सोमवार, 28 अक्टूबर 2019

सिद्धांत सीखा प्रयोग छोड़ दिया तथा अन्य कविताएं

- गणेश पाण्डेय
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सिद्धांत सीखा प्रयोग छोड़ दिया
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नयी सदी में
एक काम हमने बहुत अच्छा किया
भारतेंदु से लेकर आचार्य शुक्ल तक
और आचार्य शुक्ल से लेकर छोटे सुकुल तक
इससे पहले ऐसा कमाल हिंदी में नहीं कर पाए थे
हमने
अपने समय की सभी विद्याओं और ज्ञान की
शाखा-प्रशाखा और बाहर की शाखाओं में भी
मनोयोगपूर्वक प्रवेश किया कोई कोना छूटा नहीं
अलबत्ता आधा सीखा आधा छोड़ दिया
सिद्धांत सीखा और प्रयोग छोड़ दिया

असल में हम
हिंदी के बहुत व्यस्त लेखक थे
जगह-जगह जाना था हर तरफ जाना था
कहीं स्वतंत्रता और समता पर भाषण देना था
कहीं निराला और मुक्तिबोध को आदर्श बताना था
एक ही दिन में तीन मठाधीशों और चार उपमठाधीशों का
पैर दबाना था चंपी करना था गिलास में रसरंजन डालना था
और उसके बाद नाचने-गाने का प्रोग्राम अलग से करना था
थककर चूर होने के बाद हमारे पास
सिद्धांतों से जुड़े प्रयोग के लिए समय कहां था
सो हमने छोड़ दिया

असल में
हम हिंदी के नयी सदी के लेखक थे
हिंदी के पुरानी सदी के लेखकों की तरह पागल नहीं थे
कि हर चुनौती हर आदर्श के लिए दीवार पर माथा पटकते
लहूलूहान होते अपने समय के अंधेरे में गुम हो जाते
कि कोई आएगा हमें झाड़ से निकालकर
झाड़-पोंछकर खड़ा करेगा सबको बताएगा हमारे बारे में
एक ऐसे समय में जब हम अपने बाप को नहीं पहचानते
आने वाले वक्त के लेखकों पर कैसे भरोसा कर सकते थे

हमसे जो बन पड़ा हमने किया
हम हिंदी के लेखक थे कोई स्वतं़त्रता सेनानी नहीं
हम हिंदी के मामूली आदमी थे कोई देवता नहीं
हम अपनी सदी के लोग थे हमें पिछली सदी से क्या
हम हिंदी की दुक्की थे
तिग्गी थे चौका थे छक्का थे
गुलाम थे बहुत हुआ तो बेगम थे
हम हिंदी के बादशाह कैसे हो सकते थे
हम हिंदी के भगत सिंह नहीं थे
हम हिंदी के महात्मा गांधी नहीं थे
हम भला सत्य के प्रयोग कैसे कर सकते थे
हम बीच के लोग थे हमने बीच का रास्ता चुना
आधा सीखा आधा छोड़ दिया
सिद्धांत सीखा प्रयोग छोड़ किया।

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आज का भारत
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आज का भारत
बहुत मजबूत भारत है
बहुत कामयाब भारत है
पाकिस्तान को खूब डरा सकता है
हजार बार उसकी हेकड़ी निकाल सकता है

लेकिन आज का महाभारत
इस महादेश की गरीबी बेरोजगारी
और भ्रष्टाचार को हरगिज डरा नहीं सकता है
डराना तो दूर उसे चांटा भी नहीं दिखा सकता है

आज का भारत
अलबत्ता दावे बड़े बड़े कर सकता है
राजनीति में ऊटपटांग फैसले ले सकता है
संन्यासी को राजपाट और नागरिक को
भूख से मरने के काम में लगा सकता है
अपने अपने विषय के फिसड्डियों को
बड़े बड़े पद पर बैठा सकता है
और प्रतिभाओं को अहर्निश
घास छीलने के काम में लगा सकता है
सच तो यह कि कुलपतियों का
अधोवस्त्र धुलने वालों को
कुलपति बना सकता है

आज का भारत
झूठे का चेहरा चमका सकता है
सच्चे को हद से ज्यादा परेशान कर सकता है
अपराधियों के मुकदमें वापस ले सकता है
और निरपराध नागरिक को शक की बुनियाद पर
मरने के लिए छोड़ सकता है

आज का भारत
कल के भारत में
अपने राजनेताओं के लिए कम
और हिन्दी के खूंख्वार
इनामखोरों की बुजदिली के लिए
ज्यादा याद किया जा सकता है।

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बेहतरीन कवियों की लिस्ट
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हिन्दी के आज के
बेहतरीन कवियों की लिस्ट जारी हुई है
जिन्होंने जारी की है यह लिस्ट
भले जन हैं सामाजिक कार्यकर्ता हैं
बहुत आदरणीय हैं
शायद साहित्य के प्रति ईमानदार भी हैं

वाकई बहुत से बहुत भले हैं
बहुत से बहुत ज्यादा विचारवान हैं
देश और दुनिया की क्रूर सत्ताओं को
उखाड़ फेंकने का स्वप्न नित देखते हैं
पूंजीवाद के नाश के लिए सदैव सोचते हैं
जन को हित के लिए संघर्ष से जोड़ते हैं
ऐसे व्यक्ति के लिए सम्मान स्वाभाविक है

आज आंख खुली
उनकी हिन्दी के एक से एक बेहतरीन
कवियों की लिस्ट देखकर
साहित्य के प्रति यह अनुराग
कविता के प्रति यह प्रेम
कवियों के संसार की यह समझ उत्तम है
वाकई क्रांति इसी रास्ते से आएगी

जो कवि साहित्य में अपने आचरण से
जितना लज्जित करेगा उतना बेहतरीन होगा
जो कवि पुरस्कार के लिए जितना रोएगा
भ्रष्ट अकादमी की जितनी परिक्रमा करेगा
और अपनी कविता में जितना तीन-पांच करेगा
जो कवि साहित्य की सत्ता की पालकी ढोएगा
नित मठाधीशों के सामने उठक बैठक करेगा
जो कवि भीतर से जितना काला होगा
और खूब सुंदर क्रांतिकारी कविताएं लिखेगा
वह कवि उतना ही बेहतरीन होगा
धन्य है यह काव्य-विवेक

हे विचार के भले मानुष
हे परिवर्तन के वाहक
मुझ पर आपकी कृपा दृष्टि बनी रहे
मुझे अपनी बेहतरीन कवियों की सूची से
सौ कोस दूर रखिएगा
निश्चय ही मैं अपने समय का
सबसे खराब कवि हूं
मैंने बाकायदा खराब कविताएं लिखीं हैं
मैं साहित्य में विध्वंस चाहता हूं
साहित्य की भ्रष्ट सत्ताओं को
उखाड़ फेंकने का स्वप्न देखता हूं
मैं हिन्दी का पागल हूं
सिर्फ राजनेताओं की ही नहीं
लेखकों की भी पूंछ उठाकर देखता हूं
उनकी रचनाओं को ऊपर से नहीं
उसमें घुसकर देखता हूं
एक-एक छेद देखता हूं।

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अकेले कबीर
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कबीर
अपने समय के
पंडितों के बीच
कैसे रहे होंगे

कबीर को
उनके समय में
कितने लेखकों ने
पसंद किया होगा

कबीर
अपने समय में
कितना अकेला
रहे होंगे

कबीर
अपनी कविता में
पानी की जगह
आग क्यों लिखते रहे

कबीर
आज होते तो पंडितों से
इनाम ले रहे होते
या उन्हें लुकाठी से
दाग रहे होते

बड़ा सवाल यह
हिन्दी के इनामी डाकू
कबीर के साथ आज
कर क्या रहे होते!

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तुम्हारा नाम
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लेखको
तुम सब चाहे जितना
नाच लो तान तोड़ लो

अपने समय के
न कबीर कहे जाओगे
न प्रेमचंद न मुक्तिबोध

चाहे जितना
अनुवाद करा लो
खुद पर किताब छपवा लो

अपने समय के
हिन्दी के कीट-पतंग भी
समझे जाओगे संदेह है

शायद ही कोई
तुम्हारा नाम उस तरह ले
जैसे मैं नाम लेता हूं

खुशी-खुशी
गुमनामी में जीने वाले
देवेंद्र कुमार बंगाली का।

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प्रकाश किसको प्रकाशित करता है
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खुश रहो
बेकार की चीजों
और लोगों में मत उलझो

आगे बढ़ो
बढ़ते ही जाओ पीछे नीचे
और दाएं बाएं मत देखो

प्रकाश का धर्म निभाओ
प्रकाश का स्वभाव अग्रगामी होता है
बस सामने देखो

एक गुरु ने
अपने प्रिय शिष्य को सीख देते हुए
बहुत आशीष दिया

शिष्य की मति मारी गयी थी
अंधकार के ढेर पर बेठे बैठे
गुरु से जिज्ञासावश पूछ लिया

हे गुरुश्रेष्ठ प्रकाश
किसको प्रकाशित करता है
प्रकाश को या अंधकार को

गुरु ने दुखी होकर कहा
जाओ बच्चा साहित्य में अब
तुम्हारा कुच्छ नहीं हो सकता।

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कहां कमी रह गयी
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ओह
इतने विश्वविद्यालय
और इतने महाविद्यालय

और
इतने सुयोग्य आचार्य
इतने सह आचार्य

असंख्य दीये
हर साल जलाए गये
भव्य दीक्षांत समारोह हुए

फिर भी
समाज में अंधेरा
और अंधविश्वास छंटा नहीं

आखिर
कहां कमी रह गयी
उस पर चोट क्यों नहीं हुई।

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आचरण की पाठशाला
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ज्ञान के बड़े बड़े
विश्वविद्यालय बने

ऐसे ही तमाम
महाविद्यालय बने

ऐसे ही ज्ञान के
असंख्य छोटे विद्यालय बने

कोई बता सकता है
इनसे कितने मनुष्य बने

क्यों क्यों क्यों ये ज्ञान के
चमकीले खंडहर बने

ओह आचरण की पाठशाला
आखिर ये क्यों नहीं बने।

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साहित्य के सत्य की खोज
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यश की कामना
क्या मानवता के हित में है

यश की कामना
क्या समाज के हित में है

यश की कामना
क्या देश के हित में है

यश की कामना
क्या न्याय के हित में है

यश की कामना
क्या साहित्य के हित में है

अपने समय में यशस्वी होने से
क्या कृतियां कालजयी हो जाती हैं

यशस्वी न होने से लेखक
क्या दस्तखत करना भूल जाता है

गुमनाम रहने से कोई लेखक
क्या गोबर गणेश हो जाता है

क्या यश सत्य है
क्या अपने समय के यशस्वी सत्य हैं

क्या यश की भूख सत्य है
या कृति के लिए की गयी मौन साधना

यश के चंद्रयान पर बैठकर चंद्रमा पर
विक्रम की तरह हार्ड लैंडिंग करने वाले

यशस्वी लेखक धरती के लेखकों को
क्या बता सकते हैं साहित्य का सत्य।








बात बोलेगी : राजेन्द्र कुमार का खत

                                                                                               दि.5अक्तू.2019, इलाहाबाद।
प्रियवर गणेश पांडे जी,
कुशल से होंगे। हालांकि यह कहना भी अब मात्र एक औपचारिक मुहावरा बनकर रह गया है। जो भी व्यथित और जरा भी संवेदनशील है, वह बाहर से भले ही सकुशल दिखे, मन से तो हमेशा बेचैन और द्वंद्वग्रस्त ही रहता है। स्थितियां ही कुछ ऐसी हैं। जो दुनियादार हैं, वे स्थितियों में खुद को ढालकर अपने मन को समझा लेते हैं, अवसर के मुताबिक राह पकड़ लेते हैं। लेकिन जो स्थितियों की भयावहता, अमानवीयता, असहिष्णुता के बारे में सोचे बिना नहीं रह पाते-प्रायः उनकी नियति होती है - अकेलापन।
आपको वर्षों से लिखते-पढ़ते देख रहा हूं। इधर थोड़ा-बहुत ह्वाट्सएप, फेसबुक जैसे माध्यमों से थोड़ी-बहुत वाकफियत हो गयी है। फेसबुक पर भी आपकी चिंताओं से परिचित होता रहता हूं। आपकी चिंताओं में अपने को भी शामिल पाता हूं। अपने-अपने अकेलेपन के अंधेरे में, यह शामिल-पन का भाव कभी-कभी उम्मीद के जुगनुओं की तरह जग-मगा उठता है। कुछ साथी - कहीं भी हों, कितनी भी दूर- पर हैं तो, जो अब भी सोचने और महसूस करने की क्षमता बचाकर रखे हुए हैं। यह भी हम-आप जैसों के रचनात्मक सहारे के लिए कम बड़ी बात नहीं है।
आपने 2 अक्टूबर वाली पोस्ट में लिखा-‘ साहित्य में अंधेरा फैलाने वाले, आज गांधी पर प्रकाश डालेंगे!‘ यह विडम्बना यों तो मात्र साहित्य की नहीं, राजनीति-समाज-चिंतन वगैरह सभी क्षेत्रों की है, लेकिन आपने साहित्य का उल्लेख किया तो इसका मर्म मैं समझ सकता हूं। निराला ने ‘सरोज-स्मृति‘ में लिखा- ‘ मैं कवि हूं, पाया है प्रकाश! ‘ यह कोई व्यक्तिगत दंभ नहीं था। यह कवि होने या साहित्यकार होने की सबसे सारगर्भित परिभाषा थी। कवि होना गहरे अर्थो में ‘प्रकाश प्राप्त‘ होना है। प्रेमचंद ने भी राजनीति से नहीं, साहित्य से ही ज्यादा आशा की थी-‘साहित्य राजनीति के आगे-आगे चलने वाली मशाल है।‘ लेकिन आज ‘प्रकाश‘ और ‘मशाल‘ जैसे शब्दों को हमारे तथाकथित कवि और साहित्यकार ही अर्थहीन करते जा रहे हैं। राजनीति ने तो पहले ही इन शब्छों को मात्र चुनाव-चिह्न जैसा कुछ बनाकर रख दिया है। राजनीति में तो अंधेरा ही सर्वत्र अट्टहास कर रहा है। इस अट्टहास को ही प्रकाश की तरह बिखेरा जा रहा है। इस अट्टहास की चकाचौंध में प्रकाश का इतना भ्रम है कि आंखें चौंधियां जाती हैं। देखने की क्षमता ही जाती रहती है। और आपने इस विडम्बना की ओर ठीक ही इशारा किया है, गांधी के हवाले से। जिनको कुछ नहीं दिखता, वे ही सबकुछ देख लेने की डींग हांकते हैं। अंधता इतनी दंभी कि गांधी जैसा पुरुष-जो खुद अपनी आंखों से देखने पर विश्वास करता था, जिसने सत्य का प्रकाश पाने के लिए ‘सत्य का प्रयोग‘ करने की ठानी थी- उस पर अंधता प्रकाश डालने का दावा करती है।
मैंने कभी लिखा था,‘साहित्य एक प्रकार का रचनात्मक हठ है कि मनुष्य को सबसे पहले और सबसे आखिर तक सिर्फ मनुष्य के रूप में ही पहचाना जाए, न फरिश्ते के रूप में, न राक्षस के रूप में, न देवता के रूप में, न सिर्फ साधु या शैतान के रूप में।‘
गांधी को क्या मनुष्य के रूप में सचमुच हम अभी तक पहचान सके हैं? हमने मूर्तियां बना दीं, न्यायालयों और सरकारी दफ्तरों में उनके फोटो टांग दिए। इन सब रूपों में आज गांधी आज कितने दयनीय हो उठे हैं कि उन्हीं की फोटो के नीचे बैठे अधिकारीगण कैसे-कैसे स्वार्थ-लिप्सा भरे कारनामों को अंजाम दे रहे हैं।
गांधी को इस दयनीयता से क्या सिर्फ उन पर कविताएं लिखकर उबारा जा सकता है? है कोई ‘प्रकाश प्राप्त‘ कवि जो उनकी इस दयनीयता को सवमुच देख सके? महसूस कर सके? गांधी का अनुसरण करने-कराने का उपदेश देने वाले हर क्षेत्र में हैं। साहित्य में भी। पर गांधी बेचारे ऐसे अनुसरणकर्ताओं से बचने के लिए छिपते-छिपाते, टाट वाले बोरे में अपना चेहरा ढके चुपचाप मुकित्बोध की कविता में चले गए हैं।
सच पूछिए तो अब ‘अनुसरण‘ या ‘अनुयायी‘ जैसे शब्द पाखंड का पर्याय हो गए हैं। कोई किसी का अनुसरण नहीं करना करना चाहता है, सिर्फ अपने-आपके सिवा। अब अनुयायी होना नहीं, पिछलग्गू होना फिर भी कुछ अर्थवान शब्द है। पिछलग्गू ऐसे व्यक्तियों का, जो लाभ पहुंचाने की स्थिति में हों। थोड़ी ख्याति मिल जाए, पुरस्कार या उपाधि मिल जाय-बस इतना ही अभीष्ट है। आज के लेखक की महत्वाकांक्षाएं भी बड़ी क्षुद्र हैं। वह अपनी क्षुद्रता में अमर होना चाहता है।
ऐसी अमरता को हम-आप क्यों चाहें? क्योंकि हमारे लिए तो यह जीते जी मर जाने के समान है। ऐसे में तो अच्छा है, कबीर की तरह रहें-मेरो मन लागा ठाठ फकीरी में! हम साहित्य के फकीर बने रह सकें, यही कामना हमारे लिए ठीक है।
अभी इतना ही।
हां, इतना और कि ज्यादा शिकायती होने में वक्त जाया न करें। हर स्थिति में जितना रचनात्मक हो सकें, रहें।
आपकी सक्रियता और सार्थक चिंताओं में आपका सहभागी-
राजेंद्र कुमार

शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2019

भाई सीरीज

- गणेश पाण्डेय

(1)
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भाई बीमार हैं
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भाई बीमार हैं
अस्सी के पास पहुंचकर
सौ पार लग रहे हैं भाई

भाई बीमार हैं
बिस्तर पर लेटे लेटे भाई
कहते हैं बहुत लाचार हैं

ये मेरे कान नहीं सुन रहे हैं
आंखें सुन रही हैं बोल रही हैं
आप लोग तो जानते ही हैं
कि आंखों की भाषा
कितनी तरल होती है
क्या क्या भिगो देती हैं

भाई बीमार हैं
मैं उन्हें लंबे समय के बाद
इतने करीब सै देख रहा हूं
आमने-सामने बैठकर

भाई बीमार हैं
भाई की आंखों में
बीता हुआ समय फिर से
बीतता हुआ देख रहा हूं

भाई बीमार हैं
मेरे सामने सहसा
भाई की आंखों की पुतली
खेल का मैदान बन जाती है
भाई को हाकी खेलते हुए
देख रहा हूं

भाई बीमार हैं
और भाई की कलाई का जादू
फिर से चलते हुए देख रहा हूं
एक दो तीन चार लगातार
भाई को हाकी से गोल करते
देख रहा हूं और रोम रोम में
रोमांच से भर जा रहा हूं

भाई बीमार हैं
भाई की आंखों में
भाई की उंगली पकड़कर
खेल के मैदान से लौटते हुए
खुद को देख रहा हूं सोच रहा हूं

भाई बीमार हैं
काश भाई ने जिंदगी में भी
ऐसे ही लगातार गोल किए होते
तो इतना बीमार न हुए होते
इतनी बेकदरी न हुई होती

भाई बीमार हैं
भाई मेरे पास रहे होते
तो इतने बीमार न हुए होते
इतने उदास न होते
मेरे सहोदर मेरे सहचर होते

भाई बीमार हैं
मुझे भी अपने घर लौटना है
कुछ देर और ऐसे ही
बीमार भाई के सामने बैठा रहा
तो मैं पूरी तरह ढह जाऊंगा
और मुझे ढहता देख भाई
ढह जाएंगे।

(2)
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भाई तो हीरा थे
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भाई थे तो लगता था
हैं और रहेंगे कभी जाएंगे नहीं

कई बार कई मूल्यवान चीजें
पास में रहती हैं तो लगता ही नहीं
कुछ मूल्यवान भी है

कोई चीज गुम हो जाती है
तो लगता है अरे हीरा था खो गया है

भाई तो हीरा थे ही
वक्त की धूल से चमक छिप गयी थी
मजबूत पेड़ भी धराशायी हो जाता है
एक दिन

भाई कहां होंगे पिंजरे से निकलकर
ऊपर और ऊपर अधबीच में होंगे
या पहुंच चुके होंगे अम्मा के पास
चाहे बाबूजी के पास या दोनों के पास

बड़े भाई इसीलिए पैदा होते हैं
कि छोटे भाई को बुढ़ापे में भी
अकेला छोड़कर पहले चले जाएं
खूब रुलाने के लिए

जा तो रहे हो भाई
अम्मा पूछेंगी चले क्यों आए
छोटकू के नाती पोतों से मिले बगैर तो
अम्मा को बाबूजी को बुआ को दादी को
सबको कैसे समझाओगे भाई

अभी कितनी दूर पहुंचे होगे भाई
क्या लौट नहीं सकते भाई।

(3)
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भाई का अधखुला मुंह
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भाई का मुंह
खुला का खुला
अधखुला रह गया हो
ऐसा पहली और आखिरी बार हुआ है

क्या चाहिए भाई
पानी शरबत चाय कुछ तो बोलो
कोई दवाई कोई सिरप
क्या है भाई

इस अधखुले मुंह में
किसका कौर चाहिए भाई
अम्मा का कौर बुआ का कौर
कि चंदा मामा का कौर

मेरा भी कौर ले लो भाई
ये मेरा सोहन हलवा मेरी जलेबी
ये दो पैसे की आइसक्रीम
गंगाजल चाहिए भाई

ये सब कुछ नहीं चाहिए
तो बताओ भाई होंठ हिलाओ
बोलो तो क्या बचा रह गया है
अभी कहने से कंठ में

मुझे डांटना चाहते हो भाई
लो तुम्हारे सामने हूं डांट लो
प्यार कहना चाहते हो चूम लो
आशीष देना है सिर पर हाथ रख दो

जाते जाते बचपन की तरह
मेरा ऐसा इम्तहान न लो भाई
कि फेल हो जाऊं अम्मा से डांट खाऊं
अधखुले मुंह से कुछ तो बोलो भाई।

(4)
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मेरे भाई जल रहे हैं
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मेरे भाई
मेरी आंखों के सामने
जल रहे हैं

मैं चिता से
विनती करता हूं
हे चिता मद्धिम जलो

भाई
जैसे जैसे जल रहे होंगे
वैसे वैसे धिक रहे होंगे

हे अग्नि शीश नवाता हूं
भाई की आंखों के सपने
और प्यार मेरे लिए छोड़ देना

भाई का हदय
बहुत कोमल है फूल से भी
ज्यादा कोमल उसे छूना मत

हे अग्नि भाई का दिल
जिसमें मेरे लिए प्यार का सागर है
मेरी अंजुरी में लौटा देना

हे अग्नि दया करना
मेरे अति निश्छल निष्कलुष
गैर दुनियादार भाई पर

कैसे चिता पर भाई
धू-धू कर जल रहे है
रुई के फाहे की तरह

भाई जाते-जाते
एक बार फिर मेरे सामने
कौतुक कर रहे हैं

मैं रो रहा हूं बचपन की तरह
भाई के सताने पर
मार दूंगा भाई

अपने भाई के लिए मुझे
इस तरह कोने में टूटकर रोते हुए
देखकर

भाई की चिता के बिल्कुल पास
मेरी आत्मा छाती पीट-पीटकर
रो रही है विलाप कर रही है

हाय
मेरे भाई जल रहे हैं।

(5)
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लौट आओ भाई
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भाई के पास
पैसे बहुत कम थे
मेरे पास उनसे काफी ज्यादा पैसे थे
ऐसा नहीं होना चाहिए था

मेरे भाई
मुझसे कम योग्य नहीं थे
बस सफलताएं उनके हाथ से
फिसल जाया करती थीं

भाई पैदल चलते थे
मैं उनसे मिलने कार से जाता था
भाई को मुझसे कोई ईर्ष्या नहीं थी
वे तो मेरे लिए आशीर्वाद लुटाते थे

भाइयों के इस बुरे समय में
ऐसे भाई शायद और भी होते होंगे
पर भाई को देखने की मेरी आंख
औरों की तरह नहीं है

मैं जब भी भाई को देखता हूं
भाई की चिट्ठियां देखता हूं
बाहर की आंख से नहीं भीतर से
देखता रह जाता हूं

भाई की लिखावट में
भाई की उंगलियां देखता हूं
चूमता जाता हूं

एक-एक शब्द में
भाई का चित्र देखता हूं
छूता हूं पुकारता हूं
लौट आओ भाई।




                                                                                                              


सोमवार, 21 अक्टूबर 2019

भाई बीमार हैं

भाई बीमार हैं
अस्सी के पास पहुंचकर
सौ पार लग रहे हैं भाई

भाई बीमार हैं
बिस्तर पर लेटे लेटे भाई
कहते हैं बहुत लाचार हैं

ये मेरे कान नहीं सुन रहे हैं
आंखें सुन रही हैं बोल रही हैं
आप लोग तो जानते ही हैं
कि आंखों की भाषा
कितनी तरल होती है
क्या क्या भिगो देती हैं

भाई बीमार हैं
मैं उन्हें लंबे समय के बाद
इतने करीब सै देख रहा हूं
आमने-सामने बैठकर

भाई बीमार हैं
भाई की आंखों में
बीता हुआ समय फिर से
बीतता हुआ देख रहा हूं

भाई बीमार हैं
मेरे सामने सहसा
भाई की आंखों की पुतली
खेल का मैदान बन जाती है
भाई को हाकी खेलते हुए
देख रहा हूं

भाई बीमार हैं
और भाई की कलाई का जादू 
फिर से चलते हुए देख रहा हूं
एक दो तीन चार लगातार
भाई को हाकी से गोल करते
देख रहा हूं और रोम रोम में
रोमांच से भर जा रहा हूं

भाई बीमार हैं
भाई की आंखों में
भाई की उंगली पकड़कर
खेल के मैदान से लौटते हुए
खुद को देख रहा हूं सोच रहा हूं

भाई बीमार हैं
काश भाई ने जिंदगी में भी
ऐसे ही लगातार गोल किए होते
तो इतना बीमार न हुए होते
इतनी बेकदरी न हुई होती

भाई बीमार हैं
भाई मेरे पास रहे होते
तो इतने बीमार न हुए होते
इतने उदास न होते
मेरे सहोदर मेरे सहचर होते

भाई बीमार हैं
मुझे भी अपने घर लौटना है
कुछ देर और ऐसे ही
बीमार भाई के सामने बैठा रहा
तो मैं पूरी तरह ढह जाऊंगा
और मुझे ढहता देख भाई
ढह जाएंगे।

- गणेश पाण्डेय



                                                                                   

शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

दोस्त सीरीज

- गणेश पाण्डेय

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दोस्त 1/
अच्छी कीमत
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जैसे
सबके पास होते हैं
मेरे पास भी कुछ दोस्त थे

मैं उन्हें खोना नहीं चाहता था
ये तो मेरे दुश्मन थे जिन्होंने
उन्हें चुटकी में खरीद लिया

ऐसा नहीं है
कि मेरे दोस्त बिकना नहीं चाहते थे
बस उन्हें अच्छी कीमत का इंतजार था।

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दोस्त 2/
बिकना
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सब
बिक जाते हैं

साथी दोस्त रिश्तेदार
कौन नहीं बिकता है आज
सब बिक जाते हैं

कोई बड़ा ओहदा हो
चाहे टेंट में खूब अशर्फियां
कौन नहीं बिक जाता है
सब बिक जाते हैं

माफ करें
मैं उन पागलों की बात नहीं करता
जो बिकने के लिए पैदा ही नहीं होते
फटीचर हैं कमबख्त

वर्ना कौन
बिकने के लिए पैदा नहीं होता
सब बिक जाते हैं।

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दोस्त 3/
पतंगबाज
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मेरे कुछ दोस्तों को
दिल्ली की हवा लग गयी है
वे कई साल उन्हीं हवाओं में रहे
कभी दाएं कभी बाएं डगमगाकर
संभाला है उन्होंने खुद को

उनके लिए साहित्य
शुद्ध शुभ-लाभ का जरिया है
नाम-इनाम की लंबी पतंग उड़ाना
उन्होंने उन्हीं हवाओं में सीखा है

दूसरे की पतंग काटना
और अपनी चढ़ाते चले जाना
अपनी तो अपनी
किसी मामूली उम्मीद में
दूसरे की पतंग दिनरात उड़ाना
यह सब उन्हें दिल्ली ने सिखाया है

दिल्ली की हवाओं ने उन्हें
एक मजबूत लेखक की जगह
शातिर पतंगबाज बना दिया है

आजकल
मेरे कुछ पतंगबाज दोस्त
अकादमी अध्यक्ष की
भैंस की सींग पर बैठकर
कुछ पीठ पर लेटकर
कुछ पूंछ पकड़कर
पतंग उड़ा रहे हैं।

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दोस्त 4/
कुछ दोस्त तो होने ही चाहिए
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एक आदमी के पास
कुछ दोस्त तो होने ही चाहिए
चाय पर साथ देने के लिए क्यों न हो

एक आदमी के पास
कुछ दोस्त तो होने ही चाहिए
कोई गम भूलने के लिए क्यों न हों

एक आदमी के पास
कुछ दोस्त तो होने ही चाहिए
किसी की बुराई करने के लिए क्यों न हों

एक आदमी के पास
कुछ दोस्त तो होने ही चाहिए
धोखा खाने के लिए ही क्यों न हों।

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दोस्त 5/
जब आप विद्रोह करते हैं
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जब आप 
साहित्य में विद्रोह करते हैं
तो अपने सभी ढिलपुक दोस्त
एक-एक करके खो देते हैं

ऐसे दोस्त
फोन पर भी कम मिलते हैं
करो तो बाथरूम चले जाते हैं
भूले-भटके मिल भी जाएं
तो खुलकर नहीं मिलते
जैसे मैला हो गया हो 
मन

ऐसे डरते हैं 
ऐसे दोस्त लोग डान से
जैसे उनके मोबाइल में 
जुबान के नीचे कान के अन्दर
बालों में बनियान के नीचे
छिपे हों असंख्य जासूस

कहीं दिख जाएं
सड़क पर औचक ऐसे दोस्त
तो साफ बचके निकल जाते हैं
जैसे उपग्रह से कोई देख न ले
और फैल न जाए हवाओं में
कोई बात।

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दोस्त 6/
बागी बनना खून में नहीं है
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आप कवि हैं
और किसी कवि से 
पक्की दोस्ती चाहते हैं
तो उससे खराब कविताएं लिखिए
खराब नहीं लिख सकते तो 
अच्छी कविताएं छिपाकर रखिए
छिपा नहीं सकते तो उसके 
कोप के लिए तैयार रहिए

किसी आलोचक से
दोस्ती चाहते हैं तो औसत लिखिए
कोई किताब उससे पूछे बिना
मत छपवाइए
एक डग भी उससे आगे मत बढ़ाइए
किताब छपवाइए तो ध्यान रहे
ब्लर्ब उसी से लिखवाइए
ताकि वह कह सके कि उसने
अमुक कवि को पैदा किया है

दोस्ती-फोस्ती कुछ नहीं चाहते
और बागी बनना खून में नहीं है
सिर्फ सिर छिपाने की जगह चाहिए
चाहे कविता पाठ और लोकार्पण
पुरस्कार वगैरह साहित्य का उद्देश्य है
तो प्रलेस जलेस जसम-फसम 
किसी में चुपके से शामिल हो जाइए।

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दोस्त 7/
दोस्ती में नुक्स
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दोस्ती करके देख ली
दोस्ती जीकर देख ली

दोस्ती में कच्चा-पक्का होता है
दुश्मनी में जो होता है पक्का होता है

दुश्मनी में लड़ना है तो लड़ना है
दुश्मनी में हमेशा चौकन्ना रहना होता है

दोस्ती में नुक्स यह है
बिना आंख मूंदे हो नहीं सकती है

थक गया हूं दोस्ती का बोझ ढोते-ढोते
छोड़कर चले जाएं मुझे मेरे ऐसे दोस्त

ऐसी दोस्ती से
हजार गुना अच्छी है दुश्मनी।





मंगलवार, 7 अगस्त 2018

भारत माता की बेटियां

- गणेश पाण्डेय

कुशीनगर में
बुद्ध चिरनिद्रा में थे
और पावा नगर में महावीर
उन्हें किसी ने जगाकर बताया नहीं
कि मुजफ्फरपुर से देवरिया तक
और देवरिया से न जाने कहां-कहां तक
पहुंच गये हैं स्त्री-अस्मिता-भक्षी

बुद्ध को 
किसी ने नहीं बताया
कि ढ़ाई हजार साल बाद
गणतंत्र किन हाथों में आ गया है

जागेंगे बुद्ध
जागेंगे महावीर
तो क्या पूछेंगे नहीं 
कि यह कैसी आजादी है
आखिर यह कैसा विकास है
क्या यही है कल्याणकारी राज्य

सभ्यता 
और मनुष्यता में
छिड़ गयी है खूनी जंग
संस्कृति के निकल आए हैं नुकीले दांत
राजनीति के नाखून बहुत लंबे हो गये हैं
कांक्रीट और लोहे से बनी बस्ती
और हिंस्र पशुओं के जंगल में 
कम फर्क रह गया है

हर जगह 
बेखौफ विचरण कर रहा है
बूढ़े और जवान गिद्धों का झुंड
एक-एक को चुन-चुन कर खा रहा है
बालिका गृह की नवदेवियों की देह
और उनकी जीवित आत्मा

ये बेटियां
क्या भारत माता की बेटियां नहीं हैं
कोई दुर्गा है कोई लक्ष्मी कोई सरस्वती
कोई नूर कोई मरियम कोई मलका
अब और क्या प्रमाण चाहिए
इनके वुजूद का
आखिर सरकारें क्यों मान लेती हैं
इन्हें जीते जी मुर्दा 
कोई भी आए
नोच खाए

ऐसी
सरकारें 
जो बेटियों की लाज नहीं बचा सकतीं
खुद लाज से मर क्यों नहीं जातीं।





सोमवार, 30 जुलाई 2018

भीड़ तथा अन्य कविताएं

- गणेश पाण्डेय

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बेवकूफो
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तुम
इनाम से दूर
जिन्दा नहीं रह सकते हो
वे
कुर्सी के लिए
किसी की भी जान ले सकते हैं
बेवकूफो
तुम्हारी भी।
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तुम्हें शर्म क्यों नहीं आती
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जिसे
तुम्हारा पाठक होना चाहिए था
देखो कैसे मारकाट कर रहा है
सड़क पर किस चीज के लिए
उसके हाथ में
तुम्हारी किताब होती
तो कितना अच्छा होता
लेकिन तुम्हें यह फिक्र क्यों नहीं है
जिसे
एक आदर्श नागरिक बनना था
जिसे क्रांति करना चाहिए था
तुम्हारी कविताएं पढ़कर
वह भी
आखिर तुम जैसा निकला
लालची चापलूस बिना रीढ़ का
सत्ता का मामूली पुर्जा
तुम्हें
शर्म क्यों नहीं आती
जन की चिंता क्यों नहीं करते
तुच्छ चीजों के लिए जीते हो
और आए दिन नाटक करते हो
प्रतिरोध का।
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भीड़
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पहले
हम कितने बड़े बेवकूफ थे
समझते थे कि भीड़ है तो आदमी
भीड़ में बिल्कुल सुरक्षित है
कहां चली गयी
वह प्यारी-सी सालों पुरानी बेवकूफी
जिसमें हमारे बच्चे सुरक्षित रहते थे
आखिर
अब आदमियों की भीड़ में
कैसे आ जाते हैं भेड़िए
कितना मुश्किल हो गया है
भीड़ के बीच से भीड़ के सामने से
भीड़ के पास से भीड़ के इलाके से
किसी भले आदमी और औरत
किसी बच्चे और बूढ़े का
गुजरना
और तो और
इस भीड़ में एक बकरी तक
सुरक्षित नहीं रह गयी है
यह कैसा विकासशील देश है
नहीं-नहीं
यह आदमियों की भीड़
नहीं हो सकती है
यह आदमियों के मुखौटे में
पशुओं की भीड़ हो सकती है
कैसे कह दूं कि इस मुल्क को
इस अतार्किक अवैज्ञानिक
अमानवीय असंवेदनशील
असभ्य अधर्मी
हिंसक भीड़ से कोई खतरा नहीं है!