गुरुवार, 11 अगस्त 2022

रातनामा

- गणेश पाण्डेय

एक शख़्स 
अपनी रात की तस्वीरों का 
बंडल काँख में दबाये
घूमता रहता है सारी-सारी रात
रात के घने और काले से भी काले
अँधेरे में

कौन है 
यह शख़्स
जो भटक रहा है 
ख़ामोश परिंदे की तरह
बिजली के नंगे तारों पर
लुढ़क रहा है सड़कों पर
खाली बोतलों की तरह बेआवाज़
कौन है यह शख़्स जो गिर रहा है 
सड़कों के किनारे नालों में
आसमान से गिरते हुए अँधेरे की तरह
छपाक-छपाक 

अँधेरे में यह कौन खड़ा है
किसी तन्हा और बेबस सच की तरह 
अधपके बालों और मूँछो वाला शख़्स
या अंधेरे में भटकने वाला
कोई संन्यासी है जो निकल पड़ा है
जीवन और जगत के सत्य की खोज में

इससे बात करना मुश्किल है
इसकी रात की डायरी में जितने शब्द हैं
उतने ही चित्र हैं दर्द की कूची से बने
अँधेरे और उजाले की कोख से पैदा
शायद इसने मोबाइल से खींचा है
शायद किसी कैमरे से खींचा है
शायद रात के 
शहर के और निज़ाम के
गुंडों से बचने के लिए
ओवरकोट की बटन में लगे
या कहीं और छिपाकर रखे गये
जासूसी कैमरे से खींचा है

कहीं ऐसा तो नहीं
कि यह मेरा भ्रम हो यह आदमी
एक आम आदमी नहीं
बल्कि तीनों लोक की ख़बर रखने वाला
कोई सरकारी जासूस हो
इसका हैट कितना तिरछा है
दायीं तरफ़ पूरा झुका हुआ
आख़रि अँधेरे में भी काले चश्मे का
राज़ क्या है कुछ तो है
ग़लतफ़हमी तो नहीं

कहीं ऐसा तो नहीं
कि यह शख़्स एक ही वक़्त में
कई आदमी हो
क्या पता यह आदमी सिर्फ़ एक
आम आदमी हो
और अपने शहर में अपनी जगह
अपने लिए एक पनाह एक ठिकाना
ढूँढ रहा हो अपनी पीठ सीधी करने के लिए

कैसा बावला है
अँधेरी रात की इस काली बारिश में
खड़े-खड़े भीगने से बचने के लिए
पीपल के दरख़्त के नीचे 
शिवाले के दरवाज़े पर भूखे पेट
पेट से पैर सटाकर सो रहे कुत्ते साँड़
और भिखारियों के बीच अपने लिए
खड़े होने की जगह बना सकता है
रिक्शे का छाता उठाकर उसके नीचे
छिप सकता है अलबत्ता छिपकर
अँधेरे से भाग नहीं सकता है

शायद यह शख़्स
दिन का लाडला नहीं रात का वारिस है
यह कई पुश्तों से इसे ऐसे ही मिली है
न यह इस रात से भाग सकता है
न यह रात इसे अपनी बाहों से
आज़ाद कर सकती है
यह रात दर्द की हद से ज़्यादा लंबी है
और रात का आसमान 
जितना लंबा है उससे ज़्यादा काला
वृक्ष और वनस्पतियाँ सब काली हैं
हैंडपम्प काला है उसका जल काला है
हवाएँ काली हैं फुसफुसाहटें काली हैं

जो शख़्स अभी-अभी इधर से गुज़रा है 
चुपचाप रात का हालचाल लेते हुए
सिर से पैर तक काला है इतना काला है
कि मेरे लिए इसे पहचानना मुश्किल है
ऐसा तो नहीं कि मुझे सिर्फ़ रात नहीं 
रात की हर चीज़ हर बात
काली नज़र आ रही है
गलियों की सड़कें किनारे की बेंच
सीढ़ियाँ कारें सब काली नज़र आ रही हैं
कार के अन्दर स्टेयरिंग पकड़कर बैठा
शख़्स नहीं ख़ुद अँधेरा नज़र आ रहा है
पीछे थककर चूर लेटी हुई स्त्री
काले बालों में लिपटी हुई कोई चीज़
नज़र आ रही है

मुझे क्यों लग रहा है कि अभी
अँधेरा इंजन स्टार्ट करेगा
और अँधेरी गलियों को गोली की तरह
चीरता हुआ मेन रोड पर आ जाएगा
नीम रोशनी की बारिश में
फुटपाथ पर सोये हुए
देश के नागरिकों को कुचलता हुआ
दूसरे मोहल्ले में दूसरे शहर में
निकल जाएगा निकल चुका होगा
जब नागरिक 
किसी लोकतंत्र के फुटपाथ पर
ऐसे ही गहरी नींद में होते हैं
तो अँधेरे की कोई गाड़ी उन्हें
कुचलकर निकल जाती है
और कुछ दूर खड़ी पुलिस की तरह
किसी को पता भी नहीं चलता
प्रधानमंत्री को नींद में
अपनी कुर्सी और देश का तो कुछ
पता नहीं होता है
नागरिकों और लोकतंत्र के अँधेरे का
क्या पता होगा

अभी-अभी
फ्लाईओवर से जो गाड़ी गुज़री है
सुनसान रास्ते पर सन्नाटे 
और स्ट्रीट लाइट के बीच
उसमें एक नवधनाढ्य जोड़ा है
पीछे की सीट पर बेसुध
उसे पता ही नहीं
कि देश सो रहा है या जाग रहा है
लोग जी रहे हैं या मर रहे हैं

पीछे जो गाड़ी आ रही है
उसमें एक लेखक और लेखिका हैं
किसी उत्सव से लौट रहे हैं
खिलखिलाते हुए 
अपनी अश्लील हँसी
और क्षुद्र एषणाओं के साथ
अभी वह गाड़ी
फुटपाथ पर सोये हुए इस देश के 
भविष्य को कुचलते हुए 
आगे निकल जाएगी

रात के दो बज रहे हैं
सब सो रहे हैं पूरा देश सो रहा है
रात जाग रही है 
और अपना काम कर रही है
यह शख़्स जो ओवरकोट पहनकर
पागलों की तरह फ़ोटो खींच रहा है
वह भी अपना काम कर रहा है
बता रहा है रात में सोना ही नहीं
जागना भी एक काम है
आँख मूँदना ही नहीं देखना भी काम है
रात की डायरी के लिए 
फ़ोटो खींचना भी एक काम है
हर कोनें-अँतरे में 
अँधेरे और उजाले के बीच
छोटी से छोटी लड़ाई को देखना भी
रात डायरी में दर्ज़ करना भी एक काम है

अँधेरे से
लड़ते हुए एक गमले में 
रात की तनहाई में खिले ताज़ा फूल को
मन की गहराईयों से चूमना 
और प्यार करना भी
एक ज़रूरी काम है

लेकिन
काली रात की झाड़ियों के ऊपर 
जैसे थकी-माँदी श्रमशील बलिष्ठ
स्त्री की आँख लगी ही हो
और कोई पीली रोशनी
उसे ग़लत तरीक़े से छू रही हो
यह एक निहायत बेजा काम है

यह कैसी हिंसक रात है
गोली भी चलती है तो आवाज़ नहीं होती
किसी को भी कहीं से पकड़कर
मारा जा सकता है 
किसी की भी आबरू कहीं भी
लूटी जा सकती है
यह कैसा नशे में धुत निज़ाम है
लोगों को ख़ुशहाली और ज़िन्दगी नहीं
प्रतिबंधित ड्रग्स बाँट रहा है
धर्म बाँट रहा है जाति बाँट रहा है
हिंसा बाँट रहा है
जो पीने से इंकार करता है 
उसे गिरफ़्तार करता है
जिसे गिरफ़्तार करता है
उसे फिर ग़िरफ़्तार करता है
यह कोई देश है कि अनियंत्रिक ट्रक
जिसके नीचे आने के लिए
स्त्रियाँ बच्चे सब अभिशप्त हैं

यह एक पागल रात है
इस रात का ज़िक्र इस देश के दस्तूर में
कहीं नहीं है हो भी तो मैं नहीं मानता
कोई कुछ बोलता नहीं है 
उम्मीद की मज़बूत हड्डियों को
तड़तड़ तोड़ती हुई नाउम्मीद रात है
यह रात अपने आगोश में आने वाले
श्रमिकों को नया जीवन देने वाली 
रात नहीं है यह रात तो रात ही नहीं है
व्यवस्था की अविद्या माया है छल है 
मुर्दों में जान फूँकने वाली रात नहीं है
ज़िन्दा लोगों को मुर्दा बनाने वाली रात है

यह रात नहीं निज़ाम का खिलौना है
राजा का ओढ़ना-बिछौना है
तख़्त है ताज है
और उस शख़्स के काँख में दबी हुई
रात की डायरी में 
उसके श्वेत-श्याम अनुभव हैं
घटनाओं-दुर्घटनाओं का ब्योरा है
छिप-छिपकर फ़ोटो खींचने वाले
उस आम आदमी के लिए रात क्या है
देश क्या है दस्तूर क्या है विचार क्या है
उसके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी है।


  (एक साहित्यिक के कुछेक श्वेत-श्याम चित्रों को देखकर।)