रविवार, 23 मई 2021

आवारा सरकार

- गणेश पाण्डेय

(1)

जनता
सरकार बनाती ज़रूर थी
बनाए बिना मानती नहीं थी
लेकिन
बन जाने के बाद वह सरकार 
जनता की क्यों नहीं रह पाती थी
आखि़र
वह कौन बीच में आ जाता था
जिसके साथ सरकार हर बार भाग जाती थी
बेचारी
जनता हाथ मलती रह जाती थी
दिन-रात बच्चों के बारे में सोच-सोच कर
हलकान होती रहती थी
गऊ जैसी सीधी-सादी जनता कर भी क्या सकती थी
जो जिधर कहे अपनी सरकार ढूँढने चली जाती थी
किसी माई के थान पर किसी पीर-मुर्शिद के पास कहीं भी
और थक-हार कर वापस अपनी बस्ती में लौट आती थी।

(2)


जनता 
कोई एक थोड़े थी
कई शक्लों और कद-काठी में बँटी हुई थी
पहले का मुँह सबसे बड़ा था हिंदू था
दूसरा मुसलमान था तीसरा सिख था
चौथा ईसाई था पाँचवाँ घमंजा था
और इनकी सरकारें आवारा थीं
तरह-तरह के लिबास पहनती थीं
इत्र लगाती थीं गहने गढ़ाती थीं
किसी के भी साथ कभी भी भाग जाती थीं
कभी हिंदू की सरकार भाग जाती थी
तो कभी मुसलमान की कभी किसी की
सरकार मुँह अँधेरे भी भागती थी
तो कभी दिन दहाड़े भी भागती थी
जब सरकार भाग जाती थी
तो जनता के मुँहों से हवाईयाँ उड़ जाती थीं
जैसे यह सब
उसके साथ पहली बार हो रहा हो
जबकि उसके साथ हर बार यही होता था 
पहले से उसके राजनीतिक भाग्य में लिखा होता था
सरकार भागेगी तो कुछ दिन जनता रोये-धोयेगी
और जगह-जगह सरकार को ढूँढने के बाद 
अंत में रपट लिखाने थाने पर जाएगी।

(3) 

इतना बड्डा
हुजूम देखकर 
थानेदार की भौंहें फड़कने लगी थीं
कड़क आवाज़ में पूछा क्या माज़रा है,
हिंदू ने कहा हुज़ूर मेरी वाली भाग गयी 
मुसलमान ने कहा मेरी वाली भाग गयी 
फिर औरों ने भी कहा मेरी वाली भाग गयी
थानेदार ने झल्लाकर कहा -
अबे कुल कितनी भैंसें भाग गयीं
सबकी भैंसे एक साथ भागीं या भगायी गयीं
- नहीं, नहीं थानेदार साहब
भैंस नहीं हमारी सरकारें भाग जाती हैं
उनके भागने-भगाने की रपट दर्ज़ करो
थानेदार ने रोबीली आवाज़ से हड़काया -
क्या मैं तुम्हें पागल दिखता हूँ
अरे गधो सरकारें भी कहीं भागती हैं
हा हा हा हो हो हो
भागो यहाँ से तुम सब
भाँग खाकर आये या गाँजा पीकर
ऐसी सरकारें बनाते ही क्यों हो
जो किसी भी अड्डे-बड्डे के संग भाग जाएँ। 

(4)

पुरानी-धुरानी
हवेली उदास थी 
कनीज़ की कनीज़ दिखती 
कनीज़ चमेली उदास थी
फटेहाल नवाब साहब उदास थे 
तबलची उदास थे गवैये उदास थे
नचनिये-पदनिये उदास थे मतलब
हिंदी के कबी-सबी अम्पादक-संपादक
और अफ़सानानिगार वगैरह सारे
इनामी-सुनामी सब उदास थे
चाँदनी रात और सुरमई शाम
और सुर्ख़ आफ़ताब सब उदास थे
राजनीति की इस उदासी पर लिखी जा रही
कविताएँ उदास थीं कहानियाँ उदास थीं
दिन उदास था उजाला उदास था
चाय का प्याला और रसरंजन का गिलास
सब उदास था 
बहत्तर साल से ढहती हुई हवेली उदास थी
यहाँ तक कि उदासी भी उदास थी
हम सबकी बेग़म सरकार 
किसी साहूकार के साथ भाग गयी थीं।

(5)

जिन सरकारों को 
जनता के साथ घर बसाकर रहना नहीं आता
तो बनती ही क्यों हैं इंकार क्यों नहीं कर देतीं
शुरू में ही कह क्यों नहीं देतीं
कि हमें मुँह दिखाई में चंद्रहार चाहिए 
हमें रहने के लिए सोने के लिए
अच्छे से अच्छा सोने का महल चाहिए
नये ज़माने का एंटीलिया-फेंटीलिया से भी शानदार चाहिए 
दूल्हा तो सबसे अमीर चाहिए खानदान आला चाहिए
किसी चिरकुट निरहुआ घिरहुआ के साथ
उसकी टप-टप चूती झोपड़ी में नहीं रहना है।

(6)

यही वक़्त था सही वक़्त था
जब पुलिस की नाकामी के बाद
जासूस तिरलोकचन को लाया गया
जासूस ने अपना हैट उतारा
सिर खुजलाया आँखे मिचकाया
और बताया-
इसी सरकारी बंगले से 
इसी वजीर की कोठी फाँदकर
इसी चोर रास्ते से इसी सुरंग से
इसी आँख में पट्टी बंधी हुई 
किताब से मुँह छिपाकर 
सरकारें भागती रहती हैं
जासूस तिरलोकचन ने
ऐलान किया था कि उन्होंने 
भागी हुई सरकारों के बारे में
सब पता कर लिया है
कौन हैं जो ऐसी मनचली सरकारों को
भगाकर ले जाते हैं और ऐश करते हैं
ऐसे लोगों के खि़लाफ़ सारे सबूत हैं
सारे गवाह हैं मुकम्मल तैयारी है
हम इन्हें गिरफ़्तार कर सकते हैं
हम इन्हें हमेशा के लिए
सलाखों के पीछे डाल सकते हैं
जासूस तिरलोकचन ने
जनता की ओर देखा अपना हैट उतारा
पीठ पर हाथ ले जाकर सिर झुकाया
और अतिविनम्रता से कहा- 
बस एक बार ढंग से 
जनता का साथ देने वाली
सरकार आ जाय।




रविवार, 9 मई 2021

समय सीरीज़

- गणेश पाण्डेय

1

समय 
सब बीत जाता है
लेकिन कोई समय ऐसा भी होता है
नहीं दिखता है जिसका बीतना 

पहाड़ की तरह 
ठहरा हुआ एक समय है 
कोई समय है सिर्फ़ तारीख़ बदलती है

किसी के 
जीवन का पहिया रुक जा रहा है
किसी का थर-थर काँप रहा है

इतना बुरा समय कभी नहीं देखा था
किसी घर का एक हरा-भरा स्वस्थ वृक्ष 
किसी रोगी के छींक भर देने से 
खड़े-खड़े दो दिन में सूख जा रहा है

बुज़ुर्ग बेचारे 
भय से धराशायी हो जा रहे हैं
उनकी नींद भी जैसे नींद की पनाह में हो
यह जीना भी मरने की तरह है

कोई मुँह पर ज़रा-सा खाँस भर दे 
तो बड़े-बड़े बाऊ साहब की सिट्टी-पिट्टी 
गुम हो जा रही है

एक उत्साही युवक
बड़े मान से अपने शुभ-विवाह का 
निमंत्रण-पत्र बाँटकर आ रहा है और वह
दो दिन बाद शोक में बदल जा रहा है

एक युवा पिता 
सारे एहतियात के बावजूद
बहुत डरा हुआ घर से निकलता है
और उसी तरह डरा हुआ घर लौटता है
स्नान करने कपड़े बदलने के बाद भी
अपनी लाड़ली को गोद में उठाकर
चूमने से डरता है

बड़े तो समझ रहे हैं 
कि यह सब उनके साथ हो क्या रहा है
बच्चे समझ नहीं पा रहे हैं कि समय 
उनके साथ कर क्या रहा है

हे समय 
बहुत कर ली मनमानी
अब अपना डोला बढ़ाओ
जाओ किसी और ग्रह पर डेरा डालो
मैं कहता हूँ हटो दफ़ा हो जाओ
खाली करो हमारे बच्चों की पृथ्वी।

2

ओह
फूलों में ख़ौफ़ है
हवाओं में निकल आए हैं
ज़हरीले डंक 
पंखुड़ियों तक में 
पैदा हो गया है जानलेवा ख़ौफ़
ख़ुद को अलग कर लिया है
दूसरे से
फूल सदमे में हैं
मंदिर में मंडप में गुलदस्ते में
यहाँ तक कि प्रेम का संदेश लेकर भी
जाने से मना कर दिया है
यह कैसा समय है
जिसे देखते ही कुम्हला जाता है 
फूल का मुख 
काँपने लगती है उसकी रूह
ताकती रहती हैं आँखें बगीचे में
कोई आए और मोड़ दे 
समय का रथ।

3

यह समय
किस लिए याद किया जाएगा
ट्रंप के जाने के लिए या फिर
मोदी के रह जाने के लिए
क्या यह समय
इतना छोटा है इतना तुच्छ है कि
किसी राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री के
आने-जाने के लिए याद किया जाएगा
यह समय
दुनिया का क्रूरतम समय है
जो लाखों फ़ौज़ियों के मारे जाने के लिए नहीं
असंख्य निर्दाष लोगों के मारे जाने के लिए 
याद किया जाएगा 
दोष राजा का था
और मारे गए अपनी हड्डियों से
अपनी मांस-मज्जा से अपने हाथों से
अपनी आँखों से और उनमें बसे
स्वप्न से सिंहासन बनाने वाले
जब मर रहे थे जन
असहाय असमय समूह में
राजा अपने महल में मगन था
चक्रवर्ती राजा बनने के स्वप्न देख रहा था
राजा को प्रजा के स्वप्न न दिखायी देते थे
न उसकी चीख़ें सुनायी देती थीं
वह अभी-अभी लौटा था आखेट से
तमाम हिरनों-हिरनियों और उनके शावकों का
शिकार करके
बाहर 
हर शहर, हर गाँव-गली में
मौत का सन्नाटा पसरा हुआ था
घरों के भीतर से सिसकियाँ 
और चूड़ियों के तोड़े जाने की आवाज़
बाहर आ रही थी
यह समय 
धरती और आकाश को एक कर देने वाले
इस रुदन के लिए याद किया जाएगा
कि राजा और दरबारियों की अद्भुत
जुगलबंदी के लिए याद किया जाएगा
राजा बूढ़ा था 
चाहे उसके केश और लंबी दाढ़ी पर
सृष्टि की सारी चांदनी उतर आयी थी
लेकिन उसका
माउथऑर्गन बजाने का अंदाज़ वही था
यह समय 
आखि़र किस लिए याद किया जाएगा
न प्रेम के लिए याद किया जाएगा
न फूलों के खिलने के लिए
न हवा के चलने के लिए 
न नदी के बहने के लिए
न राजा के पसीजने के लिए
न प्रजा का भाग्य बदलने के लिए
यह समय
प्रजा के दुर्भाग्य के लिए याद किया जाएगा
परिजनों-स्वजनों के 
असमय वियोग के लिए याद किया जाएगा
शवों के अनगिनत रह जाने और शव हो जाने के 
भय के लिए याद किया जाएगा
यह समय 
हिंदुत्व के उभार के लिए नहीं
राष्ट्र के नवनिर्माण के लिए नहीं
कोरोना से हार के लिए याद किया जाएगा।

4

गोरखपुर में बारिश हो रही है
कोलकाता में भी बारिश हो रही होगी
हैदराबाद भी भीग रहा होगा
चेन्नई की सड़कों पर जल का रेला होगा
क्या देश क्या परदेश हर जगह
सबका मौसम एक है सबकी मुश्किल एक है
देश और दुनिया में
घड़ी की सुइयाँ अलग-अलग हैं
कैलेंडर के पन्ने अलग-अलग हैं
कहीं भी किसी का भी समय
अलग नहीं है
बारिश एक जैसी हो रही है
बादल एक जैसे गरज रहे हैं
बिजली एक जैसी कड़क रही है
सब एक जैसे सहमे हैं
सब एक जैसे बिलख रहे हैं
सब एक जैसे चुप हैं
सब जगह
एक पिता है एक माँ है
एक भाई है एक पत्नी है 
एक जैसे बच्चे हैं
जीवन में कोई भी बुनियादी चीज़
अलग नहीं है
अच्छा समय सबको
एक जैसा हँसाता है गोद में उठाता है
होंठों पर एक जैसी मुस्कान जड़ देता है
सब एक जैसे प्रेम करते हैं
एक-दूसरे की क़द्र करते हैं
एक दूसरे का ख़याल रखते हैं
अच्छा समय
बहुत अच्छा होता है बहुत कोमल होता है
बुरा समय उसे छूभर दे तो मुरझा जाता है
जैसे आज दुनिया के सारे अच्छे समय
असमय झर गये हैं डाल से
धूल-धूसरित हो गये हैं
किसी बाग़ में किसी मैदान में
कोई रामलीला नहीं हो रही है
एक सचमुच का रावण-समय 
पृथ्वी की मुँडेर पर पैर रखकर 
अट्टहास कर रहा है
और इसके दर्प को चूर-चूर करने के लिए
कोई राम नहीं है कोई युद्ध नहीं है
कोई धर्म किसी काम का नहीं है
हर जगह एक अकेला मनुष्य है
अपने लोगों के लिए हाय-हाय करता
इधर-उधर भागता चीख़ता-पुकारता
समय के पैरों में अपना शीश
पटक-पटक कर फोड़ता
इस काल से जूझता
मारा-मारा फिरता हुआ कोई कवि
कितनी लंबी कविताएँ लिखेगा
और उन कविताओं में
काल के काल की कामना में
मंत्र का जाप करेगा।

5

वह भी एक समय था
जब अंग्रेज़ी दवाएँ मिलना तो दूर
तेतरी बाज़ार में दिखती तक नहीं थीं
कोई साठ साल पहले आज की तरह
बाज़ार कहाँ थे बस ग्रामसभाएँ थीं
जिला परिषद का एक आयुर्वेदिक
अस्पताल था मेरे घर से दूर था
जिसका चूरन बच्चों में बहुत मशहूर था
इसीलिए कंपाउंडर अनिवार्य रूप से
सभी बच्चों के चाचा थे और हम 
इसीलिए चूरन लेने जाते थे
वह एक आयुर्वेदिक समय था
जूड़ीताप हो
चाहे साधारण ज्वर
माँ दो घर छोड़कर पंसारी की दुकान से
वेदना निग्रह रस की पुड़िया लेकर आती
कहती फाँक लो और उसके बाद 
पानी की घूँट के साथ जादुई दवा भीतर
और थोड़ी देर में बुख़ार बाहर
वह भी एक समय था
जब चाहता था कि बुख़ार आए
तो बुआ आए ख़ूब सारा मुनक्का लेकर
और मैं खाता जाऊँ खाता जाऊँ
कभी-कभी शरीर पर कुछ दाने निकलने पर
कभी माँ बुआ मिलकर शीतला माता के गीत गातीं
नीम की पत्तियों का गुच्छा फिरातीं
प्राइमरी स्कूल में
चेचक का टीका लगाने वालों को
चाचा नहीं कहते थे छपहार कहते थे
उसे देखते भी नहीं थे आना सुनते ही
बस्ता छोड़कर भाग लेते थे
कई दिन स्कूल नहीं जाते थे
छपहार भी चकमा देकर आते थे
और हम बच्चों को एक बड़ी बीमारी से
इस तरह बचाते थे कि हमारी दुनिया
आखि़र चेचक के विषाणु से बच गयी
एक यह समय है
हमारी दुनिया थर-थर काँप रही है
सर्दी-बुख़ार-खाँसी से
कहाँ हो माँ कहाँ हो बुआ और बाबूजी 
आओ देखो 
पृथ्वी का सबसे उन्नत चिकित्साविज्ञान
आज तुम्हारी संततियों और उनकी
संततियों को आश्वस्त नहीं कर पा रहा है
बहुत बड़े-बड़े चिकित्सा संस्थान हैं
जिनकी कल्पना आप सबने नहीं की होगी
और ये सब नाकाफ़ी हैं
हम बच्चे थे
लेकिन उस वक़्त भी 
मुश्किलें कम नहीं रही होंगी
जमोगा माई का नाम सुना था
जिससे अनगिनत नन्हें दीप जन्म लेते ही बुझ जाते थे
रोती-बिलखती-सुबकती रह जाती थीं नयी-नयी माँएँ
टिटनेस की सुई भी आयी 
मनुष्य ने विजय पायी
रोग और मनुष्य का यह संघर्ष अनंत है
विषाणु और मनुष्य की जिजीविषा में
हमेशा मनुष्य की जीत हुई है
और होती रहेगी
यह संघर्ष लंबा हो सकता है
मनुष्य की कोशिश कभी कम नहीं होगी
हमारे पुरखों ने भी
इसी तरह डर कर लड़ कर और बच कर
हमें बचाया है हम भी अपनी संततियों को
उनकी संततियों को बचाएंगे
हमारी उदासी हमारा रोना
थोड़े दिनों की बात है सब दूर हो जाएगा 
पृथ्वी की हरी-भरी छाती पर हलचल होगी
फुटबॉल हॉकी क्रिकेट कबड्डी
और आइस-पाइस खेलते हुए हमारे बच्चे
इस दुनिया को फिर से 
जीवन के शोर से भर देंगे हम देखेंगे
हम ज़रूर देखेंगे।

6

यह नीम का नहीं समय का पेड़ है
जिसकी डाल में अब झूले नहीं पड़ते
सखियाँ जिस पर झूलती नहीं
भाभियाँ कजरी नहीं पातीं
जिसकी सींक से बुज़ुर्ग अब 
नहीं निकालते दाँतों में फँसे दुख
जिसकी छड़ी से कोई पिता अपने पुत्र को
मारता नहीं स्कूल जाने के लिए
यह मेरे बाबा का नाना का लगाया हुआ
नीम का पेड़ नहीं है
जिसकी छाया में जुड़ाते रहे हम
जिसके नीचे रातों में चौन से
सोते रहे हम
सुबह उठते ही जिसकी निंबोलियाँ
बीनते रहे हम
यह समय का पेड़ है नीम का नहीं
न यह दातून के काम का है न छाया के
न किसी राहगीर के सुस्ताने के काम का
सब इससे दूर भागते हैं
न कोई प्रेमिका 
इसके तने से टिककर खड़ी होती है
न कोई प्रेमी इसकी सख़्त छाल पर
अपना और अपनी प्रेमिका का 
नाम लिखता है
इस पेड़ पर
न चिड़ियों की चहचहाहट है
और न परिंदों का घोंसला
यह पृथ्वी का एक अभिशप्त पेड़ है
जिसकी पत्तियों से प्राणवायु नहीं
झर-झर-झर माहुर झरता है।

7

हे समय माता
शीश नवाता हूँ प्रसाद चढ़ाता हूँ
नारियल फोड़ता हूँ टीका लगाता हूँ
रक्षासूत्र बंधवाता हूँ 

धागा बाँधता हूँ 
पृथ्वी के एक-एक जन के जीवन की रक्षा के लिए 
एक-एक पुष्प की हँसी एक-एक मुस्कान
अच्छे-बुरे आस्तिक अर्द्ध आस्तिक नास्तिक 
सबके लिए

समय के इस प्रहार की धार को
मोड़ दो माता अपने बच्चों के लिए
समय से लड़ जाओ समय माता
हे समय माता भला समय
आप से बाहर कहाँ जा सकते हैं
एक बार उन्हें टोक दो रोक दो
उनकी बाँह पकड़ कर 
पीछे खींच लो

हे समय माता
जैसे पूर्वांचल की माताएँ
अपने बच्चों की छोटी-छोटी खुशियों के लिए
हलवा-पूड़ी की कड़ाही चढ़ाती हैं
मैं भी पृथ्वी के सभी बच्चों की रक्षा के लिए
नया समय आने पर कोरोना पर लिखी
अपनी लंबी कविताओं की कड़ाही चढ़ाऊँगा माँ।





शनिवार, 6 मार्च 2021

एक बूढ़े की प्रेमकथा

- गणेश पाण्डेय

बुढ़ापे में
जब-जब थाली धुलता हूँ
तो देखता रहता हूँ उसमें
प्रियतमा का झिलमिल मुख

आटा गूँथता हूँ
तो लगता है किसी 
कमनीय देह को छू रहा हूँ
किसी की हथेलियाँ
मेरी हथेलियों से खेल रही हैं

रोटी बेलता हूँ
तो लोई बनाने से बेलने
और तवे पर रखने तक
किसी की चूड़ियाँ संग-संग
बजती हैं बजती रहती हैं

गर्म तवा
उँगलियों से छूभर जाए
तो लगता है कि किसी के
तप्त होंठ हैं
बेध्यानी में प्रायः छू जाता है

सब्जी काटता हूँ
तो अक्सर चाकू की धार से
छू जाती हैं उँगलियाँ
लगता है किसी की आँखों को
छू लिया है

जब 
रोटी और सब्जी
लेकर खाने बैठता हूँ
तो झर-झर बहने लगती हैं 
दो बूढ़ी आँखें
तुम्हे सामने देखकर

ऐसा क्यों होता है
मेरी परिणीता मेरी मीता
मेरी कुसुमलता 
चाहे जीवन में 
लाख बेकदरी की हो
अब तुम्हारे बिना एक पल
रहा नहीं जाता है

कब आओगी
अब जब भी आओगी
बर्तन मैं धुलूँगा रोटी मैं बनाऊँगा
तुम्हारी वेणी चाँदनी के फूलों से
मैं सजाऊँगा।











शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

सोने की चिड़िया तथा अन्य कविताएं

- गणेश पाण्डेय

सोने की चिड़िया
-------------------
यह 
इस देश की विशेषता है
इसे बुरे लोगों ने ही अच्छा बनाया है
अंग्रेजों ने कितना विकास किया
रेल छापाखाना टेलीफोन स्कूल कालेज
ओह तमाम नयी-नयी चीज़ें लेकर आए

उन बुरे लोगों के जाने के बाद
दूसरे लोग आए जो हमारे अपने थे
उनसे किसी भी मामले में कम न थे
बड़े-बड़े कल-कारखाने 
चौड़ी-चौड़ी सड़कें तमाम हवाईअड्डे
जमींदारी ख़त्म खेतों की हदबंदी
रुपया कमाने की कोई पाबंदी नहीं
और राममंदिर का ताला भी खुलवाया
ढहाने वालों ने गुम्बद भी ढ़हाया
हमारे अपने लोगों ने कितनी सुंदरता से
सरकार चलाया और किस सरकार ने
दंगा और क़त्लेआम नहीं कराया
विकास तो अंग्रेजों से कम नहीं हुआ

राजनीति में बुरे लोग नहीं होते
तो लोगों को न तन ढकने के लिए 
एक जोड़ा वस्त्र मिलता
न जीने के लिए मुट्ठीभर अन्न
यह सब इसी देश में संभव है 
कि बुरे लोगों से जनता किस तरह
अच्छा काम कराती है

बुरे लोग ही
इस देश को आगे और अच्छा बनाएंगे
बस इस सरकार के जाने की देर है
आने वाले प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री
इस देश और प्रदेश को 
सोने की चिड़िया बनाने के लिए
जादू की छड़ी लेकर तैयार बैठे हैं
वह सोने की चिड़िया 
कितनी ऊँचाई पर उड़ेगी
जनता के हाथ आएगी या नहीं
यह सब एक मामूली कवि
कैसे बता सकता है!

------
पेशा
------
जैसे 
दाएँ हाथ का अपना पेशा है
उसी तरह बाएँ हाथ का भी अपना पेशा है

राजनीति करने वाले ही नहीं
साहित्य में अनीति करने वाले भी
इसी पेशे में हैं।

------
पार्टी
------
ओह 
सिर्फ़ अमुक पार्टी बुरी है
चरित्रहीन है क्रूर है हत्यारी है
तो इसे इसके चुनने वालों समेत 
ले जाओ जंगल में छोड़ आओ
जाओ जल्दी करो मैं मना नहीं करता

अमुक पार्टी ही
सच्चरित्र है पवित्र है परोपकारी है 
जनतारिणी है मोक्षदायिनी है
ईश्वर की गोद से उतरी पार्टी है तो इसे
अगले चुनाव में सरकार में लाने के लिए 
रूठे हुए लोगों को जंगल से बुलाओ
गला फाड़- फाड़कर पुकारो-चिल्लाओ
उन्हें मनाओ न मानें 
तो उनकी मर्जी की पार्टी बनाओ
मैं भर्ती होने के लिए तैयार बैठा हूँ।

----------------------
राजनीतिक रोटियाँ
----------------------
किसी वयस्क लोकतंत्र में
कोई आंदोलन हो प्रदर्शन हो अनशन हो 
उसमें पूरी शुचिता तो होती ही होगी
भला किसी जन आन्दोलन में राजनीतिक पार्टियां 
अपनी रोटी क्यों सेंकना चाहेंगी
अपने महान भारत में तो
बिल्कुल नहीं!

----------------
अकाट्य सत्य
----------------
नहीं-नहीं 
न्याय मूल्य सिद्धांत आदर्श वगैरह की 
बात करने वाले बेईमान नहीं हो सकते हैं

यह हमारे समय का अकाट्य सत्य है
क्यों साहित्य-प्रवर विचार-श्रेष्ठ आचार्य
बोलो शिष्यो बोलो 
बोलो अनुकरणकर्ताओ

अलबत्ता हाँ-हाँ पक्का
बेईमान तो इन पर शक करने वाले होंगे
क्यों साहित्य-राजन!

-------------------
वैचारिक शत्रुता
-------------------
शत्रुता
और राजनीतिक विवेक में
क्या फ़र्क है जानते हो वत्स

विवेक 
किसी भी व्यक्ति और दल के
गुण-दोष की बिना किसी भेदभाव के
पहचान करता है

इन्हें देखो 
शूकर नहीं हमारे समय के लेखक हैं
वैचारिक शत्रुता में कर क्या रहे हैं
शत्रु के नाश के लिए गंदा खा रहे हैं।


.........................................................................
ऐतिहासिक विदाई
----------------------
राजनीति
और साहित्य से
आदर्शों की विदाई

कब से शुरू हुई
और कब पूरी हुई
प्रक्रिया

कुछ याद है आपको
आचार्यप्रवर विचारप्रमुख
साहित्य-राजन!

-------------
हमारे बच्चे
--------------
महान विचार भी
आदर्शों की शवयात्रा में
अपने कंधे सौंप चुके हैं

अब ये
अपने हथियार 
और अपने विचारों का बोझ
रखेंगे कहाँ

बेचारे विचार
धूल में मिल जाएंगे
ऐसे खो जाएंगे कि फिर

सदियाँ ढूँढती रह जाएंगी
हमारी पीढियां हमारी नस्लें
ओह हमारे बच्चे कैसे जिएंगे।

-----
भय 
-----
ओह
इतना भय तो
मृत्युदण्ड में भी नहीं होता होगा

जितना
आज हिन्दी के लेखकों में है
वे अपनी मर्जी का लघुकार्य भी
नहीं कर सकते हैं

अपनी मर्जी का
लिखना और बोलना तो दूर
वे धारा के विरुद्ध छींक तक नहीं सकते हैं

जनमुक्ति का भार
और विचार का प्रभार
इन्हीं के सिर पर है 

ये पैदा हुए ही हैं
एक सुरक्षित और जोखिममुक्त 
गिरोह में रहने के लिए

ये देश के लिए जीने की
बात तो करते हैं लेकिन जी नहीं पाते हैं
इनके भय का नगाड़ा इनके पिछवाड़े 
बजता रहता है बजता ही रहता है।

---------------------------------------
हाथी के पैरों से कुचल दी जाएंगी
---------------------------------------
मेरे
राजनीतिक विचार
अपने समय के लेखकों से
रत्तीभर भी मेल नहीं खाते हैं

शायद
उन्हें भय है कि विचार की जगह
विवेक चुनेंगे तो उनके भविष्य को
गोली मार दी जाएगी

उन्हें भय है
कि उनकी कविताएँ
अपने समय के आलोचकों के
हाथी जैसे पैरों से कुचल दी जाएंगी

भला ऐसे लेखकों के विचारों से
किसी स्वाधीन लेखक के विचार
कैसे मेल खा सकते हैं।







बुधवार, 18 नवंबर 2020

दीया

- गणेश पाण्डेय

पहला दीया
उनके लिए जो देख नहीं पाते
दूसरा उनके लिए जो दीया को दीया कह नहीं पाते
तीसरा उनके लिए जो दीया की कोई बात सुन नहीं पाते

एक दीया हिंदी के उन भयभीत दोस्तों के नाम 
जिन्होंने मुझे चींटी की मुंडी के बराबर दोस्ती के लायक़ नहीं समझा

हिंदी के उन दुश्मनों के नाम भी कुछ दीये ठीक उनकी अक़्ल के पिछवाड़े
जिन्होंने हमेशा चूहे की पीठ पर बैठकर शेर की पूँछ मरोड़ने की ज़िद की

ये दीये उन तमाम अदेख दोस्तों की नम आँखों के नाम 
इस वर्ष हारी-बीमारी और हादसों में छोड़ गये जिनके प्रिय और बुज़ुर्गवार
चाहे मारे गये मोर्चे पर जिनके बेटे
पति और पिता और गाँव के गौरव

पृथ्वी की समूची मिट्टी और आँसुओं से बने ये दीये
क्यों नहीं मिटा पाते हैं, सदियों से बढ़ता ही जाता अँधेरे का डर

एक थरथराती हुई स्त्री के जीवन में 
क्यों नहीं ला पाते हैं जरा-सा रोशनी
ये दीये क्यों नहीं जला पाते हैं 
हत्यारों का मुँह उनके हाथ 
और लपलपाती हुई जीभ

ये दीये उम्मीद के सही, हार के नहीं
ये दीये बारूद के न सही, प्यार के सही
ये दीये क्रांति के न सही, प्रतीक सही
दोस्तो फिर भी जलाता रहूँगा 
ऐसे ही ये दीये कविता के दोस्त सही
इनकी लौ में है पलभर में 
हमारी आत्मा को जगाने की शक्ति 

देखो अरण्य के समीप 
ग़रीब-गुरबा की बस्ती में जलते दीये
कैसे काटता है एक नौजवान टाँगे से जलौनी लकड़ी
कैसे इनकी रोशनी में डालती है एक माँ बच्चे के मुख में कौर

कैसे कनखियों से देखती है एक युवा स्त्री 
अपने पति के शरीर की मछलियों को उसकी वज्र जैसी छाती

पैसे की मार से 
दुखी लोगों के लिए कुछ दीये
उस बाप की ड्योढ़ी पर एक दीया 
जिसे बेटियों की फीस की चिंता है

जलायें न जलायें 
चाहे बड़े शौक से भाड़ में जायें
उन आलोचकों के लिए भी कविता के छोटी जाति के कुम्हारों के बनाये कुछ दीये
जिनके घर मुफ़्त पहुँचायी गयी हैं गाड़ियों में भरकर बिजली की विदेशी झालरें

विश्वविद्यालयों, अकादमियों, संस्थानों, अख़बारों, पत्रिकाओं, प्रकाशकों 
और हिन्दी के बाक़ी दफ़्तरों में 
एक-एक दीया ज़बरदस्त

हिन्दी की उन्नति के नाम पर 
उसकी किडनी बेचकर मलाई काटने वाले 
हज़ारों हरामज़ादों के लिए भी

हिन्दी के जालसाज़ों के छल में 
फँसे हुए बच्चों के लिखने की मेज पर
जीवनभर जलने वाला कविता का 
यह दीया ख़ास

हिन्दी बोलने वाले 
विपन्न बच्चों के लिए उम्मीद का एक दीया
इस साल वे भी बने कलक्टर चाहे कमाएं दो पैसा

हिन्दी बोलने वाले बच्चे पैदा करने वाली माँ के बिना चप्पल के पैरों के पास
मेरी, तेरी, उसकी, सबकी गुज़र गयी 
माँ की ज़िदा याद के पैरों के पास
चाँदी की पायल की जगह 
एक ग़रीब कवि की ओर से 
मिट्टी का यह दीया।


      




   


                                                                   - गणेश पाण्डेय

सोमवार, 28 सितंबर 2020

खलनायक

- गणेश पाण्डेय

प्रिय छेदी
इस देश को तुम्हारे जैसे
खलनायकों की ज़रूरत है

हालाँकि यूपी के
सुल्ताना डाकू की कहानी में
काफ़ी कुछ झोल है
लेकिन तुम्हारी कहानी तो
जीती-जागती हक़ीक़त है
तुम कोई लुटेरे नहीं हो
कि लूट के माल से भलाई करो
पसीना बहाते हो नक़ली हीरो से
मार खाते हो फिर पैसा कमाते हो

तुम भी चाहते तो एक कानी-कौड़ी
ग़रीब-गुरबा और ज़रूरतमंद पर 
अपने ही मुल्क़ में 
सबसे परेशानहाल
लोगों पर ख़र्च नहीं करते
सदी का महाखलनायक बनकर
अपनी आरामगाह में मुँह छिपाकर
सो रहे होते अपनी रातों की नींद
और दिन का सुकून बर्बाद नहीं करते

मैं तुम्हारे बारे में
और कुछ नहीं जानता
सिवाय इसके कि फ़र्श से अर्श पर
पहुँचने की कहानी तुम्हारी है
इस कहानी में ख़ास बात यह 
कि एक खलनायक की देह में
किसी हातिमताई की रूह 
आ जाती है और खलनायक से 
नायकों जैसे काम कराती है

एक खलनायक की सख़्त देह में
एक-एक हिस्से से तड़प उठती है
अपने लोगों के लिए झुक जाती है
आँखें डबडब हो जाती हैं

हाथ आगे बढ़ जाते हैं
पैर उसी ओर चल पड़ते हैं
जिधर लोग सिर्फ़ अपने पैरों पर
खड़े हैं बैठे हैं बच्चों को लाद रखा है
पत्नी सटकर खड़ी है 
टूटी-फूटी चीज़ों की पोटली
पैरों के सुख-दुख पूछ रही है

प्रिय छेदी
छेदी सिंह तुमने शेर की तरह
छलांग लगाई है आसमान में
किसी फ़िल्मी चमत्कार की तरह
रेल के डिब्बों में बसों में जहाज से
अपने देशवासियों को भेज रहे हो
मुश्किलों की सबसे लंबी घड़ी में
अपने घर

छेदी मैं नहीं जानता
कि तुमने सबसे कमज़ोर और उपेक्षित
लोगों में किसे देखा भारतमाता को देखा
कि अपनी माता और पिता 
और बीवी-बच्चों को देखा
कुछ तो तुमने अलग देखा
जो तुम्हारे समुदाय के लोगों ने नहीं देखा
तुम भी चाहते तो प्रधानमंत्री कोष में
कुछ करोड़ डालकर चैन की नींद सोते
तुमने अपनी नींदें क्यों ख़राब कीं
अपने बच्चों का वक़्त और प्यार
दूसरों के बच्चों को क्यों दिया

छेदी तुम्हारा पर्दे का नाम है
हालाँकि जीवन में तुमने आसमान में
छेद करने जैसा बड़ा काम किया है
पर्दे से जो कमाया मज़बूर लोगों पर
लुटाया सुल्ताना डाकू की तरह
हातिमताई जैसा कारनामा किया

तुमने अपने देश 
और अपनी मिट्टी के कर्ज़ का
मूलधन ही नहीं सूद भी लौटाया
मैं नहीं जानता कि तुम्हारे नाम में
यह सूद क्यों लगा हुआ है 
और तुम्हारा नाम सोनू जैसा 
बहुत प्यारा और घरेलू क्यों है

मैं मुंबई में 
लंबे समय से रहने वाले
हिंदी के कवियों की तरह रहता
तो कब को कोरोना पर अपनी
लंबी कविताओं के साथ तुम पर भी 
एक लंबी कविता लिख चुका होता
सोनू सूद

हिंदी में
फ़िल्मी हीरोइनों पर 
कविता लिखने का रिवाज़ है
मधुबाला से लेकर वहीदा रहमान तक
और वहीदा से माधुरी तक पर रीझकर
लिखते हुए कवियों और कथाकारों ने
अपनी क़लमें तोड़ दीं
ये पर्दे की चमक-दमक पर मुग्ध थे
मैं हिंदी के पर्दे और आसमान का नहीं
ज़मीन का आदमी हूँ मेरे बच्चे

जानते हो
छेदी नहीं-नहीं सोनू नहीं-नहीं दोनों
हिंदी में फ़िल्म वालों को सितारा कहते हैं
लेकिन सितारे 
सिर्फ़ आकाश पर नहीं होते
धरती पर भी होते हैं मिट्टी में लोटते हैं
लोकल ट्रेन में सफ़र करते हैं
अपनी लोकल आत्मा को
कभी नहीं बदलते हैं 

सितारों की दुनियाँ विचित्र है
पर्दे का खलनायक जीवन में
नायक हो सकता है
और नायक खलनायक
आए दिन ख़ुलासे होते हैं
मासूम और सुंदर नायिकाएं 
खलनायिका निकलती हैं
और अर्थपूर्ण फ़िल्म बनाने वाले चरित्रहीन
जब तक इनका सच सामने नहीं आता
इनका नायकत्व और महानायकत्व
चेहरे पर मेकअप की तरह सजा रहता है

सोनू 
चाहे पर्दे पर ऐसे ही आजीवन 
बड़े से बड़ा खलनायक बने रहना
जीवन में चाहे जितनी मुश्किल आए
चाहे जितने कमज़ोर क्षण आएं
अपने खलनायक को पर्दे से बाहर
न निकलने देना नहीं तो मेरी यह कविता
बहुत रोएगी इसके शब्द टूट-फूट जाएंगे
ऐसे ही जीवन में नायक बने रहना

जो सितारे
पैदा धरती पर होते हैं
और रहते हैं आसमानों में
ज़मीन के लोग उन्हें कभी भी
अपना नहीं समझते हैं
उनके बीवी-बच्चों को कभी इस तरह
दिल से दुआएं नहीं देते हैं
प्यार नहीं करते हैं

हाँ 
क्रिकेट के कुछ
भगवान की तरह
फ़िल्मों के भी कुछ 
नौटंकी भगवान होते हैं
ये अपनी मिट्टी अपने देश के कर्ज़ का
न मूलधन चुका पाते हैं न सूद
सब तुम्हारी तरह कहाँ हो पाते हैं
सोनू सूद।







पत्र

 प्रियवर गणेश पांडे जी,

कुशल से होंगे। हालांकि यह कहना भी अब मात्र एक औपचारिक मुहावरा बनकर रह गया है। जो भी व्यथित और जरा भी संवेदनशील है, वह बाहर से भले ही सकुशल दिखे, मन से तो हमेशा बेचैन और द्वंद्वग्रस्त ही रहता है। स्थितियां ही कुछ ऐसी हैं। जो दुनियादार हैं, वे स्थितियों में खुद को ढालकर अपने मन को समझा लेते हैं, अवसर के मुताबिक राह पकड़ लेते हैं। लेकिन जो स्थितियों की भयावहता, अमानवीयता, असहिष्णुता के बारे में सोचे बिना नहीं रह पाते-प्रायः उनकी नियति होती है - अकेलापन।

आपको वर्षों से लिखते-पढ़ते देख रहा हूं। इधर थोड़ा-बहुत ह्वाट्सएप, फेसबुक जैसे माध्यमों से थोड़ी-बहुत वाकफियत हो गयी है। फेसबुक पर भी आपकी चिंताओं से परिचित होता रहता हूं। आपकी चिंताओं में अपने को भी शामिल पाता हूं। अपने-अपने अकेलेपन के अंधेरे में, यह शामिल-पन का भाव कभी-कभी उम्मीद के जुगनुओं की तरह जग-मगा उठता है। कुछ साथी - कहीं भी हों, कितनी भी दूर- पर हैं तो, जो अब भी सोचने और महसूस करने की क्षमता बचाकर रखे हुए हैं। यह भी हम-आप जैसों के रचनात्मक सहारे के लिए कम बड़ी बात नहीं है।

आपने 2 अक्टूबर वाली पोस्ट में लिखा-‘ साहित्य में अंधेरा फैलाने वाले, आज गांधी पर प्रकाश डालेंगे!‘ यह विडम्बना यों तो मात्र साहित्य की नहीं, राजनीति-समाज-चिंतन वगैरह सभी क्षेत्रों की है, लेकिन आपने साहित्य का उल्लेख किया तो इसका मर्म मैं समझ सकता हूं। निराला ने ‘सरोज-स्मृति‘ में लिखा- ‘ मैं कवि हूं, पाया है प्रकाश! ‘ यह कोई व्यक्तिगत दंभ नहीं था। यह कवि होने या साहित्यकार होने की सबसे सारगर्भित परिभाषा थी। कवि होना गहरे अर्थो में ‘प्रकाश प्राप्त‘ होना है। प्रेमचंद ने भी राजनीति से नहीं, साहित्य से ही ज्यादा आशा की थी-‘साहित्य राजनीति के आगे-आगे चलने वाली मशाल है।‘ लेकिन आज ‘प्रकाश‘ और ‘मशाल‘ जैसे शब्दों को हमारे तथाकथित कवि और साहित्यकार ही अर्थहीन करते जा रहे हैं। राजनीति ने तो पहले ही इन शब्छों को मात्र चुनाव-चिह्न जैसा कुछ बनाकर रख दिया है। राजनीति में तो अंधेरा ही सर्वत्र अट्टहास कर रहा है। इस अट्टहास को ही प्रकाश की तरह बिखेरा जा रहा है। इस अट्टहास की चकाचौंध में प्रकाश का इतना भ्रम है कि आंखें चौंधियां जाती हैं। देखने की क्षमता ही जाती रहती है। और आपने इस विडम्बना की ओर ठीक ही इशारा किया है, गांधी के हवाले से। जिनको कुछ नहीं दिखता, वे ही सबकुछ देख लेने की डींग हांकते हैं। अंधता इतनी दंभी कि गांधी जैसा पुरुष-जो खुद अपनी आंखों से देखने पर विश्वास करता था, जिसने सत्य का प्रकाश पाने के लिए ‘सत्य का प्रयोग‘ करने की ठानी थी- उस पर अंधता प्रकाश डालने का दावा करती है।

मैंने कभी लिखा था,‘साहित्य एक प्रकार का रचनात्मक हठ है कि मनुष्य को सबसे पहले और सबसे आखिर तक सिर्फ मनुष्य के रूप में ही पहचाना जाए, न फरिश्ते के रूप में, न राक्षस के रूप में, न देवता के रूप में, न सिर्फ साधु या शैतान के रूप में।‘

गांधी को क्या मनुष्य के रूप में सचमुच हम अभी तक पहचान सके हैं? हमने मूर्तियां बना दीं, न्यायालयों और सरकारी दफ्तरों में उनके फोटो टांग दिए। इन सब रूपों में आज गांधी आज कितने दयनीय हो उठे हैं कि उन्हीं की फोटो के नीचे बैठे अधिकारीगण कैसे-कैसे स्वार्थ-लिप्सा भरे कारनामों को अंजाम दे रहे हैं।

गांधी को इस दयनीयता से क्या सिर्फ उन पर कविताएं लिखकर उबारा जा सकता है? है कोई ‘प्रकाश प्राप्त‘ कवि जो उनकी इस दयनीयता को सवमुच देख सके? महसूस कर सके? गांधी का अनुसरण करने-कराने का उपदेश देने वाले हर क्षेत्र में हैं। साहित्य में भी। पर गांधी बेचारे ऐसे अनुसरणकर्ताओं से बचने के लिए छिपते-छिपाते, टाट वाले बोरे में अपना चेहरा ढके चुपचाप मुकित्बोध की कविता में चले गए हैं।

सच पूछिए तो अब ‘अनुसरण‘ या ‘अनुयायी‘ जैसे शब्द पाखंड का पर्याय हो गए हैं। कोई किसी का अनुसरण नहीं करना करना चाहता है, सिर्फ अपने-आपके सिवा। अब अनुयायी होना नहीं, पिछलग्गू होना फिर भी कुछ अर्थवान शब्द है। पिछलग्गू ऐसे व्यक्तियों का, जो लाभ पहुंचाने की स्थिति में हों। थोड़ी ख्याति मिल जाए, पुरस्कार या उपाधि मिल जाय-बस इतना ही अभीष्ट है। आज के लेखक की महत्वाकांक्षाएं भी बड़ी क्षुद्र हैं। वह अपनी क्षुद्रता में अमर होना चाहता है।

ऐसी अमरता को हम-आप क्यों चाहें? क्योंकि हमारे लिए तो यह जीते जी मर जाने के समान है। ऐसे में तो अच्छा है, कबीर की तरह रहें-मेरो मन लागा ठाठ फकीरी में! हम साहित्य के फकीर बने रह सकें, यही कामना हमारे लिए ठीक है।

अभी इतना ही।

हां, इतना और कि ज्यादा शिकायती होने में वक्त जाया न करें। हर स्थिति में जितना रचनात्मक हो सकें, रहें।

आपकी सक्रियता और सार्थक चिंताओं में आपका सहभागी-

राजेंद्र कुमार


नोट : इलाहाबाद से वरिष्ठ लेखक राजेंद्र कुमार जी का  पत्र