शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

लेखक इंसेफेलाइटिस फैला रहे हैं...

-गणेश पाण्डेय

किसी का कोई शेर है कि हर आदमी में छुपे होते हैं दस-बीस आदमी, जिसे देखना है, उसे कई बार देखो। शायद मधुकर जी का है। शायद इसलिए कि पक्का नहीं है कि उन्हीं का है। इस शेर की जमीन पर कई लोगों के शेर हो सकते हैं। मधुकर जी इस शहर के बड़े दंगली कवि थे। कोई बात हो तो किसी भी लेखक को तुरत दौड़ा लेते थे। मुझे याद है कि मैं जब विद्यार्थी था, मधुकर जी मुझे भी एकाधिक बार कविसममेलन के मंच पर गीतफरोश बना चुके थे। बंगाली जी ने मना किया तो मंचो पर जाना छोड़ा। मंच ही नहीं, गीत भी छोड़ा। जो दो-चार थे, फाड़-फूड़ कर फेंक दिया। कहना मुझे सिर्फ उस शेर के बारे में था, लेकिन बात जब बीते दिनों की आ ही गयी है तो कह देने में कोई कोई हर्ज नहीं कि मधुकर जी मुझ पर और मेरे मित्र और मेरी पीढ़ी के बहुत अच्छे आलोचक अरविंद त्रिपाठी पर इस बात को लेकर काफी खफा रहते थे कि हम लोग ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बावजूद (हरिजन-मधुकर जी के शब्द में सीधे वही) देवेंद्र कुमार के साथ क्यों रहते हैं ? वे चाहते थे कि देवेंद्र कुमार का साथ छोड़कर उनके साथ रहें। बंगाली जी के घर कई बार रात का खाना खाते थे। बंगाली जी कमरे पर आ जाते थे और कहते थे कि देर हो गयी है, अब क्या खाना बनाओगे, चलो मेरे घर। कहना तो कुछ और था, पर बात आ ही गयी है तो यह भी कि हम लोग विश्वविद्यालय की दगी, बिन दगी या बिगड़ी हुई तोपों की जगह बंगाली जी को अधिक आदर देते थे। रिटायर होने के कुछ ही दिनों बाद उनका निधन हो गया था। आज बंगाली जी रहे होते तो इस शहर के हिंदी के परिसर में अकेलेपन की जिस त्रासदी से गुजरा हूँ, शायद वह सब नहीं हुआ होता। बहरहाल कहना यह नहीं था। कहना था कुछ और। शुरू में ही जिस शेर का जिक्र किया है। बात उसी से आगे।
     एक आदमी में कई आदमी के संदर्भ के साथ। चार-छः तो नहीं कह सकता, पर अधिकांशतः एक में दो की मौजूदगी देखता रहा हूँ। एक में दो अर्थात एक अच्छा तो उसी में एक खराब। कभी अच्छा वाला दिख जाता तो ज्यादा समय खराब दिखता। इधर कई दिनों से फेबु पर एक आदमी में दो आदमी देखने पर बड़ा जोर है। पर अधिकांश आदमी उसी आदमी में दूसरे बुरे आदमी पर पृथ्वी पर मौजूद सारी रोशनी डाल रहे हैं। चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि वह आदमी जो किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री है, मुख्यमंत्री नहीं सिर्फ एक बुरा आदमी है। आततायी है। आशय यह कि वह एक धर्म विशेष के मनुष्यों की सामूहिक हत्याओं के लिए दोषी है। अत्याचारी है। तानाशाह है। हिटलर है। देश को बर्बाद कर देगा। सीधे-सीधे कह तो नहीं रहे हैं, पर उनके कहने का मतलब यही है कि उसके आने से ट्रेनें नहीं चलेंगी। हवाई जहाज बंद हो जाएगा। विद्यालय में प्रवेश और परीक्षाओं का काम रुक जाएगा। लोग पहले की तरह साइकिल में पंक्चर ठीक करना बंद कर देंगे। मजदूर, मजदूरी नहीं करेंगे। टाटा-बिड़ला, अंबानी वगैरह खुद खेतों में हल चलाएंगे। बैंक बंद हो जाएंगे। कचहरियाँ नहीं रहेंगी। लोग रिक्शा नहीं चलाएंगे। जेएनयू को या तो बंद कर दिया जाएगा या वहाँ से हटा कर गुजरात भेज दिया जाएगा। उसके न आने से देश में लंबित सारे मुकदमे दस दिन में निस्तारित कर दिये जाएंगे। सबके बच्चे एक तरह के स्कूलों में पढ़ेंगे। जैसे सबके एक-एक वोट से सरकारें बनती हैं, उसी तरह सरकारें सबके बराबर-बराबर हित के हिसाब से काम करेंगी। सबको पैसा बराबर मिलेगा। सबके पास पैसा बराबर होगा। मँहगाई नहीं रहेगी। चीजों की कीमत नहीं बढ़ेगी। इत्यादि-इत्यादि।
    मेरे हमउम्र एक आलोचक और फेसबुकी मित्र सूची के सम्मानित सदस्य इधर कई दिनों से उसके आने को लेकर बहुत भयभीत हैं। रोज अपनी दीवार पर कुछ गोद देते हैं। (1) येदियुरप्पा दूर करेंगे भ्रष्टाचार/अबकी बार मोदी सरकार। (2) ना कुछ समझा ना कुछ जाना/ बस पाखण्ड किया मनमाना/फिर भी हो रही जयजयकार। (3)/माली आता देख कर /कलियन करी पुकार/ फूले फूले चुन लिए /कल हमारी बार / अब की बार मोदी सरकार। दूसरे कई मित्र हैं, जो उन्हीं की तरह तंज और डर का मजा ले रहे हैं। मेरी पीढ़ी तक ही नहीं है, डर का यह सिलसिला। मेरी पीढ़ी के पहले की पीढ़ी भी भयभीत है। आततायी पर कविता लिखती है और साहित्य में खुद आततायी का काम करती है। जनसत्ता में न सिर्फ ऐसे झूठमूठ के डर को जगह मिलती है, उस डर को महिमामंडित भी किया जाता है। बहरहाल यहाँ मेरा उद्देश्य किसी कवि या अखबार को छोटा बनाना नहीं है और मेरी खुद की हैसियत भी इतनी नहीं है। हाँ, अलबत्ता यह कहना चाहता हूँ कि साहित्य में कल्पना सच को प्रभावशाली बनाने का एक महत्वपूर्ण औजार है, लेकिन जीवन में इस तरह के काल्पनिक डर का क्या प्रयोजन है ? राजनीति में कल्पना का क्या योगदान है ? राजनीति और पत्रकारिता का रथ तथ्यों और तर्कों के पहिये पर चलता है। तथ्य और तर्क यह है कि आज तक किसी भी सरकार ने गैरबराबरी की खाई को  पाटने का काम नहीं किया है। दिखावा जरूर किया है।यह देश मेरा भी है/यह देश आपका भी है/एक मत मेरे पास है/एक मत आपके पास भी है/एक अरब आपके पास है/एक सौ मेरे पास है/यह देश आपको प्यारा है/मुझको भी जान से प्यारा है/एक छोटी-सी जिज्ञासा है/मान्यवर, यह देश/कितना आपका है कितना हमारा है। सबसे बुरा तो यह भाई कि साहित्य में मार्क्सवादी आलोचकों के शिष्य आलोचक भी गैर बराबरी के इस नारकीय खेल के खिलाफ कम और हिन्दू-मुसलमान के खेल में ज्यादा रुचि ले रहे हैं। यह ठीक है कि साम्प्रदायिकता का विरोध जरूरी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सिस्टम का विरोध करने की जगह व्यक्तियों के विरोध तक अपने को सीमित कर लो। 
‘‘बाबा 
तब कैसी थी दुनिया 
कैसे थे यहाँ के लोग-बाग 
ऐसी ही थी राजनीति की दुनिया 
स्वार्थ ऐसे ही निर्लज्ज था 
क्रूरता ऐसे ही असीम 
सब ऐसे ही थे 
जैसे ये हैं 
और इनके दल हैं 
ऐसे ही लूट लेते थे साधारण जन को 
कभी स्वप्न तो कभी भय दिखाकर 
ऐसे ही पहले के गैंग-शैंग करते थे 
पाँच-पाँच सौ और हजार-हजार के 
गांधी छाप नोटों की मोटी-मोटी गड्डी 
और आक़ाओं की कुर्सी की मजबूती के लिए 
क़त्ल दर क़त्ल 
ऐसे ही 
एक - एक साड़ी 
एक - एक पाउच
और दो-दो रुपये में 
खरीद लेते थे 
ईमान 
ऐसे ही जला देते थे अपने आज के लिए
सजातीय और सधर्मा जन-समूह का कल 
ऐसे ही रुपया उस समय का भगवान था 
ऐसे ही सबको क़र्ज़खोर बनाने के लिए 
किये जाते थे सरकारी उपक्रम
और उत्सव 

बाबा 
कैसा था उस वक़्त
माननीयों की समझ का संसार  
जैसे आज - 
इनकी बुनियादी समझ ही यही है 
कि इनके अलावा किसी के पास 
कोई समझ नहीं है 
देश में और इस शहर में 
जितने भी बैंक हैं बड़े-बड़े 
सब इनके सामने खड़े हैं 
शीश झुकाकर 
इनका 
छोटे से छोटा वोट बैंक
बड़े से बड़े बैंक से बड़ा है 
और ख़तरनाक 
ऐसा कोई बैंक 
पहले कभी देखा है बाबा 
किसी को वोट-सोट दिया है 
इनके चक्कर में पड़े हैं कभी 
आपके ज़माने की माया से 
कितनी ज़हरीली है आज की वोट माया 
कितनी चतुर है बाबा यह 
देखिए, तो - 
गणतंत्र के जीवन जल में 
कैसे डँसती है सबको 
मारौ मारौ 
स्रपनी निरमल जल पैठी...’’
(सबद एक पूछिबा)
      आज के राजनीति के जानकार बताएँ कि स्विस बैंकों में कालाधन जमा करना बुरा है तो देश की        राजनीति में वोट बैंक की राजनीति बुंरी क्यों नहीं ? क्या शुरू से ही इस लोकतंत्र को विवेक सम्मत बनाने की जगह वोटबैंक आधारित बनाने की कोशिश नहीं की गयी ? यह लोकतंत्र का अवमूल्यन नही तो और क्या है ? और तो छोड़िये पिछले दस साल देखिए कि हमारे पीएम महोदय लोकसभा के सदस्य नहीं थे,  राज्यसभा से आये। क्या यह कम गौरतलब है ? मैं यह नहीं कहता कि कोई मोदी का विरोध न करे। बेशक करे। कोई भी व्यक्ति इस सिस्टम से चुनकर आये। जो भी आएगा, इसी सिस्टम में उसे काम करना होगा। ऐसा नहीं होगा कि पहले अच्छा था, अमुक के आने पर खराब होगा। वह उन्नीस-बीस उतना ही अच्छा या खराब होगा जितना पहले था। इसलिए जरूरी है कि बुद्धिजीवी इस लोकतंत्र की कमजोरियों को ठीक करने के लिए आवाज उठायें। भ्रष्टाचार दूर करने के लिए जनलोकपाल बिल से पहले जरूरी यह था कि चुनाव से पैसे की भूमिका पूरी तरह खत्म करने का कानून बने। कोई  बिना पैसे के चुनाव लड़ सके। राष्ट्रीय स्तर पर भारत जैसे गरीब देश के गरीब नागरिकों के लिए चुनाव लड़ने के लिए प्रचार का माध्यम बने। गाड़ियों की भूमिका खत्म हो। जहाज की भूमिका खत्म हो। बड़ी-बड़ी रैलियों की भूमिका खत्म हो। इत्यादि-इत्यादि। अखबारों और साहित्य का भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए आलोचक और कवि लोग लगें। देश की बीमारी का इलाज भी जरूर ढ़ँूढ़ें, पर पहले साहित्य के इंसेफेलाइटिस को दूर करने का उपाय ढ़ँूढ़ें। जीवन और समाज में मच्छर इंसेफेलाटिस फैला रहे हैं, लेकिन साहित्य में लेखकवे यह काम खुद ही कर रहे हैं। साहित्य के तानाशाहों को रोको। साहित्य के सांप्रदायिक लोगों को रोको। साहित्य और खासतौर से आलोचना और साहित्यिक पत्रकारिता के भ्रष्टाचार को रोको। मोदी को भी रोको, लेकिन कहीं ऐसा न हो मित्र कि आप मोदी को भी न रोक पायें और साहित्य के तानाशाहों को भी भ्रष्टाचार करने से न रोक पायें। दोनों लड़ाई जीतो। चलो दोनों न सही, कोई एक तो जीतो ही। वैसे कोई लड़ाई न जीतो तो भी कोई हर्ज नहीं। जीतना या हारना तो बाद की चीज है, पहले जीवन में लड़ना जरूरी हैं। लड़ो, लड़ने का धोखा मत करो। साहित्य का सच कहो। राजनीति का सच कहो- 
‘‘अपने आकाश से उतर कर
लकदक खादी में खिलखिल करते 
हाथ हिलाते आयेंगे बादल 
तो कहेंगे क्या 
कि बैठिए मिट्टी की इस टूटीफूटी खाट पर
हरी चादर बिछी हुई है खास आपके लिए 
मेड़ का तकिया थोड़ा मटमैला है तो क्या हुआ
आप चाहें तो पसर सकते हैं आराम से
आप चाहें तो जुड़ सकते हैं हमारे जी से आराम से
आप चाहें तो समा सकते हैं 
मिट्टी की अतृप्त देह की आत्मा में
और जुड़ाकर हमें 
आप चाहें तो परमात्मा बन सकते हैं आराम से
आप चाहें तो अपनी खादी जैकेट की जेब से निकाल कर 
चाँदी की वर्कवाली पान की गिलौरी 
सोने के दाँतों के बीच रख सकते हैं आराम से
आप हमारे लिए कुछ न करना चाहें
किसी अमीरउमरा की कोठी में आराम फरमाना चाहें तो जा सकते हैं
हमारे मुँह पर थूक कर आराम से
आप बादल हैं सरकार
हम आपका क्या कर सकते हैं
आप का घर और आपका दफ्तर
और आपकी थानापुलिस सब आसमान पर
हमारी पहुँच से दूर
क्या कर सकते हैं हम
आप जब चाहें
असगाँव-पसगाँव सब जगह गरज सकते हैं
आप चाहें तो कहीं भी बरस सकते हैं
आप चाहें तो किसी के खेत के हिस्से का पानी
दे सकते हैं किसी और के खेत को
चाहे किसी पत्थर पर डाल सकते हैं सबेरे-सबेरे 
हंड़ेनुमा लोटे में भर कर सारा जल
आप चाहें तो अपना पानी 
सुर-असुर और नर-किन्नर किसी को भी न देकर
सब का सब बेच सकते हैं खुले बाजार में
आप बादल हैं तो क्या हुआ जितना चाहें रुपया कमा सकते हैं
आप आकाश की संसद में बैठ कर जो राग चाहें काढ़ सकते हैं
अपनी संसद को दुनिया की सबसे बड़ी मंडी बना सकते हैं
हम कुछ नहीं कह सकते हैं आपको
आप के पास कोई विशेष अधिकार है
जिसके डर से हम आपसे यह भी नहीं पूछ सकते है
कि आप रोज गला फाड़-फाड़ कर यह क्यों कहते हैं 
कि सब हमारे भले के लिए करते हैं
सरकार
और माईबाप 
सब हमारे भले के लिए करते हैं 
तो हमारा पानी 
और हमारा पसीना ले जाकर विदेश के किसी बैंक में क्यों जमा करते हैं 
अफसोस हम आपसे पूछ नहीं सकते हैं
हम ठहरे मिट्टी के क्षुद्र कण 
और आप ठहरे खादी पहनकर गजराज की तरह चलने वाले 
दुनिया के सबसे बड़े तोंदिया बादल
हम कितने मजबूर हैं
हम ने कैसे काट लिए हैं अपने हाथ
कि हम आपसे पूछ भी नहीं सकते कि आप ऐसा कानून क्यों बनाते हैं
कि हमारा सारा पानी अपने मुँह, अपने नाक, अपने कान
अपने रोम-रोम से खुद पी जाते हैं
और हम आपको स्वार्थी नहीं कह सकते हैं
बेईमान भी नहीं कह सकते
सिर्फ और सिर्फ माननीय कह सकते हैं
और चोर तो हरगिज-हरगिज सात जन्म में नहीं कह सकते हैं
ऐसा कहने पर हमें जेल हो सकती
हमारे बच्चे भूखों मर सकते हैं
आपका कानून है आप खुद कानून हैं 
आप चाहें तो सबका पानी खुद पी जाने वाले मामले पर
चाहे रबड़ के मजबूत और विशाल गुब्बारे की तरह बढ़ती जाती हुई
अपनी तोंद के खिलाफ
थोड़ी-सी भी चपड़-चूँ करने पर जनता को 
सीधे गोली मारने का कानून बना सकते हैं
आप कोई ऐसे-वैसे बादल नहीं हैं
आप बादलों के दल हैं
दलदल हैं कीचड़ हैं
जिसमें जनता धँस तो सकती है पर जिससे निकल नहीं सकती है
राजनीति के इस कीचड़ में कोई कमल भला कैसे खिल सकता है
कानून की इस जादुई किताब में 
जनता को दलों के इस कीचड़ में धंसते चले जाने के लिए 
विवश करने का कोई बाध्यकारी कानून है
पर निकलने के लिए एक नन्ही-सी भी धारा नहीं है
और दबी जुबान से भी 
हम कह नहीं सकते कि यह संविधान हमारा नहीं हैं 
हमारी उँगली से चलता है बादलों का राजपाट
लेकिन 
आकाश में विचरण की अभ्यस्त संसद हमारी नहीं है 
हमारा देश , हमारी धरती, हमारा अन्न, हमारा श्रम, 
हमारा जीवन , कुछ भी हमारा नहीं है
यहाँ तक कि यह उँगली भी हमारी नहीं है।’’
(तोंदिया बादल)


रविवार, 30 मार्च 2014

-गणेश पाण्डेय

आ मेरे रकीब

कि आ दिल के मेरे करीब थोड़ा और
जी भर के वार कर तुझे शम्शीर दे दूँ आ

आ कि तन्हा आ के मुझे कर ले गिरिफ्तार

आ तुझे जंजीर दे दूँ

आ कि थक गये कंधे नफरत लिये-लिये

तुझे प्यार दे दूँ आ

आ न डर

आ मेरे दुश्मन
कि आ दिल के मेरे करीब थोड़ा और
आ तुझे कश्मीर दे दूँ

आ।


(‘जल में’ से)












मंगलवार, 25 मार्च 2014

ज़मीनख़ोर

-गणेश पाण्डेय

वे ज़मीनख़ोर थे  
चाहते थे
औने-पौने दाम पर 
कस्बे की मेरी पुश्तैनी ज़मीन
मेरा पुराना दुमंजिला मकान
वे चाहते थे
मैं उच्छिन्न हो जाऊं यहां से
अपने बीवी-बच्चों 
पेड़-पौधों 
फूल-पत्तियों
गाय-कुत्ता समेत
वे चाहते थे मैं छोड़ दूँ 
धरती मइया की गोद
हटा दूं अपने सिर से 
उसका आंचल 
वे चाहते थे बेच दूँ 
खुद को 
रख दूँ
अपने मजबूर हाथों से 
उनकी आकाश जैसी असीम
लालची हथेली पर
अपनी जन्मभूमि 
अपना ताजमहल
और 
जीवन की पहली 
अनमोल किलकारी का 
सौदा कर लूँ
वे चाहते थे कर दूँ 
उसे नंगा और नीलाम
भूल जाऊं 
अपने बचपन का 
एक-एक डग 
पहली बार 
धरती पर 
खड़ा होना 
गिरते-पड़ते
पहला डग भरना
वे चाहते थे
बाबा बुद्ध की तरह
चुपचाप निकल जाऊं
अपनी धरती छोड़कर 
किसी को करूँ न खबर 
वे तो चाहते थे 
कि जाऊँ तो ऐसे
कि फिर लौट कर आने का 
झंझट ही न रहे 
वे मेरे मिलने-जुलने वाले थे 
मेरे पड़ोसी थे
कुछ तो बेहद करीबी थे 
और मेरे ही साथ 
मेरी धरती के साथ
कर रहे थे राजनीति  
खटक रहा था उन्हें
मेरा अपनी जमीन पर बने रहना
वे चाहते थे कि देश-विदेश
अनन्त आकाश में कहीं भी
चाहे उसी जमीन के नीचे
जल्द से जल्द चला जाऊं
पाताल में।

( ‘जापानी बुखार’ से)




सोमवार, 17 मार्च 2014

खेलो छोटे बहादुर

-गणेश पाण्डेय

आओ बहादुर
बैठो बहादुर
खाओ बहादुर
ये खुरमा
ये सेवड़ा
ये देखो रंग-वर्षा
खेलो छोटे बहादुर।

छोड़ो बहादुर
सम्भ्रांत पंक्ति का
पनाला
रहने दो आज जाम
बहने दो जहाँ-तहाँ
छोड़ो कुदाल
फेंको बाँस
लो खुली साँस।

आओ छोटे बहादुर
बताओ छोटे बहादुर
क्या कर रही होगी
इस वक्त पहाड़ पर माँ
माँ के मुख-रंग बताओ
छोटे बहादुर।

कितनी दूर है
तुम्हारा पर्वत-प्रदेश
मुझे ले चलो अपने घर
अकलुष आँख की राह
आओ छोटे बहादुर
अपने अगाये कंठ से
बोलो छोटे बहादुर
मद्धिम क्यों है आज
मुखाकृति।



(दूसरे संग्रह ‘जल में’ से)

                    

रविवार, 16 मार्च 2014

हमलोग नाटक बहुत करते हैं ...

-गणेश पाण्डेेय 
राजनीति कल्पना है या यथार्थ ? जाहिर है कि मेरी छोटी-सी बुद्धि से यथार्थ है। इसलिए हमारे समय की राजनीति मेरी समझ से नींद का महास्वप्न या दुःस्वप्न नहीं है। इसे हमने बनाया है। हमने रचा है यह पिजड़ा अपने इर्दगिर्द। हम भला इससे बच कैसे सकते हैं ? राजनीति कोई प्रेम कविता नहीं, जीवनसंग्राम का ऐसा पथ है, जिससे राहें फूटती हैं। सड़क चाहिए तो, नौकरी चाहिए तो, सुरक्षा चाहिए तो और अन्न चाहिए तो शिक्षा चाहिए तो, चहुँमुखी विकास चाहिए तो, सरकार और व्यवस्था की प्रक्रिया से गुजरने के लिए इसकी जरूरत पड़ती है। मनुष्य जीवन के लिए जैसे साँस जरूरी है, उसी तरह राजनीति। साहित्य के बिना मनुष्य जीवित रह सकता है, राजनीति के बिना नहीं। पशु राजनीति के बिना जीवन जी सकता है, पर मनुष्य नहीं। आशय यह कि जब यह इतना जरूरी है तो इसके प्रति हमारा अर्थात लेखकों, कलाकारों, पत्रकारों इत्यादि का दृष्टिकोण कभी-कभी बहुत संकुचित क्यों दिखता है ? यहाँ स्पष्ट करना जरूरी है कि मैं व्यावहारिक राजनीति की बात कर रहा हूँ, लाइब्रेरी में बंद या साहित्य की तमाम रचनाओं में बंद महान राजनीति की बात नहीं कर रहा हूँ। उस महान राजनीति की बात करने वालों को भी जीवन में हजार ऐसी मुश्किलों का सामना करना पड़ता, जहाँ लाइब्रेरी और साहित्य और विचार की किताबों में बंद राजनीति तिनके जितना भी मदद नहीं करती है। वहाँ काम आते हैं, कोई विधायक जी, कोई सांसद जी, कोई मंत्री जी, किसी पार्टी के कोई नेता जी, क्या यह झूठ है ? जिसके पारस यह नहीं होता है, वे पत्रकार मित्रों की मदद लेते हैं, पर उनकी शक्ति का केंद्र भी वहीं हैं। 
    साहित्य का प्रयोजन भी क्या समाज को सुंदर बनाना नहीं है ? क्या समाज को संुदर बनाने के लिए सुरक्षा और विकास इत्यादि का रास्ता राजनीति से होकर नहीं जाता है ? यह जो तमाम साहित्य अकादमी इत्यादि संस्थाएँ हैं, इन्हें भी पैसा वगैरह सब उसी सरकार से आता है। फिर पुरस्कारों और चर्चा इत्यादि के लिए जहाँ-तहाँ नाक रगड़ने वाले तमाम लेखकों के लिए राजनीति बड़ी गंदी जगह क्यों है ? जबकि वे खुद उससे अधिक गंदगी के शिकार होते हैं ? इस समय के चुनाव में एक अच्छी खबर यह कि मेधा पाटेकर समेत कई सामाजिक कार्यकर्ता चुनाव लड़ रहे हैं। पहले भी कई लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता चुनाव लड़ते रहे हैं। 
    मैंने दो छोटे-छोटे स्टेटस लिखकर हमारे समय की राजनीति और साहित्य के जानकार मित्रों से- जो अक्सर समस्याओं पर बहुत अच्छे-अच्छे विचार व्यक्त करते हैं-यह जानना चाहा किः ‘‘राजनीति में जाना जरूरी हो तो कहाँ जायें ? ...चुनाव सिर पर है। कभी-कभी यह सोचकर हैरान होता हूँ कि यदि हिन्दी के लेखको और पत्रकारों के लिए किसी एक राजनीतिक दल में शामिल होना अनिवार्य हो तो ये लोग जाएँगे किधर ? प्राथमिकता के आधार पर दलों का नाम किस क्रम में लिखेंगे ? या किसी एक दल या दो दल का नाम लिखेंगे ? प्राथमिकता के आधार पर पत्रकार लोगों के दलों का क्रम क्या होगा ? दरअसल इस सवाल के पीछे यह विचार सक्रिय है कि हम जिस व्यवस्था में है, कभी न चाहते हुए भी ऐसी कोई स्थिति किसी के साथ आ सकती है। यदि ऐसी कोई स्थिति आयी तो वे केजरीवाल की तरह जनता की राय लेंगे या दलों का चुनाव खुद करेंगे ? या कोई नयी पार्टी बनाएँगे ? बहरहाल दलों का क्रम तय करके रखना बेहद जरूरी है, क्या पता कब किसे चुनाव लड़ना पड़ जाय या ऐसे ही बिना मतलब या किसी बड़ी जरूरत की वजह से या किसी आंतरिक विवशता की वजह से एक दल चुनना ही पड़ जाय। पूर्वी उत्तर प्रदेश में तो वाम का न कोई मजबूत जनाधार इस वक्त है और न निकट भविष्य में संभव दिखता है। चुनाव की दृष्टि से वाम का भविष्य कमोबेश हर जगह निराश करने वाला है। ले-देकर कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा और कुछ दूसरे छोटे दल हैं। क्या सचमुच इन दलों में जाना लेखक की खुदकुशी होगी ? क्या पहले इन दलों में लेखक नहीं जाते रहे हैं ? या लेखक को हरगिज किसी दल में जाना ही नहीं चाहिए ? सक्रिय राजनीति से उसे दूर रहना चाहिए ? अरे भाई जब साधु-संत राजनीति के संग रास रचाने के लिए अक्सर आतुर होते हैं तो लेखक ही क्यों सक्रिय राजनीति से परहेज करे ? ऐसा इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि साधु संग लेखक भी वही काम करे जो साधु करते हैं। लेखक क्या कुछ बेहतर नहीं कर सकता है ? जरूरी है कि दलों की स्वीकार्यता के लिए विमर्श हो। यदि यह सब कुछ भी नहीं तो फिर विकल्प होगा क्या ? कितना और कब प्रभावी होगा ? फिलवक्त मैं खुद कहीं किसी दल में जा नहीं रहा हूँ, लेकिन क्या पता कोई लेखक मित्र तैयारी में हो ही़़़...’’ तुरत इस पर तीर की तरह चुभता हुआ एक दोटूक सच अपनी प्रतिक्रिया में रविकेश मिश्र ने कहा- ‘‘कि राजनीतिक स्थिति तो ये है श्रीमान दक्षिण वाम या पूरब पश्चिम का कोई अर्थ रह ही नहीं गया है। किसी वैचारिकता से दलों को कुछ लेना-देना नहीं, आदमी जिताऊ, टिकाऊ और कमाऊ हो तो हजार विद्वानों से बेहतर है। क्या करेंगे सैद्धांतिक बकवासी लेकर ? अब चिड़िया की आँख में तीर मारने वाला चाहिए और वफादार हो। ये पढ़े-लिखे लोग नाटक बहुत करते हैं, हालाकि चारित्रिक रूप से ये भी खोखले ही होते हैं, मौका पा जाये ंतो कौन है जो दो-चार अरब इधर-उधर न कर दे ?’’ इस प्रतिक्रिया के बरक्स संजय कुमार मिश्र की प्रतिक्रिया थी कि ‘‘ मेरे विचार मौजूदा स्थितियों को देखते हुए है कि सचमुच के एक लेखक को किसी भी राजनीतिक में न जाते हुए अपने साहित्य के माध्यम से ऐसा माहौल बनाया जाना चाहिए ताकि एक लेखक के लिए सक्रिय राजनीति दलदल न लगे, राजनीति का एजेंडा इतना सकारात्मक बन जाय कि कोई किसी भी दल में जा सके और अपना योगदान कर सके...कोई यह कह सकता है कि क्या यह संभव है तो मैं यही कह सकता हूँ कि हम लेखक है, साहित्यकार हैं, हमें बसंत के इस मनोहारी मौसम में सपने देखने की पूरी आजादी है।’’ कुछ और मित्रों ने भी बिना लागलपेट के अपने हिस्से का सच कहा, लेकिन मुझे जानना था कि वे मित्र क्या सोचते हैं जो नित्य, बल्कि क्षण-प्रतिक्षण अपनी राजनीतिक जागरूकता का परिचय देते हैं। कुछ मित्र तो यहाँ राष्ट्रीय अखबारों के संपादक-पत्रकार हैं तो कुछ नामी-इनामी लेखक, मैं चाहता था कि वे साफ-साफ बताएँ कि उनकी दृष्टि में कौन दल कितना खराब है या कितना अच्छा ? फिर पहले के स्टेटस को साझा करते हुए मैंने लिखा कि ‘‘इस देश में कोई एक पार्टी बहुत खराब है या दो पार्टियां बहुत खराब हैं ? या तीन या सब ? सब खराब हैं तो सिर्फ एक या दो सरकार न बनाएँ ,बाकी बनाएँ, ऐसा क्यों ? क्या कोई पार्टी सचमुच किसी सिद्धांत और विचारधारा इत्यादि की बहुत पक्की है या सब अवसरवाद या व्यवहारवाद की विचारधारा के साथ ? ऐसे में कहने के लिए लेखकों और पत्रकारों के पास पूरा सच क्या है ? इस माध्यम पर रोज राजनीतिक टिप्पणियां दिखती हैं, पर उनमें पूरा सच क्यों नहीं देख पाता ? सब एक खेल नहीं है तो और क्या ? कोई अभिव्यक्ति का खेल खेलने में माहिर है तो कोई विचार का खेल खेलने में माहिर है तो कोई व्यवहार का ? सब खेल ही है, तो कहीं हम खुद, जाने-अनजाने इस खेल में शामिल तो नही ंहैं ? सोचता था कि मित्रों के बीच समस्या रखने पर विकल्पों की बारिश होगी, पर दिग्गज पत्रकारों और लेखकों ने रास्ता दिखाया ही नहीं ? कितना अच्छा होता कि वे बताते कि सबसे खराब पार्टियों का क्रम ये है और अच्छी पार्टियों का क्रम ये है, पर अफसोस कि महाजन मौन हैं। कुछ मित्रों ने जरूर अपनी राय दी है। कैसे कहूँ कि ये बड़े भोले लोग हैं, जो बिना किसी लागलपेट के कुछ कहते हैं।
 मित्रो, इस पीड़ा को साझा करने की वजह सिर्फ यह है कि उन लोगों को अपना रूख पहले से साफ रखना चाहिए जो आज या कल किसी लेखक के किसी दल से या किसी दल के नेता से जुड़ने या उसके हाथ से कोई पुरस्कार इत्यादि लेने पर पर सबसे पहले नाक-भौं सिकोड़ेंगे। उन्हें चाहिए कि बताएँ कि कौन सा दल खराब है और कौन अच्छा या कम अच्छा ? क्यों कोई एक पार्टी सत्ता में न आये और क्यों दूसरी कोई पार्टी सत्ता में आए ? क्या हमें एजेंडे के आधार पर नहीं सोचना चाहिए ? क्या हमें सिर्फ भ्रष्टाचार के आधार पर सोचना चाहिए ? आज की तारीख में कौन-सी पार्टी है जो गरीब और अमीर के बच्चे को एक छत के नीचे पढ़ाई और दवाई देना चाहती है ? क्यों अलग-अलग दुनिया है ? क्यों कुछ स्त्रियाँ गैस के चूल्हे पर खाना बनाएँ और भारत की शेष स़्ित्रयाँ गीली लड़की के धुएँ में अपनी आँखें फोड़ें ? साहित्य के अँधेरे के खिलाफ लड़ना जितना जरूरी है, उतना ही समाज के अँधेरे के खिलाफ लड़ना भी जरूरी है। आजादी की लड़ाई के दिनों में लेखक की जो भूमिका थी, क्या आज वह भूमिका नहीं होनी चाहिए ? फिर सक्रिय राजनीति से परहेज क्यों ? लेखक संगठन भी इस दिशा में अपनी नयी भूमिका तय कर सकते हैं, बशर्ते वे लेखकों के पुरस्कार और चर्चा की राजनीति को छोड़ दें और समाज को संुदर बनाने और राजनीति की दुनिया में बदलाव लाने के लिए अपने आग्रहों से मुक्त हों।  बहरहाल बड़े लेखकों और पत्रकारों को किसी एक नेता या पार्टी का विरोध या समर्थन करने की जगह अपने हिस्से का पूरा सच जरूर कहना चाहिए।

               

मंगलवार, 4 मार्च 2014

कहना जरूरी है...

-गणेश पाण्डेय

मित्रो, उदय जी एक दिन एक पत्रिका में छपे एक चित्र के आधार पर ब्राह्मणवाद (ब्राह्मणों) पर बहुत नाराज थे। मैंने उनके  स्टेटस पर एक छोटी-सी टीप में कहा-‘ मुझे सिर्फ ब्राह्मणवाद के बारे में कहना है। साहित्य में ब्राह्मणवाद सिक्के का एक पहलू है और ठाकुरवाद दूसरा पहलू, दोनों के बिना हिन्दी का सिक्का चलता ही नहीं, बल्कि सच तो यह कि इस सिक्के का एक तीसरा भी पहलू है जिसे कायस्थवाद भी कहते हैं। इधर कुछ और जातियाँ हैं, जिनके गुट दिखते हैं। गौर करने पर कई और पहलू निकल आयेंगे। साहित्य के भ्रष्टाचार के महासागर में सभी जातियों की भ्रष्ट नदियां पहुँचती हैं। दृश्य तो ऐसे भी होते हैं, अपनी ही जाति का लेखक अपनी ही जाति के लेखक का विरोध करता है, दूसरी जाति के लेखक को प्रमोट करता है, सवाल यह कि साहित्य में यह प्रमोशन और पुरस्कार का भ्रष्टाचार क्यों ? बेशक आप ब्राह्मणवाद का विरोध अपने तईं कीजिए, लेकिन क्या ही अच्छा हो कि इसे आप व्यापक साहित्य-सत्तावाद के विरोध से जोड़ दें। मुझे पूरा विश्वास है कि आप भी ऐसा ही सोचते होंगे।’ इस टीप को उदय जी ने पसंद नहीं किया, जबकि छः मित्रों ने उसे पसंद किया।
आज फिर उनके स्टेटस पर अपनी तमाम कृतियों के अनुवाद के विवरण के साथ मोहनदास के जर्मन अनुवाद को श्रेष्ठ अनुवाद के रूप में चयनित होने की खबर है। यहाँ तक भी खराब नहीं। हालांकि यह प्रश्न तो बनता ही है कि इस वजह से उदय जी अपने को किन-किन लेखकों से बड़े लेखक के रूप में देखना चाहते हैं ? क्या प्रेमचंद से लेकर विनोक कुमार शुक्ल तक को अपने से छोटे कथाकार के रूप में देखना चाहते हैं ? शायद वे ऐसा नहीं चाहते होंगे ? ‘मोहनदास’ को तो मैंने भी पढ़ा है। उसका अनुवाद नहीं हुआ तो क्या उसका कोई मूल्य नहीं रहता ? क्या वह अनुवाद होने मात्र से अच्छी कृति है ? वह बहुत अच्छी कृति है तो क्या हमारे समय लिखी गयी दूसरी कथाकृतियाँ उससे अच्छी नहीं हैं ? उदय जी अच्छा लिखते हैं, जितना अच्छा लिखते हैं, उतना पढ़े भी जाते हैं, लेकिन क्या केवल उदय जी ने ही साहित्य में संघर्ष किया है, दूसरों ने नहीं ? केवल उनका ही विरोध हुआ है, दूसरों का नहीं ? उन्होंने आज अपने उसी स्टेटस में किसी ब्राह्मणवादी लेखक और उसके गुमाश्तों को लक्ष्य करके लिखा है कि ‘अब हिंदी का घनघोर ब्राह्मणवादी लेखक और उसके लंपट गुमाश्ते जितना भी ‘हेट-कैंपेन’ चलाएँ, अपना तो एक रोयां भी नहीं हिलता।’ 
मित्रो, दो-तीन बातें हैं। पहली बात तो यह कि उदय जी का संघर्ष यदि दिल्ली में न रहकर गोरखपुर या अपने गृहजनपद इत्यादि राजधानी से दूर किसी छोटे शहर में रहकर किया गया होता तो उन्हें जितने विकल्प मिले, पत्रिकाएँ और प्रकाशक निकट मिले और बहुत से सहयोगी लेखक मिले, क्या यह सब उन्हें  मिल पाता ? यह कोई आरोप नहीं है। सिर्फ एक जिज्ञासा है। आशय यह कि सिर्फ उनका ही संघर्ष, बाकी का साहित्य में नौकाविहार नहीं है। यह ठीक बात है कि अधिकांश लेखक किसी न किसी मठाधीश की गोद में बैठकर अपनी अधिकांश यात्रा पूरी करते हैं। मुझे उदय जी के बारे में अधिक कुछ भी पता नहीं है। किसने-किसने उन्हें एक अच्छा लेखक बनाने में उनकी मदद की ? किसी ने मदद की भी या नहीं ? कई लेखक ऐसे अभागे हैं, जिनका विरोध दूसरी जाति के लोगों ने कम खुद उनकी जाति के लोगों ने अधिक किया है। उदय जी का विरोध कोई ब्राह्मण करता है, यह खबर नहीं बनती, खबर तब बनती जब ‘‘सभी’’ ठाकुर लेखक विरोध करते ? साहित्य में उदाहरण ऐसे भी हैं कि ब्राह्मणों ने ही ब्राह्मण लेखक का तीव्र विरोध किया। गुरुओं ने अपने ही बच्चे का कत्ल किया-

‘पहला बाण 
जो मारा मुख पर
आँख से निकला पानी। 
दूसरे बाण से सोता फूटा
वक्षस्थल सें शीतल जल का।
तीसरा बाण जो साधा पेट पर
पानी का फववारा छूटा।
खीजे गुरु 
मेरी हत्या का कांड करते वक्त
कि आखिर कहाँ छिपाया था मैंने
अपना तप्त लहू।’

निश्चय ही उदय जी का भी विरोध हुआ होगा, संभव है कि गुरुओं ने भी किया हो, समकालीन लेखकों ने किया हो। जाहिर है कि प्रतिभाओं का विरोध तो होता ही है। विरोध में ही कुंदन और निखरता है। भारतेुंदु के बारे में रामविलास जी का कथन है- ‘भारतेंदु का विरोध दोनों ओर से हुआ-सरकार की ओर से और समाज के प्रगतिविरोधियों की ओर से भी। लेकिन जितना ही विरोध हुआ उतना ही हरिश्चंद्र का वीरभाव कुंदन की तरह और निखर उठा।...तीन शताब्दी पहले जैसे काशी के पुरोहितवर्ग ने तुलसीदास को कष्ट दिया था, उसी तरह हिन्दी साहित्य के नये अभ्युदय-काल में उसने भारतेंदु को लोक-बहिष्कृत किया था। जिस तरह तुलसीदास ने ‘‘धूत कहौ अवधूम कहौ रजपूत कहौ जुलहा कहौ कोऊ’’ लिखकर दुष्ट विरोधियों को मुँहतोड़ जवाब दिया था, उसी तरह भारतेंदु ने घोषणा की थी कि वे विरोधी कीड़़ों  के सिर पर पाँव रखकर आगे निकल जायेंगे।’- रामविलास शर्मा का यह कथन पिछले दिनों गोरखपुर में एक व्याख्यान देते समय तक मेरे जेहन में गूँजता रहा। जाहिर है कि पहले के और बाद के और कई कवि भी याद आये। याद तो आज का पूरा हिन्दी समाज आया। यह प्रश्न बेचैन करता रहा है कि ‘आज के सभी कथित बड़े कवि’ लोक-बहिष्कृत तो हुए ही नहीं, बल्कि लोक-पूजित हैं। पुरस्कृत तो इतने की पुरस्कार भी शर्मा जाये। आश्चर्य यह कि उनका तनिक भी विरोध नहीं हुआ। चक्कर क्या है ? क्या इतिहास में कुछ गड़बड़ है या हमारे समय में ? कहीं ऐसा तो नहीं काशी की तरह कुछ और भी शहर हमारे समय में हैं ? यह मानने के लिए मन नहीं कर रहा है कि हमारे समय में कुछ कवि लोक-बहिष्कृत या उपेक्षित नहीं होंगे या आगे नहीं होंगे। इसलिए उदय जी हों या कोई भी जी, यदि प्रतिभा है तो विरोध तो होगा ही भाई। विरोध का विरोध छोटे दायरे में रहकर नहीं किया जा सकता। जरूरी है कि हम अपने विरोध को व्यापक बनाएँ। उन सभी लेखकों के लिए लड़ें जो आज कहीं किसी शहर में तन्हां है। अकेले लड़ रहे हैं। हिन्दी के फिसड्डियों की फौज से टकरायें। हिन्दी के लुटेरे आज देश भर की अकादमियों को लूट रहे हैं, जिनमें दिल्ली की अकादमी भी शामिल है, विरोध को वहाँ तक ले जाना चाहिए। साहित्य की अकादमियों में और उनके आयोजनों में अपात्रों का मेला लग रहा है।
      दूसरी बात यह कि रोयां वाली बात जंची नहीं। रोयेंदार लेखक क्या सिर्फ उदय जी ही हैं ? और भी लेखक हैं जो रोयेंदार हैं। जिनका रोयां दूसरे हिला नहीं पाते, पर वे अपना रोयां दिखाते नहीं। कुछ चीजें छिपा कर रखने के लिए होती हैं। यह कहने की बात नहीं है भाई। अपना काम करना जरूरी है, अच्छा लिखिये और विरोध की आग को दूर तक ले जाइए। तीसरी बात यह कि यह तय कर लेना चाहिए कि आप अपने समय में सबसे अच्छा लिखना चाहते हैं या सबसे बड़ा दिखना चाहते हैं  या सबसे ज्यादा पुरस्कार चाहते हैं ? सबसे ज्यादा और बड़ा पुरस्कार पाने के लिए अच्छा लिखना कतई जरूरी नहीं है, होता तो मेरे या आपके आसपास के लोग उन पुरस्कारों को नहीं पाते। क्या यह बड़ी बात नहीं कि आपकी किताबों को लोग पढ़ते हैं ? यह काफी नहीं ? कहना जरूरी है, इसलिए विनमंतापूर्वक कुछ कहा है। किसी का दिल दुखाना उद्देश्य नहीं है। मोहनदास को मैंने भी पढ़ा और पसंद किया है, पर क्या मेरे जैसे असंख्य पाठको का पढ़ना महत्वपूर्ण नहीं है, सिर्फ उसका अनुवाद इत्यादि महत्वपूर्ण है ? उदयजी निश्चत रूप से मुझसे बड़े लेखक हैं, मेरी कोई बात पसंद न आयी हो तो माफ करेंगे।

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

मारु मारु स्रपनी निरमल जलि पैठी

-गणेश पाण्डेय

          काफी कुछ कह चुका हँू, फिर भी लगता है कि कुछ नहीं कहा है या कुछ सुना ही नहीं गया है। स्वमुख जैसे मेरा है, उसी तरह आँख और कान तो दूसरों का है, दिमाग तो खैर पक्का अपना-अपना होता है। इसीलिए दो दूनी चार को दो दूनी पाँच कहने वाले पैदा हुए। राजनीति ही नहीं, साहित्य में भी उच्चकोटि के उदाहरण मिल जायेंगे। एक कहेगा वाम अच्छा है तो दूसरा झट कहेगा कि नहीं जी देखो, उसमें ये नुक्स हैं,दूसरा कहेगा कि अजी दायाँ बाजू मजबूत है तो दूसरा कहेगा कि हटो तुम्हारे बाजू की हड्डी में अनगिन फ्रैक्चर है जी। एक कहेगा हमारी पार्टी इतनी साल पुरानी है तो दूसरा कहेगा कि सड़ गयी है तुम्हारी पार्टी। एक कहेगा कि देखो जी देश की सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार है, दूसरा कहेगा कि विकास जरूरी है। आशय यह कि सबके अपने-अपने विचार और निष्ठाएँ हैं। किसी को भ्रष्टाचार सूट करता है तो वह क्यों ईमान वाला बनेगा ? किसी को पुरस्कारपथ साहित्य का राजपथ या मुक्तिपथ (?) लगता है तो वह क्यों पुरस्कार की माया से बाहर निकलेगा ? साहित्य का दृश्य बड़ी निराशा पैदा करता है। जब लेखक बेईमानी के रास्ते को तजने के लिए तैयार नहीं होंगे तो भला राजनीति वाले क्यों तैयार होंगे ? जैसे राजनीति और पत्रकारिता वगैरह की प्रतिष्ठा पहले सेवा या मिशन के रूप में थी और अब सब व्यवसाय हो गया है, साहित्य भी राजनीति और पत्रकारिता के पीछे चलने वाली मशाल (?) हो गयी है। जब सार यही है तो ज्यादा माथापच्ची क्यों ? जाओ भाई तुम पुरस्कार का रास्ता पकड़ो, मुझे या जो भी चाहे उसे अपनी पगडण्डी ही भली, लेकिन क्या करूँ इस एफबी का, जहाँ इसके बारे में चर्चा-कुचर्चा जारी है।
          एक कवि के नाम पर एक नये पुरस्कार की घोषणा जल्दी ही हुई है और संयोग या दुर्योग कहें कि विमल जी ने अपने स्टेटस में पुरस्कारों का विरोध करते हुए रचना पर बल देने की बात कही है। बात तो बुरी नहीं, पर युवा लेखक अशोक पाण्डेय ने इसे वेणुगोपाल के नाम पर शुरू होने वाले पुरस्कार से जोड़कर तीव्र प्रतिक्रियाएँ दी हैं, जिन्हें मैं दुर्भावनापूर्ण तो नहीं लेकिन युवकोचित नाराजगी जरूर कहूँगा। दुर्भावनापूर्ण इसलिए नहीं कहूँगा कि उस स्टेटस को हाल में शुरू किये गये पुरस्कार से जोड़कर देख लिया गया है। उस स्टेटस में किसी लेखक का नाम नहीं था, यदि ऐसा होता तो क्या मैं कुछ नोट्स लगाता ? यह तो विमल कुमार ज्यादा बेहतर बता सकते हैं कि उनका स्टेटस अनिल जनविजय की घोषणा से जुड़ा  है या नहीं। विमल जी ने उसे लक्ष्य करके ऐसा कुछ कहा होगा, ऐसा होना तो नहीं चाहिए, लेकिन ऐसा कुछ है तो निश्चय ही उचित नहीं है। कोई भी पुरस्कार बुरा तब होता है, जब उसे धंधा बना दिया जाता है, जो अभी शुरू होने जा रहा हो उसके बारे में बुरा कहना तो दूर, बुरा सोचना भी उचित नहीं है। पुरस्कारों के विरोध में गुस्सा इस बात पर उतना नहीं है कि ये दिये क्यों जाते हैं या किसी का सम्मान क्यों किया जाता है, बल्कि गुस्सा इस बात पर है कि ये काजल की कोठरी में तब्दील क्यों हो चुके हैं ? देखने में यह भी आ रहा है कि कई बार खराब लेखकों को पुरस्कार देने के बाद किसी अपेक्षाकृत अच्छे लेखक को पुरस्कार देकर पुरस्कार का सम्मान बचाया जाता है। पहले नकलीनाथ को दिया जाता है, बाद में असलीनाथ को। यहां अशोक ने एक दूसरा पक्ष उपस्थित करके अपनी नाराजगी दर्ज की है और ध्यान खींचा है। जहां तक अनिल जनविजय की घोषणा की बात है, उसके बारे में यह विदित है कि चयन समिति के सारे नाम लेखकों के हैं। उसमें कौन लेखक नहीं है ? लीलाधर मंडलोई, राजेश जोशी, अनिल जनविजय से लेकर अशोक पाण्डेय तक, सब लेखक हैं भाई। विमल कमार यदि वेणुगोपाल पुरस्कार पर कुछ नहीं कह रहे थे तो उन्हें बहस की जगह सीधे अशोक से यह कह कर शुरू में ही अलग हो जाना चाहिए था कि उनकी मंशा यह नहीं थी। 
         जहाँ तक मैं जानता हूँ, विमल जी अशोक से उम्र में बड़े हैं, कवि भी अशोक से छोटे नहीं है। यहाँ बात साफ कर दूँ कि हमारे समय में छोटा-बड़ा जैसा कुछ विभाजन मुझे नहीं दिखता है, कई बार अपने समय में जिन्हें बड़ा कवि कह दिया जाता है, उनकी कविताएँ हरगिज बड़ी कविताएँ नहीं होती हैं। यह दूसरी बात है। विमल जी हों या कोई गोबर गणेश  हों या कोई बुरे से बुरा आदमी, वह पुरस्कारों का विरोध करता है तो उसकी आवाज को चुप करा देना सही विकल्प नहीं है। अच्छा विकल्प तो यह हो सकता कि अपने पुरस्कार को सचमुच साहित्य की राजनीति से मुक्त करके एक आदर्श पुरस्कार के रूप में प्रतिष्ठित करने की कोशिश की जाय। यह काम अशोक जैसे ऊर्जावान लेखक नहीं करेंगे तो क्या चुके हुए लेखक करेंगे ? जरूरी यह है कि अशोक को अब प्रकाशन की तरह पुरस्कार के क्षेत्र में भी जरूरी हस्तक्षेप करना चाहिए। पुरस्कार को मिसाल बनाने के बड़े काम में लग जाना चाहिए। इस काम में खतरा कम नहीं है। यह काम तब संभव होगा, जब हम अपने निकट के मित्रो का चुनाव भी सावधानीपूर्वक करें। विमल ने यदि लक्ष्य करके कहा हो तो भी उनकी बात का जवाब अपने काम से देना ज्यादा अच्छा होगा। समय दूसरा है। पुरस्कार के काम लगे लोगों के लिए अपना सम्मान बचाना बहुत मुश्किल है। इसलिए यदि पुरस्कारवाद के पक्ष में रहना है तो उठने वाली उँगलियों का अनुभव पहले ही कर लेना चाहिए। यह समय पुरस्कारवाद और गैरपुरस्कारवाद के बीच चुनाव का भी है। गौर करने की बात है कि पुरस्कार के तट पर वाम और दक्षिण, सब साथ-साथ दूषित जल ग्रहण करते हैं।
          हाँ, यह कहना भी जरूरी है कि कई पुरस्कार लेने के बाद पुरस्कारों के खिलाफ बोलने पर ऐसी दिक्कत आती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि एक बार पुरस्कार लेने के बाद आजीवन पुरस्कार का मैला ढ़ोने के लिए कोई अनुबंध कर लिया गया। यह अलग बात है कि मुझे साठ के करीब पहुँच कर भी अब तक किसी लखटकिया या कौड़ी-सौडी के पुरस्कार-वुरस्कार के दर्शन नहीं हुए। सच तो यह कि स्वप्न में भी पुरस्कार के दर्शन नहीं हुए। हुए होते तो क्या जो थोड़ी-बहुत आग मुझमें कभी-कभी दिख जाती है, रह पाती ? कह नहीं सकता कि तब क्या होता ! शायद अच्छा हुआ कि लेखक जीवन की शुरुआती ठोकर ने मेरा रास्ता बदलकर रख दिया। क्या कोई साठ के आसपास आकर क्या सचमुच अपना रास्ता बदल पाएगा ? क्या जिस लेखक को पुरस्कार नहीं मिला वह घटिया लेखक होता है ? आज की तारीख में जिन्हें पुरस्कार नहीं मिला है, उनकी कविताएँ पुरस्कार पाने वाले कवियों से खराब हैं ? ऐसे कई कवि मिल जायेंगे। बहरहाल यह दूसरी बात है। पहली बात यह कि पुरस्कारों का विरोध क्यों ? वजह साफ है, बेईमानी ही नहीं साहित्यिक दासता भी। समूची पृथ्वी से दासता का नाश चाहने वालों में इस दासता से मुक्ति की आकांक्षा क्यों नहीं ? मेरा तो एक लेख ही है ‘साहित्यक मुक्ति का प्रश्न उर्फ इस पापागार में स्वागत है संतो’। सच तो यह कि कुछ दिनों के लिए गद्य से दूर रहना चाहता हूँ, पर हो कहाँ पाता है। एक सचमुच के बडे़ कवि कह गये हैं कि गद्य जीवन संग्राम की भाषा है। फिर भी मेरा मानना है कि पुरस्कारों ने रचना और आलोचना की भलाई कम और दोनों का कबड़ा बहुत-बहुत किया है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि कुछ-कुछ स्वदेशी आंदोलन की तरह पुरस्कारों का बहिष्कार हो या कम से कम पुरस्कारों के भ्रष्टाचार का विरोध तो जरूर हो। अंत में संत कविता की इस पंक्ति से अपनी बात खत्म करूँगा- मारु मारु स्रपनी निरमल जलि पैठी  (मारौ मारौ स्रपनी निरमल जल पैठी )।