मंगलवार, 4 मार्च 2014

कहना जरूरी है...

-गणेश पाण्डेय

मित्रो, उदय जी एक दिन एक पत्रिका में छपे एक चित्र के आधार पर ब्राह्मणवाद (ब्राह्मणों) पर बहुत नाराज थे। मैंने उनके  स्टेटस पर एक छोटी-सी टीप में कहा-‘ मुझे सिर्फ ब्राह्मणवाद के बारे में कहना है। साहित्य में ब्राह्मणवाद सिक्के का एक पहलू है और ठाकुरवाद दूसरा पहलू, दोनों के बिना हिन्दी का सिक्का चलता ही नहीं, बल्कि सच तो यह कि इस सिक्के का एक तीसरा भी पहलू है जिसे कायस्थवाद भी कहते हैं। इधर कुछ और जातियाँ हैं, जिनके गुट दिखते हैं। गौर करने पर कई और पहलू निकल आयेंगे। साहित्य के भ्रष्टाचार के महासागर में सभी जातियों की भ्रष्ट नदियां पहुँचती हैं। दृश्य तो ऐसे भी होते हैं, अपनी ही जाति का लेखक अपनी ही जाति के लेखक का विरोध करता है, दूसरी जाति के लेखक को प्रमोट करता है, सवाल यह कि साहित्य में यह प्रमोशन और पुरस्कार का भ्रष्टाचार क्यों ? बेशक आप ब्राह्मणवाद का विरोध अपने तईं कीजिए, लेकिन क्या ही अच्छा हो कि इसे आप व्यापक साहित्य-सत्तावाद के विरोध से जोड़ दें। मुझे पूरा विश्वास है कि आप भी ऐसा ही सोचते होंगे।’ इस टीप को उदय जी ने पसंद नहीं किया, जबकि छः मित्रों ने उसे पसंद किया।
आज फिर उनके स्टेटस पर अपनी तमाम कृतियों के अनुवाद के विवरण के साथ मोहनदास के जर्मन अनुवाद को श्रेष्ठ अनुवाद के रूप में चयनित होने की खबर है। यहाँ तक भी खराब नहीं। हालांकि यह प्रश्न तो बनता ही है कि इस वजह से उदय जी अपने को किन-किन लेखकों से बड़े लेखक के रूप में देखना चाहते हैं ? क्या प्रेमचंद से लेकर विनोक कुमार शुक्ल तक को अपने से छोटे कथाकार के रूप में देखना चाहते हैं ? शायद वे ऐसा नहीं चाहते होंगे ? ‘मोहनदास’ को तो मैंने भी पढ़ा है। उसका अनुवाद नहीं हुआ तो क्या उसका कोई मूल्य नहीं रहता ? क्या वह अनुवाद होने मात्र से अच्छी कृति है ? वह बहुत अच्छी कृति है तो क्या हमारे समय लिखी गयी दूसरी कथाकृतियाँ उससे अच्छी नहीं हैं ? उदय जी अच्छा लिखते हैं, जितना अच्छा लिखते हैं, उतना पढ़े भी जाते हैं, लेकिन क्या केवल उदय जी ने ही साहित्य में संघर्ष किया है, दूसरों ने नहीं ? केवल उनका ही विरोध हुआ है, दूसरों का नहीं ? उन्होंने आज अपने उसी स्टेटस में किसी ब्राह्मणवादी लेखक और उसके गुमाश्तों को लक्ष्य करके लिखा है कि ‘अब हिंदी का घनघोर ब्राह्मणवादी लेखक और उसके लंपट गुमाश्ते जितना भी ‘हेट-कैंपेन’ चलाएँ, अपना तो एक रोयां भी नहीं हिलता।’ 
मित्रो, दो-तीन बातें हैं। पहली बात तो यह कि उदय जी का संघर्ष यदि दिल्ली में न रहकर गोरखपुर या अपने गृहजनपद इत्यादि राजधानी से दूर किसी छोटे शहर में रहकर किया गया होता तो उन्हें जितने विकल्प मिले, पत्रिकाएँ और प्रकाशक निकट मिले और बहुत से सहयोगी लेखक मिले, क्या यह सब उन्हें  मिल पाता ? यह कोई आरोप नहीं है। सिर्फ एक जिज्ञासा है। आशय यह कि सिर्फ उनका ही संघर्ष, बाकी का साहित्य में नौकाविहार नहीं है। यह ठीक बात है कि अधिकांश लेखक किसी न किसी मठाधीश की गोद में बैठकर अपनी अधिकांश यात्रा पूरी करते हैं। मुझे उदय जी के बारे में अधिक कुछ भी पता नहीं है। किसने-किसने उन्हें एक अच्छा लेखक बनाने में उनकी मदद की ? किसी ने मदद की भी या नहीं ? कई लेखक ऐसे अभागे हैं, जिनका विरोध दूसरी जाति के लोगों ने कम खुद उनकी जाति के लोगों ने अधिक किया है। उदय जी का विरोध कोई ब्राह्मण करता है, यह खबर नहीं बनती, खबर तब बनती जब ‘‘सभी’’ ठाकुर लेखक विरोध करते ? साहित्य में उदाहरण ऐसे भी हैं कि ब्राह्मणों ने ही ब्राह्मण लेखक का तीव्र विरोध किया। गुरुओं ने अपने ही बच्चे का कत्ल किया-

‘पहला बाण 
जो मारा मुख पर
आँख से निकला पानी। 
दूसरे बाण से सोता फूटा
वक्षस्थल सें शीतल जल का।
तीसरा बाण जो साधा पेट पर
पानी का फववारा छूटा।
खीजे गुरु 
मेरी हत्या का कांड करते वक्त
कि आखिर कहाँ छिपाया था मैंने
अपना तप्त लहू।’

निश्चय ही उदय जी का भी विरोध हुआ होगा, संभव है कि गुरुओं ने भी किया हो, समकालीन लेखकों ने किया हो। जाहिर है कि प्रतिभाओं का विरोध तो होता ही है। विरोध में ही कुंदन और निखरता है। भारतेुंदु के बारे में रामविलास जी का कथन है- ‘भारतेंदु का विरोध दोनों ओर से हुआ-सरकार की ओर से और समाज के प्रगतिविरोधियों की ओर से भी। लेकिन जितना ही विरोध हुआ उतना ही हरिश्चंद्र का वीरभाव कुंदन की तरह और निखर उठा।...तीन शताब्दी पहले जैसे काशी के पुरोहितवर्ग ने तुलसीदास को कष्ट दिया था, उसी तरह हिन्दी साहित्य के नये अभ्युदय-काल में उसने भारतेंदु को लोक-बहिष्कृत किया था। जिस तरह तुलसीदास ने ‘‘धूत कहौ अवधूम कहौ रजपूत कहौ जुलहा कहौ कोऊ’’ लिखकर दुष्ट विरोधियों को मुँहतोड़ जवाब दिया था, उसी तरह भारतेंदु ने घोषणा की थी कि वे विरोधी कीड़़ों  के सिर पर पाँव रखकर आगे निकल जायेंगे।’- रामविलास शर्मा का यह कथन पिछले दिनों गोरखपुर में एक व्याख्यान देते समय तक मेरे जेहन में गूँजता रहा। जाहिर है कि पहले के और बाद के और कई कवि भी याद आये। याद तो आज का पूरा हिन्दी समाज आया। यह प्रश्न बेचैन करता रहा है कि ‘आज के सभी कथित बड़े कवि’ लोक-बहिष्कृत तो हुए ही नहीं, बल्कि लोक-पूजित हैं। पुरस्कृत तो इतने की पुरस्कार भी शर्मा जाये। आश्चर्य यह कि उनका तनिक भी विरोध नहीं हुआ। चक्कर क्या है ? क्या इतिहास में कुछ गड़बड़ है या हमारे समय में ? कहीं ऐसा तो नहीं काशी की तरह कुछ और भी शहर हमारे समय में हैं ? यह मानने के लिए मन नहीं कर रहा है कि हमारे समय में कुछ कवि लोक-बहिष्कृत या उपेक्षित नहीं होंगे या आगे नहीं होंगे। इसलिए उदय जी हों या कोई भी जी, यदि प्रतिभा है तो विरोध तो होगा ही भाई। विरोध का विरोध छोटे दायरे में रहकर नहीं किया जा सकता। जरूरी है कि हम अपने विरोध को व्यापक बनाएँ। उन सभी लेखकों के लिए लड़ें जो आज कहीं किसी शहर में तन्हां है। अकेले लड़ रहे हैं। हिन्दी के फिसड्डियों की फौज से टकरायें। हिन्दी के लुटेरे आज देश भर की अकादमियों को लूट रहे हैं, जिनमें दिल्ली की अकादमी भी शामिल है, विरोध को वहाँ तक ले जाना चाहिए। साहित्य की अकादमियों में और उनके आयोजनों में अपात्रों का मेला लग रहा है।
      दूसरी बात यह कि रोयां वाली बात जंची नहीं। रोयेंदार लेखक क्या सिर्फ उदय जी ही हैं ? और भी लेखक हैं जो रोयेंदार हैं। जिनका रोयां दूसरे हिला नहीं पाते, पर वे अपना रोयां दिखाते नहीं। कुछ चीजें छिपा कर रखने के लिए होती हैं। यह कहने की बात नहीं है भाई। अपना काम करना जरूरी है, अच्छा लिखिये और विरोध की आग को दूर तक ले जाइए। तीसरी बात यह कि यह तय कर लेना चाहिए कि आप अपने समय में सबसे अच्छा लिखना चाहते हैं या सबसे बड़ा दिखना चाहते हैं  या सबसे ज्यादा पुरस्कार चाहते हैं ? सबसे ज्यादा और बड़ा पुरस्कार पाने के लिए अच्छा लिखना कतई जरूरी नहीं है, होता तो मेरे या आपके आसपास के लोग उन पुरस्कारों को नहीं पाते। क्या यह बड़ी बात नहीं कि आपकी किताबों को लोग पढ़ते हैं ? यह काफी नहीं ? कहना जरूरी है, इसलिए विनमंतापूर्वक कुछ कहा है। किसी का दिल दुखाना उद्देश्य नहीं है। मोहनदास को मैंने भी पढ़ा और पसंद किया है, पर क्या मेरे जैसे असंख्य पाठको का पढ़ना महत्वपूर्ण नहीं है, सिर्फ उसका अनुवाद इत्यादि महत्वपूर्ण है ? उदयजी निश्चत रूप से मुझसे बड़े लेखक हैं, मेरी कोई बात पसंद न आयी हो तो माफ करेंगे।

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

मारु मारु स्रपनी निरमल जलि पैठी

-गणेश पाण्डेय

          काफी कुछ कह चुका हँू, फिर भी लगता है कि कुछ नहीं कहा है या कुछ सुना ही नहीं गया है। स्वमुख जैसे मेरा है, उसी तरह आँख और कान तो दूसरों का है, दिमाग तो खैर पक्का अपना-अपना होता है। इसीलिए दो दूनी चार को दो दूनी पाँच कहने वाले पैदा हुए। राजनीति ही नहीं, साहित्य में भी उच्चकोटि के उदाहरण मिल जायेंगे। एक कहेगा वाम अच्छा है तो दूसरा झट कहेगा कि नहीं जी देखो, उसमें ये नुक्स हैं,दूसरा कहेगा कि अजी दायाँ बाजू मजबूत है तो दूसरा कहेगा कि हटो तुम्हारे बाजू की हड्डी में अनगिन फ्रैक्चर है जी। एक कहेगा हमारी पार्टी इतनी साल पुरानी है तो दूसरा कहेगा कि सड़ गयी है तुम्हारी पार्टी। एक कहेगा कि देखो जी देश की सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार है, दूसरा कहेगा कि विकास जरूरी है। आशय यह कि सबके अपने-अपने विचार और निष्ठाएँ हैं। किसी को भ्रष्टाचार सूट करता है तो वह क्यों ईमान वाला बनेगा ? किसी को पुरस्कारपथ साहित्य का राजपथ या मुक्तिपथ (?) लगता है तो वह क्यों पुरस्कार की माया से बाहर निकलेगा ? साहित्य का दृश्य बड़ी निराशा पैदा करता है। जब लेखक बेईमानी के रास्ते को तजने के लिए तैयार नहीं होंगे तो भला राजनीति वाले क्यों तैयार होंगे ? जैसे राजनीति और पत्रकारिता वगैरह की प्रतिष्ठा पहले सेवा या मिशन के रूप में थी और अब सब व्यवसाय हो गया है, साहित्य भी राजनीति और पत्रकारिता के पीछे चलने वाली मशाल (?) हो गयी है। जब सार यही है तो ज्यादा माथापच्ची क्यों ? जाओ भाई तुम पुरस्कार का रास्ता पकड़ो, मुझे या जो भी चाहे उसे अपनी पगडण्डी ही भली, लेकिन क्या करूँ इस एफबी का, जहाँ इसके बारे में चर्चा-कुचर्चा जारी है।
          एक कवि के नाम पर एक नये पुरस्कार की घोषणा जल्दी ही हुई है और संयोग या दुर्योग कहें कि विमल जी ने अपने स्टेटस में पुरस्कारों का विरोध करते हुए रचना पर बल देने की बात कही है। बात तो बुरी नहीं, पर युवा लेखक अशोक पाण्डेय ने इसे वेणुगोपाल के नाम पर शुरू होने वाले पुरस्कार से जोड़कर तीव्र प्रतिक्रियाएँ दी हैं, जिन्हें मैं दुर्भावनापूर्ण तो नहीं लेकिन युवकोचित नाराजगी जरूर कहूँगा। दुर्भावनापूर्ण इसलिए नहीं कहूँगा कि उस स्टेटस को हाल में शुरू किये गये पुरस्कार से जोड़कर देख लिया गया है। उस स्टेटस में किसी लेखक का नाम नहीं था, यदि ऐसा होता तो क्या मैं कुछ नोट्स लगाता ? यह तो विमल कुमार ज्यादा बेहतर बता सकते हैं कि उनका स्टेटस अनिल जनविजय की घोषणा से जुड़ा  है या नहीं। विमल जी ने उसे लक्ष्य करके ऐसा कुछ कहा होगा, ऐसा होना तो नहीं चाहिए, लेकिन ऐसा कुछ है तो निश्चय ही उचित नहीं है। कोई भी पुरस्कार बुरा तब होता है, जब उसे धंधा बना दिया जाता है, जो अभी शुरू होने जा रहा हो उसके बारे में बुरा कहना तो दूर, बुरा सोचना भी उचित नहीं है। पुरस्कारों के विरोध में गुस्सा इस बात पर उतना नहीं है कि ये दिये क्यों जाते हैं या किसी का सम्मान क्यों किया जाता है, बल्कि गुस्सा इस बात पर है कि ये काजल की कोठरी में तब्दील क्यों हो चुके हैं ? देखने में यह भी आ रहा है कि कई बार खराब लेखकों को पुरस्कार देने के बाद किसी अपेक्षाकृत अच्छे लेखक को पुरस्कार देकर पुरस्कार का सम्मान बचाया जाता है। पहले नकलीनाथ को दिया जाता है, बाद में असलीनाथ को। यहां अशोक ने एक दूसरा पक्ष उपस्थित करके अपनी नाराजगी दर्ज की है और ध्यान खींचा है। जहां तक अनिल जनविजय की घोषणा की बात है, उसके बारे में यह विदित है कि चयन समिति के सारे नाम लेखकों के हैं। उसमें कौन लेखक नहीं है ? लीलाधर मंडलोई, राजेश जोशी, अनिल जनविजय से लेकर अशोक पाण्डेय तक, सब लेखक हैं भाई। विमल कमार यदि वेणुगोपाल पुरस्कार पर कुछ नहीं कह रहे थे तो उन्हें बहस की जगह सीधे अशोक से यह कह कर शुरू में ही अलग हो जाना चाहिए था कि उनकी मंशा यह नहीं थी। 
         जहाँ तक मैं जानता हूँ, विमल जी अशोक से उम्र में बड़े हैं, कवि भी अशोक से छोटे नहीं है। यहाँ बात साफ कर दूँ कि हमारे समय में छोटा-बड़ा जैसा कुछ विभाजन मुझे नहीं दिखता है, कई बार अपने समय में जिन्हें बड़ा कवि कह दिया जाता है, उनकी कविताएँ हरगिज बड़ी कविताएँ नहीं होती हैं। यह दूसरी बात है। विमल जी हों या कोई गोबर गणेश  हों या कोई बुरे से बुरा आदमी, वह पुरस्कारों का विरोध करता है तो उसकी आवाज को चुप करा देना सही विकल्प नहीं है। अच्छा विकल्प तो यह हो सकता कि अपने पुरस्कार को सचमुच साहित्य की राजनीति से मुक्त करके एक आदर्श पुरस्कार के रूप में प्रतिष्ठित करने की कोशिश की जाय। यह काम अशोक जैसे ऊर्जावान लेखक नहीं करेंगे तो क्या चुके हुए लेखक करेंगे ? जरूरी यह है कि अशोक को अब प्रकाशन की तरह पुरस्कार के क्षेत्र में भी जरूरी हस्तक्षेप करना चाहिए। पुरस्कार को मिसाल बनाने के बड़े काम में लग जाना चाहिए। इस काम में खतरा कम नहीं है। यह काम तब संभव होगा, जब हम अपने निकट के मित्रो का चुनाव भी सावधानीपूर्वक करें। विमल ने यदि लक्ष्य करके कहा हो तो भी उनकी बात का जवाब अपने काम से देना ज्यादा अच्छा होगा। समय दूसरा है। पुरस्कार के काम लगे लोगों के लिए अपना सम्मान बचाना बहुत मुश्किल है। इसलिए यदि पुरस्कारवाद के पक्ष में रहना है तो उठने वाली उँगलियों का अनुभव पहले ही कर लेना चाहिए। यह समय पुरस्कारवाद और गैरपुरस्कारवाद के बीच चुनाव का भी है। गौर करने की बात है कि पुरस्कार के तट पर वाम और दक्षिण, सब साथ-साथ दूषित जल ग्रहण करते हैं।
          हाँ, यह कहना भी जरूरी है कि कई पुरस्कार लेने के बाद पुरस्कारों के खिलाफ बोलने पर ऐसी दिक्कत आती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि एक बार पुरस्कार लेने के बाद आजीवन पुरस्कार का मैला ढ़ोने के लिए कोई अनुबंध कर लिया गया। यह अलग बात है कि मुझे साठ के करीब पहुँच कर भी अब तक किसी लखटकिया या कौड़ी-सौडी के पुरस्कार-वुरस्कार के दर्शन नहीं हुए। सच तो यह कि स्वप्न में भी पुरस्कार के दर्शन नहीं हुए। हुए होते तो क्या जो थोड़ी-बहुत आग मुझमें कभी-कभी दिख जाती है, रह पाती ? कह नहीं सकता कि तब क्या होता ! शायद अच्छा हुआ कि लेखक जीवन की शुरुआती ठोकर ने मेरा रास्ता बदलकर रख दिया। क्या कोई साठ के आसपास आकर क्या सचमुच अपना रास्ता बदल पाएगा ? क्या जिस लेखक को पुरस्कार नहीं मिला वह घटिया लेखक होता है ? आज की तारीख में जिन्हें पुरस्कार नहीं मिला है, उनकी कविताएँ पुरस्कार पाने वाले कवियों से खराब हैं ? ऐसे कई कवि मिल जायेंगे। बहरहाल यह दूसरी बात है। पहली बात यह कि पुरस्कारों का विरोध क्यों ? वजह साफ है, बेईमानी ही नहीं साहित्यिक दासता भी। समूची पृथ्वी से दासता का नाश चाहने वालों में इस दासता से मुक्ति की आकांक्षा क्यों नहीं ? मेरा तो एक लेख ही है ‘साहित्यक मुक्ति का प्रश्न उर्फ इस पापागार में स्वागत है संतो’। सच तो यह कि कुछ दिनों के लिए गद्य से दूर रहना चाहता हूँ, पर हो कहाँ पाता है। एक सचमुच के बडे़ कवि कह गये हैं कि गद्य जीवन संग्राम की भाषा है। फिर भी मेरा मानना है कि पुरस्कारों ने रचना और आलोचना की भलाई कम और दोनों का कबड़ा बहुत-बहुत किया है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि कुछ-कुछ स्वदेशी आंदोलन की तरह पुरस्कारों का बहिष्कार हो या कम से कम पुरस्कारों के भ्रष्टाचार का विरोध तो जरूर हो। अंत में संत कविता की इस पंक्ति से अपनी बात खत्म करूँगा- मारु मारु स्रपनी निरमल जलि पैठी  (मारौ मारौ स्रपनी निरमल जल पैठी )।

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

मोढ़े की परिक्रमा

- गणेश पाण्डेय

प्रिय विमलेश, उन प्रतिभाओं के साथ यह दिक्कत अक्सर होती, जिन्हें धारा के विरुद्ध चलने की बीमारी होती है। धारा के संग बहने वाली प्रतिभाएँ सुख की नींद सोती हैं और यश के सूर्योदय में जागती हैं। जैसे मुहावरा है कि कुछ लोग मुँह में सोने का चम्मच लेकर पैदा होते हैं, उसी तरह कहते हैं कि कुछ लोग अपने भाग्य में लट्ठ लेकर पैदा होते हैं। आज हिंदी के अधिकांश लेखक, जिनमें उच्चशिक्षा संस्थानों के शिक्षक भी शामिल हैं, धारा के साथ सुखपूर्वक जीवन जीते हैं। तनिक-सा यश, तनिक-सा पुरस्कार और तनिक-सी चर्चा का सुख, उनके जीवन का उद्देश्य है, उनकी रचना का ध्येय है। ऐसे लेखक मर जाने बाद कुछ भी नहीं छोड़ना नहीं चाहते हैं, ये जीते जी अपना श्राद्ध करके जाना चाहते हैं। साहित्यिक श्राद्ध का आशय पंडिज्जी वाला कर्मकांड नहीं है, दूसरा कर्मकांड है, साफ-साफ बता दूँ कि यह कर्मकांड अपने ऊपर किताब लिखवाने और पत्रिकाओं का अंक निकलवाने का है। हमारे बीच के कई लोग ऐसा खूब करते हैं। चाहे किसी पंडिज्जी पर किताब संपादित करनी हो चाहे किसी बाऊसाहब पर। एक आलोचक ने तो यहाँ से साठ का होने पर बाकायदा एक पत्रिका का अंक ही निकलवाया, एक ने अपने काम पर एकाधिक किताब छपवाया। सबके नाम हैं, पर मेरा उद्देश्य किसी को अपमानित करना नहीं है, सिर्फ प्रवृत्ति को बताना भर है। कहना यह कि ये लोग बहुत डरे हुए लोग होते हैं और ऐसे लोगों के साथ सिर्फ और सिर्फ डरे हुए लोग होते हैं, सब यहाँ देखा हुआ है। ऐसे ही लोग उच्चशिक्षा संस्थानों में भी होते हैं। इसीलिए उच्चशिक्षा संस्थानों को प्रतिभाओं की कब्रगाह कहा जाता है।
        कोई चाहे तो यहाँ से लेकर देश के अनेक हिस्सों का उदाहरण सामने रखकर सीधे किसी कवि का नाम लेकर कह सकता है कि अमुक जी भी प्रोफेसर रह चुके हैं और अच्छे कवि कैसे हैं ? तो मैं विनम्रतापूर्वक कहूँगा कि भाई अच्छे कवि तो लाखों में हैं, यह पूछिए कि बड़े कवि हैं ? मैं अपनी समझ के आधार पर आज जब राजधानी के प्रथम पंक्ति के तीन कवियों को देखता हूँ तो उन्हें बड़े कवि के रूप में नहीं देख पाता हूँ। हाँ अच्छे और मजे हुए कवि हो सकते हैं। बड़े कवि मुझे इनसे पहले की पीढ़ी में दिखते हैं। यह उल्लेख सिर्फ इसलिए कि कह सकूँ कि कवि का जीवन जितना बड़ा होता है, उसमें टकराने का भाव जितना होता, उससे वह कवि बड़ी कविता की दीवार फाँद पाता है। जीवन में कोमलता और पग-पग पर समर्पण जितना अधिक होगा, कविता ओज से उतनी ही दूर होगी। यह ओज कवि स्वभाव का जब अंग हो जाता है, तब उसकी कविता में ठीक से भिनता है। कहीं-कहीं तो मुहावरे में झलकता है। वीरगाथाओं का ओज मुझे सच्चा ओज नहीं लगता। जैसे दिहाड़ी पर ओजप्रदर्शन किया गया हो। जीवन का खुरदुरापन अच्छी कविता के लिए जरूरी है। जाहिर है कि मँजी हुई कविता के लिए जरूरी नहीं है। मँजी हुई कविता तो अतिशय अभ्यास और बाहर की कविताओं की नकल से खूब बन सकती है।
          असल में विमलेश , कहना यह है कि अपनी संस्था के माहौल से दुखी होकर दूसरी जगह जाने के लिए हड़बड़ी में नहीं सोचना चाहिए। जाना ही चाहते हो तो ऐसी जगह जाओ, जहाँ कुछ कर सको। यह सब कहने के लिए भूमिका जरूरी है, इसीलिए कुछ संकेत किया है। इशारा यह कि आज का समय उन प्रतिभाओं के लिए बहुत बुरा समय है जो अपनी गर्दन तनी हुई रखना चाहते हैं, उन प्रतिभाओं के लिए यह समय बहुत अच्छा है जो गर्दन ही नहीं कमर भी झुकाने की कला में पारंगत हैं, क्या पता ये पहले से सीखकर ही आते हों कविता की दुनिया में। आज साहित्य से जुड़े जितने भी संस्थान हैं, सब बीमार हैं। क्यों कोई अच्छा लिखकर फलाना-फलाना जी का जूता साफ करे ? इस संपादक, उस अध्यक्ष या उस आलोचक का चरणामृत पिये ? क्या दावे के साथ आज कोई प्रकाशक या संपादक कह सकता है कि अपने समय की सभी अच्छी कृतियों को छापा है ? जिस भाषा के साहित्य में लेखकों को प्रकाशकों की पतलून साफ करनी पड़े, उस भाषा के लेखक सीना फुलाकर की चलने के योग्य हैं ?
         लेखक ही नहीं, उच्चशिक्षा संस्थानों के अधिकांश प्राध्यापक भी अपने विभागाध्यक्षों की पतलून साफ करने से मना नहीं कर पाते हैं। सीधे-सीधे कड़े ढंग से यह कहने का आशय यह है कि पढ़ने और पढ़ाने का पेशा भी उतना ही गंदा है जितना दूसरे पेशे। तनिक भी यहाँ कम नहीं है। बड़े-बड़े मार्क्सवादी भी वही करते हैं जो मोदी की पार्टी के समर्थक करते हैं। मेरा एक छोटा उपन्यास ही है-‘अथ ऊदल कथा’, जिसका नायक ऊदल ढ़ँूढ़ता ही रह जाता है, उसे लड़ाई में साथ देने के लिए बड़े भाई के रूप में कोई आल्हा नहीं मिलता है। सब के सब रणछोड़दास मिलते हैं। या सत्ता के गैंग में शामिल लोग मिलते हैं। ‘गुरू सीरीज’ की कविता तो पढ़ने और पढ़ाने की दुनिया का दस्तावेज है ही। असली दस्तावेज है, कोई नकली दस्तावेज नहीं। इससे पहले कि तुम्हें अपनी एक कविता ‘‘एकता का पुष्ट वैचारिक आधार’’ पढ़वाऊ, यह बताना जरूरी समझता हूँ कि तीन बार स्कूटर से गिरा हूँ और अगर हेलमेट नहीं रहा होता तो आज बात नहीं कर रहा होता। जाहिर है कि दफ्तर के हिंदी पुत्रों से मिला तनाव ही था, जिसकी वजह से तीन बार जाने का दुर्योग बना। तब से आज तक तनाव अहर्निश। अब गाड़ी चलाता हूँ। कुछ बचे रहने के लिए। यह सब कहता नहीं, लेकिन इसलिए कह रहा हूँ कि यह न समझो कि लेखक हो तो पढ़ने-पढ़ाने की दुनिया में हिंदी के बुरे लोग हार लेकर स्वागत करेंगे। ऐसे ही बुरे लोग साहित्य की सत्ता को भी प्रिय होते हैं, ये बुरे लोग इसलिए साहित्य की सत्ता को प्रिय होते हैं कि इनकी जुबान पर कोई अप्रिय शब्द आ ही नहीं सकता है, ये किसी भी सत्ता को यह नहीं कह सकते कि सत्ता जी आपकी धोती या पाजामें में छेद है। कहना भी हुआ कभी तो कहेंगे कि वाह क्या डिजाइन है! तो प्रियवर कहना यह कि यह कहने वाले कहीं भी रहेगे तो सुखपूर्वक रहेंगे जो कह सकेंगे कि वाह क्या डिजाइन है! जो यह कहेंगे कि यह डिजाइन नहीं छेद है मान्यवर, उनके सिर हर जगह दीवारों से टकराते रहेंगे। मैं तो अक्सर लड़कियों को मना करता हूँ कि तुम कविता मत लिखो, लिखना है तो आलोचना लिखो। कविता और कहानी दोनों क्षेत्र आज लड़कियों के लिए बहुत असुरक्षित हैं। ऐसा इसलिए कि आज संपादक, आलोचक, प्रकाशक, सब संदेह के घेरे में हैं। बहरहाल यह दूसरी बात है इस पर फिर कभी। यहाँ सिर्फ इतना ही कि उच्चशिक्षा संस्थानों में हिंदी की दुनिया संदेह के घेरे में नहीं, बल्कि सीधे-सीधे अँधेरे में है। शेषफिर, लो ‘‘एकता का पुष्ट वैचारिक आधार’’ पढ़ो-

एक वीर ने उन्हें तब घूरा
जब वे सच की तरह कुछ बोल रहे थे ।

एक वीर ने उन्हें तब टोका
जब वे किसी की चमचम खाए जा रहे थे ।

एक वीर ने उन्हें तब फटकारा
जब वे किसी मोढ़े की परिक्रमा कर रहे थे ।

असल में
एक वीर ने दम कर रखा था
उनकी उस अक्षुण्ण नाक में
जिसे तख़्ते-ताउस की हर गंध
एक जैसी प्यारी थी ।

एक दिन वे एकजुट हुए
क्योंकि एकता का पुष्ट वैचारिक आधार उनके सामने था ।

पाठ्यक्रम समिति की उस बैठक में
लिया उन्होंने निर्णय
कि ‘सच्ची वीरता’ को
जीवन से निकाल दिया जाय ।

सच्ची वीरता’ = अध्यापक पूर्ण सिंह का महत्त्वपूर्ण निबंध ।

( दूसरे संग्रह ‘जल में’ से )

रविवार, 22 दिसंबर 2013

स्वतंत्रता क्या मनुष्य और पशु में भेद नहीं करती है ?

-गणेश पाण्डेय

        पिछले दिनों हुई एक खुदकुशी ने एफबी की दुनिया को भीतर से मथ दिया है। जिन्होंने इस दुनिया को सहसा छोड़कर जाने का फैसला किया, वे मेरे मित्र नहीं थे। मेरी मित्र सूची के कुछ मित्रों के मित्र थे। वे जो भी थे, अच्छे या बुरे, मैं उन्हें ठीक से जानता नहीं था, फिर भी उनकी खुदकुशी और उसके बाद लोगों की प्रतिक्रिया से दुखी था। कोई उन्हें निर्दोष बता रहा था तो कोई कह रहा था कि खुदकुशी दोषमुक्त होने की गारंटी नहीं। आज की दुनिया बहुत खुल गयी है, शायद इतनी कि जरा-जरा-सी बात पर भी विरोध का स्वर मुखर हो जाता है। यह अच्छी बात है। स्वागतयोग्य, पर इस खुलेपन की क्या हर बात स्वागतयोग्य है ?  
       पता नहीं क्यों, मुझे लगता है कि इधर कुछ खुलापन अधिक ही खुल गया है। लगता है कि अतिआधुनिकता का कोई नया क्षितिज यौन स्वाधीनता के रूप में हमारे समय में नये विचारसूर्य की तरह उदित हुआ है। जैसे कई हजार साल पुरानी सभ्यता और संस्कृति में ऐसी कोई चीज कभी थी ही नहीं और यह पहली बार हो रहा है। हो सकता है कि सचमुच इसमें कुछ बहुत नया हो। मनुष्यों की यौन स्वतंत्रता और पशुओं की यौन स्वतंत्रता में क्या अच्छा और क्या बुरा है, यह मेरे अध्ययन का विषय कभी नहीं रहा है। कविता में भी मैंने कभी बिहारियों की कविता को पसंद नहीं किया है, आज के हिंदी के राजधानी के एकाधिक डॉनों में से एक कवि चाहे बिहारी के नाती ही क्यों न हों, उनकी कविता को भी स्त्रीदेह के शब्दानुवाद की वजह से पसंद नहीं करता। खैर, यह और बात है। यहाँ खुदकुशी वाले व्यक्ति के उभयपक्ष की सहमति वाले तर्क को फर्श पर रखकर देखना चाहता हूँ। आखिर पुरुष क्यों विवाहेतर संबंध के लिए अधिक व्यग्र रहता है ? इस रिश्ते के लिए हमारे यहाँ विवाह जैसी संस्था क्यों बनी ? आजकल, कभी-कभार लिव-इन रिलेशन जैसी बातें क्यों सामने आ रही हैं ? यदि यह कोई बहुत तार्किक, स्वास्थ्यवर्धक और उच्च मूल्यों को प्रतिष्ठित करने वाली चीज है तो इसे ही क्यों न विवाह की जगह अनिवार्य बनाने का कानून बना दिया जाय ? यदि बुद्धिजीवी बंधुओं को लगता है कि इससे समाज एक कदम और आगे जाएगा, तो उसे आगे क्यों नहीं ले जाना चाहिए ? क्या अपवाद को समाज की मुख्यधारा मान लेना चाहिए ?
       अगर पितृसत्तात्मक समाज को मातृसत्तात्मक बनाना जरूरी है तो उसे बनाने की दिशा में कानूनी पहल क्यों नहीं ? पिता का नाम अभिलेखों से हटाकर माँ का नाम क्यों न दर्ज किया जाय ? वह भी क्यों, पशुओं की तरह बच्चे पैदा करके दूध पीने की उम्र के बाद उन्हें छोड़कर चल देने की परंपरा क्यों नहीं शुरू की जाय ? स्वतंत्रता का यह संसार क्या कम आकर्षक होगा ? सौफीसदी स्वतंत्रता। यौन संबंध बनाइए और तुरत भूल जाइए कि कुछ हुआ है। जैसे चाट की दुकान से बाहर हो जाते हैं, जाइए मंच पर खड़े होकर आराम से भाषण दीजिए। विचार झाड़िए। अगर यौनक्रिया इतनी स्वतंत्र है, तो फिर भ्रष्टाचार करने या घूस लेने की स्वतंत्रता क्यों नहीं ? और यह स्वतंत्रता भी कोई मूल्य है या स्वभाव का अंग ? कोई कानून-वानून ? स्वतंत्रता क्या मनुष्य और पशु में भेद नहीं करती है ? आखिर पशुओं की दुनिया में कोई विचार या मूल्य का संसार है क्या ? पशुओं के संसार में सेक्स का संबंध संतानोत्पत्ति की भावना से जुड़ा है ? मनुष्यों को वस्त्र पहनने की परतंत्रता आखिर क्यों, नंग-धड़ंग रहने की स्वतंत्रता क्यों नहीं ? मनुष्य क्यों एक घर बनाए, बच्चों को पढ़ाए-लिखाये, शादी-ब्याह करे ? यह सब करने वाले बेवकूफ हैं ? इसी विधि से पढ़-लिखकर बुद्धिजीवी बनने वाले लोग, कोई और समाज बनाना चाहते हैं या स्वतंत्रता को, स्वतंत्रता के लिए प्राण देने वाले दीवानों से अधिक समझते हैं तो अपने लिए एक अलग दुनियाक्यों नहीं बना लेते ?
        बहरहाल, आज मीडिया ने ऐसे तमाम मुद्दों को सामने लाकर तमाम पीड़ित स्त्रियों को न्याय दिलाने के लिए उम्दा कोशिश भी की है। कई प्रभावशाली लोग कानून की पकड़ में आ सके तो मीडिया भी कहीं न कहीं श्रेय पाने की स्थिति में दिखती है। मीडिया का काम सिर्फ सच को जस का तस दिखा देना ही नहीं होना चाहिए और न एक पक्ष बन जाना चाहिए, बल्कि एक शिक्षक की तरह दण्ड और पुरस्कार की आँख से चीजों को देखते हुए बनते-बिगड़ते समाज को भी गौर से देखना चाहिए। देखना चाहिए कि समाज को क्या नुकसान पहुँचाने वाली बात है और क्या उसे फायदा पहुँचाने वाली बात है ? मेरे कहने का आशय यह नहीं कि दो जन विशेष परिस्थिति में जैसे विवाह संबंध टूट गया हो या अधिक उम्र के कारण एक साथी दुनिया से चला गया हो और बच्चे न हों तो अकेलेपन की स्थिति में या ऐसे ही कोई बड़ा कारण हो तो किसी हमउम्र को जीवनसाथी की तरह साथ रखने में बुराई नहीं दिखती है, लेकिन इस तरह की गतिविधि को विवाह जैसी संस्था के विकल्प के रूप में देखना या हर उम्र के लिए उचित बताना या महिमामंड़ित करना मुझे कुछ ठीक नहीं लगता।
        यह एफबी का संसार कई उम्र के लोगों का संसार है, कई समाजार्थिक और बौद्धिक स्तर के लोगों का संसार है, ऐसे लोगों का भी संसार है, जो अपने माता-पिता को कम और बाहर के विचार की दुनिया के आधुनिक या उत्तर आध्ुनिक माता-पिता को अधिक देखते हैं। कभी-कभी लगता है कि एकदम चुप रहना चाहिए। वैसे भी इस विषय पर कुछ कहना नहीं चाहता था, लेकिन किसी तरह कुछ कह गया।


मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

बुखार में अखबार

-गणेश पाण्डेय 
   
परसों रात से बुखार है, पढ़ना-पढ़ाना फिलहाल परसों तक बंद। उसके बाद चंगा हो जाने की उम्मीद है। कंप्यूटर भी छू नहीं रहा था, लेकिन कल बहुत दिनों बाद, बल्कि सच तो यह कि कई सालों बाद मेरा हॉकर आखिर जनसत्ता ले ही आया और कुछ कहने से अपने को रोक नहीं पा रहा हूँ। जनसत्ता की तारीफ में कुछ नहीं कहना है, मेरी तारीफ से न तो वह और अच्छा हो जाएगा और बुराई करने से न तो और खराब हो जाएगा। जनसत्ता के बहाने शुद्ध पूँजीसत्ता वाले ( खुल्लमखुल्ला व्यावसायिक ) अखबारों के बारे में कुछ कहना है। हालांकि जनसत्ता भी पूँजी से जुड़ा अखबार है। बात जनसत्ता से ही करूँगा कि एक लंबे समय के बाद उसे को देखकर आँखों को सुख मिला। कोई कह सकता है कि अखबार भी क्या ऐसे होते हैं कि जिन्हें देखकर आँखों को सुख मिले ? जरूर ओम थानवी से गणेश पाण्डेय के रिश्ते अच्छे होंगे, इसलिए जनसत्ता की तारीफ कर रहे हैं। मित्रो, ओम जी से मेरा  कोई  रिश्ता नहीं है। मैं जनसत्ता की तारीफ कतई नहीं कर रहा हूँ, मैं तो उन अखबारों की बुराई करना चाहता हूँ, जिन्हें देखते ही आँखों में मिर्ची लगती है। जैसे तोते को मिर्ची पसंद है, आज के पाठकों को भी आँखों में मिर्ची की तरह लगने वाले अखबार क्यों बेहद पसंद हैं ? कहीं सारे के सारे हिंदी अखबारों के पाठक तोता तो नहीं हो गये हैं ?
              मित्रो, जैसे मुहावरा है कि पेट के रास्ते दिल तक पहुँचा जाता है, उसी तरह आँखों के रास्ते भी दिमाग तक पहुँचा जाता है। कोई अखबार, समाचार, विचार और विमर्श का जो परिसर पाठक के लिए उपलब्ध कराता है या अपनी प्रस्तुति उस पर केंद्रित करता है, तो उसे देखकर अच्छा लगता है। वह कितने रंगों में इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, वह कितना सलीके का है, इससे फर्क पड़ता है। दिनमान तो श्वेत-श्याम था, उसे उस समय के पाठक कितना महत्व देते थे ? राजनीति के बारे में तनिक भी जागरूक रहने वाले पाठक के लिए बेहद जरूरी पत्रिका थी, आज वैसी एक भी पत्रिका नहीं है। उस दौर के शोध-छात्रों और सिविल सेवा के प्रतियोगियों के लिए अनिवार्य पत्रिका थी, यह उसका अतिरिक्त गुण था। आज रंग तो हजार हैं, पर वह बात नहीं, जो उसमें थी। साप्ताहिक हिंदुस्तान और धर्मयुग का महत्व भी बहुत अधिक था। अखबारों में भी तब के अखबार इस तरह नहीं हुए थे। इधर व्यावसायिकता ने विचार और संवेदना को अखबारों से दूर किया है। उत्तेजना तो मिल सकती है, संयम और विवेक संपादकों में सिरे से गायब है। जनसत्ता शुरू से ही एक खास तरह के पाठकों के बीच लोकप्रिय रहा है। जाहिर है कि ये पाठक, सामान्य पाठकों की तुलना में कुछ अधिक विचारसम्पन्न रहे हैं। तब अखबार हर कोई नहीं खरीदता था, आज मोबाइल की तरह चाय की गुमटी से लेकर हर कोई खरीद सकता हैं। जिसे देखो वही अखबार पढ़ता है, पर पढ़ता क्या है या पढ़ना क्या चाहता है ? मुहल्ले के नेताजी की फेटो देखना चाहता है या मुहल्ले के कविजी की या आलोचक जी की फोटो देखना चाहता है ? क्या वह जानता है कि जिसकी तारीफ आज के अखबार में पत्रकार ने छापी है, उसमें कोई नुक्स नहीं है ? क्या सचमुच उस व्यक्ति ने अपने क्षेत्र में ढ़ंग का कोई काम भी किया है या खबर लिखने और फोटो छापने वाले ने बेईमानी या बेवकूफी की है ? क्या अखबारों का पाठक कभी सोचता है कि जिनकी फोटो अक्सर पत्रकार छापता है या जिनके बारे में निरंतर खबरें छापता है , उनकी कोई कमी कभी क्यों नहीं छापता है ? अखबारों का प्रसार इधर खूब बढ़ा है, क्या इसलिए कि लोग बिना यह जाने अखबार पढ़ते हैं कि वे इस अखबार को क्यों पढ़ते हैं ?
              मैंने मिर्ची की तरह आँख में लगने वाले अखबारों की बात है। बताता हूँ कि क्या है जो आँखों को चुभता है ? आज के युवा पाठकों ने पहले के अखबारों को नहीं देखा है, पहले की पत्रिकाओं को नहीं देखा है, लेकिन वे आज जनसत्ता को कभी देखें तो क्या यह फर्क नहीं कर पायेंगे कि उनके शहर का अखबार सब कितना खराब छापता है ? शायद वे फर्क नहीं कर पायेंगे, उनके लिए मुश्किल होगा। हाँ, विचारसम्पन्न युवा पाठक जरूर फर्क कर सकते हैं। मेरे शहर के कई अखबार मेरी आँख में मिर्ची की तरह आँख में लगते हैं। ये अखबार ऐसे हैं जैसे कोई ऐसी दुकान हों जिसमें हवाई जहाज से लेकर सुई तक सब रखा हो या केंचुए से लेकर डायनासोर तक सब रखा हो या सब बौने ही बौने लोग हों या सब अगड़मबाइस हो। जैसे ये अखबार न हों, किराने की दुकान का पर्चा हों। चाहें तो ये सब मेरी इस बात से नाराज होकर मेरा नाम तक अपने अखबार में .....क्षमा करें, बस दो मिनट, श्रीमती जी का आदेश है कि कल से कुछ खाया नहीं है तो पहले जरा-सा गरमागरम खिचड़ी हो जाए....हाँ तो मैं कह रहा था कि चाहे कोई मेरा नाम अपने अखबार में न छापे, पर क्या इस डर से यह कहना बंद कर दूँगा कि तुम्हारा अखबार बुखार की खिचड़ी नहीं है जो फायदा करे। यह तो पाठक की रुचियों को ही नहीं, उनके विचार और विवेक तंत्र को ध्वस्त करने की चीज है। हाँ- हाँ, अफीम भी कह सकते हैं, स्थानीयता का अफीम। हाँ, वही मुहल्लेपन का अफीम। आँचलिकता बुरी चीज नहीं है, पर प्रतिमान वही बनेंगे जो आपके अँचल का श्रेष्ठ होगा, आपका अखबार उसे ही बड़ा या श्रेष्ठ बताए जो सचमुच अपने लेखन या कार्यों से बड़ा या श्रेष्ठ हो, आप हरगिज-हरगिज गधे को घोड़ा या चूहे को शेर की तरह नहीं छाप सकते, आप ऐसा करते हैं तो आप भी उतने ही बेईमान हैं, जितने राजनीति के लोग। जिन अखबारों को देखता हूँ, सब बस दो मिनट में देखकर फेंक दिये जाते हैं। बस अपने दफ्तर से जुड़ी खबरें और कुछ जरूरी सूचनाएँ। क्या एक अखबार का परिसर सिर्फ यही है ? इधर कई राष्ट्रीय अखबारों ने अपने चरित्र को क्षेत्रीय बना लिया है। अंचल विशेष की छोटी से छोटी चीजों को प्रमुखता से छापना। न छापने लायक चीजों को भी प्रमुखता से छापना।
          जिस अखबार के संपादक में इतना विवेक न हो कि वह प्रति सप्ताह संपादकीय पेज पर अपनी फोटो पैंट की मियानी तक का छापता हो, ऐसे संपादक से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है। ऐसे संपादकों के स्थानीय संपादक कैसे-कैसे होंगे ? ऐसे ही संपादकों का समय है यह। ऐसे संपादक क्या छापेंगे ? सच तो यह कि इन्हीं वजहों से अब अखबार का एक-एक अक्षर चाटने वाले पाठक नहीं मिलेंगे, वे पढ़ें या संपादक जी की फोटो पैंट की मियानी तक फोटो देखें। आज की तारीख में अखबार में छपी रंगीन फोटो चाटने वाले लोग मिलेंगे। जब अखबारों में साहित्य और विचार का ढ़ंग का परिसर नहीं है, तो पढ़े ंतो क्या ? खबरें भी पहले चैनल पहुँचा देते हैं, उनका भी कोई खास आकर्षण नहीं। आखिर क्या बात है कि देरे से आने पर भी जनसत्ता आज अच्छा लगा ? इसका अर्थ यह नहीं कि आज का जनसत्ता अच्छा है या बहुत अच्छा है, मैं ऐसा कुछ भी नहीं कहूँगा, मैं बस इतना कह सकता हूँ कि रेड़ का पेड़ है। जहाँ कोई पेड़ नहीं होता है, वहाँ रेड़ का पेड़ ही बड़ा होता है। जनसत्ता में साहित्य जब मंगलेश जी देखते थे, तब भी उसकी सीमा थी। सब अच्छी कविताएँ नहीं होती थीं। आज भी जनसत्ता में काफी विमर्श ऐसा है, जो नखदंत विहीन होता है अर्थात जिनमें कोई जोखिम नहीं होता। राजनीति का सच फटकार कर कहना जैसे अखबार की नैतिकता है, उसी तरह अपने समय के साहित्य का सच कहना भी अखबार की नैतिकता है। संसद में जाने वाले दागी लोगों की ही नहीं, साहित्य और कला की अकादमियों की भी आलोचना करना एक अच्छे अखबार के लिए उतना ही जरूरी है। वह अखबार जो अपने साहित्य के परिसर के लिए जाना जाता हो, उसके लिए तो और भी जरूरी है। कहना और भी है, पर बुखार में अधिक बड़बड़ाना ठीक नहीं। अंत में यह कि मेरा बुखार तो दो दिन में ठीक हो जाएगा, पर हिन्दी के इन अखबारों और पाठकों का बुखार कब जाएगा ?














   


बुधवार, 27 नवंबर 2013

माँ नाम की किताब कभी पीछा नहीं छोड़ती...

-गणेश पाण्डेय

मित्रो, यह समय यों तो अपने आप में ही विचार और जीवन के विलक्षण द्वैत की वजह से , विचार से विश्वास के उठने का है, जिसके लिए कोई अन्य कारण ढ़ूँढने की जरूरत नहीं है, फिर भी कुछ और बातें हैं, जहाँ ध्यान आप से आप जाता है। कई बार देखने में आता है कि कट्टर मार्क्सवादी, एक समय के बाद मठ और मंदिर की शरण में चले जाते हैं। अचानक उन्हें दक्षिणपंथी संगठनों से प्रेम हो जाता है।
          बायें बाजू से प्रेम करने वाले प्रोफेसर लोग तक , पगहा तुड़ाकर दायीं ओर हरे चने के खेत में निकल जाते हैं। कई दृढ़ प्रगतिशील अपने बच्चों के शादी-ब्याह में पियरी धोती पहन कर वह सब करते हैं जो गैर मार्क्सवादी करते हैं। बड़े-बड़े वैज्ञानिक अपने मिशन की सफलता के लिए बाकायदा अनुष्ठान करते हैं। पूजा और विज्ञान के परिसर में ? बहुत से लोग रक्षा-सूत्र पहनते हैं। बहुत सारी बातें हैं। यह सब तो फिर भी कुछ कम है। बहुत से लोग गरीब होकर चोरी करते हैं, बहुत से लोग अमीर होकर चोरी करते हैं, क्या मार्क्सवादी और क्या गैर मार्क्सवादी ? बहुत से लोग दूसरे की सम्पत्ति, हिस्सा, कुर्सी, यश, पुरस्कार इत्यादि लूट लेते हैं। जहाँ अच्छे को बैठना चाहिए वहाँ बुरा बैठ जाता है। तमाम लोग विचार के आधार पर संगठन बनाते हैं और विचार से दगा करने वाले लोगों को उसमें शामिल कर लेते हैं। आयोजनों में कविता पाठ या कहानी पाठ कराते हैं।
      जल, थल और वायु सेना की तरह लेखकों की तीन-तीन सेनाओं जैसे तीन लेखक संगठनों के रहते हुए साहित्य की अकादमियों में दक्षिणपंथी कैसे पदारूढ़ हुए, कैसे सब अपने हाथ में ले लिया ? क्या कर रहे थे ये सब ? साहित्य का भाड़ झोंक रहे थे या साहित्य के दरबारों में चंपी कर रहे थे ? क्या इन नासमझों के एक बूँद पानी में या बिना पानी के ही डूब मरने के लिए काफी नहीं है ? कहने का आशय यह कि पतित कोई भी हो सकता है, बुरा होने से रोकना किसी किताब के हाथ में नहीं है। दुनिया भर में ‘पूँजी’ ही नहीं, महान धर्मों से जुड़ी बड़ी पूज्य किताबें भी हैं, पर क्या दुनिया से बुराई खत्म हो गयी ?
         एक दिन एक युवा लेखक ने मार्क्स का हवाला देते हुए कहा कि मार्क्स ने एक मजेदार बात कही थी-एक व्यक्ति के तौर पर कोई सर्वहारा उतना ही पतित हो सकता है, जितना कोई अन्य व्यक्ति और कोई पूंजीपति भी एक भला मनुष्य। सर्वहारा पतित से पतित हो सकता है, पर हम उसके साथ हैं तो इसलिए कि वह मुक्तिकामी। आज हमारे समय का बड़ा सवाल तो उन लोगों से जुड़ा है जो लोग इन आम लोगों को रास्ता दिखाने का धंधा करते हैं। जहाँ तक मैं समझ पाता हूँ, जनता के भ्रष्ट होने से समाज और व्यवस्था भ्रष्ट नहीं होती है, राजा या नायक के भ्रष्ट होने से समाज या व्यवस्था भ्रष्ट होती है। बिना राजा या नायक के बदले कोई बड़ा और सार्थक बदलाव मुश्किल है। जिस देश की राजनीति के समकालीन चरित्र और आदर्श भ्रष्ट होंगे या जिस समय के बदलाव के नायक और गायक भ्रष्ट होंगे, वहाँ जनता भी क्या भला कर सकती है ? आज ग्रामसभा के प्रधान से लेकर राजधानी के प्रधान तक सब सरकार हैं, सब नायक हैं, सब राजा हैं। जो सरकार में नहीं है या सरकार में जाने की उममीद में नहीं है, सब जनता है। यह जनता भ्रष्ट नहीं है। मैं कहता हूँ कि यह जनता भ्रष्ट नहीं है, बड़े कष्ट में है। बहुत छली गयी है। बहुत मार खायी है। इसे अपनों ने बहुत ठगा है। यह बैलगाड़ी पर बैठ कर चाहे मोटी पर सवार होकर ठगे जाने के लिए गीत गाते हुए आती-जाती है। इस जनता की लाख कमी सिर्फ यह है कि यह उम्मीद का दामन कभी नहीं छोड़ती। अपने दुश्मन से भी अच्छे की उम्मीद करती है। जैसे हिंदी के पाठक हिंदी के गंदे से गंदे लेखक से भी उम्मीद नहीं छोड़ते। विचार, सिद्धांत, आदर्श कब कहाँ दगा देने लगें, कोई नहीं जानता। विचार, सिद्धांत, आदर्श भी नहीं जानते कि वे कब ऐसा करने लगेंगे या कौन उनसे यह गंदा काम कराने लगेगा, कौन नायक, कौन लेखक, कौन गुरु, कौन शिक्षक, कौन पत्रकार ? कई बार व्यक्तिगत जीवन में छले जाने के बाद साधारण जन तो धर्म या प्रभु की शरण में जाते ही हैं, कई प्रगतिशील जन भी छले जाने के बाद या अकेलेपन की वजह से किसी शक्ति की खोज में निकल पड़ते हैं। सच तो यह कि जनता प्रायः प्रभुओं के नाम पर छली जाती रही है। हजारों किस्से हैं। चैनल सब दिखाते हैं। सबकुछ। इसके बाद भी मनुष्य जाये तो कहाँ जाये ? आज की तारीख में जनता के कम और विशिष्टजनों तथा समाज और देश के नायकों के पतन के किस्से से यह संसार ज्यादा अटा पड़ा है। मनुष्य के सामने भव सागर को पार करने की नहीं, निराशा के इस महासागर को पार करने की समस्या है।
        दरअसल यह सब कहीं न कहीं मनुष्य के स्वभाव और चरित्र से जुड़ी बातें हैं। कई बार कोई घटना आपके जीवन में किताब से भी ज्यादा प्रभाव डालती है। आपका बचपन आपके भविष्य की किताब को लिखता है। बचपन में जो संस्कार माँ के दूध की घुट्टी के साथ भीतर जाते हैं ,कभी बाहर नहीं होते, जीवन भर साथ रहते हैं। कभी मुखर होकर तो कभी छिपकर। ऐसे उदाहरण भी हैं, जिसमें एक किशोर बहुत पहले अर्थात अपनी तरुणाई में राहुल सांकृत्यायन की दर्शन-दिग्दर्शन पढ़कर जीवन और जगत को बिल्कुल नये नजरिये से देखता है, पर जब आगे जीवन में मुश्किलें आती हैं, कोई मददगार नहीं होता है, न विचार, न लोग, तो फिर से वह अपने बचपन के संस्कारों के अरण्य में चला जाता है। भारतीय माँ नाम की किताब अपने बच्चों को शुरू से ही प्रभु के पाठ पढ़ाती है। प्रभु होते ही इसलिए हैं कि रोज रक्षा करें, रोज मुश्किलों से बचाएँ। कोई संकट और कोई विफलता न आने दें। भारतीय माँ के प्रभु कोई आइसक्रीम खिलाने के लिए थोड़े होते हैं। मैं यहाँ की बात कर रहा हूँ, कहीं और की नहीं। माँ की किताब जीवन भर पीछा नहीं छोड़ती, आप उसे पलटकर देखें या नहीं, पर वह किताब आपके पीछे लगी रहती है। शायद इसीलिए कई लोग वैज्ञानिक सोच और विश्वास विकसित कर लेने के बाद भी, ‘‘व्यक्तिगत जीवन में’’ छोटे या बड़े संकट के आने पर वापस माँ की किताब के पास लौट जाते हैं। यह लोग शायद बुरे लोग नहीं होते है। क्या करें आखिर जब विचारधारा का पहाड़ सिर पर लेकर घूमने वाले लोग ही इनकी पीठ में छुरा भोकने लगें, दगा करने लगें ? ऐसे लोगों को लगता है कि प्रभु कुछ करें या न करें, कम से कम विचारधारिए प्रभुओं की तरह उनके साथ दगा तो नहीं करेंगे, पीठ में छुरा तो नहीं भोंकेंगे।

         विचार की किताब जीवन के अरण्य में अब तक हमें बचाने में किसी हद तक विफल दिखती है, लेकिन इसका आशय यह नहीं कि नुक्स विचार की किताब में है, शायद विचार की किताब पढ़ाने वालों में ही नुक्स हैं। माँ की किताब को पढ़ाने वाले की जरूरत नहीं, उसे तो बच्चा अपनी बचपन की आँख से ही बहुत अच्छे से पढ़ लेता है।






रविवार, 24 नवंबर 2013

मैं कहता हूँ, खोट आदमी नाम के कीड़े में है...

    मनुष्य जीवन कोई सरल सीधी इकहरी रेखा नहीं है। विचार का संघर्ष और जीवन का संघर्ष एक-दूसरे से जितना नाभिनालबद्ध है, उतना ही एक-दूसरे से पृथक। कहीं का व्यक्ति, समूह, समाज पूरा का पूरा स्वार्थ केंद्रित दिख सकता है। अपने स्वार्थ के लिए विरोध करने वाले को अपमानित कर सकता है, उसके संग कई तरह की क्रूरता कर सकता है। व्यक्तिगत जीवन में अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए कई बार महान विचारधारा भी मदद नहीं करती। महान विचारधारा के ध्वजवाहक प्रतिरोध में खड़े व्यक्ति के साथ दगा कर सकते हैं, उसे अकेला छोड़ सकते हैं निरंकुश सत्ता के सामने। व्यक्तिगत जीवन में संघर्ष और विचार को पीठ दिखाने वाले जन विचारधारा के शामियाने के नीचे क्यों जगह पाते हैं ?

      जंगल में या पिछड़े इलाकों में रहने वाले नागरिकों के लिए की जा रही न्याय और समानता की जो लड़ाई ईमान के साथ दिखती है, वैसी लड़ाई समाज और संस्थाओं में क्यों नहीं होनी चाहिए ? न्याय और समानता जैसे मूल्य सुविधासापेक्ष हैं ?  क्यों व्यक्तिगत जीवन में संघर्ष से बचना प्रगतिशीलता है ? क्यों संस्थाओं में चुप रहना या बगलें झाँकना बुद्धिवादी होना है ? विचारशील होना है ? जब सत्ता के अन्याय में महान विचारधाराओं वाले बुद्धिजीवी सहायक हों तो विरोधी विचारधारा के लोगों का सहयोग लेना क्यों बुरा है ? यदि उदाहरण देकर कहूँ तो यदि किसी फासिस्ट कहे जाने वाले संगठन के लोग किसी स्थानीय सत्ता के केंद्र हों या उससे प्रमुख रूप से जुड़े हों और महान क्रांतिकारी विचारधारा के लोग भी उनके साथ हों तो प्रतिरोध में अकेले खड़े व्यक्ति को क्या करना चाहिए ?
1-प्रतिरोध की बात भूल जाना चाहिए ?
2-सत्ता और उसकी चौकड़ी के समक्ष समर्पण कर देना चाहिए ?
3-न्याय के लिए किसी भी विचारधारा चाहे फासिस्ट ही क्यों न हो, उससे जुड़े व्यक्ति या सत्ता केंद्र की मदद लेनी चाहिए ?
4-किसी शहर या संस्था में बस्तर के लिए सात आँसू रोने वाले विचारधारा से जुड़े कथित लेखक या पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता लोग स्थानीय संघर्ष से आँख मूँद लें तो क्या करना चाहिए ?
5-अपने अंचल के बच्चों और युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वाली संस्थाओं और सत्ता केंद्रों से टकराना चाहिए या नहीं ?
6-सब भूल-भाल कर सत्ता की खुशामद में लग जाना चाहिए और अपने जीवन को ‘‘सुखमय’’ बनाने का उपाय करना चाहिए ?
7-जरूरी सवाल यह कि कोई विचारधारा महान और बहुत अच्छी है तो सबसे पहले अपने अनुयायिओं को अच्छा क्यों नहीं बनाती है ?  विचार अच्छे हों और जीवन बुरा, यह तो ठीक नहीं ? 

       यह सब कहने का आशय यह कि मित्रो, संकट बड़ा और पेचीदा है। राजनीति में सभी दल दूसरे को बुरे से बुरा बताने में अपनी ऊर्जा राष्ट्र की महान सेवा के नाम पर खर्च करते हैं। एकबार जो आ गया, उसे हटाओ मत, वही अच्छा है या दूसरे को लाओ, वह अच्छा है, नहीं वह भी खराब है, तीसरे को लाओ....लाख टके का सवाल यह कि विकल्प जब सब खराब हों तो हम करें क्या ? कहाँ जायें ? अँधेरा बहुत है। हम अभी उतने अँधेरे में ही हैं। यह उजाला जो दिख रहा है, साँप की काली त्वचा की तरह चमकीला है और हम इस उजाले को सचमुच का उजाला समझ बैठे हैं। मैं कहता हूँ, खोट आदमी नाम के कीड़े में है, पहले उसे बदलो... पिछले दिनों अखबार में जहाँ महात्मा गांधी की फोटो छपी थी उस जगह समाज, समता, न्याय, प्रतिपक्ष, मूल्य इत्यदि से दगा करने वाले ऐसे गंदों की फोटो मत छापो, न मंच पर ऐसे गंदे लोगों को माला पहनाओ... संसद ही नहीं, साहित्य की संसद में भी दागी हैं, ऐसे गंदों को सम्मान मत दो...विचारधारा को पहले ईमान से जोड़ो, नही तो आदमी तो बाद में मरेगा, विचारधारा पहले मर जाएगी।