गुरुवार, 2 जुलाई 2020

आलोचक अभिनव ज्ञान की मौखिक परीक्षा तथा अन्य कविताएं

- गणेश पाण्डेय

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आलोचक अभिनव ज्ञान की मौखिक परीक्षा
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आचार्य हँसमुख शास्त्री डी.लिट. ने
अपने पट्टशिष्य अभिनव ज्ञान से 
मौखिक परीक्षा में सबसे पहले पूछा-
वत्स, अपना नाम बताओ 

अभिनव ज्ञान ने 
हाफपैंट की जेब से हाथ बाहर निकाला
और धाराप्रवाह बोलना शुरू किया-
जी, मेरे अग्रज का नाम ज्ञानेंद्र है
उनके अग्रज का नाम ध्यानेंद्र है
मेरे अनुज का नाम रणेंद्र है
उसके अनुज का नाम देवेंद्र है
मेरे चचेरे भाई का नाम नरेंद्र है
मेरे मौसेरे भाई का नाम जितेंद्र है
मेरे फुफेरे भाई का नाम धर्मेंद्र है

आचार्य हँसमुख शास्त्री डी.लिट. ने
बाह्य परीक्षक आचार्य सुतुही प्रसाद सिंह को
गर्व से देखा कि ग़ौर से देखिए 
मेरे संस्थान का नगीना है नगीना
एक प्रश्न के दस-दस उत्तर दे सकता है

बाह्य परीक्षक 
आचार्य सुतुही प्रसाद सिंह ने पूछा-
वत्स, तुम्हारे पिता जी का क्या नाम है
और अभिनव ज्ञान की आँखों से निकलती
अद्भुत ज्योति से चकित होकर
फिर कहा- हां, वत्स बताओ

अभिनव ज्ञान ने फिर शुरू किया
पहले से भी अधिक धाराप्रवाह-
जी, मेरे ताऊ का नाम है निर्मल प्रसाद
मेरे मंझले ताऊ का नाम है विमल प्रसाद
मेरे चाचा का नाम है सदल प्रसाद
उनसे छोटे चाचा का नाम है कोमल प्रसाद
मेरे फूफा का नाम है लालमन प्रसाद
मेरे मौसा का नाम है ढुनमुन प्रसाद
मेरे मामा का नाम है भुल्लन प्रसाद

इस बार 
बाह्य परीक्षक सुतुही प्रसाद सिंह ने
आंतरिक परीक्षक हँसमुख शास्त्री डी. लिट. को 
सविस्मय देखा
और एक चौड़ी मुस्कान मुस्काए-
वाह, क्या विद्यार्थी है अद्भुत है
हिंदी का प्रतिभाशाली आलोचक है
पूछो एक बताता है दस
आचार्य हँसमुख शास्त्री ने 
अपना सीना छप्पन इंच का करके
अतिहर्षित होते हुए कहा-
मित्र सुतुही प्रसाद सिंह जी पूछिए 
कुछ और पूछिए

आचार्य सुतुही प्रसाद सिंह ने 
अभिनव ज्ञान को ग़ौर से ऐसे देखा
जैसे सूर्य और चंद्रमा को देख रहे हों
जैसे रामचंद्र शुक्ल 
और हजारी प्रसाद द्विवेदी को
साक्षात देख रहे हों 
मन ही मन प्रणाम भी किया
तत्क्षण सहज होकर अभिनव ज्ञान से पूछा - 
वत्स, अपने गाँव का नाम बताओ

अभिनव ज्ञान ने 
प्रचण्ड आत्मविश्वास से फिर शुरू किया
पहले से भी अधिक धाराप्रवाह-
जी, मेरे गाँव में गाँधी जी आ चुके हैं
और नेहरू जी दो बार आ चुके हैं
मेरे गाँव में वाजपेयी जी भी आ चुके हैं
मेरे गाँव में नामवर जी आ चुके हैं
मेरे गाँव में रामविलास जी आ चुके हैं
मेरा गाँव आदर्श गाँव बन चुका है
मेरा गाँव जनपद मुख्यालय के पास है
मेरे गाँव के पास रेलवे स्टेशन है
मेरे गाँव के पास हवाईअड्डा बन रहा है

बाह्य परीक्षक आचार्य सुतुही प्रसाद सिंह
अभिनव ज्ञान की कारयित्री प्रतिभा से
और आचार्य हँसमुख शास्त्री डी. लिट. के भव्य
सत्कार से तृप्त और अतीव प्रसन्न हो चुके थे
उन्होंने कहा- अब जाओ, वत्स!
आलोचना के आकाश में विचरण करो
जो चाहो सो करो

परीक्षार्थी के जाने के बाद
बाह्य परीक्षक आचार्य सुतुही प्रसाद सिंह ने
आंतरिक परीक्षक और अपने मित्र
आचार्य हँसमुख शास्त्री डी.लिट. से
तपाक से कहा-
अभिनव ज्ञान को उसके अभिनव ज्ञान 
और विलक्षण तर्कणा के आधार पर
हमारे समय की हिंदी आलोचना की
पीएचडी की उपाधि प्रदान करने हेतु 
संस्तुति की जाती है।

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चुग़द उर्फ़ मियाँ मोहन राकेश
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(तुम से पहले भी वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था/
उसको भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था : हबीब जालिब)

इस शहर में 
तब भी कोई हलचल नहीं हुई थी
शायद सब अपने-अपने में 
बहुत मसरूफ़ रहे होंगे
कुछ जो अपने शहर के लेखक से
भीतर ही भीतर जलते रहे होंगे
शायद ख़ुश भी हुए होंगे
कि चलो हम नहीं छोटा कर पाये
उसे किसी ने तो किया

जब
मोहन राकेश ने
शायद अपने बोले चाहे लिखे में
कोई नुक़्स निकालने की वजह से
इस शहर के एक लेखक को
चुग़द कहा था बल्कि लिखा था
टाँक दिया था बाक़ायदा 
अपनी डायरी में हमेशा के लिए
बिना वजह बताए उसके मुँह पर 
कालिख मल दिया था

क्या 
कोई बड़े से बड़ा लेखक भी
साहित्य का ख़ुदा होता है
कि कोई उसकी आलोचना न करे
कोई उसे चुभने वाली बात न करे
और चुभने वाली बात का जवाब
शानदार दलील की जगह गाली क्यों हो
भला ख़ुदा भी कहीं गाली देता है

काश
मैं मोहन राकेश का
समकालीन रहा होता तो कहता
मियाँ मोहन राकेश बड़े लेखक हो
तो तुम्हारे पास कोई अच्छा शब्द 
क्यों नहीं है 
अनाड़ी नहीं कह सकते थे
नासमझ नहीं कह सकते थे
औसत नहीं कह सकते थे
कहाँ गयी थी तुम्हारी भाषा
घास चरने चली गयी थी
उस वक़्त जब तुम 
किसी लेखक पर
टल्ली होकर
थूक रहे थे

मोहन राकेश 
तो मोहन राकेश
आज की तारीख़ में
छोटे से छोटा लेखक भी ख़ुद को
बड़ा लेखक से कम नहीं समझता है
उसे ख़ुद के तख़्त-नशीं
और ख़ुदा होने का 
घमंड हो गया है

बुरा वक़्त है
मोहन राकेश के समय से काफ़ी बुरा है 
जो आज काफ़ी बुरा है वह भी
धड़ल्ले से किसी लेखक को
उसके मुँह पर चुग़द कह सकता है
मुझे भी

मेरी बात और है
फिर भी मेरे मुँह पर कोई
मेरे बराबर का या मुझसे बड़ा शख़्स
मुझे चुग़द कहेगा तो शायद मैं 
सीधे उसका कुर्ता फाड़ दूँ
अगर मैं ऐसा नहीं करता 
तो यह शहर तो मेरे साथ भी
ठीक वही सलूक करेगा
अकेला छोड़ देगा

यह शहर है ही ऐसा
कहने के लिए सब साथ होते हैं
लेकिन असल में सब के सब
बहुत अकेले होते हैं
इतनी बुरी तरह अकेले होते हैं 
कि अकेले चलने जीने और लड़ने का
साहस ही किसी के पास नहीं होता है
भला ऐसा शहर भी कोई शहर होता है।

(नोट : यह कविता एक अर्थ में अपने शिक्षक परमानंद श्रीवास्तव के प्रति श्रद्धांजलि है। परमानंद जी एक लोकतांत्रिक लेखक थे। सहमति और असहमति, दोनों का स्वागत करते थे। साहित्य में कई मुद्दों को लेकर मेरी उनसे असहमति भी रही है, लेकिन मुझ पर एक शिक्षक के रूप में उनका ऋण भी रहा है। इस कविता को मुझे कोई पच्चीस-तीस साल पहले लिखना चाहिए था, लेकिन किसी बात को लिखने का समय कब और किस घटना-दुर्घटना के बहाने आएगा, यह कौन जानता है।)

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परिक्रमाकार 
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जब 
आपके पास 
ढंग का एक लेख भी नहीं है
जिसका नाम लेकर 
अभी बता सकें कि यह
आपकी कीर्ति का आधार है
एक बीघा खेत नहीं है 
और आप बनना चाहते हैं
गोरखपुर की आलोचना का 
ज़मींदार
ऐसा कैसे हो सकता है भला
और अगर आप बज़िद हैं 
तो फिर आपको इस उम्र में 
साहित्यिक औषधि की जरूरत है

बेहतर हो
आप अपने लिए 
औषधि की विधि का चुनाव ख़ुद करें 
चाहें तो आयुर्वेदिक चाहें तो होम्योपैथ 
लेकिन एलोपैथ आपके लिए
ख़तरनाक होगा उसमें सर्जरी है

इस उम्र में
दुर्बल महत्वाकांक्षाओं को 
अपने घर के सहन में मिट्टी खोदकर 
उसी में रखकर अच्छी तरह से 
ऐसे दबा देना चाहिए 
कि फिर कभी बाहर न आ सकें
जैसे मैंने एकल काव्यपाठ 
मंच माइक माला 
और पुरस्कार की इच्छा को 
दफ़्न कर दिया है

साहित्य में 
एक कार्यकर्ता के रूप में भी 
ईमान साथ हो तो अच्छा काम 
किया जा सकता है 
और अमूमन मठाधीश के रूप में 
बहुत ख़राब काम किया जाता है 
गोरखपुर के मठाधीश का हाल देख लें
न कविता में कुछ न आलोचना में कुछ 

और
आप हैं कि आलोचना का क़िला 
फ़तह करने की ज़िद लिए बैठे हैं
यह भूल गये हैं कि आप ऊंट हैं
और पहाड़ को मां की गाली दे बैठे हैं

असल में 
आप छेदीलाल शुक्ल के काव्य संग्रह पर
ब्लर्ब लेखन को ही आलोचना समझ बैठे हैं
और आपको घमंड इस मूर्खता पर है
जबकि आपका छेदीलाल
मेरे मित्र का चरणरज 
हज़ार बार ले चुका है

जब मैं
अपने प्यारे आलोचक मित्र 
अरविंद की कमियों पर चोट कर सकता हूं
तो आप किस खेत की मूली हैं 
अरविंद के पास तो 
आलोचना की अच्छी खेती बारी है
मोटा-महीन सब बोता है
आपके पास तो 
एक बिस्वा खेत नहीं है 
जो है हवा-हवाई है 
आलोचना में हाथ की सफाई है 

ज़रूरी नहीं
कि परमानंद के सेवक भी 
इस शहर में आलोचना का परमपद
प्राप्त करें ख़ुद को शांत करें
ठंडा तेल अपनी खोपड़ी पर धरें
कुछ बनने के लिए तीस साल बहुत होते हैं 
मान लें कि इतने लंबे वक्त में 
न आप आलोचक का पद बचा पाए 
न विमर्शकार बन पाए
बेहतर होगा
आलोचना के परिक्रमाकार के रूप में
ख़ुद को मुतमइन करें।

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दीन-हीन निरीह लेखक की हवाई फायरिंग
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गोरखपुर के एक लेखक ने 
बाहर के एक लेखक की पोस्ट पर 
कुछ टिप्पणी की 

बाहर के लेखक ने 
गोरखपुर के लेखक को उसके मुंह पर कहा, 
आप मूर्ख हैं 

और 
गोरखपुर के लेखक ने
तुरत झुककर हथियार डालते हुए कहा,
आप यही कह सकते हैं

हद है 
इस दीन-हीन निरीह लेखक ने
गोरखपुर का मान कितना घटा दिया  

पलट कर यह भी नहीं कहा 
कि आप महामूर्ख हैं 
या मैं नहीं आप मूर्ख हैं

किसी ने पूंछ पर पैर रखा
तो दस दिन बाद फनफनाये
हवा में खूब तलवारबाजी की
बेनामी गालियां दीं 

बाहर के लेखक को 
पता ही नहीं कि पट्ठा यह प्रलाप 
किसे सुनाने के लिए कर रहा है
पूंछ पर पैर रखने वाले को पता नहीं

हवाई फायरिंग का मतलब भीड़ में होता है
साहित्य में हवाई फायरिंग का मतलब
शुद्ध मूर्खता है

पट्ठा जो-जो ऊपर वाले पर फेंक रहा था
सारा सूखा गीला गंदा उसके मुंह पर 
गिर रहा था फिर भी वह बहुत खुश था

गोरखपुर का लेखक है इतना ही काफी है
कुछ भी कहूंगा तो हम सबकी बदनामी है
यों कहने को पूरा पोथा अभी बाकी है।

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मेरे विद्यार्थियो
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कहां होंगे 
मेरे विद्यार्थी 
कविता का दरवाज़ा खोलना 
उन्हें ठीक से याद होगा

अब भी सीढियों से उतरकर
दोस्तों और सखियों संग
मर्मस्थल पर पहुंचने की बेचैनी
उतनी ही तीव्र होगी

अब भी 
उनके जीवन में 
उतना ही गाढ़ा होगा
गुलमोहर और अमलतास का
सुर्ख़ और चटक पीला रंग

कहां होगे
मेरे विद्यार्थियो
मेरे बच्चो इस हारी-बीमारी में
कहीं निपट अकेले तो नहीं होगे
किस हाल में होगे।

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लाइव मुकुट वितरण
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कवि जी
ख़ूब आस्तीनें मोड़ते हैं
ख़ूब तलवारें भांजते हैं
काले बादलों से भी ज़्यादा
ख़ूब-ख़ूब गरजते हैं

कवि जी जैसे
अपने इस महारोर से
सब उलट-पलट देंगे
हिंदी की काली दुनिया को
दिव्यज्योति से पलभर में
भासमान कर देंगे

ये क्या हुआ
कवि जी का सिंहनाद
लाइव में आते ही गुम हो गया
कवि जी मुदितमन प्रसन्नवदन 
मुकुट वितरण करने लगे।











गुरुवार, 21 मई 2020

मेरे कानों में हिंदी की चीखें हैं तथा अन्य कविताएं

- गणेश पाण्डेय

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मेरे कानों में हिंदी की चीखें हैं
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बहुत हुआ 
रोज़-रोज़ का झगड़ा-टंटा
कोई और बात करो

बहुत किया
दूसरी तरह के लेखकों के
आराम में ख़लल जाने दो

ख़ुद की सोचो
बीपी और शुगर की गोली
अब और न बढ़ने दो

औरों को जी लेने दो
नाम-इनाम की मदिरा 
छककर पी लेने दो

छोड़ो सब
चंद रोज़ की पाबंदी में 
आराम करो

मुझे मेरे दोस्त ने  
समझाया तो कहा आंसू देखो
हिंदी की तार-तार लाज देखो

मेरे भाई आराम कहां
मेरे कानों में हिंदी की चीखें हैं
मुझे बुलाती उसकी पुकार सुनो।

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ग़ुलामी
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साहित्य में
बहुत ज़रूरी 
काम करो

सम्मान 
सबका करो
ग़ुलामी किसी की नहीं।

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चार कवि चुनने की जल्दी
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आठवें दशक में
या किसी भी दशक
या काल की कविता में
चार कवि चुनने की 
जल्दी क्यों थी

आखि़र
यह किसकी साजिश थी
ओह कितनी बड़ी 
नाइंसाफ़ी थी

जिस काम में 
सदियां लग जाती हैं
उसे दो मिनट में और
अकादमी इनाम का
सिक्का उछालकर क्यों
सबसे पंजा लड़ाकर 
क्यों नहीं

अब से
सिर्फ़ मुश्किल काम 
नाम की एक कविता से
इनकी तमाम कविताएं 
लड़ाकर देख लो
और भी सैकड़ों
कविताएं मौजूद हैं
कई कवि हैं
हमारे समय में
चुनौती की तरह

असली
देशी घी की तरह शुद्ध
और लोहे की तरह
मज़बूत।

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बाक़ी कवि खड़े रहें
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सबके पास
कुछ अच्छी कविताएं
होती ही होती हैं

सबके बैठने के लिए
कुर्सी या मोढ़ा होता है

ऐसा नहीं होना चाहिए
कि सभी कुर्सियों पर
चार-छः कवि बैठें
बाक़ी कवि खड़े रहें

किसी समय में
ऐसा अंधेर होगा
तो कुर्सियां टूटेंगी
सिर फूटेंगे।

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प्रतिभा का इंजन
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युवा हो
बहुत प्रतिभाशाली हो
अपनी प्रतिभा का
सही इस्तेमाल करो

क्यों क्यों क्यों
प्रतिभा का इस्तेमाल
पालकी ढोने के लिए क्यों

प्रतिभा का इंजन
चालू करो और सोचो
साहित्य के लोकतंत्र में
पालकी की ज़रूरत क्यों।

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ईमान के जागने का समय
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समय 
बदल गया है
इनाम का कुर्ता 
और पाजामा
सब फट गया है

कवि की औक़ात
उसकी चतुराई नहीं
उसकी निश्छलता
उसकी सरलता
तय करेगी

कवि की चालाकियों
और उसकी तमाम
दुरभिसंधियों का काल
बीत गया है 

उसके हेलीमेली 
चमचे चाकर लठैत
और गैंग
सबका अंत
सामने है

उठो
सोने वाले लेखको
ठीक तुम्हारे सिरहाने
ईमान के जागने का
समय आ गया है।

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बहादुर लेखक की मिसाइल
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बड़ा
बहादुर लेखक है
किसी पर दाग देता है
मिसाइल

उसकी 
ये मिसाइल
अमेरिका और इजराइल से
बहुत अच्छी है

ये देश
मिसाइल दागने
और निशाने पर लगने के बाद
वापस नहीं मंगा सकते

यहां
बहादुर लेखक
जब चाहता है लंबी और कम दूरी की
मिसाइल दागता है और निशाने पर
लग जाने के बाद उसे वापस कर लेता है।

मुझे भी
मिसाइल वापस मंगाने की
इस कला को सीख लेना चाहिए
यहां बहादुर से बहादुर लेखकों को
पलटी मारते देर नहीं लगती।

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महाकवियों की पालकी
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यह पालकी
महाकवियों की थी

हमारे समय के
कुछ चलता-पुर्जा वरिष्ठ कवियों ने
आव न देखा ताव न देखा उसमें
कुछ कमउम्र चापलूस 
कवि-आलोचकों के उकसावे पर
बिना टिकट बैठ गये

इन
वरिष्ठ कवियों का
यह गुनाह यक़ीनन बड़ा था
इन्हें साहित्य में जेल हो सकती थी
जेल में इनके साथ कुछ भी बुरा हो सकता था

लेकिन
जिन चापलूस 
कवि-आलोचकों ने
इन्हें इस हाल में पहुंचाया 
और महाकवियों की पालकी में बैठाकर
इन्हें शहर-शहर घुमाया 
लाइव दिखाया

असल गुनाह तो 
इस साहित्यिक ख़ुदकुशी के लिए
उकसाने वाले लालची चापलूसों का था
उन्होंने इनको महान कह-कह कर
इन्हें कविता का गुनहगार बनाया

ऐसे लड़कों को
सबक सिखाना बहुत ज़रूरी था
वरगना हिंदी के उस्ताद कवि क्या समझते
कुछ समझाने वाले आए भी
कड़ी से कड़ी भाषा में समझाया

लेकिन 
एक शख़्स ने तो कल
इन लड़कों की चमड़ी ही उधेड़ दी।

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वाचिक लिखित लाइव प्रशंसा के ख़तरे
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किसी ने 
आपके साथ 
साहित्य के किसी 
स्वतंत्रता संग्राम में भाग नहीं लिया है

किसी ने 
अपने समय के साहित्य में 
कोई युगांतर हस्तक्षेप नहीं किया है

किसी ने
साहित्य की संस्थाओं में ऐयाशी करने 
और अनुयायी बनाने का काम किया है
इसके लिए करोड़ों का फंड जुटाया है

किसी ने 
कविता या आलोचना में 
साठ पार करने के बाद भी कहीं
अपने अंगूठे का निशान नहीं लगाया है

किसी ने 
आए दिन कविता और कहानी में
बाहर की तमाम भाषाओं का 
तर माल उड़ाया है 

किसी ने
नाम-इनाम हासिल करने के लिए
साहित्य में वो सारे काम किए हैं
जो नाम डुबोने के लिए किए जाते हैं
जैसे नाक रगड़ना दुम हिलाना 
बिछ जाना इत्यादि

आप 
ऐसे किसी भी लेखक की प्रशंसा
वाचिक लिखित लाइव किसी भी रूप में
दो-तीन बार से ज़्यादा करेंगे 

तो
कवि-आलोचक की जगह
उसके पक्के पालतू ख़ानदानी
चापलूस वगैरह समझे जाएंगे। 











शनिवार, 9 मई 2020

आदरणीय की गुफा तथा अन्य कविताएं

- गणेश पाण्डेय

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आदरणीय की गुफा
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वे
आदरणीय थे
उम्र में मुझसे कुछ बड़े थे
और ज्ञान में तो बहुत बड़े थे
मैंने कभी नहीं चाहा था कि वे
मुझसे एक भी कदम पीछे रहें
बल्कि चाहा कि उम्र में बड़े हैं तो
आगे रहें

लेकिन
वे कुछ ऐसे लोगों के पीछे रहे
जो उम्र और सलाहियत में मुझसे
न सिर्फ़ पीछे थे बल्कि साहित्य के
चलता-पुर्जा क़िस्म के लोग थे
फिर भी मैंने आदरणीय का 
भला चाहा

आदरणीय ही
अपना भला ख़ुद नहीं चाहते थे
उनके भीतर जाने कैसी दिक़्कत थी
कि वे जिनके साथ रहते थे
उनकी तरह दिखना नहीं चाहते थे
शायद उनकी ख़्वाहिश रही हो
कि मेरी तरह दिखना चाहते थे

बस 
यों समझ लें कि आदरणीय
अपनी कमीज़ धोना भी नहीं चाहते थे
और साफ़ दिखना भी चाहते थे
मैं फिर भी मदद करने के लिए
तैयार था

आदरणीय 
जितना बाहर रहते थे
उससे ज़्यादा भीतर रहते थे
कोई गुफा थी उनके भीतर
शायद गुफा के भीतर कोई गुफा थी 
शायद उसके भीतर भी कोई गुफा थी

आदरणीय
गुफा से बाहर निकलकर भी
गुफा में होते थे गुफा लेकर चलते थे
आदरणीय सड़क पर चलते थे
तो गुफा साथ-साथ चलती थी
कुर्सी पर बैठते थे 
तो पीछे खड़ी रहती थी

आदरणीय
किसी के सामने होते थे 
फिर भी गुफा में होते थे
बोलते वहीं से थे बाहर होंठ हिलता था
सोचते वहीं से थे बाहर हाथ हिलता था
मैं उनकी अदृश्य गुफा को देखता रहता था
उसके भीतर की एक-एक हरकत 
मुझे दिख जाती थी

आदरणीय को 
एक झटके में हाथ पकड़कर
उनकी ख़ुद की बनायी गुफा से 
बाहर खींच सकता था
पर वे मुझे अपनी कानी उंगली तक
तो पकड़ने नहीं देना चाहते थे

वे
हिंदी के
चूहे बिल्ली गिरगिट चींटी
और गधे वगैरह किसी भी
प्राणी की मदद ले सकते थे
मेरी मदद नहीं लेना चाहते थे
वे मुझे ख़ुद से कमतर समझते थे
फिर मेरी मदद कैसे ले सकते थे
वे उन्हीं चीकटों के साथ रहते हुए
ख़ुद को मिटा देना चाहते थे
यह कैसी ज़िद थी

वे
मुझे छोड़कर
किसी के भी साथ खड़े हो सकते
किसी के भी दोस्त बन सकते थे
किसी से भी रिश्ता जोड़ सकते थे

आदरणीय
मेरे साथ दो नहीं एक कदम भी
आधा कदम भी चल नहीं सकते थे
मेरी बगल में कभी बैठ नहीं सकते थे
असल में उनकी भीतरी गुफा में 
कोई मनोमालिन्य छिपकर बैठ गया था
ऐसे लोगों का कुछ नहीं हो सकता था
फिर भी मैं उनके लिए प्रार्थना करता था 
उनके बारे में अक्सर सोचता था
और उदास हो जाता था।

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विलक्षण कविताएं
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कुछ कवि
अपनी कविताएं
ज़मीन पर नहीं रखना चाहते
शायद मैली हो जाने के डर से

वे अपनी कविताएं
फूल के पौधों पर भी
खिलने और सूखने के लिए
फैलाना नहीं चाहते
कि तेज़ धूप में मुरझा न जाएं

वे कवि
अपनी कविताएं
पेड़ पर भी नहीं रखना चाहते
कहीं आंधियों में खो न जाएं
किसी देहाती-भुच्चड़ के
हाथ न लग जाएं

वे अपनी कविताएं
मज़दूरों की टेंट में भी
छिपाकर नहीं रखना चाहते
कि उसे चिलम पर चढ़ाकर
गांजे की तरह पी न जाएं

वे अपनी कविताएं 
हीरे की अंगूठी की तरह
प्रेयसी की उंगलियों में
पहनाना नहीं चाहते कि कोई
चाकू की नोंक पर छीन न ले

वे कवि
अपनी कविताएं बैंक में 
इस डर से रखना नहीं चाहते
कि बैंक दीवालिया न हो जाए
कोई लेकर भाग न जाए

वे अपनी कविताएं
इतनी ऊंचाई पर रखना चाहते हैं
कि परिंदा भी पर न मार सके
ऐसे बचाकर रखना चाहते हैं
कि प्रलय भी नष्ट न कर सके

ऐसे कवियों की कविताएं
ग़रीब-गुरबा के चूल्हे पर
रोटी की तरह नहीं पकती हैं
जिससे सबकी भूख मिटे
सबके होठों को मीठी लगे

इनकी कविताएं
सीधे कला की भट्ठी से
भाप बनकर उठती हैं और
आकाश में बादल बनकर 
कविता के अंतरिक्ष में
राज करती हैं

पाठक 
देखकर ख़ुश हो सकता है
उचक-उचक कर आसमान में
उसे छू नहीं सकता 
चूम तो बिल्कुल नहीं सकता

वे विलक्षण कविताएं
प्रायः धरती पर उतरती नहीं
धरती पर कभी बरसती भी हैं 
तो ख़ास नक्षत्र में ख़ास मात्रा में

वह भी तब जब उनका आलोचक 
अपनी छत पर शरद की चांदनी में
मुंह निकाल और खोलकर सोया हो
और उसमें टप से चू जाएं।

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कवि-आलोचक-संवाद
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आलोचक जी
ग़रीब कवि वह होता है
जो कविता का अभिजन नहीं होता है
जो कला का ध्वजवाहक नहीं होता है
जो कविता में साहित्यिक मूल्यों के लिए
जोख़मि उठाता है संघर्ष करता है

आलोचक जी
ग़रीब कवि वह नहीं होता 
जो साहित्य के मठों का कारिंदा होता है
जो साहित्यिक शामियाना हाउस का
मैनेजर वगैरह होता है

आलोचक जी
ग़रीब कवि वह होता है
जो किसी नामी-गिरामी बाऊसाहब
और पंडिज्जी से आशीर्वाद नहीं लेता है
जो साहित्यिक यात्राएं नहीं करता है
जो अपनी मेज और अपने पाजामे से
बाहर नहीं जाता है

आलोचक जी
ग़रीब कवि वरिष्ठ लेखकों की ख़ुशामद
और कनिष्ठ लेखकों के पीछे चलने का
काम नहीं करता है

आलोचक जी
कोई ग़रीब कवि 
(साहित्यिक रूप से)
ताउम्र भूखा रह सकता है 
पानी पीकर जी सकता है
भीख नहीं मांग सकता है
दांत नहीं चियार सकता है

आलोचक जी
ग़रीब कवि आपसे
कभी नहीं कह सकता है
उस पर लेख लिख दीजिए
सूची में उसका नाम डाल दीजिए

आलोचक जी
यह कवि की ख़ुद्दार ग़रीबी है
इस ग़रीबी को लंबे संघर्षों में
ख़ून-पसीना बहाकर कमाया जाता है
इस ग़रीबी का मज़ाक नहीं उड़ाया जाता है।

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कविता का छप्पर
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छप्पर बनाना
बहुत अच्छा काम है
इसे बनाने के काम में
उठाने और रखने के काम में
लगे हुए लोग एक दूसरे से आगे 
क्यों नहीं निकलना चाहते हैं

आज की तारीख़ में
ग़रीब कविता का छप्पर 
बनाने के काम में लगे हुए लोग
एक दूसरे से आगे क्यों होना चाहते हैं
आज का कवि कोरोना से ज़्यादा
दूसरे कवि से डरता है
कि उससे आगे निकल जाएगा

कवि का यह भय
क्या उसे जीते जी मार नहीं डालेगा
डर-डर कर तुम लोग
पेशाब तो ठीक से कर नहीं सकते
कविता क्या ख़ाक लिखोगे

कवियो
कविता का छप्पर बनाते समय
दूसरे कवियों को मत देखो
एक समय की कविता का छप्पर
कई लोग मिलकर बनाते हैं

इस काम के लिए
किसी उजरत की उम्मीद मत करो
यह भलाई का काम है व्यापार नहीं
कविता की दुनिया इसी तरह चलती है
कविता का छप्पर इसी तरह बनता है

ऊंची फ़ीस पर
अमीरों की कविता का 
महल बनाने के लिए विलायत से
कविता की इंजीनियरिंग पढ़कर लौटे
शहराती कवियों की ओर मत देखो

अपने लोगों की कविता को देखो
ग़रीब की कविता का छप्पर देखो
उसे देखो जिसके लिए
छप्पर बनाना है।

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सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
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सक्सेना
सर्वेश्वर दयाल
कविता के लाल थे
दलाल नहीं थे

मेरे 
जनपद के थे
स्वप्निल के जनपद के थे
हम उसी बस्ती जनपद के थे

बच्चो
वैसा सक्सेना
कविता की बस्ती में
कुआनो नदी के पास
फिर नहीं आया

सोने का 
पानी चढ़ाने वाले
कविता की भाषा के ठग
बहुत आए बहुत आए

मंचों पर 
घुंघरू पहनकर
कठिन नाच नाचने वाले
कविता को मौत के कुएं में भेजकर
सर्कस और जादू दिखाने वाले
तमाम कवि आए

सरल कवि कम आए
स्वाभाविक कवि कम आए
पाठकों की चिंता करने वाले कवि
बहुत कम आए।

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कविता का नाराज़ फूफा
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भाई जी ने
छोटे सुकुल को बताया-
कविता का स्वयंवर रचाया जा रहा है
उत्सव लाइव दिखाया जा रहा है
जिस कवि को देखो सजा-धजा
तेल-फुलेल लगाकर सीना फुलाये है
नयी-नयी कविता सुनाये है

छोटे सुकुल ने 
पहले ख़ुद को शांत किया
फिर भाई जी से कहा-
भाई जी मुझे क्या जी
मुझे लौंडों की बेजा हरकतों से 
बहुत से बहुत दूर रखो जी
उम्र के इस पड़ाव पर
मुझे कविता के स्वयंवर
और तख़्त और ताज़ से अब क्या जी
छोड़ो जी इस लाइव-साइव से 
क्या लेना-देना जी

देक्खो भाई जी 
मैं तो ठहरा कविता का देहाती-भुच्चड़
अपने समय की कविता की बारात का
नाराज़ फूफा हूं जी 
जिसे मेरा कोई साढ़ू साला उनका बेटा 
चाहे कोई और रिश्तेदार मनाता ही नहीं 
अब आप ही बताओ मैं क्या करूं जी
जो कर रहा हूं क्यों न करूं जी
ताड़ के पेड़ पर सबसे ऊपर चढ़कर
रोज़ अपनी नाराज़ कविता सुनाना
क्यों बंद करूं जी आओ नीचे बैठो जी
कविता के नाराज़ फूफा की कविता
आप तो सुनो जी।







गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

एक अछूत कवि की आत्मकथा तथा अन्य कविताएं


- गणेश पाण्डेय
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एक अछूत कवि की आत्मकथा

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मैं कट्टर मार्क्सवादी नहीं हूँ
मेरे लिए यह बिल्कुल बुरी बात नहीं है
मैंने ऐसे लोगों को साहित्य की सड़क पर
सिर्फ़ चलते और दौड़ते हुए ही नहीं 
बाकायदा रेंगते हुए और जगह-जगह
मत्था टेकते हुए देखा है

आप 
कट्टर मार्क्सवादी हैं तो यह
आपके लिए बहुत अच्छी बात हो सकती है
ईश्वर करे कि आप ऐसा बन जाएँ
कि आपको देखकर मेरा भी मन
मार्क्सवादी हो जाना चाहे

मैं किसी लेखक संघ का 
सदस्य या पदाधिकारी नहीं हूँ
मुझे इससे कोई परेशानी नहीं है
लिखने-पढ़ने में कोई समस्या नहीं है
ईश्वर करे कि आपका लेखक संघ 
चिरकुटों की जगह 
स्वाभिमानी लेखकों का संघ बन जाए
और मेरा मन उसमें शामिल होना चाहे

मैं किसी 
साहित्य अकादमी-फकादमी में 
न जाता हूँ न जाने के लिए जान देता हूँ
उससे मेरे रचना और आलोचना कर्म में
किसी भी प्रकार की न कोई रुकावट होती है 
न कोई खेद होता है
मेरे लिए वह जगह कमज़ोर लेखकों का
हवाईअड्डा है भकभकअड्डा है बसअड्डा है 
म़द्यप और व्यभिचारी लेखकों का ठिकाना है
जिसका प्रबंध 
हिंदी के अलेखकों के हाथ में है
सड़क छाप लोगों के हाथ में है
आप वहाँ जाते हैं तो शौक़ से जाएँ
अपनी कविताओं का ब्रीफकेस 
चाहे गठरी चाहे बटुआ लेकर 
कविता के स्वर्ग की यात्रा करें
आपकी यात्रा मंगलमय हो
मुझे कविता का स्वर्गीय नहीं होना है

मैं साहित्य के
किसी करोड़पति फाउंडेशन के 
चेयरमैन का न सगा हूँ न उसका संगतकार हूँ
न उसकी प्रेमिका हूँ न उसका नाती-पोता वग़ैरा हूँ
इस तरह की किसी भी प्राइवेट लिमिटेड संस्थाओं में
आने-जाने और प्रोग्राम करने का
तनिक भी इच्छुक नहीं हूँ

मैं अपने शहर के किसी आयोजन में नहीं जाता हूँ
वहाँ कोई न कोई दो कौड़ी का 
ब्राह्मण अलेखक मंच पर बैठा होता है
और लेखक ख़ुशी-ख़ुशी सामने चटाई पर 
बैठे हुए ताली बजा रहे होते हैं
ताली बजाने वाले लेखक कहाँ नहीं होते हैं
मैं बाहर के किसी आयोजन में भी 
नहीं जाना चाहता हूँ

मैं साहित्य का कार्यकर्ता हूँ बालम नहीं
किसी भी लेखिका से मर्यादित दूरी रखता हूँ
किसी भी लेखिका का अपमान नहीं करता हूँ
बेटियों 
और भतीजियों की उम्र की लेखिकाओं की चिंता करता हूँ
अलबत्ता उनमें कमी देखूँ तो उन्हें प्यार से डाँटता भी हूँ

पता नहीं कहाँ से आ गया है 
मुझमें इतना ज़्यादा ग़ुस्सा 
जैसे हिंदी की गंदगी को साफ़ करने का काम
सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे ज़िम्मे हो
जैसे ही कोई बुरा दृश्य देखता हूँ
नाराज़ हो जाता हूँ

निराला ने अपनी कविता में
ख़ुद को ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत कहा है
मैंने भी इस शहर में 
हिंदी के ब्राह्मणोँ के समाज में 
अब तक अछूत का जीवन जिया है
मेरे ब्राह्मण गुरु ने शुरू में ही मुझे
नगरनिगम के कूड़ापात्र में फेंक दिया था
कि हिंदी के दो जर्मन शेफ़र्ड मुझे कच्चा
नोंच-नोंच कर खा जाएँ
मैं निराला नहीं था फिर भी बच गया
और आज आप सबके सामने
हिंदी की इस सबसे सरल कविता में
हाथ जोड़कर खड़ा हूँ
अपनी कहानी सुना रहा हूँ
देखिए कितनी नम हैं मेरी आँखें

मेरे नाम में ब्राह्मण लगा था
फिर भी इस शहर में देवेंद्र कुमार ने मुझे प्यार दिया
वे दलित थे मैं ब्राह्मण यह कैसा रिश्ता था
वे इस शहर के 
अपने समय के सबसे अच्छे कवि थे
आज भी सबसे अच्छे कवि वही हैं
मैं उन्हें गोरखपुर के ब्राह्मण कवियों का
ताऊ समझता था आज भी समझता हूँ

मैंने अपनी कविता में लिखा भी है :
’कोई मधुकर था यहाँ
कोई काला था, कोई दिलवाला
कोई परमानंद, कोई विश्वनाथ ।
देवेंद्र कुमार को यहीं देखा
अपनी हीर कविता के लिए राँझा बनते।’
देवेंद्र कुमार हीर कविता के राँझा थे
ख़ुद को उन्होंने कभी दलित कवि नहीं समझा
वे मनुष्य, समाज, प्रकृति और देशकाल के
प्रतिनिधि कवि थे पूर्ण कवि थे 
आज भी प्रतिनिधि कवि हैं पूर्ण कवि हैं 
मैंने देवेंद्र कुमार जैसे 
कविता के संत को नहीं देखा होता 
तो कविता में परमानंद और विश्वनाथ की गति को
प्राप्त होता
कवि नहीं कविता का सौदागर होता

मैं कविता की रसमलाई
और माखनभोग नहीं खाता हूँ
नमक-रोटी खाकर
कविता के चौकीदार की नौकरी करता हूँ
बहुत ख़ुश हूँ बहुत से बहुत
कविता के ब्राह्मण समाज में
एक अछूत कवि की ड्यूटी बजाता हूँ
ब्राह्मणों के सिर पर तो रोज़ बजाता हूँ
उनके सीने पर फन काढ़कर लोटता हूँ
उनके कानों में पिघले हुए शीशे की तरह
उतर जाती हैं मेरी कविताएँ
यह सौभाग्य सबको कहाँ मिलता है
कविता के बाज़ार में आज अधिकांश कवि
भाड़े के टट्टू हैं बजरबट्टू हैं।

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ईश्वर आए आए आए
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ईश्वर का 
गुणगान करने वाले आए
उसका संदेश लाने वाले आए
उसकी पूजा करने वाले आए
भव्य इबादतगाह बनाने वाले आए
उसके नाम पर हिंसा करने वाले आए
पोथियों को सिर पर लादने वाले आए
अपनी जड़ता पर गर्व करने वाले आए
उसके नाम पर राजनीति करने वाले आए
ख़ुद इनाम के कीचड़ में धंसकर
उसकी कड़ी आलोचना करने वाले 
दो दिन के मशहूर लेखक आए
ईश्वर को मानने वाले आए 
न मानने वाले आए
न मानने वाले भी मंदिर जाने वाले आए
मानने वाले मंदिर कम जाने वाले आए
ईश्वर मेरे तेरे उसके सपने में भी आए
जब-जब मुश्किल में फंसे ख़ूब याद आए
आज दुनिया कितनी मुश्किल में है
मंदिर मस्जिद चर्च गुरुद्वारे मुश्किल में हैं
सारे धर्मग्रंथ मुश्किल में हैं
देखो मेरे बच्चो
ईश्वर आए तो कोई और रूप धरकर नहीं
सफ़ेद लिबास में डाक्टर-नर्स
और ख़ाकी वर्दी में पुलिस बनकर आए
ईश्वर आए आए आए।

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कवियों के तीन तल
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भूतल पर 
वे कवि रहते हैं, 
जो कविता के राजपाट से मुक्त होते हैं
राजपाट के अंधेरे से मुक्त होते हैं
हर दासता से मुक्त होते हैं
और उन्हें इस मुक्ति का
बोध होता है

मध्यतल पर 
वे कवि रहते हैं जिन्हें ऊपर से 
कुछ न कुछ द्रव्य और आभूषण इत्यादि
समय-समय पर मिलता रहता है 
और वे नित्य ऊपर की ओर देखकर
लिखित और वाचिक गुणगान 
करते रहते हैं

आकाश तल पर 
कविता के देवता कवि रहते हैं
सुंदर, गौरवर्ण और कभी-कभार
श्यामाच्छादित काव्य रचते हैं
उन्हें कोई रोग नहीं होता है
कोई शोक नहीं होता है

उनके लिए 
पृथ्वी का बड़े से बड़ा दुख 
स्त्री की जंघा पर एक सुंदर-सा 
नन्हा-सा उभरता हुआ फोड़ा है 
किसी चांद की तरह
किसी ब्रह्मांड सुंदरी की तरह
अंतरिक्ष में पतंग उड़ाते बच्चे की तरह
आकाश की गलियों में 
साइकिल चलाती हुई लड़की की तरह
सुंदर बहुत सुंदर बहुत से बहुत सुंदर

मध्यतल के
सारे के सारे कवि 
आकाशतल की सैर करना चाहते हैं
कविता का देवता बनना चाहते हैं
कम से कम देवता का संगतकार
चाहे सहायक संगतकार
बनना ही बनना चाहते हैं

भूतल का कवि 
आकाशतल पर ज़बरदस्त
पत्थर फेंककर मारना चाहता है
मध्यतल के असंख्य कवियों की पीठ
बारबार सामने आ जाती है
ग़ुस्से में अपनी मुट्ठियां भींचता है, 
कविता की दीवार पर घूंसा मारता है 
और लहूलुहान होता है

ऊपर
आकाश तल का देवता कवि
मध्यतल के कवियों के इस गुण पर
मंद-मंद मुस्काता है 
और कुर्ते की जेब से निकालकर
जादुई बतासे बरसाता है।

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सोहन हलवा
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साहित्य का 
थोक मिष्ठान्न भंडार
राजधानी के सिवा
और कहां हो सकता है

आलोचक
सोहन हलवा बना रहा है
कवि सोहन हलवा पर
चांदी का वर्क सजा रहा है

दोनों 
सबको दोने में हलवा
परोस रहे हैं कह रहे हैं
खाइए-खाइए
कराची से अच्छा हलवा
दिल्ली का सोहन हलवा

सुंदर है
अजी स्वादिष्ट है
जो सुंदर है वही स्वादिष्ट है
जो स्वादिष्ट है वही सुंदर है
जो सुंदर और स्वादिष्ट है
वही कविता है वही आलोचना है

अचानक 
साहित्य मिष्ठान्न भंडार के सामने
एक देहाती-भुच्चड़ पागल 
लट्ठ लेकर खड़ा हो जाता है

ललकारता है-
सालो कोरोना फैला रहे हो
तुम्हारा
सोहन हलवा
कविता और आलोचना है
तो छोटे सुकुल की लट्ठ क्या है!

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कवियो
---------
सब 
एक जैसा तुम्हारी भाषा में
सोचें देखें बोलें सुनें यह संभव नहीं है

कवियो
अपनी कहो सबसे
लेकिन किसी पर थोपो नहीं
और हां किसी से पहेलियां न बुझाओ

उन्हें देखो जो कम कविता जानते हैं
या जानते हुए भी कविता का मुकुट
छिपाते हैं किसी ग़रीब पाठक के सामने

और
जिनसे कोई दर्द साझा करना होता है
उनके लिए कविता महारानी को
उनकी फूआ काकी आजी बनाते है
कविता में कहूं तो कविता को 
एक बात बनाने का ख़तरा
मोल लेते हैं

यह मैं हरगिज़ नहीं कहता 
कि आज उन्हें कविता का महाराज
समझने की कोई बेवकूफ़ी की जाय
अलबत्ता यह कहता हूं कविता में
दिल्ली स्कूल का तरीक़ा जनविरोधी है

यह भी कहना ज़रूरी है
आज अगर देश से कुछ कहना है
चाहे बचे-खुचे कविता के लोगों से
कुछ कहना है तो उनकी भाषा में कहो
किताब की भाषा में नहीं

कवियो
बड़ी कृपा होगी देश पर
कविता की बारीक़ियों के 
कम जानकार लोगों के लिए
उन्हीं के मुहावरे में साफ़-साफ़ कहो।

----------------------------------
एक वरिष्ठ नागरिक की हंसी
----------------------------------
कभी
रोज़ हंसी-ठट्ठा
बैठकबाज़ी और दोस्तों संग
मौज़-मस्ती करते थे

बहुत से बहुत
पहले की बात है याद है
तब हम किसी से ईर्ष्या नहीं करते थे
दोस्तों के लिए जो हो सकता था
सब करते थे

धीरे-धीरे
दोस्त अपने-अपने काम में लग गये
किसी ने साइकिल की दुकान कर ली
कोई वकील बन गया कोई मुंशी
कोई डाक्टर बन गया कोई इंजीनियर
सब कहीं गुम हो गये

किसी के पास फ़ुरसत नहीं
बीवी-बच्चे मां-बाप की देखरेख में
खो गये उनका खोना बुरा नहीं लगा
हमारी सबसे क़ीमती चीज़ खो गयी
दुख इस बात का है आज ज़्यादा है

वह निश्छल और उन्मुक्त हंसी
कहां गयी कहां गयी कहां गयी
शरीर के जिस हिस्से में
जहां रहती थी पहले हंसी बेफ़िक्री
और ख़ुशी का ख़ज़ाना
उस जगह पता नहीं कैसे इन दिनों
कोई डर रहने आ गया है

बेटा बेटियां बहू 
दामाद सब कहते रहते हैं आजकल
पापा जी बाहर घूमने मत निकलिएगा
पापा जी दूध सब्जी लेने मत जाइएगा
आपको बीपी है डायबिटीज है ख़तरा है
ये मत कीजिएगा वो मत कीजिएगा
अपना ख़याल रखिएगा

अब इस उम्र में
किन बातों का ख़याल रख पाऊंगा
मुझसे एक हंसी क्या गुम हुई
कुछ याद नहीं रहता बस एक डर है
इन दिनों साथ रहता है।

--------------
बुरे वक़्त में
--------------
मनुष्य के रोम-रोम में 
प्रवेश कर गया है भय

ओह कितना 
असहाय है मनुष्य

बुरे वक़्त में प्रभु से
न कहें तो किससे कहें

शक्तियां हों न हों
जितनी भी हों

हे ईश्वर कुछ भी करके
बचाना सबको।

---------
विषाणु 
---------
इतने देवदूत आए
इतने धर्म और वांग्मय
यीशु आए बुद्ध आए मोहम्मद आए
महावीर आए मार्क्स आए गांधी आए
और आती रहीं विपदाएं आपदाएं
मानवजाति के नाश की आशंकाएं

विस्मय की बात यह कि किसी के पास 
प्रकृति को वश में करने का मंत्र नहीं है 
कितना निहत्था है आज मनुष्य
अपने असंख्य परमाणुओं और
डालर और रुपये के ढेर पर बैठा
सूक्ष्म विषाणुओं के सामने

कितना बुरा समय है
मनुष्य के ज्ञान-विज्ञान जीवन
सभ्यता और संस्कृति की यात्रा
ओह कितनी अधूरी है
कहां है मनुष्य का अहंकार
और विश्वविजेता बनने का स्वप्न

कहां है हिंदी के लेखक का पुरस्कार
और अमर होने के लिए उसकी
हजार नीचताएं
विश्व की कितनी महाशक्तियां
आज एक विषाणु के सामने खड़ी हैं
एक पैर पर अभी कितनी दूर है
दूसरा पैर।

------------
नया कवि
-----------
माना
नये कवि के हाथ में
सोना-चांदी फूल-पत्ती 
कुछ नहीं है अनगढ़ पत्थर है 

लेकिन 
कविता के सभासदो देखो तो
उसने तुम्हारे राजा के महल के
कांच पर कैसे दे मारा है दनादन।







सोमवार, 30 मार्च 2020

लंबी रात

- गणेश पाण्डेय

यह एक असाधारण 
और काली लंबी रात है
मेरे सिर पर काले छाते की तरह
तनी हुई है जैसे गर्दन पर चाकू

कहीं कोई दूर-दूर तक आवाज़ नहीं है
न किसी गाड़ी की न किसी आदमी की
न किसी कुत्ते और बिल्ली के रोने की
सबके सब पेड़-पत्ते फूल-पत्तियां 
सब चुप हैं कुछ नहीं सूझ रहा है किसी को
मैं ख़ुद नहीं कर रहा हूं किसी से कोई बात

रात के ग्यारह बज रहे होंगे
लगता है कि एक से ऊपर बज गये होंगे
शायद सब सो गये होंगे 
शायद सब मेरी तरह जाग रहे होंगे
बजते हुए इस वक़्त को सुन रहे होंगे
शायद वक़्त की आवाज़ में
किसी पायल की आवाज़ शामिल होगी
छम-छम छम-छम 
कुछ चूड़ियों की आवाज़ के साथ
एक खनकती हुई हंसी शामिल होगी
पता नहीं यह किसी 
औरत की आवाज़ होगी 
या किसी और की

मुझे डर लग रहा है बाहर सड़क पर
कोई औरत जैसी चीज़ सफेद लिबास में
ज़रूर टहल रही होगी 
मौत होगी
शहर-शहर घर-घर घूम-घूम कर 
रोशनदान से खिड़की की दरार से
दरवाज़े के नीचे से झांक रही होगी
आदमी की मौजूदगी

बल्ब बुझने की वजह से
जहां कुछ नहीं दिखता होगा
वहां अपनी गजभर लम्बी नाक से
सूंघ-सूंघ कर पता कर रही होगी
आदमी की मामूली से मामूली गंध 
सूप जैसे लम्बे कानों से सुन रही होगी
आदमी की सांसों की मद्धिम से मद्धिम
आवाज़

ओह जैसे ही 
दरवाज़ा खुलेगा घुस जाएगी
शायद रात के सन्नाटे की वजह से
शायद पैंसठ का होने की वजह से
शायद दिनभर टीवी देखने की वजह से
इस तरह के ख़याल आ रहे हैं
कि हर जगह ऐसी कोई डरावनी चीज़ है 
जो आदमियों के प्राण हर लेगी

मैं पत्नी को सोते हुए देखता हूं
तो सोते हुए अपने घर को देखता हूं
घर की एक-एक चीज़ को सोते हुए पाता हूं
लेकिन ख़ुद नहीं सो पाता हूं
देश और दुनिया की सड़कों पर
गज़ब का सन्नाटा देखता हूं
मेरे बार-बार करवट बदलने से
पत्नी जग जाती हैं पूछती हैं-
क्या हुआ नींद क्यों नहीं आ रही है
बच्चों के लिए परेशान हैं क्या
मेरे हां कहते ही उठकर बैठ जाती हैं
मैं भी बैठ जाता हूं

मुझे लगता है
पृथ्वी पर जितने भी पति होंगे
पत्नियों के साथ उठकर बैठ गये होंगे
और अपने बच्चों के बारे में
और मुल्क़ के हालात के बारे में
बात कर रहे होंगे सोच रहे होंगे

कुछ लोग 
उन लोगों के बारे में सोच रहे होंगे
जो अपने बच्चों और वतन से दूर होंगे
शायद जहाज रेल बस के इंकार के बाद
इस वक़्त पैदल चल चुके होंगे
रात के दो बज गये होंगे

मां और बाबूजी 
हैजा और प्लेग की महामारी के बारे में
जब हम सभी छोटे थे बताते थे
लेकिन हमने तो ख़ुद अपनी आंखों से
पहले जापानी बुख़ार से
यूपी बिहार और नेपाल की तराई के 
पचास हज़ार से ज़्यादा बच्चों को
अपनी मांओं की गोद सूनी करके 
असमय जाते देखा है

और अब 
चीनी बुख़ार की काली छाया से
बूढ़ों और बच्चों को जाते देख रहे हैं
चीन से फैले कोरोना वायरस ने
पृथ्वी के जीवन का रस निचोड़ लिया है

दुनिया का हर देश भयभीत है 
दुनिया की आंखों से नींद ग़ायब है
पत्नी कहती हैं
बच्चों से सोने के पहले बात हुई थी
सब ठीक है एहतितात कर रहे हैं
कोई बाहर नहीं जाएगा
ऑफिस का काम घर से होगा
आप भी अब सो जाइए

मेरी नींद छुट्टी पर है
नहीं- नहीं मेरी नींद बहुत डरी हुई है
और आंखें जाग रही हैं नौकरी पर हैं
आकर टीवी के कमरे में बैठ जाता हूं
टीवी पर एक भयावह दृश्य है
इक्कीस दिन के लॉक डाउन में
आनंदविहार बस अड्डे पर यूपी बिहार
झारखंड अपने गांव जाने वाले 
दिहाड़ी मज़दूरों की
बीस-पच्चीस हज़ार की भीड़ 
एक-दूसरे से चिपकी हुई गुंथी हुई

एक के पास भी 
छिपा हुआ वायरस हुआ तो तो तो
तो कई प्रदेश श्मशान में बदल जाएंगे
कहां है दिल्ली सरकार कहां है केंद्र
कहां है मज़बूत सरकारों का प्रबंध
ओह कितना कमज़ोर है
और सबसे बड़ी बात जनता ख़ुद 
मौत के मुंह में क्यों जाना चाहेगी
ज़रूर कोई बड़ी मजबूरी होगी
चाहे हुआ होगा कुछ उसके साथ
बुरा

टीवी बंद करके बिस्तर पर लौटता हूं
तो दिन में दिल्ली के डिप्टी सीएम का
बयान याद आता है-
हमने स्कूलों में शेल्टर होम बनाए हैं 
पूरा इंतजाम है रहने खाने का
लेकिन कोई अपने घर जाना चाहेगा 
तो हम ज़बरदस्ती कैसे रोक सकते हैं
और दिल्ली सरकार की बसों से
भीड़ को आनंदविहार ले जाया जाता है

केंद्र कुछ कहता है
राज्य सरकारें कुछ करती हैं
यहां की सरकारों के अहमकों को
दूसरे देश के राजनेताओं के बारे में
पता नहीं कि उनका टेस्ट पाजिटिव आया है
एक देश की राजकुमारी गुजर गयी है
वायरस के साथ की गयी राजनीति
महंगी पड़ेगी राजनेताओं 
सब मारे जाओगे मौत किसी को 
ऊंची कुर्सी की वजह से छोड़ नहीं देगी

दूसरे देश कोरोना से लड़ने के लिए
कार और दूसरी चीज़ें बनाने वाली
फैक्ट्रियों में तेजी से वेटिंलेटर बना रहे हैं 
देशवासियों के लिए सांसें बना रहे हैं
उनके जीवन को बचाने के लिए 
पूरी ताक़त झोंक दे रहे हैं
अस्पताल बना रहे हैं 
जांच किट बना रहे हैं 
दवा बना रहे हैं

अपने देश की बेटी 
वायरोलॉजिस्ट मीनल 
अपने बच्चे को जन्म देने के 
कुछ घंटे पहले तक अथक काम करके
देश के तमाम बच्चों और उनके
माता-पिता के लिए
कोविड-19 का जांच किट बनाती है
देश के लाखों डाक्टर नर्स
और स्वास्थ्यकर्मी भाई-बहन
जान की बाजी लगाकर लड़ रहे हैं

और हमारे कुछ नेता 
ओछी राजनीति कर रहे हैं
टीवी पर सरकारी विज्ञापन में 
एक सीएम निर्लज्जतापूर्वक 
अपना प्रचार करते हुए
मसीहा बनने की क्या खूब नौटंकी 
कर रहा है

बहुत मुश्किल वक़्त है
देश पर एक लंबी काली रात तारी है
हम मौत की जिस काली लंबी रात से
गुजर रहे हैं क्या गुजर पाएंगे
क्या सुकून की सुबह ला पाएंगे
सुबह के बारे में सोचता हूं
डर जाता हूं

मेरी आंखों की नींद
चुरा ले गयी है पृथ्वी पर पसरी हुई
मृत्युभय की अपूर्व काली छाया
लंबी रात की देह में प्रवेश कर चुकी है
और मेरी नींद को कुतर-कुतर खा रही है
मेरे कानों में उसके दांतों के चलने की
बहुत तेज़ आवाज़ आ रही है

कोई भारी चक्की चल रही है
जिसमें मेरी नींद पिस रही है
मेरा चैन पिस रहा है हम पिस रहे हैं
और पृथ्वी पर महामृत्यु हंस रही है 
अट्टहास कर रही है।

(कोरोना पर पहली लंबी कविता ’पृथ्वी पर काली छाया’ के बाद, कोरोना पर दूसरी लंबी कविता है ’ लंबी रात’।)