सोमवार, 16 दिसंबर 2019

कविता का एक हिस्सा खाली है


- गणेश पाण्डेय

कवि के लिए
तानाशाह का चेहरा
और उसकी तमाम क्रूरताएं दिखाना
बहुत से बहुत उससे भी बहुत जरूरी है

कवि के लिए
दुनिया का हर स्याह सफेद दिखाना
उसके कविकर्म का जरूरी हिस्सा है
उसे सबको दिखाना है सबका चेहरा
टेढ़े मुंह पर पुती कालिख
और दूसरी कमियां

कवि के लिए
जो-जो अपनी कविता में करना है
सब सही है सब सुंदर है सब जरूरी है
बस कविता के किसी कोने में उसे
अपना चेहरा दिखाना क्यों नहीं जरूरी है

कवि के लिए
हमारे समय के कवि के लिए
अपने चेहरे के दाग धब्बे गड्ढे छिपाने की
आखिर यह कैसी मजबूरी है कैसी
उसकी कविता में एक हिस्सा खाली है।



रविवार, 15 दिसंबर 2019

वृक्षों के नीचे फैली वनस्पतियों में

- गणेश पाण्डेय

सब गुम हो जाते हैं
जब तक दृश्य पर रहते हैं
खूब उछल-कूद नाच-गाना
और हंसी-ठट्ठा करते हैं
भूल जाते हैं कि यह
एक दिन का मेला है

बाद में पता चलता है
कि अरे-अरे यहां कोई था
अभी-अभी कहां चला गया
किस कबाड़ में किस धुंध में
निष्प्रयोज्य लिखे हुए किस पात्र में
कौन था कोई जान नहीं पाता है

शायद जो लोग
अपने काम में नहीं दिखते हैं
गुम होने के बाद कभी नहीं दिखते हैं
उनके घुंघरू उनकी पिस्तौलें
उनकी गलेबाजी किसी खड्ड में
गायब हो जाती है

दो-चार दिन चेले-चपाटी
और पाले हुए लौंडे-लफाड़ी
याद करतें हैं फिर खुद
दृश्य का हिस्सा बन जाते हैं

मुझे दृश्य से नहीं नेपथ्य से प्रेम है
मैं चाहता हूं मुझे कोई देखे नहीं
मैं अपने वक्त में ऐसे गुम रहूं
कि खुद भी खुद को देख न पाऊं

कविता की किताब के पन्नों पर
पंक्तियों के घने जंगल में कहीं
बड़े वृक्षों के नीचे फैली वनस्पतियों में
खो जाना चाहता हूं हमेशा के लिए
किसी अनाम जड़ी-बूटी
चाहे किसी कीट-पतंग की तरह
कोई मेरी शक्ल और मठ न देखे
कोई मेरे तमगे और मेरी नाच न देखे

आज के नचनियों के नचनिये
और उनके नचनिये प्रशंसक दृश्य से
छूमंतर हो जाएं तो कोई साधु आए
जिसकी आंख की एक ठोकर से
उघड़ जाए मेरी लहूलुहान आत्मा
और मैं पूरे पन्ने पर फैल जाऊं
उसके जाते ही फिर गुम हो जाऊं
फिर फिर ऐसे ही देखा जाऊं।

     



सोमवार, 9 दिसंबर 2019

हिंदीपट्टी सीरीज

- गणेश पाण्डेय
1/
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हिंदी के ज्ञानियो
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ज्ञान है
तो उसे जीवन में
उतरना चाहिए

अन्यथा
ज्ञान और गोबर में
क्या फर्क है

पहल के लिए
आपका जीवन
क्यों बुरा है।

2/
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हिंदी पट्टी क्या हो गयी है
-----------------------------
क्या
आज हिंदी पट्टी
गोबर पट्टी नहीं हो गयी है

लोग तो हिंदी के जिस-तिस
ऐरे-गैरे नत्थू खैरे को महान मानकर
पूजने के लिए अति विकल हैं
एक पैर पर खड़े हैं

उन्हें
इस बात से मतलब नहीं
जिसको पूज रहे हैं
उसके पास कोई महानता
है भी या नहीं
है तो क्या।

3/
--------------------------------
धारा के विपरीत जैसे होंगे
--------------------------------
जिसने
अपने समय के
किसी महाकवि चाहे
आलोचक का झोला नहीं ढोया

वह ऐसा करने वालों की तरह
अपना जीवन कैसे जी सकता है
उनकी तरह कैसे रह सकता हैं
उन्हें खुश करने वाला साहित्य
कैसे लिख सकता है

बहुत
मुश्किल समय है
धारा के विपरीत आप जैसे होंगे
लोग चाहे कुछ न कर पाएं फिर भी
आपको बर्बाद करने में लग जाएंगे
पत्थर फेकेंगे गालियां देंगे
दुष्प्रचार करेंगे।

4/
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वही अपनी बात कह पाता है
-----------------------------------
जो
अकेला होने का
जोखिम उठाता है

वही
कोई अपनी बात
कह पाता है

वर्ना
भीड़ में सब एक जैसा
लिखते बोलते करते हैं।

5/
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अकेला हूं अद्वितीय नहीं
--------------------------------
मैं यहां बहुत
अकेला हूं जरूर

पर हिंदी पट्टी में
अद्वितीय नहीं हूं

मेरी तरह और भी
बहुत अकेले हैं

अपनी-अपनी
जगह।

6/
-----------------------------
बस एक लंबी पंक्ति लिखूं
------------------------------
गुरुओं ने
मेरी कोई बात नहीं मानी
लेकिन मैं सोचता हूं
अपने प्रिय शिष्य की एक बात
जरूर मान लूं

यहां से हट जाऊं
नेपथ्य में बैठकर
एकांत साधना करूं
कुकुरमुत्तों को पूजने के दौर में
सरस्वती की पूजा करूं

सोचता हूं
शिष्य के कहने पर चुप रहूं
लंबी सांस लूं लंबी सांस छोड़ूं
समय के विशाल कागज पर
ग्रंथ नहीं महाकाव्य नहीं
अपनी लिखावट में
बस एक लंबी पंक्ति लिखूं

और
इस तरह अपना काम
पूरा करूं।


                                                         

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

विश्वविद्यालय सीरीज


- गणेश पाण्डेय


1

विश्वविद्यालय
-----------------

इक्कीसवीं सदी है बाबू
नेकी की नहीं बदी की सदी है बाबू
बदी के अनेक रूप और रंग हैं बाबू
ऐसे विश्वविद्यालयों को पैदाकर
मुश्किल में फंस गया है देश बाबू

विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में
नेकी की बातें ठूंस-ठूंस कर भरी हुई है
लेकिन आचार्य उसे अपने छलबल से 
पढ़ने-पढ़ाने से बाहर जाने ही नहीं देते
विद्यार्थियों को जीवन में उतारने ही नहीं देते

हौदा जी आचार्य हाथी जी आचार्य
चूहा जी आचार्य और क्रांतिकारी जी आचार्य
विद्यार्थियों को जोर-जोर से डांटते हुए कहते हैं
कि यह जीवन में शामिल करने की चीज नहीं है
सिर्फ कंठस्थकर कापी पर लिखने
और ज्यादा नंबर पाने की चीज है
नंबर लो और अपने घर जाओ गधो

वे विद्यार्थियों को गधे की जगह
घोड़ा ऊंट शेर बनाना ही नहीं चाहते
उन्हें अच्छा मनुष्य बनाने के बारे में
वे सौ जन्म तक सोचना ही नहीं चाहते
वे हिंसामुक्त असमानतामुक्त समाज की बात
कक्षाओं में कर तो सकते हैं पर ऐसा हो
दिल से चाह नहीं सकते
वे मोमबत्ती जलाने का नाटक तो कर सकते हैं
पर अपने भीतर बदी से लड़ने के लिए
एक चिंगारी पैदा नहीं कर सकते हैं

क्या दुनियाभर के आचार्य
नेकी को बदी की तरह पढ़ाते हैं
मोटी-मोटी पोथियों की आड़ में
विद्यार्थियों से अपना जीवन छिपाते है
क्या हो गया है इस देश के आचार्यों को

इस देश के विश्वविद्यालयों को
समाज को सुंदर बनाने की प्रविधि के केंद्र की जगह
फूल जैसे बच्चों को पत्थर बनाकर निकालने की जगह
किन लोगों ने बनाया है कौन हैं पहले उन्हें ठीक करो।

2

कुलपति
-----

मुझे
कुलपति नहीं होना था जिस गाँव नहीं जाना था
उस रास्ते पर कोई डग रखना तो दूर उसे देखा तकनहीं 
मुझे तो अपने अनुशासन में कुछ टूटा-फूटा काम करना था
और जो पहले से टूटा-फूटा था और उसकी मरम्मत का 
जो काम पहले से बाक़ी चला आ रहा था
बस उसी को करना था किया भी

वे जो सूक्ष्म खोपड़ी के अतिविकट नितंबी आचार्य थे
उन्हें ले-देकर कुलपति बनने का काम करना था
जिन्होंने अपने आत्मवृत्त में छींकने से लेकर
मीआदी बुख़ार होने तक का वृत्तांत लिख रखा था
अपने अनुशासन का अ अक्षर तक ठीक से नहीं लिख रखा था
उनके पास कुछ भी ठीक से करने के लिए वक़्त कहाँ था
उन्हें तो कुलपतियों को नहाने के बाद तौलिया पहनाने से लेकर
रात में बिस्तर की सिलवटें ठीक करने तक का काम
पूरी मुस्तैदी के साथ करना था
कुलपति बेचारा अकेले खुले में ठीक से पाद तक नहीं सकता था 
ये सूँघते हुए वहाँ भी पहुँच जाते थे 
ऐसी बात नहीं कि कुलपतियों को यह सब ठीक नहीं लगता था
यह सब उनके जीवन का अभिन्न था इन्हीं सीढ़ियों से चढ़कर
कुलपति बनना होता था
कुलपति होते ही अलबत्ता एक अतिरिक्त दुम निकल आती थी
कुछ और भी अतिरिक्त हो जाता था

कुछ कुलपति अपवाद होते थे कहिए कि भूलवश होते थे
कुलाधिपतियों से दुर्घटनावश हो जाते रहे होंगे
ऐसे कुलपति सब जान जाते थे कि विद्या की दुनिया में
कौन-सा आचार्य किस कोटि का है 
किससे लिपिकीय कार्य लेना है, किससे परीक्षा का काम
किसे चम्मच और काँटे की तरह इस्तेमाल करना है
और किसका हृदय से सम्मान करना है
अक्सर छात्रों-शोधछात्रों और स्ववित्तपोषित महाविद्यालय के 
प्राध्यापकों के हित के लिए विभागाध्यक्षों से
मेरी लड़ाई होती रहती थी एक दिन लड़ाई
हाथापाई में बदल गयी
विभागाध्यक्ष कुलपति की आँख के तारे थे 
पहुँच गये अपने कुलपति के पास अकेले में रोना-धोना किया
और लौट आए मन ही मन मगन हांेकर अब पेशी होगी 
कल होगी परसों होगी शायद फोन पर होगी
लेकिन कुछ हुआ ही नहीं काफी दिनों बाद 
कुलपति मिले मैंने ख़ुद ही चर्चा की तो मासूम -सा जवाब दिया
उसी दिन मेरे पास आए थे लेकिन मैंने आपसे तो कुछ भी नहीं कहा
ऐसे कुलपति कम होते हैं जिनके पास अपने कान होते हैं
अपनी जुबान और अपना दिमाग होता है
नही ंतो ज़्यादार कुलपति अक़्ल से पैदल और कान के कच्चे होते हैं
चमचाप्रिय सेवाप्रिय मालप्रिय होते हैं

जब कुलपति बनना करोड़ों का खेल हो जाए
देकर बनो लेकर फूलकर कुप्पा बनो फिर दो बनो लो
ऐसे देश को रसातल में जाने से कौन रोक सकता है
जब मंत्री और कुलपति दोनों एक जैसे लुटेरे हों
एक बीमार देश यह कैसे तय कर सकता है
कि उसे लुटेरा कुलपति चाहिए या कुल की उन्नति करने वाला
कुलपति।

3

विभागाध्यक्ष
--------------

मुझे
विभागाध्यक्ष होना ही नहीं था
इसलिए कभी किसी दंदफंद वाले के पीछे
चलना ही नहीं था
उन लोगों को होना था
इसलिए उन लोगों ने
विभागाध्यक्ष होकर भी कम उम्र के
अपने विषय के फिसड्डी आचार्य
शिक्षक नेताओं के पीछे चलने में
अपनी भलाई समझी सब निरापद हो
अध्यक्षता ठीक से चलती रहे
कुलपति की डांट से बचे रहें
उनके लिए नाचना और पादना बुरा नहीं था
जीवन में इस मूल्यवान अवसर को
गँवा देना बुरा था
अपनी संततियों को कैसे बताते
जीवन में प्राध्यापक होकर उपाचार्य होकर
आचार्य होकर विभागाध्यक्ष होकर 
क्या बड़ा किया

और मुझ गधे के पास
इन फिजूल कामों के लिए वक़्त कहाँ था
मैं हिंदी का बेटा था मुझे भला
उसकी सेवा से छुट्टी कहाँ थी
उसी के लिए जीना था उसी के लिए
दिनरात लड़ना था उसी के लिए मरना
मुझे तो पता ही नहीं कि प्राध्यापक होने के बाद
हिंदी ने कब मेरे जीवन में दर्शन की जगह ले ली
कब उसने मेरी उँगली को जोर से पकड़ ली
और मैं माँ-माँ कहते हुए उसकी पीछे चल पड़ा

असल में हम
अपनी रुचि का जो काम
अच्छे से कर सकते थे हमने वही किया
भला इससे ज्यादा अच्छा
और क्या कर सकते थे।

4

प्राध्यापक
-----------

नयी सदी के
प्राध्यापक भी पूरी तरह
प्राथमिक अध्यापक बन चुके थे

सरकार ने नहीं
उन्होंने ख़ुद ही ख़ुद को 
अपने अनुशासन में कुछ बड़ा करने की जगह
शिक्षणेतर कार्यों के एक विशाल भाड़ में झोंक दिया था

कुलपति
और विभागाध्यक्ष ने
ख़ुद नहीं कहा कि पढ़ाने की जगह उनकी खुशामद करो
फिर भी उन्होंने ख़ुद ही ख़ुद को उन्नत किस्म की चंपी करने के 
पाठ्यक्रमेतर सैद्धांतिक और प्रायोगिक कार्य में 
निष्ठापूर्वक लगा दिया था

ज़ाहिर है ऐसे में प्राध्यापक
उससे भी कम पढ़ाने लगे थे
जितना किताबों में लिखा हुआ था
असल में हाथ मैले न हो जाएं
इसलिए किताबों को कम से कम छूते थे
बच्चों के सामने अपना जीवन 
किताब की तरह खोलकर कभी सीखा ही नहीं
सीखते भी तो वरिष्ठ डस्टर से उसे मिटा देते
समय बहुत दूसरा ख़ुद को बचाना
ख़ुद को अंतरिक्ष में बचाने जैसा था
और हिंदी की दुनिया में किसे इतना आता था

एक बिल्कुल अलग दुनिया थी
अलग तरह के कुलपति थे विभागाध्यक्ष अलग तरह के
प्राध्यापकों ने ख़ुद ही ख़ुद को उनके अनुकूल ढाल लिया था
और वातानुकूलित प्राध्यापक बन गये थे।


5

शिक्षाविद
------------

सरकारें कैसे-कैसे नमूनों को
शिक्षाविद चेयरमैन कुलपति बनाने लगीं थीं
जब शिक्षामंत्री ही नमूनों के सरदार हों
तो फिर नमूनों की सरकार में अचरज कैसा
इनसे कोई सख़्ती से पूछ ले तो हवा निकल जाए
तुम्हारी शिक्षा का उद्देश्य क्या है और है तो कहाँ है
तुम्हारे ज्ञान का विज्ञान का उद्देश्य क्या है कहाँ है
तुम्हारे पाठ्यक्रम का उद्देश्य क्या है दिख क्यों नहीं रहा है
तुम्हारे आचार्य का उद्देश्य क्या है तुम्हारा आचार्य कर क्या रहा है
तुम्हारे छात्र का उद्देश्य क्या है कर क्या रहा है
तुम्हारे विश्वविद्यालय का उद्देश्य क्या है विघ्वविद्यालय कहाँ खड़ा है
तुम्हारे शिक्षाविद होने का उद्देश्य क्या है तुम लोग कर क्या करे हो।







मंगलवार, 19 नवंबर 2019

ओ ईश्वर पार्ट टू

- गणेश पाण्डेय

ओ ईश्वर
सविनय निवेदन है
पहले भी एक बार
बाबरी मस्जिद ढ़हने के आसपास
सविनय विनयपत्रिका भेज चुका हूं

हे परमपिता
आपने मुझ पर अहेतुक कृपा की है
भारत वर्ष में एक टुकड़ा कृषियोग्य
ईमान की भूमि देकर

हे पालनहार हे जगन्नियंता
मैं जैसे ही हल लेकर खेत जोतने निकलता हूं
मेरे पीछे-पीछे लगे लाल हरे केसरिया रंग के सांड़
मेरी आत्मा के दो सुंदर और पुष्ट बैलों को दौड़ाकर
अपनी झुंड के सीगों से लहूलुहान कर देते हैं

हे अन्नदाता
मैं क्या करूंगा इस कृषियोग्य भूमि का
जिसके भाग्य में अनंतकाल तक बंजर रहना लिखा है
ईमान के इस टुकड़े को आप वापस ले जाएं नहीं तो
इसे कुएं में फेंक दूंगा आग लगा दूंगा
अजायबघर में रख दूंगा

हे सच्चिदानंद
मुझे स्वर्ग नहीं चाहिए मैं भी नर्क में जीना चाहता हूं प्रभु
जैसे जीते हैं सब बेईमानी की लहलहाती फसलों के बीच
मैं भी अपने बच्चों को खुशहाल देखना चाहता हूं
कम से कम सात पुश्तों के लिए इंतजाम करना चाहता हूं

हे नाथ
आपने बेईमानी की कई एकड़ कृषिभूमि
हिन्दी के हरामजादों को देकर किसी को
वाइसचांसलर तो किसी को मंत्री-वंत्री बनाया
आप ही बताइए खुलकर बताइए
हिंदी का ईमान लेकर मुझे क्या मिला घंटा

हे सर्वशक्तिमान
ईमान वालों के साथ न्याय नहीं कर सकते
तो उन्हें ईमान का प्लाट-व्लाट देते ही क्यों हैं
प्रेम करने वाले अपने भक्तों को आप इतना दुख देते हैं
और आपका नाम बेचने वालों को राजपाट

हे बाबा
गोरखनाथ
आप शिवावतार भी हैं और हिन्दी के कवि भी
आपकी छाया में मेरा घर है एक किलोमीटर पर
आपने कभी जानने की कोशिश क्यों नहीं की
कि कविता का ईमान ढोनेवाला कोई मजदूर भूखा क्यों है
और आपकी खिचड़ी हिन्दी के कैसे-कैसे लोगों में
बांट दी जाती है

ओ अंतर्यामी
अब इस उम्र में मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए
न सोना-चांदी न राजपाट और न यश का छत्र
मेरे जीवन में खुराफात की जड़ इस ईमान को
बस जल्द से जल्द वापस ले लीजिए

हे विधाता
मेरे दिमाग से ईमान को फौरन निकालकर
उसकी जगह धर्म का गोबर भर दीजिए चाहे
हिन्दी की पुरस्कार की टट्टी भर दीजिए
चाहे राजनीति की हरामजदगी भर दीजिए

ओ ईश्वर
बस बस बस बहुत हुआ देख लिया ले जाओ
अपना यह टूटा-फूटा ईमान का खिलौना
बहुत खेल लिया बहुत हार लिया बहुत रो लिया
अगले जन्म में मुझे भी चलता-पुर्जा आदमी बनाना
ईमान का चलता-फिरता पुतला नहीं।



                                                                     

बुधवार, 6 नवंबर 2019

हिंदीघर सीरीज

- गणेश पाण्डेय

(एक)
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जब किसी ने नहीं सुनी मेरी बात
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जब किसी ने
नहीं सुनी मेरी बात

तो आखिर मैं क्या करता
उन हंसी-ठट्ठा करते लोगों के बीच

खुद को बचाने के लिए मुझे
अलग होना ही था हुआ।

(दो)
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कितनी देर तक विनती करता
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कहां-कहां
किसके पास कितनी देर तक
विनती करता

सब पत्थर की चलती-फिरती
हंसती-बोलती नाचती-गाती
और काव्यपाठ करती मूर्ति थे

सब समय की बहती हुई धारा के
कण थे मृत पशु थे अस्थि थे
मानव-शव थे

कोई सुनता ही नहीं मेरी बात
पता नहीं क्या टेढ़ा था मेरा मुंह
कि मेरी बात

जैसे उनके लिए
मैं था फिर भी नहीं था
जैसे मैं कोई अदृश्य चीज था

हवा होता तो महसूस करते
उड़नतश्तरी होता तो देख लेते
शायद मैं उनके लिए बीता समय था

मैंनै चुपचाप अपना
कुछ सामान बोरिया-बिस्तर समेटा
और उस जगह से बाहर हो गया।

(तीन)
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शर्म से पानी-पानी हुआ
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तमाम लोग
बड़ी-बड़ी जगहों से
बाहर कर दिए जाते हैं
लेकिन उन्हें शर्म नहीं आती

कितना नासमझ हूं
उन जगहों की तुच्छ बातों को देखकर
मैं खुद ही शर्म से पानी-पानी हुआ खूब
और बिना देर किये बाहर आ गया।

(चार)
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मेरी उंगली और सभाध्यक्ष की आंख
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मैं सोचता था
कि मेरी उठी हुई उंगली की ओर
सभाध्यक्ष देखेंगे और सुधार लेंगे
अपनी बात

लेकिन उन्हें
झूठ बोलने की इतनी जल्दी थी
कि अपनी आंखें निकालकर
जेब में रख लीं

ओह मैं
बहुत से बहुत शर्मिन्दा हुआ
अपना सिर और उंगली झुकाकर 
सभागार से बाहर आ गया।

(पांच)
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हिंदीघर से मुझे बाहर फेंक दिया
--------------------------------------
मुझे
हर ऐसी-वैसी बात पर
छींकने की बीमारी हो गयी थी
और उन्हें वह सब करने की आदत थी

मैं अपनी नाक को
बहुत समझाता था कि बस भी करो
लेकिन मेरी नाक पर मेरा वश नहीं था
आखिर वही हुआ जिसका डर था

किसी ने मेरी नाक किसी ने कान
किसी ने हाथ किसी ने पैर खींचा जोर से
और मेरे बाप-दादा-परदादा के बनाए
उस हिन्दीघर से मुझे बाहर फेंक दिया।


                                                                       

सोमवार, 4 नवंबर 2019

जागो सीरीज : छोटी कविताएं

- गणेश पाण्डेय

(1)
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उनकी चीख सुनो
-------------------
बेईमानों
चोर-उच्चकों
और लुटेरों का गिरोह होता है

ईमानवालों का
कोई गिरोह नहीं होता है
बाजदफा बिल्कुल तनहा होते हैं

उनकी चीख सुनो हिंदी के बच्चो
उनका दर्द और छाती पीटना सुनो
यकीनन यह सब तुम्हारे लिए है।

(2)
--------------------------
आप चुप नहीं रह सकते
--------------------------
हिन्दी के इस
चौराहे पर खड़े होकर
बस के नीचे आते बच्चों को देखकर
आप चुप नहीं रह सकते
अगर आप चीख नहीं सकते
तो गधा बैल कुत्ता बिल्ली हो सकते हैं
आदमी तो बिल्कुल नहीं हो सकते

हिन्दी के भले आदमी हैं
तो जागिए कुल्ला-दातून कीजिए
खेतों की तरफ भागिए
नील गायों को ललकारिए
हिन्दी की फसल को
बर्बाद होने से बचाइए।

(3)
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जवानी तुम्हारी है हिन्दी हमारी है
------------------------------------
तय करो
तुम्हें अपनी जवानी
लड़ाकों के संग
हिन्दी की उन्नति को देनी है
या साहित्य उत्सवों की मंडी में
प्रसूनों विश्वासों के संग बैठकर
बर्बाद करनी है

जवानी तो तुम्हारी है
किसी भी खूंटे में फंसा दो
ताल-तलैये में डुबो दो
किसी को भी दान कर दो
चाहे तो कोठे पर गंवा दो
तुम अपनी जवानी के संग
कुछ भी कर सकते हो
लेकिन हिन्दी के साथ
कोई बुरा काम नहीं कर सकते

लड़के
सम्हल जाओ
तुम्हारी जवानी तुम्हारी है
तुम्हारा जोश तुम्हारा है
तुम्हारी यशेषणा और वासना
तुम्हारी है तुम्हारी है
हिंदी हमारी है।

(4)
-----------
तय करो
-----------
चीखें
हमें जिंदा रखती हैं

और चुप्पी
हमें मार देती है

तय करो तुम्हें आगे
हिंदी में क्या करना है।

(5)
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टाफी
--------
बच्चे तो बच्चे हैं
वे थोड़ा-सा मचलते
फिर सम्हलकर
अपने काम में लग जाते

ये तो हिंदी के
मेरी उम्र के हरामजादे हैं
बच्चों को टाफी दिखाना
बंद नहीं करते।