गुरुवार, 30 जुलाई 2026

हिन्दू और हिन्दी कविता के शत्रु

- गणेश पाण्डेय

शुरू में ही स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं धर्म के सकारात्मक पहलू की इज़्ज़त करता हूँ। कोई भी धर्म हो। धर्म मनुष्य के उन्नयन का मार्ग है। धर्म का काम मनुष्य और मनुष्य में भेद करना नहीं है। धर्म का काम राजनीति करना नहीं है। भक्तिकाल में भक्ति किसी की सरकार को गिराने या बनाने का ज़रिया नहीं है। भक्तिकाल में जिस मुक्ति की बात की गई है, वह कोई साधारण मुक्ति नहीं है, असाधारण है। आध्यात्मिक मुक्ति है। उस मुक्ति के लिए धर्म का नकारात्मक इस्तेमाल नहीं किया गया है। न धर्म की राजनीति की गई है, न धर्म को दंगा-फसाद का ज़रिया बनाया गया है। इसी काल में सामाजिक मुक्ति की भी बात की गयी। धर्म के आडम्बर और अंधविश्वास की तीव्र आलोचना की गयी। भक्तिकाल के कवियों के सामने कविता के बहुत ऊँचे उद्देश्य थे। वे कवि न तो पाँच सौ रुपये के भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार के लिए कविता लिख रहे थे, न साहित्य अकादेमी के लखटकिया पुरस्कार के लिए, न उन्हें किसी लिटफेस्ट के मंच पर पहुँचने की जल्दी थी, न किसी लेखक संगठन या रज़ा फाउंडेशन में भर्ती होने की। वे आज के दो कौड़ी के चुत्थड़ साहित्य-प्रभुओं को जानते ही नहीं थे। साहित्य के केंद्रों में मत्था टेकने नहीं पहुँव जाते थे। दो कौड़ी के जलेस, प्रलेस, जसम की चटाई पर बैठने के लिए मरे नहीं जाते थे। इन लेखक संगठनों के पदाधिकारियों, हाथी जैसे राजकमल प्रकाशन के घोडे जैसे पुस्तक संपादकों और आलोचना पत्रिका और उसके कविता के कातिल संपादकों को भी नहीं जानते थे। वे तो सच्चे शब्द-साधक थे, जीवन की उच्चतर भाव-भूमि के प्रेमी। वे तो सपने में भी नहीं सोच सकते थे कि कभी किसी दौर में युवा कवियों को कविता की सही राह दिखाने की जगह गुमराह भी किया  जा सकता है।  
     क्या कविता का काम किसी एक धर्म और किसी एक जाति को नायक और दूसरे को खलनायक बनने का है क्या यह सच है की कोई एक खास धर्म है या कोई एक खास जाति है जिसमें आक्रामकता है, सांप्रदायिकता है, कट्टरता है और दूसरी जाति बिल्कुल दूध की धुली है? क्या ऐसा है? जाहिर है कि ऐसा नहीं है। ऐसा नहीं है कि अल्पसंख्यक बहुत बुरे हैं और बहुसंख्यक बहुत अच्छे हैं या बहुसंख्यक बहुत बुरे हैं और अल्पसंख्यक बहुत अच्छे हैं। ऐसा मानना दृष्टिहीनता और ईमान की सीमा का परिचायक है। जाहिर है कि ऐसा मानने वाला लेखक, लिखने की मेज पर स्वतंत्र नहीं होता है बल्कि जिस लेखक संगठन से जुड़ा होता है, उसके कार्यकर्ता के रुप में काम कर रहा होता है। उसे पता ही नहीं होता है कि विचारधारा पहले भी थी, लेखक पहले भी थे। क्या रामविलास शर्मा मार्क्सवादी समझ नहीं रखते थे? रामविलास शर्मा को छोड़ो। कबीर तो मार्क्स से बहुत पहले ही पैदा हो गए थे? और आज क्या लेखक संगठनों से दूर मार्क्सवादी समझ वाले या प्रगतिशील दृष्टिसंपन्न लेखक नहीं हैं?
       ओह, कितने ऐसे आलोचक हैं जो सचमुच साहित्य का सच फटकार कर कहना चाहते हैं या कह सकते हैं मुझे तो देखने में आता है कि हिंदी के अधिकांश आलोचक साहित्य का सच कहने की पात्रता ही नहीं रखते हैं रचना के सच और आलोचना के सच से उनका कोई वास्ता ही नहीं हैं वे झूठ के पुतले हैं। ऐसे मुश्किल वक्त में एक ईमानदार आलोचक का क्या काम है? वही जो कभी कबीर जैसे कई का काम था। लटृठ उठाओ और बरसाओ तब से बेईमान समझेंगे। यह बातों से नहीं समझेंगे। डांटना-डपटना पड़ेगा, फटकारना पड़ेगा तब शायद कुछ समझें। 
    पिछले 50 साल की आलोचना संबंधों के आधार पर लिखी गई आलोचना है। मैंने एक बार अपने एक आलोचक मित्र से कहा कि तुम जिस रास्ते पर हो उसे रास्ते पर परमानंद श्रीवास्तव से आगे नहीं जा सकते हो, अगर तुम्हारी सीमा वही है अगर तुम्हारा उद्देश्य वही है अगर तुम्हारी क्षमता वही है तो फिर तुम गादर बैल हो, मेरे साथ नहीं चल सकते। हालाँकि परमानंद श्रीवास्तव कोई मील का पत्थर नहीं हैं, बल्कि उनका उदाहरण आलोचना की सीमा को बताने के लिए है। परमानंद जी ने मुझे पढ़ाया है। बहुत अच्छे अध्यापक थे। गोरखपुर के हिन्दी विभाग के संदर्भ में आसपास के लेखकों में दो बहुत अच्छे और बहुत ख़राब अध्यापकों का नाम उदाहरण के रुप में देना हो तो अच्छे में परमानंद श्रीवास्तव का नाम लूँगा और ख़राब में विश्वनाथ प्रसाद तिवारी का। विश्वनाथ जी पर कहीं और किसी और प्रसंग में याद करेंगे। यहाँ बात परमानंद जी की। परमानंद जी की आलोचना भाषा जहाँ पूर्वार्द्ध में जलेबी जैसी गोल-गोल घुमावदार है, वहीं उत्तरार्द्ध में वे अपनी आलोचना की भाषा को माँजते हैं, लेकिन आलोचना के सरोकार वही रहते हैं। वही संबंधों के आधार पर की गयी प्रशंसामूलक आलोचना। आगे चलकर सभी नये आलोचकों ने भी प्रशंसामूलक आलोचना की पताका फहराने का काम किया। कुछ ने तो ऐसी बंद अर्थात जपाट भाषा में प्रशंसामूलक आलोचना लिखते समय आलोचना की ही नहीं, जिसकी कविता की आलोचना की है, उसकी भी टाँगे तोड़ दी है। सविता सिंह की कविताओं पर रविरंजन का मनोरंजन देख सकते हैं। सुना है, उन्होंने कई मामूली से भी नीचे के कुछ और कवियों पर ए आई की कृपा से ़त्रैलोक्य-विकंपित आलोचना लिखी है। दस पंकि्ंतियों बहुत औसत कविताओं पर सौ-सौ पेज की आलोवना जैसी चीज़ लिखी है। इतना फैलकर तो रामविलास शर्मा ने निराला की कवितओं पर नहीं लिखा है। उदाहरण भी देते चलना ज़रूरी होता हैं। ख़ैर। आगे बढ़िए। आलोचना के धर्म पर बातें भी होंगी, लेकिन कविता में आतंकवादियों की तरह घुसपैठ करने वाले धर्म के ख़तरनाक रंग पर बात करना इस ममय सबसे ज़़रुरी है।
  कोई कवि हिन्दुओं की माँ-बहन करने लगे या कोई बिल्कुल नया कवि हामिद की तरह इस उम्र में कविता के मेले में चिमटा ख़रीदने की समझदारी दिखाने जगह जालीदार टोपी पहनकर ंअरबी-फारसी के कठिन शब्दों की तलवार चमकाने लगे या हिन्दुओं की स्त्रियों नंगा करने लगे तो उस पर बोलना बहुत ज़रुरी है। कविताओं पर ऐसे ही बोलकर आगे बढ़ जाना और उदाहरण न देना बेईमानी होगी। ज़ा़हिर है कम से कम किसी एक कवि का नाम भी देना ज़़रुरी होगा। संयोग देखिए, नाम की पर्ची भी निकली तो राजकमल प्रकाशन के संपादकीय विभाग के एक सदस्य की। नही-नहीं, मैं सत्यानंद निरूपम का नाम नहीं ले रहा हूँ। पता नहीं वे कुछ लिखते भी हैं या नहीं, उन्हें तो मैं हिन्दी के अलेखक के रुप में जानता हूँ। हिन्दी में उनके काले कारनामों पर फिर बात करेंगे। यहाँ आर चेतनक्रांति और उनकी एक कविता ‘हिन्दू देश में यौन क्रांति’ पर बात करुँगा। हिन्दी के बड़े संयोगों में से एक संयोग और राजकमल प्रकाशन के नाम है। असल में जिस ‘शोकनाच’ सुंग्रह में ‘हिन्दू देश में यौन क्रांति’ कविता शामिल है। यह कविता निश्चय ही हिन्दू-विरोधी कविता है। हिन्दुओं को लज्जित करने वाली कविता है। हिन्दुओं की माँ-बहन करने वाली कविता है। इस कविता को देखने के बाद कोई भी ईमानदार आलोचक ख़ुद को ग़़ंस्सा होने से रोक नही सकता। इसका मतलब यह नहीं कि किसी कवि को नुकसान पहुँचाने के लिए ऐसा कह रहा हूँ। यहाँ सिर्फ ऐसी कविताओं से बनने वाली प्रवृŸा पर चोट करना है। आर चेतनक्रांति को राजकमल प्रकाशन की नौकरी से बर्ख़ास्त करने की माँग करना उद्देश्य नहीं है। जैसा कि कुछ अपराधी प्रवृŸा के लेखकों ने पिछले दिनों अविनाश मिश्र के संदर्भ में किया था। मैं न तो राजकमल प्रकाशन का शत्रु हूँ, न राजकमल प्रकाशन के संपादकीय विभाग के सदस्यों का शत्रु हूँ। अलबŸा, यह ज़रूर चाहता हूँ कि अशोक महेश्वरी इस बात पर ध्यान दें कि उनकी छवि कैसी बन रही है? क्या उन्होंने जानबूझकर अपने प्रकाशन की हिन्दू-विरोधी छवि बनने दी है? बहरहाल आर चेतनक्रांति की कविता ‘हिन्दू देश में यौन क्रांति’ देखिएः
हिन्दू देश में यौन-क्रांति
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मर्दों ने मान लिया था
कि उन्हें औरतें बाँट दी गईं
और औरतों ने
कि उन्हें मर्द
इसके बाद विकास होना था
इसलिए
प्रेम और काम, और क्रोध और लालसा और स्पर्द्धा,
और हासिल करके दीवार पर टाँग देने के पवित्र इरादे के पालने में
बैठकर सब झूलने लगे
परिवारों में, परिवारों की शाखाओं में
कुलों और कुटुंबों में जातियों-प्रजातियों में
विकास होने लगा
जंगलों-पहाड़ों को
म्याऊँ और दहाड़ों को
रौंदते हुए क्षितिज-पार जाने लगा
इतिहास के कूबड़ में
ढेरों-ढेर गोश्त जमा होने लगा
पत्थर की बोसीदा किताब से उठकर डायनासोर चलने लगा
कि यौवन ने मारी लात देश के कूबड़ पर और कहा
रुकें, अब आगे का कुछ सफ़र हमें दे दें
पहले स्त्री उठी
जो सुंदर चीज़ों के अजायबघर में सबसे बड़ी सुंदरता थी
और कहा, कि पेडू में बँधा हुआ यह नाड़ा कसता है
कि क़ीमतों का टैग आप कहीं और टाँग लें महोदय
इस अकड़ी काली, गोल गाँठ को अब मैं खोल रही हूँ
सुंदरता ने असहमति के प्रचार-पत्र पर
सोने की मुहर जैसा सुडौल अँगूठा छापा और नाम लिखाकृअतृप्ति
कूबड़ थे जिनमें अकूत धन भरा था
कुएँ थे जिनमें लालसा की तली कहीं न दिखती थी
पर सुंदरता का दावा न था कि वह इस असमतलता को दूर करेगी
इरादों की ऋजुरैखिक यात्रा में वह थोड़ी अलग थी
उसने एक नई धरती की भराई शुरू की
जो सितारे की तरह दिखती थी
चाँद की तरह
जिसकी मिट्टी में गुरुत्व नहीं था
जिसके ऊपर, नीचे, दाएँ, बाएँ आसमान था
तो भी घर-घर में एक इच्छा जवान होती थी
कि बेशक अमेरिका के बाद ही
पर एक दिन हम भी वहाँ जाकर रहेंगे
आँगन-आँगन कामना का इस्पात घिसता था
बुझी-गीली राख में रात-दिन
और तश्तरी की धार तेज़ होती जा रही थी
तश्तरी घूमती थी और काटती थी
घूम-घूमकर काटती कतरती थी ककड़ियों-खरबूजों की तरह
हिंदू देश में हिंदुओं को
अपनी सांस्कृतिक दुविधाओं में खड़े
वे खच-खच कटते थे
अपनी विविधताओं में बुझे मोतियों से जड़े
धर्म के सुविधाजनक-उपेक्षित पिछवाड़े पड़े
वे चमार, लुहार, कुम्हार
ब्राह्मण, बनिये, सुनार
कहीं न थी पूरी तलवार
केवल धार
सड़क पर चिलचिलाती धूप में लहराती
निमिष-भर को दिखती
और खरबूजों-तरबूजों की तरह फले-फूले
और पाला खाई टहनियों-से सूखे-तिड़के
मर्दों के मेदे में उतर जाती
मनु का देश काँखता खड़ा रह जाता
और वह अगली धूप में पहुँच जाती
सारे पांडव, सारे कौरव, सारे राम, सारे रावण
अपने रचयिताओं को पुकारते युद्ध से बाहर हुए जाते थे
दूर खड़े अपने हथियार चमकाते
चरित्रवान आत्माओं को जगाते कहते,
यौवन ने मचा दिया ध्वंस
कल तक कैसे शांत खड़ी लहराती थी संयम की फ़सल
आह, इतने आक्रामक तो न थे हिंदू आदर्श
ये तो रास्ता छेंककर खड़ी हो जाती है
ये कौंधती टाँगें,
ये सुतवाँ नितंब, ये घूरते स्तन, ये सोचती-सी नाभि
सर्वत्र प्रस्तुत कि जैसे हाथ बढ़ाओ, छू लो, खा लो
पर इरादा कर बढ़ो तो... अरे सँभालो...
यही क्या हिंदू सौंदर्य है!
चकित थे हिंदू
बलात्कार की विधियाँ सोचते, घूरते, घात लगाए, चुपचाप देखते, सन्नद्ध
कि भीम के, द्रोण के देश में जनखापन छाया जाता है
कि एक ही आकृति में स्त्री आती है और पौरुष जाता है
कि दृश्य यह अद्भुत है
पूछते विधाता से हाथ जोड़कर प्रार्थना में
और शाखा में पवन-मुक्तासन बाँधकर संचालकजी से
कि इस दृश्य का लिंग क्या है, प्रभो! 

   इससे पहले कि मैं इस कविता पर कुछ और कहूँ, वरिष्ठ आलोचक शिवकिशोर तिवारी, इस कविता को किस नज़रिए से देखते हैं, आप भी देखिए- ‘आज एक मित्र ने यह कविता भेजी। आपको खुफिया तौर पर बता रहा हूँ , यह कविता काक्रोच जनता पार्टी का दस्तावेज है। आदिकाल से लेकर इस काल तक का वर्णन इस कविता में किया गया है। यह वर्णन हिन्दू जाति पर केन्द्रित है, अर्थात् विवाह- संस्था, परिवार, क्लैन, कास्ट आदि की अवधारणाएं केवल हिन्दुओं में पैदा हुईं। फिर कैपटलिज्म भी पहले हिन्दुओं में आया - “ इतिहास के कूबड़ में ढेर-ढेर गोश्त’। फिर क्रांति आई जिसका उपोद्घात हिन्दू नारियों के नाड़ा खोलने से हुआ। फिर स्त्री-पुरुष की बायनरी खतम हो गई; जैसे चेतन नामक मर्द और क्रांति नामक स्त्री गड्डमड्ड हो गये - तब काक्रोच आन्दोलन का जन्म हुआ - हमारा लिंग, हमारी च्वाइस! इस तरह हिन्दुओं को ठीक कर दिया गया। अब आर एस एस वाले परेशान हैं!’ असल में तिवारी जी का यह कथन दो मित्रों के बीच कुछ-कुछ गंभीर और कुछ-कुछ व्यक्तिगत बातचीत जैसा है। उन पर अधिकार है। जानता हूँ, तिवारी जी की साहित्य-निष्ठा और शुभचिंता असंदिग्ध है। मेरा ध्यान तिवारी जी के इस हिस्से पर है कि आदिकाल से लेकर इस काल तक का वर्णन इस कविता में किया गया है। यह वर्णन हिन्दू जाति पर केन्द्रित है, अर्थात् विवाह- संस्था, परिवार, क्लैन, कास्ट आदि की अवधारणाएं केवल हिन्दुओं में पैदा हुईं। फिर कैपटलिज्म भी पहले हिन्दुओं में आया - “ इतिहास के कूबड़ में ढेर-ढेर गोश्त’। फिर क्रांति आई जिसका उपोद्घात हिन्दू नारियों के नाड़ा खोलने से हुआ। 
   मुझे भी कहना यही है कि यह कविता हिन्दुओं पर केंद्रित है। हिन्दू स्त्रियों के विरोध लिखी गयी है, बल्कि कहना चाहिए कि इस कविता में हिन्दू स्त्रियों की भयंकर तौहीन की गयी है। हिन्दू स्त्रियों को इस कविता में नंगा कर दिया गयाः
‘यौवन ने मारी लात देश के कूबड़ पर और कहा
रुकें, अब आगे का कुछ सफ़र हमें दे दें
पहले स्त्री उठी
जो सुंदर चीज़ों के अजायबघर में सबसे बड़ी सुंदरता थी
और कहा, कि पेडू में बँधा हुआ यह नाड़ा कसता है
कि क़ीमतों का टैग आप कहीं और टाँग लें महोदय
इस अकड़ी काली, गोल गाँठ को अब मैं खोल रही हूँ

ये कौंधती टाँगें,
ये सुतवाँ नितंब, ये घूरते स्तन, ये सोचती-सी नाभि
सर्वत्र प्रस्तुत कि जैसे हाथ बढ़ाओ, छू लो, खा लो
पर इरादा कर बढ़ो तो... अरे सँभालो...
यही क्या हिंदू सौंदर्य है!’
आगे कवि हिन्दूओं के पवन-मुक्तासन पर ख़ास बल देता हैः
‘चकित थे हिंदू
बलात्कार की विधियाँ सोचते, घूरते, घात लगाए, चुपचाप देखते, सन्नद्ध
कि भीम के, द्रोण के देश में जनखापन छाया जाता है
कि एक ही आकृति में स्त्री आती है और पौरुष जाता है
कि दृश्य यह अद्भुत है
पूछते विधाता से हाथ जोड़कर प्रार्थना में
और शाखा में पवन-मुक्तासन बाँधकर संचालकजी से
कि इस दृश्य का लिंग क्या है, प्रभो!’

हद है कि कवि के दिमाग़ में हिन्दू पुरुष और स्त्रियाँ तो घुसी ही घुसी हैं, शाखा संचालक जी की पाद भी घुस गयी है। शायद कवि कहना चाहता है कि यह संसार की एकमात्र पाद है, कोई और ऐसी पाद नहीं पाद सकता। शायद कवि यह कहना चाहता है, कामरेड कभी ऐसी पाद नहीं पादते। हिन्दी के मार्क्सवादी लेखक और लेखक संगठन के लोग ऐसी पाद कभी पाद ही नहीं सकते है। मतलब यह कि संचालक जी की पाद, पाद है, बाकी सब इत्र छोड़ते हैं। अरे भाई मैंने हिन्दी की दुनिया में हिन्दी के मार्क्सवादी लेखकों को सबसे ख़तरनाक हवा छोड़ते हुए देखा है। हिन्छी की दुनिया बस्सा रही है। सूप बोले तो बोले चलनी क्या बोले जिसमें बहŸार छेद। इस पाद-विचार की ज़रूरत यह बताने के लिए पड़ी कि लेखक अपने गिरोह, अपने गैंग में प्रतिष्ठा अर्जित करने के बहुत प्याज खाने लगता है। आँख, कान, मुँह, हर जगह से मार्क्सवादी प्याज खाने लगता है। हिन्दुओं को जितनी गाली दो, जितना बुरा कहो, उतना ही सम्मान मिलेगा, अवसर मिलेगा, लेखक संगठनों का प्यार मिलेगा। हिमाकत देखिए, हिन्दुओं की यौन-क्रांति दिखती है, अन्य धर्मों की यौन-क्रांति नहीं। जैसे नितंब, स्तन, नाभि आदि अंग किवल हिन्दू स्त्रियों के शरीर में होते हैं, बाकी अन्य धर्मों स्त्रियों के के शरीर में इनकी जगह लोहा-लक्कड़ होता है।
     हिन्दू विरोधी मार्क्सवादी लेखकों ने कविता की हत्या करने से पहले अपने कव्यविवेक की हत्या की है। हिन्दी कविता के भविष्य की हत्या की है। नये कवियों के भविष्य की हत्या की है। कोई कवि तत्सम के कुछ शब्द अपनी कविता में ले आए तो, उसे दौड़ा लेंगे और कोई मुसलमान कवि अरबी-फारसी हिन्दी में लाए तो उसका स्वागत करेंगे। मेरा मतलब आमफहम शब्दों को लाने से नहीं है। अरबी-फारसी के कठिन शब्दों को लाने से है। बिल्कुल युवा कवि अदनान कफील दरवेश का नाम लेना नहीं चाहता था, लेकिन हिन्दी कविता के साथ दिल्ली का एक गैंग जो कर रहा है, उसे बताने के लिए उदाहरण के रूप में नाम लेना पड़ रहा है। मैं इस युवा कवि की प्रतिभा पर संदेह नहीं कर रहा हूँ, बल्कि यह देख रहा हूँ कि उसकी कविता में क्या दिक्कत पैदा हो रही है। उसे हिन्दी के रंग में रंगने से कौन रोक रहा है। उसकी कविता में एक ओर बोली के बहुत प्यारे शब्द- नइहर, सईंतते, सम्हारते, लीपते आते हैं तो दूसरी ओर अरबी-फ़ारसी के कठिन शब्द- बोसीदा, फलक बोस, सब्ज बुर्ज, जाँ-कनी, अजदहा, बयाज, मुलव्विस, शीरफाम, रूहखस मकीन, मुतवज्जेह, नशेब, सरगोशिया, क़दीमी, आहन, क़िबला आदि, मुहावरे में कहूँ तो हजारों। कहना ज़रूरी है कि अरबी-फ़ारसी के कठिन शब्दों की भरमार, अदनान की एक मुस्लिम कवि की छवि बनाते हैं। अदनान को इससे बचने की ज़रूरत है। हिन्दूपन और मुसलमानपन, जीवन में हो तो ठीक, कविता में नहीं। जालीदार टोपी लगाइए या शिखा रखिए, चलेगा। हाँलाकि र्घामक होते हुए भी प्रगतिशील हुआ जा सकता है। लोग होते ही हैं। कविता में, ख़ासतौर से उसकी भाषा में हिन्दूपन और मुसलमानपन की गुंजाइश नहीं है। अशोक वाजपेयी जैसे कविता के जरजरात शत्रु की कविताओं में तत्सम की अति, मेरा मतलब हिन्दूपन को पसंद नहीं करता। विडम्बना कहिए या मार्क्सवादी लेखकों की मूर्खता, ऐसे व्यक्ति को अपना नायक बना लेते हैं, प्रतिरोध का नायक बना लेते हें। हद है। बहरहाल बात कविता की भाषा में हिन्दूपन और मुसलमानपन की कर रहा हूँ। भाषा कोई बिना दरवाजे और बिना खिड़कियों का भुतहा मकान नहीं है। उसमें दूसरी भाषाओं के शब्दों की आवाजाही होती है, लेकन उन शब्दों की जो लोक के रास्ते से आते है। हिन्दी में ढलकर आते है। इन युवा कवियों को अपने मुसलमानपन से बचने की जरूरत है। अरबी-फारसी के कठिन शब्दों का आतंक फैलाने से बचने की जरूरत है। हिन्दी को ग़ालिब जैसे कवि की ज़रूरत नहीं है, जायसी , रसखान, रहीम वगैरा जैसे कवियों की ज़रूरत है। जो हिन्दी में आए तो हिन्दी के रंग में रंग जाए। लगे ही नहीं कि कोई और है। जायसी की अवधी, तुलसी की अवधी से कम नहीं है। फ़िराक़ भी उर्दू में काम करते हैं तो हिन्दी के कठिन शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते हैं-
तमोलियों की दुकानें कहीं कहीं हैं खुलीं
खड़ा है ओस में चुपचाप हर सिंगार का पेड़ 
दुल्हन हो जैसे हया की सुगंध से बोझल

  कवियों को कविता से ही नहीं, कथाभाषा से भी  सीखना चाहिए। कैसे राही मासूम रज़ा ने आधागाँव उपन्यास में कथाभाषा को समृद्ध किया है। उर्दू और भोजपुरी के मेल से कमाल किया है। मीठी ज़बान उर्दू में मीठी बोली भोजपुरी को मिलाकर कैसे चकित करते है। श्रीलाल शुक्ल के रागदरबारी में ट्रक के वर्णन और केदारनाथ सिंह के एक टूटा हुआ ट्रक को एक साथ रखकर देख सकते हैं। भाषा की दृष्टि से नहीं। किसी कविता के स्रोतों की पड़ताल की दृष्टि से। असल में अब सीखना बंद हो गया, मशहूर होने की लालसा ने युवा कवियों को एक अंधी दौड़ में दौड़ते-दौड़ते  खत्म हो जाने के लिए छोड़ दिया गया है।
    मुश्किल यह है कि अदनान जैसे तमाम नए कवि पुरस्कार, अवसर और चर्चा के लिए लेखक संगठनों और साहित्य के शक्तिकेंद्रों की ओर जाते हैं और फिर कभी अपनी मिट्टी में लौट नहीं पाते हैं। अदनान ही नहीं, चेतनक्रांति जैसे तमाम कवि भी इन्हीं लालसाओं की वजह से अपने काव्यविवेक को तजकर लेखक संगठनों की शरण में चले जाते हैं। बड़ा और बड़ा कवि बनने की लालसा में फँस जाते हैं। लेखक संगठन वालों को ऐसे ही वरिष्ठ और युवा लेखक चाहिए, उनकी दुकान चलाने के लिए। उदाहरण देकर बात करनी हो, तो कहना चाहूँगा कि आलोचना के संपादक आशुतोष कुमार बहुत प्यार से भी ऐसे कवियों को डाँट नहीं सकते हैं, कुछ समझा नहीं सकते हैं। क्योंकि यह उनकी रणनीति का हिस्सा नहीं है। उन्हें कविता की भाषा से कुछ लेना-देना नहीं है। आलोचना में एक दूसरे संपादक हैं संजीव कुमार, उनके बारे में कम जानता हूँ; बहुत कम, अलबत्ता इतना जानता हूँ कि अरुंधति राय के भक्त हैं। उनका इंटरव्यू लिया है। शायद सत्यानंद निरुपम के साथ। अरुंधति जी ने हिन्दी को क्या दिया है, हिन्दी में उनका योगदान क्या है, हिन्दी के लिए अनिवार्य क्यों हैं? बुकर पाने के पहले से उनकी पूजा हिन्दी में शुरू हुई है या बाद में ? ओह ये कैसे जाहिल हिन्दी में आ गए हैं, हिन्दी के धंधे में आ गए है, पुरस्कार से लेखक का कद तय करते हैं। अरे मूखों, हिन्दी या किसी भी भाषा की परंपरा में कृतियों और लेखक के मूल्यांकन के लिए पुरस्कार को कसौटी नहीं माना गया है। सत्यानंद निरुपम जैसे पुस्तक-संपादकों ने पुरस्कार का इतना बड़ा हव्वा खड़ा कर दिया है कि जो पुरस्कृत लेखक है, वही बड़ा लेखक है, वही जीवित है, कालजीवी है। बुकर तो बुकर, साहित्य अकादमी पुरस्कार उनके लिए तोप है, है तो भारतभूषण पुरस्कार भी तोप ही का पुरस्कार । भारतभूषण पुरस्कार पा गया, तो कविता संग्रह छाप दो। हद है। कविता की समझ नहीं है, आलोचना की समझ नहीं है, उपन्यास की समझ नहीं है, पुरस्कार की समझ से राजकमज प्रकाशन समूह का धंधा चल रहा है। हिन्दी को कौन नुक़सान पहुँचा रहा है, यह कुछ-कुछ जानता हूँ। हिन्दी कविता का टेंटुआ, ऐसे ही संपादकों के पंजे में फँसा हुआ है। पिछले पन्द्रह वर्षों में जिस तरह के पुस्तक-संपादकों का प्रादुर्भाव हुआ है, ये हिन्दी कविता ही नहीं, हिन्दी आलोचना और उपन्यास की भी जान लेकर मानेंगे। एक ओर राजकमल प्रंकाशन समूह के पुस्तक संपादकों, आलोचना पत्रिका और लेखकसंगठनों से जुड़े कुछ लोगों का गैंग है, तो देशभर में फैले लेखक संगठनों से जुड़े लेखकों का भय, उनका साहित्य-विवेक च्युत होना, पुंरस्कार और चर्चित होने की तीव्र लालसा ने उन्हें हिन्दीद्रोही बना दिया है। मुश्किल यह कि जो नये कवि उनके साथ हैं, उनकी कमियों को दूर करने, उन्हें और सजाने-सँवारे की ज़िम्मेदारी भी उन्हीं पर है। जबकि यह सब करने की स्थिति में वे आज नहीं हैं। कहना उन्हें चाहिए था, कह मैं रहा हूँ। प्यार से डाँट मैं रहा हूँ, यह काम उन्हें करना चाहिए था। संपादक की ज़िम्मेदारी बहुत बड़ी है, आज महावीर प्रसाद द्विवेदी सरस्वती निकाल रहे होते, मैथिलीशरण गुप्त जैसे कवियों से कविता का पथ सँवार रहे होते, अरुंधति के पीछे इसलिए नहीं भागते कि बुकर मिला है और बुकर मिलने से देश की सबसे बड़ी लेखक हो गई हैं। मैं अरुंधति का विरोधी नहीं हूँ, उनका शत्रु नहीं हूँ, लेकिन हिन्दी के लेखकों के हिस्से का मान उन्हें दे दिया जाए, यह स्वीकार्य नहीं है। हिंदी का संसार मेरी प्राथमिकता में है। हिन्दी कविता के लिए लाखों के बोल सह सकता हूँ, नुक़सान उठा सकता हूँ, किताबें छपवाए बिना मर सकता हूँ, मशहूर हुए बिना मर सकता हूँ। मुझे हिन्दी के बुरे लागों से कुछ नहीं चाहिए। साहित्य में जिस बात को ग़लत समझता हूँ, तो उसे ग़लत कहूँगा। यह एक बहुत बुरा समय है। कुछ लोग हर समय में होते हैं, जिन्हें जोखिम उठाकर साहित्य का सच कहना ही होता है। 

(कविता की जान लेने के सौ तरीके का दूसरा अध्याय)  




गुरुवार, 4 जून 2026

कविता की जान लेने के सौ तरीके

कविता की हार्दिकता
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-गणेश पाण्डेय

कविता से हार्दिकता नष्ट हो रही है, यांत्रिकता बढ़ती जा रही है। कल्पनाशीलता का नाश हो रहा है। भाषा से सर्जनात्मकता कम होती जा रही है। बुद्धि, अपनी नैसर्गिकता खो रही है। कुछ लोग हैं, जो कविता का अतिक्रमण कर रहे हैं, उसे लेख की दासी बना रहे हैं। जो लोग, यह सब कर रहे हैं, यह सोचकर कर रहे हैं कि कविता में कमाल कर रहे हैं। वे आचार्य शुक्ल से आगे का काम जिसे समझ रहे हैं, दरअसल वह उनकी समझ का फेर है। शायद उन्हें कविता की बुनियाद, दीवारों और मंजिलों के बारे में कम पता है या उन्होंने हिन्दी साहित्य से बाहर, अपने पुरखे और आदर्श चुन लिए हैं। यह हमारे समय की कविता का एक हिस्सा है, जिस ओर कविता का हृदय पक्ष नहीं है, हड्डियों का एक टूटा-फूटा ढाँचा है, धोखा है, उस ओर आज के युवा सरपट दौड़े चले जा रहे हैं, लेकिन अभी पूरा मैदान उनके दौड़ने के लिए खाली नहीं हुआ है। फिर भी इन युवाओं के आका कविता की पीठ में छुरा घोंपने से बाज नहीं आ रहे हैं। असल में इनकी पीठ पर किसी न किसी संगठन, गैंग और साहित्य की भ्रष्ट संस्थाओं का हाथ है। कोई कितना ही बलवान क्यों न हो, कितनी ही बड़ी फौज उसके पास क्यों न हो, चाहे उसके पास करोड़ों का फंड हो, दरबारियों का हुजूम हो, कविता किसी के मारने से न कभी मरी है, न मरेगी। इन्होंने अब तक कविता की जान लेने के सौ तरीक़े आज़माए, लेकिन कविता अपने आसन से कभी डिगी नहीं। कविता की हत्या के लिए सन्नद्ध हिन्दी के ये हत्यारे, शार्पशूटर अलबत्ता की समय हाथों मारे जाएँगे।

      हे भगवान, हे भगवान इसलिए कहता हूँ, क्योंकि अपने समय के हिन्दी साहित्य में मुझे कोई ऐसा लेखक मिला ही नहीं, जो दूध का धुला न हो तो, कम से कम पानी का धुला तो हो ही, जिसे अपना गॉडफ़ादर बना सकूँ। नामवर सिंह में न ऐसा कुछ दिखा, न अपने गृह जनपद सिद्धार्थनगर के बिस्कोहर गाँव के विश्वनाथ त्रिपाठी में। त्रिपाठी जी तो महाढिलपुक निकले। मेरे सामने इलाहाबाद और गोरखपुर के एक-एक गीतकारों का नाम जैसे लिया, तभी मैं समझ गया कि पंडिज्जी अब कितने पानी में आ गये हैं, पानी तो धुलने भर का भी नहीं है। मैंने सीधे विश्वनाथ त्रिपाठी लिख दिया है, जिला -जवार कै मनई पढ़ेंगे तो मुझे गाली देंगे, नालायक तो कहेंगे ही कहेंगे, जिला-जवार कै बुजुरुक का नाम इज्ज़त से नाहीं लिया। हमारे यहाँ किसी बुजरुक के बारामंड पर लाठी बजाना होता है, तो पहले पैलगी करते हैं, फिर लाठी बजाते हैं। सो पाठको, पं विश्वनाथ त्रिपाठी जी के आगे चार बार परम आदरणीय लिखता हूँ। पंडिज्जी के बाद बाऊ साहब का जिक्र। 
      केदारनाथ सिंह, मेरे प्रिय कवि बंगाली जी के बहुत निकट थे, लेकिन सिंह साहब की पालकी ढोने वालों की संख्या का अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि गोरखपुर में चार तो मुख्य पालकी ढोने वाले थे, ऊपर से चौदह सहायक भी थे। सहायक तो नामवर जी के भी कई थे। एक प्रमुख सहायक तो गोरखपुर में ही थे। मैं कहाँ से किसको पकड़कर कहता कि आप मेरे गॉडफ़ादर बन जाओ। वाजपेयी जी में गॉडफ़ादर बनाने लायक़ कुछ था ही नहीं, वे तो चिरकुट लेखकों-अलेखकों तक के गॉडफ़ादर रहे हैं। आजकल तो कहीं से लंबा हाथ मारकर फंड हथिया लिया है, उसी लेखकों का गाडफादर वगैरा बनते हैं। हमारे समय में किसी का एक गॉडफ़ादर होना तो बहुत मामूली बात है, मेरी पीढ़ी में तो एक-एक के दस-दस गॉडफ़ादर रहे हैं। गॉडफ़ादर भी बहुत छोटे थे। बहुत छोटे। छोटे इसलिए थे कि बाद की किसी भी पीढ़ी में एक भी मज़बूत लेखक नहीं पैदा कर सके। गॉडफ़ादर-प्रसंग यहाँ मुख्य या सहायक विषय नहीं हैं। यह तो औचक भगवान के सामने फाट पड़ा। 
     तो फिर से, हे भगवान भले मुझे नातिनों और पोतियों का ब्याह देखने तक का समय न दीजिए, लेकिन मुझे इतना समय ज़रूर दीजिए कि कविता के आज के बीसियों डॉन और उनके शूटरों की ख़राब कविताओं पर थोड़ा-बहुत कह सकूँ। कविता या साहित्य को नुक़सान पहुँचाने वालों पर चोट कर सकूँ। बुरी कविता के कुछ प्रतिमान थिर कर सकूँ और कविता के देवता की पोशाक पहनकर जगह-जगह विचरण करने वाले, कविता के कापुरुषों की पहचान कर सकूँ। उन्हें रेखांकित कर सकूँ। अपने समय की कविता का एक काला इतिहास लिख सकूँ। एक ऐसा दस्तावेज़ लिख सकूँ, जो मेरे न रहने के बाद, वक़्त पर काम आये।

    सोचता हूँ कि यह शुरुआती हिस्सा किसी प्रिंट या वेब-पत्रिका को दे दूँ, लेकिन कविता को लेकर हमारे समय के संपादकों के क्या आदर्श हैं, हमारे समय के कौन से कवि उनके प्रतिनिधि कवि हैं, उनकी दृष्टि में अच्छी कविता के प्रतिमान क्या हैं, क्या सब धान बाईस पसेरी हैं या कविता को लेकर उनकी कोई समझ है या नहीं, जान तो लूँ।

       कोई संपादक के साथ प्रोफ़ेसर भी हो, तो मतलब यह कि करेला नीम पर चढ़ा हुआ है। वैसे भी प्रोफेसर होना बड़ी चीज है। इस अर्थ में कि उसकी नौकरी पक्की है, कुछ भी लिखे; मोदी और भाजपा की चाहे जितनी तीव्र आलोचना करे, फासिस्ट-विरोध की बुनियाद पर लेखक संगठन चलाये। प्रोफेसर अगर लेखक संगठन को जेब में रखकर देश भर में दौरा करने लगे, कवियों का जमावड़ा लगाये और एक  पत्रिका में छापने लगे, तब तो वह कम उम्र में ही साहित्य की एक सत्ता बन सकता है। उसके साथ चलने वालों में, उसकी पत्रिका में छपने वालों में हिम्मत नहीं होगी कि उसकी आलोचना कर सकें, उसके खि़लाफ़ चूँ बोल सकें। वैसे जो लोग प्रोफ़ेसर नहीं हैं, सिर्फ संपादक हैं, उन्होंने भी कम मठाधीशी नहीं की है। राजेन्द्र यादव तो बड़े मठाधीश थे। मंगलेश डबराल भी साहित्य संपादक होने की वजह से छोटे -मोटे मठाधीश ही थे। इनके अनुयायी और उपकृत आज भी हैं। इस तरह के सभी लेखक कभी भी साहित्य की भ्रष्ट सत्ताओं की आलोचना नहीं करते हैं। साहित्य के अँधेरे पर सवाल नहीं उठाते हैं। मेरा मानना है कि एक लेखक को प्राथमिक रूप से भाजपा, कांग्रेस, सपा, तृणमूल, सीपीआई, सीपीएम वगैरह राजनीतिक दलों का काम नहीं करना चाहिए। कोई आज़ादी की लड़ाई नहीं चल रही है। अंग्रेज़ों से संघर्ष नहीं करना है।

     आज़ादी के बाद कई-कई बार केंद्र में और प्रांतों में सरकार बनाने वाले और सत्तारूढ़ दल को हराने वाले, उठाने और गिराने का बेहतर काम कर रहे हैं। जनता, इस मामले में हिन्दी के आज के लेखकों से हज़ार गुना ज्यादा मजबूत है।

      लेखक को अपने दायरे में रहना चाहिए। विपक्ष की पार्टियाँ मर नहीं गयी हैं। वे अपना काम कर रही हैं। हाँ, वे न कर पा रही हों, तो उन्हें चार चाँटा मार कर सभी विपक्षी पार्टियों की बागडोर अपने हाथ में ले लेना चाहिए। कविता और पत्रिका छोड़कर चुनाव में कूद पड़ना चाहिए।

      फ़िलहाल तो मेरे विचार से इस समय लेखक जी लोगों को साहित्य के अँधेरे के ख़लिफ़ लड़ना चाहिए। साहित्य की अपसंस्कृति और अंधविश्वास के ख़लिफ़ लड़ना चाहिए। साहित्य के पूँजीवाद से लड़ना चाहिए। अकादमियों की साफ़ सफ़ाई में लग जाना चाहिए। अफ़सोस, ये लेखक आज़ादी के बाद भी आज़ाद नहीं हैं, अपने राजनीतिक आकाओं के अनुचर हैं। ऐसे लेखक साहित्य में अँधेरा कम करने का काम नहीं, बढ़ाने का काम करते हैं। पैदा होते ही शुरू कर देते हैं। संपादक अवसर सुलभ कराते हैं। चलो बच्चे, जिस कवि से मतलब गाँठना है, उस पर पचास पेज लंबा लेख लिख मारो। प्रशंसा इतनी ज़ोर ज़ोर से करो कि प्रशंसा की टाँग ही टूट जाए। तीनों लोक दाँतो तले उँगली दबा ले। असल में एक लेखक को अपने किशोर और युवा काल में बहुत सँभलकर रहना चाहिए। कोई भी किसी भी तरह का बेजा फायदा न उठा सके। कम उमरी में ऐसा हो जाता है। होने को तो साठ पार करने के बाद भी आलोचक वयस्क नहीं हो पाता है। अपने समय के तीन तीन औसत कवियों पर किताब संपादित कर रहा होता है।  यह वयस्क आलोचना नहीं है। मैंने आज तक कभी किसी कवि पर लेख नहीं लिखा। यहाँ तक कि अपने प्रिय कवि देवेन्द्र कुमार बंगाली पर भी नहीं। जबकि मेरे मित्र अरविंद त्रिपाठी ने अपने समय के कोई हजार कवियों पर लेख या ज्यादातर उनकी पुस्तकों की समीक्षाएँ लिखीं। हमारे समय में अधिकांश आलोचकों ने कमोबेश यही सब किया है। असल में आलोचना की दुश्मन हैं, तीन चीज़ें। संबंध, स्वार्थ और संगठन। उदाहरण के लिए अशोक वाजपेयी से संबंध है तो उन्हें संस्कृति पुरुष कहने लगेंगे, संगीत और कलाओं के क्षेत्र में उनके काम को महान बताकर उन्हें रामचंद्र शुक्ल से बड़ा आलोचक कहने लगेंगे। टैगोर के समकक्ष बताने लगेंगे। लेखक संगठन से जुड़े हैं तो अपने कवियों को महान बताने लगेंगे। यह आलोचना नहीं है। अतिप्रशंसामूलक आलोचना, आलोचना नहीं, मुंशीगीरी है। आलोचकों को अपने समय के लेखकों पर लेख लिखने से बचना चाहिए। बहुत ज़रूरी हुआ तो बिल्कुल नये लेखकों को प्रोत्साहित करने के लिए संयमित टिप्पणी करनी चाहिए। लिखने वाले से अधिक छापने वाले की जिम्मेदारी है कि वह साहित्य का सच छापे, झूठी प्रशंसा नहीं।

    हर लेखक और संपादक मेरी तरह लगातार मुखर होकर साहित्य की भ्रष्ट सत्ताओं का विरोध करता रहे, तलवार चलाता रहे, ज़रूरी नहीं। विरोध और आलोचना, दोनों के लिए, पुष्ट आधार और तर्कशीलता की ज़रूरत होती है। किसी का किसी ने पक्ष ले लिया या विरोध कर दिया तो हम उसका कुर्ता नहीं फाड़ सकते हैं। बड़े तार्किक ढंग से उसका विरोध करेंगे। नामवर जी ने बेईमानी करके अपने एक प्रिय कवि को उठाने के लिए छंद की अनिवार्यता की बात की, तो मैंने अपने लेख ‘ कविता का चाँद और आलोचना का मंगल’ में समझाया कि छंद या छलछंद अच्छी कविता की गारंटी नहीं है। अगर आज अच्छी या बड़ी की गारंटी छंद है, तो केदार नाथ सिंह तो गीतों की दुनिया से आये हैं, छंदमुक्त कविता की जगह छंद की कविता में लौटकर महाकवि या बड़ा कवि या कालजयी कवि क्यों नहीं बन जाते हैं? मैंने अपने लेख के निष्कर्ष में कहा कि छंद में भी और छंदमुक्त में भी, दोनों में अच्छी कविता भी हो सकती है और ख़राब कविता भी हो सकती है। तुलसीदास और केशवदास का उदाहरण भी दिया। जहाँ तक मुझे याद है ख़राब कविता के रूप में राजेश जोशी की किसी कविता का उदाहरण दिया था। परमानंद श्रीवास्तव जी ने मुझे बताया था कि राजेश जी ने वागर्थ का वह लेख पढ़ लिया है। विश्वनाथ जी ने भी पढ़ा था और कहा था कि बड़े तर्क के साथ लिखा है। आशय यह कि लेखकों को साहित्य और लेखकों की आलोचना में तर्क को महत्व देना चाहिए। हमारे आग्रह निजी पसंद से नहीं, तर्क से पुष्ट होते हैं।

     हमारे समय का कोई कवि हमारा बहनोई या साला नहीं है, सिर्फ़ एक कवि है, हमें अच्छा लग सकता है; इसका मतलब यह नहीं कि उसमें कमियाँ नहीं होंगी। पूजाभाव नहीं होना चाहिए। आजकल तमाम युवा लेखक और संपादक, अशोक वाजपेयी की पूजा करते हैं, ज़ाहिर है भक्त भी हैं, बहुत उपकृत भी हैं। अशोक वाजपेयी जी की आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सकते। कई मठाधीश हैं, सबके भक्त हैं। कुछ तो वैचारिक साम्य की वजह से कुछ लेखकों को बहुत निकट का मानते हैं, लेकिन ध्यान देना चाहिए कि हमारे राजनीतिक विचार कविता की कसौटी नहीं हो सकते हैं। ऐसा होता तो वामपंथी राजनीतिक दलों के सभी कार्यकर्ता कविता लिख रहे होते। कविता में कबीर क्या कम आदर्श हैं? विचार के आधार पर ही नहीं, धर्म के आधार पर भी कवि की पहचान नहीं बननी चाहिए। कवि की पहचान, कवि के रूप में थिर होनी चाहिए। साहित्य में राजनीतिक संघर्ष की जगह लेखक के आत्मसंघर्ष का महत्व है। किसी कवि को उसका राजनीतिक संघर्ष नहीं, आत्मसंघर्ष बड़ा बनाता है। आत्मसंघर्ष ही हर कवि की एक अलग छाप उपस्थित करता है। यह आत्मसंघर्ष, कवि के साहित्यिक जीवन में ही नहीं, मूल्यों के लिए उसके संघर्ष में ही नहीं, उसके लेखन में भी दिखता है, उसकी भाषा की खोज में दिखता है, उसके मुहावरे में आता है।

    हमारे समय की कविता में राजनीति का सच बहुत कहा जा चुका है, चलिए थोड़ा सा और कह लें; लेकिन साहित्य का सच बहुत कम कहा गया है, ज़रूरी है कि लेखक लोग अपने समय के साहित्य का सच भी कहें। लेखक संगठनों को , लेखकों और साहित्य की समस्याओं की ओर रुख़ करना चाहिए। नयी सदी की कविता पर केंद्रित यात्रा के दो विशेषांकों के बाद कर्ण सिंह चौहान जी के साथ साहित्य का कृष्णपक्ष पर विशेषांक लाना चाहते थे। पर्याप्त रूप से लिखने वाले लोग नहीं मिल पाये। दिल्ली के एक फ्रीलांसर त्रिपाठी जी थे, पता नहीं हैं या नहीं, एनएसडी के खिलाफ यहाँ खूब लिखते थे, जब उनसे साहित्य के भ्रष्टाचार पर लिखने के लिए कहा तो सीधे मना करने की जगह उन्होंने पूछा, कितना पैसा देंगे। ग़नीमत यह कि वे आज़ादी की लड़ाई में नहीं थे वरना गांधी जी से पूछते, कितना पैसा देंगे। इस तरह, हमारे पास दो विकल्प थे, पहला यह कि जैसे हमने पिछले विशेषांक में एक सौ पच्चीस पेज का और चालीस पेज का लेख लिखा था, फिर से साहित्य के भ्रष्टाचार पर लंबे लेख लिखते या कुछ समय के लिए पत्रिका का प्रकाशन स्थगित करते। हमने दूसरा विकल्प चुना। हम लिखते रहे हैं, आगे भी लिखेंगे, हमारा तरीक़ा और हमारी विधा दूसरी हो सकती है। इस पर फिर बात करेंगे।

    आज के संपादकों और लेखकों को केवल लेखक संगठनों से जुड़े लेखकों की ही नहीं, हिन्दी के लिए संघर्ष करने वाले दूसरे लेखकों की भी फ़िक्र होनी चाहिए। हिन्दी के अँधेरे के खिलाफ भी विशेषांक लाना चाहिए। एक बात छूट रही थी, देखिए, कोई बात है कि कोई ज़रूरी बात छूट नहीं पाती है। नयी सदी की कविता पर केंद्रित यात्रा के अंक कविता के धंधे और अँधेरे पर भी बात की गयी है। कहा गया है कि हमारे समय की कविता को भाभूअ पुरस्कार ने कितना नुक़सान पहुँचाया है। शायद यह सब आलोचना के ताजा विशेषांकों में नहीं कहा गया होगा। नयी सदी की कविता सिर्फ़ फ़ासिस्ट-विरोध की कविता नहीं है। उसे फ़ासिस्ट-विरोध तक सीमित कर देना, कविता के पंख कतर देना है, उसका टेंटुआ दबा देना है। कविता, जीवन, समाज और प्रकृति की सहचर है।

     आज हिन्दी कविता संकट में है। उसे खतरा न  फासिस्टवाद से है, न राष्टवाद से, न मार्क्सवाद से, न साम्यवाद से, न समाजवाद से, किसी विचारधारा या वाद से नहीं, हिन्दी के इन वादों के भ्रष्ट अनुयायियों से है। खतरा बाहर से नहीं, हिन्दी के खासतरह के बेईमान लेखकों से है। न इन्हें कविता के भविष्य की चिंता है, न वर्तमान और न इतिहास की। ये लेखक कम यश और पुरस्कार के लुटेरे अधिक हैं। ये मशहूर होने और कविता की दुनिया में दहशत पैदा करने के लिए किसी भी दौर की कविता की जान ले सकते हैं, कविता के लिए जान देने वालों की जान वक्त से पहले ले सकते हैं। उसे अपने समय की काल कोठरी में डाल सकते हैं, फाँसी पर चढ़ा सकते हैं। हिन्दी का एक बड़ा पब्लिकेशन हाउस कविता का फाँसीघर बना हुआ है। उसके एडीटर इन चीफ का हाल तो पूछो ही मत। ओह हिन्दी कविता के साथ क्या-क्या नहीं किया।
     कविताहीन कविता के इस दौर में, पाठकों के भीतर डर पैदा करने के लिए यह सब नहीं कह रहा हूँ। अच्छी कविता के प्रति प्रेम बना रहे। उसे कोई मार न सके, इसलिए कह रहा हूँ। एक कवि के पास उसकी सभी कविताएँ एक ही तरह की नहीं होनी चाहिए। संघर्ष की हों तो प्यार की हों, भरोसे की हों तो प्रकृति की हों, मनुष्य जीवन की हों तो मनुष्येतर प्राणियों की हों। आशय यह कि कुछ भी कविता के लिए वर्जित नहीं है। जिन विषयों को वर्जित माना गया, उन पर भी कविताएँ लिखी गयी हैं। मेरे पहले संग्रह में ही गुरु सीरीज है। बहरहाल अपनी एक बिल्कुल नयी प्रेम कविता पढ़वाता चलूँः

ओ चाँद के मुसाफ़िर
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ओ चाँद के मुसाफ़िर
चाँद पर अपनी गाड़ी
बहुत आहिस्ता से उतारना
चाँद की अँजुरी में
फूल की मानिंद रखना पग
अपना भारी-भरकम
बूट-सूट पहनकर ऐसे चलना
जैसे रुई का फाहा हो
चाँद को बहुत प्यार से छूना
उसे कोई खरोंच न लगने पाए
उस पर चलना तो उड़ना
तितलियों की तरह पंख फैलाए
इस कोने से उस कोने तक
सुगंध की तरह विचरण करना
उसमें बेकार की चीज़ें मत ढूँढने लगना
चलो तुम्हारा बहुत मन करे
तो अपनी लोहे की बैलगाड़ी में
कंकड़-पत्थर
चाहे हीरे-जवाहरात भी रख लेना
लेकिन ख़बरदार जो दिए बिना लौटे
सखी को मेरा संदेशा मेरा प्यार
भेंट-अँकवार
ये सिल्क की साड़ी
ये पेटीकोट और ब्लाउज
और लाल बिंदी का पत्ता
और मेरे हाथ की बनी हुई
खीर
तो ऊपर लटके रह जाओगे
मेरा भी नाम सोनौरा गाँव की
सबसे ज़िद्दी सुमिन्तरा देवी है
मैं कोई चार किताबें पढ़ने वाली
मतिमंद स्त्री थोड़े हूँ
जो मुझे और बातों में उलझाकर
चाहे तरह-तरह का लालच देकर
अपना जहाज़ उतार लोगे
उतरने तो तभी पाओगे बच्चू
जब तीनों लोक के
सबसे बड़े प्रेमी की फोटो
सखी से मांगकर लाओगे
ओ चाँद के अलबेले मुसाफ़िर
जहाज़ को सोनौरा गांव की मेरी
सबसे ऊँची छत पर उतारने की जगह
किसी समुद्र में उतारने की ग़लती मत करना
मेरी सखी चाँद की पाती
और सबसे बड़े प्रेमी की फ़ोटो भीग न जाए
मेरा ब्याह उसी से होगा
कहे देती हूँ।

      साहित्य की मुख्यधारा धारा, जो युवाओं के लिए कविता की धारा नहीं, विचारधारा या फासिस्ट-विरोध की धारा हो गयी है, जिसके पास ‘आलोचना’ और दूसरी ऐसी पत्रिकाएं हैं, जिसके साथ दिल्ली का इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा एडिटर इन चीफ है, उस धारा के आलोचक आएँ, चापलूस आएँ, गुंडे आएँ और ऊपर दी गयी मेरी कविता का वध कर दें। उन्हें आमंत्रित करता हूँ। आएँ, उनका स्वागत करता हूँ और बताएँ कि यह कविता अच्छी कविता क्यों नहीं है? हिन्दू-मुसलमान ही अच्छी कविता क्यों है? आएँ, आएँ, कहें कि ‘ओ चाँद के मुसाफ़िर’ अवैज्ञानिक कविता है, कवि को विज्ञान की बुनियादी जानकारी नहीं है, कवि इतना कूढ़मगज है कि चाँद पर प्रज्ञान और विक्रम की जगह बैलगाड़ी चलवा रहा है? कितना बड़ा अहमक है, गणेश पाण्डेय, चंद्रयान को समुद्र की जगह छत पर उतरवा रहा है? भला कविता में अँगने में कल्पना का क्या काम है? काव्यभाषा का क्या काम है? यह तो स्त्रीविमर्श-विरोधी कविता है। नकल है। चोरी की कविता है। जाहिर है, इस तरह की बातें आज कविता की जान लेने वाले ही कर सकते हैं। इसीलिए तो आमंत्रित किया है कि फ़ैसला हो जाए कि कविता का हत्यारा कौन है? यहाँ अपनी ‘ओ ईश्वर’ कविता उद्धृत नहीं कर रहा हूँ। सिर्फ़ यह बताने के लिए उसका नाम ले रहा हूँ कि 1992 में जब इस गैंग के नये शूटर पैदा ही नहीं हुए थे, तब 6 दिसंबर के बाबरी-प्रकरण के तुरत बाद 13-19 दिसम्बर के साप्ताहिक हिंदुस्तान में यह कविता आयी थी। यह सब इसलिए कह रहा हूँ कि एक कवि को  जीवनभर हिन्दू-मुसलमान नहीं करते रहना चाहिए। इस विषय पर एक बार, दो बार, चलो दस बार लिख दो, उसके बाद तो तुम्हें कविता के दूसरे इलाक़े में जाना चाहिए। ताकि तुम्हारी कविता यांत्रिक होने से बच सके। मेरे कहने से नयी पीढ़ी नहीं सुधरेगी। कविता कोई खिलौना नहीं है। कविता कोई अनाथ नहीं है। उसकी आत्मा से उठने वाली चीखें सुनने वाले हैं। कविता का एक भरा-पूरा जीवन है और उसका जीवन तुम सबके जीवन से बहुत-बहुत लंबा है। कविता का एक सम्पूर्ण संसार है। साहित्य के संसार में कविता के जीवित सगे-संबंधी हैं। उनके रहते कविता की हत्या करना कठिन है। नामुमकिन है। क्योंकि सिर्फ़ आज ही नहीं, हर समय में एक ओर यांत्रिक कविताएँ लिखी जाती रहेंगी, तो दूसरी ओर कविता की हार्दिकता के पक्ष में लिखने वाले कवि और आलोचक, चुनौती देते रहेंगे। कविता की जान लेने की कोशिश करने वालों के मंसूबों को भसम करते रहेंगे।

       नोट : काफी पहले यात्रा के कालम को पढ़कर लेखक-पत्रकार राजकिशोर जी ने मुझसे फोन पर पूछा था कि कचिता की जान लेने के सौ तरीके़ नाम की किताब कहाँ से छपी है? मैंने बताया कि कालम में सिर्फ  ज़िक्र है। मैंने किताब अभी लिखी नहीं है। तब भी कविता के हत्यारे प्रचुर मात्रा में थे, आज तो ख़ैर जिस दिल्ली रिटर्न को देखिए हत्यारा दिखता हैं। तब किताब शुरू नहीं कर पाया था। अब कर दिया है। यह किताब भक्तिकाल या आधुनिककाल की प्रगतिशील कविता पर नहीं है। हमारे समय की फर्जी प्रगतिशील कविता पर है, कविता और सच्ची प्रगतिशील कविता के तरीकों और हत्यारों पर है। कविता की जान लेने के सौ तरीके का यह पहला अध्याय है- कविता की हार्दिकता। यह तुरंता कापी है। 




सोमवार, 13 अप्रैल 2026

दिल्ली जाऊँगा

- गणेश पाण्डेय 

दिल्ली जाऊँगा
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मई-जून में 
दिल्ली में कितनी गर्मी रहती होगी 
वहाँ के लेखक बाहर धूप में 
निकलते होंगे या नहीं निकलते होंगे 
निकलते होंगे तो उनका माथा 
कितना गर्म रहता होगा 

सोचता हूँ गर्मियों में 
बच्चों के पास एनसीआर जाऊँ
जाऊँ तो सबसे पहले 
उस लेखक से मिलूँ
जिसका माथा हमेशा ठंडा रहता हो
और जो दिल्ली में रहकर भी 
सादादिल हो सादामिज़ाज हो
और जिससे मिलने के बाद 
आग बरसाती हुई दोपहरी में भी 
रूहअफ़ज़ा शर्बत पीने जैसी
ताज़गी मिलती हो

दूसरे लेखकों से मिलने के लिए 
कौन सा दिन और वक़्त सही होगा
किससे स्वागत की उम्मीद करूँगा
कौन मुँह लटकाकर मिलेगा 
किसे कुर्सी का घमंड होगा
किसे नहीं होगा
किससे मिलना ज़रूरी होगा 
किससे ग़ैर-ज़रूरी
किससे मिलकर 
वज़नी होकर लौटूँगा
किससे लुट जाऊँगा

किसी से मिलूँ तो कितना झुकूँ
कितना मुँह खोलूँ कितनी चाय पिऊँ
सुड़कूँ या ख़ामोशी से पिऊँ
नमकीन खाऊँ या नहीं खाऊँ

अव्वल तो मेट्रो में अकेले 
चढ़ नहीं पाऊँगा गिर जाऊँगा
कोई सामान चुरा लेगा
मोबाइल पर्स पानी की बोतल 

एक गमछे से इतनी बड़ी दिल्ली में 
ऐन दोपहरी में लू के थपेड़ों से 
कैसे बच पाऊँगा मुश्किल होगी 
फिर भी दिल्ली जाऊँगा

पहली बार गर्मियों में कुछ हफ़्ते
एनसीआर में रहने की मजबूरी हो 
तो मुझे क्या करना चाहिए 
और क्या नहीं करना चाहिए 
मदद करो ओ दिल्ली वालो
ओ दिल्ली आने-जाने वालो

इकहत्तर 
पार कर चुका हूँ 
एक बार दिल्ली के दिल को
एकदम से मेरे दिल से मिला दो
दोनों एक-दूसरे का सुख-दुख 
जान लें 

आग बरसती हो या पानी 
चाहे चलती हो आँधी
जब दिल्ली आऊँगा ही तो
दिल्ली के मज़े मुझे भी चखा दो 
लेखकों की रंगीन शामें महफ़िलें
और रक़्स दिखा दो दिखा दो
मुझे भी थोड़ी-सी 
पिला दो पिला दो पिला दो
उनकी तरह 
एक बूढ़ी रक़्क़ासा बना दो

लेकिन 
रक़्स ख़त्म होने के बाद 
देर रात मुझे रास्ता कौन बताएगा
मुझे मेरे बच्चों के पास 
कौन पहुँचाएगा
मेरी मदद कौन करेगा 
मैं वापस अपने ठिकाने पर अकेले 
देर रात कैसे लौट पाऊँगा

नहीं-नहीं मैं दिल्ली की
रंगीन रातों को देखने के लिए 
क़तई रुक नहीं पाऊँगा
दिन ढलने से पहले लौट आऊँगा।

                                           
                                                                                                   

बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

फ़रवरी सिर्फ़ एक महीना है तथा अन्य कविताएँ

- गणेश पाण्डेय 

बलई मिसिर एमए पीएचडी हिन्दी 
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न फूल की दुकानें थीं
न छिपकर बैठने की जगहें 
एक स्वेटर एक जूता तो था नहीं 
हवाई चप्पल पहनकर घूमते थे 
वहाँ न यूनिवर्सिटी थी न कॉलेज 
कितनी नदियों को पार करके 
कितनी मुश्किलों में हुई थी 
बलई मिसिर की पढ़ाई लिखाई
फिर तो जीवन में कभी 
फ़रवरी आयी ही नहीं 
जो आयी सीधे 
सूर्यमुखी बीबी आयी 
चार बच्चे आये
बेचारे 
बलई मिसिर तो जीवन में 
जनवरी की हाड़ कँपाती 
ठंड के पहाड़ से सीधे 
अप्रैल मई जून की आग में 
कूद पड़े थे
चारों तरफ़ 
आग ही आग थी 
न गुलमोहर न अमलतास 
न फ़रवरी न मार्च ओह 
जन्म-जनम के फ़रवरी-वंचित 
बलई मिसिर 
एम ए पी-एच डी हिन्दी।

फ़रवरी सिर्फ़ एक महीना है 
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मैं इसी महीने में 
उस नदी के पास गया था 
नदी उसी तरह बह रही थी 
नदी वही थी पानी नया था 

नये लड़के और लड़कियाँ 
तट पर हूबहू उसी तरह बैठे थे 
एक पैर जल में था एक तट पर

सूरज की किरणों से उनका 
चेहरा उसी तरह दमक रहा था 

सूरज डूब रहा है डूब जाएगा 
उन्हें पता नहीं था जैसे हमें 
पता नहीं था 

सूरज डूब जाएगा 
नदी का पानी बह जाएगा 
फूल मुरझा जाएगा 
कौन बताए उन्हें 

जीवन में 
फ़रवरी सिर्फ़ एक महीना है 
बीत जाएगा।

जगह वही है 
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यह पेड़ वह पेड़ नहीं है 
यह हरा है वह सूख गया था 
जगह वही है 
यह गुलमोहर नया है 
यह अमलतास नया है फूल नये हैं 
उस पर बैठी कोकिला नयी है 
उसका कंठ नया है 
उसकी पुकार नयी है 
दोनों का साहचर्य नया है 
यह फ़रवरी नयी है।

मेरी जान
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पार्क में सीमेंट की बेंच वही है 
कुर्ती उसी तरह लाल है छींटदार है 
और सलवार उतनी ही सफ़ेद 
लड़की नयी है लड़का नया है 
और बगल में खड़ी लाल बाइक 
नयी है 

सीमेंट की बेंच भी 
हमें कहाँ अलग होने से बचा पायी 
वह जगह भी हमें नहीं रोक पायी 
वह घास भी कहाँ हमें बाँध पायी 
जिस पर हम नंगे पैर चलते थे 
बिना कुछ बिछाये लेट जाते थे 
आसमान को निहारा करते थे 
आसमान भी हमें बचा नहीं पाया

समय का चाकू 
मज़बूत से मज़बूत जोड़ को
एक झटके में अलग कर देता है 
कोई नहीं बचा पाता है फ़रवरी भी
हम बचने के लिए बने ही नहीं थे 
हमें इसी तरह टूट-फूट जाना था
मिट्टी के राजा
और मिट्टी की रानी की तरह।



मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

गंगाजल तथा अन्य कविताएँ

- गणेश पाण्डेय

हमारा प्यार 
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तुम चाहती तो 
मेरा घर तोड़ सकती थी 

मैं तो चिता से भी उठकर 
तुम्हारे साथ भाग सकता था 

मैं चाहता तो 
तुम्हारा घर तोड़ सकता था 

तुम्हारे घर के आसपास
दीवारों पर तुम्हारा नाम लिखकर 

प्यार में कोई किसी को 
नुक़सान कैसे पहुँचा सकता है 

हम तो अपने प्यार को तमाम 
वक़्त के थपेड़ों से बचाते रह गये 

दिल के किसी पोशीदा तहखाने में 
यादों की संदूक में उसे रखा 

यही था यही था हमारा प्यार 
राख में बची हुई चिनगारी की तरह।

पोती पूछेगी 
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तीन दिन फोन पर बात नहीं हुई तो 
पोती ने कहा, बाबा कहाँ चले गये थे
बाबा ने कहा, मेरी तबीयत ख़राब थी 
पोती ने पूछा, तबीयत क्यों ख़राब थी
काश, उसके बाबा कभी बीमार न हों
काश, पोती की आँखों के सामने से 
उसके बाबा कभी ओझल ही न हों
पोती पूछेगी परेशान होगी।


फ़ज़ीहत के बाद 
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मुफ़्त सलाह देना 
समझदारी की बात नहीं थी 
नहीं देना चाहिए था कभी नहीं 
जहाँ मुफ़्त में देना बहुत ज़रूरी था 
वहाँ से भी बिना दिए चुपचाप 
हट जाना चाहिए पाँडे जी को 
अक़्ल आयी तो लेकिन तमाम
फ़ज़ीहत के बाद।

गंगाजल 
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बेटा 
दूसरे देश में नौकरी करता है
बुज़ुर्गवार कहीं गये ही नहीं 
यहीं पैदा हुए इसी मिट्टी में 
जवान हुए यहीं काम किया 
माँ-बाप की सेवा की 
बूढ़े हुए बीमारियाँ हुईं 
खाँसते-थूकते-जागते
बीतती है अब
सारी-सारी रात
बाबूजी की बनवायी बेंच पर 
तो कभी 
जिस आम के पेड़ को लगाया था 
उसके नीचे बैठकर 
रास्ता देखते-देखते दिन कटता है 
बेटा कभी आता है तो 
मरने के टाइम पर बिस्तर पर 
गू-मूत साफ़ करने के सपने 
दिखा जाता है 
बुज़ुर्गवार कभी नहीं पूछते
चारोधाम कब कराओगे 
बुज़ुर्गवार को अक्सर अपने 
बचपन की याद आती है 
किशोर जीवन की याद आती है 
पिता की याद आती है 
याद आता है अपने 
पिता का हाथ-पैर दबाना 
उनकी पीठ खुजलाना
नल के नीचे बैठाकर नहलाना 
बुज़ुर्गवार तो अपने 
बेटे की बड़ाई करते नहीं थकते 
बाहर रहता है दिरहम कमाता है 
उसकी कोई बुराई तो किसी से 
करते ही नहीं 
अलबत्ता 
जब कोई आसपास नहीं होता 
आसमान में देखकर कहते हैं 
मरते समय गू-मूत नहीं उठाओगे 
तो भी मर जाऊँगा बेटा 
कोई नहीं रोक पाएगा मरने से 
मरते समय क्या गू-मूत 
क्या गंगाजल 
जीते जी 
थोड़ा सा सुख मिल जाता तो
शायद थोड़ा और जी जाते।












रविवार, 7 दिसंबर 2025

कुछ नयी कविताएँ

-  गणेश पाण्डेय

होना
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मेरे कहने से 
कुछ नहीं होगा 
लेकिन इस कहने में ही
मेरा होना शामिल है

कल कोई कब्र में 
मुझे हिला-डुलाकर 
पूछ सकता है-
अपने ज़माने में तुमने तो
कुछ कहा ही नहीं

मरने के बाद शर्म से 
दोबारा मर नहीं जाऊँगा 
मर जाऊँगा मर जाऊँगा 
सब कह जाऊँगा 
कह जाऊँगा।


भरोसा 
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कहूँगा नहीं तो जी कैसे पाऊँगा 
कोई नहीं सुनेगा तो पेड़ से कहूँगा 
नदी के पास जाऊँगा

कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाऊँगा 
राजा के जनता दरबार में जाऊँगा 
थानेदार के पैर पकड़ लूँगा 
फिर भी कोई नहीं सुनेगा तो 
पानी की टंकी पर चढ़ जाऊँगा 
पर्वत से कूद जाऊँगा 
आग लगा लूँगा

फिर भी कोई नहीं सुनेगा तो 
मंदिर जाऊँगा भगवान के सामने 
दुख का भरा कटोरा रख दूँगा 
आँसुओं का समुद्र उड़ेल दूँगा 
चरणों में लेट जाऊँगा

कोई तो सुनेगा 
यह भरोसा भी साथ नहीं होगा 
तो मर नहीं जाऊँगा।


पिछड़ना मंजूर था 
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पिछड़ना मंज़ूर था
पीछे चलना नहीं

उम्र हुई अकेले 
चलते-चलते 

थक गया हूँ 
छिप जाना चाहता हूँ।


ढंग का काम 
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अपने समय का
मशहूर नहीं हुआ तो क्या हुआ 
बहुत ज़्यादा बदनाम तो हुआ
चलो गुमनाम तो नहीं हुआ 
मेरे नाम का ख़ौफ़ तो हुआ 
कई प्रकाशक छापने से डरे
उनके संपादक तो और डरे 
आलोचक और लेखक डरे
सारे के सारे धंधेबाज़ डरे
मेरे नाम से बेईमानों की नींद 
हराम तो हुई कुछ तो हुआ
ढंग का कोई काम तो हुआ
क्या हुआ जो मेरा 
नाम नहीं हुआ।

मोतियाबिंद 
--------------

जो चीज़ें कभी
बहुत सुंदर दिखती हैं 
जिनके दिख भर जाने से 
उन पर बहुत-बहुत प्यार आता है 
एक दिन ऐसी सारी सुंदर चीज़ें
सुंदर दिखते-दिखते 
कम सुंदर दिखने लगती हैं 
एक समय तो बिल्कुल धुँधली 
दिखने लगती हैं 
कविता नहीं है 
अनुभव की बात है 

बायीं आँख से 
आजीवनप्रिया का सुंदर मुख 
बहुत मलिन दिखने लगता है 
विशालाक्षीप्रिया की आँखों का
आभास होता है अपनी जगह पर है
लेकिन वह पुतली नहीं दिखती है 
जिसमें मेरा प्रफुल्लित मुख दिखता था
चश्मे का नंबर भी साथ छोड़ देता है 
और सभी चीज़ें बायीं आँख से
बहुत धुँधली दिखने लगती हैं 
दायीं से बहुत धुँधली 
शायद इसे ही 
आँखों का बुढ़ापा कहते हैं 
लेकिन यह बुढ़ापा तो ऐसा है 
जो किसी को बूढ़ा होने पर आता है 
तो किसी की आँखें छत्तीस साल की 
भरी जवानी में बूढ़ी हो जाती हैं 
ओह इनकी मृगनयनीप्रियाओं पर 
क्या बीतती होती
कितना हलकान होती होंगी 

मोतियाबिंद से डरो मत
आँखों के मोती की चमक 
फीकी हो जाती है तो चिकित्सक 
उसे बदल देते हैं फिर से 
जवान बना देते हैं 
प्रिया फिर से 
जवान दिखने लगती है 
हर मुलाक़ात 
पहली मुलाक़ात लगने लगती है 
धरती नयी हो जाती है झरना नया 
जी करता है हर चीज़ चूम लो
जिन्हें पहले हज़ार बार चूमा हो
उन्हें फिर से लाख बार चूम लो 
प्रिया को देखने चूमने और छूने की 
कोई सीमा नहीं हो सकती है 
दिल ही तो है कभी बूढ़ा नहीं होता 
पुराने से पुराने दिल में हज़ारों 
नयी हसरतें पैदा होती रहती हैं 
प्रिय के लिए मचलता रहता है 
जो प्रिय के प्रिय हैं उनके लिए 
तो ख़ूब मचलता है

बस दो मिनट 
डॉक्टर की टेबल पर
चुपचाप लेट जाओ और दूसरे दिन 
अपनी ही आँख पर सहसा 
यक़ीन नहीं कर पाओगे 
कि आँखें झूठ बोल रही हैं 
कि दुनिया सचमुच इतनी सुंदर है 
सुंदरतम है 
यह डाक्टर के 
हाथों का कमाल है जादू है
विज्ञान का वरदान है

संसार के बड़े से बड़े 
प्रेमियों को मोतियाबिंद होता है 
न प्रेम रुकता है न मोतियाबिंद 
न जीवन न तुम रुकोगे 
अस्पताल से 
जैसे ही घर आओगे छोटी नातिन 
आँख पर पट्टी देखते ही 
हक्का-बक्का हो जाएगी
हाथ उठाकर पूछेगी ये क्या नानू
कैसा सफ़ेद स्टीकर लगाकर आये हो

(उसके इस तरह कहने पर तुम 
हँसना तो चाहोगे फिर भी 
एहतियातन नहीं हँसोगे 
बाक़ी लोग हँस पड़ेंगे 
तुम सिर्फ़ हल्का सा मुस्कुराओगे 
लेकिन तुम्हारा दिल ख़ूब मुस्कुराएगा 
नातिन पर ख़ूब प्यार आएगा)

अगले कुछ दिनों में देखोगे 
नातिन को तुम्हारे काले चश्मे से 
प्यार हो गया है
उसे छूना चाहेगी चूमना चाहेगी 
निकालेगी फिर लगाएगी 
और कहेगी- गुड जॉब।  






शुक्रवार, 12 मई 2023

तीस कविताएँ

- गणेश पाण्डेय

सपने में पीएम
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सपने में देखा लोकतंत्र जनता के कंधों पर नहीं
माफ़ियाओं के बाहुबल पर टिका हुआ है मैं इस
डर से किसी बलात्कारी के खि़लाफ़ कड़ी कार्रवाई 
नहीं कर पा रहा हूँ कि चार सीटें कम पड़ जाएंगी
और मैं पचासवीं बार पीएम नहीं बन पाऊँगा
लानत है मुझ गणेश पाण्डेय पर मैं अपने ही मुँह पर 
पचास बार थूकता हूँ तुम हिन्दी में ही रहते गधे
सौ पुरस्कार लेते कोई तुम पर कभी नहीं थूकता
क्या ज़रूरत थी तुम्हें देश का प्रधानमंत्री बनने की
हिन्दी साहित्य सम्मेलन का नहीं बन पा रहे थे!


नींद खुल गयी
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सपने में मैंने ख़ुद को 
एक हिन्दू माफ़िया के रूप में पाया
कई हिन्दू लड़कियों के साथ बहुत बुरा किया 
हिन्दुओं का क़त्ल और अपहरण कराया
पचास हज़ार करोड़ से अधिक की सम्पत्ति बनायी
कुछ दान दिए कुछ ग़रीबों की शादी करायी
मदद करने से सुल्ताना डाकू जैसी ख्याति पायी
लेकिन किसी ने भी मुझे डाकू वग़ैरा नहीं कहा
माननीय सांसद जी माननीय विधायक जी कहा 
सहसा ज़िन्दाबाद के नारों के बीच नींद खुल गयी।


सपने में पुलिस 
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ये लो सपने में पुलिस भी आ गयी वही वाली 
कोरोना के दिनों की देवदूत जैसी छवि वाली
बड़े-बड़े माफ़ियों को यूँ मिट्टी में मिलाने वाली
ये क्या वर्दी तो वही थी चेहरा काला क्यों था
लेकिन उसके पंजे में माफ़िया की गर्दन नहीं  
जंतर-मंतर पर धरनारत बेटियों के बाल थे
भारतमाता जैसी सुंदर इन बेटियों की आँख में
ओलंपिक पदक की चमक नहीं आँसू ही आँसू थे
पुलिस इनके आँसू नहीं पोछ रही थी किसी ने
उसकी ममता का अपहरण कर लिया था।


मुर्गे पर कविता
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सपने में पुलिस मुझे खींचकर थाने ले गयी
सिपाही ने फिर नायब ने फिर थानेदार ने पूछा
तूने गृहमंत्रालय की अनुमति के बिना कविता 
कैसे लिखी किसके कहने पर लिखी आखि़र
कौन-सी पार्टी का बंदा है सरकार के खि़लाफ़
कविता लिखना तेरा धंधा है तू कबी ही तो है
कि सुप्रीम कोर्ट से बड्डी कोई चीज़ है बता नहीं 
तो अभी तुझे मुर्गा बनाता हूँ कुकड़ू-कू कराता हूँ
मुर्गे पर कविता लिखवाता हूँ।


असली सरकार 
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सपने में एक सरकार क्रीम-पावडर लगाकर 
बनी-ठनी घूमती दिखी तो आखि़र पूछ ही बैठा
इतने साल से सरकारे हैं रोज़गार दिला पायीं 
सबके जान-माल की हिफाज़त क्या कर पायीं
बच्चियों और महिलाओं की इज़्ज़त बचा पायीं
इस देश को सोने की चिड़िया बनाना तो छोड़ो
न्याय की नन्ही चिड़िया की जान क्या बचा पायीं
ये कौन लोग हैं जो सरकार का चीरहरण करते हैं
सरकारें चुपाई मारकर बैठी रहती हैं यही लोग 
असली सरकार हैं?


सपने में न्याय 
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सपने में न्यायाधीश मिले 
श्रीमन् कहा जाता है कि आप सर्वोच्च हैं
आपका कहा पत्थर की लकीर है अकाट्य है
अमिट है अजर है अमर है देववाणी है
आपका कार्यालय न्याय का मंदिर है जहाँ
निर्बल और डाकू सब सिर झुकाते हैं
फिर आपके होने के बावजूद देश में अपराध 
और अत्याचार कम क्यों नहीं हो रहा हैं
चमत्कार यह नहीं कि यह सब हो रहा है बल्कि 
यह कि आप में हमारा भरोसा आज भी है।


सपने में अरे भाई मिले
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सपने में मुझे प्रलेसी जलेसी जसमी मिले
कोई मुझे मेला घुमाने नहीं ले जा रहा था
कोई मेरी कमर में हाथ तक नहीं डाल रहा था
कोई मेरी नथ तक नहीं उतार रहा था सब मुझे
अंग्रेजी में हिन्दी बोलने वाली गोरी मेम नहीं
हिन्दी कविता की कुरूप फूहड़ मुँहफट बदबूदार 
कुमारी गणेश पाण्डेय समझ रहे थे अरे भाई 
सच ही तो बोल रहा था कविता में 
झूठ बोलने के लिए तो पूरी दुनिया पड़ी थी।


सपने में शेषन मिले
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सपने में टी एन शेषन मिले
मुझे बहुत परेशान हाल और ठगा-सा जान पूछा
क्या हुआ कवि जी चेहरा क्यों उतरा हुआ है
मैंने कहा भाई आज मतदान केंद्र से लौटा हूँ
पिछले कई सालों की तरह आज भी मैं न किसी
प्रत्याशी का नाम पढ़ पा रहा था न चुनाव-चिह्न 
पहचान पा रहा था सब गड्डमड्ड हो जा रहा था
क्या समझूँ मेरी नज़र कमज़ोर हो गयी है 
या भारत का लोकतंत्र धुँधला हो गया है।


सपने में इनामचंद 
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सपने में कविवर पंडित इनामचंद मेरे घर आये
बोले पंडित ईमानचंद सुना है आजकल बीमार हो
सपने में भी देश और कविता की चिंता करते हो
मुझे इतने इनाम मिलने के बाद अब न देश की
न साहित्य की चिंता है अगर कोई चिंता है भी
तो यह कि अमर होने के बाद मैं स्वर्ग में रहूँगा
और भक्तिकाल के अपुरस्कृत कवि बेचारे नर्क में
मैं स्वस्थ हो चुका था डपटा अबे इनामचंदिए 
साहित्य और अकादमी की तो मार ही चुका है 
देश की भी मारेगा क्या।


सपने में हिन्दू
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सपने में एक हिन्दू मिला बोला ओय गणेशिये
एक हिन्दू होकर हिन्दू की बुराई करना छोड़ दे
मैंने कहा तू हिन्दू स्त्री से बलात्कार करना छोड़ दे
हिन्दू से दहेज लेना छोड़ दे ज़मीन हड़पना छोड़ दे
हिन्दू होकर हिन्दू की जान लेना तो छोड़ दे
मैंने कहा देख मैं हिन्दू और मुसलमान दोनों की
बुराई करता हूँ किसी एक की नहीं तू केवल 
मुसलमान की बुराई करना छोड़ दे करना है
तो सभी माफ़ियाओं की बुराई कर।


सपने में भगवान
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मैंने पूछा कि आपके रामराज्य में यही होता है
कि लड़कियाँ पटरी पर धरना देती हैं तो उन्हें
पुलिस मारती-पीटती है गाली देती है धमकाती है
उनसे उम्मीद की जाती है कि आपके दल के
बाहुबलियों से लड़कियाँ दबकर रहें अपनी इज़्ज़त 
लुटने दें और उफ़ तक न करें क्योंकि बाहुबली
आपकी सरकार उलट-पलट देगा फिर आप
काहे के भगवान इससे तो अच्छा था कि आप
किसी देश के पीएम बन जाते। 


सपने में भविष्य 
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सपने में सो रहा था थोड़ी देर के लिए जाग गया
किसी बेटी ने पूछा तुम सचमुच के पीएम होते 
तुम्हारे परिवार की बेटी के साथ बुरा हुआ होता
तो बुरा करने वाले बड़े से बड़े महाबली के साथ
क्या करते तब भी गुणा-भाग करते मुँह सिल लेते 
आँख मूँद लेते ध्यानमग्न होकर योग करने लगते
विश्व रंगमंच पर अपना श्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहे होते 
और मैं फिर सपने में चला गया जहाँ मेरे पास कोई 
प्रश्न नहीं था अपने उज्ज्वल राजनीतिक भविष्य का 
एक मानचित्र था उसे देख रहा था।


बेटियों के आँसू
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सपने में कोई लड़का अपनी बहनों के लिए
माइक के सामने रो रहा है-राजनीति के पहलवानो 
जंतर-मंतर पर धरने पर बैठी बेटियों की इज़्ज़त
सत्तामद के क्रूर बुलडोज़र से मत रौंदो बुरा होगा
उनमें तुम्हारी भी बेटियाँ हो सकती थीं बशर्तें वे
पहरे में नहीं रहतीं पहलवान होतीं लड़ रही होतीं
लड़कियों की इज़्ज़त का सौदा मत करो मत करो
उनसे राजनीति का यह गंदा खेल मत खेलो
देश की बेटियों के आँसू तुम्हारे खेल को
आज नहीं तो कल हार में बदल देंगे।


देश को जिताने वाली लड़कियाँ
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सपने में एक क्रूर सत्ता थी
जिसने देश को जिताने वाली लड़कियों को हराने 
और राजनीति के दाग़ी खिलाड़ी को जिताने का
बीड़ा उठाया था कोई उसे हरा नहीं सकता था
न पुलिस न न्यायालय न कोई और अलबत्ता
लड़कियाँ हार कर भी हार नहीं मान रही थीं
क्रूर सत्ता बौराई हुई थी उनका खाना-पीना-सोना
साँसे तक हराम कर देना चाहती थी फिर भी
सत्ता जितनी क्रूर थी लड़कियाँ उससे कहीं
ज़्यादा मज़बूत थीं क्योंकि देश उनके साथ था।


सपने में सरस्वती
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सपने में माँ सरस्वती आयीं
पहले कान उमेठीं फिर ख़ूब कसके डाँटीं
रे मूर्ख तू कविता लिखता है तो कविता में
देश-दुनिया की हर बेटी तेरी बेटी होती है
दो दिन के लिए पीएम क्या हुआ दूसरों की
बेटियों को अपनी बेटियाँ नहीं समझता है 
देश भर के गुंडे-बदमाशों को सगा समझता है
तुझे शाप देती हूँ सात जन्मों तक पीएम रहेगा
लेकिन परिवार का सुख नहीं पाएगा।

सपने में भी नहीं
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सपने में मैं सिर्फ़ सपना ही नहीं देखता
सोचता भी हूँ आँख देखने का काम करती है
और दिमाग़ अपना काम करता है जैसे
सपने में पीएम बना हुआ दिख रहा हूँ चाहे हूँ नहीं
लेकिन दिमाग़ चाह रहा है कि इस बेवक़ूफ़ी से
बाहर निकलूँ कविता की अपनी दुनिया में 
एक सच्चे कवि के लिए राजनीति परदेस है
जिसकी क्रूरता के बारे में कड़ी टिप्पणी कर सकता हूँ
लेकिन जब साहित्य का सोना-चाँदी नहीं ले सकता
तो उस क्रूर जीवन को कैसे जी सकता हूँ।


सपने में ओलंपिक मेडल 
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सपने में बेटियाँ रोये जा रही थीं ताऊ तूने
हमें इस खेल में क्यों डाला जहाँ भेड़िए रहते हैं
आईपीएस बनाते तो एनकाउंटर कर सकती थीं
ओलंपिक मेडल का क्या करें एक दिन चमका 
पीएम-सीएम ने एक दिन पूछा फिर नहीं पूछा
सोना-चाँदी लाने वाली बेटियाँ सड़क पर क्यों हैं
बुझ गये मेडल को हाथ में लेकर रोये जा रही थीं
पीएम से कह दे ताऊ ऐसे मेडल से क्या फ़ायदा
कोई बाहुबली किसी भी मेडल को क़ानून को
बेटियों की इज़्ज़त को कुचल सकता है।


सपने में बाबा
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सपने में जंतर-मंतर पर
चश्मावाले एक बाबा आये लाठी लिए
बोले लड़कियो डटी रहो क्रूर सत्ता से लड़ना ही
तुम्हारी सबसे बड़ी जीत है अहिंसा की जीत है
तुम्हारे साहस की जीत है सबकी नैतिक जीत है
देश की जीत है आधी आबादी की पूरी जीत है
किसी क्रूर सत्ता के सामने खड़ा होने की हिम्मत 
न करना उससे न लड़ना सबसे बड़ी हार है।


सपने में हरी पत्तियाँ
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सपने में एक नीम के पेड़ के नीचे सुस्ता रहा था
छाया की सीमा से सटे बाहर एक वनस्पति दिखी
उसमें नन्ही कोमल और हरी चार पत्तियाँ दिखीं
उनके ऊपर प्रचंड सूर्य का अति भीषण ताप था
मैंने कहा बेटियो बूढ़ा हूँ फिर भी थोड़ी देर तुम्हें
अपनी दोनों हथेलियाँ बढ़ाकर पूरा ढाँप सकता हूँ
पत्तियों ने शीश नवाकर आभार जताते हुए कहा
ठीक है ताऊ हम कुम्हलाएंगी नहीं आशीष का छाता
हमें कभी हमारे संघर्ष से डिगने नहीं देगा सामने
उत्पाती सूर्य हो बलात्कारी हो चाहे क्रूर सत्ता हो।


सपने में कविता
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सपने में जंतर-मंतर पर जब अप्रैल-मई में देश की
पहलवान बेटियाँ चालीस डिग्री में धरना दे रहीं थीं
हिंदी के कुछ कवि फ़रवरी पर कविता लिख रहे थे
संपादक अपने समय की गर्म हवाओं की कविता नहीं 
उतान हो-होकर फ़रवरी की कविता छापे जा रहे थे
हिन्दी के आलोचकों की मति इतनी मारी गयी थी
कि वे ख़ुद को आचार्य शुक्ल तो समझ ही रहे थे
अप्रैल-मई को फ़रवरी और आज की हिन्दी कविता को 
अंग्रेज़ी का उपनिवेश समझ रहे थे
पाठक तो ख़ैर कुछ समझ ही नहीं रहे थे।


सपने में हे राम 
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सपने में जब हे राम आये तो मैंने उनसे कहा 
धरती पर कभी आपके नाम पर लोकतंत्र को 
नया किया गया तो कभी संसद की इमारत 
बदलकर तो कभी धरनारत बेटियों को
घसीट-घसीटकर बसों में ठूँस ठूँसकर 
उनके तम्बू-कनात उखाड़कर 
इस तरह एक अच्छे-ख़ासे लोकतंत्र को 
नया करने के नाम पर दुनिया में बार-बार 
ज़लील किया गया।


कृपालु सरकार 
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सपने भगवान आये तो उन्होंने कहा
तुम्हारे देश में एक नयी इमारत बनायी गयी है
जिसे लोकतंत्र का ताजमहल कह सकते हो
फ़र्क़ इतना है कि इस ताजमहल को
देश से दगा करने वालों माफ़ियाओं और
स्त्रियों के साथ यौन-दुर्व्यवहार करने वालों के
लिए ख़ासतौर से बनाया गया है निश्चय ही 
बहुत कृपालु और न्यायप्रिय सरकार होगी।


सपने में शाहजहाँ
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सपने में ये लो मैं शाहजहाँ बन गया था
अपनी बेग़म सियासत जान के लिए मुल्क में
दिनरात जहाज से दौड़ता ही रहता था 
मुल्क की बेहतरी के लिए क्या काम करता था
दो रुपये का पेट्रोल दो हज़ार में बेचता था
अपने दरबार में छँटे हुए बदकार माफियाओं को
ख़ासतौर से रखता था जिससे लगे कि किसी
नयी सदी के बादशाह सलामत का दरबार है।


विचित्र देश 
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सपने में एक दिन विचित्र देश में चला गया
वहाँ कोई देवेन्द्र कुमार नाम के सच्चे कवि थे
बेचारे किसी को प्रोफ़ेसर नहीं बना सकते थे 
सो उनका आलोचक प्रोफ़ेसर बनाने वाले
फिसड्डी कवि पर पोथे पर पोथा लिखने लगा
बहुत ख़राब जगह थी नाम-इनाम की जल्दी में
सारे लेखक नंग-धड़ंग मंच पर चढ़ जाते थे
बेटियों के साथ दुर्व्यवहार होता था कविगण 
ग़ुस्सा नहीं होते थे जुलूस नहीं निकालते थे
कवयित्रियाँ बड़े मन से स्वेटर बुनतीं रहतीं थीं।


काग़ज़ की तलवार 
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सपने में कबीर आये कोंचकर कहा ओये
तू सपने में भी कैसे जागता रहता है और 
बाक़ी कवि जागते हुए सो कैसे रहे हैं मैंने कहा
जी इसमें नयी बात नहीं वे अक्सर यही करते हैं
नयी बात यह कि वे राष्ट्रवाद के पत्थर को
पुरस्कारवाद की काग़ज़ की तलवार से
काटना चाह रहे हैं कबीर ने माथा पकड़ लिया
बोले अहमक़ो क्या ग़ज़ब करते हो काश 
तुम सब सही रास्ते से पैदा हुए होते।


सपने में नया ताजमहल 
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आगे सपने में देखा कि बेग़म सियासत जान 
मरणासन्न थीं और मैं उनके लिए नये ज़माने का
ताजमहल बनवाना चाहता था बनवाया भी ख़ूब 
और हैरानी की बात यह कि मैंने कारीगरों के
हाथ नहीं कटवाये यह मेरी आखिरी भूल थी
नया ताजमहल पहले से शानदार था फ़र्क़ यह 
कि वहाँ सब जा सकते थे यहाँ सिर्फ़ बदकार
साहिर लुधियानवी जैसे तमाम लोग हरग़िज 
न जा सकते थे और न यह कह सकते थे कि 
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़।


चमड़ा
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सपने में बहुत उदास था
राजनीति और साहित्य के भविष्य को लेकर 
बहुत निराश था सुबक-सुबककर रो रहा था
देश में बेटियों के साथ कुछ भी हो जा रहा था
नये-नये बाबा हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए 
जन्म लेते ही जा रहे थे और हिन्दी के लेखक 
ससुरे पुरस्कार का चमड़ा खा रहे थे।


पुरस्कारवालियाँ
---------------------
सपने में मैं हिन्दी की पुरस्कारवालियों को 
जगह-जगह कोनें-अतरे में इस-उस अख़बार में
ढूँढ रहा था कि पहलवान बेटियों के पक्ष में
उनका कोई बयान दिखे पुरस्कार लौटाती दिखें
ऐसा कुछ नहीं दिखा वे निश्चय ही किसी जगह 
बैठकर अतिगंभीर स्त्री-विमर्श में तल्लीन होंगी
देश में क्या हो रहा है उन्हें पता ही नहीं होगा।


ख़ूब लड़ीं मर्दानी
---------------------
सपने में देखा कि वे लड़कियाँ
जो लड़ाई में सबसे आगे थीं लोहे की देवी थीं
भले वह प्रधानमंत्री-गृहमंत्री की बेटी नहीं थीं
लेकिन देश की बेटी वही थीं वही थीं वही थीं
देश बेचारा एक कोने में खड़ा सुबक रहा था
लोकतंत्र और क़ानून को कुछ हत्यारों ने मुर्गा 
बनाया हुआ था आधा जिबह भी हो चुका था
जितना बड़ा राजनेता उतना ही मुँह काला था
लड़कियाँ डरी नहीं अंत तक ख़ूब लड़ीं मर्दानी
दुष्कर्मी की छाती को चीर डालना चाहती थीं।


तानाशाही
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सपने में लोहिया आये थे ख़फ़ा हो रहे थे
बोले ओह लोकतंत्र का क्या से क्या हो गया है
मैंने कहा जी-जी जापानी बुख़ार पहले हुआ था
अब रोना इस बात का है कि कोरोना हो गया है
सरकार कहती है कि हमारा सांसद आग मूतेगा
जनता की बेटी की छाती छुएगा पेट छुएगा और 
बेटियाँ धरना-प्रदर्शन कुछ नहीं कर सकती हैं 
सरकार कहती है अंधे क़ानून पर भरोसा करो
सत्तानुकूलित पुलिस पर भरोसा करो मुझे
रोता देख वे भी तानाशाही है कहकर रोने लगे।