मंगलवार, 11 जनवरी 2022

एक सौ बीस छोटी कविताएँ

- गणेश पाण्डेय 

1
मिट्टी
------
हम 
जिस मिट्टी में 
लोटकर बड़े होते हैं

वह 
हमारी आत्मा से 
कभी नहीं झड़ती।

2
बाबा
------
बहुत से भी 
बहुत कम लेखक होंगे 
जिन्हें साहित्य में कभी 
कृपा बरसाने वाले 
किसी बाबा की ज़रूरत 
नहीं हुई होगी।

3
बड़ा बाजार
---------------
साहित्य को 
बड़ा बाजार बनाया किसने

जी जी उन्हीं दो-चार लोगों ने
जिनकी आप पूजा करते हैं।

4
जो कवि जन का है
------------------------
जो कवि
जितना गोरा है
चिकना है सजीला है
उसके पुट्ठे पर राजा की
उतनी ही छाप है

जो कवि
जितना सुरीला है
तीखे नैन-नक्श वाला है
उसके गले में अशर्फियों की
उतनी ही बड़ी माला है

जो कवि 
जन का है 
बेसुरा है बदसूरत है
बहुत खुरदुरा है
उम्रक़ैद भुगत रहा है।

5
जीवन
--------
जहाँ
जीवन ज्यादा होता है
हम वहाँ रुकते ही कम हैं

असल में
जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं
चमकती हुई चीज़ों के पीछे
तेज़ दौड़ना शुरू कर देते हैं

जीवन तो कहीं पीछे से
हमें मद्धिम आवाज में 
पुकारता रह जाता है।

6
समकालीन कवि
--------------------
जब हम 
साहित्य में लड़ रहे थे

तब वे किसी उत्सव में
काव्यपाठ कर रहे थे

कहने के लिए वे भी
समकालीन कवि थे।

7
नया मुहावरा
----------------
साहित्य में
लड़ोगे-भिड़ोगे
तो होगे ख़राब

मुंडी झुकाकर
लिखोगे-पढ़ोगे
तो होगे नवाब।

8
काम
------
जिसका जो काम है
उसे वही करना चाहिए

जैसे हर शख़्स
ख़ुशामदी नहीं हो सकता है

उसी तरह हर शख़्स
बाग़ावत नहीं कर सकता है।

9
अहमक़
----------
ओह ये अहमक़ 
आख़िर समझेंगे कब

साहित्य को जश्न नहीं
ईमान की ज़रूरत है।

- गणेश पाण्डेय

10
गालियाँ
---------
कविता के पितामह ने 
बिगाड़ा है मुझे

सारी गालियाँ
उन्हीं से सीखी हैं मैंने

मेरा क्या करोगे भद्रजनो
जाओ कबीर से निपटो।

11
आज़माइश
--------------
इतना 
टूटना भी ज़रूरी था
ख़ुद को आज़माने के लिए

एक हाथ टूट जाने दिया
फिर दूसरे हाथ से
लड़ाई की।

12
आ संग बैठ
---------------
तू भी 
कवि है मैं भी कवि हूँ
मान क्यों नहीं लेता

जब पीढ़ी एक है तो तुझे 
ऊँचा पीढ़ा क्यों चाहिए
आ संग बैठ चटाई पर।

13
कविता का मजनूँ
---------------------
जिस कवि को
हज़ार कविताएँ लिखने के बाद
एक भी खरोंच नहीं आयी
एक ढेला न लगा सिर पर
ज़रा-सा ख़ून न बहा

कितना सुखी 
सात्विक और अपने मठ का
निश्चय ही प्रधानकवि हुआ
गुणीजनो क्या वह 
कविता का मजनूँ हुआ!

14
दुरूह
-------
जिस कविता में 
कथ्य की रूह 

साफ़-साफ़
एकदम दिख जाय

वह दुरूह नहीं है 
नहीं है नहीं है।

15
दलाल
---------
जो अलेखक हो
जुगाड़ का चैंपियन हो

छपने-छपाने इनाम दिलाने
मशहूर कराने में माहिर हो

और देशभर के लेखकों को
मिनटों में मुर्गा बनाता हो।

16
ब्रह्म
-----
जिसने तबीअत से
पुरस्कार को सूँघ लिया
ब्रह्म को पा लिया 

जिसे नसीब नहीं हुआ
वह बेचारा हर जन्म में 
हिन्दी का लेखक हुआ।

17
दिल्ली
----------
हाशिए के लेखक
मेरे दोस्त हैं मेरी ताक़त हैं

मेरी तरह दिल्ली के
पॉवरहाउस से दूर रहते हैं

दिल्ली उन्हें भी मेरे साथ
मिटाने के लिए विकल है।

18
भिड़ंत
--------
तुम अपनी 
अशरफ़ी दिखाओ

मैं अपना
ईमान दिखाता हूँ।

19
मार्क्सवादी
--------------
हिन्दी के मार्क्सवादी
चाहते हैं देश के पूँजीपतियों का
नाश हो नाश हो नाश हो

और वे राजधानी में खुलेआम
हिन्दी के पूँजीपतियों का तलवा
चाटते हैं चाटते हैं चाटते हैं।

20
लगा पीटेगा
---------------
यह कविता इससे पहले
लिखी क्यों नहीं गयी थी

आलोचक ने कहा तो लगा
पहले के कवियों को पीटेगा

थोड़ा डरा सोचा कि यह ख़ुद
पहले क्यों नहीं पैदा हुआ!

21
महानता
----------
भाड़ में जाए 
आपकी महानता

जो था सब 
कह नहीं दिया तो।

22
धरती पर
------------
धरती पर कोई फूल 
अधखिला रह न जाए

कोई बात ज़रूरी हो
तो कहे बिना रह न जाए

23
नानी की नानी
------------------
नानी कब याद आती हैं
जी, कठिन बात कहनी हो तब

और जब बहुत कठिन बात 
कहनी हो तो तब, वत्स

जी गुरु जी, तब
नानी की नानी याद आती हैं।

24
नहीं देखा
------------
मंच की रोशनी में
फुदकते हुए चूहों को
कभी शेर में बदलते
नहीं देखा नहीं देखा
चूहों ने भी नहीं देखा 
नहीं देखा नहीं देखा।

25
ये
---
मेरा ख़याल है ये अभी
गंदा खाने तक जाएंगे
आख़िर इन्हीं के समय में
पुरस्कार युग आया है
कर लेने दो खा लेने दो।

26
अधिकतम
-------------
लेखकों, संपादकों, आलोचकों ने
कभी कृति के न्यूतम समर्थन मूल्य की 
बात की ही नहीं

इन्होंने हमेशा गोलबंद होकर
अधिकतम समर्थन मूल्य के लिए
राजधानी को घेरा।

27
कनकौआ
-------------
इधर के 
किन-किन लेखकों के पास 
कोई जुनूनी काम है

क्या पता
कनकौआ उड़ाना ही आज का
बड़ा काम हो!

28
वहाँ
-----
अच्छा हुआ
मैं वहाँ बहुत कम जाना गया 
जहाँ थोड़े से आदमी रहते थे 
और चूहे बहुत ज़्यादा ।

29
सुधार
--------
गुप्त जी मानते थे
कि राम के चरित के सहारे
कोई भी कवि बन सकता है

आज हैरान होते हिन्दी के इन
दुश्चरित्र कवियों को देखकर
अपने लिखे में सुधार करते

कोई भी दुश्चरित्र कवि हो जाय
यह सहज संभाव्य है।

30
मज़बूत कवि
----------------
जैसे 
बच्चे को देखकर
तंदुरुस्ती जान लेते हैं

उसी तरह
मज़बूत कवि को
दूर से पहचान लेते हैं।

31
शायद
-------
हिन्दी में विचारों की कमी नहीं है
बस काम करना बंद कर दिया है

हिन्दी में आदर्शों की कमी नहीं है
बस काम करना बंद कर दिया है

हिंदी में महान लेखक कम नहीं हैं
इन लेखकों ने रास्ता बदल लिया है

लेखक की दुनिया बदल गयी है
शायद पुरस्कार-राशि बढ़ गयी है।

32
सर्वेंट क्वार्टर
----------------
यह बच्चा
जब दिल्ली में लेखक बना है
वहीं पला-बढ़ा है तो जाएगा कहाँ
अमेरिका इंग्लैंड वग़ैरा

यह तो अंतरराष्ट्रीय साहित्य के
सर्वेंट क्वार्टर में पैदा हुआ है
देश की नसों में मेरा ख़ून बनकर
कैसे दौड़ेगा।

33
आ बेटा
----------
बच्चा लेखक है 
सारे अंग छोटे और कोमल होंगे
मूते भी तो मुझ तक कैसे पहुँचेगी

मुझे ही जाना होगा दिल्ली
दुलार करने आ बेटा सिर पर 
कर ले मन की।

34
लीला
-------
मान्यवर आप लेखक हैं
और साहित्य के संघर्ष में नहीं हैं
तो आपकी भाषा चमकती हुई
स्निग्ध कोमल वग़ैरा तो होगी ही
आपकी उँगलियाँ अभी भी
स्वेटर बुनने की अभ्यस्त होंगी
काश मैं भी मूलतः स्त्री होता
मेरी हथेलियाँ खुरदुरी न होतीं
मैं गणेश नहीं लीला होता।

35
डण्डा
-------
वे
साहित्यपति थे

उन्होंने कहा -
झण्डा लेकर चलो

मैंने कहा -
डण्डा लेकर चलो।

36
लज्जा
-------
हे प्रभु
माइक के सामने
अख़बार के बयान में
कविता लिखते हुए 
टेढ़ी हो गयी है कवि की रीढ

जहाँ झगड़ना था मीठा बोला 
जहाँ तनकर खड़ा होना था झुका
जहाँ उदाहरण प्रस्तुत करना था 
छिपकर जिया

हे प्रभु
उसे सुख-शांति दीजिए न दीजिए
थोडी-सी लज्जा जरूर दीजिए।

37
अकड़
--------
हे प्रभु
आप हो तो ठीक है
न हो तो भी
पर हिन्दी में ऐसा वक़्त 
ज़रूर आये

जब पाठक ही पाठक हों
और पाठक के पास इतना बल हो
कि कवि और आलोचक की
अकड़ तोड़कर उसकी जेब में
डाल दें।

38
निरीह कवि
--------------
हे प्रभु
आये ज़रूर आये
हिन्दी में ऐसा भी वक़्त 

जब आलोचक अपनी अकड़
निरीह कवि के सामने नहीं
साहित्य की सत्ता के सामने
दिखाए।

39
दिल्ली भी
------------
साहित्य में
दिल्ली भी है
दिल्ली ही नहीं

सुनता कौन है
देशभर के लेखक
बहरे हैं।

40
ज्ञानी
-------
हिन्दी में
इतने ज्ञानी आ गए हैं 
कि पूछो मत

ज्ञान की आंधी में
कविता की नाव 
अब डूबी तब डूबी।

41
टैटू
------
नक़लची कवि
असली कवियों को
कविता पढ़ा रहे हैं

हँस रहे हैं चूतड़ मटका रहे हैं
उसी पर कविता का टैटू
बनवा रहे हैं।

42
नोट कर लें
-------------
एक बात नोट कर लें
मैं किसी का पालतू
कवि नहीं हूँ

यह भी नोट कर लें
मेरा कोई पालतू
आलोचक नहीं है

फिर भी 
कविता की पृथ्वी का
एक कण मैं भी हूँ।

नोटबुक में 
जगह न बची हो तो
जिल्द पर नोट कर लें।

43
क़सम
--------
उन्होंने
मुझे बर्बाद करने की
ज़बरदस्त क़सम खायी थी

जानकर
बहुत अफ़सोस हुआ

उनकी 
अच्छी-ख़ासी क़सम 
बर्बाद हो गयी।

44
बुरी बात
----------
ग़ुस्सा चाहे जितना हो 
किसी वाजिब बात के लिए हो
तो अच्छी बात है

ख़ुद कुछ न कर पाएँ और
ग़ुस्सा करने वाले पर खीझ हो
तो बहुत छोटी बात है

और अगर साहित्य में 
ऐसी छोटी बात हो तो
बहुत बुरी बात है।

45
पत्थर हूँ
---------
हाँ पत्थर हूँ
बहुत से बहुत सख़्त

और तुम ठहरे 
चलते-फिरते आदमजात
मान क्यों नहीं लेते
मेरे ऊपर सिर्फ़ प्यार से 
बैठ सकते हो
दो घड़ी सुस्ता सकते हो

मुझे
अपनी राह का
पत्थर समझकर
ठोकर से हटाना चाहोगे
तो ज़ख़्मी हो जाओगे।

46
पोतड़े
--------
बादशाहों का
कुछ साफ़ नहीं किया

तो उनके बच्चों के
पोतड़े कैसे साफ़ करूँ

जाओ मुझे तुमसे भी
कुछ नहीं चाहिए।

47
चरणरज
----------
वह 
कल तक बड़ों का
चरणरज लेता था

और
आजकल छोटों का
चरणरज लेता है।

48
जीना
-------
मित्र अब न कहो
बरस अठारह क्षत्रिय जीवे 

लेखक बेचारा किसी मठ में
एक बार खड़ा नहीं हो पाता।

49
गया नहीं
------------
राजधानी कोई शहर नहीं
एक बुलडोज़र है बुलडोज़र
जहाँ चूहा भी ऐंठकर चलता है

अच्छा हुआ कि मैं गया नहीं
बुलडोज़र से लड़ तो जाता
चूहे से कैसे लड़ता।

50
इसीलिए
-----------
हिन्दी के लेखक हैं
उन्हें पता ही नहीं है
कि वे कर क्या रहे हैं 

इसीलिए
जिधर सब जा रहे हैं
उसी तरफ़ जा रहे हैं।

51
परंपरा
--------
जैसे 
बड़ी कविता की 
परंपरा होती है

उसी तरह 
ज़रूरी कविता की 
परंपरा होती है।

52
नक़ली कविता
------------------
इधर हिन्दी कविता में ख़ूब
झूठमूठ की चीज़ें मिल जाएंगी

कवि के जीवन से विरत
नक़ली कविता यहीं संभव है

53
ठग
-----
आज की तारीख़ में 
किसी कवि को कविता में 
बारीक बुनावट करते देखो
चाहे मामूली कविता को
ख़ूब चिकना करते देखो
तो समझ जाओ कि वह 
कवि नहीं कविता का ठग है।

54
जुनूनी काम
---------------
मित्र से पूछा
इधर के किसी कवि को
कविता में जुनूनी काम
करते देखा है
मित्र ने कहा कुछ नहीं
बस मेरी तरफ़ देखते रहे।

55
ये लेखक
-----------
अंग्रेज़ों से 
ग़लती हो गयी
बड़ी ग़लती हो गयी
वे सौ साल बाद आये होते
तो आज के हिन्दी के ये लेखक 
आज़ादी की लड़ाई होने ही नहीं देते!
आख़िर साहित्यिक मुक्ति के लिए
लड़ाई कहाँ की!

56
कविता की शक्ति
---------------------
आज का आलोचक ख़ुद
अपने दिमाग़ की खिड़कियाँ खोले 
आँखों के जाले ख़ुद साफ़ करे
मज़बूत कविता की खोज करे

मैं अपनी कविता की शक्ति से
घोड़े को शेर में बदल सकता हूँ
गधे आलोचकों को घोड़ा बनाना 
मेरा काम नहीं है।

57
मास्टर
---------
वे सब आलोचक कहाँ थे
वे तो हिन्दी के मास्टर थे
जितना पढ़ा पढ़ाया
उतना ही लिखा

हिन्दी का मास्टर होकर भी
मैं आजीवन कार्यकर्ता ही रहा
कविता का मास्टर बनने का 
कभी सोचा ही नहीं।

58
आदर्श
--------
मैंने कहा 
तू मेरे गाँव का है
बच्चा संपादक है तो क्या हुआ
मेरी तरह बहादुर-शहादुर बन
चल मर्दाना कविताएँ छाप

वह 
तनिक भी नहीं बदला
देशभर के नचनिया कवि 
उसके आदर्श थे।

59
चाटना 
---------
ईमान नहीं है
तो विचारधारा कुछ नहीं है 

सिर्फ़ चाटने 
और चाटते रहने की चीज़ है।

60
आत्मसंघर्ष
--------------
आप छत्तीस साल के युवा हैं
लेकिन लिख कितने साल से रहे हैं
आत्मसंघर्ष की उम्र कितनी है
कभी किया भी है या नहीं
लेखक के जीवन में चिंगारी 
सिर्फ़ किताबों से पैदा होती तो 
दुनिया में रोशनी ही रोशनी होती
मेरे बच्चे जीवन में रगड़ से
पैदा होती है असल रोशनी।

61
लेखक-प्रकाशक
---------------------
मानता हूँ 
अच्छा रिश्ता होता है
लेखक और प्रकाशक के बीच

लेकिन एक सच्चा लेखक
किसी प्रकाशक के लिए 
पैदा नहीं होता है

उसे तो अपने लोग 
और अपनी भाषा के लिए
जीना-मरना होता है।

62
खड़ी कविताएँ
------------------
वह ढिलपुक संपादक
मुझे पसंद नहीं करता
क्योंकि मैं खड़ी कविताएँ
लिखता हूँ

और वह
लेटी हुई कविताओं का
सोलह शृंगार करके
छापता है।

63
दोहराव
----------
कविता का उद्देश्य बड़ा है
और कवि भी जुनूनी है

तो अलग-अलग ढंग से 
कोई बात कहना

दोहराव नहीं असाधारण
चोट की निरंतर है।

64
अंतिम बल्लेबाज़
-------------------
मेरे एक मित्र 
बड़े मज़ाक़िया हैं
मुझे अपनी पीढ़ी का 
अंतिम बल्लेबाज़ कहते हैं

कहते हैं
बाक़ी सस्ते में निपट गये
कविता में सारे चौके छक्के
अब मुझे ही लगाने हैं।

65
दोस्ती
-------
लेखक का साथ
लेखक के चरित्र का 
जासूस होता है

बता देता है कि यह लेखक
किस तरह के साहित्य के
गिरोह में शामिल है

फिर आप हुआ करें कुछ भी
गणेश पाण्डेय की दोस्ती के
क़ाबिल नहीं रह जाते।

66
निजी विचार
---------------
साहित्य 
मनुष्यता का अभियान है
और कविता उस अभियान की बेटी

आज के कवियों 
और आलोचकों के बारे में
मेरा निजी विचार यह कि ये दोनों 
कविता के सीरियल रेपिस्ट हैं।

67
पाठक
--------
आज की कविता का 
कोई पाठक बहुत हुआ तो
खेत कोड़ने जितना श्रम कर देगा

कविता की आत्मा तक
पहुँचने के लिए मौत के कुएँ में
मोटरसाइकिल नहीं चलाएगा।

68
कवि
------
कवि का काम है
पाठक की तरफ़ हाथ बढ़ाना

किसी दरबार में मुजरा करना 
किसी क़ीमत पर नहीं।

68
ख़रगोश
----------
हिन्दी के एक
कछुए की क्या हैसियत है
कोई उसे देखता ही नहीं

कछुआ अक्सर फर्राटे से
दौड़ते हुए लेखकों को देखता है
और सोचता रहता है

ये हृष्टपुष्ट ख़रगोश 
थकेंगे तो नहीं बेचारे अधबीच में
सो तो नहीं जाएंगे।

70
स्त्रीमुक्ति
-----------
कविता में 
प्रेम से आगे का
सब हो गया

अर्थात कविता में
स्त्रीमुक्ति का काम
पूरा हो गया था।

71
अहंकार
----------
राजधानी की माया 
विचित्र है कि मठ का 
नन्हा-सा चूहा भी ख़ुद को
मठाधीश समझता है

न मुझे सलाम करता है 
न मुझसे छापने के लिए 
कविताएँ माँगता है ताऊ हूँ
फिर भी अहंकार देखो।

72
सीढ़ी
-------
हिन्दी में कुछ लेखक
लेखक कम होते हैं 
सीढ़ी अधिक

किसी से बताना मत 
कि ये सीढ़ी लेखक
दिल्ली में अधिक होते हैं।

73
नंगा कीजिए
---------------
कोई लेखक
नाम-इनाम का विरोध करता है

तो ख़ुद को ईमानदार लेखक
क्यों नहीं समझ सकता है

क्या वह बाक़ी लेखकों की तरह है
है तो उसे नंगा कीजिए।

74
फ़ाइल
--------
कवि जी बहुत हुआ
पुरानी फ़ाइलें जमा करना
मुंशी जी का काम है
आपका नहीं

आपकी ड्यूटी
नयी फ़ाइल बनाने की है
ज़रूरी फ़ाइल बनाने की है
झट से आगे बढ़ाने की है।

75
कारख़ाना
------------
कुछ लेखक
लिखने का कारख़ाना होते हैं
उनके कारख़ाने में सोचने का 
पुर्ज़ा नहीं लगा होता है

कभी जान ही नहीं पाते
कि इतना फ़ालतू सामान
क्यों तैयार किया क्या होगा
बस लिखते हैं लिखते जाते हैं।

76
तुम
-----
तुम्हें लगता है कि वह ग़लत है
सीने में बर्छी जैसी चुभती हैं
उसकी बातें और कविताएँ

तुम वैसा कर भी नहीं सकते
और वैसा करते हुए उसे
देखना भी चाहते हो।

77
बुरा
-----
बुरा लगता है
बहुत बुरा लगता है

जब हिन्दी का चोट्टा
मर्यादित भाषा का
पाठ पढ़ाता है

जी करता है
मुँह तोड़ दूँ।

78
विशेषाधिकार
-----------------
वह चरित्रहीन होकर भी
क्रांति की बात कर सकता है

सिर्फ़ हिन्दी के लेखक को
यह विशेषाधिकार है।

79 
आन बाट
------------
लेखको
मरे हुए तो हो ही
जब भी जाओगे ऊपर
बाबा कबीर गेट पर बैठे मिलेंगे
हाथ में जलता हुआ चैला लिए
पूछेंगे मरे हुए क्यों पैदा हुए थे
झूठ बोलोगे तो फँस जाओगे
सच कहोगे आन बाट से आया
तो शायद दागे जाने से बच जाओगे।

80
अजीब बात
---------------
झूठ बोलता हुआ
इस देश का हर आदमी
हिन्दी का कवि लगता है

कितनी अजीब बात है
झूठ बोलने वाला अब
राजनेता नहीं लगता है।

81
लड़वैया
----------
अगर तुम
पहले के लड़वैया की
इज़्ज़त नहीं करते

तो तुम 
कवि वग़ैरा हो सकते हो
लड़वैया नहीं हो सकते।

82
तर्क के जूते
---------------
मुझे एक दो नहीं
सौ जूते चाहिए थे
मेरा दिमाग़ खराब था

मेरा दुर्भाग्य देखिए
हिन्दी में किसी के पास
तर्क के जूते ही नहीं थे।

83
जमात
--------
मैं उस जमात को
वक़्त पर छोड़ नहीं आया होता

तो पूरी ज़िन्दगी
चिलम सुलगाता रह गया होता।

84
मेरे सामने
------------
यह तो कोई बेईमान 
आलोचक ही कह सकता है 

आलोचना की आलोचना 
बुरा काम है आलोचना नहीं

मैं चाहता हूँ कि मेरे सामने
मेरे लिखे की धज्जियाँ उड़ाएँ।

85
नया बाग़ी
-----------
बीस साल पहले सोचा 
नहीं था यह सब करूँगा

उड़िए मत आप जानते हैं
बीस साल बाद क्या होगा

बीस साल में हिन्दी में
नया बाग़ी पैदा हो जाता है।

86
नाराज़ कवि
---------------
नाराज़ कवि के हाथ में
सोना-चांदी फूल-पत्ती वग़ैरा नहीं
मामूली पत्थर है 

कविता के सभासदो देखो तो
उसने तुम्हारे राजा के महल के
काँच पर कैसे दे मारा है दनादन।

87
दोस्त
-------
वह मेरा दोस्त था
और दोस्त जैसा नहीं था
मेरे दुश्मनों से डरता था
उसने न कभी दुश्मन बनाये
न किसी से कोई लड़ाई की
वह मेरा दोस्त कैसे हो सकता था।

88
गिनतीकार
-------------
गिनतीकार
आलोचकों ने
रोज़-रोज़ कविगणना 
और श्रेणीबद्धता से
माठा नहीं कर रखा होता
तो मैं भला उनके ख़िलाफ़
सख़्त कार्रवाई क्यों करता
कि छोटे सुकुल समेत 
फाट पड़ता।

89
मार दो
---------
कविता 
जब हिन्दी के शोहदों के सामने 
भय से थरथर काँप रही है
एक डरा हुआ आलोचक
जो ख़ुद की हिफ़ाज़त नहीं सकता
हिंदी कविता की आबरू
ख़ाक बचाएगा सबसे पहले 
उसे मार दो।

90
नाराज़ कवि
---------------
नाराज़ कवि के हाथ में
सोना-चांदी फूल-पत्ती वग़ैरा नहीं
मामूली पत्थर है 

कविता के सभासदो देखो तो
उसने तुम्हारे राजा के महल के
काँच पर कैसे दे मारा है।

91
आत्मा
--------
किसी को
अपशब्दों की बौछार से
लज्जित करना चाहोगे तो
वह सिर्फ़ नाराज़ होगा

और
उसकी आँख में
आँख डालकर तर्क करोगे
तो उसकी आत्मा लज्जित होगी‌।

92
बेचैनी
-------
न सबद लिखता हूँ
न रमैनी लिखता हूँ

कविता का 
छोटा-मोटा कार्यकर्ता हूँ

साखी जैसी बस
अपनी बेचैनी लिखता हूँ।

93
कर्ज़
-----
जिस
आलोचक की आलोचना में
ईमान का छंद नहीं होता है

वही
प्राय: कविता में छंद के लिए
आठ-आठ आँसू रोता है

असल में
उसे कुछ कवियों से लिया गया
पुराना कर्ज़ चुकाना होता है।

94
मैं
---
मैं जब
कविता में 
मैं लिखता हूँ

तो 
पुरस्कार का नहीं
हिन्दी का मैं लिखता हूँ।

95
भरोसा
---------
उसके हाथ में डायरी थी
उसमें कई नंबर और पते थे

मेरे पास सिर्फ़ दो हाथ थे
मुझे उन्हीं पर भरोसा करना था।

96
पंडिज्जी
----------
पंडिज्जी की कोठी थी
मेरे पास थी मड़ई थी इसीलिए 
वे मुझे पड़ोसी मानते नहीं थे
मैं हिन्दी की ज़मीन में रोज़
कुआँ खोदता रोज़ पानी पीता
एक-एक ईंट जोड़कर जब मैंने 
हिन्दी की मीनार खड़ी कर दी
तो वे रातों में छिप-छिपकर
उसे देखते थे।

97
ईमान
-------
हिन्दी में
पहले भी हुआ है

ईमान के
चींटी जैसे पैर

बेईमानी के हाथी को
कुचल सकते हैं।

98
अशुभ योग
--------------
कवियो कहीं भी सो जाना
चारपाई पर चाहे ज़मीन पर
किसी भी तरफ़ पैर कर लेना
भूलकर भी दिल्ली की दिशा में
सिर करके मत सोना
बोले तो अशुभ योग है।

99
दुर्दशा
-------
मेरे पुरखे
प्राचीन कवि गोरखनाथ होते तो
हिन्दी की दुर्दशा पर चुप नहीं रहते
अलबत्ता इस शहर के बाक़ी कवि
उनके होने पर भी चुप रहते।

100
वैशाखनंदन
--------------
मूर्ख लेखक को
गधा या लेंड़ी वग़ैरा
कैसे कह सकते थे 
पवित्र भाषा हिन्दी में 
छोत भी तो नहीं कह सकते थे 
चुगद पहले कहा जा चुका था 
इसलिए गधा कहा।

101
दण्ड
------
मैंने जिन 
लेखकों के रहस्य खोले
और उनके अतिसौंदर्यप्रसाधनयुक्त
मुखमंडल पर कालिख पोती
मुझे उनसे दण्ड मिलना
स्वाभाविक था
उन्होंने मुझे सर्वसम्मति से
जातिबहिष्कृत किया।

102
अपकीर्ति
------------
मेरे समय में
हिन्दी के समुद्र में मंथन हुआ
तो कुछ को पाँच टके का सिक्का
कुछ को हज़ार का कुछ को 
लाख का आभूषण
कुछ को हीरे से सुसज्जित मुकुट
मेरे हिस्से में विलक्षण वस्तु आयी
अपकीर्ति का बहुमूल्य चमड़ा।

103
मिशन
--------
यह धंधे का समय है
क्या साहित्य क्या पत्रकारिता
क्या धर्म क्या राजनीति क्या शिक्षा
मिशन का नाम लेंगे तो सीधे
सूली पर चढ़ा दिए जाएंगे
जैसे मुझे साहित्य में
सूली पर चढ़ा दिया गया।

104
सरल रेखा
-------------
सरल रेखा 
सबको अच्छी लगती है
चुपचाप मुंडी झुकाये चलते जाने में
कोई मुश्किल भी नहीं होती है
कोई दर्द नहीं कोई शर्म नहीं
जीवन के टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर चलना 
हिन्दी के लेखकों के लिए भी
सरल नहीं होता।

105
बड़का कबी
---------------
कुछ कबी तौ 
बिल्कुल्लै मज़ेदार कबीता लिखि रहै हैं
गजबै करत हैं पुरान कोल्हू है बैल नवा
न कौनो चीरा-टाका न कौनो दर्द-सर्द
पेटौ ठीक से फूला नाहीं नौ महीना
एक मिनट में कबीता-फबीता होइगै
दाँत चियारि-चियारि खेलावत हैं
ज़मीदारन कै पैर दबावा टोटका आज़मावा
डिल्ली पहुँचि कै बड़का कबी होइगा।

106
भैंस
-----
साहित्य 
कोई भैंस नहीं है 
जिसे कोई इनाम की लाठी से 
हाँक सकता है!

107
तू 
--
तू किताब पढ़
मैं जिन्दगी को पढ़ता हूँ
तू ज्ञान के शिखर चूम
मैं गिरे हुए को उठाता हूँ
तू इनाम ले
मैं खुद को मिटाता हूँ
तू अकादमी जा 
मैं उस पर थूकता हूँ
तू दिल्ली जा
मैं टिकट फाड़ता हूँ।

108
बच्चों की प्रतीक्षा
---------------------
जब
बच्चे बहुत छोटे थे
नौकरी पर जाते समय
हाथ पकड़कर झूल जाते थे
पीठ पर चढ़ जाते थे
पैरों से लिपट जाते थे

अब
मैं रिटायर हो गया हूं
बच्चे बाहर काम पर हैं
मेरे पैर मेरे कंधे मेरी बाहें सब 
घर पर बच्चों की प्रतीक्षा करते हैं।

109
कितने दिन रह गये हैं
-------------------------
होली में
कितने दिन रह गये हैं

पूछता हूं पत्नी से, कहती हैं
रोज एक ही बात पूछते हैं

चुप हो जाता हूं दूर से
चुपचाप कैलेंडर देखता हूं

मोबाइल में ढूंढता हूं
होली की तिथि दिन गिनता हूं

रिटायर हो गया हूं न, बच्चे आएंगे
तो फिर काम पर लग जाऊंगा।

110
बच्चे आ गये हैं
------------------

कोई चिड़िया पीछे से
सिर पर पंख फड़फड़ाती है

कोई तितली 
चुपके से कंधे पर बैठ जाती है

कोई हिरन 
सामने से कुलांचे भरता है

कोई शावक टीवी पर 
धूप में बाघिन के मुंह चूमता है

कोई शख्स
दरवाजे की कुंडी खटखटाता है

कोई जहाज
हवाई अड्डे पर उतरता है

कोई पीछे से
मुझसे जोर से लिपट जाता है

हजार बातें हैं पता चल जाता है
बच्चे आ गये हैं।

111
देखना
--------
उस रात प्रीतिभोज में 
उसके साथ एक बच्चा था
बड़ा प्यारा था
खरगोश की तरह
देखता था सबको
मुझे भी ।
और उसने भी मुझे देखा था
जैसे नहीं देखा था
मैंने देखा था।

112
उठा है मेरा हाथ
--------------------
मैं जहाँ हूँ
खड़ा हूँ अपनी जगह 
उठा है मेरा हाथ ।

रुको पवन
मेरे हिस्से की हवा कहाँ है।

बताओ सूर्य 
किसे दिया है मेरा प्रकाश ।

कहाँ हो वरुण
कब से प्यासी है मेरी आत्मा ।

सुनो विश्वकर्मा
मेरी कुदाल कल तक मिल जानी चाहिए 
मुझे जाना है संसद कोड़ने ।

113
उनका कोश
---------------
सबके काम आते थे 
सबसे काम लेते थे 
बड़े काम-काजी थे। 
हर जगह थी उनकी पूछ । 
असल में, उनके कोश में 
अकरणीय कुछ था ही नहीं।

114
गौरैया
--------
इतने बड़े आसमान में 
मेरी नन्ही गौरैया
जिसके हर हिस्से में 
हजार इच्छाएँ 
आसमान से बड़ी।

115
मेरा बेटा
-----------
मेरा बेटा
कंधे पर बैठा हुआ 
भरता है किलकारियाँ
दिखाता है आसमान को
ठेंगा।

116
क्यों नहीं करते
------------------
इस पिद्दी को तो देखो 
कितनी देर से कर रहा है 
इतने बड़े देश के साथ 
हँसी-ठट्ठा।
कहाँ हैं लोग 
क्यों नहीं करते
इसका मुँह बंद।

117
हिंदी की चींटी
------------------
मेरा क्या
मैं हिंदी की चींटी
चले गये सब हिंदीपति
योद्धा बड़े-बड़े
कुछ अप्रिय कुछ मीठा लेकर

उस पथ पर
मैं चींटी हिंदी की मतवाली

क्यों छेड़े कोई मुझको
कोई हाथी कोई घोड़ा
चाहे कोई और।

118
एक भिण्डी
--------------
यह जो छूट गयी थी 
थैले में अपने समूह से 
अभी-अभी अच्छी-भली थी
अभी-अभी रूठ गयी थी 
एक भिण्डी ही तो थी 
और एक भिण्डी की आबरू भी क्या 
मुँह फेरते ही मर गयी थी।

119
याद रहे पर
--------------
ये लो पहले हाथ 
फिर काटो दोनों पैर
गर्दन काटो
बोटी-बोटी कर दो
मेरी देह।
कहीं फेंक दो
कहीं झोंक दो
याद रहे पर
लपट उठेगी ऊँची-ऊँची
हर हिस्से से।

120
प्रतिबंध
----------
बच्चे समझाते हैं, पिताजी 
किसी भी प्रकार का संसार हो
चूतियों से भरा हुआ है
साहित्य का भी

आप ख़ून न जलाएँ
चाहें तो उनका मुँह न देखें जाने दें
आप उनकी ईश्वर प्रदत्त अलौकिक 
मूर्खता की नवीन प्रस्तुतियों पर
चाहकर भी प्रतिबंध नहीं लगा सकते हैं।

                                 

                                                            

बुधवार, 5 जनवरी 2022

इकतालीस छोटी कविताएँ

- गणेश पाण्डेय

(जैसे युद्ध सिर्फ़ मिसाइलों से नहीं होता, कई छोटे हथियारों और एके दो सौ तीन वग़ैरा की भी ज़रूरत पड़ती है, उसी तरह इधर तमाम लंबी कविताओं के बाद छोटी कविताओं की झड़ी लग गयी है। कहना और आभार स्वीकार करना ज़रूरी है कि कविमित्र योगेंद्र कृष्णा जी ने मेरी तमाम छोटी कविताओं के पोस्टर बनाये हैं। साहित्य के इस संघर्ष में उनकी संलग्नता प्रीतिकर है।)

1
मिट्टी
------
हम 
जिस मिट्टी में 
लोटकर बड़़े होते हैं

वह 
हमारी आत्मा से 
कभी नहीं झड़ती।

2
बाबा
------
बहुत से भी 
बहुत कम लेखक होंगे 
जिन्हें साहित्य में कभी 
कृपा बरसाने वाले 
किसी बाबा की ज़रूरत 
नहीं हुई होगी।

3
बड़ा बाजार
---------------
साहित्य को 
बड़ा बाजार बनाया किसने

जी जी उन्हीं दो-चार लोगों ने
जिनकी आप पूजा करते हैं।

4
जो कवि जन का है
------------------------
जो कवि
जितना गोरा है
चिकना है सजीला है
उसके पुट्ठे पर राजा की
उतनी ही छाप है

जो कवि
जितना सुरीला है
तीखे नैन-नक्श वाला है
उसके गले में अशर्फियों की
उतनी ही बड़ी माला है

जो कवि 
जन का है 
बेसुरा है बदसूरत है
बहुत खुरदुरा है
उम्रक़ैद भुगत रहा है।

5
जीवन
--------
जहाँ
जीवन ज्यादा होता है
हम वहाँ रुकते ही कम हैं

असल में
जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं
चमकती हुई चीज़ों के पीछे
तेज़ दौड़ना शुरू कर देते हैं

जीवन तो कहीं पीछे से
हमें मद्धिम आवाज में 
पुकारता रह जाता है।

6
समकालीन कवि
--------------------
जब हम 
साहित्य में लड़ रहे थे

तब वे किसी उत्सव में
काव्यपाठ कर रहे थे

कहने के लिए वे भी
समकालीन कवि थे।

7
नया मुहावरा
----------------
साहित्य में
लड़ोगे-भिड़ोगे
तो होगे ख़राब

मुंडी झुकाकर
लिखोगे-पढ़ोगे
तो होगे नवाब।

8
काम
------
जिसका जो काम है
उसे वही करना चाहिए

जैसे हर शख़्स
ख़ुशामदी नहीं हो सकता है

उसी तरह हर शख़्स
बाग़ावत नहीं कर सकता है।

9
अहमक़
----------
ओह ये अहमक़ 
आख़िर समझेंगे कब

साहित्य को जश्न नहीं
ईमान की ज़रूरत है।

- गणेश पाण्डेय

10
गालियाँ
---------
कविता के पितामह ने 
बिगाड़ा है मुझे

सारी गालियाँ
उन्हीं से सीखी हैं मैंने

मेरा क्या करोगे भद्रजनो
जाओ कबीर से निपटो।

11
आज़माइश
--------------
इतना 
टूटना भी ज़रूरी था
ख़ुद को आज़माने के लिए

एक हाथ टूट जाने दिया
फिर दूसरे हाथ से
लड़ाई की।

12
आ संग बैठ
---------------
तू भी 
कवि है मैं भी कवि हूँ
मान क्यों नहीं लेता

जब पीढ़ी एक है तो तुझे 
ऊँचा पीढ़ा क्यों चाहिए
आ संग बैठ चटाई पर।

13
कविता का मजनूँ
---------------------
जिस कवि को
हज़ार कविताएँ लिखने के बाद
एक भी खरोंच नहीं आयी
एक ढेला न लगा सिर पर
ज़रा-सा ख़ून न बहा

कितना सुखी 
सात्विक और अपने मठ का
निश्चय ही प्रधानकवि हुआ
गुणीजनो क्या वह 
कविता का मजनूँ हुआ!

14
दुरूह
-------
जिस कविता में 
कथ्य की रूह 

साफ़-साफ़
एकदम दिख जाय

वह दुरूह नहीं है 
नहीं है नहीं है।

15
दलाल
---------
जो अलेखक हो
जुगाड़ का चैंपियन हो

छपने-छपाने इनाम दिलाने
मशहूर कराने में माहिर हो

और देशभर के लेखकों को
मिनटों में मुर्गा बनाता हो।

16
ब्रह्म
-----
जिसने तबीअत से
पुरस्कार को सूँघ लिया
ब्रह्म को पा लिया 

जिसे नसीब नहीं हुआ
वह बेचारा हर जन्म में 
हिन्दी का लेखक हुआ।

17
दिल्ली
----------
हाशिए के लेखक
मेरे दोस्त हैं मेरी ताक़त हैं

मेरी तरह दिल्ली के
पॉवरहाउस से दूर रहते हैं

दिल्ली उन्हें भी मेरे साथ
मिटाने के लिए विकल है।

18
भिड़ंत
--------
तुम अपनी 
अशरफ़ी दिखाओ

मैं अपना
ईमान दिखाता हूँ।

19
मार्क्सवादी
--------------
हिन्दी के मार्क्सवादी
चाहते हैं देश के पूँजीपतियों का
नाश हो नाश हो नाश हो

और वे राजधानी में खुलेआम
हिन्दी के पूँजीपतियों का तलवा
चाटते हैं चाटते हैं चाटते हैं।

20
लगा पीटेगा
---------------
यह कविता इससे पहले
लिखी क्यों नहीं गयी थी

आलोचक ने कहा तो लगा
पहले के कवियों को पीटेगा

थोड़ा डरा सोचा कि यह ख़ुद
पहले क्यों नहीं पैदा हुआ!

21
महानता
----------
भाड़ में जाए 
आपकी महानता

जो था सब 
कह नहीं दिया तो।

22
धरती पर
------------
धरती पर कोई फूल 
अधखिला रह न जाए

कोई बात ज़रूरी हो
तो कहे बिना रह न जाए

23
नानी की नानी
------------------
नानी कब याद आती हैं
जी, कठिन बात कहनी हो तब

और जब बहुत कठिन बात 
कहनी हो तो तब, वत्स

जी गुरु जी, तब
नानी की नानी याद आती हैं।

24
नहीं देखा
------------
मंच की रोशनी में
फुदकते हुए चूहों को
कभी शेर में बदलते
नहीं देखा नहीं देखा
चूहों ने भी नहीं देखा 
नहीं देखा नहीं देखा।

25
ये
---
मेरा ख़याल है ये अभी
गंदा खाने तक जाएंगे
आख़िर इन्हीं के समय में
पुरस्कार युग आया है
कर लेने दो खा लेने दो।

26
अधिकतम
-------------
लेखकों, संपादकों, आलोचकों ने
कभी कृति के न्यूतम समर्थन मूल्य की बात की ही नहीं

इन्होंने हमेशा गोलबंद होकर
अधिकतम समर्थन मूल्य के लिए
राजधानी को घेरा।

27
कनकौआ
-------------
इधर के 
किन-किन लेखकों के पास 
कोई जुनूनी काम है

क्या पता
कनकौआ उड़ाना ही आज का
बड़ा काम हो!

28
वहाँ
-----
अच्छा हुआ
मैं वहाँ बहुत कम जाना गया 
जहाँ थोड़े से आदमी रहते थे 
और चूहे बहुत ज़्यादा ।

29
सुधार
--------
गुप्त जी मानते थे
कि राम के चरित के सहारे
कोई भी कवि बन सकता है

आज हैरान होते हिन्दी के इन
दुश्चरित्र कवियों को देखकर
अपने लिखे में सुधार करते

कोई भी दुश्चरित्र कवि हो जाय
यह सहज संभाव्य है।

30
मज़बूत कवि
----------------
जैसे 
बच्चे को देखकर
तंदुरुस्ती जान लेते हैं

उसी तरह
मज़बूत कवि को
दूर से पहचान लेते हैं।

31
शायद
-------
हिन्दी में विचारों की कमी नहीं है
बस काम करना बंद कर दिया है

हिन्दी में आदर्शों की कमी नहीं है
बस काम करना बंद कर दिया है

हिंदी में महान लेखक कम नहीं हैं
इन लेखकों ने रास्ता बदल लिया है

लेखक की दुनिया बदल गयी है
शायद पुरस्कार-राशि बढ़ गयी है।

32
सर्वेंट क्वार्टर
----------------
यह बच्चा
जब दिल्ली में लेखक बना है
वहीं पला-बढ़ा है तो जाएगा कहाँ
अमेरिका इंग्लैंड वग़ैरा

यह तो अंतरराष्ट्रीय साहित्य के
सर्वेंट क्वार्टर में पैदा हुआ है
देश की नसों में मेरा ख़ून बनकर
कैसे दौड़ेगा।

33
आ बेटा
----------
बच्चा लेखक है 
सारे अंग छोटे और कोमल होंगे
मूते भी तो मुझ तक कैसे पहुँचेगी

मुझे ही जाना होगा दिल्ली
दुलार करने आ बेटा सिर पर 
कर ले मन की।

34
लीला
-------
मान्यवर आप लेखक हैं
और साहित्य के संघर्ष में नहीं हैं
तो आपकी भाषा चमकती हुई
स्निग्ध कोमल वग़ैरा तो होगी ही
आपकी उँगलियाँ अभी भी
स्वेटर बुनने की अभ्यस्त होंगी
काश मैं भी मूलतः स्त्री होता
मेरी हथेलियाँ खुरदुरी न होतीं
मैं गणेश नहीं लीला होता।

35
डण्डा
-------
वे
साहित्यपति थे

उन्होंने कहा -
झण्डा लेकर चलो

मैंने कहा -
डण्डा लेकर चलो।

36
लज्जा
-------
हे प्रभु
माइक के सामने
अख़बार के बयान में
कविता लिखते हुए 
टेढ़ी हो गयी है कवि की रीढ

जहाँ झगड़ना था मीठा बोला 
जहाँ तनकर खड़ा होना था झुका
जहाँ उदाहरण प्रस्तुत करना था 
छिपकर जिया

हे प्रभु
उसे सुख-शांति दीजिए न दीजिए
थोडी-सी लज्जा जरूर दीजिए।

37
अकड़
--------
हे प्रभु
आप हो तो ठीक है
न हो तो भी
पर हिन्दी में ऐसा वक़्त 
ज़रूर आये

जब पाठक ही पाठक हों
और पाठक के पास इतना बल हो
कि कवि और आलोचक की
अकड़ तोड़कर उसकी जेब में
डाल दें।

38

निरीह कवि
--------------
हे प्रभु
आये ज़रूर आये
हिन्दी में ऐसा भी वक़्त 

जब आलोचक अपनी अकड़
निरीह कवि के सामने नहीं
साहित्य की सत्ता के सामने
दिखाए।

39
दिल्ली भी
------------
साहित्य में
दिल्ली भी है
दिल्ली ही नहीं

सुनता कौन है
देशभर के लेखक
बहरे हैं।

40
ज्ञानी
-------
हिन्दी में
इतने ज्ञानी आ गए हैं 
कि पूछो मत

ज्ञान की आंधी में
कविता की नाव 
अब डूबी तब डूबी।

41
टैटू
------
नक़लची कवि
असली कवियों को
कविता पढ़ा रहे हैं

हँस रहे हैं चूतड़ मटका रहे हैं
उसी पर कविता का टैटू
बनवा रहे हैं।



मंगलवार, 24 अगस्त 2021

अफ़ग़ान सीरीज़


- गणेश पाण्डेय


1
ख़ुदा करे मेवे की बारिश हो
--------------------------------

यहाँ 
गाजर का हलवा बना हुआ है
क्या रंगत है वाह क्या ख़ुशबू है
ओह कितना मीठा है कितने मेवे हैं
सब ख़ालिस अफ़ग़ानिस्तान के हैं
बच्चे कटोरी भर-भरकर खा रहे हैं 
खाते-खाते खेल रहे हैं गा रहे हैं

यहाँ बारिश हो रही है 
सारे खेत-खलिहान बहुत उम्मीद से हैं
देशभर में तनख़्वाह 
और मँहगाई भत्ते में इज़ाफ़ा हो रहा है
लोग बच्चों की पढ़ाई के लिए 
शादी-ब्याह के लिए 
कपड़े और गहने ख़रीदने के लिए
बैंक से ख़ूब रुपये निकाल रहे हैं
कुछ लोग अगले चुनाव की तैयारी में हैं
ज़ोर-शोर से कमर कस रहे हैं
कोई किसी को हटाने की बात कर रहा है
कोई किसी को लाने की बात कर रहा है
बड़ी से बड़ी ग़रीबी को भूलकर
किस तरह महिलाएँ गीत गाते हुए
मतदान करती हैं
कितना सुख है यहाँ
किसी भी मंत्री चाहे प्रधानमंत्री को
कुछ भी कह सकते हैं

दुनिया में
सभी देशों में ऐसी ही बारिश होती है
या इससे कम या बिल्कुल कम होती है
इस समय पड़ोस के देशों में
कैसी बारिश हो रही होगी
बादल किस तरह गरज रहे होंगे
बिजली किस तरह चमक रही होगी
कैसी बिजलियाँ गिर रही होंगी
वहाँ के लोगों पर

वहाँ के बच्चों ने खाना खा लिया होगा
रोटी मिल गयी होगी मेवे पास में होंगे
दुधमुँहे बच्चों की माँओं की छातियों से
दूध उतर रहा होगा या नहीं 
बाज़ार खुले होंगे या नहीं
सामान मिल रहे होंगे या नहीं

ख़ुशहाली की बारिश हो रही होगी 
या बदहाली की बारिश हो रही होगी
आफ़त की बिजलियाँ गिर रही होंगी
या प्रभु की नेमत बरस रही होगी
तानाशाही की बारिश हो रही होगी
या लोकतंत्र की बारिश हो रही होगी

यहाँ उम्मीद की बारिश हो रही है
ख़ुदा करे कि हर जगह यहाँ की तरह
उम्मीद की बारिश हो
दूध-दही और मेवे की बारिश हो।


2
अफ़ग़ानिस्तान
------------------

हिंदुस्तान में बच्चे
बेख़ौफ़ राखी मना रहे हैं जैसे 
ईद और बाक़ी त्योहार मनाते हैं
सुबह से ही चिड़िया की तरह
चह-चह कर रहे हैं बच्चे
ऊब-चूभ हो रहे हैं

अफ़ग़ानिस्तान में 
आज कितनी बंदूकें बच्चों में
ख़ौफ़ पैदा करने के काम पर लगी होंगी
कितने निर्दयी निकले होंगे सड़कों पर
कितनी मासूम बेटियों को 
खिड़की की दरार से सूँघ रहे होंगे
दिन के उजाले में उनकी आँखों में
रात का अँधेरा पैदा कर रहे होंगे
पंखुड़ी जैसी उनकी कोमल नींद
अपने बूटों से रौंद रहे होंगे

आज
अफ़ग़ानिस्तान के निहत्थे भाई 
अपने और अपनी बहनों के सामने
आतंक के इस पहाड़ का सामना  
किस तरह कर रहे होंगे
कुछ तो खदबदा रहा होगा उनके भीतर
किस सोच में होंगी वहाँ की बहनें
शायद यह कि बंदूक का सामना
किस चीज़ से करना है
शायद यह कि जीना है तो किस तरह
और मरना है तो किस तरह
ओह माँएँ जी कैसे रही होंगी
उनके वालिद की दाढ़ी कितनी बार
माथे के पसीने से भीग चुकी होगी

पाकिस्तान में भी
भाई रहते होंगे बहनें भी रहती होंगी
बेटियों के माँ-बाप रहते ही रहते होंगे
ये लोग क्या सोच रहे होंगे
पड़ोस की आग के बारे में 
कहाँ तक उट्ठेंगी लपटें कहाँ तक जाएंगी
कुछ तो सोच रहे होंगे

जैसे हम 
अफ़ग़ानिस्तान की आग में
धिक रहे हैं और सोच रहे हैं।

3
ख़ूबसूरत दुनिया
--------------------

बचपन 
सबसे सुंदर देश होता है
प्यारे-प्यारे न्यारे-न्यारे
बच्चों का निराला देश होता है
जो इस छोर से उस छोर तक
पूरी दुनिया में फैला होता है

बच्चा
कहीं का हो
पाकिस्तान का हो
चाहे अफ़ग़ानिस्तान का हो 
चाहे हिंदुस्तान का बच्चा हो

दुनिया का हर बच्चा 
जहाँ कहीं भी जिस समय होता है
सिर्फ़ और सिर्फ़ प्यार का 
राजदूत होता है

कोई भी 
बच्चा हो किसी का हो
दुनिया में सबका बच्चा होता है
उसका हँसना सबका हँसना होता है

एक बच्चा 
किसी कोने में उदास होता है
तो दूसरा बच्चा आप से आप
उदास हो जाता है

अफ़ग़ानिस्तान में 
कोई बच्चा किवाड़ के पीछे 
सुबुक-सुबुककर रोता है
तो हूबहू हिंदुस्तान में भी कोई बच्चा 
रोता है

दुनिया का कोई भी बच्चा 
न कभी उदास होना चाहता है 
न रोना चाहता है सीने से चिपक पर
वह तो सबको ख़ूब-ख़ूब 
प्यार करना चाहता है

वह तो 
बड़े से बड़े हत्यारे में भी साधु ढूँढता है 
दुनिया के सबसे बुरे आदमी में भी 
अपना प्यार ढूँढता है  

ओह 
कैसे कोई निर्दयी 
अपनी माँ से लाड़ करते हुए
एक हँसते हुए बच्चे को रुला सकता है

जगह-जगह
बारूद के ढेर पर बैठा हुआ 
कोई चौधरी इस ख़ूबसूरत दुनिया को 
बर्बाद करना चाहता है।

4
बंदूक 
-------

बंदूक
बनाने वालों के पास
आँखें नहीं थीं नहीं तो 

बंदूक में 
बच्चों को देखने वाली 
आँखें ज़रूर बनाते।

5
दहशतगर्द
-------------

दहशत फैलाने वाले
माँ की कोख से नहीं पैदा होते
सीधे आसमान से फाट पड़ते हैं

ये तो कभी 
बच्चे होते ही नहीं हैं
किसी की उँगली पकड़कर 
चलते ही नहीं हैं

अपनी उँगलियों से
कभी किसी फूल को चाहे किसी 
तितली को छुआ ही नहीं होता है
किसी कंचे से खेला ही नहीं होता है

अपनी 
नन्ही उँगलियों से कभी
माँ के होठों को छुआ नहीं होता है
माँ के पयोधरों का अमृत 
पिया नहीं होता है

शायद 
ये इंसानों की बस्ती में नहीं
किसी जंगल में पैदा होते हैं
शायद बंदूक की नली से पैदा होते हैं
शायद कारतूस के खोखे से 
पैदा होते हैं

शायद 
सीधे ट्रिगर पर
आधा-अधूरा पैदा होते हैं
सिर्फ़ इनकी उँगलियाँ पैदा होती हैं
बिना दिल और दिमाग़ के वहीं
जवान होती हैं और जवानी में
मर जाती हैं।

6
बच्चों की उँगलियाँ
---------------------

बच्चे
गुलाब के फूल और काँटे को
एक जैसी ललक से छूते हैं

बच्चे
सुख़र् आग और सफ़ेद बर्फ़ को
एक जैसी उत्सुकता से छूते हैं

बच्चे
माउथऑर्गन और बंदूक को
एक जैसी निडरता से छूते हैं

बच्चे
मनुष्य पशु और पक्षी को
एक जैसे रिश्ते में बँधकर छूते हैं

बच्चे
अपनी सबसे अच्छी उँगलियों से 
दुनिया की हर चीज़ प्यार से छूते हैं।

7
अफ़ग़ानी लोग
-----------------

ये कैसी 
कोमलांगी स्त्रियाँ हैं जिन्होंने
अपने बच्चों के लिए अपने देश के लिए
देह से चिपकी कोमलता की पंखुड़ियों को 
नोचकर फेंक दिया है

बंदूकों से नहीं डर रही हैं
इन्हें टैंक नहीं डरा पा रहा है
न इन्हें तालिबान का ख़ौफ है
न पाकिस्तान की फ़ौज का

दुनिया वालों देखो
फूल जैसे बच्चों की सोने जैसी माँओं ने
ख़ुद को लोहे जैसा बना लिया है
इनके कंठ में लोहे जैसे इरादों की आवाज़ है
इनके हाथों की तख़्तियाँ कैसे चीख़ रही हैं
काबुल की सड़कों पर दूसरी जगहों पर
हर स्त्री पंजशीर बन गयी है

मारो उसे मारो
जीभर मारो कोड़े से मारो
उसे भून दो गोलियों से वह नहीं लड़ेगी
तो कौन लड़ेगा उसके बच्चों के लिए
उसे लड़ना ही होगा

इन स्त्रियों के बड़े-बड़े बच्चे
और सहोदर अपनी मातृभूमि के लिए
दुनियाभर में फैल चुके हें प्रदर्शन कर रहे हैं
हाथों में तख्तियाँ लिए चीख़ रहे हैं
अपने देश को बचाने की अपील कर रहें हैं

एक हँसता-खेलता हुआ देश
किस तरह अचानक दुनिया का सबसे दुखी 
और दुश्चिंताओं वाला देश बन गया है
अफ़ग़ानी लोंगों को चैन कहाँ नींद कहाँ
भूखे-प्यासे बस यही सोचते होंगे
कैसे कुछ लोगों ने हमारे समय को
एक बर्बर समय में बदल दिया है
इस बर्बरता के खि़लाफ़ कुछ सोच रहे होंगे।








रविवार, 27 जून 2021

स्त्री सीरीज़

-गणेश पाण्डेय

1

---------------
भारतीय सास
---------------

जो औरत
औरत नहीं होती है सास होती है
सास रहते हुए भी वह औरत चाहे तो 
उसके भीतर एक औरत ज़िदा रह सकती है
ऐसा होता तो कितना अच्छा होता 
संसार की सारी औरतों का मन 
कितना सुंदर होता

औरत तो औरत होती है
माँ भी होती है सास भी होती है
जब कोई औरत कम औरत होती है
तो माँ भी कम होती है और सास भी
कठोर

माँ जन्म देती है
सास बहू को जन्म नहीं देती है
लेकिन सास अच्छी हो तो बहू को
सिर्फ़ अपना बेटा ही नहीं नित आशीष
अपनी गोद और अपना आँचल भी
ज़रूर देती है 

कम औरत 
जब कठकरेजी सास होती है
तो बहू की हारी-बीमारी में
उसके लिए आए दूध और फल
तीन चौथाई आँखों से ओझल कर देती है
बेटे के सामने आदर्श सास बनकर
बहू के लिए सेब काटकर ले जाती है 
बेटे के बाहर जाने पर पूछती भी नहीं
बहू जी रही हो कि मर रही हो

ओह सासें भी
तरह-तरह की होती हैं
कुछ तो मोरनी जैसी होती हैं
नाचती रहती हैं नाचती रहती हैं
बहुओं के सिर पर
कुछ फ़िल्म की हीरोइनों की तरह
हरदम बनी-ठनी रहती हैं गोया बहू के संग
सौंदर्य प्रतियोगिता में भाग लेना हो
कुछ तो बिल्कुल सौत की तरह होती हैं
पत्लू से बाँधकर रखना चाहती हैं बेटे को
बहू को उसके साथ अकेले
कहीं जाने ही नहीं देतीं
और चला जाए तो दम पर दम
फोन करती रहती हैं
इंग्लिश मीडियम की सास हो 
चाहे हिंदी मीडियम की 
चाहे अँगूठा ही क्यों न लगाती हो
जिसे ख़ुद पर ज़रा -सा भी भरोसा नहीं होता है
चाहती है कि बेटे पर वर्चस्व कम न होने पाए
बहू के रंग में कुछ तो भंग पड़ जाए
ऐसी सासें प्रेम और प्रेमविवाह
दोनों की पैदाइशी शत्रु होती हैं
निन्यानबे फ़ीसद 
प्रेमविवाह की विफलता का मुकुट
इन्हीं के सिर पर सजता है
वैसे भारतीय सासों में
अंग्रेज़ी और हिंदी मीडियम की सासों को भी
भोजपुरी और अवधी में आते देर नहीं लगती है
जैसे हिंदी का सारा व्यंग्य बाण
इन्हीं के मुखारविंद से पैदा हुआ हो
इन्हें बेटे का घर बसे रहने में नहीं
बहू का घर उजड़ने में ख़ुशी होती है

भारतीय सासों के जंगल में टीवी पर
अशक्त सासों के पीटे जाने की ख़बरें
अब बिल्कुल विचलित नहीं करतीं
लगता है कि ज़रूर इसने कभी
अपनी बहू को ख़ूब सताया होगा
असल में इस देश में 
सासों की क्रूरता का लंबा इतिहास है
लोकगीतों और लोककथाओं में ही नहीं
हमारे समय में भी ऐसी सासें
अपनी-अपनी पारी खेल रही हैं
और अपने माँ-बाप से दूर बेटियाँ
पिस रही हैं रो रही हैं
रोज़ डर रही हैं
और ऐसी बदनसीब बेटियों के माँ-बाप
फोन की घंटी से भयभीत हो जाते हैं
राम जाने आज क्या किया होगा
डायन ने मेरी बच्ची के साथ

उफ़
वह औरत 
जो तनिक भी औरत नहीं है
न सिर्फ़ भारत की बल्कि
पृथ्वी की सबसे भयानक सास है
वह ज़रा-सा भी औरत होती
तो अपनी बहू को बेटी न भी समझती
तो कम से कम अपनी बहू तो 
समझती ही समझती
इस तरह किसी विदीर्णहृदय 
सुदूर निरुपाय पिता की बेटी को 
दासी न समझती वह भी समझ लेती
तो भी स्त्री तो समझती
अपने चरणों की धूल न समझती

ऐसी बहुओं के जीवन में
तिरस्कार के सिवा कुछ नहीं होता है
न प्यार न सुख न साज-सिंगार 
जिनके पति कान के कच्चे होते हैं
और जिनके लिए माँ की हर बात
पत्थर की लकीर होती है

सभी बेटे ऐसे नहीं होते हैं
तमाम बेटे माँ-बाप की भी आलोचना
ख़ूब करते हैं उनसे बहस करते हैं
उनकी कमियाँ बताते हैं
जिनके पति ऐसे नहीं होते हैं
जिनके पिता प्रभावशाली नहीं होते हैं
और जो कमज़ोर घरों से आती हैं
उन बहुओं का भाग्य ऐसी ज़ालिम सासें
अपने बाएँ पैर के अँगूठे से लिखती हैं।


2

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राग दौहित्री
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सद्यःप्रसूता
बेटी के कंधे पर 
उसकी नवजात आत्मजा
कोमलांगी अति गौरांगी
जैसे शस्यधरा के कंधे पर 
नयी-नयी बनी नन्ही पृथ्वी
यह सब देखना 
सबको नसीब नहीं होता

बोलती हुई पृथ्वी की आँखों से
निःशब्द सुनते चले जाना
ब्रह्मांड के अख़ीर तक
और फिर वापस लौट आना
बोलती हुई आँख की पुतली में
उसी में समा जाना
नाना नाना नाना
और कोई शब्द नहीं

उसकी एक नन्ही पंखुड़ी जैसी
स्मिति में ग़ुम हो जाना क्या होता है
सब कहाँ जान पाते हैं कहाँ छू पाते हैं 
अपने जीवन में इतना कुछ
इसके आगे निस्सार है 
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री का पद
चाहो तो प्रधानमंत्री जी से पूछ लो 
चाहे मुख्यमंत्री जी से पूछ लो
ईश्वर जिससे प्रसन्न होते हैं 
उसे यह नयी दुनिया दिखाते हैं
उसे सचमुच का मनुष्य बना देते हैं

बाक़ी आज की राजनीति क्या है
और साहित्य तो कुछ है ही नहीं
जो है सब एक गोरखधंधा है

मेरे लिए आज
मेरी बेटी की बेटी सबकुछ है
मेरी बेटी की आकृति है छवि है
उसकी रूह है उसकी आवाज़ है
मेरे कानों में मेरी आँखों में
मेरे घर के हर हिस्से में
आँगन में छत पर अहर्निश 
बजती हुई यह नन्ही-सी 
मद्धिम-सी प्यारी-सी आवाज़ 
मेरे जीवन के पुराने संतूर पर 
नई सुबह का एक राग है
राग दौहित्री।


3

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मायका
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बेटी 
आज मायके में आयी है
माँ को उसकी नवासी सौंपकर
तीसरे पहर से सो रही है जैसे
युगों की नींद लेकर आयी हो

रात हो गयी है 
ज़्यादा रात हो गयी है
पिता को न भूख लगती है न प्यास
बेटी जागेगी तो पहले उससे करेंगे बात
फिर उसी के साथ खाएंगे कौर-दो कौर

भाई चुप है 
कुछ नहीं बोलता है
पिता व्यथित हैं कुछ नहीं कहते
जैसे उनके हृदय पर मद्धिम-मद्धिम
आरी जैसी कोई चीज़ चल रही हो
बेटी बिना मिले सोने चली गयी है

माँ
नवासी को बैठक में लाती है
नाना की गोद में रख देती है
नवासी नाना को देख मुस्काती है
नाना उसे देख जी उठते हैं।

4

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दहेज में हिमालय 
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माँओ
तुम्हारी बेटियाँ
डलिया-मौनी बनाना न सीखें
चादर और तकिए पर कढ़ाई न सीखें
अनेक प्रकार के व्यंजन बनाना न सीखें
भरतनाट्यम चाहे सुमधुर गायन न सीखें
तो तनिक भी अफ़सोस मत करना

माँओ
अपनी बेटियों को विदा करने से पहले
उन्हें बहुत पौष्टिक चीज़े खिलाना
जितना दूध बेटे को देना उससे ज़्यादा उन्हें
उनके हाथ-पाँव हाकी की तरह ख़ूब
मज़बूत करना सिर्फ़ खेलने के लिए नहीं
बड़ी से बड़ी मुसीबत से पार पाने के लिए 

माँओ
तुम्हारी बेटियाँ
सजने-सँवरने में मन न लगाएं
क्रीम-पावडर होंठ लाली न लगाएँ
तो उन्हें सुंदर दिखने का ज्ञान
मत देने बैठ जाना

माँओ
तुम्हारी बेटियाँ
पढ़ने में मन लगाएँ तो उनकी
चुटिया कसके ज़रूर खींचना
गदेली से उनके गाल पूरा लाल कर देना
हेडमास्टर से अधिक सख़्ती करना

माँओ
दहेज जुटाने में अक़्ल से काम लेना
ऐसी चीज़ें देना जिसे आग जला न सके
पानी गला न सके चोर चुरा न सके
और शत्रु जिस पर विजय न पा सके
प्रतिभा और योग्यता का ऐसा हिमालय
बेटियों के ससुराल को भेंट करना
जिसे वे तोड़ न सकें।

5

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कारागृह
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बिटिया
आदमियों के इस जंगल में
अकेले जीना चाहे बच्चे को पालना
थोड़ा मुश्किल ज़रूर है
नामुमकिन नहीं

तुम्हारा पति 
तुम्हें महत्वहीन समझे
घर को सिर्फ़ अपना समझे तुम्हारा नहीं
सारे फ़ैसले ख़ुद करे तुम्हें पूछे तक नहीं
तुम्हारा पैसा तुमसे छीन ले

तुम्हारा शौहर कहे
कि सास-ससुर से पूछे बिना
तुम अपने मायके नहीं जा सकती
तो समझ लो कि तुम एक जेल में हो
तुम्हारा पति प्रेमी नहीं एक जेलर है
और तुम उम्रक़ैद की सज़ा भुगत रही हो

बिटिया
भगवान न करे 
कि ऐसा कुछ किसी के जीवन में घटे
लेकिन ऐसा कुछ हो ही तो डरना मत
अपने माँ-बाप से एक-एक बात करना
भाई से कहना ये सब तुम्हारे साथ होंगे

बिटिया
इस सामाजिक कारागृह के 
सींखचों को तोड़ना ही होगा
ऊँची चहारदीवारी को ढहाना ही होगा
तुम्हें बाहर खुली हवा में साँस लेना होगा
तुम्हें जीना होगा बिटिया अपने लिए
अपने बच्चों के लिए।

6

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बहू का तराना
---------------

सास जी सास जी 
ऐसा ना सोचें आप जी 
केवल लड़कों के होते हैं 
माँ-बाप जी

सास जी सास जी
लड़कियों के भी होते हैं माँ-बाप जी 
ऐसा नहीं समझेंगी तो फूँक दूँगी 
सास जी

सास जी सास जी
पैर से मसलने की सासगीरी छोड़कर
माँ बन जाएंगी तो भला करेंगे
राम जी

सास जी सास जी
आप भी बहू थीं यह भूल जाएंगी
तो चक्कू मारूँगी हँसिए से काटूँगी
सास जी

सास जी सास जी
पढ़-लिखकर दिमाग़ में गोबर भर लेंगी 
तो सबके सामने इज़्ज़त उतार दूँगी 
सास जी

सास जी सास जी
रूल नहीं करेंगी डायन नहीं बनेंगी 
राम भजेंगी तो पूजा करूँगी आपकी
सास जी।

7

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यहाँ सब तुम्हारा है
--------------------

हे बेटी
ससुराल में
कोई बड़ा-बुज़ुर्ग
कुछ समझाए चाहे सिखाए
तो उसे सिर माथे लगाना

कोई ऐसा 
आदरणीय बुज़ुर्ग
अकारण डाँटने-फटकारने लगे 
चाहे बात-बात पर अपमानित करे
चाहे नीचा दिखाए चाहे ताने दे
किसी बेजा चीज़ के लिए
मज़बूर करे
तो उसका आदर-फादर करना
छोड़-छाड़कर पहली ट्रेन से
चाहे पहली जहाज से उड़कर
अपने घर लौट आना

यहाँ 
तुम्हारा घोंसला 
उसका एक-एक तिनका
बिल्कुल वैसे का वैसा है
तुम्हारा कमरा 
तुम्हारी आलमारी
तुम्हारी मेज़ तुम्हारी किताबें
तुम्हारा गुलदस्ता तुम्हारी पेंटिंग
सब जस का तस हैं
तुम्हारी माँ तुम्हारी बहन
तुम्हारे पिता और भाई का
दिल कलेजा कंधा और बाहें
सब वही हैं

यहाँ क्या है जो तुम्हारा नहीं है
धरती और आसमान
सब तुम्हारा है।

8

-----------------
बहादुर बेटियो
-----------------

कोई ऐसा मिले
जो तुम्हारे बच्चे का बुरा चाहे
तो उसे पहले प्यार से समझाना

फिर भी नुक़सान पहुँचाना चाहे
तुम्हारे बच्चे को सुई चुभोना चाहे
तो तुम भी चाकू निकाल लेना

फिर भी न माने दुष्ट
तुम्हारे बच्चे पर चाकू चलाना चाहे
तो तुम तलवार निकाल लेना

फिर भी न माने
तो जान की बाज़ी लगा देना
उस राक्षस को चीरफाड़ देना

ओ पृथ्वी की बहादुर बेटियो
संसार उदाहरणों से भरा पड़ा है
माँएँ कैसे बाघ से लड़ जाती हैं।

9

----------------
पिता की सीख
----------------

मैंने 
अपने समय के कई सूर्य को 
असमय ढलते हूए देखा है बेटी
उन्हें बादलों में घिरते हुए देखा है

मेरी बेटी एक से एक तप्तसूर्य को 
चंद्रमा होते जग को शीतल करते देखा है
बेटी मैंने विशाल पर्वत के सीने से 
मीठे पानी का सोता फूटते हुए देखा है

मैंने लोहे को 
मोम की तरह पिघलते हुए देखा है बेटी
मैंने निष्ठुर सास को भी माँ की तरह
अपनी बहू को कलेजे से चिपकाकर 
आँचल की छाँव देते हुए देखा है

मेरी बेटी 
समय और परिस्थितियों के थपेड़े 
बड़े-बड़े ग्रंथों से भी बड़ी सीख देते हैं
कई बार सास के भीतर का डर 
उसे सख़्त बनाता है और डर का क्या है 
जितनी जल्दी घर बनाता है उसी तरह
दबे पाँव वापस अपने देश लौट जाता है
मेरी बेटी लगता है थोड़ा वक़्त लगता है
समय बदलता है मन बदलता है।

10

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सुख
------

बेटी 
तुम्हारी कलाई में 
यह सुनहला कंगन
बहुत अच्छा लगता है

तुम्हारे सुंदर गले में 
यह बड़ा-सा मंगलसूत्र
और भी अच्छा लगता है

तुम्हारी आँखों की अपूर्व चमक
दमकते हुए ललाट पर सुर्ख़ बिंदी
और लाल-लाल होंठों पर लाल मुस्कान
बहुत अच्छी लगती है

तुम्हारी गोद में बेटी
खिल-खिल करती दौहित्री की
किलकारी सबसे अच्छी लगती है
सृष्टि की सबसे सुंदर कलाकारी लगती है

एक साधारण 
भारतीय पिता के लिए 
इस सुख से ज़्यादा अच्छा 
और क्या हो सकता है।





रविवार, 23 मई 2021

आवारा सरकार

- गणेश पाण्डेय

(1)

जनता
सरकार बनाती ज़रूर थी
बनाए बिना मानती नहीं थी
लेकिन
बन जाने के बाद वह सरकार 
जनता की क्यों नहीं रह पाती थी
आखि़र
वह कौन बीच में आ जाता था
जिसके साथ सरकार हर बार भाग जाती थी
बेचारी
जनता हाथ मलती रह जाती थी
दिन-रात बच्चों के बारे में सोच-सोच कर
हलकान होती रहती थी
गऊ जैसी सीधी-सादी जनता कर भी क्या सकती थी
जो जिधर कहे अपनी सरकार ढूँढने चली जाती थी
किसी माई के थान पर किसी पीर-मुर्शिद के पास कहीं भी
और थक-हार कर वापस अपनी बस्ती में लौट आती थी।

(2)


जनता 
कोई एक थोड़े थी
कई शक्लों और कद-काठी में बँटी हुई थी
पहले का मुँह सबसे बड़ा था हिंदू था
दूसरा मुसलमान था तीसरा सिख था
चौथा ईसाई था पाँचवाँ घमंजा था
और इनकी सरकारें आवारा थीं
तरह-तरह के लिबास पहनती थीं
इत्र लगाती थीं गहने गढ़ाती थीं
किसी के भी साथ कभी भी भाग जाती थीं
कभी हिंदू की सरकार भाग जाती थी
तो कभी मुसलमान की कभी किसी की
सरकार मुँह अँधेरे भी भागती थी
तो कभी दिन दहाड़े भी भागती थी
जब सरकार भाग जाती थी
तो जनता के मुँहों से हवाईयाँ उड़ जाती थीं
जैसे यह सब
उसके साथ पहली बार हो रहा हो
जबकि उसके साथ हर बार यही होता था 
पहले से उसके राजनीतिक भाग्य में लिखा होता था
सरकार भागेगी तो कुछ दिन जनता रोये-धोयेगी
और जगह-जगह सरकार को ढूँढने के बाद 
अंत में रपट लिखाने थाने पर जाएगी।

(3) 

इतना बड्डा
हुजूम देखकर 
थानेदार की भौंहें फड़कने लगी थीं
कड़क आवाज़ में पूछा क्या माज़रा है,
हिंदू ने कहा हुज़ूर मेरी वाली भाग गयी 
मुसलमान ने कहा मेरी वाली भाग गयी 
फिर औरों ने भी कहा मेरी वाली भाग गयी
थानेदार ने झल्लाकर कहा -
अबे कुल कितनी भैंसें भाग गयीं
सबकी भैंसे एक साथ भागीं या भगायी गयीं
- नहीं, नहीं थानेदार साहब
भैंस नहीं हमारी सरकारें भाग जाती हैं
उनके भागने-भगाने की रपट दर्ज़ करो
थानेदार ने रोबीली आवाज़ से हड़काया -
क्या मैं तुम्हें पागल दिखता हूँ
अरे गधो सरकारें भी कहीं भागती हैं
हा हा हा हो हो हो
भागो यहाँ से तुम सब
भाँग खाकर आये या गाँजा पीकर
ऐसी सरकारें बनाते ही क्यों हो
जो किसी भी अड्डे-बड्डे के संग भाग जाएँ। 

(4)

पुरानी-धुरानी
हवेली उदास थी 
कनीज़ की कनीज़ दिखती 
कनीज़ चमेली उदास थी
फटेहाल नवाब साहब उदास थे 
तबलची उदास थे गवैये उदास थे
नचनिये-पदनिये उदास थे मतलब
हिंदी के कबी-सबी अम्पादक-संपादक
और अफ़सानानिगार वगैरह सारे
इनामी-सुनामी सब उदास थे
चाँदनी रात और सुरमई शाम
और सुर्ख़ आफ़ताब सब उदास थे
राजनीति की इस उदासी पर लिखी जा रही
कविताएँ उदास थीं कहानियाँ उदास थीं
दिन उदास था उजाला उदास था
चाय का प्याला और रसरंजन का गिलास
सब उदास था 
बहत्तर साल से ढहती हुई हवेली उदास थी
यहाँ तक कि उदासी भी उदास थी
हम सबकी बेग़म सरकार 
किसी साहूकार के साथ भाग गयी थीं।

(5)

जिन सरकारों को 
जनता के साथ घर बसाकर रहना नहीं आता
तो बनती ही क्यों हैं इंकार क्यों नहीं कर देतीं
शुरू में ही कह क्यों नहीं देतीं
कि हमें मुँह दिखाई में चंद्रहार चाहिए 
हमें रहने के लिए सोने के लिए
अच्छे से अच्छा सोने का महल चाहिए
नये ज़माने का एंटीलिया-फेंटीलिया से भी शानदार चाहिए 
दूल्हा तो सबसे अमीर चाहिए खानदान आला चाहिए
किसी चिरकुट निरहुआ घिरहुआ के साथ
उसकी टप-टप चूती झोपड़ी में नहीं रहना है।

(6)

यही वक़्त था सही वक़्त था
जब पुलिस की नाकामी के बाद
जासूस तिरलोकचन को लाया गया
जासूस ने अपना हैट उतारा
सिर खुजलाया आँखे मिचकाया
और बताया-
इसी सरकारी बंगले से 
इसी वजीर की कोठी फाँदकर
इसी चोर रास्ते से इसी सुरंग से
इसी आँख में पट्टी बंधी हुई 
किताब से मुँह छिपाकर 
सरकारें भागती रहती हैं
जासूस तिरलोकचन ने
ऐलान किया था कि उन्होंने 
भागी हुई सरकारों के बारे में
सब पता कर लिया है
कौन हैं जो ऐसी मनचली सरकारों को
भगाकर ले जाते हैं और ऐश करते हैं
ऐसे लोगों के खि़लाफ़ सारे सबूत हैं
सारे गवाह हैं मुकम्मल तैयारी है
हम इन्हें गिरफ़्तार कर सकते हैं
हम इन्हें हमेशा के लिए
सलाखों के पीछे डाल सकते हैं
जासूस तिरलोकचन ने
जनता की ओर देखा अपना हैट उतारा
पीठ पर हाथ ले जाकर सिर झुकाया
और अतिविनम्रता से कहा- 
बस एक बार ढंग से 
जनता का साथ देने वाली
सरकार आ जाय।