बुधवार, 31 जुलाई 2013

प्रेमचंद और हमारा समय

- गणेश पाण्डेय

     आज प्रेमचंद के स्मरण का अर्थ सिर्फ कथापितामह का परचम लहराना है या उनके साहित्यिक और जीवन मूल्यों की अनदेखी करते हुए उनकी कृतियों पर केंद्रित कोई औपचारिक लेख लिखना है तो मित्रो मैं यह काम करने से रहा। मेरे लिए साहित्य के वे पुरखे जिन्होंने अशर्फियों और इनाम इत्यादि के लिए लेखन नहीं किया है, बल्कि देश और समाज के लिए अपनी ड्यूटी पूरी की है, सचमुच श्रद्धा के केंद्र हैं। जाहिर है कि प्रेमचंद उनमें से एक हैं। आज का समय श्रद्धा के मामले में बेढ़ंगा है। बेढ़ंगा इस अर्थ में कि आज साहित्य में श्रद्धा सिर्फ पुरस्कार और प्रमोशन इत्यादि के लिए दिखती है, वह भी असली नहीं होती। काम निकलते ही श्रद्धा को श्राद्ध में बदलते देर नहीं लगती है। यों आज प्रेमचंद का नाम ले-ले कर अपने को रोशनी में लाने के लिए विकल लेखक कम नहीं हैं, पर प्रेमचंद के साहित्यक मूल्यों को जीने वाले बहुत कम मिलेंगे। उस लेखक संघ में भी कम ही मिलेंगे जिसके अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए 1936 में प्रेमचंद ने कहा था कि ‘‘प्रगतिशील लेखक संघ’, यह नाम ही मेरे विचार से गलत है। साहित्यकार या कलाकार स्वभावतः प्रगतिशील होता है। अगर उसका यह स्वभाव न होता तो शायद वह साहित्यकार ही न होता। उसे अपने अन्दर भी एक कमी महसूस होती है और बाहर भी। इसी कमी को पूरा करने के लिए उसकी आत्मा बेचैन रहती है। अपन कल्पना में वह व्यक्ति और समाज को सुख और स्वछंदता की जिस अवस्था में देखना चाहता, वह उसे दिखाई नहीं देती। इसलिए, वह वर्तमान मानसिक और सामाजिक अवस्थाओं से उसका दिल कुढ़ता रहता है। वह इन अप्रिय अवस्थाओं का अन्त कर देना चाहता है, जिससे दुनिया जीने और मरने के लिए इससे अधिक अच्छा स्थान हो जाय।’’ प्रेमचंद की दृष्टि में लेखक वह है जिसके भीतर इस दुनिया जीने और मरने के लिए और अधिक अच्छा बनाने की बेचैनी हो, लेकिन क्या सचमुच आज के लेखक के भीतर भी यह बेचैनी है या बेचैनी का दिखावा है ? क्या हम अपने भीतर साध्य की पवित्रता के बिना मंजिल तक पहुँच सकते हैं ? प्रेमचंद अपने इसी प्रसिद्ध लेख/भाषण में यह भी कहते हैं कि साहित्य जीवन की आलोचना है। मैथ्यू आर्नाल्ड ने भी कविता को जीवन की आलोचना कहा है। जहाँ तक मैं समझ पाता हूँ, प्रेमचंद विचार की आलोचना नहीं, जीवन की आलोचना इसलिए कहते हैं कि निरा विचार की आलोचना ज्ञान और सामाजिकविज्ञान के दूसरे अनुशासनों की चीज है। वह साहित्य को जीवन की आलोचना इसलिए कहते हैं कि साहित्य संवेदना का व्यापार है। इसका आशय यह कतई नहीं कि जीवन विचारशून्य है या मनुष्य का विचार से कुछ लेना-देना नहीं। जब वे दुनिया जीने और मरने के लिए अच्छा बनाने की बात करते हैं तो यह बात अपने आप में एक अच्छा विचार है। वह लेखक के स्वभावतः प्रगतिशील होने की बात इसीलिए करते हैं। जीवन की आलोचना की बात इसीलिए करते हैं। लेखक के जीवन की आलोचना की बात भी करते हैं। लेखक की दृष्टि की बात करते हैं-‘‘ हमें सुंदरता की कसौटी बदलनी होगी। अभी तक यह कसौटी अमीरी और विलासिता के ढ़ंग की थी। हमारा कलाकार अमीरों का पल्ला पकड़े रहना चाहता था, उन्हीं कह कद्रदानी पर उसका अस्तित्व अवलंबित था और उन्हीं के सुख-दुख, आशा-निराशा, प्रतियोगिता और प्रतिद्वन्दिता की व्याख्या कला का उद्देश्य था। उसकी निगाह अंतःपुर और बंगलों की ओर उठती थी। झोपड़े और खंडहर उसके ध्यान के अधिकारी न थे।’’ प्रेमचंद, जाहिर है कि लेखक की प्रगतिशीलता की परीक्षा भी करते हैं। वे जिस लेखक नाम की संस्था को स्वभावतः प्रगतिशील कहते हैं, उस लेखक नाम की संस्था के भीतर मौजूद खतरों की ओर भी इशारा करते हैं और बताते हैं कि कैसे कोई लेखक अप्रगतिशील भी हो सकता है। आज भी यह खतरा टला नहीं है। प्रगतिशीलता की सुपरफास्ट गाड़ी के बावजूद गैर प्रगतिशीलता की यह मालगाड़ी नई दिल्ली जंक्शन से बदस्तूर चलती चली जा रही है। श्रृंगारिकता और विलासिता का घराना अपनी गायकी में उसी तरह तल्लीन है, पर प्रेमचंद के ठीक पहले के समय में जहाँ यह मुख्यधारा  थी, वहीं अब यह सूखकर एक मामूली पनाले में तब्दील हो चुकी है। प्रेमचंद के सामने अपने सामने की दुनिया को बेहतर बनाने की बेचैनी में दरअसल अपने देश को, अपने समाज को और अपने समय के साहित्य को भी बेहतर बनाने की बेचैनी शामिल है। प्रेमचंद को पता है कि लेखक की असल कर्मभूमि साहित्य है। प्रेमचंद कहते हैं कि ‘‘ जिन्हें धन-वैभव से प्यारा है, साहित्य-मंदिर में उसके लिए स्थान नहीं है।...हमारी परिषद ने कुछ इसी प्रकार के सिद्धांतों के साथ कर्मक्षेत्र में प्रवेश किया है। साहित्य का शराब-कबाब और राग-रंग का मुखापेक्षी बना रहना उसे पसंद नहीं। वह उसे उद्योग और कर्म का संदेश-वाहक बनाने का दावेदार है। उसे भाषा से बहस नहीं। आदर्श व्यापक होने पर भाषा अपने आप सरल हो जाती है। भाव-सौंदर्य बनाव-सिंगार से बेपरवाही दिखा सकता है। जो साहित्यकसा अमीरों का मुँह जोहने वाला है, वह रईसी रचना-शैली स्वीकार करता है, जो जन-साधारण का है, वह जन-साधारण की भाषा में लिखता है।’’ प्रेमचंद यहाँ साफतौर पर साहित्य की संप्रेषणीयता पर विचार कर रहे होते हैं। जाहिर है कि उनके सामने साहित्य की पहुँच का बड़ा प्रश्न है, लेकिन प्रेमचंद बड़े लेखक हैं इसलिए वे शुरू में ही बता देते हैं कि साहित्य की भाषा ठीक वही नहीं हो सकती है जो बोलचाल की भाषा है-‘‘ भाषा साधन है, साध्य नहीं।...भाषा बोलचाल की भी होती है और लिखने की भी।...मेरा अभिप्राय यह नहीं कि जो कुछ लिख दिया जाय, वह सब साहित्य है। साहित्य उसी रचना को कहेंगे, जिसमें कोई सचाई प्रकट की गयी हो, जिसकी भाषा प्रौढ़, परिमार्जित और सुदर हो और जिसमें दिल और दिमाग पर असर डालने वाला गुण हों और साहित्य में यह गुण पूर्णरूप में उसी अवस्था में उतपन्न होता है, जब उसमें जीवन की सचाइयां और अनुभूतियां व्यक्त की गयी हों।’’ इसीलिए अंत में भी प्रेमचंद कहते हैं कि ‘‘हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव, सौंदर्य का सार हो, सुजन की आत्मा हो, जीवन की सचाइयों का प्रकाश हो-जो हममें गति और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं, क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।’’ सवाल यह कि आज प्रेमचंद जैसा खरापन कहाँ है ? क्या लेखक संगठनों के पास और उसमें शामिल कच्चे-पक्के प्रगतिशील लेखकों के पास प्रेमचंद का ईमान है ? क्या वे लोग सचमुच रचना और आलोचना और जीवन में रईसी-शैली से मुक्त हैं ? ये आलोचकों के पीछे-पीछे भागना, उनकी पूजा करना, उनसे सर्टिफिकेट लेना, सेठों और सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के पुरस्कारों के पीछे-पीछे भागना जनता के लेखक का काम है या रईसी-शैली के लेखकों का काम है ? पहले की अशर्फियों और आज के पुरस्कारों में कोई बहुत अंतर नहीं है। क्या ऐसे ही लेखक दुनिया को बेहतर बनाने का काम करेंगे, जो अपनी उपलब्धियों के लिए मरे जा रहे हैं ? क्या ऐसे लेखक प्रगतिशील हैं जो यौन-संदर्भों को चटखारे के लिए लिखते हैं और अतिश्रृंगारिक कथा की पत्रिका में छपने के लिए लालायित रहते हैं ? सब जानते हैं कि ऐसी कहानियों का छापाखाना प्रेमचंद के नाम पर कथापत्रिका का धंधा करने वाले किस बुजुर्ग लेखक के पास है। प्रेमचंद का विपुल कथासाहित्य कया आज के कथाकारों और कथासंपादकों के लिए प्रमाण नहीं है कि प्रगतिशील कथा का परिसर किसे कहते हैं ? असल में प्रेमचंद के सामने साहित्य का उद्देश्य कुछ और था और आज के लेखकों के सामने साहित्य का उद्देश्य कुछ और है। प्रेमचंद के सामने बेचैनी का सबब रचना और अपने समय का तीखा यथार्थ था, बदलाव की आकांक्षा आत्मा को मथती थी। आज तो लेखक प्रगतिशीलता की आड़ में यश, इनाम, चर्चा का धंधा करने में लगे हैं। प्रेमचंद देश और समाज को देखते थे, ये अपने आप को देखते हैं, अपना तमगा, अपना नाम और अपना सर्टिफिकेट देखते हैं। यह बेहद तकलीफदेह है कि बकौल प्रेमचंद जिनके ऊपर अपने समय के समाज को जगाने की जिम्मेदारी है, सो रहे हैं। विडम्बना यह कि ये सोने वाले जिन्हें हिंदी का जगाने वाला बनना था, नींद में अमरता का स्वप्न देख रहे हैं। ये खुली आँखों से स्वप्न देख रहे हैं कि अमुक आलोचक और अमुक संपादक और अमुक इनाम उन्हें अमर बना रहा है, उन्हें हिंदी कथा साहित्य या कविता या आलोचना का हीरो बना रहा है। क्या पानी के बुलबुले जैसी नायकत्व की यह आकांक्षा अच्छी रचना या आलोचना को जन्म दे सकती है ? प्रेमचंद जैसी रचना की बात करते हैं, वह इन कमजोर हाथों से संभव है ? ऐसे ही लेखक समाज को बेहतर बनाने का जीवित स्वप्न पाठकों की आँखों में भर सकते हैं ? ऐसे लेखक पाठकों के लेखक बन सकते हैं ? क्या यह बताने की बात है कि प्रेमचंद आलोचकों के लेखक हैं या पाठकों के ? पाठकों की जगह आलोचकों और संपादकों की पूजा करने वाले लेखक कभी भी हिंदी के सच्चे लेखक हो ही नहीं सकते हैं। पुरस्कार बड़ा लेखक नहीं बनाता है, पाठक बड़ा लेखक बनाते हैं। पाठकों के लिए लिखी गयी रचना ही बड़ी रचना बनती है। पाठक ही समाज है। आज हिंदी के परिसर से पाठक गायब हैं। कुछ हैंे जो कविता-कहानी-आलोचना लिखते हैं और कुछ किताब और पत्रिकाएँ खरीद लेते हैं, बाकी पुस्तकालयों की शोभा की चीज हैं। कभी नाव पर रखकर पत्रिकाएँ और किताबें गाँव में पहुँचती थीं, प्रेमचंद घरों में पढ़े जाते थे। आज का दृश्य क्या वही है ? पाठकों की शक्ति पर भरोसा न करने वाले या पाठाकों की अभिरुचि को उन्नत न करने वाले लेखक समाज को बेहतर बनाने का स्वप्न जनता के दिल और दिमाग में पहुँचा सकते हैं ? कह सकते हैं कि आज राजनीति ने और व्यवस्था के इस मॉडल ने समाज को भ्रमित किया है, तो समाज को विचार और मूल्य से जोड़ने का काम किसका है ? राजनीति करने वालों का ? जनता को राजनीति के इस अँधेरे से निकालने का काम किसका है ? बिना आँख वालों को बिना आँख वाले खुली हवा में ले जाएंगे ? क्या राजनेताओं की तरह लेखकों ने जनता का विश्वास खो नहीं दिया है ? यह हमारे समय का बड़ा सवाल है ? इस सवाल से टकराना क्या आज लेखक संगठनों की जिम्मेदारी नहीं है ? शायद इस बड़ी कमी की वजह से ही आज साहित्य राजनीति से आगे नहीं है। प्रेमचंद ने जब कहा था-‘‘ साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है, उसका दरजा इतना न गिराइए। वह देश-भक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सचाई भी नहीं, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई है।’’ जाहिर है कि तब इस नसीहत की जरूरत जितनी थी, उससे कम आज नहीं है। आज भी महफिल सजाने और मनोरंजन का सामान जुटाने का काम लेखक बढ़-चढ़कर कर रहे हैं।  राजे-रजवाड़े नहीं हैं तो क्या हुआ राजनीति और साहित्य के राजे-रजवाड़े हैं। अपने को गिराने की ऐसी होड़ शायद अशर्फियों के जमाने में भी इतनी न रही होगी। क्या यह प्रगतिशील लेखकों और लेखक संगठनों के लिए गौरतलब नहीं है ? प्रेमचंद के स्मरण का अर्थ आज और क्या हो सकता है।
(यह लेख ‘पीपुल्स समाचार’ के 31 जुलाई 2013 के अंक में भी है।)






शनिवार, 13 जुलाई 2013

ऋण है मुझ पर

 -गणेश पाण्डेय

उस खेत का, उस बीज का
उस धूप का, उस पानी का
उस किसान का ऋण है
मुझ पर
उस हवा का , उस जगह का
उस चौखट का, उस छत का
उस दुलार का ऋण है
मुझ पर
उस छड़ी का, उस किताब का
उस पाठशाला का, उस विचार का
उस गुरु का ऋण है
मुझ पर
उस चरण का , उस आशिष का
उस मोतीचूर का, उस हृदय का
उस बुआ का ऋण है
मुझ पर
उस भाई का, उस मित्र का
उस साथ का, उस चाह का
उस अपनत्व का ऋण है
मुझ पर
उस चितवन का, उस स्पर्श का
उस गंध का , उस स्मृति का
उस प्यार का ऋण है
मुझ पर
उस शत्रु का, उस वरिष्ठ का
उस घात का, उस कायर का
उस नाग का ऋण है
मुझ पर
उस आक्रोश का, उस ललकार का
उस साहस का, उस दर्प का
उस रक्त का ऋण है
मुझ पर
उस धारा का, उस यकीन का
उस शक्ति का, उस पृथ्वी का
उस अभिन्न संगिनी का ऋण है
मुझ पर
कोई देखे कितना सुख है
अपने होने की खोज में
कितनी तृप्त है मेरी आत्मा
अपनी इस अतिशय दरिद्रता में।


( ‘अटा पड़ा था दुख का हाट’ से )
(यह कविता ई पत्रिका सृजनगाथा पर भी उपलब्ध है।)






गुरुवार, 4 जुलाई 2013

आलोचना की सामाजिकता का रास्ता और चंद राहजन

- गणेश पाण्डेय

मैनेजर पाण्डेय हमारे समय के एक बड़े आलोचक हैं। ज़ाहिर है कि आलोचना की बड़ी परंपरा में यह बड़ा होने का रिश्ता देह की ऊँचाई या आलोचना के नाम पर अनुयायिओं की हनुमानजी की पूँछ जैसी लंबी पंक्ति से नहीं बनता है। बड़ा होने का यह रिश्ता, आलोचना की समग्रता में उसकी शर्तों और आलोचना की कसौटी पर ख़ुद को परखते रहने से बनता है। अपने समय की चुनौतियों और विकलताओं का सच के साथ सामना करने से बनता है। आलोचक का कद न तो उसकी धोती का घेरा तय करता है, न पाजामा, न कोई अन्य अंगरखा, जहाँ तक मैं जान पाता हूँ, एक आलोचक आलोचना की सचाई के पैमाने से बड़ा या छोटा होता है। केवल लिखना और लिखना और कुछ लिखते जाना या बोलना और बोलना और कुछ भी बोलते जाना ही आलोचना नहीं है। अच्छी आलोचना तो कतई नहीं है। हमारे समय में दो ऐसे उदाहरण बिल्कुल सटे हुए हैं जिनमें पहले में अति वक्तृता है तो दूसरे में -जो पहले के ही सहायक के रूप में अधिक प्रसिद्ध हैं-अतिलेखन और आशुलेखन। यह जो अतिबोला और अतिलेखन या आशुलेखन का संसार है, जिस-तिस पर कभी भी कुछ भी शानदार, अद्वितीय से कम नहीं, यह जो एक अर्थ में आलोचना का ‘‘सामाजिक कार्य’’ है, क्या यही आलोचना की सामाजिकता है ? आख़िर सार्वजनिक रूप से यह सब करते हुए आलोचक कितना सामाजिक होता है, किसी विधायक या सांसद की तरह किसी के निवेदन पर तत्काल अपनी संस्तुति बाँटता चाहे बेचता हुआ? यह दृश्य क्या आज की हिंदी आलोचना का नहीं है? क्या इसे ही मैनेजर पाण्डेय आलोचना की सामाजिकता कहते हैं ?
मैनेजर पाण्डेय छोटे आलोचक होते तो शायद ऐसा कह सकते थे, लेकिन जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा कि मैनेजर पाण्डेय बड़े आलोचक हैं, इसलिए पाण्डेय जी का कतई यह आशय नहीं है। गौर करने पर यकीनन आप पायेंगे कि पाण्डेयजी की आलोचना की सामाजिकता का आशय आलोचना की बड़ी परंपरा की व्यापकता और सार्थकता से मेल खाने वाला है। मैं ‘पक्का’ आलोचक नहीं हूँ। पक्का आलोचक तो मेरा ढ़िलपुक दोस्त है। मेरे समझने में कुछ दिक्कतें ज़रूर हैं, पर समझने के इस क्रम में समझते-समझते मैं भी किसी हद तक समझ जाऊँगा। अपनी ही बात से आगे बढ़ने की कोशिश करता हूँ। यह जो ‘व्यापकता’ और ‘सार्थकता’ है, शायद मेरी कुछ मदद करे।
पाण्डेय जी का आलोचना की सामाजिकता वाला लेख शायद आलोचना में पहली बार देखा था। शायद क्या, यकीनन देखा था। इसी नाम की किताब में दूसरी बार देख रहा हूँ। यह लेख हमारे समय की आलोचना पर जितना मौजू है, शायद उससे ज़्यादा आने वाले वक़्त की आलोचना पर मौजूँ होगा। पर मेरे सामने आज का समय है। मैनेजर पाण्डेय के सामने भी उनका समय है। एक सही आलोचक अपने समय को जब भी देखता है, आलोचना की खुली आँख से देखता है। पाण्डेय जी भी अपनी खुली और धुली-पुंछी आँख और सही नंबर के चश्मे से अपने समय को साफ़-साफ़ देखते हैं-‘आजकल भारत पूँजीवादी सभ्यता के आतंककारी प्रभावों का सामना कर रहा है। पूँजीवाद का स्वभाव है हर सार्वजनिक वस्तु का निजीकरण करना। पूँजीवाद अपने वर्तमान दौर में प्रकृति के पाँचों तत्वों-पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु का पूँजी के संचय और विस्तार के लिए निजीकरण में लगा हुआ है। जब प्रकृति का निजीकरण हो रहा हो तब संस्कृति कब तक और कितनी देर तक सामाजिक या सार्वजनिक रह सकती है। पूँजीवाद का वर्तमान दौर सचमुच ‘सामाजिक की मृत्यु’ का समय है।’ ऐसे मुश्किल वक़्त में मैनेजर पाण्डेय चुनौती के रूप में एक प्रश्न खड़ा करते हैं और उस चुनौती से दो-दो हाथ करने के लिए आस्तीन चढ़ाते हुए पाठकों को यह बताना नहीं भूलते हैं कि भाई- यह जो आलोचना की सामाजिकता नाम की बेशक़ीमती चीज़ है, आख़िर है क्या और रचना की वैयक्तिकता से इसका क्या रिश्ता है-‘ साहित्य के विभिन्न रूपों में वैयक्तिकता और सामाजिकता की स्थिति एक समान नहीं होती। अगर कविता स्वभाव से अधिक व्यक्तिगत होती है तो उपन्यास अधिक सामाजिक। आलोचना रचना की व्याख्या करती हुई, उसे व्यापक पाठक समुदाय तक पहुँचने में मदद करती हुई ख़ुद सामाजिक बनती है और रचना को भी सामाजिक बनाती है।’ पाण्डेय जी आगाह करते हैं-‘जो लोग रचना और आलोचना दोनों को नितांत व्यक्तिगत बनाते हैं वे अभिजन एक तरह से साधारण जन को साहित्य-संसार से बाहर रखने की कोशिश करते हैं और पूँजीवाद के निजीकरण में सहायक भी बनते हैं।’ और यहीं पाण्डेय जी आलोचना की सामाजिकता के व्यापक निहितार्थ को स्पष्ट करते हैं -‘आलोचना की सामाजिकता की चिंता असल में पूँजीवाद द्वारा प्रकृति और संस्कृति के निजीकरण के प्रयत्न के विरुद्ध प्रतिरोध की चिंता से जुड़ी हुई है।’
ज़ाहिर है कि साहित्य की आत्मा जिन दो छोरों के बीच डोलती है, वे असहमति और प्रतिरोध ही हैं। प्रसंग से तनिक इतर होकर यहाँ मैं कहना चाहूँगा कि एक अर्थ में करुणा जैसे शुद्ध मनोभाव के मूल में भी असहमति और दुख के विरुद्ध कोमल प्रतिकार है। दुख के विरुद्ध जाना उस संघर्ष के विरुद्ध भी जाना है जो दुख का कारण है या दुख देती है। आदिकवि से लेकर आज तक के कवियों ने अपने ढंग से और अपने समय के भीतर असहमति और प्रतिकार की संस्कृति को कविता की आत्मा का सहचर बनाया है। मैथ्यू आर्नाल्ड ने कविता को जीवन की आलोचना कहा है। आशय यह कि आलोचना की व्याप्ति कविता के भीतर अनिवार्य रूप से मौजूद है। उस आलोचना की व्याप्ति है जो असहमति और प्रतिरोध की संस्कृति से जुड़ी हो। मैनेजर पाण्डेय के लिए आलोचना की सामाजिकता का अर्थ है- ‘आलोचना, चाहे समाज की हो या साहित्य की, वह सामाजिक बनती है, एडवर्ड सईद के शब्दों में-सत्ता के सामने सच कहने के साहस से।’ यहाँ मैनेजर पाण्डेय सावधान करते हुए बेहद ज़रूरी बात कहते हैं कि-‘ सत्ता केवल राजनीति की ही नहीं होती। धर्म,संस्कृति और साहित्य की भी सत्ताएँ होती हैं, जो एक ओर बौद्धिक दमन और अपने वर्चस्व की स्थापना का प्रयत्न करती हैं तो दूसरी ओर राजनीतिक सत्ता को मजबूत करने में सहयोग भी करती हैं। ऐसी सत्ताओं के सामने सच कहने का साहस जिस आलोचना में होता है वह मनुष्य की स्वतंत्रता के पक्ष में खड़ी होती है, इसलिए वह सामाजिक होती है।’ यहाँ यह कहना ज़रूरी है कि राजनीति, धर्म, संस्कृति की सत्ताएँ किसी हद तक अमूर्त होती हैं जबकि साहित्य की सत्ताएँ प्रायः मूर्त होती हैं। कभी हाथी छाप, कभी घोड़ा छाप, कभी तलवार छाप, कभी बाऊ साहब छाप, कभी मोटी चुटिया छाप, कभी पतली मोरी का पाजामा छाप, कभी लाला जी छाप, कभी पंडिज्जी छाप, कभी सुर्ती छाप तो कभी कोई और छाप। दिल्ली हो या गोरखपुर या कोई भी शहर, साहित्य की सत्ताएँ बड़ी, मझोली, छोटी या पिद्दी हर जगह होती ही होती हैं। मज़े की बात यह कि ऐसी किसी भी मामूली से मामूली साहित्य की सत्ता के विरुद्ध खड़े होने का साहस शायद ही कहीं दिखता हो। एक रहस्य यह भी कि साहित्य की सत्ता हासिल करने के लिए अच्छा लिखना कतई ज़रूरी नहीं है। कोई भी मीडियाकर अपने दंद-फंद से ऐसी सत्ता पलक झपकते हासिल कर लेता है। अब साहित्य की सत्ता हासिल करने के लिए किसी का नामवर होना या आलोचना या रचना में खूँटा गाड़ना अर्थात महत्वपूर्ण करना कतई ज़रूरी नहीं रहा। सच तो यह कि साहित्य की सत्ता बनने के लिए तो कहीं-कहीं लेखक होना भी ज़रूरी नहीं रहा। जैसे समुद्री डाकू पानी के तमाम जहाज चुटकी बजाते हुए लूट लेते हैं, उसी तरह आज साहित्य के लुटेरे लाखों-करोड़ों रुपये के सरकारी और ग़ैर सरकारी अनुदान से चलने वाली भारी-भरकम और नामी-गिरामी साहित्यिक संस्थाओं और अकादमियों को लूट रहे हैं। देश के हिन्दी भाषी क्षेत्र के अनेक हिस्से आज अपराध की दुनिया में शूटरों और आतंकवादियों के लिए ही नहीं बदनाम हुए हैं, साहित्य के क्षेत्र में भी लूट और कत्ल के पेशेवर गिरोहों के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर जाने-पहचाने जा रहे हैं। कहना यह है कि आज ऐसे लुटेरों और हिंदी के हत्यारों के ख़िलाफ़ बोलने का रत्ती भर साहस जब बहुत बोलने वाले लेखकों में नहीं है तो दूसरे सामान्य लेखकों के बारे में क्या कहें। बस इतना समझ लीजिए कि ऐसे साहित्यिक माफियाओं के सामने जब कुछ विश्वविद्यालयों के हिंदी के कई प्रोफेसर साहबान और कई स्वनामधन्य लेखक चूहा और चुहिया बन जाते हों-बन क्या जाते हों,बल्कि हों ही- तो फिर साहित्य के युवा लेखकों और बच्चों के भविष्य के बारे में क्या कहना। फिर भी शायद कुछ हैं, हैं कुछ सिरफिरे जो ताल ठोंकते हैं और साहित्य के परिसर का सच साहस के साथ कहते हैं। पर ऐसे कितने हैं ? साहस के साथ सच कहने वाले को बुजदिलों की फौज देख नहीं पाती है या देख कर शर्म से मुँह फेर लेती है ? साहित्य की सत्ता की क्रूरता और कदाचार के साथ जो बड़ा सवाल पैदा होता है, उससे टकराये बिना क्या समाज, राजनीति, धर्म और संस्कृति की सत्ता से टकराने की बात मौजूं है ? प्रतिरोध की संस्कृति पहले ज़मीन पर दिखनी चाहिए या आसमान पर ? साहित्यकार पहले साहित्य की क्रूर और भ्रष्ट सत्ता से नहीं टकराएगा तो फिर हम कैसे तय करेंगे कि उसका बारूद असली है? या वह ख़ुद असली है? या कि उसमें वाकई दम है? क्या साहित्य की सत्ता के सामने आत्मसमर्पण करने वाले लोग दुनिया की बाक़ी सत्ताओं के ख़िलाफ़ सचमुच ताल ठोंक कर खड़े हो सकते हैं या आरपार की लड़ाई लड़ सकेंगे? या कोई फर्जी लड़ाई करेंगे ? या सिर्फ़ लड़ाई-लड़ाई खेलेंगे? क्या प्रतिरोध की संस्कृति एक खेल है ? असली सवाल यह है। यह पाण्डेय जी बेहतर बता सकते हैं कि साहित्य की सत्ता से कैसे टकरायें ? क्योंकि पाण्डेय जी को वर्तमान साहित्य के आलोचना विशेषांक में छपे लेख ‘ आलोचक का बाहर-भीतर ’ में हिंदी आलोचना की अब तक की सबसे बड़ी लफंगई दिखती है। यहाँ यह सवाल ज़रूरी है कि क्या वह लेख आलोचना और साहित्यिक पत्रकारिता अर्थात साहित्य की सत्ता की अंधेरगर्दी, लूटपाट और महाभ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ हिंदी के सिपाहियों की ओर से किया गया जवाबी हमला नहीं है ? क्या आततायियों के ख़िलाफ़ जवाबी कार्रवाई ग़ैरक़ानूनी है ? क्या साहित्य की क्रूर और भ्रष्ट सत्ताओं के ख़िलाफ़ फूलों का हार ले जाकर देवभाषा में नतमस्तक होकर दबी जुबान से निवेदन करने से हिंदी के वे क्रिमिनल अपनी साहित्यिक धंधई बंद कर देंगे? गुनाह से तौबा कर लेंगे ? क्या उस लेख में आलोचकों और संपादकों का जो यथार्थ है वह सही नहीं है? एक आलोचक को, एक संपादक को बुरे से बुरा साहित्यिक जीवन जीने का हक़ है, वह चाहे जितनी गंदगी फैलाये, पर उसे कठोर और कबीर की तरह फटकार की भाषा में कुछ न कहा जाये? उसे देवभाषा में जल-अक्षत चढ़ाते हुए देवताओं की तरह पूजा जाये? पाण्डेय जी बतायें कि हिंदी की लाज सरेआम लूटने वाले इन गुनाहगारों के साथ क्या किया जाए? कमतर कवियों को प्रमोट करने के मामले हों, चाहे कमतर रचनाकारों को पुरस्कारों की रेवड़ी बांटने का धंधा हो, हिंदी के इन माफ़ियाओं के गुनाह कौन नहीं जानता है और जानकर चुप रहने के गुनाह का हिस्सेदार नहीं बनता है। कथासाहित्य का एक छोटा-सा उदाहरण है। दो लेखिकाओं के पहले उपन्यासों - जो उपन्यास की ‘पहली’ शर्त ‘पठनीयता’ के सामने ही फेल हो जाते हैं-को आसमान पर पहुँचाने वाले आलोचकों और संपादकों के इस भ्रष्टाचार की सज़ा क्या होनी चाहिए ? या इन्हें बेवकूफ़ या मक्कार या बेईमान वगैरह समझ कर माफ़ कर देना चाहिए ? इस देश की या शायद दुनिया भर में ऐसा कहीं नहीं होता होगा-जहाँ किसी भी परीक्षा में प्रारम्भिक और मुख्य परीक्षाएँ होती होंगी- कि प्रारम्भिक परीक्षा में फेल होने के बाद अर्थात प्रारम्भिक परीक्षा पास किये बग़ैर मुख्य परीक्षा का गोल्डमेडल दे दिया जाय, ये तो साहित्य के महाभ्रष्ट ही ऐसा कर सकते हैं। क्या ऐसे कांड साहित्य में होटल ताज के 26/11 कांड की तरह नहीं हैं, जिसमें उपन्यास और आलोचना के ‘‘ईमान’’ और पाठकों के ‘भरोसे’ का लगातार बर्बर क़त्ल किया जाता है ? साहित्य की लाज को तार-तार किया जाता है। क्या न्यायालयों के जजों के ग़लत काम पर उन्हें दण्ड नहीं मिलता है ? अभी आज ही (27नवंबर10 को) ख़बर छपी है कि सुप्रीम कोर्ट ने शेक्सपीयर का उल्लेख करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के बारे में कहा है कि ‘‘विलियम शेक्सपीयर ने ‘हेमलेट’ में कहा था कि डेनमार्क राज्य में कुछ गड़बड़ है। उसी तर्ज पर कहा जा सकता है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में कुछ गड़बड़ है।’’ काश कभी सुप्रीम कोर्ट का ध्यान साहित्य के हाईकोर्टों पर भी जाता और यहाँ की साफ़-सफाई के लिए कुछ हो पाता। साहित्य के न्यायालयों के लिए शायद हमारे संविधान में कोई व्यवस्था नहीं है, वहाँ सिर्फ़ स्वेच्छाचार है। इसीलिए साहित्य के हाईकोर्ट हों या सुप्रीमकोर्ट, सब भ्रष्ट हैं। हमारे शहर में तो साहित्य का हाईकोर्ट भ्रष्ट ही नहीं बल्कि महाभ्रष्ट है। क्या साहित्य के माफ़ियाओं के ख़िलाफ़ किसी साहित्यिक फौजी कार्रवाई की ज़रूरत नहीं है? वैसे पाण्डेय जी का ध्यान इस ओर दिलाना ज़रूरी है कि जब क़ानून का राज नहीं रहता है तो जनता क़ानून को अपने हाथ में ले लेती है। साहित्य के नैतिक ‘क़ानून’ और ‘मूल्यों’ का कत्ल करने वालों के साथ साहित्य के ग़रीब बेटे और कुछ कर सकें या न कर सकें पर वह दिन दूर नहीं जब साहित्यिक सभा-गोष्ठियों में बेईमानों और लुटेरों पर हमारे समय की राजनीति की तरह तीव्र असहमति व्यक्त करने के लिए जूते फेंकने का दौर शुरू हो जाय ? साहित्य की सामाजिकता के रास्ते में राहजनी बंद नहीं होगी तो शायद ऐसे राहजनों के ख़िलाफ़ साहित्य की जनता या साधारण कार्यकर्ता ख़ुद ‘साहित्यिक हथियार’ लेकर चलना शुरू कर देंगे? जब बड़े - बड़े साहित्यकारों ने कविता, कथा और आलोचना के रास्ते के राहजनों को प्रश्रय देना और महत्व देना और मान्यता देना शुरू कर दिया हो और ख़ुद भी उनके साथ मिलकर राहजनी करने लगे हों तो यह कहना मुश्किल है कि ऐसे लोगों के लिए देवभाषा की जगह लफंगई और जूता फेंकने की घटनाओं जैसी स्वतःस्फूर्त जनता की देसी प्रतिरोध की संस्कृति साहित्य में नहीं विकसित होगी? अपराध के साथ दंड का भी विधान होता है। कुछ ऐसे अपराध होते हैं जिनके ख़िलाफ़ बौद्धिक और शालीन असहमति ख़ुद एक अपराध है। यों जिस लेख पर पाण्डेय जी को एतराज है उसके बारे में ‘यात्रा’ के अंक तीन में ‘छोटे सुकुल के प्राइवेट नोट्स’ में यह सफाई है कि कैसे उस लेख में कथाकंस की जगह लंगड़सांई या कुछ और दूसरी चीज़ें आयीं, जिन्हें नहीं आना चाहिए था। हालाकि पाण्डेय जी ने भी उस लेख को अबतक की सबसे बड़ी लफंगई कहते हुए उसी पैराग्राफ में ख़ुद ही उन हालात और दिक्कतों का ज़िक्र किया है जिसकी वजह से उस तरह के लेख लिखने जैसे हालात पैदा होते हैं-‘‘ आलोचना की सामाजिक विश्वसनीयता एक और कारण से कम हुई है। कुछ लोग व्यक्तिगत राग-द्वेष के कारण रचनाओं और रचनाकारों की कभी अतिरंजित प्रशंसा करते हैं तो कभी रक्तरंजित निंदा। ऐसी आलोचना प्रायः अतिरंजना और सरलीकरण के सहारे चलती है और वह अपनी विश्वसनीयता के साथ-साथ आलोचना कर्म की सामाजिकता का भी नाश करती है।’’ आलोचना की सामाजिकता का नाश करने वालों के साथ आख़िर क्या सलूक हो ? क्या आलोचना की सामाजिकता का नाश करने वालों के सिर पर एक छोटा-सा भाषा का ही सही साहित्य के ईमान के बारूद से बनाया गया बम भी नहीं फोड़ा जा सकता है, तब क्या हिंदी के सच्चे सपूत आलोचना की सामाजिकता का नाश करने वालों के सिर पर चमेली का तेल रखकर चम्पी करें ? पूर्वांचल में कहा जाता है कि जैसा देवता वैसा अक्षत। लेखक की बात पर भरोसा उसके जीवन को देखकर किया जाता है। आलोचना की सामाजिकता के रास्ते पर बहुत से बहुरूपिये राहजन तरह-तरह के भेस बनाकर घूम रहे हैं, जिनकी पहचान उनके मुखौटे को उतार कर ही की जा सकती है। आलोचना की सामाजिकता को ज़ाहिर है कि पाण्डेय जी शिद्दत के साथ महसूस करते हैं और उस पर खुले दिमाग़ से रोशनी भी डालते हैं-‘ आलोचना की सामाजिकता पर विचार करने की शुरुआत इस प्रश्न से हो सकती है कि वह किसके लिए लिखी जाती है या उसे कौन पढ़ता है। इससे आलोचनात्मक सोच की प्रक्रिया प्रभावित होती है और उसका उद्देश्य भी तय होता है। यही नहीं इससे आलोचना की शैली और भाषा भी निर्धारित होती है। आजकल हिन्दी में आलोचना के नाम से कई तरह का लेखन हो रहा है। एक छोर पर अख़बारी आलोचना है तो दूसरे छोर पर अकादमिक आलोचना। अख़बारी आलोचना साहित्य के बारे में ख़बरें देती है, इसलिए जिनकी दिलचस्पी साहित्य संसार में होती है, वे ही अख़बारी आलोचना पढ़ते हैं। ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक नहीं है। अकादमिक आलोचना के पाठक मुख्यतः छात्र-छात्राएँ हैं।’ मैनेजर पाण्डेय आगे कहते हैं- ‘टेरी इग्लटन ने लिखा है कि आजकल आलोचना या तो साहित्य-उद्योग के जन-सम्पर्क का हिस्सा है या शिक्षा संस्थाओं का आन्तरिक मामला। उसका कोई सामाजिक लक्ष्य या कार्य नहीं है।’ ज़ाहिर है कि साहित्य के ऐसे भारी उद्योग का सबसे बड़ा मुनाफ़ा हिंदी में पुरस्कार के लिए तिकड़म है और इस तिकड़म को साहित्य के पवित्र कार्य में बदलने या आधार देने का काम ग़ैर-ज़िम्मेदार या भ्रष्ट आलोचना बख़ूबी कर रही है।मैनेजर पाण्डेय आलोचना की सामाजिकता के रास्ते की एक रुकावट के रूप में बेहद ज़रूरी बात आलोचना की राजधानी क्षेत्र की भाषा को लेकर करते हैं-‘ आज की हिंदी आलोचना को अभिजन संस्कृति का हिस्सा बनाने और उसकी सामाजिकता को सीमित करने का काम आलोचना की भाषा भी कर रही है। हाल के वर्षों में हिंदी आलोचना में संस्कृत से अधिक अँगरेज़ी का आतंक बढ़ा है। इस आतंक का अनुभव करना हो तो बहुवचन-7 में छपे सुधीश पचौरी के लेख ‘कबीर धर्मवीर और फूको की जीनियोलाजी’ को पढ़ना उपयोगी होगा, हिंदी में ऐसे आलोचक पहले भी रहे हैं और आज भी हैं जो शायद पाठकों के हिंदी ज्ञान पर संदेह के कारण या किसी अन्य कारण से हिंदी शब्दों के समानार्थी अँगरेज़ी शब्दों से अपने लेखों को सजाते रहे हैं, लेकिन सुधीश पचौरी ऐसा नहीं करते। वे देवनागरी लिपि में अंग्रेजी लिखते हैं। उदाहरण के लिए उनके लेख से उद्धरण देखिए: इंटरटेक्स्चुएलिटी के ज़माने में सिर्फ़ मूर्ख ही दलित को कबीर में ढ़ूँढ सकते हैं। जीनियोलाजिकल डिकंस्ट्रक्शन की यही ख़ास बात है कि दलित कबीर की किताब में भले न हो, लेकिन जीनियोलोजी के वर्तमानत्व और दलितवाद के युद्ध में कबीर एक प्राथमिक सांस्कृतिक टेक्स्ट हो सकते हैं।’ हिंदी आलोचना की सामाजिकता के रास्ते में आने वाली एक और बाधा का ज़िक्र पाण्डेय जी करते हैं-‘हिंदी आलोचना की सामाजिकता को संदेहास्पद बनाने वाली एक प्रवृत्ति वह है जो किसी रचना की समीक्षा के दौरान उसमें मौज़ूद समाज पर ध्यान नहीं देती।’ इस प्रसंग में वे ललित कार्तिकेय की लिखी अल्मा कबूतरी की समीक्षा का ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि ‘समीक्षक की सारी बौद्धिकता ‘अल्मा कबूतरी’ को एक प्रकृतवादी रचना साबित करने में लगी है। जब आलोचनात्मक चेतना धारणाओं के पीछे-पीछे चलती हुई रचनाओं के बारे में फ़ैसला करती है तब ऐसी ही अदालती आलोचना लिखी जाती है।’ यहाँ कहना ज़रूरी है कि उसी लेखिका के शुरुआती उपन्यास को अपठनीय, ठस और भूसाछाप कथाभाषा होने के बावजूद एक संपादक जी ने और कुछ आलोचकों ने सिर पर रखकर जो भांगड़ा किया था, वह क्या था ? क्या यह कहने की ज़रूरत है कि कथाभाषा में कथारस का चार सौ बोल्ट का करेंट प्रवाहित होता है जो पाठक को न सिर्फ़ प्यार से अपने सीने से चिपका लेता है, बल्कि किसी कथाकृति को यादगार बनाता है ? यह ठीक है कि ललित कार्तिकेय की आलोचनादृष्टि में बौद्धिकता और नागरबोध की दिक्कत है, पर इस दिक्कत से कहीं बड़ा अपराध कूड़ा कृतियों को आसमान पर बैठा देने से है। क्योंकि एक में अज्ञान या दृष्टिदोष है तो दूसरे में आलोचक के ईमान का लोप ही नहीं बल्कि बाक़ायदा कदाचार है। क्या यह आलोचना की असामाजिकता नहीं है ? यहाँ याद दिलाना है कि पाण्डेय जी ने ख़ुद ही ग्राम्शी के इस कथन का उल्लेख आगे किया है कि ‘महत्वपूर्ण साहित्यिक रचना एक कलाकृति होने के साथ ही अपने समय और समाज की सभ्यता का एक हिस्सा भी होती है।’ महत्वपूर्ण बात यह कि ग्राम्शी के इस कथन में यह स्पष्ट है कि एक साहित्यिक रचना का समय और समाज से जुड़ाव होने के साथ ‘एक कलाकृति होना’ भी ज़रूरी है। इसी नज़रिये से दलित विमर्श या स्त्री विमर्श से जुड़ी रचनाओं के साथ एक अविस्मरणीय ‘कलाकृति’ न हो पाने की विफलता की बात की जाती है। बहरहाल मैनेजर पाण्डेय यहाँ ललित कार्तिकेय के बहाने बेशक बौद्धिकता के ख़तरों की ओर ध्यान खींचने का ज़रूरी काम करते हैं। इस क्रम में वे नामवर सिंह को याद करते हुए लिखते हैं-‘नामवर सिंह ने ठीक ही कहा है कि आलोचना अपने समय की बौद्धिकता की उपस्थिति है।’ फिर आर-पार देखते हुए सवाल करते हैं-‘सवाल यह है कि कैसी बौद्धिकता। ज़ाहिर है अपनी सेवा में लगी बौद्धिकता नहीं, बल्कि अपने समाज की वर्चस्ववादी विमर्श की काल्पनिक सहमति के छद्म की निर्मम आलोचना करने वाली बौद्धिकता। ऐसी ही बौद्धिकता अपने समय के समाज के आलोचनात्मक विवेक का प्रतिनिधित्व करती है। वह एक ऐसी निरंतर सतर्क बौद्धिकता होती है जो अपने समय की हलचलों को जानती है और धड़कनों को पहचानती है। उसमें अपने समाज, संस्कृति और साहित्य के प्रति गहरी जिज्ञासा और ऐसी प्रश्नात्मकता होती है, जिसकी पहुँच के बाहर न परंपरा की स्मृति होती है, न वर्तमान का बोध और न भविष्य की चिंता। उस बौद्धिकता का लक्ष्य मनुष्य की स्वाधीनता है, मनुष्य की अमूर्त अवधारणा की दार्शनिक स्वतंत्रता, समाज में पराधीनता के शिकार मनुष्यों की सामाजिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता।’ यही आलोचना की सामाजिकता की बुनियाद भी है। सवाल फिर यहाँ साहित्य की दुनिया में लेखक की स्वाधीनता का है। क्यों लेखकों का कोई छोटा या बड़ा समूह अपनी स्वाधीनता किसी साहित्य की सत्ता को भेंट कर देता है। लेखकों का समाज हो या वृहत्तर समाज उसके स्वास्थ्य से बहुत-सी चीज़ें तय होती हैं। ‘ अगर समाज का बौद्धिक वातावरण उन्मुक्त और संवादधर्मी होगा तो आलोचना भी मूलगामी, उत्सुक, तेजस्वी, प्रश्नाकुल और सत्यनिष्ठ होगी, लेकिन अगर बौद्धिक वातावरण रूढ़िवादी, पीछे देखू और सहमतिवादी होगा तो आलोचना वैसी ही होगी। हिन्दी आलोचना के बेजान और बीमार होने का एक कारण हमारे समाज का वह बौद्धिक वातावरण है जिसमें साहित्यवाद का सहयोगी सहमतिवाद है। ऐसे वातावरण में पलने वाली आलोचना अगर असामाजिक हो तो आश्चर्य की क्या बात है।’ मैनेजर पाण्डेय आलोचना की सामाजिकता के रास्ते में जगह-जगह घात लगाकर बैठे राहजनों की हरक़तों पर बारीक नज़र रखते हैं। तभी तो कहते हैं- ‘हिन्दी आलोचना को असामाजिक बनाने में कुछ भूमिका उन आलोचकों की भी है जो अतिरंजना, सरलीकरण, धमकी, फ़तवा, आशीर्वाद और दुविधा की भाषा में आलोचना लिखते हैं। ऐसी आलोचना ग़ैर ज़िम्मेदार होती है, इसलिए असामाजिक की होती है।’ कहना बेहद ज़रूरी है कि आज ऐसे आलोचकों, उप आलोचकों, सहायक आलोचकों की एक पूरी ज़मात राहजनी के धंधे में लगी हुई है। आलोचकों की यह खेप प्रतिभा की जगह अपनी धंधई से बड़े सुकुल जी का बाप बनना चाहती है, ऐसा इसलिए कि उसके पास आलोचना में आत्मसंघर्ष की कूवत सिरे से गायब है। सच तो यह कि आज आलोचना की सामाजिकता को असली ख़तरा ऐसे राहजनों से ज़्यादा है।


(यह लेख ‘प्रस्थान’ के मैनेजर पाण्डेय पर केंद्रित अंक और उसके 
पुस्तकाकार संस्करण में भी है। ई पत्रिका सृजनगाथा पर भी उपलब्ध है।)














मंगलवार, 25 जून 2013

एकता का पुष्ट वैचारिक आधार

- गणेश पाण्डेय

एक वीर ने उन्हें तब घूरा
जब वे सच की तरह कुछ बोल रहे थे ।

एक वीर ने उन्हें तब टोका
जब वे किसी की चमचम खाए जा रहे थे ।

एक वीर ने उन्हें तब फटकारा
जब वे किसी मोढ़े की परिक्रमा कर रहे थे ।

असल में
एक वीर ने दम कर रखा था
उनकी उस अक्षुण्ण नाक में
जिसे तख़्ते-ताउस की हर गंध
एक जैसी प्यारी थी ।

एक दिन वे एकजुट हुए
क्योंकि एकता का पुष्ट वैचारिक आधार उनके सामने था ।

पाठ्यक्रम समिति की उस बैठक में
लिया उन्होंने निर्णय
कि ‘सच्ची वीरता’ को
जीवन से निकाल दिया जाय ।



सच्ची वीरता’ = अध्यापक पूर्ण सिंह का महत्त्वपूर्ण निबंध ।

( दूसरे संग्रह ‘जल में’ से )





आप सौ साल जियें पापा

-गणेश पाण्डेय 

छोड़ दीजिए पापा
पान के बीड़े चबाना
और तरह-तरह के जर्दे की
गमकने वाली खुशबू।

गदेली पर अँगूठे से
तम्बाकू-चूना मलना, ठोंकना
और होंठ के भीतर दाबकर
चुनचुनाहट के मजे लेना
बंद कीजिए पापा बंद।

मुझे नहीं पसंद है पापा
मम्मी को नहीं पसंद है पापा।

ये लीजिए पापा सौंफ
इलायची लीजिए पापा
आप सौ साल जियें पापा।

सफेद फ्रॉकों वाली गुड़िया जैसी
दस बरस की बिटिया
करती है प्रार्थना।

(1987)

( पहले संग्रह ‘ अटा पड़ा था दुख का हाट ’ से।)






रविवार, 16 जून 2013

पितृपक्ष

- गणेश पाण्डेय

जैसे रिक्शेवाले भाई ने किया याद
पूछा जैसे जूतों की मरम्मत करनेवाले ने
जैसे दिया जल-अक्षत सामनेवाले भाई ने
जैसे दिया ज्ञानियों ने और कम ज्ञानियों ने
जैसे किया याद
अड़ोस-पड़ोस और गाँव-जवार ने
अपने-अपने पितरों को

मैंने भी किया याद
पिता को और पिता की उँगली को
बुआ को और बुआ की गोद को
और उसकी खूँट में बँधी दुअन्नी को
सिर से पैर तक माँ को
माँ के आँचल के मोतीचूर को
मामा को और मामा के कंधे को
दादी को और दादी की छड़ी को

अनुभव की चहारदीवारी में
और याद की चटाई पर
आते गए जो भी आप से आप
मैंने सबको किया याद
जिन्हें देखा और जिन्हें नहीं देखा

जैसे ठेलेवाले भाई ने किया याद
जैसे याद किया नाई ने
मैंने भी जल्दी-जल्दी खाली कराया
पितरों के बैठने के लिए अपना सिर । 






शनिवार, 15 जून 2013

सदियों से पीछा करती आवाज तथा अन्य नोट्स

-गणेश पाण्डेय   

सदियों से पीछा करती आवाज

by Ganesh Pandey (Notes) on Saturday, June 15, 2013 at 6:43pm
बचपन में माँ और बुआ के मुख से एकाधिक बार सुना यह लोकगीत आज अचानक देखकर अपने उन मित्रो से साझा करने का मन है, जो मेरी तरह कविता के साधारण कार्यकर्ता हैं, असाधारण लेखक नहीं। उम्मीद है, यह लोकगीत अपनी ताकत से फिर-फिर चकित और द्रवित करेगा, एक-दो बार नहीं, हजार बार। कोई कविता यदि पाठक के मन में भावों का उद्रेक नहीं करती या विचारों के अग्निकण को तीव्र नहीं करती है तो यकीन मानिए कि वह और कुछ भी हो जाय, कविता हरगिज-हरगिज नहीं हो सकती। जो लोकगीत आपके सामने है कितना असाधारण है, आप स्वयं अनुभव करेंगे। मेरा सारा लिखा इसके सामने कुछ भी नहीं है। ऐसा इसलिए कह रहा हूँ कि इस गीत में मेरी, आपकी और उसकी माँ और बुआ की ही नहीं, बल्कि हमारी दादी-परदादी और उनकी भी परदादी के विदीर्ण हृदय की कातर पुकार है जो सदियों से हमारा पीछा कर रही है। कितनी पुरानी है प्रतिरोध की यह आवाज ? यह लोकगीत अवधी और भोजपुरी, दोनों क्षे़़त्रों में समान महत्व का है। पहली नजर में आपको लगेगा कि यह सामंतवाद के विरुद्ध लोकमन का बहुत मद्धिम प्रतिरोध है। कुछ पाठक पहली नजर में यह भी अनुभव करेंगे कि हरिनी का यह सारा उपक्रम अपने प्रेम और प्रेम की स्मृति को बचाने के लिए है। यह भी अनुभव करेंगे कि वह  कहीं अपने असीम प्रेम की महाशक्ति से फिर से खलरी में प्राणप्रतिष्ठा तो नहीं करना चाहती है। जैसे हो न हो उसके पास कोई जादू है, लेकिन ऐसा नहीं है मित्र, जादू से कुछ संभव होता तो वह सबसे पहले सामंतवाद को ही गायब कर देती। जैसे ही हम तनिक कविता के अंतस्तल में झाँकते हैं, लगता है कि अरे यह हरिनी तो एक माँ है, जो दूसरी माँ कौसिल्या रानी से संवाद करती है। एक अपने बेटे के मनोरंजन के लिए हरिना की खलरी और प्रीतिभोज में अपने पूरे परिवार और वर्ग के लिए उसका मांस चाहती है, जीवन चाहती है, सबकुछ चाहती है। हरिनी का मद्धिम प्रतिरोध दरअसल तीव्र प्रतिरोध की बड़ी महीन बुनावट है। यह लोककविता की शक्ति है, कला है। हरिनी भी इस पूरी कविता में सिर्फ माँ और प्रेयसि ही नहीं, बल्कि उससे कहीं अधिक लोक अर्थात जन की प्रतीक है। पाठक गौर से देखेगे तो देखेंगे कि इस गीत की आत्मा का सहचर बनते ही विचार किस तरह आते हैं। जैसे ही पाठक इस कोण से देखना शुरू करेंगे कि आज कौसिल्या रानी अयोध्या में हैं या दिल्ली में या जगह-जगह हर जगह, अर्थ की अनेक छवियाँ दिखती जाएंगी। हम आज की तारीख में इस कविता में सामंतवाद ही नहीं, पूँजीवादी सत्ता के विरुद्ध प्रतिकार की गूँज से भर उठेंगे। काश, हम यह जनविरोधी राजपाट पलट सकते। सच तो यह कि इस कविता में विमर्श के कई कोण सुलभ हैं। स्त्रीविषयक भी। अब अनुभव करता हूँ कि मेरी माँ और बुआ जैसी असंख्य स़्ित्रयों को यह गीत क्यो इतना प्रिय रहा है। मेरी तो आँख काफी देर से नम है। 

छापक पेड़ छिउलिया तपत वन गहबर हो
रामा, तेहि तर ठाढ़ि हरिनियां मन अति अनमनि।
चरतइ चरत हरिनवा त हरिना से पूछइ हो 
हरिनी कि तोर चरहा झुरान न पानी बिन मुरझिउ। 
नाही मोर चरहा झुरान न पानी बिन मुरझिउँ हो
हरिना, आजु राजा जी के छट्ठी त तोहइ मारि डरिहइँ।
मचियै बैठी कौसिल्या रानी हरिनि अरज करइ हो
रानी मसुवा त सीझहिं करहिया खलरिया हम्मै देतिउ।
पेड़वा से टँगबेउ खलरिया त हेरि फेरि देखतेउँ हो
रानी, देखि देखि मन समुझउतिउँ जनुक हरिना जियतइ।
जाहु हरिन घर अपने खलरिया नाहि देबइ हो
हरिनी खलरी कइ खझडी मिढ़उबइ त राम मोर खेलिहइँ।
जब जब बाजइ खझड़िया सबद सुनि अनकइ हो
हरिनी ठाढ़ि ढकुलिया के पेड़ हरिन के बिसूरइ।



रंगों के बाजार में काला और सफेद

by Ganesh Pandey (Notes) on Friday, March 8, 2013 at 8:00pm
       कुछ मित्र कहते रहते हैं कि दुनिया को सिर्फ काले और सफेद में देखना बेवकूफी है। ऐसा कुछ नहीं होता। थोड़ा कम सफेद भी होता है तो थोड़ा कम काला भी होता है। थोड़ा पीला-पीला भी होता है। थोड़ा हरा-हरा भी। थोड़ा केसरिया-केसरिया भी! थोड़ा लाल-लाल भी होता है। कोई रंग बहुत ज्यादा भी होता है। थोड़ा उससे भी कम होता है। थोड़ा उससे भी कम -कम होता है। थोड़ा थोड़ा-थोड़ा ज्यादा भी होता है। इन्हीं रंगों के बीच रेशमी केसरिया और सांप की त्वचा से भी अधिक काले रंग को हराने का खेल करना होता है। कहते हैं कि काले रंग का पेट फूला होता है, बिल्कुल किसी सेठ की तरह और लाल रंग का पेट उसकी आँत से चिपका रहता है।    
     मेरे समय के पढ़े-लिखे लोग बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। जैसे सड़क के किनारे सांप और नेवले की फर्जी लड़ाई की बात कह कर कोई मदारी देर तक हमें रोके रहता है और अंत में कोई तेल या दांत साफ करने का पावडर बेचता हैं। मैं सबकी सुनता हूँ और बेचैन हो जाता हूँ। मै समझ नहीं पाता हूँ कि एक गरीब अपने पेट के लिए झूठ बोलता है यह तो चल सकता है भाई लेकिन मोटी तनख्वाह पाने वाला झूठ क्यों बोलता है ? मुझे यह जानने में बड़ी दिक्कत होती है कि महाकाले रंग को हटाने के लिए नीला-पीला क्या करेंगे ? किसी राक्षस को हटाने के लिए राक्षस क्या करेंगे ? जैसे लोहे को लोहा काटता तो काले को काला ही हटाएगा ? राजनीति के राक्षस को हटाने का काम खेल, फिल्म, पत्रकारिता, धर्म, समाज और साहित्य आदि क्षेत्रों के राक्षस करेंगे ? हो सकता है कि राक्षस सिर्फ राजनीति में होते हों ? बाकी क्षेत्रों में नहीं ?      
     क्या रंगों की लड़ाई के खेल का नाम दुनिया है ? क्या सिर्फ विचारों की लड़ाई का नाम दुनिया है ? क्या झूठ और सच की लड़ाई कोई स्वप्न है, यथार्थ नहीं ? क्या न्याय और अन्याय की लड़ाई सिर्फ किस्से-कहानी की बात है ? दुनिया भी कोई चीज है या फैशन ? अपने घर को साफ करने के लिए, अपने घर के अँधेरे को दूर करने के लिए आखिर हमे झाड़ू और मोमबत्ती कहाँ मिलेगी ? किस दुकान, मकान या गुप्त तहखाने में ? या जंगल में ? काले को भगाने का मंत्र और दवा कहाँ है भाई ? कितनी कारगर है भाई ? दवा में किसी सुधार की जरूरत है या दवा केे असर के लिए हमारी हजार पीढ़ियों को कुर्बानी देनी होगी ?     
      कहाँ हैं विचारक और लेखक और पत्रकार सब ? क्यों नहीं निकालते काला जादू का तोड़ ? कब तक गरीबों-वंचितों, स्त्रियों और कमजोर लोगों के साथ होता रहेगा भेद-भाव ? मेहनत करने वाला भूखा रहेगा और तोंद वाला मजा करेगा ? अच्छा काम करने वाला हाशिये पर रहेगा और फिसड्डी लेखक पुरस्कार पायेगा ? पुरस्कार पाकर या कतार में लगा हुआ लेखक क्रांति करेगा ? काला रंग भगाने की कविता रचेगा ? कविता क्या पूरा मंत्र रचेगा ? शर्तिया इलाज का दावा करेगा! हद तो यह कि राजधानी के लेखकों की क्रूरता पर रोष करने वाला खुद पुरस्कार पाने के बाद साहित्य की सारी क्रूरता को भूल कर अन्तर्राष्ट्रीय लेखक बनने के अभियान में लग जायेगा! इधर पुरस्कार ही नहीं रचनाओं के अनुवाद के फैशन के रूप में भी बेवकूफी दिखती है ? पहले के लेखक अपनी रचनाओं का अनुवाद देखकर मरे हैं क्या भाई ? अपना श्राद्ध करने की हड़बड़ी क्यों ? क्या करोगे काले रंग से फर्जी लड़ाई का ? कहीं तो ढंग से लड़ो यार! देश की लड़ाई का बूता नही ंतो चलो कोई बात नहीं। अपने आसपास की लड़ाई लड़ो। राजनीति की लड़ाई नहीं लड़ सकते तो साहित्य की लड़ाई लड़ो। समाज की लड़ाई भी नहीं लड़ सकते तो अपने जीवन की लड़ाई लड़ो। अपने बच्चो की लड़ाई लड़ो। असली लड़ाई तो होगी। आज नही ंतो कल। काले पर जब तक पूरा सफेद नहीं पोतोगे, काला नहीं भागेगा। सफेद बढ़ाओ। थोड़ा-थोड़ा करके बढ़ाओ। खुद नहीं बढ़ा सकते तो रास्ते से हट जाओ। ये रंगों का बाजार मत लगाओ। हटाओ उधर। फेंको उधर। बाहर के लाल से नहीं जायेगा काला। भीतर थोड़ा और लाल करो। कुछ चीजों से रंग बदल जाता है। जैसे ही भीतर थोड़ा और लाल करोगे, जैसे ही बढ़ा हुआ रंग आँखों के रास्ते बाहर आयेगा, काले को खत्म करने का सफेद आप से आप बन जायेगा।  


हिंदी माँ ही नहीं, मेरी प्रेमिका भी है

by Ganesh Pandey (Notes) on Monday, March 25, 2013 at 11:25pm
           भाषा की निर्मिति में सांस्कृतिक अवयवों की भी कम भूमिका नहीं होती है। प्रकृति, समाज, धर्म, अर्थ, राजनीति और इन सबसे बढ़कर लोकविश्वास और लोकजीवन की परंपरा की शक्ति, ये सब भाषा की रचना में सहायक होते हैं। भाषा का भी एक जीवन होता है। भाषा के भी मनुष्य से रिश्ते होते हैं। भाषा ही मनुष्यों में रिश्ते बनाती है। रिश्ते आसमान से पैदा नहीं होते हैं। जिस भाषा का जीवन नहीं होता है, वह भाषा मर जाती है। वह भाषा केवल पुस्तकालयों की शोभा बन कर रह जाती है। भाषा की रचना भले ही मनुष्य करता है, लेकिन एक ऐसी स्थिति भी आती है कि जब भाषा मनुष्य को और अच्छा मनुष्य बनाती है। जैसे मनुष्य ने भाषा को निरंतर समृद्ध किया है। भाषा मोटे तौर पर दो तरह की होती है। मैं यहाँ ज्ञान-विज्ञान और अध्ययन के माध्यम के रूप में भाषा की बात नहीं करूँगा। बल्कि उन दो रूपों की बात करूँगा, जो एक तो साधारण जीवन में रोजी-रोटी और सरकारी कामकाज तथा सामाजिक व्यवहार का माध्यम है, दूसरे वह भाषा जिसका प्रयोग लेखक लोग करते हैं अर्थात जो सर्जनात्मक भाषा है।       
           यह बातचीत भी किसी बड़े भाषा विमर्श के लिए नहीं है, बल्कि एक छोटी-सी सफाई है कि मैं हिंदी को माँ जैसा कुछ क्यों कहता हूँ। हालाकि हिंदी को माँ कभी नहीं कहा है। बल्कि कुछ लोगों को हिंदी का बेटा कहता हूँ या कहता हूँ कि ये हिंदी के बेटे नहीं हैं। कभी-कभी जब समय विपरीत होता है या परिस्थितियाँ विपरीत होती हैं तो एक बाप को भी अपने बेटे के सामने सफाई देनी पड़ती है। कहते हैं कि इधर मूल्यों में क्षरण बहुत हुआ है। हर क्षेत्र में हुआ है। राजनीति, धर्म, वाणिज्य, साहित्य, सब जगह। सो भाषा में भी बहुत कुछ खराब हुआ है। कविता की भाषा में पत्थर कूटने का जो काम शुरू हुआ है, उसे देखकर स्वर्ग में बैठे हुए पुरखो की आत्मा खूब तृप्त हो रही होगी। बहरहाल कविता की भाषा पर कभी आगे बात करेंगे। यहाँ नये कवियों के भाषा विवेक पर कुछ कहना है। इसलिए कहना है कि यह बता सकूँ कि मैं ‘‘हिंदी के बेटे’’ जैसे पद का प्रयोग क्यों करता हँू ?  शमशेर बहादुर सिंह नाम के एक कवि हिंदी में हुए हैं, इस तरह इसलिए कह रहा हूँ कि कुछ नये कवियों को शायद यह मालूम नहीं होगा कि उन्हांेने ‘‘चाँद का मुँह टेढ़ा  है’’ संकलन की भूमिका में मुक्तिबोध को मर्द कवि कहा है। सवाल यहीं से शुरू हो जाता है कि उन्होने ऐसा क्यों किया ? मर्द कवि कहने की क्या जरूरत थी ? वह तो कहिए कि अभी कट्टर विमर्शवादियों ने अभी ध्यान नहीं दिया है वर्ना शमशेर को मर्दवादी कह कर स्त्रीविरोधी घोषित कर देते। तो हाँ, मर्द की जगह बहादुर या वीर या लड़ाका इत्यादि क्यों नहीं कहा ? मर्द ही क्यों कहा ? असल में नये कवियों को भी पता होना चाहिए कि शमशेर कविता की भाषा के जादू के जानकार थे। यों यह हर कोई जानता है कि शब्द की तीन शक्तियाँ होतीं हैं, अभिधा, लक्षणा, व्यंजना। मर्द शब्द को अभिधा में लेने वाले शमशेर के साथ अनर्थ कर देंगे। ठीक वैसे ही जैसे जब मैं कहता हूँ कि ‘हिंदी के बेटे’ तो सीधे-सीधे माँ-बेटे के स्थूल संबंध में भाषा के इस पद को देख कर अनर्थ कर देंगे। अभी बताता हूँ...    
             पहले यह कि यह माँ का पद भी भाषा ही नहीं जीवन, समाज, सभ्यता, संस्कृति का शीर्ष पद है। आदिशक्ति ही नहीं सभी देवियों को भी माँ कहते है और परमेश्वर को भी पिता ही कहते हैं। और तो और नदियों को माँ कहते हैं। धरती को माँ  कहते हैं। गाय को माँ कहते हैं। गाय को ही नहीं, बैल, भैंस, बकरी, कुत्ता आदि पशुओं को भी गाँव में बाबू-भैया, दीदी-बहिनी, मौसी इत्यादि संबोधन देते हैं। कई स्त्रियाँ तो गाय, बकरी आदि की असमय मृत्यु पर पारिवारिक संबोधन देते हुए विलाप करती हैं। कई घरेलू कुत्तों को बहुत पढ़े-लिखे और मेरी तरह बेवकूफ लोग भी बेटा कहते हैं। कई बच्चे भैया कहते हैं। आखिर जो अपनी माँ के पेट से पैदा नहीं हुआ है, उसे हम भैया क्यों कहते है ? और तो और हम जिस ऑटो में बैठकर सफर करते हैं, उसके ड्राइवर को भाई साहब या बेटा या भैया क्यों कहते हैं ? किसी बुजुर्ग को देख कर चाचा क्यों कहते हैं ? गाँव में छोटी जाति या बड़ी जाति के लोगों को समान रूप से चाचा, चाची भैया आदि से संबोधित क्यों करते हैं ? इसलिए! इसलिए!! इसलिए!!! कि यह भावनात्मक संलग्नता है। यही सामाजिकता है। यह भावनात्मक श्रृंखला ही एक मजबूत समाज की रचना करती है। आशय यह कि थोड़ी देर के लिए अभिधा में भी ‘हिंदी के बेटे’ को ले लें तो भी संलग्नता के स्तर का पता चलता है। भावनात्मक जुड़ाव की तीव्रता का पता चलता है। हालाकि ऐसा कुछ न भी हो तो सीधे-सीधे शब्द की शक्ति की ओर ध्यान केंद्रित करूँगा।     
        जब मैं किसी को हिंदी का बेटा कहता हूँ तो आशय यह कि हिंदी के प्रति उसकी निष्ठा और ईमान का स्तर वही है जो एक माँ के प्रति एक बेटे का होता है। जब यह कहता हूँ कि ‘वे हिंदी के बेटे नहीं हैं’ तो आशय ठीक वही है जैसे कोई कहे कि अमुक देशभक्त नहीं है। अर्थात गद्दार है। हिंदी हो या देश दोनों के लिए बात एक ही है। असल में यह माँ जैसा पद या दूसरे पारिकवारिक पद हमारे संबंधों के स्तर ही नहीं, भावनात्मक और मूल्यपरक निकटता और मजबूती को भी दर्शाते हैं। आखिर हम किसी को पत्नी क्यों कहते हैं ? पारिवारिक सहायक क्यों नहीं कहते हैं या पार्टनर क्यों नहीं कहते हैं ? गुरु को गुरु क्यों कहते हैं, शिक्षणकर्मी क्यों नहीं कहते हैं ? आपको आपके दफ्तर में कोई क्लर्क क्यों नहीं कहता है ? आपके उपनाम से क्यों संबोधित करता है ? वही भावनात्मक निकटता का आधार। पर ‘हिंदी के बेटे नहीं हैं’ कहते हैं तो उसके पीछे की ध्वनि तो सीधे ‘हिंदी के गद्दार’ की ही है। आखिर मातृभाषा पद क्यों है ? फिर हिंदी को माँ कहने से परहेज क्यों ? हिंदी या दुनिया की कोई भी भाषा कोई फुटबाल है ? मातृभाषा या सर्जनात्मक भाषा के  साथ यह नासमझी क्यों ?       
          सच तो यह कि मेरे लिए हिंदी, जीवन में परिवार और सभी संबंधों का भी आधार है। सांस तो है ही। मुझे पुरस्कार के लिए हिंदी में काम नहीं करना है। हिंदी मेरे लिए ऑफिस की कोई फाइल नहीं है बच्चो, हिंदी मेरे लिए कोई सिगरेट या शराब का प्याला भी नहीं है। हिंदी मेरे लिए माँ ही नहीं, मेरी प्रेमिका भी है। 



लाइक और कमेंट उर्फ आग से प्रेम करता हूँ

by Ganesh Pandey (Notes) on Thursday, March 28, 2013 at 7:22pm
            एक एफबी मित्र ने फेसबुक के परिदृश्य को सिर्फ लाइक और कमेंट संख्या के अधार पर देखने की कोशिश की है। मैं संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि पहुँच के आधार पर देखता हूँ। आप किस वर्ग तक अपनी बात ले जाना चाहते हैं। यह बहुत कुछ तय करता है। यह कोई जरूरी नहीं कि कोई आपकी तीखी बात सुने या देखे और हाँ भी कहे। एफबी पर काफी अधिक संख्या युवाओं की है। मेरी उम्र के या मुझसे अधिक उम्र के कम हैं। उम्र ही नहीं रुचियाँ और प्रतिबद्धताएँ भी महत्वपूर्ण हैं। सबसे बड़ी बात यह कि यह एक सामाजिक माध्यम है, जहाँ आपकी पोस्ट, आपके लाइक और कमेंट सबके लिए सुलभ हैं। आशय यह कि यहाँ आप ड्राइंगरूम की तरह अकेले में कोई लाइक और कमेंट नहीं कर सकते हैं। सब आपको देख सकते हैं। इसलिए  कई बार उन बातों और चीजों से कुछ लोग दूर रहते हैं ,जहाँ यह डर होता है कि कोई जान न जाय कि मैं गणेश पाण्डेय के साथ हूँ या मैं इस तरह की बातों को पसंद करता हूँ। यह ऐसे भीरु मित्र होते हैं, जिन्हें यदि अनलाइक की भी सुविधा मिली हो तो वह भी नहीं करेंगे। एफबी पर कई तरह की पोस्ट दिखती है। अधिकांश युवामन की पोस्ट होती है। जिनमें वैचारिकता या गंभीरता या परिवर्तन की आकांक्षा की जगह उच्चवास अधिक होता है। ऐसी अभिव्यक्ति चालीस-पचास की उम्र में भी दिख जाती है। मेरी उम्र के आसपास और कुछ जरा कम उम्र के लोग भी ज्यादातर अपने को प्रतिष्ठत करने के लिए अपने बारे में कहते हैं। साहित्यिक परिदृश्य से जुड़ी ज्यादातर ऐसी पोस्ट साहित्यिक परिदृश्य पर किसी बदलाव, असहमति या नाराजगी की वजह से नहीं होती है। अधिक सक्रिय ज्यादातर युवा लेखक मित्र भी साहित्य के भ्रष्टाचार पर भयवश चुप रहना अधिक पसंद करते हैं। भय सिर्फ यह कि हाय, पुरस्कार और चर्चा से वंचित हो जायेंगे या अमुक संगठन या समूह के लोग नाराज हो जायेंगे।  यह जानता हूँ, इसलिए मुझे तनिक भी दुख नहीं होता कि क्यों कम लोग लाइक या कमेंट करते हैं। एक बार अग्रज मोहन श्रोत्रिय जी ने मेरे बारे में कहा था कि आँख में उंगली डाल कर साहित्य का सच दिखाता हूँ। यह श्रोत्रिय जी का बड़प्पन है कि वे मेरे बारे में ऐसा कहते हैं। इस उद्धरण का प्रयोजन सिर्फ यह कहने के लिए कि जब आप आँख मूँद कर साहित्य में काम करने वाले लोगों की आँख में उंगली डालेंगे तो वे भला आपको क्यों पसंद करेंगे। पर यह सच है कि आप अपने समय के साहित्यक परिदृश्य पर भूमिगत यथार्थ को फटकार कर कहने के लिए कबीर बनने की हिमाकत करते हैं, तो वे आपके साथ तो नहीं आयेंगे, पर छिप-छिप कर आपकी बात सुनेंगे और पढ़ेंगे, जैसे कुछ लेखों की फोटो कापियाँ पढ़ी गयीं। यह सिर्फ इसलिए कि जब यह आप जानेंगे तो आपको कतई लाइक और कमेंट की संख्या को लेकर कोई दुख नहीं होगा। मैं जब कई लोगों की पोस्ट के साथ सौ-दो सौ की लाइक और कमेंट देखता हूँ तो कतई बुरा नही लगता। क्यों कि मेरी उम्र के या युवा लेखक मित्रों की उन सौ-दो सौ लाइक में साहित्य में काम करने वाले गंभीर लोग नहीं होते है। अधिकांश अन्य क्षेत्रों के लोग होते हैं। नवनीत जी  ने अपने जिन तीन अनुभूत सत्यों का जिक्र किया है, वे हैं-पहला-पोस्ट चाहे जैसी हो अगर प्रोफाइल फीमेल है तो दावा है खूब-खूब सारे लाइक और कमेंट मिलेंगे। दूसरा-पोस्ट चाहे जैसी हो अगर पोस्ट किसी प्रोमिनेंट फिगर की है तो भी कुछ लाइक और कमेंट मिलेंगे। तीसरा-पोस्ट चाहे कितनी ही अच्छी, सही और मुद्दे की हो लेकिन अगर प्रोफाइल दमदार नहीं तो बहुत मुश्किल है कि आपकी बात को आपके निजी मित्रों से बाहर किसी का समर्थन मिल पाए।  विनम्र निवेदन यह कि यह देखें कि किसी फीमेल की पोस्ट में लाइक की संख्या महत्वपूर्ण है या कैसे लोग उनकी बात को पसंद करते हैं, यह महत्वपूर्ण है। कविता वाचक्नवी की तमाम पोस्ट को बहुत से लोग लाइक करते हैं, लेकिन मैं यह नहीं मानता कि मेरे जैसे दूसरे कई मित्रों की पसंद का उनके लिए वही अर्थ है जो बाकी मित्रों की पसंद का। उन्हें पता है कि कौन मित्र पाठक मित्र है और कौन मित्र लेखक मित्र है। दूसरी बात कम उम्र की बच्चियों बौर बहनों की पसंद का तो उनसे किसी प्रकार की ईर्ष्या का भाव नहीं होना चाहिए, बल्कि यह देखना चाहिए कि कितने लोग उनकी बात सुन रहे हैं और वे कैसे संवाद कर रही हैं। मनीषा पाण्डेय नाम की एक कम उम्र की मित्र के संवाद देखें। हम लेखक मित्रों को कोई चुनाव लड़ना है क्या कि हम लाइक बढ़ाने के उपाय ढ़ँूढे। मै जानता हँू कि कौन-कौन मुझे पढ़ता है, भले ही वह लाइक का बटन नहीं दबाता है। हम किसके लिए लिखते या कहते हैं, इस पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है। नये लेखक इस भ्रम में हो सकते हैं कि उन्हें बहुत से लोग लाइक करते हैं। एफबी मित्र की सामाजिक हैसियत या पद उसकी पोस्ट को ज्यादा लाइक जरूर दिला सकता है। कोई किसी बड़े अखबार का संपादक है तो बहुत से लोग इस आकर्षण में लाइक-वाइक या कमेंट कर सकते हैं। लेकिन मेरी उम्र का व्यक्ति क्या ऐसा करेगा या मैं पहले उसकी बात देखूँगा, अच्छी है तब लाइक करूँगा। मैं तो यह भी देखूँगा कि वह व्यक्ति जितना बड़ा संपादक है, क्या उतना ही बड़ा लेखक भी है ? ऐसा कोई व्यक्ति जो साहित्य के प्रति उसी निष्ठा से न जुड़ा हो जैसा मैं अपने को महसूस करता हँू, तो उसके लाइक न करने का मुझे कोई दुख नहीं होता है। यह भी जानता हूँ कि बड़े संपादक की कुर्सी पर बैठने मात्र से कोई निडर संपादक नहीं हो जाता है। जो संपादक, साहित्य की सत्ता से डरेगा भला वह राजनीति और समाज की सत्ता के सामने कैसे टिकेगा। कई सरकारी अधिकारी हैं, जिनकी पोस्ट को बहुत कम लोग लाइक करते हैं। जाहिर है कि यहाँ पद नहीं बल्कि रचना का सवाल होता है। मित्रो, यह निवेदन इसलिए कि आप लाइक और कमेंट पर नहीं अपनी अभिव्यक्ति पर ध्यान दें। आप क्या कह कर सुकून महसूस करते हैं। क्या आप यह सोचते हैं कि आप इस धरती पर क्या करने और कहने के लिए आये हैं ? या यह सोचते हैं कि अमुक को खुश करके पुरस्कार और कार्यक्रम का निमंत्रण पाने के लिए आये हैं। मित्रों डर कर मेरी पोस्ट को लाइक न करने की दिक्कत कुछ मशहूर प्रोफसर और लेखक लोगों के साथ भी है। कुछ तो हिंदी के नये अंतरराष्ट्रीय लेखकों के साथ भी ऐसा ही डर है। लेकिन मैं तनिक भी बुरा नहीं मानता। मुझे इस बात का संतोष है कि मैंने लिखा वह जो चाहा। किसी संपादक या आलोचक या साहित्य की सत्ता को प्रसन्न करने के लिए उस तरह का साहित्यिक जीवन नहीं जिया है, जैसा आज बहुत से लोग जीते हैं। कुछ लोग आग को छूने से डरते तो हैं और मैं आग से प्रेम करता हँू। अपना काम कीजिए। लाइक और कमेंट की चिता करने की कोई जरूरत नहीं है। अंत में यह कि फेसबुक एक ऐसा माध्यम है, जहाँ आप किसी शहर में रहते हुए भी अपनी निडरता और खासतौर से लेखकीय स्वाभिमान की वजह बाहर कर दिये जाने पर भी एक सचमुच का समाज पा सकते हैं, जहाँ कुछ लोग आपकी तरह सोचने और जीने वाले हैं। मैं इन्हीं कुछ मित्रों को देखना और इनसे ही संवाद करना पसंद करता हँू..........



वीआईपीवाद के पंजे में फँसा है जनसुरक्षा का टेंटुआ...

by Ganesh Pandey (Notes) on Sunday, April 21, 2013 at 3:22pm
यह किताब भी अजीब किताब है। कुछ होते ही कई पन्ने आप से आप फड़फड़ाने लगते हैं। कभी इसका रंग लाल दिखता है तो कभी काला तो  कभी इंद्रधनुष जैसा लुभावना। कभी-कभी तो इतना बेमेल दिखता है कि देखने का मन नहीं करता है। देश एक पाँच बरस की बेटी के साथ हुए हादसे से सदमें में है और एक लेखक अपनी फोटो बदल रहे हैं, एक संपादक अपनी निजी दुनिया में विचरण कर रहे हैं। यही लोग देश और समाज के शुभचिंतक हैं ? कुछ लेखक लोग इस घटना पर प्रवचन में दुश्मन नम्बर एक के रूप में पूँजीवाद को पहले गिरिफ्तार करने की बात करते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि भाई पूँजीवाद कोई घुरहुआ-निरहुआ नहीं है कि उसे आप कहीं से पकड़ कर जेल में ठूँस देंगे और सारी समस्या पलक झपकते ही छूमंतर हो जाएगी। अरे भाई पूँजीवाद एक बड़ी बीमारी है, जाते-जाते जाएगी, एक लंबी लड़ाई है। साल-दो साल में कुछ नहीं होने वाला। जब किसी व्यवस्था को राजरोग हो जाता है तो उसकी लंबी दवाई होती है। किसी आदमी को तपेदिक हो और उसका पैर भी टूट जाए तो पैर टूटने का इलाज क्या तपेदिक ठीक होने के बाद किया जाएगा ? या पैर को दिखाने हड्डी के चिकित्सक के पास जाएँगे ? प्लास्टर वगैरह जो जरूरी होगा, करेंगे ? कहना यह कि मौजूदा लोकतंत्र के फेफड़े में क्षय रोग हो गया है, जिसकी उपयुक्त चिकित्सा की जरूरत है। गंभीर बात यह कि लोकतंत्र को राजरोग के साथ पोलियो भी हो गया है। इससे भी गंभीर बात यह कि पोलियो दाहिने हाथ में हो गया है। सीधे-सीधे कहूँ तो पुलिसतंत्र को पोलियो हो गया है। विचारणीय यह कि यह पोलियो किसी टीके से नहीं दूर होगा, इसे दूर करने के लिए पुलिसतंत्र को ही कहीं दूर व्यवस्थित करना पड़ेगा। जब तक पुलिस का पोलियो ठीक न हो जाए तब तक उसे लालबत्ती अर्थात वीआईपी ड्यूटी या वीआईपीवाद से दूर रखना पड़ेगा। उसे जनता का सेवक और रक्षक बनाने के लिए राजनीतिक गुलामी से मुक्त करना पड़ेगा। उसकी सेवाशर्तों में बड़े फेरबदल की जरूरत है। उसे पहले जनता की रक्षा करने के लिए बाध्य करना पड़ेगा। 
     इस घटना पर कुछ लोग कहते हैं कि फाँसी की सजा हो जाए तो क्या ऐसे अपराध बंद हो जाएंगे ? मैं कहना चाहता हूँ कि फाँसी की सजा नहीं है तो क्या ऐसे अपराध बंद हैं ? मानवाधिकारों की बात करने वाले कुछ लोग बड़े अपराधियों को फाँसी न देने की वकालत करते दिख जाते हैं। उनका कहना है कि फाँसी की सजा न हो। जानने की इच्छा होती है कि भाई जब एक या दस हत्या करने वाले अपराधी को फाँसी न देने की बात की जाती है या ऐसा कानून बनाने की बात की जाती है तो फिर सेनाओं को दुश्मनों को मौत के घाट उतारने की अनुमति क्यों ? आखिर दुश्मन भी तो मानव है, उसके भी जिंदा रहने का अधिकार उस समय कहाँ होता है ? क्या उस समय संकीर्ण मानवाधिकार की बात करने वाली बहन या भाई को युद्ध के मोर्च पर भेज देना चाहिए ? क्या जिसकी हत्या होती है या जिसके देह के साथ क्रूरतम व्यवहार किया जाता है, उसके दर्द का कोई मोल नहीं है ? बस मानवाधिकार की ओर से निंदा के दो बोल काफी हैं ? क्या शरीर में गंभीर बीमारी होने पर कभी उसके अंग को अलग नहीं किया जाता है ? यहाँ फाँसी के दंड के पक्ष में कोई बहस नहीं कर रहा हूँ। सिर्फ यह कह रहा हूँ कि लकीर के फकीर मत बनिए। प्रगतिशीलता को पहले तर्क की कसौटी पर कसिए। फिर आप यह मुनासिब पाते हैं कि फाँसी की सजा एकदम से खत्म कर दी जाए तो खत्म कर दीजिए। लेकिन देखना यह है कि आप इस धरती पर सिर्फ फाँसी की सजा खत्म कर देने का स्वप्न देखने के लिए पैदा हुए हैं या समाज को हिंसा मुक्त कराने के लिए ? जिस देश में रहते हैं, उसे बेटियों और बहनों को सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए बेहतर बनाने के लिए योगदान करना चाहते हैं ? तर्क सिर्फ फाँसी की सजा तक ही नहीं रह जाएगा, फिर तो यह भी पूछना पड़ेगा कि भाई हथियार की क्या जरूरत ? बैंकों की सुरक्षा तो मानवाधिकार वाले लोग कर ही लेंगे ? बाहर की सेनाओं को भी अपने भाषण से प्रभावित कर लेंगे ? क्या मानवाधिकार की सोच का दायरा तंग है ? मानवाधिकार की बात क्या वहाँ नहीं करनी चाहिए जहाँ शासन की पुलिस या अन्य बल निहत्थे लोगों पर क्रूरताएँ करते हैं ? पिछड़े लोगों को ताकत के बल पर दबाते हैं, उनका सबकुछ छीन लेते हैं। उनकी आबरू लूट लेते हैं। फिर यहाँ आबरू लूटने वालों के साथ जान की माफी की बात क्यों ? जिस स्त्री या बच्ची के साथ ऐसा कुछ होता है, उसे न जाने कितनी बार, शायद रोज मरना होता होगा। पर यह जानता हूँ कि फाँसी की सजा से भी हमारा समाज सचमुच बदल नहीं जाएगा। हत्याएँ रुक गयीं क्या ? दूसरे अपराध खत्म हो गये क्या ? दरअसल सबसे बड़ा सवाल कानून के राज का है। कानून के डर का है। संविधान के प्रति निष्ठा का है। लेकिन यह होगा कैसे ? क्या हमारे देश के राजनेताओं की निष्ठा सचमुच संविधान के प्रति सच्ची है या सब दिखावा है ? कानून का डर वीआईपी को नहीं होगा तो जनता को कानून का डर कैसे होगा ? राजा कानून तोड़ेगा तो जनता  कानून का पालन कैसे करेगी ? यह सब यह कहने के लिए कह रहा हूँ कि हमारे लोकतंत्र के चुनाव में पैसे की भूमिका सबसे खतरनाक है। इसी पैसे के लिए कानून तोड़ने का खेल चलता है। यह सब विचारणीय है पर सबसे पहले वीआईपी की सेवा से पुलिस को मुक्त करने की जोरदार पहल हो। 
     सच तो यह कि सिर्फ राजधानी ही नहीं, देश के बाकी हिस्सों में भी इस तरह के हादसे बच्चियों और महिलाओं के साथ हो रहे हैं। जिन पर मीडिया का फोकस कम है। पुलिस के चरित्र की समस्या वहाँ भी कमोबेश ऐसी ही है। पुलिस परिवार की बच्चियों को भी कई बार यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है। फिर भी अपराध छिपाना और अल्पीकरण करना या गलत दिशा देना, आम बात है तो ऐसा इसलिए कि पूरे देश में पुलिस कानून की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि सत्ता और वीआईपी की रक्षा के लिए काम करती है। जाहिर है कि यह सब खुशी-खुशी नहीं, बल्कि अपनी सेवाशर्तों की वजह से ऐसा करती है। जनांदोलन इस बात के लिए भी होना चाहिए कि सरकारें सबसे पहले जनता की पुलिस से अपना काम लेना बंद करें अपनी सुरक्षा लिए दूसरे बल का गठन करें, चाहें तो दूसरी फौज बना लें। पर जनता की सुरक्षा में संेध न लगाएँ। सच तो यह कि आज की तारीख में जनसुरक्षा का टेंटुआ वीआईपीवाद के पंजें में फँसा है। इस वीआईपीवाद से टकराना ही होगा। वे जिस दिन पुलिस को अपनी सेवा से मुक्त कर देंगे, कम से कम कानून में भी इससे बेहतर हो जाएगा। 


साहित्य के पूँजीवाद से कब लड़ेंगे ?

by Ganesh Pandey (Notes) on Saturday, May 4, 2013 at 8:46pm
     युवामित्रो द्वारा की जा रही एक अखबार के संपादकजी की तीव्र आलोचना ने ध्यान खींचा है। युवा मित्रों के हौसले के साथ हूँ। युवा ही नहीं बल्कि कुछ वरिष्ठ मित्र भी संपादकजी से असहमत हैं। एक मित्र ने अपनी पीड़ा को जरा तल्ख लहजे में रघुवीर सहाय के मुहावरे से ठीक ही कहा कि ऐसे ही रहा तो अमुक अखबार बच्चों के नम्बर दो के लायक रह जाएगा। एक युवामित्र ने  कहा  कि जैसे रोम के जलने पर वहाँ का शासक वंशी बजा रहा था, संपादकजी भी अपनी वंशी में लीन हैं। पता नहीं धुन में या वंशी में या दोनों में या किसी की याद में। एक अशोकजी हैं एक कमलेश जी हैं। ऐसे कई ‘जी’ साहित्य में सक्रिय हैं। यह ‘जी’ एक सामाजिक-सांस्कृतिक (एक अर्थ में राजनीतिक भी) संगठन के लोगों द्वारा अनिवार्य रूप से लगाया जाने वाला आदरसूचक एक विशेष पद है। संबोधन ही नही, कहीं भी उल्लेख करना हो तो रेल के इंजन की तरह श्री लगाने के बाद अंत में गार्ड के डिब्बे की तरह ‘जी’ जरूर लगता है। पर यही ‘जी’ प्रगतिशील मित्रों के हाथ लगते ही सिर्फ और सिर्फ एक औपचारिक आदर बन जाता है। जैसे नामवरजी। हृदय से सम्मान न भी करते हों तो दिखाने के लिए ही सही। हो सकता है कि बहुत से लोग संपादकजी का भी सम्मान सिर्फ दिखाने के लिए ही करते हों या इसलिए कि वे एक अखबार के संपादक हैं, इसलिए। वे संपादक न रहते तो कितने लोग किस तरह सम्मान करते, यह एक अलग विषय है। पर विनम्रतापूर्वक यह जरूर कहूँगा कि तब लोग उनके लिखे को देखकर करते। अशोकजी का न चाहते हुए भी लोग सम्मान इसलिए करते हैं कि उन्होंने बकौलखुद हजार से अधिक कविताएँ लिखी हैं, जैसे तेंदुलकर ने कई हजार रन बनाए हैं। वे एक बड़े अफसर थे, कई साहित्यिक संस्थाओं के प्रधान थे। पर क्या अपने समय के और अपने आसपास के लेखकों में उनका काम सबसे अच्छा है ? वे जितनी जगह घेरते हैं, सचमुच उतनी जगह के अधिकारी हैं ? मैं बहुत छोटा आदमी हूँ, बड़े संकोच के साथ यह कह रहा हूँ। पर जब कोई साहित्य की एक चली हुई दुकान हो जाएगा तो कुछ लोग तो उस दुकान के साथ रहेंगे ही। दरअसल साहित्य में ऐसी कई दुकानें हैं। सिर्फ अशोकजी ही क्यों , दो और भी हैं। कुछ लेखक संगठन भी दुकान ही हैं। जब मैं दुकान कह रहा हूँ तो उन्हें छोटा नहीं बना रहा हँू बल्कि यह कह रहा हूँ कि जैसे दुकान अपने फायदे की बात सोचती है, इसी तरह यह लोग भी अपनी दुकान के फायदे की बात सोचते हैं। साहित्य में दोनों तरफ यही दुकानदारी है। खरीदने और बेचने का काम एक जैसा चलता है। संपादकजी भी किसी दुकान के से जुड़ गये हों तो कुछ गलत नहीं। आज देश की राजनीति में ही नहीं, साहित्य के देश में भी दबंगों और गिरोहोे का बोलबाला है। वहाँ लालबत्ती है तो यहाँ भी लालबत्ती बँटती है। सारा लफड़ा ही लालबत्ती का है। आप अगर किसी गिरोह में नहीं होंगे तो आपको पूछेगा कौन ? अकेले रहने का साहस जिसके भी पास नहीं होगा, वह इसी तरह के दरबारों के रत्न और उपरत्न बनने की कोशिश करेगा। मित्रो, मैं किसी का व्यक्तिगत रूप से असम्मान नहीं कर रहा हूँ बल्कि इस खतरनाक प्रवृत्ति की ओर इशारा कर रहा हूँ।   कई बार कह चुका हूँ कि यह गिरोहबंदी साहित्य के लिए नुकसानदेह है। इस गिरोहबंदी को बढ़ावा देने वाली चीजों में पुरस्कार और चर्चा है। कम काम करके भी अधिक मान-सम्मान पाने की लालसा भी पूँजीवादी सोच ही है। गैरवाम के लोग यह करें तो कह सकते हैं कि उनका रास्ता ही दूसरा है, हालांकि गलत वह भी है, पर वाम के लोग करते हैं तो हजार गुना अधिक गलत है। जब तक यह सब रहेगा तब तक एक नहीं हजार कमलेश आयेंगे-जायेंगे, हजार आजपेयी-वाजपेयी आते-जाते रहेंगे। मुद्दा सिर्फ सीआईए को मानवता के लिए जादू की छड़ी मानने का होगा या सीआईए के विरोध तक सीमित रहेगा तो साहित्य के जरूरी संघर्ष का मुद्दा कभी केंद्र में नहीं आएगा। आज साहित्य में सबसे बड़ा खतरा साहित्य के पूँजीवाद से है। पूँजीवादी संस्कृति से है। ठीक है कि आप सीआईए को मानवता के लिए वरदान मानने वालों की जमकर आलोचना करें। चोट पर चोट करें। पर यह साहित्य में कुछ बदलाव लाने वाली कोई निर्णायक लड़ाई नहीं हो सकती है। कुछ और भी सोचना होगा।     
       आज बड़े-बड़े संपादकजी लोग डरते हैं कि फलाना जी नाराज हो जाएंगे, इसलिए इसके साथ न दिखो, उसके साथ न रहो, यह न करो, वह न करो या कुछ लोग विरोध वहाँ करेंगे जहाँ पुरस्कार खोने का डर नहीं होगा तो इस तरह के डर हमेशा नुकसान साहित्य का ही करेंगे। एक संपादक चाहे जितना शक्तिशाली हो जाय, यदि उसके पास साहस नहीं है तो वह दो कौड़ी का है। एक लेखक चाहे जितना शोर मचाए लेकिन उसके पास पुरस्स्कर और चर्चा के भ्रष्ट पथ को तजने का साहस नहीं है तो उसकी सारी खुद की या सांगठनिक ताकत भी दो कौड़ी की है। असल बात सिर्फ साहस का है। साहस ही शक्ति की खोज करता है, शक्ति अर्जित करता है। शक्ति से साहस नहीं पैदा होता। जोड़तोड़ और तिकड़म में लगे हुए लेखक-संपादक साहित्य की इन मुश्किलों पर ध्यान देंगे तो साहित्य का भला होगा। पर यह तब होगा जब आप अपना नहीं, साहित्य का भला करना चाहेंगे। कहना यह है संपादकजी और उनसे भिड़ने वाले मित्र अ शोकजी और क मलेशजी के विवाद से आगे बढ़े। साहित्य की जरूरी लड़ाई तक पहुँचें। साहित्य का धंधा करने वाली सभी संस्थाओं और संगठनों और लेखकों का विरोध करें। जैसे संसद में दागी लोग पहुँच जाते हैं, उसी तरह साहित्य की संसदों में दागी और फर्जी लेखक पहुँच जाते हैं। जैसे कई पत्रकार दूसरे रास्ते से संसद में पहुँच जाते हैं, उसी तरह कुछ पत्रकार भी साहित्य की संसद में पहुँचने के लिए दूसरे रास्ते का इस्तेमाल करते हैं।      
      जरूरत आज इस बात की ज्यादा है कि साहित्य की सभी संस्थाओं को भ्रष्टाचार मुक्त करने, उसे अधिक लोकतांत्रिक, अधिक पारदर्शी बनाने के लिए काम करें। वैसे यह सिर्फ एक मामूली विचार है, जरूरी नहीं लोग जिस वाद-विवाद में लगें हुए हैं उससे आगे बढ़कर ऐसा कुछ सोचें या करें। मैं तो ऐसे ही कहता रहता हूँ।


निशाने पर सिर्फ लेखक संगठन ही क्यों

by Ganesh Pandey (Notes) on Thursday, May 16, 2013 at 5:38pm
खून में मीठा 120/150 है। रिपोर्ट बिल्कुल नार्मल है। फिर भी कल से बहुत थकान महसूस कर रहा हूँ। कुछ देखकर कुछ कहने का मन नहीं करता है। चलो कोई भी कुछ कह लो। मैं कुछ नहीं कहता। लेकिन मेरे एक प्यारे बच्चे ने लेखक संगठन को लेकर एक बहुत अच्छी बात कह दी है। मैं थोड़ी देर के लिए अपनी थकान भूल गया हूँ। हालांकि जहाँ तक मैं समझ पा रहा हूँ, मेरी थकान देह की कम है मन की ज्यादा। लड़ते-लड़ते थक गया हूँ। कुछ दिन आराम करूँगा, फिर पहनूँगा युद्ध की पोशाक और कूद पड़ूँगा। अब न भी कहूँ और कुछ तो भी वे खुद चिार करने लगे हैं, जिन्हें विचार करने की जरूरत ज्यादा थी। इसका मतलब यह नहीं कि संपादकजी को संपादक होने के नाते विचार करने से छूट मिल जाती है। संपादकजी ने अपनी एकतरफा साहित्य-निष्ठा की वजह से या संपादक के रूप में अपनी निडरता की वजह से दोनों तरफ देखे बगैर लेखक संगठनों को मुर्गा बनाया है। पड़रौना वाले अपने केदार जी के हवाले से। संपादक जी हिसाब से बस लेखक संगठन ही बुरे हैं। इतना ही नहीं शायद उनकी दृष्टि में सारी खुराफात की जड़ हैं। अपने स्टेटस में उन्होंने यह सीधे-सीधे तो नहीं कहा पर उनके कहने का आशय यही है कि जो लेखक संगठनों से जुड़े नहीं हैं, वे दूध के धुले हैं। हिंदी साहित्य के मौजूदा परिदृश्य को रत्तीभर भी गंदा करने का काम उन्होंने नहीं किया है। संपादकजी कितने भोले हैं कि संगठन के रूप में सिर्फ प्रलेस, जलेस और जसम को देख रहे हैं। क्या संगठन के लिए कोई निश्चित संख्या या औपचारिक घोषणा जरूरी है ? आज साहित्य के अनेक गिरोहों और लेखक संगठन में क्या अंतर है ? संगठन वाले तो बुरा ही सही, जो कर रहे हैं खुले आम कर रहे हैं। गिरोह वाले तो साहित्य का भूमिगत संगठन चला कर बड़े से बड़ा अपराध कर रहे हैं। कवियों, कथाकारों और आलोचकों और संपादकों के अपने -अपने गिरोह हैं। ये दिल्ली ही नहीं लखनऊ और गोरखपुर में अर्थात कहाँ नहीं हैं ? अस्वस्थ अनुभव करने के बावजूद कहना जरूरी है कि लेखक संगठनों को उल्टा लटका दीजिए संपादक जी, लेकिन इन गिरोहों पर भी एक नजर डालिए। खुद को भी देखिए कि कहीं आप किसी गिरोह के भीतर तो नहीं हैं ? शायद संपादक होने के नाते आप किसी गिरोह में न हों। मैं ठीक-ठीक नहीं जानता हूँ। दुर्भाग्य से आपका प्रतिष्ठित पत्र मेरे मुहल्ले के हाकरों को प्रिय नहीं है, इसलिए उसे नित्य देख नहीं पाता हूँ। यह सब यह जानने के लिए कह रहा हूँ कि आप साहित्य के प्रति समर्पित संपादक हैं और आपकी बहुत प्रतिष्ठा है, फिर तो आपने जैसे इधर मीडिया ने राजनीति के भ्रष्टाचार को प्रमुखता से उजागर किया है, अपने साहित्य के भ्रष्टाचार को उजागर किया होगा, क्यों संपादकजी ? दिल्ली और देश की अन्य राजधानियों में स्थित सरकारी और गैर सरकारी साहित्यिक संस्थानों के भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई मुहिम जरूर चलाई होगी ? यदि हाँ तो मुझे आगे कुछ नहीं कहना है। यदि नही ंतो भी प्रश्न बहुत छोटा-सा कि फिर बेचारे लेखक संगठनों जुड़े लेखक ही क्यों आपकी कलम की नोंक पर हैं ? यह तो नाइंसाफी हुई। शुरू में मैंने जिस बच्चे की बात की, साफ कर दूँ कि सिर्फ यहाँ के स्थानीय मुहावरे में की रहा हूँ नहीं तो वह अपनी उम्र में ही बाप बन चुका है, उसने यह बहुत अच्छी बात कही है कि लेखक संगठनों को सिर्फ बुरा-भला कहने की जगह कुछ ऐसा भी बताएँ कि आपकी अपेक्षाएँ क्या हैं ? उन्हें कैसे बेहतर बनाया जा सके ? जरूरी बात यह कि क्या गिरोहों को भी बेहतर बनाने की बात गिरोह के लोग करेंगे ? बहुत चाहकर भी अधिक कुछ अधिक नहीं पा रहा हूँ। अलबत्ता पहले के लेख का लिंक दे रहा हूँ।