- गणेश पाण्डेय
बलई मिसिर एमए पीएचडी हिन्दी
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न फूल की दुकानें थीं
न छिपकर बैठने की जगहें
एक स्वेटर एक जूता तो था नहीं
हवाई चप्पल पहनकर घूमते थे
वहाँ न यूनिवर्सिटी थी न कॉलेज
कितनी नदियों को पार करके
कितनी मुश्किलों में हुई थी
बलई मिसिर की पढ़ाई लिखाई
फिर तो जीवन में कभी
फ़रवरी आयी ही नहीं
जो आयी सीधे
सूर्यमुखी बीबी आयी
चार बच्चे आये
बेचारे
बलई मिसिर तो जीवन में
जनवरी की हाड़ कँपाती
ठंड के पहाड़ से सीधे
अप्रैल मई जून की आग में
कूद पड़े थे
चारों तरफ़
आग ही आग थी
न गुलमोहर न अमलतास
न फ़रवरी न मार्च ओह
जन्म-जनम के फ़रवरी-वंचित
बलई मिसिर
एम ए पी-एच डी हिन्दी।
फ़रवरी सिर्फ़ एक महीना है
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मैं इसी महीने में
उस नदी के पास गया था
नदी उसी तरह बह रही थी
नदी वही थी पानी नया था
नये लड़के और लड़कियाँ
तट पर हूबहू उसी तरह बैठे थे
एक पैर जल में था एक तट पर
सूरज की किरणों से उनका
चेहरा उसी तरह दमक रहा था
सूरज डूब रहा है डूब जाएगा
उन्हें पता नहीं था जैसे हमें
पता नहीं था
सूरज डूब जाएगा
नदी का पानी बह जाएगा
फूल मुरझा जाएगा
कौन बताए उन्हें
जीवन में
फ़रवरी सिर्फ़ एक महीना है
बीत जाएगा।
जगह वही है
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यह पेड़ वह पेड़ नहीं है
यह हरा है वह सूख गया था
जगह वही है
यह गुलमोहर नया है
यह अमलतास नया है फूल नये हैं
उस पर बैठी कोकिला नयी है
उसका कंठ नया है
उसकी पुकार नयी है
दोनों का साहचर्य नया है
यह फ़रवरी नयी है।
मेरी जान
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पार्क में सीमेंट की बेंच वही है
कुर्ती उसी तरह लाल है छींटदार है
और सलवार उतनी ही सफ़ेद
लड़की नयी है लड़का नया है
और बगल में खड़ी लाल बाइक
नयी है
सीमेंट की बेंच भी
हमें कहाँ अलग होने से बचा पायी
वह जगह भी हमें नहीं रोक पायी
वह घास भी कहाँ हमें बाँध पायी
जिस पर हम नंगे पैर चलते थे
बिना कुछ बिछाये लेट जाते थे
आसमान को निहारा करते थे
आसमान भी हमें बचा नहीं पाया
समय का चाकू
मज़बूत से मज़बूत जोड़ को
एक झटके में अलग कर देता है
कोई नहीं बचा पाता है फ़रवरी भी
हम बचने के लिए बने ही नहीं थे
हमें इसी तरह टूट-फूट जाना था
मिट्टी के राजा
और मिट्टी की रानी की तरह।

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