह स्वीकार्य नहीं है। हिंदी का संसार मेरी प्राथमिकता में है। हिन्दी कविता के लिए लाखों के बोल सह सकता हूँ, नुक़सान उठा सकता हूँ, किताबें छपवाए बिना मर सकता हूँ, मशहूर हुए बिना मर सकता हूँ। मुझे हिन्दी के बुरे लागों से कुछ नहीं चाहिए। साहित्य में जिस बात को ग़लत समझता हूँ, तो उसे ग़लत कहूँगा। यह एक बहुत बुरा समय है। कुछ लोग हर समय में होते हैं, जिन्हें जोखिम उठाकर साहित्य का सच कहना ही होता है। 

(कविता की जान लेने के सौ तरीके का दूसरा अध्याय)