मंगलवार, 13 सितंबर 2016

जापानी बुखार

 - गणेश पाण्डेय    
  
हे बाबा
किसका है यह
जो अभी - अभी था
और इस क्षण नहीं है
जिसके मुखड़े के बिल्कुल पास
बिलख रहे हैं परिजन और स्वजन
राहुल - राहुल कह कर
किसका है यह नन्हा - सा
राजकुमार
जिसे अपनी छाती से लगाये
चूमती जा रही है बेतहाशा
एक लुटी-लुटी - सी बदहवास युवा स्त्री
जिसकी पथराई आँखों से झर रहे हैं
आँसू
झर-झर-झर
कौन है यह
अटूट विलाप करती हुई
अभागी कोमलांगी
जिसे अड़ोस - पड़ोस की बुजुर्ग औरतें
चुप करा रही हैं -
यशोधरा - यशोधरा कह कर
यह किसकी यशोधरा है बाबा
किसका है राहुल यह
तुमसे क्या नाता है

पिपरहवा के किसी सिधई अहीर
और गनवरिया के किसी बुधई कोंहार से
इस कालकथा का क्या रिश्ता है
कितने राहुल हैं बाबा
कितनी यशोधरा
ढाई हजार साल बाद
यह कैसी पटकथा लिख रहा है
काल
कपिलवस्तु के एक - एक गाँव में
कपिलवस्तु के बाहर गाँव - गाँव में
फूस की झोपड़ियों
और खपरैल के कच्चे - पक्के मकानों में
इक्कीसवीं सदी के एक - एक राहुल को
चुन - चुन कर
कैसे डँस लेता है काल
मच्छर का रूप धर कर
क्या पहले भी मच्छर के काटने से
मर जाते थे कपिलवस्तु के लोग
क्या पहले भी धान के सबसे अच्छे खेतों में
छिपे रहते थे जहरीले मच्छर
और देखते ही फूल जैसे बच्चों को
डँस लेते थे ऐसे ही
जापानी बुख़ार - जापानी बुख़ार
कह - कह कर
हमारे पुरखों के  पुरखों के  पुरखे
शालवन और पीपल के पेड़ वाले
बाबा
आज भी जिस जापान में बजता है
तुम्हारे नाम का डंका
सीधे वहीं से फाट पड़ी है यह महामारी
तीर्थों के तीर्थ बुद्ध प्रदेश में
पूर्वी उत्तर प्रदेश में
शोक में डूबी हुई है
यह विदीर्ण धरती
जहाँ - जहाँ पड़े हैं
तुम्हारे चरणकमल
श्रावस्ती हो या मगध
कपिलवस्तु हो या कोसल
लुम्बिनी हो या कुशीनारा
या हो सारनाथ
हर जगह है तुम्हारा राहुल
अनाथ
आमी हो या राप्ती
सरयू हो या गंगा या कोई और
जिन - जिन नदियों ने छुए हैं
तुम्हारे पांव
डबडब हैं यशोधरा के आँसुओं की बाढ़ से
देखो तो कैसे कम पड़ गया है
तुम्हारी करुणा का पाट
तुम्हीं बताओ बाबा
क्या
मेरी माँ यशोधरा
मेरी चाची यशोधरा
मेरी बुआ यशोधरा
मेरी दादी
मेरी परदादी की परदादी
यशोधरा के असमाप्त रुदन से
जीवित हैं इस अंचल की नदियाँ
क्यों नहीं सूख जाती हैं ये नदियाँ
क्यों नहीं खत्म हो जाता है
राहुल की चिन्ता न करने वाला
राजपाट
क्यों नहीं हो जाता सिंहासन को
जापानी बुखार
बोलो बाबा
कुछ तो बोलो
हे मेरे अच्छे बाबा कुछ तो नया बोलो
यशोधरा के महादुख पर रोशनी डालो
आलोकित करो पथ

क्या गोरखपुर क्या देवरिया
और क्या महराजगंज
क्या सिद्धार्थनगर
क्या अड़ोस - पड़ोस के जनपद
क्या पडोस के बिहार के गांव-गिरांव
और क्या नेपाल बार्डर - अन्दर
हर जगह पसरा हुआ है
मौत का सन्नाटा
और डर
घर - घर में कर गया है घर
किसी
नई - नई हुई माँ से
उसे रह-रह कर पुकारती हुई
उसकी नटखट पुकार को
छीन लेना
सहसा
किसी
पिता की डबडब आँख से
उसके चाँद-तारे को
अलग कर देना
किसी मासूम तितली से
एक झटके में
उसके पंख नोच लेना
और गेंदा और गुलाब से
उसकी पंखुड़ियों को लूटकर
मसल देना
किसी कविता का अंत है
कि जीवन की अवांछित विपदा
कि सभ्यता का कोई अनिवार्य शोकगीत
बोलो बाबा
क्या है यह
जपानी बुखार है तो यहां क्यों है
क्यों पसंद है इसे सबसे अधिक
इसके फंदेनुमा पंजे में
गिरई मछली की तरह तड़प-तड़प कर
शांत हो जाने वाले
इस अंचल के विपन्न , हतभाग्य
और दुधमुंहे
यह कोई बुखार है
बुखार है तो उतरता क्यों नहीं
महामारी है महामारी
नई महामारी
सबसे ज्यादा नये पौधों को
धरती से विलग करने वाली
मौत की तेज आंधी है
बुझाये हैं जिसने
इस अंचल के
हजारों नन्हे कुलदीप
कहां हैं मर्द सब
बेबस
और विलाप करती हुई मांओं की गोद
शिशु शवों से पाट देने वाला
हत्यारा जापानी बुखार
बचा हुआ है कैसे अबतक
कहां है पुलिस
और कहां है सेना
क्यों नहीं करती इसे गिरिफ्तार
जिंदा या मुर्दा
कोई विपक्ष है
है तो क्यों नहीं मांगता
जीने के अधिकार की गारंटी
कोई सरकार है कहीं
है तो कहां है
आये हाईकमान
कोई भारी-भरकम मंत्री-संत्री
कोई राजधानी का पत्रकार आये
और
टीवी पर जिंदगी की दो बूंद देने वाले
महानायक को पकड़कर लाये
कोई तो बतलाये-
जापान में एटमबम से
कितने शिशुओं की आंखें हुईं बंद
वर्ल्ड टेªड सेंटर पर हुए हमले में
मारे गये कितने अमेरिकी
आखिर कितना है अभी यहां कम
आने से कतराता है
सरकार का मुखिया
करता है वक्त का इंतजार
और हिसाब-किताब
अस्पतालों और सेहत का महकमा
पता नहीं किस अहमक के जिम्मे है
क्या शहर और क्या देहात
क्या धान के खेत
और क्या गड्ढे का पानी
किस सूअर
और किस मच्छर की बात करें
हर कोनें-अंतरे में बठी हुई है मौत
सफेद लिबास में
एक कहता है
हेलीकाप्टर में बैठकर
अपने नुकीले नाखूनों वाले पंजे से
छिड़केंगे दवा
गांव-खेत , ताल-पोखर
चल चुकी है राजधानी से
दवा लगी मच्छरदानियों की भारी खेप
हर मुश्किल में आपके साथ है
एक खानदानी पंजा
दूसरा
पहले शंख बजाता है फिर गाल-
बुखार जापानी हो या पाकिस्तानी
मार भगायेंगे
मर्ज कैसा भी हो
काफी है छूमंतर होने के लिए
कमल की पंखुड़ियों से बनी
एक गोली
तीसरा आता है बाद में
रहता है सरकार में मगन
कहता है कुछ करता है कुछ
मिनट-मिनट पर सोचता है
नफा-नुकसान
क्या खूब फबती है
उसकी दस लाख की गाड़ी पर
हरे और लाल रंग के मखमल जैसे
छोटे से झण्डे में कढ़ी हुई
सुनहली साइकिल
जिसके पास खड़ा होकर
किसी पुराने दर्द भरे गाने की तरह
कहता है-
जो हुआ उसके लिए बेहद अफसोस है
टीके और दवा का करते हैं इंतजाम
लीजिए फौरन से पेश्तर
ले आया हूं आठ करोड़
बस पकड़े रहें
साइकिल की मूठ
आते हैं एक से बढ़कर एक
हाथी नहीं आता
मुमकिन है कभी आये हाथी
गिरते-पड़ते
चाहे हाथी के हौदे पर आये
कोई गुस्सैल
चिंघाड़ते हुए-
नहीं-नहीं , यह नहीं जापानी बुखार
न इंसेफेलाइटिस न मस्तिष्क ज्वर
यह तो है सीधे-सीधे
मनुवादी बुखार
कमजोर तबके पर है जिसकी ज्यादे मार
कोई नहीं आता ऐसा
कोई वैद्य कोई डाक्टर
कोई लेखक कोई कलावंत
जीवन का कोई इंजीनियर
कोई पथ-प्रदर्शक
कोई माई का लाल
माई से कहने-
घबड़ाओ नहीं माई
लो
मेरी त्वचा की रूमाल से
पोंछ लो अपने आंसू
हर पंजे से बचायेंगे
बचायेंगे कमल से
साइकिल से बचायेंगे
बचायेंगे हाथी से
शर्तिया बचायेंगे माई
इस भगोड़े जापानी बुखार से
सूअर से बचायेंगे
बचायेंगे मच्छर से
सबसे बचायेंगे
माई ।

(तीसरे कविता संग्रह ‘‘जापानी बुखार’’ से)










रविवार, 4 सितंबर 2016

एक अफवाह है दिल्ली

गणेश पाण्डेय

कोई तो होगा मेरे जैसा

जो कह सके शपथपूर्वक
चालीस पार किया 
गया नहीं दिल्ली
नयी कि पुरानी

देखा नहीं कनाट प्लेस

बहादुर शाह जफर मार्ग
चांदनी चौक, मेहरौली
अनकनंदा, दरियागंज

मुझे अक्सर लगा

एक डर है दिल्ली
किसी शहर का नाम नहीं
जो फूत्कार करता है
लेखकों की जीभ पर
हृदय के किसी अंधकार में

जब-जब बताते रहे एजेंट सगर्व

दिल्ली दरबार के किस्से
लेखकों की जुटान के ब्योरे
कैसे बंटती हैं रेवड़ियां
और पुरस्कार

हाय ! सुनता रहा किस्सों में

कैसे मचलते हैं नए कवि
किसी उस्ताद की कानी उंगली से
एक डिठौने के लिए

और 

नाचते हैं कैसे आज के किस्सागो
किसी दरियाई भालू के आगे
उसकी एक फूंक के लिए
निछावर करने को आतुर
अपना सबकुछ 

बेशक होता रहा हांका

कुल देश में कि खैर नहीं
मार दिये जाएंगे वे 
जो जाएंगे नहीं
दिल्ली

मैं हंसता रहा

कि दिल्ली से
दिल्ली के लिए उड़ायी गयी
एक अफवाह है दिल्ली

देखो तो

बचा हुआ है गणेश पाण्डेय
गोरखपुर में साबूत।

( "अटा पड़ा था दुख का हाट" से)






शुक्रवार, 25 मार्च 2016

अच्छी कविता में आत्मरक्षा का गुण होता है

 - गणेश पाण्डेय
बात कहीं से भी शुरू की जा सकती है। छायावाद से भी कि छायावाद आधुनिक हिंदी कविता की सबसे ऊँची मंजिल है। लेकिन जरूरी नहीं कि इस बात से या किसी बात से सब सहमत हो। क्योंकि यह एक ऐसा समय है जब हिंदी के अनेक स्वनामधन्य आचार्य अपने काव्य विवेक से अधिक अपने समय के नामी-गिरामी आलोचकों के काव्यविवेक या किसी अन्य आग्रह पर अधिक भरोसा करते हैं। भरोसा ही नही बाकायदा उनकी पूजा करते हैं। हो सकता है कि ऐसे काव्यालोचक कहें कि प्रगतिवाद सबसे उंची मंजिल है। पर मेरे देखेने में अच्छाइयों के बावजूद प्रगतिवाद आधुनिक कविता की सबसे ऊँची मंजिल नहीं है। मैं ही नहीं और भी कई लोग ऐसा ही अनुभव करते हैं। पर हो सकता है कि ग्लोकोमा की वजह से मैं इससे अधिक देख न पा रहा होऊँ। असल में हिंदी साहित्य में यह भ्रम जोरों पर है कि सूरदास तो सिर्फ कविता में होते हैं और वह भी आज के जमाने में सिर्फ लच्छीपुर खास में होते हैं, आलोचना में हरगिज-हरगिज नहीं होते हैं। जबकि मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि हिंदी साहित्य के मौजूदा परिदृश्य पर आलोचना में सूरदासों की भरमार है। सूरदास ही नहीं बल्कि इनमें गजब-गजब के दास होते हैं। कोई परम आनंद में डूबा दास होता है तो कोई विश्वभ्रमण पर निकला संसारी दास। कोई नया-नया दासानुदास। ये कब कहां कैसे क्या करते हैं, यह सब बताने की बात नहीं है। बस इतना समझ लीजिए कि ये किसी नयी बात से या किसी बात को नयी तरह से देखने से डायबिटीज के मरीजों की तरह सख्त परहेज करते हैं। ऐसे आचार्य कविता की विकास यात्रा को किस दृष्टि से देखते हैं, यह दुर्भाग्यवश किसी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं हो सकता है। आधुनिक हिंदी कविता के पाठ्यक्रम में छायावाद ही नहीं छायावादोŸार कविता का भी विशिष्ट स्थान है। लेकिन जैसा कि कहा गया कि छायावाद आधुनिक कविता का शिखर है, तो इसके पुष्ट आधार हैं। छायावादी कविता द्विवेदीयुग की कविता की तरह टेढ़ामेढ़ा लड्डू नहीं है। बल्कि संुदर, स्वादिष्ट और सुपाच्य, कविता का नायाब प्रसाद है। कविता की उर्वर और श्रेष्ठ कल्पना का असीम आकाश ही नहीं है बल्कि अनुभव का अद्वितीय लोक है। कवि अपने पूरे वुजूद के साथ कविता का सहचर और भोक्ता है। एक ऐसी काव्यभूमि है जहां प्रकृति सिर्फ नई ही नहीं होती है बल्कि कुछ और भी बन जाती है, एक जीती जागती और प्रेयसि जैसी प्रिय स्त्री। छायावाद में स्त्री बिल्कुल नये रूप में सामने आती है। स्त्री की चिंता भी कहीं ज्यादा ईमानदार है। एक और राम की शक्तिपूजा में सीता की मुक्ति की चिंता है तो दूसरी ओर देवी जैसी रचना में अति साधारण और हाशिये की स्त्री के जीवन और सरोकारों की चिंता। विधवा स्त्री की भी चिंता कवि को उसी तरह विकल करती है। प्रायः कवियों ने नयी स्त्री को देखने की कोशिश की है। इन कवियों की स्त्री एक ओर देवि, सहचरि, मां है तो दूसरी ओर इष्टदेव के मंदिर की पूजा-सी विधवा और पत्थर तोड़ती मजदूरनी भी। निराला कविता को जब परिवेश की पुकार कहते हैं तो उनके सामने जाहिर है कि छायावाद की कविता होती है। आचार्य शुक्ल ने छायावाद को जब चित्रभाषा शैली कहने  साथ-साथ उसे बाहर से आया बतलाया तो उनके इस आग्रह को स्वीकार करने में जिन कारणों से दिक्कत हुई, स्पष्ट है। रहस्यवाद छायावादी कविता का एक छोटा-सा अंश है पूरा छायावाद नहीं। इस तरह का रहस्यवादी छायावाद पहले रवींद्रनाथ की कविताओं में फिर वहां से हिंदी में आया, इसे भी स्वीकार करने में मुश्किल हुई। यदि इसे ही छायावाद मान लेंगे तो फिर स्वाधीनता संधर्ष जैसे साहित्य के वृहत्तर उद्देश्य का क्या होगा ? क्या उससे बड़ा कविता का सरोकर कहा जायेगा - बीसवीं सदी और अब नयी सदी में - छायावाद का रहस्यवादी सरोकार ? यह ठीक है कि छायावादी कविता का पाट जिन दो छोरों से बनता है, उसमें एक ओर विराट का साक्षात्कार है तो दूसरी ओर लघुता के प्रति दृष्टिपात ही नहीं बल्कि उनके और विशेषरूप से देश के लिए संघर्ष चेतना की प्रतिष्ठा है। कविता का शाश्वत परिसर तो है ही। जाहिर है कि कविता की सलिला जिन दो पाटों के बीच बहती है उनमें एक है प्रकृति और दूसरा है अपने समय के समाज का परिदृश्य। छायावाद में प्रकृति पहलीबार जीती-जागती और किसी सुंदर और सौम्य स्त्री की तरह बहुत नयी-नयी और बेहद आत्मीय और अंतरंग लगती है। आगे कुछ कवियों के यहां तो अल्हड़ और नितांत अपनी लगती है। कविता में निजता का तत्व कविता का विरोधी नहीं है। बल्कि कविता को और विश्वसनीय और तरल बनाने वाला तत्व है। यह तरलता ही कविता को पठनीयता और सम्प्रेषणीयता जैसे आलोचनात्मक प्रश्नों से मुक्त करती है। वैयक्तिकता और सामाजिकता के प्रश्न छायावादी कविता को अशक्त नहीं करते हैं, बल्कि ताकत देते हैं। निराला लिखते है- ‘मैंने मैं शैली अपनायी’ और दूसरी ओर कहते हैं कि ‘कविता परिवेश की पुकार है’। जाहिर है कि परिवेश केवल प्रकृति का आंगन नहीं है। उसके भीतर आसपास का सब शामिल है। आसपास का ही नहीं, बल्कि हमारी चेतना के भीतर जो कुछ भी अंट सकता है, सब शामिल है। क्या समाज और क्या देश। क्या यहां और क्या वहां। क्या इस पार और क्या उस पार। छायावादी कविता की श्रेष्ठता का आधार उसके कवियों का महत्वपूर्ण अवदान है। कोई भी काव्यांदोलन, काव्यांदोलन ही नहीं बल्कि कोई भी साहित्यिक आंदोलन अपने आग्रहों और अपनी वैचारिकी से महत्वपूर्ण नहीं होता है, बल्कि उसे उससे जुड़े लेखकों के कद और योगदान के आधार पर याद किया जाता है। कभी-कभी बिना किसी घोषित काव्यांदोलन के एक कालखण्ड विशेष के भीतर के लेखकों में आप से आप अपने समय और परिवेश की पुकार के आधार पर मिलती-जुलती काव्य प्रवृत्तियां दिखने लगती हैं। सच बात तो यह कि कोई सजग कवि जब कविता रच रहा होता है तो उस समय वह पुलिस की परेड नहीं कर रहा होता है। उसकी अपनी काव्यदृष्टि बहुत-सी चीजों को तय करती है। उदाहरण के लिए कह सकते हैं कि इसीलिए हिंदी के सारे मार्क्सवादी कवि मुक्तिबोध से छोटे हैं। छोटा या बड़ा होना किसी सीमित अर्थ में लेने से कभी-कभी अनर्थ भी हो जाता है। छायावादी कविता के बड़े होने के अपने पुष्ट अकाट्य आधार हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि बाद की कविता अवांछित या महत्वहीन है।  छायावादोत्तर कविता एक अर्थ में छायावादी कविता का ही विकास है। द्विवेदीयुग की कविता की प्रतिकिरिया में छायावाद के लिए स्थूल के विरुद्ध सूक्ष्म का स्वागत जैसा सूक्ष्म के विरुद्ध स्थूल जैसी कोई चीज नहीं। न तो उसकी भयंकर प्रतिक्रिया में अलग से कविता की दृष्टि से कोई क्रांतिकारी चीज है। इंकिलाब है तो कथ्य के स्तर पर पहले के जन सरोकारों के स्वर की तीव्रता तक सीमित है। हिंदी के प्रिय विद्यार्थियों और भविष्य के कर्णधारों से विनती है कि वे छायावादोत्तर कविता को आधुनिक हिंदी कविता के विकासक्रम में अगले और एक छोटे पड़ाव लेकिन महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखने की कृपा करें। इसे एक ऐसे पड़ाव के रूप में लें कि जहाँ कविता के पाठकों को गला तर करने के लिए एक छोटा-सा कुआँ है, एक छोटी-सी रस्सी है और एक छोटा-सा घड़ा है। थोड़ी-सी मौज है थोड़ी-सी मस्ती है। प्यास का थोड़ा-सा दीवानापन है। यों तो एक अध्यापक रूप मेे अपने विद्यार्थियों से कहना हो तो कहेंगे कि छायावाद के बाद हिंदी कविता मोटेतौर पर जिन दो रास्तों पर आगे बढ़ती है, उनमें पहला रास्ता प्रगतिवाद कहलाता है जिसे कुछ लोग अज्ञानवश बंद गली का आखिरी मकान भी कहते हैं। दूसरा रास्ता प्रयोगवाद कहलाता है जिसे वही कुछ लोग बंद गली के आखिरी मकान के बगल से दाहिने निकला हुआ रास्ता कहते हैं। वे यह भी कहते हैं कि जब प्रगतिवाद में कविता के तत्वों की बहुत अनदेखी होने लगी तो कुछ कवियों ने कविता के पक्ष में और एक अर्थ में कुछ कवियों ने जनता के पक्ष में खड़ी होने वाली कविता के पक्ष में खड़े होने की कोशिश की। पर आगे बढ़ने से पहले  छायावादोत्तर या उत्तर छायावाद जैसी छतरी के नीचे मौजूद कुछ ताकतवर कवियों की कविता पर भी गौर करना जरूरी होगा। ये सीधे और उन अर्थों में प्रगतिवादी तो नहीं कहलाये पर जिनकी रचनाओं में जनपक्षधरता के स्वर मौजूद हैं। लेकिन ऐसे भी कवि हैं जो समाज के वृहत्तर दुख को दूर करने या सामाजिक सौहार्द के शर्तिया इलाज के लिए मयखाने में बैठना ज्यादा जरूरी समझते हैं। आधुनिकता की वैचाारिकी से इस मयखाने का रिश्ता या मय की ताजपोशी समझना औरों के लिए भले ही मुश्किल चीज हो पर हिंदी आलोचकों के लिए अतिसरल है। मधु तो छायावाद में भी है पर शाला का निर्माण तो छायावादोत्तर या कि छायावाद से थोड़ा आगे और प्रगतिवाद से थोड़ा पहले के मील के पत्थर के पास जन अरण्य में ही संभव होता है। निराला की कविताओं में सामान्यजन की प्रतिष्ठा और उनके पक्ष में डटकर खड़े होने का जैसा जज्बा मौजूद है, बाद की कविताओं में संधर्ष के दृश्य उनसे अलग नहीं बल्कि उनके स्वर के आलाप हैं। आशय यह नहीं कि छायावादोत्तर कवियों का उपक्रम कहीं से कम है या नगण्य है। कहना चाहिए कि नगण्य और वंचितों की चिंता का स्वर उनके यहाँ तीव्र है। प्रगतिवाद के कवियों में कथ्य की सबलता और स्वर की तीव्रता ने जाहिर है कि कविता के तत्वों की अनदेखी की तो कविता के तत्वों की मजबूती के लिए प्रयोगवाद से जुड़े कवियों को आगे आना पड़ा। उनमें भी अज्ञेय तो जैसे आगे की कविता का सारा कील-कांटा जानते थे सो उन्हें सबसे आगे रहने के लिए प्रयोगवाद एक अवसर था। हालाकि वे वादी कहलाने के पक्ष में नहीं थे। पर जिन्हें उन्हें वादी कहना था, उन्होंने वादी कहा। तार सप्तक का प्रकाशन सचमुच गौरतलब है। सप्तक के कवियों के बारे में दिलचस्प यह कि ये कवि विचारधारा के स्तर पर एक नहीं थे। उनमें फर्क था। दूसरी बात यह कि ये कवि युवा थे पर कविदृष्टि वयस्क थी। तीसरी बात यह कि इस संकलन में शामिल कवियों की कविताएं, उन कवियों की सर्वोत्तम कविताएं नहीं थीं। सर्वोत्तम क्या प्रतिनिधि कविताएं भी नहीं थीं। इसके बावजूद संकलन के कवियों और उनकी कविताओं ने नई राह के अन्वेषण को संभव किया। यही इस संकलन का शायद उद्देश्य भी था। तार सप्तक के बाद दूसरा सप्तक फिर तीसरा सप्तक आया। सप्तकों ने और जो भी किया हो, कविता को नई कविता का एक खुला आसमान दिया। कहने को तो अज्ञेय चौथा सप्तक भी लेकर आये पर वह चौथा ही बनकर रह गया। सात तो दूर एक भी तार ठीक से बज नहीं पाया। जबकि तीसरे सप्तक तक के कवियों में कई कवि ऐसे हुए जिन्हांेने अपने समय की कविता को तो प्रभावित किया ही है बाद की कविता को भी प्रभावित किया है। कविता की यात्रा हो या साहित्य की किसी भी विधा की विकास यात्रा,  कम प्रतिभा के ऐसे कवियों की भरमार रहती है जो किसी भी तरह उछल-कूद करके अमर हो जाने के लिए विकल रहते हैं। आलोचक या संपादक को खुश करने के लिए कुछ भी करने को तो तैयार रहते ही हैं, कविता या रचना की हत्या करने तक के काम को करने में तनिक भी दुखी नहीं होते। कविता मरती है तो मर जायें, बस ये अमर हो जायें। कविता की सुफरफास्ट रेलगाड़ी के दरवाजे पर हैंडिल को कस कर पकड़कर या बिना टिकट बर्थ पर लेटकर सफर करने वाले ऐसे कातिलों को आज भी देखा जा सकता है। साहित्य में कई आंदोलन ऐसे मीडियाकर अमर होने की आकांक्षा में चलाते हैं। कई संपादक अपनी पत्रिका या खुद को संपादक के रूप में स्थापित करने के लिए भी ऐसे प्रायोजित आंदोलन खड़ा करते रहते हैं। पर बिना अच्छी रचना के कोई भी आंदोलन जीवित नहीं रहता है। कईबार अपने समय की कविता या कवियों को चर्चित करने या अंधेरे में रखने में प्रतिष्ठित आलोचक भी कम बेईमानी या कम बड़ी चूक नहीं करते हैं। कुछ वक्त पहले एक नामचीन आलोचक ने  एक इंटरव्यू में कहा था कि फणीश्वरनाथ रेणु के महत्व को समझने में देर हुई। शायद यह आधा सच है। यह सच है कि उन्होंने रेणु के महत्व को देर से स्वीकार किया। पर यह सच नहीं लगता कि हमारे समय का कोई नामचीन आलोचक रेणु जैसे लेखक के महत्व को देर से समझ पायेगा। यह सिर्फ एक उदाहरण है। हिंदी आलोचना में आज कई ऐसे आलोचक हैं जो अपने समय की कविता और आलोचना को इसी तरह कलंकित करते हैं। दुर्भाग्य यह कि हमारे समय की युवा आलोचना कभी अपने पैरों पर खड़ी ही नहीं हुई। लेकिन सौभाग्य से हिंदी कविता की निर्मल आत्मा कभी भी ऐसी कुचेष्टाओं से मलिन हुई ही नहीं। शुरू में ही ंिहदी कविता की नींव इतनी मजबूत बनी कि कोई आलोचक या दंद-फंद में लगा हुआ कवि  अपनी दबंगई या बुरी नजर से उसे हिलाना तो दूर, छू भी नहीं सकता है। कविता की आत्मा के पास पहुंचते ही अपात्र सूर्य जैसे ताप में राख हो जाता है। लेकिन कई बार एक पूरा का पूरा दौर ही आंख पर पट्टी बांध लेता है। किसी महाजन की जगह किसी महादुर्जन के फतवे को ही अपने समय का सत्य समझ लेता है। पर जब समय का सारा पानी बह जाता है तो रेत की तरह सच सामने होता है। अपने समय के सब चर्चित भुला दिये गये होते हैं। याद रहते हैं वे जिनकी कविताओं में कुछ होता है। कभी-कभी कुछ वाले भी अपने समय में अपनी हैसियत से अधिक पा जाते हैं। 
       नई कविता और नई कहानी दोनों आधुनिक काल का महत्वपूर्ण पड़ाव है। कविता में नई कविता के बाद कुछ पानी के बुलबुले जैसे काव्यांदोलन भी आते हैं। पर कविता के एक समृद्ध और मजबूत देश में अकविता के लिए कितनी गुंजाइश हो सकती है। सो आये और गये की तरह कविता और कहानी में ऐसे आंदोलन कहने के लिए आये और चले गये। साठ के बाद कविता के मिजाज में जो परिवर्तन दिखता है, वह अचानक और किसी एक कवि के प्रादुर्भाव से नहीं होता है। यह सोचना नासमझी होगी कि एक धूमिल के आने से साठ के बाद की कविता चमकी। वह एक ऐसा कालखण्ड था जब देश की परिस्थितियों में काफी कुछ नाउम्मीदी और विकलता और विश्वास का संकट युवा लेखकों को मथ रहा था। बाहर और भीतर काफी कुछ टूट रहा था। नई कविता के कई कवियों में अपने समय के दंश और उसकी तीव्रता का अनुभव मौजूद है। जहां तक राजनीतिक कविता का प्रश्न है, यह कहने में संकोच नहीं कि मुक्तिबोध के बाद रधुवीर सहाय ध्यान खींचते हैं। साठोत्तरी कविता में जिसे मोहभंग की कविता भी कहा गया, राजनीति और खासतौर से लोकतंत्र और समाजवाद को लेकर कविता में बहुत बोलने वाली मुहावरेबाज कविता का एक दौर आता है। जिसमें कविता की भाषा को धरना-प्रदर्शन में चीखने वाली भाषा में बदलने की छटपटाहट दिखती है। धूमिल के लिए एक नामचीन आलोचक इतने व्यग्र होते हैं, शायद उतना कभी अपने बच्चों के लिए भी विकल नहीं हुए होंगे। धूमिल एक प्रतिभाशाली कवि हैं। इसमें कुछ खास बुरा नहीं है किसी पत्रिका में उन्हें किस तरह और उनकी कविता को कैसे करके छापा गया होगा। संपादक एक अभिभावक की तरह होता है। नये रचनाकार को अपने बच्चे की तरह सजाता और संवारता है। लेकिन किसी संपादक या  आलोचक को दूसरे बच्चे दिखें ही नहीं, यह बुरा है। साठोत्तरी कविता में धूमिल के अलावा लीलाधर जगूड़ी और देवेंद्र कुमार जैसे कवि भी शामिल हैं। पटना के युवा लेखक सम्मेलन में धूमिल ने जिस देवेंद्र कुमार की काव्य भाषा को अपनी कावयभाषा से बेहतर बताया था, दुर्भाग्य यह कि हम पूर्वांचल में धूमिल को तो पढ़ाते हैं पर देवेंद्र कुमार की कविता को नहीं। ऐसा क्यों ? क्या इसलिए कि देवेंद्र कुमार न तो श्रीवास्तव थे न तिवारी ? या कि तिवारियों और श्रीवास्तवों की कविता से पहले किसी अन्य जाति में जन्म लेने वाले कवि की कविता पढ़ाने में कोई साहित्यिक या नैतिक बाधा है ? या विश्वविद्यालयों के आचार्य कभी अपने कूपों से बाहर निकलेंगे ही नहीं ? या.... जब ये आचार्य चले जायेंगे और नये आचार्य आयेंगे, जो कूपों में नहीं बल्कि कविता के खुले परिसर में बैठेंगे, तब देवेंद्र कुमार ही नहीं देवेंद्र कुमार के बाद कविता के जो भी सच्चे सपूत होंगे, उनकी कविता पढ़ाएंगे। जब हमारा समय बीत जायेगा और हम बीत जायेंगे तो शायद कुछ और लोग आयेंगे जो आज की दरिद्र युवा आलोचना को समृद्ध, ताकतवर और भरोसेमंद बनाएंगे। तब तक शायद न नामचीन आलोचक रहेंगे और न उनका डर। आज की मुश्किल यह कि हर शहर में एक-दो नामचीन रहते हैं। जो लेखक अपने समय के नामचीनों से डर कर लिखते हैं। जाहिर है कि वे लिखते नहीं हैं, बल्कि कुछ और करते हैं। आठवें दशक की कविता और उसके बाद की कविता की अपनी मुश्किलें हैं। अच्छे कवियों को तनाव में रहना पड़ता है और कम अच्छे कवियों को साहित्य अकादमी टॉफी की तरह दी जाती है। नवें दशक की कविता हो या अंतिम दशक की कविता और या नई सदी की कविता, इस पूरे दौर की कविता को एक अदद आलोचक की दरकार है जो सच को फटकार कर कह सके और राजधानी की ओर मुंह करके फटकार सके। लेकिन फटकारेगा कौन ? फटकारेगा वह जिसके पास एक टका ही सही, उसका अपना हो। अंत में कहना चाहूंगा कि फटकारने वाले आलोचक का प्रादुर्भाव नहीं होता है तो न सही। अच्छी कविता में आत्मरक्षा का गुण अनिवार्य रूप से होता है। अच्छी कविता किसी आलोचक का मुंह नहीं देखती। एक आलोचक को ही अच्छा आलोचक बनने के लिए अच्छी कविता के पास जाना पड़ता है। मैं यह मान नहीं सकता कि तुलसीदास आचार्य शुक्ल के पास गये थे। अच्छा कवि आलोचक के पास नहीं जाता है। आचार्य शुक्ल ही तुलसीदास और सूरदास और जायसी के पास गये थे। फिर आज के कवि क्यों दौड़-दौड़ कर राजधानी जाते हैं ? हिंदी कविता की यात्रा से जो लोग परिचित हैं जानते होगे कि अच्छी कविता राजधानी से दूर रहती है। कविता अपना जासूस आप होती है। किसी भी दौर की कविता हो, छायावाद की कविता हो या छायावादोत्तर कविता या उसके बाद की कविता अपनी खूबियों और खामियों को छुपाकर रख नहीं सकती है। इसे आप कविता की देवी का वरदान कहें या शाप, पर यह है और सौ फीसदी है। 
                                                           


रविवार, 13 मार्च 2016

मुश्किल काम

(आज मेरे घर एक वरिष्ठ मित्र आये, अपने संपादकत्व में गोरखपुर का साहित्येतिहास तैयार करा रहे हैं। उनसे पहले उनके एक सहयोगी लेखक आये थे, कोई सहयोग नहीं कर सका था, उलटे मुझसे अनजाने में दुखी होकर लौटे। आज आये वरिष्ठ मित्र से कई बार निवेदन किया कि मेरी रुचि नाम-इनाम और इतिहास में तनिक भी नहीं है।  वे माने नहीं, कहा कि बाद में लोग प्रश्न करेंगे कि आपका जिक्र क्यों नहीं है। बहरहाल, उनसे कहा कि फिर मेरे बारे में दो-चार लाइन कुछ भी लिख दीजियेगा, बस। बातें बहुत हुईं, विश्वनाथ जी समेत यहाँ के तमाम लेखकों के बारे में। वे मिलनसार हैं, यहां के लेखकों से काफी घुले-मिले हुए हैं। उन्हें बताया कि मैं यहाँ के लेखकों के साथ खुद को सहज नहीं पाता हूं। कहीं भी और कभी भी अपना नाम क्यों नहीं उनके साथ देखना चाहता हूँ, यह बताने के लिए उन्हें अपनी कविता “ मुश्किल काम “ सुनाना चाहता था, पर उस  वक्त ढ़ूँढ़, नहीं पाया था। अब मिल गयी है, साझा कर रहा हूँ)

मुश्किल काम 
-----------------
गणेश पाण्डेय

यह कोई मुश्किल काम न था
मैं भी मिला सकता था हाथ उस खबीस से
ये तो हाथ थे कि मेरे साथ तो थे पर आजाद थे।
मैं भी जा सकता था वहाँ-वहाँ
जहाँ-जहाँ जाता था अक्सर वह धड़ल्ले से
ये तो मेरे पैर थे
जो मेरे साथ तो थे पर किसी के गुलाम न थे।
मैं भी उन-उन जगहों पर मत्था टेक सकता था
ये तो कोई रंजिश थी अतिप्रचीन
वैसी जगहों और ऐसे मत्थों के बीच।
मैं भी छपवा सकता था पत्रों में नाम
ये तो मेरा नाम था कमबख्त जिसने इन्कार किया
उस खबीस के साथ छपने से
और फिर इसमें उस अखबार का क्या
जिसे छपना था सबके लिए और बिकना था सबसे।
मैं भी उसके साथ थोड़ी-सी पी सकता था
ये तो मेरी तबीयत थी जो आगे-आगे चलती थी
अक्सर उसी ने टोका मुझे-‘पीना और शैतान के संग’
यों यह सब कतई कोई मुश्किल काम न था।

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2016

सत्रह साल के एक कवि की कविताएं

सर, एक साल के बाद, मने जब 16 साल का कवि 17 साल का हो गया है(10 जनवरी को ही हो गया था वैसे), तो इस अंतराल के बीच लिखी अपनी कविताओं में से कुछ आपको पढ़ाना चाहता था...
कि कविता की दुनिया में मैंने अभी अगला कदम रखा कि नहीं... कि कविता को तरतीब देने में अभी कुछ-कुछ सक्षम हुआ हूँ कि नहीं...
परिवार के कुछ लोग कभी-कभी कहते हैं कि 'एक-आध कविता अपनी किसी अख़बार या और किसी पत्रिका में छापने के लिए भेजो ना!' लेकिन मन नहीं करता .. अगर कोई छाप भी दिया तो मुझे अच्छा नहीं लगे...
मैं चाहता हूँ कि पहले अच्छी कविता लिखना आ जाएगा, तब कहीं भेजूंगा...
-तरुण त्रिपाठी


तरुण त्रिपाठी की कविताएं


1.
कोई फ़र्क नहीं पड़ता है यार!
जिस सड़क से कल जा रहे थे
छठ पूजा कर के लोग;
उसी सड़क से आज कोई
अपने बेटे की लाश भी ले जाता है;
और उसी सड़क से
तुम भी तो आती हो
मुझसे मिलने!
तो,
या तो ये कहो
कि चीज़ें तीनो
जुड़ी हैं एक ही सड़क से,
मानो जुड़ी हैं एक-दुसरे से
कि सारी चीज़ें जुड़ी होती है एक-दूसरे से
कि सारा कुछ दरअसल कोई एक ही चीज़ है
जैसे पूरी पृथ्वी आई है
एक ही सूर्य से
या ये कहो
कि सड़क होती है बहुत खुले विचारों की
जो अनेक और अनेक तरह की घटनाओं को
खुद में ही समेटने की क्षमता रखती है
जो चूमती है
संत और हत्यारे
दोनों के पाँव
जैसे पृथ्वी
या फिर मैं...,
जैसे मैं कभी चलूँ इस सड़क पर
तुम्हारे साथ
तुमसे बातें करते हुए।
और अगले दिन
जब वापस जाऊं उस पर
तुम्हारी स्मृतियों के साथ
बातों की गूंज और तुम्हारे निशाँ तलाशते हुए
और मैं देखूं एक कुत्ता भी मरा हुआ
कहीं बीच सड़क,
तो मैं सीधे-सीधे इसे दोहरा चरित्र कहूँगा
सड़क का;
गाली दूंगा उसे गुस्से में!
जैसे पृथ्वी को
कि कोई बला होनी ही क्यों थी!
एक सकारात्मक और अहिंसक लड़ाई हो सकती थी
मेरे और पूजा वाले लोगों के बीच
तुम्हारे प्रति प्रेम और ईश्वर के प्रति प्रेम के बीच
मेरे ख़याल से!
अगर ज़रूरी था कुछ अनर्थ होना।
मगर मेरे ख़याल से...
कोई फ़र्क नहीं पड़ता है यार!
***
हालांकि इतना
मैं भी सोचना पसंद करता हूँ
कि जिस सड़क से कल जा रहे थे
छठ पूजा वाले लोग
उसी सड़क से
तुम भी आती हो
मुझसे मिलने...
***
या जाने दो!
वो सार्वजनिक सड़क है
2.
हे सुनो!
मैं तुमसे प्यार करना चाहता हूँ
लो, मेरा ये दिल रख लो
(चुपके से)
हाँ-हाँ एकदम!
ले जाओ!
क्या?
दाम?
दाम तो अब इस पर तय होगा ना
कि मैं माफ़ कर पाता हूँ
तुम्हारा
मेरा दिल चुराना...
तुम दाम की फ़िक्र मत करो!
नहीं कर पाया
तो तुम्हारा भी चोरी हो जाएगा
(चुपके से)....
3.
मैं इतना सोचता हूँ ना!
कि जो सोचता हूँ
कर नहीं पाता हूँ।
***
वैसे मैं आजकल ये सोच रहा हूँ
कि सोचना बंद कर दूँ
यार, बहुत नुक्सान हो जा रहा है मेरा
सोचने से...
***
और अब ये सोच रहा हूँ
कि कब तक सोचना बंद करने की
खाली सोचता रहूँ!
अब मुझे सोचना बंद करने के बारे में
सोचना बंद कर देना चाहिए
और बंद कर देना चाहिए अब
सोचना।
***
बात अब ये है कि
कुछ दिनों से मेरा बहुत समय
नहीं सोचने की सोचने में चला जा रहा है।
तो सोच रहा हूँ
कि नहीं सोचना चाहिए मुझे अब
नहीं सोचने के बारे में।
कि बेकार है नहीं सोचने की ज़िद।
कि जैसे नहीं कर पाता हूँ
बाकी सोचे काम,
नहीं संभव है मेरे लिए
ये नहीं सोचने का भी काम करना
यूँ सोच-सोच कर।
कि इतने दिनों से इसी पर ना सोच रहा था
मुझे कोई और रास्ता ढूँढना होगा
और ढूंढ कर
फिर उस पर भी सोचूंगा कुछ दिनों...
हे.. हे..
मैं इतना सोचता हूँ ना!
कि जो सोचता हूँ
कर नहीं पाता हूँ...
****
लेकिन सुनो यार!
ये बहुत ख़तरनाक है
इससे निपटना बहुत ज़रूरी है
नहीं-नहीं! कुछ तो सोचना पड़ेगा!...
सोचना पड़ेगा?
फिर?
ना! ना!
'हे सुनो!
बंद करो ये सोचना-भोचना
चुप!
एकदम चुप!'..
4.
मैं दुखों का
स्वागत करता हूँ
ताकि वो आये
और मैं उसे पकडूँ
जकड़ूँ उसका गला..
उसे निचोड़ कर
निकाल गिराऊँ
उसमें से हर एक तटस्थ अंश।
ताकि गहरे तक महसूस होता हो
केवल दुख।
और बाँध के अंनुभूति की रस्सी से उसे
ले जाऊँ घसीटते हुए
अपनी छाती के फ़र्श पर
अपने दिल के घर से
बुद्धि के बाजार में।
और उसे बेचकर
ख़रीद लूँ कुछ पंक्तियॉ।
अनुभूति की रस्सी बिछाकर
उन्हें रखूं उसी पर
और अंत में खींच कर वो रस्सी
ऊपर में बाँध दूँ।
और बना दूँ उन पंक्तियों का एक गट्ठर
अपनी सहूलियत के लिए।
ताकि ले जा सकूँ उसे सहजता से
अपने दिल के घर में वापस..
या किसी भी और के दिल के घर में..
बिना घिसटे
बुद्धि से ह्रदय तक की राह में।
कि ना रह जाए उस दिल तक पहुँचने से..
जिसे भी बेचूँ मैं ये गट्ठर
इन्हें लेने की महज़
रूचि के दाम पर...
4.
बचे अभी हैं बहुत बरस एक हमारे होने में
आनंद प्रतीक्षा का भी लें मत काटें रोने-धोने में
तुमको ज़ल्दी पा लूंगा तो बौना हो जाएगा प्यार
प्यार जवां होता है यारा एक दूजे को खोने में
कितना समय लगे है वक़्त को काल की घड़ी बदलने में!
कहाँ हमें ये पता चलता कितने पल काटे सोने में!
प्यार की माला बनती है तो हर लम्हा एक मोती है
कुछ उजले कुछ गाढ़े-रंग, सब चहिये इसे पिरोने में
वफ़ा से रोशन होना है तो बाहर-दुनिया घूम लो कुछ
जहाँ बिलखते हो सूरज भि तो ना पहुंचे उस कोने में
मुझमें तुम, मैं तुममें डूबा; प्यार में दोनों डूबे हैं
मज़ा है बस इतनी सी बात में पूरे जहाँ को डुबोने में
प्यास बुझा लूंगा सागर में जब तुम मिलोगे सोचा है
पर तुम आँखों के जल को मत व्यर्थ बहाओ रोने में
सारी दुनिया अपनी थी जब तक हर कदम सचेत रहे
बदल गया घर और शहर इक रात डूब कर सोने में
हँस ही रही थि तो हँसती रहती, मुझ पर क्यूँ ठहरी आँखें
तुम भि ना कितनी तेज हो यारा अपनी पलक भिगोने में
5.
इस बार मनेगी होली तुम बिन
दीवाली भी तुम बिन और
एक-एक दिन भी तो कटेंगे तुम बिन..
बहुत लोग मिलने आयेंगे घर के सारे लोगों से
बच नहीं पाऊँगा मैं तिरे बिन होने वाले रोगों से
रंग भी तुम बिन लागेगा
दीये भी तुम बिन सजेंगे और
हम कहीं अकेले हटेंगे तुम बिन..
ये आधा डूबा घट कैसे जल पूरा भर कर पायेगा
उल्लास कोई इस दुखी ह्रदय में कैसे घर कर पायेगा
सावन भी तुम बिन आयेगा
बरसात भी तुम बिन होगी और
हम बूंद-बूंद में बटेंगे तुम बिन..
ख़ुशी के मौकों में सब पर मैं बोझ सा, ताने खाऊँगा
वो चाँद भी घूरेगा शब की तन्हाई में जब जाऊँगा
पूनम भी तुम बिन छायेगी
उजलेगी तुम बिन चाँदनी और
हम वहीं रात भर डटेंगे तुम बिन..
ये हरियाली से भरे बाग इस बार तो बागी होएंगे
मतलब नहिं तेरी यादों से, अपनी मस्ती में खोएंगे
सो बहार भी तुम बिन आएगी
पंक्षी, तितली भी तुम बिन और
हम रो-रो उनसे पटेंगे तुम बिन..
एक और कविता थी.. अभी बहुत, मने पूरा तो नहीं लिखा हूँ... लेकिन जितना है उतना ही दे रहा हूँ छोटा सा...-
6.
रात भर सोया नहीं हूँ
नहीं रे! रोया नहीं हूँ
जाग कर एक गीत लिक्खा
हाँ! किसी का प्रीत लिक्खा
भावना को बांधना था
सुबह जा कर जीत लिक्खा
अब बहुत आनंद उर में
ना!-ना! कुछ खोया नहीं हूँ..
रात भर सोया नहीं हूँ
नहीं रे! रोया नहीं हूँ.

शनिवार, 23 जनवरी 2016

मौलिकता के बारे में कुछ मौलिक बातें

-गणेश पाण्डेय


जहाँ तक समझ पाया हूँ, साहित्य में मौलिकता कोई जादू नहीं है। तमाम लोग मौलिकता को कोई जादू, कोई अद्भुत, कोई अदेखा, अजाना संसार समझते हैं, जिसका दशमलव शून्य शून्य शून्य शून्य एक प्रतिशत भी कहीं कुछ वुजूद न हो, आशय यह कि मौलिकता के बारे में या उसका विरोध करते समय ऐसे मौलिक विचार देते हुए लोग डरा ही देते हैं। ऐसे मौलिकता विरोधी सबसे पहले कहेंगे कि भाई आपको या आपके काम को मौलिक तब मानेंगे जब आप इन-इन शर्तों को पूरा करते हों। वे पहले यह भी कह सकते हैं कि सिद्ध कीजिए कि आप अपने माता-पिता की मौलिक संतान हैं। वे यह भी शर्त जोड़ेंगे कि आपकी नाक, आपकी आँखे, आपके ओंठ इत्यादि कुछ भी आपके पिता-माता से हरगिज-हरगिज नहीं मिलना चाहिए। इतना ही नहीं , वे यह भी कहेंगे कि आपके पिता-माता का उनके माता-पिता और उनके के उनके और उनके भी उनके से  सुई की नोंक के बराबर कुछ भी नहीं मिलना चाहिए। ये मौलिकताविरोधी कहेंगे तो यह भी कि आपको सबसे पहले एक दुनिया खुद बनानी चाहिए, फिर अपने लिए एक माता-पिता खुद पैदा करना चाहिए और उसके बाद उन माता-पिता से खुद पैदा होना चाहिए। वे कहेंगे या कहते हैं कि यह सब कीजिए या भूल जाइये कि मौलिकता भी कोई चीज है और साहित्य की धरती पर है। असल में वे मौलिकता के पक्षधर नहीं, उसके विरोधी होते हैं। विरोधी इसलिए होते हैं कि उनके पास कोई ढ़ंग की या मौलिक कृति नहीं होती है, होती तो वे मौलिकता की बुराई आँख मूँद कर नहीं करते। जहाँ तक मैं मौलिकता को थोड़ा-बहुत समझ पाया हूँ, इसका आशय यह नहीं है कि आप पहले खुद हिंदी जैसी एक भाषा और देवनागरी जैसी एक लिपि पैदा कीजिए, खुद कागज पैदा कीजिए, खुद कलम पैदा कीजिए, खुद रोशनाई पैदा कीजिए और फिर ठाट से आराम कुर्सी पर बैठकर कविता, कहानी या आलोचना इत्यादि लिखिए। मैं तो सिर्फ इतना जानता हूँ कि साहित्य में मौलिकता का अर्थ किसी कृति का उल्था या छायाप्रति या अनुकृति न होना है। जब हर पढ़ी-लिखी या अपढ़ माँ का हर बच्चा मौलिक होता है, उसका चेहरा-मोहरा, उसका स्वभाव इत्यादि बहुत कुछ अलग होता है। यहाँ तक कि कोई बच्चा लड़का-कोई बच्चा लड़की होती है। क्या बच्चे की मौलिकता तब मानी जाएगी जब एक शेरनी आदमी का बच्चा, खरगोश का बच्चा, गधे का बच्चा, पेड़ का बच्चा, फूल का बच्चा, सब एक साथ अलग-अलग पैदा करे ? अरे भाई इतनी कड़ी शर्त मौलिकता की न बनाइए, उसे नहीं मानना है, तो मत मानिए। कौन आपको रोक रहा है कि आप पश्चिम की नकल न करें ? कौन आपको मना कर रहा है कि उस नकल से कथा साहित्य या कविता या आलोचना में कमाल मत कीजिए ? किसी के रोकने से साहित्य में धंधा बंद हो रहा है ? संसद की तरह साहित्य की अकादमियों  में दागी लोग नहीं पहुँच रहे हैं ? यह समय साहित्य में निर्लज्जता के महोत्सव का समय है। आप भी उत्सव मना सकते हैं। हाँ, जो लोग मौलिक रचना चाहते हैं, उनके हौसले को कम न कीजिए। असल में रचना लेखक का तब तक एक बेहद निजीकर्म है, जब तक वह किसी कृति को रचकर उसे प्रकाशित नहीं रकता। जब यह उसका निजी कर्म है तो जाहिर है कि उसकी छाप उस पर जरूर दिखेगी। एक बिटिया दुकान से दूध, शक्कर, चाय की पत्ती लाने के बावजूद अपने घर में पहले पड़ी इलायची डाल कर जब चाय बनाती है तो उसकी चाय का स्वाद कुछ अलग होता है। अरे भाई, यही तो है मौलिकता। अब वह बिटिया पहले चीनी मिल खोले, चाय का बागान खरीदे, भैंस पाले और खुद दुहे और गैस के चूल्हे का फिर से आविष्कार करे तब जो चाय बनाएगी वह मौलिक होगा ? अरे भाई फिर तो और कुछ मौलिक हो या न हो आपका दिमाग जरूर मौलिक होगा, किसी खास पत्थर से बना हुआ। रामचरित मानस के कई दोहों को भी उल्था कहा जाता है, क्या मानस की चमक उससे कम हुई ? इसे नोट ही बनाए रखना चाहता हूँ, इसलिए एक-दो बातें और। मौलिकता का अर्थ मेरी दृष्टि में सिर्फ और सिर्फ नया करना है। आप किसी कृति में क्या नया करते हैं ? यह नवता ही मौलिकता है। नवता की असमाप्त श्रृंखला ही मौलिकता की यात्रा है। एक चोर की उँगलियों की छाप भी जब गिलास और दरवाजे की हैंडिल पर पड़ जाती है तो एक लेखक की कृति में उसकी कोई छाप क्यों नहीं दिखनी चाहिए ? यह छाप ही मौलिकता है। अमौलिकता की बात करना नासमझी ही नहीं साहित्य की सबसे बड़ी बेईमानी भी है। असल में इधर संपादको और आलोचकों ने काफी कुछ जाली नोट चलाया है, इसलिए असली नोट से उन्हें परहेज है। साहब जब आप असली नोट लेना पसंद करते हैं तो जाली रचना और आलोचना क्यों पसंद करेंगे ? क्या कीजिएगा, जैसे जाली नोट की पहचान सबको नहीं होती है, उसी तरह साहित्य में जाली नोट पकड़ने का चलन कम है। बड़ी मुश्किल यह कि पाठक हैरान है कि वह पुरस्कृत कवियों और कृतियों को जाली समझे कैसे ? क्या यह देखने की तनिक भी जरूरत नहीं है कि आज का हिंदी साहित्य कहीं जाली की प्रतिष्ठा का साहित्य तो नहीं है ? ये लेखक, संपादक, आलोचक  अमौलिकता का इस्तेमाल कहीं साहित्य में चोर दरवाजे की तरह तो नहीं कर रहे हैं ?




बुधवार, 16 दिसंबर 2015

धर्मशाला बाजार के आटो लड़के

- गणेश पाण्डेय

वे दूर से देखते थे और पहचान लेते थे
मद्धिम होता मेरा प्याजी रंग का कुर्ता
थाम लेते थे बढ़कर कंधे से
मेरा वही पुराना आसमानी रंग का झोला
जिसे तमाम गर्द-गुबार ने
खासा मटमैला कर दिया था

वे मेरे रोज के मुलाकाती थे
मैं चाचा था उन सबका
मेरे जैसे सब उनके चाचा थे
कुछ थे जो दादा जैसे थे
इस स्टैंड से उस स्टैंड तक
फैल और फूल रहे थे
छाते की कमानियों की तरह
कई हाथ थे उनके पास
रंगदारी के रंग कई

दो-दो रुपये में
जहां बिकती थी पुलिस
वे तो बस
उसी धर्मशाला बाजार के
आटो लड़के थे हंसते-मुस्कराते
आपस में लड़ते-झगड़ते
एक-एक सवारी के लिए
माथे से तड़-तड़ पसीना चुआते
पेट्रोल की तरह खून जलाते

वे मुझे देखते थे
और खुश हो जाते थे
वे मेरे जैसे किसी को भी देखते थे
खुश हो जाते थे
वे मुझे खींचते थे चाचा कहकर
और मैं उनकी मुश्किल से बची हुई
एक चौथाई सीट पर बैठ जाता था
अंड़सकर 

वे पहले आटो चालू करते थे
फिर टेप-
किसी खोते में छिपी हुई
किसी अहि रे बालम चिरई के लिए
फुल्ले-फुल्ले गाल वाले लड़के का
दिल बजता था

उनका टेप बजता था
आटो में ठुंसे हुए लोगों में से
किसी की सांसत में फंसी हुई
गठरी बजती थी

किसी की टूटी कमानियों वाला
छाता बजता था
किसी के झोले में
टार्च का खत्म मसाला बजता था

और अंधेरे में
किसी बच्चे की किताब बजती थी
किसी छोटे-मोटे बाबू की जेब में
कुछ बेमतलब चाबियां बजती थीं
कुछ मामूली सिक्के बजते थे

किसी के जेहन में-
धर्मशाला बाजार की फलमंडी में
देखकर छोड़ दिया गया
अट्ठारह रुपये किलो का
दशहरी आम
और कोने में एक ठेले पर
दोने में सजा
आठ रुपये पाव का जामुन बजता था

और घर पर इन्तजार करते बच्चों की आंखें
बजती थीं सबसे ज्यादा।

(‘जापानी बुखार’ से)