गुरुवार, 23 जनवरी 2020

बच्चे : कुछ कविताएं

- गणेश पाण्डेय

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बच्चों की प्रतीक्षा
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जब
बच्चे बहुत छोटे थे
नौकरी पर जाते समय
हाथ पकड़कर झूल जाते थे
पीठ पर चढ़ जाते थे
पैरों से लिपट जाते थे

अब
मैं रिटायर हो गया हूं
बच्चे बाहर काम पर हैं
मेरे पैर मेरे कंधे मेरी बाहें सब
घर पर बच्चों की प्रतीक्षा करते हैं।

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कितने दिन रह गये हैं
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होली में
कितने दिन रह गये हैं

पूछता हूं पत्नी से, कहती हैं
रोज एक ही बात पूछते हैं

चुप हो जाता हूं दूर से
चुपचाप कैलेंडर देखता हूं

मोबाइल में ढूंढता हूं
होली की तिथि दिन गिनता हूं

रिटायर हो गया हूं न, बच्चे आएंगे
तो फिर काम पर लग जाऊंगा।

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बच्चे आ गये हैं
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कोई चिड़िया पीछे से
सिर पर पंख फड़फड़ाती है

कोई तितली
चुपके से कंधे पर बैठ जाती है

कोई हिरन
सामने से कुलांचे भरता है

कोई शावक टीवी पर
धूप में बाघिन के मुंह चूमता है

कोई शख्स
दरवाजे की कुंडी खटखटाता है

कोई जहाज
हवाई अड्डे पर उतरता है

कोई पीछे से
मुझसे जोर से लिपट जाता है

हजार बातें हैं पता चल जाता है
बच्चे आ गये हैं।



मंगलवार, 14 जनवरी 2020

प्रधानमंत्री की कुर्सी तथा अन्य कविताएं

- गणेश पाण्डेय

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प्रधानमंत्री की कुर्सी
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भावी प्रधानमंत्री जी ने कहा है
ठीक ही कहा है बहुत ठीक कहा है
पक्का चौबीस कैरेट कहा है
कि वर्तमान प्रधानमंत्री के पास
छात्रों के सवालों का जवाब नहीं है

भावी प्रधानमंत्री जी से
विनम्र प्रार्थना है कि आप आज ही
बल्कि अभी इसी वक्त छात्रों को
कुछ घंटे ट्यूशन पढ़ा दीजिए 
सेमेस्टर इम्तहान जल्द होने हैं
फेल होने से बच जाएंगे

अलबत्ता भावी प्रधानमंत्री जी
पहले अपनी तमाम जेबों में
यहां तक कि चोरजेबों में 
और गिरेबां वगैरह में
जुबान को उलट-पलट कर
और घर के पुस्तकालय में भी 
देख लीजिए
हर किताब में माथापच्ची करके
सही जवाब ढ़ूंढ लीजिए

गरीबी हटाने की
कितनी जोरदार कोशिश हुई
गरीबी टस से मस नहीं हुई
जमींदारी उन्मूलन हुआ
फाइवस्टार फार्म हाउस बने
राजनीति में जमींदारी घुस आई
व्यापार में जमींदारी घुस आई
सभी दलों की जमींदारी
छात्र राजनीति में घुस आई
और बची-खुची जमींदारी
साहित्य में घुस आई


राजाओं का प्रिवीपर्स बंद हुआ
खादी पहनने वाले नये राजाओं
और राजघरानों का उदय हुआ
अपना समाजवाद बेचारा सालों से
लोकतंत्र के किसी कोने-अंतरे में
लावारिस और मरियल कुत्ते की तरह
दुबका हुआ दम तोड़ रहा है

पिछले राज में भी
मनुष्येतर प्राणी ही हलवा खा रहे थे
इस राज में भी एक से बढ़कर एक
उसी तरह के जीव-जन्तु खा रहे हैं
कुछ तो रोज-रोज
एक बार में पूरा देश खा जा रहे हैं
यह देश भी कोई देश है 
जनता का देश नहीं है
राजनेताओं की ऐशगाह है
ऐसे में
हम जो जनता हैं कहां जाएं
जिनके हिस्से में सिर्फ घास-फूस है

भावी प्रधानमंत्री जी
इन सवालों का जवाब हो
तो जरूर दीजिए
उन्हीं छात्रों युवाओं को दीजिए
जिन्हें आप जैसे तमाम राजनेता
आग में झोंक कर उस पर
अपनी मिस्सी रोटी सेंकते रहे हैं

पता नहीं अभी
कितने हजार साल तक
प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए
भावी और मौजूदा प्रधानमंत्रियों की
लगाई आग में हमारे बच्चे
ऐसे ही जलते रहेंगे।

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आधा सच
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जब
आधा सच ही
बोलना है

और
बोलना ही है

तो
बायीं कुर्सी पर
बैठकर बोलूं

चाहे
दायीं कुर्सी पर
बैठकर बोलू़ं

क्या फर्क पड़ता है
जब आधा ही सच
बोलना है।

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गिरना तय है
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पूरब
दीवार है

पश्चिम
दीवार है

उत्तर
कुर्सियां हैं
तीन टांग की

दक्षिण
स्टूल है
ढ़ाई टांग की

गिरना तय है
तो डरना क्यों

कहीं भी
बैठ जाओ

और ऐसे बैठो
कि बैठ जाओ

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मीडिया में विचार की कमी है
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दिल्ली की मीडिया में
विचार ही नहीं आचार की भी
बहुत कमी है

दिल्ली की मीडिया
असल में देश की मीडिया है
और बदनाम इतनी है कि पूछिए मत

कोई इसे गोदी मीडिया कहता है
कोई इसे सोती मीडिया कहता है
कोई इसे दल्ला मीडिया कहता है
कोई इसे बुद्धू मीडिया कहता है
कोई कुछ कहता है कोई कुछ

दिल्ली की मीडिया
इतनी होशियार है कि पूछिए मत
शेर हो या चूहा उठाने के लिए
एक ही क्रेन का इस्तेमाल करती है
चम्मच और बेलचे में फर्क नहीं करती

उसके लिए हिन्दी का
लेखक दो कौड़ी का है
हिंदी की हीरोइनें
और अंग्रेजी की लेखिकाएं पूजनीय
दिल्ली की मीडिया के लिए
विश्वविद्यालय सिर्फ जेएनयू है
बाकी देशभर के विश्वविद्यालय
थूथूथू हैं।



   




शुक्रवार, 10 जनवरी 2020

धर्मग्रंथ तथा अन्य कविताएं

- गणेश पाण्डेय

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धर्मग्रंथ
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मैं जालीदार टोपी पहन लूं
मैं कुरआन की आयतें पढ़ लूं
मैं उर्दू से बहुत प्यार करने लगूं
तो क्या मुसलमान हो जाऊंगा

मैं शिखा रख लूं
मैं धोती पहनने लगू़ं
मैं वेद की ऋचाएं पढ़ने लगूं
मैं मानस को प्रेम करने लगू़ं
मैं कृष्ण की वंशी बजाने लगूं
तो क्या हिंदू हो जाऊंगा

मैं कोट पैंट पहनने लगूं
मैं हैट लगाने लगूं
मैं बाइबिल पढ़ने लगूं
मैं गोरी मेम से प्रेम करने लगूं
तो क्या ईसाई हो जाऊंगा

मैं
बेगुनाहों का कत्ल करूंगा
और ऐसे कातिलों के लिए
जिंदाबाद का नारा लगाऊंगा
तो मुसलमान कैसे हो सकता हूं

मैं
गले में हरदम क्रास लिए घूमूंगा
बात-बात पर धमकी दूंगा
परमाणु बम गिराने की
तो ईसाई कैसे हो सकता हूं

मैं
धर्म के नाम पर
नित छप्पनभोग का भोग लगाऊंगा
प्रेम अहिंसा करुणा बंधुत्व छोड़
बार-बार त्रिशूल चमकाऊंगा
अहिंदुओं से नफरत करूंगा
तो हिंदू कैसे हो सकता हूं

मैं
अच्छा हिंदू अच्छा मुसलमान
अच्छा सिख अच्छा ईसाई
अच्छा पारसी नहीं हो सकता
अगर धर्म की शिक्षाओं को
जीवन में उतार नहीं सकता
फिर मनुष्य कैसे हो सकता हूं

धर्म का उद्देश्य
इससे इतर आखिर है क्या
धर्म हमारे जीवन में नहीं
तो किस काम का
और धर्म का मनुष्यता से
कोई रिश्ता ही नहीं है तो ले जाकर
सारे ग्रंथ हिंद महासागर में
डुबो दो।

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नागरिकता रजिस्टर
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बेशक
आप मेरे कंधे पर बैठकर
मोदी की एक-एक मूंछ
उखाड़ लीजिए

बेशक
आप नागरिकता रजिस्टर
चिंदी-चिंदी कर दीजिए
फूंककर उड़ा दीजिए

बेशक
मेरे किसी और सवाल का
कभी जवाब मत दीजिए
एक चुप हजार चुप रहें

बस
इतना बता दीजिए
पुरस्कृत ही क्यों साहित्य का
नागरिक है शेष घुसपैठिया

कृपा होगी
दोनों हाथ से उठाकर
साहित्य का नागरिकता
रजिस्टर सबको दिखा दीजिए।

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सीसीटीवी फुटेज
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इस साल
खूब खराब कविताएं लिखीं
कविता में कोई बुजुर्ग जिंदा रहा होता
तो कहता शाबाश

इस साल
दो बच्चों की शादी हुई
छोटी बिटिया की और बेटे की
फोटो लेने की सुध नहीं रही
सो लगाया नहीं
बच्चे देंगे तो लगा दूंगा

अरे हां
साल जाते-जाते भले लोगों के लिए
एक नया खाता खोला खाता क्या
जीवन की ओर एक खिड़की
सोचा पुराने खाते को मुड़कर
देखूंगा नहीं

लेकिन हिंदी ने
पीछे से कालर पकड़ लिया और कहा-
तू चला जाएगा तो मेरा क्या होगा
कालिये

मैंने अकबर को याद किया और कहा-
नहीं नहीं एक दम से नहीं जाऊंगा
शिया के साथ शिया रहूंगा
सुन्नी के साथ सुन्नी
नाराज मत होना
मेरी मुन्नी

अच्छे के साथ अच्छा रहूंगा
और हिंदी के बुरों के साथ
नये साल में भी उनसे ज्यादा
बुरा रहूंगा

खूब झब्बा-सब्बा उतारूंगा
कम बुरे को डांटूंगा ज्यादा का
अंगरखा चर्र-चर्र फाड़ूंगा
फोटो खींचकर रख लूंगा

जब भी ऊपर से
कबीर तुलसी निराला वगैरह का
बुलावा आएगा तो आज के
लेखकों के सीसीटीवी फुटेज
ले जाऊंगा

आज तो कोई है ही नहीं
कविता के किसी बुजुर्ग के पास
मुंह ही नहीं है जो कह सके शाबाश

कुछ बड़े भाई हैं थोड़े से दोस्त
और कुछेक बहनें जिनके कहने पर
लिखे जा रहा हूं खराब कविताएं
सालों-साल।

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लेखक देश के साथ गद्दारी करते हैं
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आज
दो के लिए
अच्छे दिन हैं

इनके बाद
कल चार के लिए
फिर अच्छे दिन आ जाएंगे

हम आप
आखिर कहां जाएंगे
जहां हैं वहीं रहेंगे
लौट के बुद्धू घर आएंगे
एक ही घर के चार के घर

आज दो को
हटाने का काम कर रहे हैं
कल चार को हटाने का करेंगे
जनता होने का मतलब है
हजार बार यही काम करना है

हम जनता हैं
हमारा काम ही है खुद खड़े रहो
कुर्सी पर इन्हें फिर इन्हें बैठाओ
और फिर उन्हें बैठाओ
इस बैठाने के खेल में खुद बैठ जाओ

बुरा यह नहीं कि हम मजबूर हैं
बुरा यह नहीं राजनेता झूठ बोलते हैं
धोखा देते हैं पहले मीठा बोलते हैं
फिर गोली का डर दिखाते हैं

इस देश के लिए बुरा
यह कि लेखक भी झूठ बोलते हैं
देश के साथ गद्दारी करते हैं
न राजनीति का पूरा सच बताते हैं
न ढंग का विकल्प बनाते हैं

हम जनता हैं
लेखकों का क्या कर सकते हैं
इन्हे़ं पटककर मार भी नहीं सकते
इनका झब्बा-सब्बा नोच नहीं सकते
वोट देने और बारबार इसी तरह
सरकार बदलने के अलावा
हम क्या कर सकते हैं।

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मेरी खराब कविताओं को मत देखे
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उसने
साहित्य में शायद
अभी कोई जबर्दस्त
लड़ाई नहीं की है

इसीलिए उसे
फूल तितलियां नदी
प्रेम और देह का उत्सव
कविता में खूब भाता है

उसे
नखविहीन कविताएं
या फिर नेलपालिश लगी
चिकनी-चुपड़ी कविताएं
और सुंदर सजीले कवि
बहुत अच्छे लगते हैं

उसे
संगठनों से जुड़े कवियों की
फर्मूलाबद्ध प्रतिरोधी कविताएं
और हजार बार गाये हुए गीत भी
बहुत अच्छे लगते हैं

बस उसे
मेरी खराब कविताएं पसंद नहीं हैं
जिनमें साहित्य की काली दुनिया का
लंबा-चौड़ा बही खाता है
और अपने समय का सही खाता है

उसे
मेरी टिप्पणियों से जूड़ीताप होता है
जिसमें एक लेखक के जीवन का
संग्राम है

उसे
मेरा मुंह देखने से दिक्कत होती है
पता नहीं मेरा चेहरा सुंदर क्यों नहीं है
उसका पूरा हफ्ता खराब हो जाता है

उसे
खुश करने के लिए
पैंसठ की उम्र में सिर पर बड़ा-सा
पका हुआ कटहल लेकर चाहूं तो भी
इतनी दूर पैदल कैसे जा सकता हूं

वह जो भी है
मुझे बहुत अजीज है
मेरी खराब कविताओं को मत देखे
खुश रहे आगे बढ़े खूब जिए
जो बाद में आएंगे लड़कर
देखेंगे।

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शिक्षा का मंदिर
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चोटें
आम आदमी के
बच्चों को लगती हैं

खून बहता है
माथे पर टांके लगते हैं
घर पर माएं रोती हैं
कलेजा फटा जाता है

माएं बच्चों के
भविष्य का सोचती हैं
पढ़ाई का सोचती हैं
इम्तहान का सोचती हैं

टूटती हुई
उम्मीद का सोचती है
घर का सोचती हैं
नौकरी और ब्याह का
सोचती हैं

आखिर
कम पढ़ी-लिखी माएं
देश की प्रथमपंक्ति की महिला
चाहे मंत्री सांसद महासचिव
अभिनेत्री लेखिका प्रोफेसर
बुद्धिजीवी वगैरह तो हैं नहीं
इसीलिए कम सोचती हैं

ये मारकाट
ये पुलिस हिंसा
ये हिंदू मुसलमान
उसे कुछ नहीं चाहिए
उसे अपना लाल चाहिए
साबुत चाहिए

ये कैसा देश है
पीढ़ियों से साथ रहने वाला
साथ पढ़ने-लिखने वाला
एक-दूसरे के घर जाने वाला
तीसरे चौथे पांचवे के बहकावे में
सौ कैरेट का हिंदू
और सौ कैरेट का मुसलमान
हो जाता है
दोनों के दिलों में बसने वाले
मनुष्य को कौन चुरा ले जाता है
कौन शिक्षा के मंदिर में
दंगे-फसाद कराता है

हाय कैसे
गरीबों के बच्चों को
तड़तड़ चोट लगती है
खून बहता है हड्डियां चटकती हैं
और दूर बैठे राजनेताओं के
मुकुट का हीरा आकार लेता है

बस
राजनीति का यही सत्य
कवि की आत्मा को
चीर देता है।

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काव्यपाठ
-----------
मैंने
बहुत कम काव्यपाठ किया है
याद भी नहीं है कि कब कहां कैसे
किया है

अलबत्ता
तमाम कवियों को तरह-तरह से
काव्यपाठ करते हुए देखा है

गीत वाले गले से पढ़ते थे
गजल वाले तरन्नुम और तहत
दोनों में पढ़ते थे

कृष्ण बिहारी नूर का पढ़ना
निदा वसीम और बद्र से बेहतर था
यों सब ठीक ही लिखते थे
पर नूर की आवाज कलेजे को
चीरती हुई निकलती थी
दिल और दिमाग में एकसाथ
गूंजती थी

फराज की मशहूर गजल
सुना है लोग उसे अच्छी लगती थी
फराज का पढ़ना बुरा नहीं था
पर उतना अच्छा नहीं था
जितनी गजल

बंगाली
गीत बहुत अच्छा लिखते थे
उतना अच्छा पढ़ते नहीं थे
आप गले से गाएं
या दिल से पढ़ें
पढ़ना कला है

यह कला न हो तो
फिर भी ठीक है शब्द
संभाल लेते हैं
भले कवि को
भले कवि के लिए
कविता मजाक नहीं है

हिंदी के कई
प्रगतिशील कवियों को यहां
काव्यपाठ करते हुए देखा है
कविता को न तीर मारने की तरह
पढ़ते हैं न प्यार करने की तरह

मेरा अपना तजुर्बा है
और बहुत खराब तजुर्बा है
कविता उनके लिए न प्रेम है न पूजा
वे कविता जैसी गंभीर चीज को
संसद में आंख मारने की तरह पढ़ते हैं।

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आलू जैसी मुलायम आलोचना
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नये आलोचक
दागी हिस्सा निकालकर
अच्छे से छील और काटकर
आलू को घी और जीरे में
छौंक देते है

और
सुघड़ बहू की तरह
खूबसूरत तश्तरी में रखकर
सबका ध्यान अपनी ओर
खींच लेते हैं

असल में हिंदी की
खानदानी आलोचना में
यह रवादारी अब तक
बनी हुई है

यह अलग बात है
कि मेरी उम्र के आलोचक
नयी-नयी सास की तरह
कहते पाए जाते हैं

हम ऐसे नहीं थीं
जरा हींग के साथ तड़का
लगाती थीं फिर तो आलू
दांत नहीं होठों के छूनेभर से
दो फाड़ हो जाता था

क्या आलू था
वाह क्या आलोचना थी
वाह क्या आलोचना है
और यह
क्या खराब कविता है।





सोमवार, 23 दिसंबर 2019

गणेश पाण्डेय की प्रेम कविताएं

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ओ केरल की उन्नत ग्रामबाला
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कहां फेंका था तुमने
अपना वह माउथआर्गन
जिस पर फिदा थीं तुम्हारी सखियां
कहां गुम हुईं सखियां किस मेले-ठेले में
किसके संग

कैसे तहाकर रख दिया होगा तुमने
अपना प्यारा-प्यारा स्लेटी स्कर्ट
किस खूंटी पर फड़फड़ा रहा होगा
वह बेचारा लाल रिबन

सब छोड़-छाड़ कर 
कैसे प्रवेश किया होगा तुमने
पहलीबार
भारी-भरकम प्रभु की पोशाक के भीतर

यह क्या है तुममें
जे बज रहा है फिर भी मद्धिम-मद्धिम
कहां हैं तुम्हारी सखियां
कोई क्या करे अकेले
इस राग का

देखो तो आंखें वही हैं
जिनमें छिपा रह गया है फिर भी कुछ
जस के तस हैं काले तुम्हारे वही केश
होठों में गहरे उतर गया है नमक
कुछ भी तो नहीं छूटा है
वही हैं तुम्हारे प्रियातुर कान
किस मुंह से जाओगी प्रभु के पास

ओ केरल की उन्नत ग्रामबाला
कैसे करोगी तुम ईश का ध्यान
जब बजने लगेगा कहीं
मद्धिम-मद्धिम
माउथआर्गन।

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प्रथम परिणीता
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जिस तलुए की कोमलता से 
वंचित है 
मेरी पृथ्वी का एक-एक कण 
घास के एक-एक तिनके से
उठती है जिसके लिए पुकार
फिर से जिसे स्पर्श करने के लिए 
मुझमें नहीं बचा है अब 
चुटकीभर धैर्य
जिसके पैरों की झंकार 
सुनने के लिए
बेचैन है
मेरे घर के आसपास  
गुलमोहर के उदास वृक्षों की कतार
और तुलसी का चौरा  
जिसकी 
सुदीर्घ काली वेणी में लग कर
खिल जाने के लिए आतुर हैं 
चांदनी के सफेद नन्हे फूल 
और 
असमय 
जिसके चले जाने के शूल से
आहत है मेरे आकाश का वक्ष
और धरती का अंतस्तल
तुम हो 
तुम्हीं हो
मेरी प्रथम परिणीता 
मेरे विपन्न जीवन की शोभा
जिसके होने और न होने से 
होता है मेरे जीवन में 
दिन और रात का फेरा 
धूप और छांव 
होता है नीचे-ऊपर 
मेरे घर 
और 
मेरे दिल 
और दिमाग का तापमान
अच्छा हुआ
जो तुम 
जा कर भी जा नहीं सकी 
इस निर्मम संसार में मुझे छोड़कर
अकेला
सोचा होगा कैसे पिएंगे प्रीतम 
सुबह-शाम 
गुड़
अदरक 
और गोलमिर्च की चाय
भूख लगेगी तो कौन देगा 
मीठी आंच में पकी हुई 
रोटी
और मेथी का साग
दुखेगा सिर 
तो दबाएगा कौन 
आहिस्ता-आहिस्ता 
सारी रात 
रोएंगे जब मेरे प्रीतम
तो किसके आंचल में पोछेंगे
रेत की मछली जैसी 
अपनी तड़पती आंखें
और जब मुझे देख नहीं पाएंगे
तो जी कैसे पाएंगे
कैसे समझाएंगे
खुद को
कैसे पूरी करेंगे जीवन की कविता
कैसे करेंगे मुझे प्यार
अच्छा हुआ
मीता
मेरी प्रथम परिणीता
छोड़ गयी मेरे पास
स्मृतियों की गीता
दे गयी 
एक और मीता
परिणीता
जिसके जीवन में शामिल है
तुम्हारा जीवन
जिसके सिंदूर में है तुम्हारा सिंदूर
जिसके प्यार में है
तुम्हारा प्यार
जिसके मुखड़े में है तुम्हारा मुखड़ा
जिसके आंचल में है तुम्हारा आंचल
जिसकी गोद में है तुम्हारी गोद
कितना अभागा हूं
भर नहीं पाया तुम्हारी गोद
तुम्हारे कानों में पहना नहीं पाया
किलकारी के एक-दो कर्णफूल
तुम्हारी आंखों के कैमरे में 
उतार नहीं पाया
तुम्हारी ही बालछवि
किससे पूछूं कि जीवन के चित्र
इतने धुंधले क्यों होते हैं
समय की धूल 
उड़ती है
तो आंधी की तरह क्यों उड़ती है
प्रेम का प्रतिफल 
दुख क्यों होता है
और 
अक्सर 
तुम जैसी स्त्री का सखियारा
दुख से क्यों होता है 
तुम नहीं हो
तुम्हारी सखी है 
है दुख है तुम्हारी सखी है
कर लिया है उसी से ब्याह
हूं जिसके संग 
देखता हूं उसी में 
तुम्हें नित।

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गर्वीली बिंदी
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जरा-सा
छू गयी थी बस
वह कलफदार साड़ी गुलाबी
सुबह की गाड़ी के पहले डिब्बे में 
किसी माता के मंदिर को जातीं
और उसी के गुन गातीं
कई रंग और कई उम्र
और कई चेहरों वाली
स्त्रियों के बीच।
देर से 
रह-रह कर हिल-डुल रहा था
एक कंगन और एक मुखड़ा
बीचोबीच।
आउटर सिंगनल पार करते-करते
दिशाओं में जीवन रस घोलती हुई
एक लंबी सीटी के साथ
दिल के किसी कोने से निकला-हाय
कोई बेधक गान।
प्लेटफार्म पर उतरते-उतरते
लगा कि मुझे 
खींच नहीं पा रही थी पीछे से
सोने की मोटी चेन।
चश्में के सुनहले फ्रेम से
पलक झपकते
बाहर हो गया था मैं।
मुझे ढूंढ़ नहीं रही थीं
रेले में पता नहीं किसे ढूंढ़ती हुई
वे दो खोयी-खोयी आंखें।
बोलते-से होंठ बुला नहीं रहे थे मुझे
अपने पास।
फिर भी
एक इच्छा हुई कि देखूं पीछे मुड़कर
और दौड़कर 
चूम लूं उसकी गर्वीली बिंदी
झुककर
पर यह तो कोई बात न हुई।

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एक चांद कम पड़ जाता है
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कई बार एक जीवन कम पड़ जाता है
एक प्यार कम पड़ जाता है कई बार 
कई बार हजार फूलों के गुलदस्ते में
चंपे का एक फूल कम पड़ जाता है
एक कोरस ठीक से गाने के लिए
एक हारमोनियम कम पड़ जाता है
कई बार।
सांसें लंबी हैं अगर
और हौसला थोड़ा ज्यादा
तो तबीअत से जीने के लिए
एक रण कम पड़ जाता है
जो है और जितना है उतने में ही 
एक दुश्मन कम पड़ जाता है।
दिल से हो जाय बड़ा प्यार अगर
तो कई बार
एक अफसाना कम पड़ जाता है
एक हीर कम पड़ जाती है
ठीक से बजाने के लिए
सितार का एक तार कम पड़ जाता है
एक राग कम पड़ जाता है।
कई बार
आकाश के इतने बड़े शामियाने में
एक चांद कम पड़ जाता है
दुनिया के इस मेले में देखो तो
एक दोस्त कहीं कम पड़ जाता है
एक छोटी-सी बात कहने के लिए
कई बार एक कागज कम पड़ जाता है
एक कविता कम पड़ जाती है।

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गायिका
---------

बस
ऐसे ही 
गाती रहो गायिका
इस जमघट के घट-घट में
ढूंढो 
नंद के लालन को
पकड़ो
रंग डारो
छा जाओ गायिका
आतुर
रागमेघ बनकर टूट पड़ो 
अरराकर
विकल अति तप्त धरा के
एक-एक कण
और एक-एक बीज को
छू-छू कर बरसो गायिका
एक-एक पुकार से 
लिपट-लिपट कर बरसो 
गायिका 
आज की रात
और 
मेरे जीवन की रात के हर क्षण को
बना दो अपने जैसी गाती हुई।
यह एक खास रात है 
गायिका
तुम बरस रही हो
और कोई तुम्हें सुन रहा है 
रोम-रोम से
ऐसे ही बरसती रहो गायिका
अनुभव और स्मृति की उर्वर घरती पर
तुम गा रही हो
तुम बरस रही हो मुझ पर ऐसे
कि कोई और नहीं बरस रही है
पृथ्वी पर
कोई और गायिका नहीं गा रही है 
किसी लोक में ऐसे 
कोई और नहीं सुन रहा है तुम्हें
जिस तरह मैं सुन रहा हूं तुम्हें।
गायिकी की नौका में तुम्हारे संग
ऐसे ही हिचकोले खाते रहना चाहता हूं
सारी रात
ऐसे ही गाती रहो गायिका
जैसे 
नन्ही-नन्ही उंगलियों के इशारे पर
नाचता है तुम्हारा हारमोनियम
बांसुरी जैसे
जैसे ढोल।
ऐसे ही गाती रहो
ऐसे ही बार-बार
गंव से लट पीछे ले जाओ
छेड़ती रहो
आलाप जैसी उठी हुई बाहों से तान
एक-एक बोल पर
थिरकती हुई अपनी आखों से गाओ
गाते हुए होंठो से गाओ
कंठ के भीतर बैठी हुई
राधा के कंठ से गाओ
गायिका 
ऐसे ही।
कोई और फिर से याद आकर
जाए तो जाए निष्ठुर
आज की रात
मुझे छोड़कर
तुम न जाओ गायिका
ऐसे ही बस गाती रहो
जब तक मैं हूं।

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उस चांद से कहना
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तुम्हारे उड़ने के लिए है 
यह मन का खटोला 
खास तुम्हारे लिए है यह
स्वप्निल नीला आकाश      
विचरण के लिए 
आकाश का 
सुदूर चप्पा-चप्पा
सब तुम्हारे लिए है 
तनिक-सी इच्छा हो तो 
चांद पर 
बना लो घर 
चाहो तो चांद के संग 
पड़ोस में मंगल पर बस जाओ
जितनी दूर चाहो
जाओ
बस 
देखना प्रियतम
अपने कोमल पंख
अपनी सांस 
और भीतर की जेब में 
मुड़ातुड़ा
अपनी पृथ्वी का मानचित्र 
सोते-जागते दिखता रहे 
आगे का आकाश
और पीछे प्रेम की दुनिया
धरती पर 
दिखती रहें
सभी चीजें और अपने लोग
उड़नखटोले से
होती रहे 
आकाश के चांद की बात
पृथ्वी के सगे-संबंधियों
और अपने चांद की
आती रहे याद 
जाओ जो चाहो तो जाओ
जाओ आकाश के चांद के पास 
तो लेते जाओ उसके लिए 
धरती का जीवन 
और संगीत 
मिलो आकाश के चांद से
तो पहले देना 
धरती के चांद की ओर से
भेंट-अंकवार
फिर धरती की चंपा के फूल
धरती की रातरानी की सुगंध
धरती की चांदनी का प्यार
धरती के सबसे अच्छे खेत
धरती के ताल-पोखर
धान 
और गेहूं के उन्नत बीज
थोड़ी-सी खाद
और एक जोड़ी बैल
देना
कहना कि कोई सखी है
धरती पर भी है एक चांद है
जिसे 
तुम्हारे लौटने का इंतजार है
कहना कि छोटा नहीं है
उसका दिल
स्वीकार है उसे
एक और चांद 
चाहे तो चली आए 
तुम्हारे संग 
उड़नखटोले में बैठकर 
मंगलगीत गाती हुई 
धरती के आंगन में 
स्वागत है।

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इतनी अच्छी क्यों हो चंदा
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तुम अच्छी हो
तुम्हारी रोटी अच्छी है
तुम्हारा अचार अच्छा है
तुम्हारा प्यार अच्छा है 
तुम्हारी बोली-बानी 
तुम्हारा घर-संसार अच्छा है
तुम्हारी गाय अच्छी है
उसका थन अच्छा है
तुम्हारा सुग्गा अच्छा है
तुम्हारा मिट्ठू अच्छा है
ओसारे में 
लालटेन जलाकर
विज्ञान पढ़ता है
यह देखकर 
तुम्हें कितना अच्छा लगता है
तुम 
गुड़ की चाय
अच्छा बनाती हो
बखीर और गुलगुला
सब अच्छा बनाती हो
कंडा अच्छा पाथती हो
कंडे की आग में 
लिट्टी अच्छा लगाती हो
तुम्हारा हाथ अच्छा है
तुम्हारा साथ अच्छा है
कहती हैं सखियां 
तुम्हारा आचार-विचार
तुम्हारी हर बात अच्छी है
यह बात कितनी अच्छी है
तुम अपने पति का 
आदर करती हो
लेकिन यह बात 
बिल्कुल नहीं अच्छी है
कि तुम्हारा पति 
तुमसे
प्रेम नहीं करता है
तुम हो कि बस अच्छी हो
इतनी अच्छी क्यों हो चंदा
चुप क्यों रहती हो
क्यों नहीं कहती अपने पति से
तुम उसे 
बहुत प्रेम करती हो।

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कहां जान पाते हैं सब लोग
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नाती-पोतों की दुनिया में मगन
दादियों और नानियों की 
थुलथुल टोली की वह नायिका
इतनी वयस्त है कि भूल गयी है
काफी समय से बंद
खिड़कियों को खोलना
वक्त की तमाम धूल को झाड़ना 
किसी को याद रखना
भूल गयी है नूरजहां का गाना
कहती है-
अब मेरे लिए 
इतना वजनी शरीर लेकर
न नाचना मुमकिन है न गाना 
बीते दिनों में लौटना
पीछे की पगडंडी पर कदम रखना
और किसी पुराने छत पर 
चांदनी रातों में तन्हा टहलना
अब मुमकिन नहीं
कह दो
अब कुछ नहीं मुमकिन
पता नहीं कहां रख दी है
वह किताब
कह दो 
प्रेम मेरे लिए
पहली कक्षा का एक पाठ था
किस कमबख्त को याद रहता है
इतना पुराना पाठ
कोई याद दिलाए भी तो हंसकर
टाल जाना बेहतर 
आखिर
कितना वक्त लगता है 
किसी पाठ के कुपाठ होने में
मैं जिसे प्रेम करती हूं
राख में दबी हुई चिंगारी की तरह 
बस प्रेम करती हूं
उसे याद नहीं करती हूं
प्रेम मेरे लिए 
न मेरी दिनचर्या का हिस्सा है
न मेरे घर के कोने में 
इस तरह की 
किसी जानलेवा चीज के लिए
झाड़ू जितनी जगह है
घर की कारा में ऐसा कुछ रखना
कितना खतरनाक होता है
कहां जान पाते हैं
सब लोग।

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घर : पांच /  

कैसे निकलूं सोती हुई यशोधरा को छोड़कर
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कैसे निकलूं इस घर से
सोती हुई यशोधरा को छोड़कर
कितनी गहरी है यशोधरा की नींद
एक स्त्री की तीस बरस लंबी नींद
नींद भी जैसे किसी नींद में हो
चलना-फिरना
हंसना-बोलना
सजना-संवरना
और लड़ना-झगड़ना
सब जैसे नींद में हो 

बस एक क्षण के लिए
टूटे तो सही यशोधरा की नींद
मैं यह नहीं चाहता कि मेरा निकलना
यशोधरा के लिए नींद में कोई स्वप्न हो
मैं निकलना चाहता हूं उसके जीवन से 
एक घटना की तरह
मैं चाहता हूं कि मेरा निकलना
उस यशोधरा को पता चले
जिसके साथ एक ही बिस्तर पर
तीस बरस से सोता और जागता रहा
जिसके साथ एक ही घर में            
कभी हंसता तो कभी रोता रहा
मैं उसे इस तरह 
नींद में 
अकेला छोड़कर नहीं जाना चाहता
मैं उसे जगाकर जाना चाहता हूं
बताकर जाना चाहता हूं
कि जा रहा हूं
मैं नहीं चाहता कि कोई कहे
एक सोती हुई स्त्री को छोड़कर चला गया
मैं चाहता हूं कि वह मुझे जाते हुए देखे
कि जा रहा हूं
और न देख पाते हुए भी मुझे देखे 
कि जा रहा हूं। 

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घर : छः /  

उठो यशोधरा तुम्हारा प्यार सो रहा है
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कैसे जगाऊंगा उसे
जिसे जागना नहीं आता
प्यार से छूकर कहूंगा उठने के लिए
कि चूमकर कहूंगा हौले से
जागो यशोधरा
देखो कबसे जाग रही है धरा
कबसे चल रही है सखी हवा
एक-एक पत्ती
एक-एक फूल
एक-एक वृक्ष
एक-एक पर्वत
एक-एक सोते को जगा रही है
एक-एक कण को ताजा करती हुई
सुबह का गीत गा रही है
उठो यशोधरा
तुम्हारा राहुल सो रहा है 
तुम्हारा घर सो रहा है
तुम्हारा संसार सो रहा है
तुम्हारा प्यार सो रहा है

कैसे जगाऊं तुम्हें
तुम्हीं बताओ यशोधरा
किस गुरु के पास जाऊं
किस स्त्री से पूछूं
युगों से 
सोती हुई एक स्त्री को जगाने का मंत्र
किससे कहूं कि देखो 
इस यशोधरा को
जो एक मामूली आदमी की बेटी है 
और मुझ जैसे 
निहायत मामूली आदमी की पत्नी है
फिर भी सो रही है किस तरह
राजसी ठाट से 

क्या करूं 
इस यशोधरा का
जिसे 
मेरे जैसा एक साधारण आदमी 
बहुत चाह कर भी
जगा नहीं पा रहा है
और 
कोई दूसरा बुद्ध ला नहीं पा रहा है।

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कब्र में लेटी रहने वाली स्त्री
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कौन था
वह बूढ़ा आदमी 
और कौन थी वह 
बूढ़ी स्त्री
दो पैसे 
खुद पर खर्च किया
बहुत दिनों के बाद

बूढ़े का
हाथ पकड़
रसोई की कब्र से 
बाहर निकाली
और 
खुली हवा में 
जीभर  
देर तक 
हंसी
बहुत दिनों के बाद

बूढ़े ने 
मंहगे टाकीज में
सफेद बालों वाली
एक सांवली 
बूढ़ी स्त्री को
सिनेमा दिखाया
सिल्क की एक साड़ी खरीदी
बहुत दिनों के बाद

मसाला डोसा खाया 
और फुल प्लेट 
कुल्फी खिलायी
कोल्ड काफी भी पिलायी
बहुत दिनों के बाद 

पार्क में बैठे
यादों की चादर बिछा कर 
उंगलियों का जाल बनाकर 
एक-दूसरे के चेहरे को 
एकटक देखा 
पहले जैसा         
बहुत दिनों के बाद
ढ़लते हुए सूरज को
और थके हुए पक्षियों को 
कलरव करते
लंबी सांस भरते 
देखा-सुना करीब से
बहुत दिनों के बाद

फिर से
जोड़ा-जामा पहन कर
बूढ़ी स्त्री की चुनरी 
लहराया
बूढ़ी ने भी बूढ़े को
उस नजर से देखा
और पार्क में बैठे
लड़कों 
और लड़कियों की
आंख बचा कर
बूढ़े को जोरदार ढंग से 
मारी आंख
इस तरह
एक घरेलू क्रांति हुई
बहुत दिनों के बाद

स्वप्न और उमंग के 
समुद्रतल में धंसे हुए
लड़के
और लड़कियां 
कितनी बेखबर हैं
क्या जानें 
साल में एक दिन
शादी की वर्षगांठ पर 
अपने 
बूढ़े जिन्न के इशारे पर 
जिन्दा हो जाने के लिए
वर्षभर
चुपचाप
कब्र में लेटी रहने वाली 
वह 
बूढ़ी स्त्री 
कौन है

किससे पूछूं जानते हो
किससे कहूं नहीं जानती हो
तो जाओ 
मेरे जैसे किसी गुमनाम 
कवि के जीवन की कविता से
इस बूढ़ी स्त्री का
चित्र निकाल कर
ले जाओ
और
मिलाओ इसे
उस बूढ़ी स्त्री से
जिसे तुम जानते तो हो
पर तुम्हारे पास जिसके लिए 
वक्त सबसे कम है

जाओ 
उस मां के पास जाओ 
जिसने दी है तुम्हें 
अपनी लोहे जैसी जवानी
गला कर 
कुंदन जैसी यह तरुणाई 
देर-देर तक
उस बूढ़ी स्त्री का हाथ पकड़ कर 
कभी बरामदे में 
कभी फोन के पास 
कभी फोटो के सामने 
बैठे रहने वाले
उस बूढ़े आदमी के पास जाओ 

देखो 
आज 
इतना अधीर क्यों है 
कमजोर क्यों है उसका मन
जिसने दी है तुम्हें 
प्रेम और संघर्ष के लिए
फूल की पंखड़ियों जैसी कोमल 
और वज्र जैसी कठोर 
काया
बैठो उसके पास 
ठीक अपनी जड़ के पास
कुछ देर बैठो 
देखो 
फिर कोई कंछा फूट रहा है 
बहुत दिनों के बाद। 

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आत्मा का एकांत आलाप                          
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अजीब आदमी है
ढ़लान से उतरते हुए
मुड़-मुड़ कर
आकाश में चांद को 
देखता है 
इतने बड़े आकाश में 
चांद को अकेला देखता है
देखता है कैसे 
कहीं गिर न जाए बेचारा
खड्ड में
उसे अकेला चांद
बिल्कुल अपने जैसा लगता है
कितना अच्छा लगता है
अपनी तरफ एकटक देखते हुए
चांद के कान के पास मुंह ले जाकर 
कहता है-
कितनी अजीब बात है 
मैं भी भटक रहा हूं कोई तीस बरस से 
अपने आकाश में अकेला
और जिसे प्रेम करता हूं
कुछ नहीं कहता हूं उससे अब
यह भी कि मैं तुम्हें प्रेम करता हूं
जिससे प्रेम नहीं करता हूं
उससे भी नहीं कहता 
कि मैं तुम्हें प्रेम नहीं करता हूं
मेरे लिए प्रेम 
बिल्कुल निजी घटना है 
आत्मा का एकांत आलाप
अभिव्यक्ति के सारे दरवाजे बंद हैं जहां 
बस एक अद्वितीय अनुभव है
प्रौढ़ता का एक शालीन विस्फोट
जिसने मेरे प्रेम को 
त्वचा की अभेद्य सतह को भेदकर
भीतर कहीं गहराई में पहुंचा दिया है
शायद मेरे लिए प्रेम
एकांत में किसी फूल से मिलना है
अपनी ही हथेली को 
बार-बार चूमना है
किसी पुलिया पर बैठ कर
आहिस्ता-आहिस्ता
डूबते हुए सूरज को देखना है
उम्र की ढ़लान पर
पुराने प्रेमियों के लिए शायद
स्मृति का महोत्सव है प्रेम
जीवन का अंतिम राग है
जीवन की चुनरी का
मद्धिम रंग है
रेलगाड़ी के किसी पुराने डिब्बे में
किसी छोटे-से स्टेशन पर
किसी शहर में
किसी गरीब के लोटे की तरह 
कि उसके बदनसीब दिल की तरह 
छूट गया
अनोखा वाद्य है।

---------------------------
सफेद दाग वाली लड़की
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कोई  
आया नहीं 
देखने कि कैसी हो 
कहाँ हो मिट्ठू 
किस हाल में हो
न तो पास आकर छुआ ही उसे
कोई नब्ज
दिल का कोई हिस्सा
कि बाकी है अभी उसमें कितनी जान
किस रोशनाई और किन हाथों का 
है उसे इन्तजार
कहाँ-कहाँ से बह कर आता रहा
गंदा पानी
किसी को हुई नहीं खबर
किस-सि का गर्द-गुबार आ कर
बैठता रहा उस पर
सब अपने धंधे में थे यहाँ
चाहिए था काफी और वक्त था कम
उसके सिवा
मरने की फुर्सत न थी किसी के पास
यह जानने के लिए तो और भी नहीं
कि कैसे हुई अदेख
पृथ्वी के एक कोने में
जमानेभर से रूठकर लेटी हुई
कुछ-कुछ काली
और बहुत कुछ सफेद दाग वाली
कुछ लाल कुछ पीली
एक लंबी नोटबुक
औंधेमुँह
कैसे अपने एकांत में
सिसकते और फड़फड़ाते रहे
पन्ने सब सादे
कैसे सो उसके संग
उदास कागज
एक छोटी-सी प्रेम कविता की उम्मीद में
सरी-सारी रात और सारा-सारा दिन
जगते हुए
कोई आए उसे फिर से जगाए।

--------
वर्दी में
--------

कई थीं
ड्यूटी पर थीं
कुछ तो बिल्कुल नई थीं
अंट नहीं पा रही थीं वर्दी में
आधा बाहर थीं आधा भीतर थीं।
एक की खुली रह गयी थी खिड़की
दूसरी ने औटाया नहीं था दूध
झगड़कर चला गया था तीसरी का मरद
चौथी का बीमार था बच्चा कई दिनों से
पांचवीं जो कुछ ज्यादे ही नई थी
गपशप करते जवानों के बीच
चुप-चुप थी
छठीं को कहीं दिखने जाना था
सातवीं का नाराज था प्रेमी
रह-रह कर फाड़ देना चाहता था
उसकी वर्दी।

----------
परिणीता
---------                            
                              
यह तुम थी !
पके जिसके काले लंबे बाल असमय
हुए गोरे चिकने गाल अकोमल
यह तुम थी !
छपी जिसके माथे पर अनचाही इबारत
टूटा जिसका कोई कीमती खिलौना
एक रेत का महल था जिसका
एक पल में पानी में था
कितनी हलचल थी कितनी पीड़ा थी
भीतर एक आहत सिंहनी कितनी उदास थी

यह तुम थी !
ढ़ल गया था चांद जिसका
और चांद से भी दूर हो गया प्यार जिसका
यह तुम थी !
श्रीहीन हो गया जिसका मुख
खो गया था जिसका सुख यह तुम थी !
यह तुम थी एक-एक दिन
अपने से लड़ती-झगड़ती खुद से करती जिरह
यह तुम थी ! औरत और मर्द दोनों का काम करती
और रह-रह कर किसी को याद करती

यह तुम थी !
कभी गुलमोहर का सुर्ख फूल
और कभी नीम की उदास पीली पत्ती
यह तुम थी !
अलीनगर की भीड़ में अपनी बेटी के साथ
अकेली कुछ खरीदने निकली थी
यह तुम थी !
यह मैं था
साथ नहीं था आसपास था
मैं भी अकेला था तुम भी अकेली थी
मुझसे बेखबर यह तुम थी !
बहुमूल्य
चमचमाती और भागती हुई
कार के पैरों के नीचे एक मरियल काले पिल्ले-सा
मर रहा था किसी का प्यार
और तुम बेखबर थी
यह तुम थी ! जिसकी किताब में लग गया था
वक्त का दीमक
कुतर गये थे कुछ शब्द कुछ नाम कुछ अनुभव
एक छोटी-सी दुनिया अब नहीं थी
जिसकी दुनिया में यह तुम थी !
जो अपनी किताब में थी और नहीं थी
जो अपने भीतर थी और नहीं थी
घर में थी और नहीं थी
यह तुम थी !
बदल गयी थी
जिसके घर और देह की दुनिया
जुबान और आंख की भाषा
बदल गया था
जिसके चश्मे का नंबर और मकान का पता
यह तुम थी !
जिसकी आलीशान इमारत ढ़ह चुकी थी
मलबे में गुम हो चुकी थी जिसकी अंगूठी
और हार छिप गया था किसी हार में
यह तुम थी!
जीवन के आधे रास्ते में
बेहद थकी हुई झुकी हुई
देखती हुई अपनी परछाईं
समय के दर्पण में
जो इससे पहले कभी
इतनी कमजोर न थी
इतनी उदास न थी
यह तुम थी
किसी की परिणीता!



और
यह !
तुम थी !!
मेरी तुम !!!
जो अहर्निश
मेरे पास थी
जिसकी त्वचा
मेरी त्वचा की सखी थी
जिसकी सांसों का
मेरी सांसों के संग
आना-जाना था
मेरे बिस्तर का आधा हिस्सा जिसका था
और जिसका दर्द मेरे दर्द का पड़ोसी था
जिसके पैर बंधे थे मेरे पैरों से
जिसके बाल कुछ ही कम सफेद थे
मेरे बालों से
जिसके माथे की सिलवटें कम नहीं थीं मेरे माथे से
जिससे मुझे उस तरह प्रेम न था
जैसा कोई-कोई प्रेमी और प्रेमिका किताबों में करते थे
पर अप्रेम न था कुछ था जरूर
पर शब्द न थे जो भी था एक अनुभव था
एक स्त्री थी
जो दिनरात खटती थी
सूर्य देवता से पहले चलना शुरू करती थी
पवन देवता से पहले दौड़ पड़ती थी
हाथ में झाड़ू लेकर
बच्चों के जागने से पहले
दूध का गिलास लेकर
खड़ी हो जाती थी मुस्तैदी से
अखबार से भी पहले
चाय की प्याली रख जाती थी
मेरे होठों के पास मीठे गन्ने से भी मीठी
यह तुम थी
मेरे घर की रसोई में
सुबह-शाम सूखी लकड़ी जैसी जलती
और खाने की मेज पर
सिर झुकाकर
डांट खाने के लिए तैयार रहती
यह तुम थी!
बावर्ची
धोबी
दर्जी
पेंटर
टीचर
खजांची
राजगीर
मेहतर
सेविका
और दाई
क्या नहीं थी तुम!
यह तुम थी!
क्या हुआ
जो इस जन्म में मेरी प्रेमिका नहीं थी
क्या पता मेरे हजार जन्मों की प्रेयसी
तुम्हारे अंतस्तल में छुपी बैठी हो
और तुम्हें खबर न हो
यह कैसी उलझन थी मेरे भीतर कई युगों से
यह तुम थी अपने को मेरे और पास लाती थी
जब-जब मैं अपने को तुमसे दूर करता था
यह तुम थी !
जो करती थी मेरे गुनाहों की अनदेखी
मेरे खेतों में
अपने गीतों के संग पोछीटा मार कर
रोपाई करती हुई मजदूरनी कौन थी!
अपनी हमजोलियों के साथ
हंसी-ठिठोली के बीच
बड़े मन से मेरे खेतों में एक-एक खर-पतवार
ढूंढ-ढूंढ कर निराई करती हुई
यह तन्वंगी कौन थी!
मेरे जीवन के भट्ठे पर पिछले तीस साल से
ईंट पकाती हुई झाँवाँ जैसी यह स्त्री कौन थी
यह तुम थी!

और यह मैं था एक अभिशप्त मेघ !
जिसके नीचे न कोई धरती थी न ऊपर कोई आकाश
और जिसके भीतर पानी की जगह प्यास ही प्यास
कभी
मैं ढू़ंढ़ता उस तुम को !
और कभी इस तुम को !
कभी किसी की प्यास न बुझाई
न किसी के तप्त अंतस्तल को
सींचा
न किसी को कोई उम्मीद बंधायी

यह मैं था प्रेम का बंजर
इतनी बड़ी पृथ्वी का
एक मृत और विदीर्ण टुकड़ा
अपनी विकलता और विफलता के गुनाह में
डूबा
यह मैं था! यह मेरे हजार गुनाह थे
और तुम मेरे गुनाहों की देवी थी!
यह तुम थी!
जिससे
मेरी छोटी-सी दुनिया में
गौरैया की चोंच में अंटने भर का
उसके पंख पर फैलने भर का
एक छोटा-सा जीवन था
एक छोटी-सी खिड़की थी
जहां मैं खड़ा था
सुप्रभात का एक छोटा-सा
दृश्यखंड था
यह तुम थी! मेरी आंखों के सामने
मेरी तुम थी
यह तुम थी!

मेरे गुनाहों की देवी!
मुझे मेरे गुनाहों की सजा दो
चाहे अपनी करुणा में
सजा लो मुझे
अपनी लाल बिन्दी की तरह
अपने अंधेरे में भासमान इस उजास का क्या करूं
जो तुमसे है इस उम्मीद का क्या करूं
आत्मा की आवाज का क्या करूं
अतीत का क्या करूं अपने आज का क्या करूं
तुम्हारा क्या करूं
जो मेरे जीवन की सखी थी और सखी है
जिसके संग लिए सात फेरे
मेरे सात जन्म के फेरे हैं
जो मेरी आत्मा की चिरसंगिनी थी मेरा अंतिम ठौर है
यह तुम थी!
यह तुम हो!!
मेरी मीता                      
मेरी परिणीता।


('परिणीता' संग्रह से प्रेम कविताएं )





सोमवार, 16 दिसंबर 2019

जी हां हुजूर मैं कविता का नाच नाचता हूं

- गणेश पाण्डेय

जी हां हुजूर मैं कविता का नाच नाचता हूं
कुछ उल्टा कुछ सीधा हर नाच चाचता हूं
कविता के कुछ नाच किये हैं जी मस्ती में
कुछ कविता की हद दर्जे की सस्ती में जी
कुछ नाच किया है यूपी का कुछ एमपी का
कुछ बिहार के बहार का नयी दिल्ली में
ठाकुर की ड्याढ़ी में पंडिज्जी की बस्ती में
जी हां हुजूर मैं डेढ़ टांग पर अतिभावप्रवण
कत्थक का नाच देशभर की अकादमियों में
भरतनाट्यम भवनों-संस्थानों में नाचता हूं
जी मैं अपने वक्त की कविता की मंदी में
गली-गली चौराहों पर गंदा नाच नाचता हूं
जी नहीं-नहीं मैं कोई कविता नरेश नहीं
सस्ती कविता का बस साधारण दल्ला हूं
जी हां हुजूर मैं कविता का नाच नाचता हूं
जी नाच-नाच कर यश का पेट पालता हूं
आउंडेशन-फाउंडेशन-जाउंडेशन के युग में
हर महफिल में जा-जा कर नाच नाचता हूं
जी हां हुजूर मैं छंद नहीं छलछंद बेचता हूं
जी मैं हिंदी का कवि हूं और प्रगतिशील हूं
पुरस्कार की धुन पर नंगा नाच नाचता हूं
जी हां हुजूर मैं कविता का नाच नाचता हूं
सुबह दोपहर शाम और आधीरात नाचता हूं
जी मैं भवानी बाबू नहीं हूं जवानी बाबू हूं
जी गीतफरोश कविता का गीतफरोश नहीं हूं
जी मैं नयी सदी का पक्का कविताफरोश हूं
जी मैं कविता का गणेश नहीं गोबर गणेश हूं
साहित्यिक मुक्ति के लिए अनंत योनियों में
यश का मारा-मारा फिरता अति बिसनाथ हूं
जी हां हुजूर मैं कविता का नाच नाचता हूं
अपनी हर नाच पर दो-दो शब्द लिखवाकर
और दस-दस फोटो रोज-रोज छपवाता हूं
जी मैं खुदपर खुद ही पुस्तक छपवाता हूं
जी हां हुजूर मैं कविता का नाच नाचता हूं
जी आलोचना का नाच भी नाच सकता हूं
जी नामवर आलोचक के पैर दबा सकता हूं
उससे अपनी किताब का लोकार्पण कराने
गीदड़दलबल सहित अन्य शहर जा सकता हूं
जी मैं हिंदी का नितहर्षित हंसमुख लल्लू हूं
मैं हिंदी का सारहीन अतिविनम्र मिलनसार
कड़ी से कड़ी बात सुनकर हें-हें करता हूं
जी हां हुजूर मैं कविता का नाच नाचता हूं
जी हां हुजूर मैं कविता को नाच बनाता हूं।






कविता का एक हिस्सा खाली है


- गणेश पाण्डेय

कवि के लिए
तानाशाह का चेहरा
और उसकी तमाम क्रूरताएं दिखाना
बहुत से बहुत उससे भी बहुत जरूरी है

कवि के लिए
दुनिया का हर स्याह सफेद दिखाना
उसके कविकर्म का जरूरी हिस्सा है
उसे सबको दिखाना है सबका चेहरा
टेढ़े मुंह पर पुती कालिख
और दूसरी कमियां

कवि के लिए
जो-जो अपनी कविता में करना है
सब सही है सब सुंदर है सब जरूरी है
बस कविता के किसी कोने में उसे
अपना चेहरा दिखाना क्यों नहीं जरूरी है

कवि के लिए
हमारे समय के कवि के लिए
अपने चेहरे के दाग धब्बे गड्ढे छिपाने की
आखिर यह कैसी मजबूरी है कैसी
उसकी कविता में एक हिस्सा खाली है।



रविवार, 15 दिसंबर 2019

वृक्षों के नीचे फैली वनस्पतियों में

- गणेश पाण्डेय

सब गुम हो जाते हैं
जब तक दृश्य पर रहते हैं
खूब उछल-कूद नाच-गाना
और हंसी-ठट्ठा करते हैं
भूल जाते हैं कि यह
एक दिन का मेला है

बाद में पता चलता है
कि अरे-अरे यहां कोई था
अभी-अभी कहां चला गया
किस कबाड़ में किस धुंध में
निष्प्रयोज्य लिखे हुए किस पात्र में
कौन था कोई जान नहीं पाता है

शायद जो लोग
अपने काम में नहीं दिखते हैं
गुम होने के बाद कभी नहीं दिखते हैं
उनके घुंघरू उनकी पिस्तौलें
उनकी गलेबाजी किसी खड्ड में
गायब हो जाती है

दो-चार दिन चेले-चपाटी
और पाले हुए लौंडे-लफाड़ी
याद करतें हैं फिर खुद
दृश्य का हिस्सा बन जाते हैं

मुझे दृश्य से नहीं नेपथ्य से प्रेम है
मैं चाहता हूं मुझे कोई देखे नहीं
मैं अपने वक्त में ऐसे गुम रहूं
कि खुद भी खुद को देख न पाऊं

कविता की किताब के पन्नों पर
पंक्तियों के घने जंगल में कहीं
बड़े वृक्षों के नीचे फैली वनस्पतियों में
खो जाना चाहता हूं हमेशा के लिए
किसी अनाम जड़ी-बूटी
चाहे किसी कीट-पतंग की तरह
कोई मेरी शक्ल और मठ न देखे
कोई मेरे तमगे और मेरी नाच न देखे

आज के नचनियों के नचनिये
और उनके नचनिये प्रशंसक दृश्य से
छूमंतर हो जाएं तो कोई साधु आए
जिसकी आंख की एक ठोकर से
उघड़ जाए मेरी लहूलुहान आत्मा
और मैं पूरे पन्ने पर फैल जाऊं
उसके जाते ही फिर गुम हो जाऊं
फिर फिर ऐसे ही देखा जाऊं।