रविवार, 2 नवंबर 2014

यह न पूछें, क्यों लिखता हूँ

-गणेश पाण्डेय

   नवनीत जी, यह न पूछें कि मैं क्यों लिखता हूँ ? ‘सिर से सीने में कभी, पेट से पाँवों में कभी/ एक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है।’-दुष्यंत के एक शेर से शुरू करता हूँ। आप ने पूछा ही है तो कुछ तो कहूँगा। इसकी एक नहीं दो नहीं, कई वजहें हैं। पहली बात तो यह कि मेरी कुंडली में कवि होना लिखा था। दूसरी बात यह कि अपने भीतर का सब कहना बहुत जरूरी था, मैं उसके बगैर रह ही नहीं सकता था। तीसरी बात यह कि मुझे बंगाली जी मिल गये। चौथी बात यह कि मुझे हिन्दी के कापुरुषों से रोज लड़ना था। पाँचवी बात कि हिंदी के ये चोट्टे मुझे गुप्त कवि बना कर रखना चाहते थे। छठी बात यह कि यहाँ के एक डॉन ने हिंदी के राक्षसों की एक टीम बना ली थी और जिसे अक्सर मेरे खिलाफ प्रमोट करते रहते थे। अपने कंधे पर बैठाकर घूमते थे। सातवीं बात यह कि मैं हिंदी का मर्द था, मैदान छोड़कर भाग नहीं सकता था। आठवीं, नौवीं, दसवीं, न जाने कितनी वजहें। मैं समाज को शर्तिया बदल देने के लिए नहीं लिखता था, क्यों कि सिर्फ कविताएँ समाज को बदल देंगी, यह नहीं मानता था। हाँ, अलबत्ता इसलिए लिखता था कि यह दुनिया बदल जाय, सुंदर हो जाय, इस भाव से लिखता था। प्रतिरोध की चिंगारी को नित सुलगाते हुए यह जानता था कि दुनिया को कवि नहीं, कार्यकर्ता बदलते हैं, जनता क्रांति करती है, वह जनता जो ढं़ग से साहित्य पढ़ना भी नहीं जानती। इसीलिए खुद को कवि कम और कविता का कार्यकर्ता अधिक समझता था। यह भी जानता था कि हमारे समय के अधिकांश कवि डरपोक हैं, इसलिए कविता और दुनिया का सच एक साथ कहने के लिए लिखता था। नाम की लालसा बचपन में रही होगी, पर जब बालिग हुआ और साहित्य में कदम-कदम पर गंदगी के दर्शन हुए तो कविता का सफाई कर्मचारी बनना ज्यादा रास आया। यह सब जानते हैं कि नाम और इनाम के लिए मैं हरगिज-हरगिज नहीं लिखता और न कभी नाम और इनाम की इच्छा से प्रेरित होकर कोई काम करूँगा। लिखने के साथ पत्रिका निकालने की वजह भी साहित्य में हस्तक्षेप करना भी एक बड़ी वजह थी और है। आपने देखा है कि अब तक मैंने साहित्य के सच को फटकार कर कहा है। जब अपने भीतर के स्वार्थ को आदमी मार देता है तो वह पृथ्वी का सबसे निडर बन जाता है। आप जानते हैं कि मैं साहित्य के किसी भी डॉन-फॉन से नहीं डरता, हाँ डॉन-फॉन ही मुझसे डरने लगें तो दूसरी बात है।
    साहित्य मेरे लिए सच का मंदिर है जो समाज को सुंदर बनाने के लिए स्वप्नों की दीवार और मेहराब पर टिका हुआ है। इस मंदिर में जब गंदगी फैलाने वालों को देखता हूँ तो आगबबूला हो जाता हूँ। साहित्य मेरे लिए मनुष्य की शक्ति का स्रोत है, विवेक और साहस का स्रोत है, मनुष्य की वृत्तियों और संवेदनाओं को परिष्कृत करने का स्रोत है। साहित्य मनुष्य की आत्मा के पीने के पानी का निर्मल झरना है। मुझे इस पानी के धंधे से शिकायत है। मिनरल वाटर जो बाजार में बिकता है, उससे भी शिकायत है तो इस स्तर पर कि सरकारें अगर देश में पीने का शुद्ध पानी नहीं मुहैया करा सकीं तो यह उनकी और इस पूँजीवादी निजाम की विफलता है। साहित्य के जिस पानी की बात कर रहा था, उस पवित्र झरने-आप चाहें तो नदी कह लें-में देश की साहित्य अकादमियों, विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभागों, प्रकाशन उद्योग, हिन्दी के नामी और इनामी डाकू-बदमाशों ने अपनी गंदगी का पनाला डाल रखा है। आप ही बताएँ कि इस देश और हिन्दी की दुनिया में एक लेखक अच्छा लिखे भी और अपनी किताबें छपवाने के लिए प्रकाशकों के दरबार में अपना शीश झुकाए, ऐसा क्यों ? क्या यह हिन्दी साहित्य की बड़ी गंदगी नहीं है ? एक लेखक अच्छा लिखे और आलोचकों के चरणरज लेने के लिए साष्टांग प्रणाम करे, यह साहित्य की गंदगी नहीं है ? क्या तुलसीदास या मलिक मुहममद जायसी या सूरदास, रामचंद्र शुक्ल के पास चापलूसी करने के लिए आए थे ? कबीरदास, हजारी प्रसाद द्विवेदी के पास बनारस का पान लेकर पहुँचे थे ? निराला जी ने रामविलास जी का पैर दबाया था क्या ? फिर आज का आलोचक हरामजादा यह अपेक्षा क्यों करता है कि लेखक उसके चरणरज को अपने माथे से लगाए और अपनी पीठ पर उसको सवारी कराए ? आप ही बताएँ कि यह हिन्दी साहित्य की सबसे बड़ी गंदगी है कि नहीं ? आखिर नागार्जुन को यह क्यों कहना पड़ा -
‘अगर कीर्ति का फल चखना है
आलोचक को खुश रखना है’
आलोचक पुलिस के सिपाही की तरह दो-दो रुपये के लिए कविता के ट्रकों को बीच सड़क पर रोक दे रहा है। बिना दो रुपये लिए जाने ही नहीं देता। यह तो कोई गणेश पाण्डेय की तरह कविता के ट्रक का उजड्ड ड्राइवर हो या बैलगाड़ी का मस्त गाड़ीवान तो बैरियर-सैरियर को तोड़-ताड़कर चल देगा। बाकी लोगों की तो जान साँसत में है। आपसे एक राज की बात बताता हूँ कि मैं तो सीधा-सादा एक छोटा-मोटा कवि था और हूँ, मैं आलोचना में आया ही हिंदी के हरामजादे आलोचकों की हरामजदगी के खिलाफ। कुछ आलोचक जरूर ऐसे हैं जिनमें गंदगी कम है। कुछ में तो गंदगी बिल्कुल कम मिलेगी, लेकिन साहस की कमी तो हर जगह एक जैसी है। एक आलोचक को डरते देखा कि हाय अमुक का नाम लूँगा तो अमुक नाराज हो जाएंगे, अमुक मेरी बेटी को हिंदी विभाग में नियुक्त नहीं होने देंगे। एक आलोचक को देखा कि अमुक का नाम लूँगा तो अमुक विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में मेरी नियुक्ति की संभावना खत्म हो जाएगी, एक को डरते देखा कि अमुक की प्रशंसा करूँगा तो अमुक अलेखक और हिंदी का छुटभैया डॉन नाराज हो जाएगा। लंबी कहानी है भाई डरपोंक आलोचकों की। आलोचक तो आलोचक, नामी-गिरामी कवि भी बहुत डरपोंक दिखे। एक बड़े भारी कवि रहते हैं राजधानी में और पूरब के महाकवि समझे जाते है, वे भी डरते रहे कि हाय इस कवि से दूर रहो, मेरे चेले-चापड़, मेरे संगी-साथी नाराज हो जाएंगे, अलेखकों के साथ रह लेना ठीक, हिंदी के हरामजादों के साथ दारू पी लेना ठीक मगर इस फटीचर कवि से दूर रहो। कहा न, कहानी लंबी है।ं सार यह कि हिंदी की गंदगी को साफ करने के लिए कलम की धार को तेज किया। भीतर के स्वार्थ को- नाम-यश की आकांक्षा को- मार डाला, इन्हीं हाथों से किया है खून, लीजिए देखिए, तब कहीं जाकर सच कहना और सच के लिए लड़ना सीखा है। मेरे लिए साहित्य की कोई विधा हो फर्क नहीं पड़ता, दर्द अगर सच्चा है तो आप गद्य में ही नहीं कविता में भी जीवन का संग्राम लिख सकते हैं। अब एक कविता आपको न दिखाऊँ, यह कैसे हो सकता है-कविता का शीर्षक है-कम कविता के दिन थे-
कुछ करने के दिन न थे
कविता के लिए मरने के दिन न थे
जो मरे मारे गये, कोई न पूछ थी कहीं।
रोशनी का काम उनके जिम्मे न था
जिनके पास कुछ ढँका-छिपा न था।
गजब का मंजर था सामने
टुटही हरमुनिया थी
वक्त-बेवक्त राग जैजैवन्ती गवैया थे
वही झाँझ-करताल वही बजवैया थे
बड़े-बड़े घुटरुन चलवैया थे
कुछ थे जो
बाहरी जहाजों पर कूद-कूद चढ़वैया थे
कई तो अपने ऊपर ग्रंथ छपवैया थे।
रटन्त विद्या के दिन थे
एक कविता दौर के अन्तिम दिन थे
दृश्य उन्हीं का था
जिनके जीवन में कोई संग्राम न था
जीवन छोटा था
कम कविता के दिन थे
फिर भी कुछ पागल थे बचे हुए
जिनके हौसले थे कि कम न थे।
(‘जल में’ से)
   यह कविता अपने समय की कविता और कवियों का पोस्टमार्टम है। इसे देने की वजह यह कि आप जान सकें कि एक खराब कविता और खराब कविता को दुरुस्त करने वाली कविता में क्या फर्क है ? एक वजह यह भी है कि आप जान सकें कि यह समय कविता के लिए कितना मुश्किल समय है। इस मुश्किल समय में जाहिर है कि मैं कोई आसान काम कैसे कर सकता था। आसान काम तो वह था जो ऊपर दिख रहा है कि एक पागल को छोड़कर बाकी लोग जिसे कर रहे थे। आप चाहे जितना बुरा मानें, लेकिन ‘‘मुश्किल काम’’ नाम की एक कविता और यहाँ देना चाहूँगा, ताकि जान जान सकें कि कौन आसान काम कर रहा था और कौन मुश्किल काम-
यह कोई मुश्किल काम न था
मैं भी मिला सकता था हाथ उस खबीस से
ये तो हाथ थे कि मेरे साथ तो पर आजाद थे।
मैं भी जा सकता था वहाँ-वहाँ
जहाँ जाता था वह अक्सर धड़ल्ले से
ये तो मेरे पैर थे जो मेरे साथ तो थे
पर किसी के गुलाम न थे।
मैं भी उन-उन जगहों पर मत्था टेक सकता था
ये तो कोई रंजिश थी अति प्राचीन
वैसी जगहों और ऐसे मत्थों के बीच।
मैं भी छपवा सकता था पत्रों में नाम
ये तो मेरा नाम था कमबख्त जिसने इंकार किया
उस खबीस के साथ छपने से
और इसमें उस अखबार का क्या
जिसे छपना था सबके लिए और बिकना था सबसे।
मैं भी उसके साथ थोड़ी-सी पी सकता था
ये तो मेरी तबीयत थी जो आगे-आगे चलती थी
अक्सर उसी ने टोका मुझे-
‘पीना और शैतान के संग ?’
यों यह सब कतई कोई मुश्किल काम न था।
(‘जल में’ से)
    दरअसल यह वह फर्क है जो मेरे जैसे कविता के मामूली कार्यकर्ता और हमारे समय के नामी-इनामी कवियों के बीच है। मैं यह नहीं कहता कि मैंने अच्छी कविताएँ लिखी हैं, पर यह कहता हूँ कि मेरी कविताओं में मेरे जीवन का भरपूर खुरदुरापन है। आप इस खुरदुरेपन को कोई भी नाम दे सकते हैं। आप ‘मर्दाना’ के अर्थ को लिंग से जोड़कर देखने की जगह शक्ति के चेहरे के रूप में देखें तो कह सकते हैं कि मैंने एक अर्थ में मर्दाना कविताएँ और गद्य लिखने की कोशिश की है। मेरा मानना है कि एक छोटे से छोटा कवि भी अपने भीतर सबसे निचले तल में पक्का घर बना कर रहने वाली नाम और इनाम की कमजोरियों को दूर कर ले तो वह भी अपने समय की कविता की सच्ची राह पर चल सकने का कमाल कर सकता है , जिस पर मैंने बस अभी पहला डग ही रखा है।
     कहना जरूरी हे कि साहित्य की भ्रष्ट सत्ताओं के सामने आत्मसमर्पण करने वाले लेखक साहित्य के कीट-पतंग तो हो सकते हैं, हिंदी के सच्चे लेखक नहीं। जाहिर है कि सिर्फ आत्मसंघर्ष ही लेखक के महत्व को जानने की पहली और सबसे बड़ी कसौटी है। एक लेखक जब हिंदी के किसी माफिया के सामने अपनी गर्दन झुकाता है तो सिर्फ़ उसकी गर्दन नहीं झुकती है, उसकी आत्मा झुक जाती है, उसका काव्यविवेक धूल धूसरित हो जाता है, उसकी आलोचना के लोचन में मोतियाबिंद हो जाता है, वह अपने समय के झूठ-मूठ के महाजनों का पिछलग्गू बनकर लेखक के स्वाभिमान की हत्या करता है। ऐसे झुंड में भेड़-बकरियों की तरह जीना सबसे नहीं हो पाता है भाई। ऐसे लोगों को राजधानी के साहित्य का राजपथ मुबारक, मुझे अपनी स्वाधीन कुटिया भली। दरअसल साहित्य दृष्टि, विचार, मूल्य, संवेदना और स्वप्न का घर है, जब एक दुर्बल लेखक उसे नाम और इनाम का कारखाना समझ लेता है तो वह साहित्य में जीवन का नहीं मृत्यु का वरण करता है। मेरे लिए साहित्य आत्मा का फाँसीघर नहीं है। मेरे लिए कविता एक अर्थ में मनुष्य का पुनर्जीवन है, इस नये जीवन में हम अपने रचना के ठीक पहले के जीवन में हुई टूट-फूट को ठीक करने की कोशिश करते हैं। यह काम कविता के प्रति सच्चे समर्पण का है। जब लेखक का ध्यान कुछ और पाने और जल्दी से पा जाने की ओर होगा तो वह अपने इस दायित्व से विमुख हो जाएगा।
     मेरे लिए तनिक सुविधाजनक यह कि आपने यह पूछा है कि मैं क्यों लिखता हूँ, यह नहीं पूछा है कि जो लिखता हूँ, वह क्यों लिखता हूँ ? नही ंतो मुझे सच बताना पड़ता। सच यह कि जैसे और जो-जो और सब लिखते हैं, उस तरह और वह मैं नहीं लिखता हूँ। इसलिए कि मैं न तो फर्जी क्रांति का बिजूका बनना चाहता हूँ और न अपने समय के साहित्य की मुख्यधारा में बह जाना चाहता हूँ। एक लेखक खुद को समय के अँधेरे से नहीं बचाएगा तो दुनिया को सुंदर बनाने का स्वप्न क्या खाक देखेगा ? इस देश को फासीवादी ताकतों से मुक्त कराने का स्वांग करने वालों करी सच्चाई उस वक्त उनके पतलून से बाहर आ जाती है, जब वे साहित्य की भ्रष्ट और क्रूर सत्ता के सामने घुटने टेकते हैं। नाम और इनाम को छोड़िये, कुछ कार्यक्रमों बुलाये जाने के बहुत मामूली स्वार्थ में हिंदी के तमाम छुटभैयों को फिसड्डी महाप्रभुओं के सामने साष्टांग लेटकर प्रणाम की मुद्रा में देखता हूँ तो लगता है कि हम हिंदी के सचमुच के नर्क में तो नहीं आ गये हैं ? देखिए यह देखना बहुत आसान है कि सामने बैठा लेखक किस कोटि का है ? आप उसकी एक रचना को छुएँ या उसके मुखारबिंद से दो शब्द झरने दे ंतो पता चल जाएगा कि इस बंदे की असली जाति क्या है ? जैसे फर्जी भक्ति होती है, उसी तरह फर्जी सांप्रदायिकता विरोध होता है, उसी तरह पूँजीवाद का फर्जी विरोध होता है, ठीक वैसे ही सामंतवाद का फर्जी विरोध दिखता है। आखिर नाम और इनाम सामंती मूल्य है या नहीं ? भक्तिकाल की बड़ी कविता में नाम और इनाम की आकांक्षा है या मुक्ति की ? गौर से देखिए तो वह मुक्ति भी आध्यात्मिक मुक्ति के भीतर सामाजिक मुक्ति की बड़ी और जनाकांक्षा की अभिव्यक्ति है। मैं जो लिखता हूँ, वह इन्हीं फर्जी लेखकों की गंदगी साफ करने का साबुन है। झाग भले ही कम देता हो , पर मैल बहुत अच्छी तरह काटता है, यहाँ तक कि पतलून तो पतलून, चमड़ी भी बाजदफा कट जाती है। यह कहना गलत है कि मैं चमड़ी काटने के लिए लिखता हूँ, पतलून साफ करने के लिए नहीं। काफी पहले आलोचकों और आलोचना पर लिखे गये एक मामूली पर जिसे हमारे समय के दूसरे नंबर के एक आलोचक ने हिंदी आलोचना की अब तक की सबसे बड़ी लफंगई कहा था, उसका बड़ा विरोध हुआ कि उसमें लेखकों की चमड़ी काटी गयी है, जबकि मैंने तो सिर्फ मैल साफ करने की कोशिश की थी। आखिर उस लेख में जिस आलोचना में जिस जातिवाद पर प्रहार था, आलोचना में जिस मुंशीगीरी पर चोट थी, लेखिकाओं के साथ संपादक और आलोचक जो शोषण और नाइंसाफी कर रहे थे,, साहित्य के तमाम अँधेरों में दियासलाई जलाने की कोशिश की गयी थी, वह सब क्या था ? मेरा मानना है कि आलोचना की धंधई ही हिंदी की दुर्दशा की सबसे बड़ी वजह है। इसीलिए हिंदी के बेटे का फर्ज निभाता हूँ। जो जरूरी है, वह लिखना जरूरी है। सांप्रदायिकता के विरोध को न तो बारबार रिपीट करना जरूरी है और न सिर्फ किसी एक संगठन का नाम लेना जरूरी है, कहो तो ऐसे कि वह जितनी अपनी समय में हो उतना ही आने वाले समय में ? आज जो संगठन दिख रहे हैं, कल उसी तरह के दूसरे संगठन दूसरे नाम से आ सकते हैं। यह मेरा मानना है, मैं इस सोच के साथ सांप्रदायिकता का विरोध करता हूँ अपने लेखन में। ‘ओ ईश्वर’ लिखता हूँ, ‘गाय का जीवन’ लिखता हूँ तो ‘सबद एक पूछिबा’ भी लिखता हूँ। जो लिखता हूँ, वह इस तरह लिखता हूँ कि चेहरा खुला रहे और पाठक उसे पहचान ले। कविता लिखता हूँ, भाषण लिखने से बचता हूँ। पैर में पाजामा पहचनता हूँ, बालों में कंघा करता हूँ अर्थात गद्य में गद्य लिखता हूँ और कविता में कविता। मैं लिखता हूँ तो अपनी तरह लिखता हूँ। अपने अँगूठे का निशान लगाता हूँ। किसी नामी-इनामी कवि का फर्जी दस्तखत अपनी कविता में नहीं करता हूँ। मैं लिखता हूँ तो सौ फीसदी मैं लिखता हूँ। मैं लिखता हूँ क्यों कि मैं लिखे बगैर रह नहीं सकता। लिखना छोड़ दूँगा और अपनी तरह लिखना छोड़ दूँगा तो मर जाऊँगा। जीने के लिए लिखता हूँ। अमर होने के लिए नहीं लिखता हूँ। कविता पर मर-मिटने के लिए लिखता हूँ। ऊपर कह चुका हूँ- कविता के लिए मरने के दिन न थे/जो मरे मारे गये, कोई न पूछ थी कहीं।’ फिर भी कवि स्वभाव का क्या करूँ। कुत्ते के स्वभाव में चमड़ा प्रेम है तो सहृदय का स्वभाव है अच्छी कविता पर रीझना। यहाँ मुझे कोई डरके मारे पूछे न पूछे कोई फर्क नहीं पड़ता। लगें रहें सब यहाँ के साहित्य के डॉन और उनके गैंग के छुटभैयों के पीछे-पीछे, धुलते रहें उनकी धोती इत्यादि और करते रहें उनकी पूजा, न पूछें मुझे जैसे बंगाली जी को नहीं पूछते, सच्ची कविता को नहीं पूछते। कोई फर्क नहीं पड़ता। आप जैसे मित्र बहुत हैं, पूछते रहें, बहुत है। दरअसल मैं हिंदी के कापुरुषों के लिए नहीं, हिंदी के बेटों के लिए लिखता हूँ।



गुरुवार, 18 सितंबर 2014

कसौटी यह कि पहले कवि की आँख का पानी देखें

-गणेश पाण्डेय
स्वप्निल श्रीवास्तव का नया संग्रह आज ही मिला है। स्वप्निल जिला-जवार के हैं। उनका हक बनता है कि सब काम रोक कर उनका संग्रह देखूँ। स्वप्निल भी यूपी के सिद्धार्थनगर जनपद के हैं, जो पहले आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बस्ती जनपद का हिस्सा था। सनद के मुताबिक स्वप्निल मुझसे आठ माह बड़े हैं, पर कविता में मुझसे पहले और मुझसे काफी प्रतिष्ठित हैं। यों कहने के लिए इसी जनपद के और असल में दिल्ली के बाबा विश्वनाथ त्रिपाठी भी हैं। बाबा पंडिज्जी के अर्थ में कह रहा हूँ। वे चहुँओर पंडित हैं। बस अपने जनपद के कुछ नहीं हैं। उन्होंने खुद एक बार मेरे सामने सिद्धार्थनगर में खुद को घर का जोगी जोगड़ा कहा था। जाहिर है कि वजह वे खुद हैं। बहरहाल, छोड़िये अपने जनपद के ऐसे किसी पुरनिया की बात। बात तो हमउम्र स्वप्निल की करेंगे, जो हमवतन हैं और मुझे हमेशा हमवतन लगते हैं। भाभू पाने के बाद कभी कोई ऐंठ इस कवि में नहीं दिखी। कम से कम मुझे। कुछ और भी होंगे जो भाभू के बाद भी धरती पर रहते हैं। ऐसा इसलिए कहता हूँ कि कुछ कवि तो ऐसे छोटे-मोटे इनाम पाने के बाद आसमान में उड़ने लगते हैं। कहना यह है कि स्वप्निल आसमान में उड़ने वाले नहीं, सचमुच की धरती के कवि हैं। गाँव-जवार और एक अर्थ में कस्बाई मन के कवि हैं। शायद इसीलिए उनके प्रगतिशील में शील अलग से लगा हुआ देखता हूँ। नहीं तो आज तमाम ऐसे प्रगतिशील कवि दिख जाएंगे जिन्होंने गाँव और कस्बे के शील को तज कर शुद्ध शहराती बनकर साहित्य में काफी प्रगति की है। असल में जैसे-जैसे वाणिज्य हमारे परिवेश के कण-कण में एक-एक साँस में समा गया है, साहित्य की दुनिया में भी लेन-देन का एक नया दौर चला है। एक धंधा चल निकला है। पहले दोस्तो के बीच अलीबाबा और चालीस चोर का एक मुहावरा खूब चलता था, इधर साहित्य में एक बाबा या एक ठाकुर और चार सौ चोर का मुहावरा शुरू हुआ है। हाँ, यह सच है कि मेरे गद्य का अपना अलग रंग है, इसलिए किसी भी बात को मुहावरे में कहने लगता हूँ। कहने का आशय यह कि साहित्य का एक नेटवर्क है। उससे जुड़े हैं तो मालामाल, नाम-इनाम इत्यादि भरपूर। कुछ इनाम तो स्वप्निल को भी मिले, पर कभी इनामी डाकू जैसा कुछ लगे नहीं। स्वप्निल की यह सहजता उनकी कविता का आधार है। इसीलिए स्वप्निल कभी खाँटी राजनीतिक कवि, खाँटी सांगठनिक कवि या खाँटी क्रांतिकारी कवि लगे नहीं, बावजूद इसके कि उनकी कविताओं में राजनीतिक संदर्भ कभी कम नहीं रहे या परिवर्तन की आवाज कभी गुम नहीं हुई। कह सकते हैं कि एक सहज प्रगतिशील कविता का स्वर स्वप्निल की कविता की पहचान है, लेकिन इस प्रगतिशीला की राह में उनकी निजता कभी बाधक नहीं रही। सच तो यह कि अपनी निजता को तज कर ढंग का प्रगतिशील कवि हुआ भी नहीं जा सकता है। मैं स्वप्निल के बारे में कुछ अधिक कहने के मूड में नहीं था, पर कक्षा के लिए निकलने में कोई तीस मिनट का वक्त था, सोचा क्यों न यह सारा का सारा वक्त अपने जिला-जवारी के लिए खर्च कर दूँ, आखिर मैं दिल्ली का कोई बाबा-साबा तो हूँ कि सारा जीवन औरों के लिए और अपने जिला-जवार के लिए नहीं । कम से कम मैं इतना स्वार्थी नहीं हो सकता हूँ भाई। दुश्मन की भी कविता अच्छी हो तो रुक कर देखूँगा और इत्मीनान से एक बार जोरदार ढं़ग से साँस खींचकर वाह कहूँगा, फिर आगे बढ़ूँगा। यह तो स्वप्निल की कविता है। उस स्वप्निल की, जिसकी हँसी बाँध लेगी और जिसकी डबडब आँखें खींचकर अपने में डुबो लेंगी। जब तक है जीवन, स्वप्निल जैसे कवियों का साथ है। यह स्वप्निल की नये संग्रह का नाम भी है- जब तक है जीवन।
    स्वप्निल के लिए कविता का अर्थ जीवन है। आप चाहें तो सुविधा के लिए पर्याय कह लें। स्वप्निल के लिए भी जीवन का पर्याय कविता ही है। जीवन का एक छोर यर्थाथ की सख्त चट्टान पर टिका है तो दूसरा भावना के समुद्र के सबसे निचले तल में। इस तरह भी कह सकते हैं स्वप्निल की कविता की नदी बुद्धि और हृदय के दो पाटों के बीच बहती है। आप यह न समझें कि मैं स्वप्निल की कविता की तारीफ में कोई पर्वत बना रहा हूँ या समुद्र लाँघ रहा हूँ। यह सब जो कह रहा हूँ, स्वप्निल जैसे हजारों कवियों में मौजूद है। यह सब कह इसलिए रहा हूँ कि आप यह जाने कि मेरी दृष्टि में स्वप्निल कवि है, कविता के व्यापारी नहीं। कविता के कार्यकर्ता हैं, इंजीनियर नहीं। खुरदुरे हाथों से कविता की सड़क बनाते हैं, कमीशन नहीं खाते हैं। कविता है तो कविता ही है, लेख नहीं, निबंध नहीं, कुछ और नहीं। स्वप्निल कविता की बुनियादी शर्तों को कभी नहीं तजते। कहीं-कहीं यथार्थ का दबाव उन्हें बतकही तक खींचकर जरूर ले जाता है, पर अगली कविता में वापस कविता में लौट आते हैं। गाँव स्वप्निल के यहाँ लोक के मुहावरे में पहले की कविता की छौंक के साथ नहीं, बल्कि संवेदना के स्तर पर यथार्थ के आलोक में दिखता है। ‘हलवाहे’ कविता आप खुद देखें-
हलवाहे दिखते नहीं
मैंने सोचा-
वे बैलों के आसपास होंगे
लेकिन बैल कहाँ हैं ?
तो चलो हलवाहे को हल और
जुआठे के आसपास खोजा जाय
लेकिन अफसोस वे वहाँ नहीं हैं

हो सकता है कि हलवाहे खेत
जोत रहे हों
हाँ वे खेत में शर्तियाँ होंगे
लेकिन वे वहाँ भी नहीं मिले
उन्हें खोजने की यह कोशिश भी
बेकार गयी

किसी ने बताया हलवाहों के बिना
जोते जा सकते हैं खेत
यह मेरे लिए दुखद सूचना थी
हलवाहों के बिना खेत की
कल्पना नहीं होती
लेकिन हमारी कल्पना से ज्यादा
घटित हो रही हैं दुर्घटनाएँ

यह मानने में वक्त लगेगा कि
हलवाहे नहीं रहे
उसी तरह हमें एक दिन यह भी
सुनना पड़ सकता है कि खेत
नहीं रहे।

लेकिन मेरी दिलचस्पी स्वप्निल की राजनीतिक और सामाजिक यथार्थ से जुड़ी कविताओं के साथ उन कविताओं में भी है जहाँ स्वप्निल अपने वजूद के साथ, अपने निजी संसार के साथ, कवि होने की पहली शर्त के साथ के साथ दिखते हैं। जिस कवि की आँख में आँसू नहीं, वह कवि, कवि नहीं, कविता का दलाल है। कहना तो कुछ और चाहता हूँ, पर दलाल शब्द की व्यंजना अपना काम कर देगी। हाँ, तो आते हैं उस कविता की ओर, जिसका जिक्र अपने एक लेख में अन्यत्र कर चुका हूँ और जिसे यात्रा में दे चुका हूँ-सूई धागा :
तुम सूई थी और मैं था धागा
सूई के पहले तुम लोहा थी
धरती के गर्भ में सदियों से
सोई हुई

तुम्हें एक मजदूर ने अंधेरे से
मुक्त किया
उसी ने तुम्हें तराश तराश
बनाया सूई
ताकि तुम धागे से दोस्ती
कर सको

धागे के पहले मैं कपास था
जिसे मां जैसे हाथों से चुनकर
चरखे तक पहुँचाया गया
कारीगरों ने मुझे बनाया धागा

मैं अकेला भटकता रहा
और एक दिन मैं तुमसे मिला
इस तरह हम बन गये
सूई धागा
और साथ साथ रहने लगे

तुम्हारे बिना मैं रहता था
बेचैन
और मेरे बिना तुम
रहती थी अधीर

हम दोनों मिलकर ओढ़ते रहे
जिंदगी की चादर
और अपने सुख-दुख को रफू
करते रहे

एक दिन तुम मृत्यु के अंधेरे में
गिर गयी
मैं रह गया अकेला

जब भी मैं तुम्हारे बारे में
सोचता हूँ
तुम मुझे चुभती हो
आत्मा तक पहुँचती है
तुम्हारी चुभन।

      इस तरह की कविताओं को स्वप्निल की कविता की कसौटी मानता हूँ। यों यह कसौटी किसी भी भले कवि के लिए हो सकती है कि सबसे पहले उसकी आँख का पानी देखें। कुछ मित्रों को लग सकता है कि दूसरे कवियों पर एकाध पैराग्राफ कहे और स्वप्निल की कविता पर कई पैराग्राफ।  इस आरोप के जवाब में सिर्फ इतना कहना है कि मैं कोई दिल्ली का बाबा नहीं हूँ जीवन में बाहर के लोगो के लिए करता रहूँगा, अपने जिला-जवार के कवियों को हिंदी के आदमखोर जानवरों के हिस्से में छोड़कर अपनी मिट्टी का कर्ज उतारे बिना चल दूँगा। अंत में मित्रो आपसे विनम्र प्रार्थना है कि स्वप्निल की कविता को एक भले कवि की कविता के रूप में देखें, मेरे जिला-जवार के कवि के रूप में हरगिज नहीं, वह तो मैं ऐसे ही कह रहा था।
 (नोट : यह संग्रह पाने के बाद शिष्टाचारवश एक त्वरित प्रतिक्रिया है। इसे संग्रह की पुस्तक समीक्षा के रूप में न देखें।)


रविवार, 29 जून 2014

बच्चों को बताएँ कि सिर्फ एक फूल क्यों नहीं

-गणेश पाण्डेय
 
कुछ राजे-रजवाड़े या रईस लोगों के बच्चों की तरह मेरी प्रारंभिक शिक्षा घर पर विशेष शिक्षकों की देख-रेख में नहीं हुई और न तो बहुत नामी-गिरामी अर्थात किसी दूसरी जगह के अमीरों के बच्चों वाले स्कूल में हुई। कविता का सबसे पहला पाठ घर पर नीम की छड़ी से ,  जो पिता जी के हाथ में थी। मैं स्कूल जाना नहीं चाहता था, बहुत से बच्चों की तरह खेलने- कूदने को ही जीवन की सबसे बड़ी शिक्षा समझता था। असल में यह उम्र ही ऐसी थी। तब स्कूल भी ऐसे कहाँ थे जिनमें सबसे छोटी कक्षा में जाने पर चॉकलेट मिलती ? हाँ, उस वक्त मेरे बहुत छोटे-से कस्बे में जो एक ग्रामसभा थी, दो स्कूल थे, एक प्राइमरी स्कूल था जो सरकारी था और एक गैर सरकारी। उस गैर सरकारी स्कूल के कर्ताधर्ता तेलिया पंडिज्जी थे, हम सब उन्हें इसी नाम से जानते थे। साँवला चेहरा, दरमियाना कद, धोती-कुर्ते की पोशाक और कड़क आवाज, बाद में ऐसी ही एक शानदार आवाज सबसे ऊँची कक्षा में दुबले-पतले और नाटे कद के एक कवि-आलोचक गुरु में दिखी थी। तेलिया पंडिज्जी की आवाज तो बहुत अच्छी थी ही, ज्ञान-वान की पहचान भला हम बच्चों को उस वक्त कहाँ थी, पर सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली बात उनकी लिखावट थी। श्यामपट्ट पर क्या मोती जैसे सुंदर अक्षर लिखते थे। उन्हीं सुंदर अक्षरों ने कुछ सीखने के लिए प्रेरित किया। वे हाथ पकड़कर भी पटरी पर खड़िया मिट्टी से लिखवाते थे। भाषा को सीखना ही मेरे लिए कविता के देश में जाने का पहला पासपोर्ट था। हालाँकि कविता लिखना कुछ और वक्त बाद शुरु किया। उठो लाल अब आँखें खोलो जैसी कविताओं से होते हुए आगे बढ़े। तेलिया पंडिज्जी के स्कूल में सिर्फ कक्षा चार तक की पढ़ाई होती थी, पाँचवीं में दाखिले के लिए प्राइमरी स्कूल में जाना पड़ा। वहाँ रामप्रकाश पंडिज्जी मिले। कड़क वे भी थे। सामने रेलवे लाइन थी और बगल में स्टेशन। पाँचवीं के बच्चे शरारती इतने थे कि रेल पर बिना टिकट बैठ कर पश्चिम के स्टेशन चिल्हिया नंबर एक करने चले जाते थे तो कभी पूरब के स्टेशन उस्का दो करने। रामप्रकाश पंडिज्जी ने एक ऐसे ही शरारती बच्चे को पीठ पर रेल की पटरी के पत्थर से जरा-सा ही कस कर मारा था और उसके आसपास के बच्चे ंके बस्ते भीग गये थे। कहना यह कि ऐसे ही बच्चों के बीच से निकल कर जब कस्बे के इंटर कालेज में दाखिला लिया तो वहाँ के प्रधानार्य आरछी सिंह तो बहुत धाकड़ प्रिसिंपल थे, पर मेरा ध्यान उनकी जगह हिन्दी के अध्यापक रमेश सिंह गुरु जी की तरफ आकर्षित हुआ। पहली बार जब मैंने ग्रामजीवन पर निबंध लिखा और उस पर रमेश गुरु जी ने जो तीन शब्दों का एक छोटा-सा वाक्य टीप के रूप में दर्ज किया, कई दिनों तक उस कापी को अपने सीने से लगाए रहा।  इसके तनिक पहले ही कविता लिखने की कोशिश में तुकबंदी शुरु कर दी, पर असल में कविता के प्रति अनुराग और प्रगाढ़ कस्बे में होने वाले मुशायरों और कविसम्मेलनो से हुआ। मेरे लिए पारंपरिक स्कूल ही नहीं साहित्य के पारंपरिक आयोजन भी साहित्य के स्कूल बने। किशोर जीवन में कृष्णबिहारी नूर जैसे शायर के शेरों ने मेरे भीतर न सिर्फ कविता, बल्कि जीवन के प्रति नजरिया भी बदला-
मैं एक कतरा हूँ मेरा वुजूद तो है
हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है।
  राहुल सांकृत्यायन की ‘दर्शन-दिग्दर्शन ने भी जीवन को देखने की नयी दृष्टि दी। बुद्ध का घर मेरे घर से कुछ कोस की दूरी पर था। एक सबसे बड़ी चीज थी रात में गर्मियों में नीम के पेड़ के नीचे चारपाई डालकर सोना पड़ता था, कस्बे में किसी के घर बिजली थी नहीं, हाँ, सिंचाई विभाग की कॉलोनी में कोई बड़ा-सा जनरेटर था, जिससे सड़कों पर स्ट्रीट लाइट जल जाती थी। एक खम्भा मेरे घर के सामने भी था। बस रात में कागज-कलम लेकर बिस्तर पर लेटे-लेटे कुछ लिखता रहता। हालाँकि कविता सोचने की कुछ ऐसी जगहें भी होती थीं, जिनका जिक्र नहीं किया जा सकता। आशय यह कि पारंपरिक स्कूलों ने और गैर पारंपरिक स्कूलों ने कविता के प्रति रुचि पैदा की। भक्तिकाल और आधुनिककाल की कविताओं ने ही नहीं, मुशायरों और कविसम्मेलनों की कविताओं ने भी काव्यरचना के लिए प्ररित किया। मेरे कस्बे में कविता के लिए कोई कार्यशाला नहीं लगती थी। कुछ संस्थाएँ बनी जिन्होंने कवितायात्रा के अगले पड़ाव तक पहुँचाया। मैं, नजीर, सत्यप्रकाश, असलम और दूसरे कई साथियों ने मिलकर एक संस्था बनायी, एक छोटी-सी पत्रिका निकाली, पर यह सब साहित्य के मेरे पहले गुरु जो पेशे से चिकित्सक हैं, श्रद्धेय डा. सच्चिदानंद मिश्र के संरक्षण में हुआ। कविता लिखने की शुरुआत आदिकवि की तरह क्रौंच पक्षी के वध जैसी किसी घटना को देखकर नहीं हुआ, बल्कि जीवन की एक स्वाभाविक गति में आप से आप। हालाँकि एक तथ्य यह भी है कि मेरी कुंडली में कवि होना लिखा भी था। मेरे पिता जी ने जब एक जानकार को मेरे सामने ही दिखाया तो मैंने भी सुना। बहरहाल कुंडलियों में बहुत-सी बातें होती हैं, सब सही होतीं तो कोई बेरोजगार या दुखी रहता ? निराला जी की कुंडली में दो विवाह लिखे ही थे, पर हुआ ? कविजीवन के निर्माण की अपनी प्रक्रिया होती है, कुछ धीमी होती है।
        असल में कविजीवन का अपना वैशिष्ट्य होता है। पहला तो यह कि कवि की आँख उसे बेचैन करती रहती है, दूसरा उसका दिल। विशेष ये आशय सिर्फ यह कि दिखे सबकी तरह और हो तनिक-सा हटकर। हर कवि अपने जीवन में एक अर्थ में अपनी कविता का ही जीवन जीता है। कवि का जीवन और कविता का जीवन, दोनों में संगति ही अच्छी कविता को संभव करती है। हाँ, अच्छी कविता की समझ बनने में भी वक्त लगता है। मैं भूलता नहीं हूँ कि बहुत पहले एक बार विश्वनाथ जी पूछा कि अच्छी कविता लिखने के लिए क्या करना चाहिए ? उन्होंने बड़ी सहजता और विनम्रता से उत्तर दिया था कि अरे गणेश जी, यह सब लिखते-लिखते अपने आप हो जाता है। क्यों प्रश्न को टाल गये, इसका जवाब उनकी चिर-परिचित जासूस मुस्कान में ढ़ूँढ़ना चाहिए था,सोचता हूँ किसी दिन उनके घर जाऊँ और फिर से ढ़ूँढ़ू ? बहरहाल, यह विनोद ऐसे ही।
          मैं अपने बच्चों को कक्षा में कविता भिन्न प्रकार से पढ़ाता हूँ। आचार्यों की बात कहना जरूरी होता है तो भी कोशिश करता हूँ कि ऐसे कहूँ कि मेरी बात उन तक पहुँच जाय। उनके जीवन के आसपास की चीजों को उठाकर उन्हें बताना चाहता हूँ। ऐसा इसलिए कि पूर्वांचल के बच्चे, जेएनयू के बच्चे नहीं होते हैं। यहाँ तो सबसे ऊँची उपाधि लेने के बाद भी बच्चा एक साधारण प्रार्थना-पत्र ठीक से नहीं लिख पाता है। जिस अंचल में पीएचडी करके बच्चे पाँच-सात हजार की नौकरी करेंगे, वहाँ पढ़ाई का माहौल और स्तर भला क्या होगा ? जहाँ विश्वविद्यालयों के आचार्य हिन्दी की उन्नति की जगह ईर्ष्या-द्वेष और संस्थान की राजनीति में लगे रहेंगे तो यह सब नित्य देखकर बच्चे अच्छे कैसे बनेंगे ? हाँ तो कह रहा था कि कविता को कैसे समझाएँ! कोलरिज की इस बात को समझाने के लिए कि कविता उचित शब्दों का उचित क्रम है, उदाहरण देता हूँ कि नाई तुम्हारे बाल कैसे बनाता है, कान के बिल्कुल पास बहुत छोटा, फिर ऊपर थोड़ा-सा बड़ा, फिर ऐसे ही वह बालों को उचित क्रम देता है। यह भी बताता हूँ कि वह कितनी बार कैंची चलाता है, कितनी बार हाथ उठाता है, कितनी बार बाएँ-दाएँ, आगे-पीछे होता है। यह भी बताता हूँ कविता पान की पीक की तरह एकबार में बाहर नहीं हो जाती है, समय देना होता है। घुलाना होता है। पान की पीक है भी नहीं कविता, बहुत खास चीज है। बताता हूँ कि तुम्हारे जैसे बच्चे कितनी बार शीशे के सामने खड़े होकर कंघा करते हैं
           एकबार में जब कंघा नहीं हो पाता है तो कविता कैसे ? कई बार लड़के बिजली की गति से हजार बार कंघे को आगे-पीछे ले जाते हैं। इतना ही नहीं, जब वे पूरी तरह आश्वस्त हो जाते हैं और जूते पैरों में डाल कर निकल रहे होते हैं, उस वक्त भी मुड़कर अपने बालों को एकबार फिर देख लेते हैं। बच्चों को यह भी बताता हूँ कि कोई-कोई बच्चे रात में सोने के पहले भी एक बार कंघा करना पसंद करते हैं। ऐसे बनती है कविता। इतना समर्पण , इतनी दीवानगी और सुदर दिखने की इतनी इच्छा से ही कविता भी सुदर बनती है। केवल आचार्य शुक्ल का ‘कविता क्या है’ निबंध ही नहीं महावीर प्रसाद द्विवेदी के  निबंध ‘कवि-कर्तव्य’ को भी ध्यान में रखना पड़ता है।
          जहाँतक बात लेखन कार्यशालाओं की है, इसे बहुत अच्छा माध्यम मानता हूँ, लेकिन जैसे कविता को जनता से जोड़ने के माध्यम मुशायरों और कविसम्मेलनों का पतन हुआ है, उसी तरह आज कविता की कार्यशालाएँ भी वह नहीं कर पा रही हैं जो उन्हें करना चाहिए। देखिए अपवाद भी है। कुछ कार्यशालाएँ अच्छी भी होंगी। मैं मानता हूँ कि छोटे बच्चों के लिए कार्यशालाएँ जिस रूप में चल रही है, उसके कुछ अच्छे परिणाम भी आ रहे हैं, लेकिन किशोर या युवा कवियों के लिए, कविता की रचना-प्रक्रिया पर ही नहीं कविजीवन की रचना-प्रक्रिया पर भी कुछ बताना चाहिए। बताना चाहिए कि कवि भी भ्रष्ट और गंदा हो सकता, ऐसा होने से बचने के तरीके क्या हैं, ऐसे गंदे लोगों को कविता का प्रवक्ता या प्रशिक्षक बनने से कैसे रोकें, जिसे साहित्य अकादमी मिल गयी वह कविता का मान्य प्रशिक्षक कैसे बन गया ? जिसने जीवन भर इंजीनियरी करके खूब धंधा किया, करोड़ों कमाए और सड़के और भवन सब खराब बनाया, वह अच्छी कविता कैसे सिखएगा, जो अस्सी साल के बाद बच्चों का पुरस्कार पाने के लिए मचलेगा, वह अच्छी कविता कैसे बताएगा ? वह कैसे बताएगा कि अच्छी कविता के लिए एक कवि को नौ महीने तक प्रसव के लिए की गयी प्रतीक्षा की तरह घैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करना पड़ता है। वह कैसे बताएगा कि आलोचना के लिए ही नहीं, कविता के लिए भी ईमान, धीरज और साहस की जरूरत होती है ?
      सच तो यह कि आज सृजनात्मकता के विकास के लिए ऐसी कार्यशलाओं की जरूरत है, जो बच्चों और युवाओं में कविता या रचना की किसी भी विधा के चरित्र और स्वभाव को ही नहीं, लेखक के चरित्र और स्वभाव से भी परिचित कराएँ। बताएँ कि बच्चों जब तुम्हारे माता पिता ने तम्हें जन्म देते समय किसी पुरस्कार की कामना नहीं की, बल्कि माना कि तुम्हारा आना ही उनके जीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार है तो ये गंदे कवि अपनी कविता के लिए पुरस्कारकामना में मरे क्यों जाते हैं ? बताएँ कि अच्छा कवि अपनी कविता को ही कविजीवन का सच्चा पुरस्कार मानता है। पुरस्कार में सिर्फ एक कलम क्यों नहीं ? सिर्फ एक फूल क्यों नहीं ? सिर्फ पाठक का प्यार क्यों नहीं ?

(श्री महेश पुनेठा के बच्चों की कार्यशाला और पत्रिका के बहाने)







सोमवार, 23 जून 2014

बिगाड़ के डर से पुरस्कार का सच न कहें ?

-गणेश पाण्डेय
          मुझे ऐसा लगता है कि अपने समय में कवि, कविता और पुरस्कार का पूरा सच न तो पत्रिकाएँ छाप पाती हैं और न इस माध्यम पर आ पाता है। एक तीसरा माध्यम भी है मित्रो, जिसे समय कहते हैं। मूल्यांकन के मामलें में तो साहित्य का यह माध्यम अपने समय में बिल्कुल ही नहीं काम करता। यह काम तब करता है, जब काफी पानी सिर से गुजर चुका होता है। काफी कुछ बीत चुका होता है। काफी लोग किसी और लोक में कविता लिखने या आलोचना का धंधा करने जा चुके होते हैं। आशय यह कि जब उम्रदराज कवि और उनके चेले-चापड़ और उपकृत जन इस पृथ्वी से कूच कर चुके होते हैं। कवियों की मालाएँ, रुपये और शाल इत्यादि, मिट्टी में मिल चुके होते हैं या खर्च हो चुके होते हैं या उनके उत्तराधिकारी उसे फेंक-फाँक या फेँक-फाँक चुके होते हैं। तब साहित्य का सच्चा और निर्मम आलोचक समय प्रकट होता है और  अपना काम शुरू करता है।
        साहित्य का यह सबसे बड़ा और विश्वसनीय आलोचक ‘समय’ नहीं आता रहता तो बहुत से लेखकों ने अपने समय में धारा के विरुद्ध लिखना ही छोड़ दिया होता। बहुत से लेखक अच्छा लिखने के साथ खुशामद न करने की जिद छोड़ चुके होते। वे सब अपने वक्त की कविता के देवताओं की बैठक और आलोचना के दारोगाओं के थाने में उठक-बैठक करते हुए पूरी उम्र बिता चुके होते और उन्हें खुश करने के लिए न सिर्फ उनका अँगरखा धुलते रहते, बल्कि उनके सेवकों और दलालों की खुशामद की कला में अपने समय के तमाम कवियों की तरह पारंगत होते। बचाया किसने ? बस वही साहित्य के ‘समय’ जी ने।
           मित्रो, आप सोच रहे होंगे कि मैं काफी समय बाद फिर कवि, कविता, पुरस्कार पर क्यों कुछ कह रहा हूँ। असल में हुआ यह कि अभी बिल्कुल अभी हमारे समय के हिन्दी के एक अच्छे कवि को ज्ञानपीठ मिला है। यहाँ जो कुछ भी कहूँगा, पुरस्कृत कवि के प्रति असम्मान व्यक्त करने के लिए नहीं। यह बात स्पष्ट कर देना जरूरी है। केदार जी हमारे समय के तीन-चार अति महत्वपूर्ण कवियों में से एक हैं। जिस पुरस्कार के बहाने बात कर रहा हूँ, उसे आज की तारीख में हिन्दी कवियों को देना हो तो जाहिर है कि यही नाम होंगे। यहा इन नामों से तनिक भी विरोध नहीं है। विरोध पुरस्कार की संस्कृति से है। आज की तारीख में पुरस्कार इन कवियों को नहीं, यदि भगवान को भी मिलता तो तब भी इस तरह की बातें होतीं। असल में हिन्दी कविता में पुरस्कार की संस्कृति के साथ ही अनुयायीपन भी खूब फैला है। कबीर, निराला, मुक्तिबोध के समय उनके इतने अनुयायी न रहे होंगे। ये अनुयायी इतना शोर करने लगते हैं कि लगता है कि आसमान सिर पर उठा लेंगे। इतना ही नहीं, ये अपने प्रिय कवि को महान ही नहीं मानते हैं, बल्कि बाकायदा उनकी कविता की नकल शुरू कर देते हैं। जाहिर है कि यह प्रवृत्ति हिन्दी कविता के सहज विकास की बाधक बनती है। अपने समय को प्रभावित करती है। अपने समय के साहित्यिक मूल्य को नुकसान पहुचाती है। ऐसे में साहित्य का जो अँधेरा ये निर्मित करते हैं, उसके मूल में हजार-पाँच सौ के पुरस्कार से लेकर बड़े-बड़े पुरस्कार शामिल हैं। पहले कविता के इतने बच्चे पुरस्कार न थे कि हर युवा कवि एक पुरस्कार का बैट-बाल लेकर घूमे। इधर पुरस्कारों की दुकानें खुल गयी हैं। बहुत बड़ी दुकान भी खुल गयी हैं। ज्ञानपीठ हो, व्यास हा, साहित्य अकादमी हो, पुरस्कारों की एक लंबी पंक्ति है। ज्ञानपीठ ग्यारह शायद ग्यारह लाख रुपये का पुरस्कार है। अभी दो-चार दिन पहले विमल जी ने या किसी ने कहा कि यह पुरस्कार पाँच रुपये का होता तो क्या होता! असल में पत्रकार का दिमाग केवल कविता और आलोचना लिखने वालों से कुछ अधिक चलता है। ठीक चलता है।
   आखिर ज्ञानपीठ पुरस्कार को क्या भगवान ने खुद गढ़ा है ? उसकी निणार्यक समितियों में अपने समय के लेखक-अलेखक ही होते हैं या सीधे ईश्वर खुद आकर बैठते हैं ? दूसरी समितियों में भी तो ऐसे ही लोग बैठते हैं या अन्य पुरस्कारों की दूसरी समितियों में मिट्टी की मूर्तियाँ बैठती हैं ? फर्क केवल पैसे का है या और कुछ ? तो अब पुरस्कार के पैसे से तय होगा कि कौन अपने समय का बड़ा लेखक है ? रचनाओं से तय नहीं होगा ? केदार जी हों या कोई और, किसी भी हिन्दी कवि को यह पुरस्कार मिला होता तो वह कवि अपनी रचनाओं से बड़ा या छोटा नहीं होता ? फिर यह पुरस्कार क्यों ? कवि की कविता का सम्मान पाठक के हाथ में जाने से है या पुरस्कार की जूरी के सामने जाने से ? पुरस्कार को लेकर यह तो पृथ्वी की सबसे बड़ी नासमझी है भाई। संतोष की बात यह कि इस तरह की नासमझी हिन्दी के सभी लेखकों में नहीं है। उन लेखकों में ही है जो औसत लेखक हैं या पुरस्कारवादी लेखक हैं या जिन्होंने पुरस्कार को साहित्य का सबसे बड़ा सच और मूल्य मान लिया है या जो खुद हजार-पाँच सौ के पुरस्कार से लेकर कुछ हजार या लाख के पुरस्कारों की कतार में हैं, न सिर्फ एक कतार में हैं, बल्कि कई कतार में हैं। किसी कतार में सिर फँसाया है तो किसी में हाथ, किसी में पैर, किसी में कुछ। ये पुरस्कारकामी लेखक हिन्दी के मर्द कवि नहीं है। जानता हूँ कि ऐसा कहते ही कई मित्र नाराज हो सकते हैं, पर क्या बिगाड़ के डर से पुरस्कार का सच नहीं कहूँगा ? स्पष्ट करना चाहता हूँ कि पुरस्कारकामी सिर्फ उन्हें नहीं समझता हूँ जो अपने घर में बैठे रहते हैं और कुछ लिखने के आधार पर पुरस्कार की कामना करते हैं। पुरस्कारकामी उन्हें कह रहा हूँ जो बाकायदा पुरस्कारों के लिए जहाँ-तहाँ नाक रगड़ते हैं। हद दर्जें की तिकड़म करते हैं। जाने दीजिए, क्या-क्या नहीं करते हैं। किसी ने एक दिन कवि के जीवन की बात की थी, कुछ ने कवि के जीवन को अदेख करने की बात की थी। शायद ऐसा ही कुछ था। न भी रहा हो, बस इतना कि हिन्दी में बड़ी कविताएँ कवि के बड़े जीवन के बिना संभव नहीं हुईं हैं। कवि का जीवन ही नहीं, बड़ी कविता के लिए साहित्य का बड़ा मूल्य भी जरूरी होता है। भक्तिकाल की महान कविता में पुरस्कार या अशर्फियों के लिए कहीं जगह है ? बाद की कविता में भी बड़ी कविता के सामने कहाँ ठहरती है पुरस्कारकामना ? इससे पहले कि कुछ और कहूँ, मर्द कवि के बारे में साफ कर दूँ कि शमशेर ने ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ की भूमिका लिखते हुए मुक्तिबोध को मर्द कवि कहा है। शमशेर न भी कहते मुक्तिबोध को मर्द कवि तो कबीर, निराला, मुक्तिबोध जैसे तमाम कवियों को बड़े मजबूत कवि के रूप में ही हम देखते। यह मजबूती दरअसल कहीं न कहीं कवि के जीवन से आती है। कबीर जब यह कह सके कि आन बाट ह्वै काहे न आया, तो इसमे उनके खरे जीवन की शक्ति शामिल थी। बहरहाल, कहना यह है कि मजबूत कवि होना और अच्छा कवि होना दोनों दो तरह की बातें हैं। अच्छे कवि तो बिहारी भी हैं, पर मजबूत कवि नहीं हैं। बात पुरस्कार की कर रहा था। ज्ञानपीठ की बात कर रहा था। अभी बिल्कुल अभी, हिन्दी के एक अच्छे कवि को मिला है। केदार जी हमारे समय में दिये जाने वाले इस पुरस्कार से खराब कवि नहीं हैं। यहा जो कुछ कह रहा हूँ सिर्फ पुरस्कार संस्कृति के विरोध में कह रहा हूँ। केदार जी के विरोध में नहीं।
     इस पुरस्कार को लेकर कई तरह की बातें इस माध्यम पर की गयी हैं। तमाम लोगों ने बल्लियों उछलकर स्वागत किया है, यह अच्छी बात है। कोई अपना या निकट का है या जिससे कुछ संबंध है, उसे मिले पुरस्कार पर बिल्कुल सकारात्मक प्रतिक्रया देना सही है। खुश होने का पूरा हक है ऐसे लोगों को जिन्हें पुरस्कृत कवि ने खुद कभी पुरस्कृत किया हो। यह साहित्य के शिष्टाचार का तकाजा है। जिस कवि को मिला है, निश्चित रूप से भले कवि हैं। भला केदार जी को भला आदमी कौन नहीं कहेगा ? कभी कहीं कोई लड़ाई-सड़ाई नहीं, सबसे मधुर संबंध। ऐसे कवि का अनिष्ट भला कौन चाहेगा ? पृथ्वी के सारे पुरस्कार केदार जी को मिल जाएँ तो भी किसी को तनिक भी दुख नहीं होना चाहिए। चिंता और प्रश्न यह कि पुरस्कार सबके लिए होते कहाँ हैं भाई ? मुक्तिबोध को मिला ? क्या मिला ? कई महत्वपूर्ण कवि हैं जिन्हें पुरस्कार नहीं मिला। इसका अर्थ यह नहीं कि साहित्य के समाज में इन पर चर्चा नहीं होगी। कुछ तो लोग कहेंगे ही कहेंगे। कोई डरेगा नहीं तो इन बकवास पुरस्कारों का पूरा सच ही कहने लगेगा। जो डरेगा या जिसका स्वार्थ कभी सधा होगा या सधने वाला होगा या सधने की उम्मीद होगी या जिसे साहित्य में अपनी जाति सबको बताने की जल्दी होगी कि भाई लोग देख लो मैं भी पुरस्कारवादी हूँ, इसलिए बहुत खुश हूँ, ऐसे लोग ऐसे मौके पर पुरस्कारों कर सच्चाई पर बात नहीं करेंगे।
      बात केदार जी के प्रसंग के बहाने ही पुरस्कारों पर चल रही है।मैं केदार जी का मान कम करने की हिमाकत नहीं कर रहा हूंँ। कुछ प्रश्न और चिंताएँ है और विश्लेषण प्रश्नोंऔर चिंताओं की धरा पर ही संभव है। मैं एक छोटा-सा उदाहरण यहाँ रखना चाहता हूँ। केदार जी पूर्वांचल के कवि है। यह शहर पूर्वांचल का ही हिस्सा है। यहाँ से केदार जी का निकट रिश्ता रहा है। रिश्ता तो उनका यहाँ के कवि देवेंद्र कुमार बंगाली से भी रहा है। उन्होंने अपने प्रयास से बंगाली जी पर साहित्य अकादमी पर एक कार्यक्रम भी कराया। कुछ-कुछ बंगाली जी का प्रिय था मैं। बंगाली जी केदार जी को प्रिय थे। फिर मेरे और केदार जी के बीच कुछ तो प्रेम का रिश्ता होना चाहिए था ? पर केदार जी एक बहुत अच्छे कवि होकर अकवियों या कुकवियों या सिर्फ प्राध्यापकों या दूसरे तरह के लोगों से क्यों घिरे रहे ? इस अवसर पर क्या कहना चाहिए या क्या नहीं, यह पीछे छूट चुका है। जो सामने है कह देना है। जिसने बंगाली जी को हीर कविता से प्रेम करते अनुभव किया वह कवि उस काय्रक्रम से दूर था। इसलिए कि कुछ लोग या कोई गिरोह मेरे विरोध में था। यह अपने मान-अपमान की कथा नहीं कह रहा हूँ, सिर्फ केदार जी के कविता प्रेम और साहस की कथा कह रहा हूँ। बातें तमाम हैं, पर मैं कुछ और नहीं कह रहा हूँ। केदार जी में वह कम है, जो किसी कवि को बड़ा कवि बनाता है। सिर्फ यह कहने के लिए यहाँ का तनिक-सा प्रसंग उद्धृत किया। इस उदाहरण के पीछे मेरी कोई अन्य मंशा नहीं। इसलिए बात आगे बढ़ाता हूँ। किसी बडे से बड़े कविव्यक्तित्व के लिए न्यूनतम यह है कि वह किसी छोटे से छोटे कवि के साथ अनादर और अन्याय न होने दे। कोई स्वाभिमानी कवि ऐसा होने नहीं देगा। स्वाभिमान के नाटक भी बहुत होते हैं। वह भी पता है। आप किस तरह के लोगों के सामने झुक जाते हैं, किस तरह के लोगों के साथ रहते हैं, यह सब आपके कविव्यक्तित्व को बनाता है। केदार जी में बहुत मुलायमियत दिखी। कोमलता इतनी की पूछिये मत। यह हर समय दुर्गुण नहीं होता है। कभी-कभी हो जाता है। एक बात यहाँ साफ कर देना बहुत जरूरी है कि कुछ तो कमी मुझमें भी रही होगी। वह क्यो न बताऊँ ? मेरी कमी यह कि केदार जी जब भी यहाँ आते मैं उनसे मिलने नहीं जाता था। शायद एक या दो बार उनसे मिलने जाना हुआ होगा, पर वह बाहर जब भी और जहाँ भी मिलते अपनी कविता की सबसे लंबी मुस्कान लिए मिलते। बहुत प्यार से। यह जो सामने दिखता था, उनका गुण था। कुछेक शामें भी कई मित्रोंऔर नामी-गिरामी लेखकों के बीच गुजरीं। यह सब उनका गुण था। एक कवि के रूप में भी उनमें कम गुण नहीं हैं। रेशम के धागे से बुनी उनकी कविताएँ भला किसे अच्छी नहीं लगेंगी ?
         मुझे कहना ही हो केदार जी के कविरूप पर तो कहूँगा कि केदार जी हमारे समय सबसे सुदर, सबसे कोमल और सबसे ज्यादा उजले-धुले इकलौते खरगोश कवि हैं। हमारे समय की हिन्दी कविता के अरण्य में अपने कोमल पग में नूपुर डाल कर सबसे तेज दौड़ने वाले कवि। सबसे चतुर कवि। सबसे चौकन्ने कवि। यह केदार जी हैं और जो नहीं हैं, पूरा कहने का अधिकारी तो नहीं हूँ, पर कुछ अनुभव करता हूँ। केदार जी में जीवन का वह खुरदरापन नहीं देख पाया जो पहले के दूसरे कवियों के यहाँ है। वह संघर्ष नहीं देख पाया। यह मेरी सीमा रही होगी कि पहले के कवियों कबीर, फिर निराला, फिर मुक्तिबोध को पसंद करता रहा। मैं केदार जी को उन कवियों की पंक्ति में रखकर नहीं देख सकता। केदार जी मुझे इसके लिए क्षमा करेंगे। हालांकि केदार जी खुद भी इतने अज्ञानी नहीं हैं कि अपने को उन कवियों की पंक्ति में रखकर देखेगें। यह सब इसलिए कह रहा हूँ कि पीछे चलने वाले नये कवियों की फौज सिर्फ इस माध्यम पर ही नहीं, बाहर भी कुछ इस अंदाज में जयकार करती है कि जैसे केदार जी ने कोई पुरस्कार पाकर कविता का कोई किला जीत लिया। अरे भाई पुरस्कार कविता का किला नहीं है। धंधा है। शुद्धरूप से धंधा। आखिर ज्ञानपीठ हो या अज्ञानपीठ या कोई भी पीठ, यदि वह सचमुच साहित्य को सम्मानित करने के लिए पुरस्कार देती है तो अपने समय के कवियों को क्यों ? क्यों नहीं जो पहले के महान कवि हैं उनके वंशजों और उत्तराधिकारियों में जो हों उन्हें बुलाकर सबसे पहले सम्मानित करती ? उसे भी छोड़िये। पहले के कवियों को पुरस्कार नहीं तो अब क्यों ? यह उम्र के आखिरी पड़ाव पर या शुरू में ही कवियों को पुरस्कृत करने की जरूरत क्यों ? उनकी रचनाओं के प्रकाशन और संरक्षण और जनसुलभ बनाने की कोशिशों की जगह ये पुरस्कार क्यों ? आज हिन्दी प्रकाशन जगत लूटमार का अड्डा बना हुआ है। किताबों के चयन में हजार बेईमानियाँ हैं। एक लेखक के महत्व को सीध्रो प्रकाशक नहीं समझता है, उसे कोई माध्यम चाहिए। कोई हो जो बताए कि यह अच्छा या खराब है। वह चाहे तो किसी अच्छे को खराब बताए और खराब को अच्छा। यह हिन्दी का सबसे भयानक है कि एक लेखक अच्छा लिखे और उसके बाद प्रकाशक और आलोचक के चरणों में सिर नवाये। लानत है ऐसे हिन्दी लेखक समाज पर। पुरस्कारों को लेकर भी क्या कम गंदगी है ? ऐसे में इस अँधेरे को दूर करने की जगह पुरस्कारों के प्रति यह आकर्षण क्यों ? या इसलिए कि आज के कवि पहले से बेहतर हैं ? या इसलिए कि आपके पास कुछ पैसों की व्यवस्था है तो आप साहित्य के पुरस्कारों का धंधा कर सकते हैं ? सच तो यह हमारे समय के पुरस्कारों ने साहित्य में इंसेफेलाइटिस फैलाया है, जिससे साहित्य के बच्चे विकलांग होते जा रहे हैं। इंसेफेलाइटिस पर मेरी कविता है, केदार जी की बनारस पर है। क्षमा करेंगे मुझे अपनी कविता का नाम नहीं लेना चाहिए था। पर कहना यह था कि केदार जी हमारे समय के तमाम कवियों से अच्छे कवि हैं, बल्कि बहुत अच्छे कवि हैं, बल्कि सबसे अच्छे कवि हैं, पर यह जरूरी तो नहीं कि पहाड़ की मिट्टी में वह तत्व हो ही जो तराई के किसी ढ़ेले में हो। हाँ कहना जरूरी है कि मुझे भी केदार जी की कविता मुग्ध करती है, पर नशा हर समय अच्छा हो जरूरी नहीं। केदार जी की कविता मुग्ध करती है, पर मुक्तिबोध की कविता उठाकर कंधे पर बैठा लेती है। केदार जी को किसी और तरह से कहना हो तो यथार्थ का नर्स कहना जरूरी चाहूँगा और मुक्तिबोध को सर्जन। एक बड़ी चीर-फाड़, बहुत सारा खून और फिर एक जीवन को संभव बनाता दृश्य। समाज को बेहतर बनाने का उपक्रम करता कवि। अपने समय के सच को फटकार कर कहता कवि। जोखिम उठाता कवि। मैं यह सब कह क्या रहा हूँ ? यह सब कहने की कोई जरूरत थी ? भला मुक्तिबोध का नाम लेने की क्या जरूरत थी ? केदार जी तो उस पंक्ति में हैं ही नहीं। क्या इसलिए कह रहा हूँ कि उनके अनुयायी बल्लियों उछल रहे हैं ? उछलें न क्या फर्क पड़ता है ? केदार जी से भला मुझे क्या ईर्ष्या ? वे अस्सी के मैं साठ के करीब ? बंगाली जी उनकी बड़ी इज्जत करते थे, भला उनके प्रति मेरे मन में असम्मान कहाँ से आ सकता है ? बंगाली जी की आत्मा मुझे डाँटेगी। मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकता। हाँ, यह जो कुछ कह रहा हूँ सिर्फ पुरस्कार को लेकर फैली महामारी के बारे में कह रहा हूँ। केदार जी का बहाना है, बस। ‘साहित्यिकमुक्ति का प्रश्न उर्फ इस पापागार में स्वागत है संतो’ में पुरस्कार से मुक्ति की बात कर चुका हूँ, पर वह बात केदार जी जैसे लोगों के लिए नहीं के बराबर और नये लोगों के लिए ज्यादा है। अखबार के लोग गँवरई करें तो बात समझ में आती है कि उन्हें कविता समझ में नहीं आती है, वे छोटे-बड़े पुरस्कारों के आधार पर ही किसी कवि का मूल्य तय करते हैं, लेकिन जब कविता करने वाले लोग ऐसी गँवरई करते हैं तो तकलीफ होती है। कहना सिर्फ इतना है कि यह नासमझी है कि ज्ञानपीठ पाने से या कोई भी पुरस्कार पाने से केदार जी हो या कोई भी कवि वह बदल नहीं जाता है। उसकी कविता जितनी अच्छी या खराब रहती है, पुरस्कार के बाद भी उतनी ही अच्छी या खराब रहती है। किसी कवि की कसौटी पुरस्कार नहीं उसकी रचनाएँ होती हैं। केदार जी को अच्छा कहें या बड़ा कहें, उनकी रचनाओं के आधार पर कहें। पुरस्कारों के आधार पर कवियों की पूजा साहित्य की सबसे बड़ी नासमझी है।
      कर्णसिंह चौहान की दो पुरानी पोस्ट से बात खत्म करना चाहता हूँ -
‘ पहली पोस्ट :
पुरस्कार प्रकरण
साहित्यिक भ्रष्टाचार के स्रोत
1-पुरस्कार लेना गलत है।
2-पुरस्कार देना गलत है ।
3-पुरस्कार समितियों में होना गलत है ।
4-पुरस्कारों पर बधाई देना और लेना गलत है ।
5-पुरस्कारों पर चर्चा करना गलत है
ये सब साहित्य में भ्रष्टाचार के स्रोत हैं ।
दूसरी पोस्ट :
पुरस्कार राशि का सदुपयोग
1-जितने सरकारी, अर्द्ध सरकारी, स्वायत्त और निजी पुरस्कार हैं - केंद्रीय, राज्य स्तरीय, स्थानीय, व्यक्तिगत - उनकी राशि को केन्द्रीय, राज्य स्तरीय, स्थानीय साहित्य कोषों में जमा कराना चाहिए ।
2- इस राशि को साहित्य और संस्कृति के विकास की योजनाओं पर खर्च किया जाना चाहिए ।
3- इस राशि में से आर्थिक रूप से विपन्न मसिजीवी लेखकों और कलाकारों को नियमित सहायता दी जानी चाहिए । इसी में से बीमार पड़ने पर बिना सरकार के आगे हाथ फैलाए उनके इलाज का बंदोबस्त होना चाहिए ।
4-इस राशि में से लेखकों-कलाकारों के लिए भारत भर में ऐसे भवनों, स्थलों, रिजार्टों का निर्माण होना चाहिए जहां वे जाकर रचना-कर्म कर सकें या अवकास ले सकें ।
5-इससे पुस्तकालयों, पत्र-पत्रिका संग्रहालयों, गोष्ठी कक्षों का जगह-जगह पर निर्माण होना चाहिए ।
        अगर साहित्यिक भ्रषटाचार का स्रोत बनी यह राशि पिछले 65 साल में इन कोषों में जमा होती और इन बुनियादी कामों पर खर्च होती तो अब तक एक व्यापक, सुंदर, साहित्यिक परिवेश का निर्माण हो गया होता । व्यक्तिगत पुरस्कारों के रूप में बांटकर उनका कितना सदुपयोग हुआ यह निश्चित करना मुश्किल है ।’
       मैं तो साहित्य का यहाँ का सबसे बुरा आदमी हूँ, मेरी बात खराब हो सकती है, पर कर्णसिंह जैसे तमाम मित्र जो कह रहे हैं, क्या वह भी खराब बात है ? पुरस्कारवादी या कामी जो कर रहे हैं करते रहें, मेरी शुभकामनाएँ उनके साथ हैं, ईश्वर करें कि पुरस्कारवादी मित्रों को साहित्य में बहुत यश और सुदीर्घ जीवन मिले।



रविवार, 8 जून 2014

खूब मिले गुरुभाई

-गणेश पाण्डेय

प्रिय शिष्य होना सबके भाग्य में नहीं होता है। प्रिय शिष्य बहुत अच्छा भी हो सकता है और बहुत खराब भी। जाहिर है कि यहाँ अच्छा योग्य के अर्थ में है। अच्छा शिष्य अपने गुरु का मान बढ़ाता है तो खराब शिष्य घटाता है। मान बढ़ाने से आशय गुरु के काम को आगे ले जाने से है, न कि फूलमाला पहनाने और हरवक्त जयकार करने से है। खराब शिष्य तो ऐसे-ऐसे मौकों पर गुरु का नाम ले लेते हैं, जहां नहीं लेना चाहिए। गुरु का मान कहीं कम हुआ हो तो भी उसे सार्वजनिक उस दशा में नहीं करना चाहिए कि अपमान का प्रतिकार होने की जगह और बढ़ जाय। दुर्भाग्यवश मैं यहां प्रिय शिष्य नहीं बन पाया तो इसमें दोष किसी गुरु का नहीं था, मुझमें ही रही होगी कोई कमी। कुछ गुण कम रहे होंगे, उनसे जो प्रिय थे। भले मैं कुछ अच्छा नहीं कर पाया, पर कुछ गुरुओं का कुछ प्रेम तो मुझे भी मिला। गुरु कभी मुक्तमन या स्वेच्छा से किसी खराब से खराब शिष्य को अप्रेम नहीं देता है। मनुष्य जीवन में ऐसे क्षण कभी भी और कही भी आ सकते हैं, जब कोई बड़े से बड़ा ज्ञानी भी एक क्षण के विवेक से शिथिल हो जाय। चूक कहां नहीं होती है। चूक को मैं पाप नहीं मानता। हां जानबूझकर हो तो बुरा मानता हूँ, पर मेरे जीवन में ऐसी कोई बात किसी गुरु की ओर से रही हो, मुझे स्मरण नहीं। यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे शोध में गुरु के रूप में श्रद्धेय रामदेव शुक्ल जी मिले। आज स्मरण कर रहा हूं तो इस प्रयोजन के साथ कि इधर कुछ लोगों ने जानबूझकर उन्हें दुख पहुंचाने के लिए उनके नाम का उल्लेख मेरी गुरु सीरीज की कविताओं के साथ किया है। विभाग में जब भी ऐसी कोई बात आयी तो मैने तुरत प्रतिवाद किया कि नहीं ऐसी बात नहीं, मेरे तो दस गुरु हैं। आशय यह कि किसे कविताओं में ढँ़ूढ़िएगा ? यह भी स्पष्ट करता कि यह कविता तो सत्ता के प्रतिरोध में है। सत्ता चाहे अकादमिक दुनिया की हो या समाज, धर्म या राजनीति, किसी भी दुनिया की। मैं मजाक में भी किसी को अपने गुरु के बारे में ऐसा कुछ कहते पसंद नहीं करता था। मेरी आखों से अपने गुरु रामदेव जी का वह पोस्टकार्ड कभी ओझल नहीं होता, जब उन्होंने मेरे जीवन में आयी एक दुख की घड़ी में लिखा था कि तुम पैसे की चिंता मत करो, शोधप्रबंध जमा हो जाएगा, आ जाओ। भला ऐसे गुरु के प्रति कभी असम्मान का भाव मन में आ सकता है ?
     साहित्य में कुछ करने की वजह से सभी गुरुओं के साथ एक लोकतांत्रिक या कह लें कि आलोचनात्मक रिश्ता भी बना। यह आलोचनात्मक दृष्टिकोण केवल साहित्य संबंधी सहमति या असहमति को लेकर होता है। यहां भटकने का खतरा है, इसलिए उस बेहद जरूरी हस्तक्षेप के लिए ध्यान खींचना चाहूंगा कि गुरु सीरीज के बारे में आचार्यगण ऐसी किसी नासमझी की बात न करें कि यह अमुक पर है या अमुक पर। उस सीरीज में एक कविता है-गुरु से बड़ा था गुरु का नाम-
गुरु से बड़ा था गुरु का नाम
सोचा मैं भी रख लूँ गुरु से बड़ा नाम
कबीर तो बहुत छोटा रहेगा
कैसा रहेगा सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
अच्छा हो कि गुरु से पूछूँ
गजानन माधव मुक्तिबोध के बारे में।
पागल हो, कहते हुए हँसे गुरु
एक टुकड़ा मोदक थमाया
और बोले-
फिसड्डी हैं ये सारे नाम
तुम्हारा तो गणेश पाण्डेय ही ठीक है।
   इस कविता में जिस गुरु के बड़े नाम का उल्लेख है, उसके लिए ऐसे नाम की ओर देखने की जरूरत क्यों नहीं हुई, जिसके नाम में सबसे ज्यादा अक्षर हों या शब्द हों। विश्वनाथ जी का नाम बड़ा है ही, फिर उन्हें लक्ष्य क्यों नहीं किया गया ? क्या इसलिए कि उन्हें ऐसी असहज स्थिति में उनकी टीम के छुटभौये उन्हें खड़ा करेंगे तो उनका मान घट जाएगा ? मेरे कहने का आशय यह नहीं कि है कि उन्हें देखें। यह इस कविता के साथ अन्याय है कि आप उसे किसी व्यक्ति के साथ जोड़कर देखें। अन्याय ही नहीं, बल्कि कमअक्ली भी। विश्वनाथ जी में कुछ अच्छा है तो कुछ खराब भी। सबके साथ ऐसा होता है। कई बार मैं ऐसे खराब को आंतरिक विवशता के रूप में देखता हूं। जीवन में ऐसा बहुत कुछ होता है कि हम अपने प्रिय या अत्यंत उपयोगी के लिए बहुत योग्य को भी दूर रखते हैं। ऐसी दुर्बलता कहाँ नहीं है ? आंतरिक विवशताओं के विस्तार में नहीं जाना है। हाँ, वहाँ जरूर विरोध होता जब आप ऐसे अपात्र को अपने साहित्यिक उत्तराधिकारी की जगह देने लगते हैं। इस शहर में कोई कविसीढ़ी बनी, कोई कविक्रम बना तो किसे कहाँ रखेंगे ? जाहिर है कि कोई इसमें कोई बड़ा उलट-फेर नहीं कर सकता है ? कोई लाख उछल-कूद करे, लेकिन जब बाहर से आने वाले पचास से कम उम्र के साधारण कवियों को कवि के रूप में बहुत आदर देगा तो किस मुँह से और किस ताकत से मुझे या किसी को फूंककर उड़ा देगा ? मैं अधिक महत्व का अधिकारी नहीं हूँ। कोई किसी को न तो बड़ा बना सकता है, न छोटा। काम खुद बोलता है। काम का बोलना बेवकूफी का बोलना या मुँह इत्यादि का बोलना नहीं होता है। यह सब इसलिए कह रहा हूँ कि गणेश पाण्डेय तो शुरू से ही विरोध का अभ्यस्त है, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई उसे क्या कहता है, उसे फर्क तब पड़ता, जब उसका काम बोलता नहीं। मेरे बारे में जो बोलना है, सब बोल सकते हैं। जहाँ जरूरी होगा कुछ कहूँगा, जहाँ नहीं जरूरी होगा, बताकर अलग हो सकता हूँ। हाँ यह जरूर चाहता हूं कि मुझे छोटा बनाने में अपनी सारी शक्ति खर्च करने वाले आचार्य या लेखक-अलेखक किसी एक गुरु को पीड़ा पहुंचाने का काम और किसी की महानता के गुण गाने का काम न करें। बंद करें यह सब। इसलिए गुरु सीरीज की कविताओं से भयभीत रहने वाले लोग उस कविता को जितना चाहें बदनाम करें, बस उस कविता के नाम पर किसी गुरु को पीड़ा न पहुँचाएँ। ऐसा इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि महान बनने की कोशिश कर रहा हूँ। अपनी कविता के बारे में मैं बेहतर नहीं बता सकता तो और कौन बताएगा ? सच तो यह कि गुरु सीरीज की कविताओं में सतह के नीचे की सारी हलचल के केंद्र में तो गुरुभाई हैं, हिन्दी के असली कापुरुष तो यही हैं, पर इतनी हिम्मत उन लोगों में कहाँ हैं कि वे लोग बताएं कि कौन-कौन हैं और हिन्दी की दुनिया में उनका असली चरित्र क्या है ? वे बता नहीं सकते हैं, क्यों कि वे खुद उसी टीम का हिस्सा हैं -
कैसे हो सकता था
कि जो गुरु के गण थे, नागफनी थे
जड़ थे, कितने कार्यकुशल थे।
आगे रहते थे, निकट थे इतने
जैसे स्वर्ण कुंडल, त्योरियाँ, हाथ।
क्या खतरा था उन्हें मुझसे
तनिक भी दक्ष नहीं था मैं
निकटता का पाठ मेरे कोर्स में था ही नहीं।
क्यों रोकते थे वे मुझे कुछ कहने से
जरूर हुई होगी कोई असुविधा
इसी तरह वैशम्पायन के गुरुकुल में
याज्ञवल्क्य से।
000
खूब मिले गुरुभाई
सन्नद्ध रहते थे प्रतिपल
कुछ भी हो जाने के लिए
मेरे विरुद्ध।
बात सिर्फ इतनी-सी थी
कि मैं कवि था भरा हुआ
कि टूट रहा था मुझसे 
कोई नियम
कि लिखना चाहता था मैं 
नियम के लिए नियम।
   बहरहाल मैं अपनी कविताओं की व्याख्या नहीं करना चाहता। जानबूझकर किसी एक गुरु को दुखी करने की कोशिश के विरुद्ध बस हस्तक्षेप करना था, सो कर रहा हूँ। क्योंकि कुछ लोग  काव्यानुभव और जीवनानुभव की बात तो करते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि काव्यानुभव कोई आकाश से नहीं झरते हैं, जीवनानुभव की गीली मिट्टी ही पककर काव्यानुभव बनती है। असल में ये आचार्य ऐसे कवियों की पूजा अधिक करते हैं, जिनके पास अपना जीवनानुभव कम होता है, बाहर के काव्यानुभव को ही अपने परिवेश में ढ़ाल लेते हैं। आज हिन्दी के बड़े समझे जाने वाले कितने कवियों के पास ऐसी कविताएँ हैं, जिन्हें लिखने में कोई जोखिम रहा हो। जीवनसंघर्ष में जिन्होंने साहित्य की स्थानीय सत्ताओं और केंद्रों का विरोध किया हो। प्रमोटी कविसंघ के सदस्य या अध्यक्ष न रहे हों ? यह सब इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि ऐसा करने से कोई बड़ा कवि बन जाता है, इसलिए कह रहा हूँ कि बड़ों के पीछे-पीछे चलने वाले छुटभैये उनकी उन कमजोरियों को भी जान सकें जो छिपाकर रखी जाती हैं। ये आचार्य न तो कविता की आंतरिक संगति या तर्क को समझ पाते हैं और न कविता की शक्ति को। इन्हें यह भी नहीं पता होता है कि किसी छोटे दुख से भी बड़ी या अच्छी कविता संभव हो सकती है और किसी बड़े दुख की कविता भी खराब बन सकती है। जिनके पास खुद की कोई भाषा नहीं होती, वह भला किसी लेखक की भाषा को कैसे जान सकता है। 
      मित्रो अघाये हुए लोगों की भाषा और रोटी के लिए संघर्ष करने वालो की भाषा का फर्क समझना चाहिए। मैंने भले खराब कविताएँ लिखी हों, पर किसी की गोद में या चरणों में बैठकर यह सब निश्चिंत भाव से नहीं किया है। कहीं कहा है कि यह सब एक हाथ में हिन्दी के राक्षसों से लड़ने के लिए तलवार और दूसरे हाथ में कलम लेकर कविताई की है। कई साल संघर्ष किया है। विश्वविद्यालय में दूसरा शिक्षक संगठन खड़ा किया, एक नहीं तीनबार स्कूटर दुर्घटना में मरने से बचा। मैं भी अमुक जी या ढमुक जी का पिछलग्गू या लठैत बन जाता तो साहित्य में भी कुछ हलवा-पूड़ी पाता रहता। कहना जरूरी है कि हिन्दी के आचार्य लठैत बनना अधिक पसंद करते हैं, वीर बनना कम। लठैत बनकर दाना-पानी और आफत से छुटकारे की पक्की व्यवस्था रहती है। जिसका चाहो सर फोड़ दो। कोई स्वाधीन लेखक हो या चोर-उचक्का, क्या फर्क पड़ता है। बस मालिक के सामने दुम दबी रहनी चाहिए। मालिक का नाम लेते रहना चाहिए। वीर मूल्यजीवी होता है। किसी अर्थपूर्ण मकसद के लिए संघर्ष करता है। साहित्य के अँधेरे को दूर करने के लिए। गंदगी साफ करने के लिए, न कि गंदगी करने के लिए। मुझे एक वीर का क्षणिक जीवन भी प्रिय है, किसी का लठैत बनने से अच्छा है, चुल्लूभर पानी की खोज करना। साहित्य में कभी किसी के साथ संबंध निभाने के लिए समझौता नहीं किया। अरविंद त्रिपाठी मेरे मित्र हैं, उनकी कमियों पर भी खुलकर कहा और उन्होंने कभी भी अवयस्क या अलोकतांत्रिक व्यवहार नहीं किया। इसलिए कि अरविंद जी लेखक हैं, हिन्दी के अहंकारी आचार्य नहीं। किताबों के रटने का अहंकार नहीं, रचने का अभिमान है, बल्कि आश्वस्ति है। एक लेखक कभी जीवन की आपाधापी में आंतरिक विवशता की वजह से निकृष्ट पर बहुत उपयोगी लोगों के साथ जुड़ा रह सकता है, लेकिन अगर वह सच्चा लेखक है तो उस निकृष्ट व्यक्ति की नाराजगी के बावजूद किसी सच्चे लेखक से रिश्ते की एक खिड़की जरूर अपने पास रखता है। गुरुओं में भी ऐसे लेखक हों तो आश्चर्य नहीं। उदाहरण के लिए बाहर जाने की जरूरत नहीं। अलबत्ता यहाँ सब लेखक ऐसे नहीं हैं। ज्यादातर लेखक साहसी नहीं हैं। विश्वविद्यालय के आचार्यों से बहुत डरते रहे हैं। शायद यह देश का पहला शहर होगा जहाँ के लेखक अपने शहर के अलेखकों से डरते होंगे। लेखक बनना उतना ही अच्छा है जितना अच्छा एक शिक्षक बनना है या एक अच्छा पाठक बनना है, लेकिन अलेखक बनकर साहित्य के परिसर में लठैती करना सबसे खराब काम है। ये अलेखक कई बार आयोजक, प्रशंसक इत्यादि की भूमिका में शहर के लेखकों को प्रभावित करने लगते हैं। शहर के वे लेखक जो भीतर से कमजोर होते हैं, साहित्य की स्थानीय सत्ता और उसके लठैतों के डर में जीने लगते हैं। हजार डर होते हैं, ऐसे लेखकों के पास, हाय ये मेरा नाम नहीं लेंगे, हाय ये मुझे कविता पढ़ने के लिए नहीं बुलाएंगे, इत्यादि। हद तो यह कि ऐसे भयभीत लेखक शहर की साहित्यिक वरिष्ठता साहित्य में काम से तय नहीं कर पाते, बल्कि विश्वविद्यालय की नौकरी की वरिष्ठता को ही प्रमाण मानने लगते हैं। हद है या नहीं ? जाहिर है, ऐसे लेखक भला किसी निडर लेखक को क्यों पसंद करेंगे ? बहरहाल उनसे कोई शिकायत नहीं कि उन्होंने साहस का पथ क्यों नहीं चुना, लेकिन संतोष की बात यह है कि इसी शहर में कुछ ऐसे लेखक भी हैं जो एक सीमा में ही सही अपने हिस्से का सच कहने की कोशिश करते हैं। उनसे मिलकर अच्छा लगता है, उनसे बात करके अच्छा लगता है। अब ऐसे लोगों के विरोध से कोई फर्क नहीं पड़ता, जो खुद विरोध के काबिल नहीं हैं। कभी-कभी अपने जीवन को लेकर यह अनुभव जरूर होता है कि आखिर मुझे यहाँ कैसा जीवन मिला जो पाता ही आया विरोध-धिक जीवन जो पाता ही आया विरोध। ऐसी पंक्ति की रचना करने वाले महान लेखकों के चरणों की धूल भी नहीं हूँ मैं, लेकिन जीवन तो यहाँ कुछ-कुछ वैसा ही जिया। वीरता का एक कण भी कहीं पा सका तो बहुत है। उसी कण के सहारे कट जाएगी जिन्दगी। मुझे अपनी कविता से कोई पुरस्कार नहीं चाहिए।
    कविताएँ हमेशा पुरस्कार ही नहीं दिलातीं। कभी-कभी दण्ड भी दिलाती हैं। जब्त कर ली जाती हैं या जेल होती है। मैं जानता हूँ कि अपने पहले संग्रह में गुरुसीरीज की कविताओं की वजह से साहित्य की दुनिया में मुझे वनवास का दण्ड मिला है तो सिर माथे पर। कौन कहता है कि कविताएँ कुछ नहीं करती हैं ? कमजोर कवियों की कविताएँ अलबत्ता कुछ नहीं करती हैं। बहुत हुआ तो पुरस्कार की सूली पर लटक जाती हैं, बस।







मंगलवार, 20 मई 2014

बाबू बोलता प्रसाद राय का निजी काव्यशास्त्र

-गणेश पाण्डेय

कई दिनों से माठा कर दिया है। बोलते है तो बोलते ही रहते है, बिना कुछ विचारे। यह नहीं सोचते कि थूक किस पर रहे हैं, जिस पर थूक रहे हैं, उसके नीचे तो नहीं खड़े हैं कि ऊपर थूकते समय सारा का सारा थूक अपने ही मुंह पर पड़ रहा है। चूंकि हिन्दी में ऐसे थुक्काचार्यों की कमी नहीं है, जो बिना कोई काम किये दूसरे को छोटा बनाने के लिए व्यग्र रहते हैं। हिन्दी के पत्रकार भी कम महाचूतियापा नहीं करते हैं, ऐसे बोलता प्रसाद राय जैसे लोगों को अपने अखबार की शोभा बनाते रहते हैं, इसलिए ऐसे लोग लेखक की कुर्सी पर बिना टिकट बैठ जाते हैं और बैठे रहते हैं। साहित्यकार बने फिरते हैं। चूंकि यह एक प्रवृत्ति है, इसलिए एक ऐसे ही बोलता प्रसाद राय की अनमोल और अखण्ड, बल्कि वज्रमूखर्तापूर्ण बातों की चर्चा इस कथा में।
      बोलता प्रसाद राय चूंकि धज के मामले में डायनासोर से तनिक ही कम हैं और नासमझी के मामले में मूसक प्रसाद के सगे छोटे भाई, इसलिए उनकी बातों से तनिक भी नाराज न होते हुए हजार व्रत कथाओं की तरह बोलता प्रसाद राय की एक कथा कहता हूं। बोलता प्रसाद राय क्षण-प्रतिक्षण एक स्वप्न देखते रहते हैं कि जब वे हिन्दी के हमारे समय के बाहर और यहां के सभी बड़ों के अंगरखे के भीतर घुसे रहते हैं तो वे गोबर गणेश नाम के इस शहर के लेखक से बड़े क्यों नहीं ? क्या हुआ जो गोबर गणेश के पास चार कविता संग्रह है, एक कहानी की किताब है, दो उपन्यास है, आलोवना की एक किताब है और ढ़ेर सारे पठनीय लेख हैं, गोबर गणेश का कोई गॉडफॉदर तो नहीं है, वह किसी लेखक संगठन इत्यादि में तो नहीं है, साहित्य की सत्ताओं का फेरा तो नहीं लगाता है, फिर कैसे बोलता प्रसाद से बड़ा है ? क्यों बड़ा है? बोलता प्रसाद ने अपने जीवन काल में बाहर और यहां के लेखकों की हजार धोतियों, पाजामों इत्यादि को धुला है और नगर संचालक के रूप में विख्यात हैं, अपने संस्थान के प्रभावशाली लोगों के रत्नों में शुमार है तो गोबर गणेश से श्रेष्ठ क्यों नहीं ? क्यों इस आभासी दुनिया में लोग गोबर गणेश को मान देते हैं, प्यार करते हैं और उसे नहीं पूछते हैं ? उसे गोबर गणेश के गद्य से परेशानी है कि बिना अपने समय के किसी महान या महानों का अंगरखा इत्यादि धुले ऐसा गद्य लिखता है ? उनकी मुश्किल यह है कि उन्होंने हिन्दी आलोचना के बीज शब्दों की कई किताबों को घोलकर पी रखा है और निरंतर उन्हीं शब्दों की उल्टी करता रहते है और लोग हैं कि उन्हें आलोचक नहीं समझते हैं। उन्हें आलोचक अरविंद त्रिपाठी के समकक्ष या उनसे अधिक क्यों नहीं जाना जाता ? दिल्ली के एक वर्तमान महाकवि का स्थानीय प्रधान सेवक होने के बावजूद काव्यालोचक की कुसी उन्हें  क्यों नहीं मिली ? आलोचना का बच्चा पुरस्कार भी क्यों नहीं मिला ? क्यों गोबर गणेश संस्थान के प्रभावशाली आचार्यों के पीछे-पीछे बोलता प्रसाद राय की तरह दुम दुबाकर नहीं चलता है ? इसी तरह के हजार दुख हैं बोलता प्रसाद राय के। यह भी कि बोलता प्रसाद के सामने बाहर के अच्छा लिखने वालों की तारीफ क्यो ंकर देता हूँ ? क्यों कह देता हूँ कि अमुक विषय पर बोलता जी, शिरीष और अशोक जैसे युवा आपसे खराब नहीं बोलेंगे ? आशय यह कि आपसे अच्छा बोलेंगे। पाठक स्वयं जान सकते हैं कि कुंठा और हताशा की मनोदशा में किस तरह के लोग रहते हैं ? सोचिए कि कहीं किसी जगह एक युवा कवयित्री के संग्रह पर मैं दो शब्द कह रहा हूँ, कुछ अच्छा कह रहा हूँ। अलबत्ता इस माध्यम पर आठ-दस दिन अनुपस्थित रहने के बारे में भी थोड़ा-सा सफाई जैसा कुछ और वह भी कोष्ठक में कहकर आगे बढ़ जा रहा हूँ। कवयित्री की कविताएँ रख रहा हूँ। ध्यान दीजिए कि ऐसे ही एक बोलता प्रसाद राय उस पोस्ट पर फाट पड़ते हैं हरहराकर दौड़ते हुए साँड की तरह। न जगह देखते और न अवसर, बहुत अपमानजनक भाषा में शास्त्रार्थ शुरू कर देते हैं। कहते हैं कि पाण्डेय जी टेबल पर मुक्का मार-मारकर बात करने की मनोदशा में न पहुँच जाएँ तो कुछ अर्ज करना चाहता हूँ। शुरू में ही पाण्डेय जी को मनोरोगी कहते हैं, असामान्य कहते हैं। नासमझ और असंयत कहते हैं। सोचिए भला कैसा लगेगा ? अर्ज भी साहब बिल्कुल साँड़ाना अंदाज में करते हैं कि बताइए कि अनगढ़ता कविता की लय में कभी-कभी वेग को तीव्र करके कविता के सौदर्य को बढ़ाती कैसे हैं ? आगे दूसरी टिप्पणी में ज्ञान-मीमांसा की बात करते हैं। उन्हें संदर्भ चाहिए, फुटनोट चाहिए। जैसे मैं उस कवयित्री की किताब पर शुभकामना के शब्द नहीं कोई शोधपत्र लिख रहा हूँ। बहरहाल वह भी बुरा तो था पर ज्यादा बुरा नहीं था, लेकिन सबसे बुरा यह था कि उन्होंने एक पंक्ति में जानने की गरज से यह नहीं पूछा। अपने ज्ञान से साँड की तरह उठाकर पटक देने के लिए कि लो मैं काव्यशास्त्र पढ़ाता हूँ तो मैंने कुछ पढ़ रखा है, लय को जानता हूँ। यह बात कितनी बेवकूफी की है कि कोई अध्यापक यह सोचे कि वह लय जानता है और कवि जो कविता करता है वह उससे कम लय जानता है या उसके सामने घास छीलता है, पानी भरता है। जबकि अहंकार में डूबे बोलता प्रसाद राय जैसे लोग यह नहीं जानते हैं कि लय ही नहीं हिन्दी कविता  और आलोचना की भाषा को वे कवि ऐसे बोलता प्रसाद राय जैसे लोगों से बेहतर जानते हैं, वे कवि भी जिन्होंने विद्यार्थी के रूप में हिन्दी की विधिवत या संस्थागत शिक्षा नहीं ली है। इतना ही नहीं विज्ञान के विद्यार्थी रह चुके हिन्दी के कई युवा कवि ऐसे बोलता प्रसाद राय जैसे लोगों से अधिक हिन्दी संवेदना और काव्यशास्त्र जानते हैं। अधिक यहां भूसे के मंडीले के अर्थ में नहीं है। गुणवत्ता के अर्थ में है। हो सकता कि नाम भी पूछा जाए कि बताइए कौन युवा कवि है जिसकी हिन्दी कविता और आलोचना की समझ ऐसे बोलता प्रसाद राय जैसे लोगों से अच्छी है। उदाहरण माँगने वालों के लिए पहले से एक उदाहरण दे देना चाहिए। दूर का नहीं भाई, यहीं का बिल्कुल पास का। अपने विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातकोत्तर करने वाले युवा कवि नील कमल का नाम लेता हूँ और कहता हूँ कि इस कवि के पास कविता की भाषा की समझ ही नहीं, आलोचना की भाषा की समझ भी बोलता प्रसाद राय जैसे लोगों से बहुत अच्छी है। नील ही नहीं, और भी है। केशव तिवारी कामर्स के विद्यार्थी रहे हैं, अशोक अर्थशास्त्र के, पर क्या ये कविता की भाषा और आलोचना की भाषा बोलता प्रसाद राय जैसे आचार्यों से कम जानते हैं ? हिन्दी के समकालीन परिसर में ही युवा कवियों में अरुण देव, शिरीष कुमार मौर्य, जितेंद्र श्रीवास्तव, महेश पुनेठा आदि की समझ और भाषा ऐसे आचार्यों से अच्छी है। जबकि ये नाम बोलता प्रसाद राय जैसे लोगों से कोई दस-पन्द्रह साल छोटे हैं।  उम्र में काफी छोटे और शिष्य, यहीं अपने विभाग के दीपक प्रकाश त्यागी की ही आलोचना की भाषा ऐसे बोलता प्रसाद राय जैसे आचार्यों से कहीं अधिक अच्छी है। समझ भी। संपादक के रूप मेंं कृतियों की अच्छी पहचान है। दुर्भाग्य यह कि साहित्य में झोलाछाप आलोचकों और आलोचना के दलालों का धंधा ऐसे ही बोलता प्रसाद राय जैसे लोगों की वजह से चल निकला है। कुछ और अच्छा और मूल्यवान लिखने की जरूरत ही क्या है जब स्थानीय पत्रकार कोई लेख देखे बिना ही युवा आलोचक के रूप में नाम छापने लगते हैं और अखबार में नाम देख-देखकर यह भ्रम हो जता है कि मैं तो आलोचक बन गया। अखबारों में नाम और बड़े नामों के सेवक पद का मद सिर पर चढ़कर बोलता है। किताब रटने के अहंकार में डूबे बोलता प्रसाद राय जैसे कुछ लोग तभी उस सुंदर पोस्ट को तहस-नहस करने की साँड़ाना कोशिश करते हैं। असल में ऐसे साँड़ो के पुट्ठे पर मालिकों के नाम खुदे होते हैं। कई-कई नाम खुदे होते है। वे अपने उत्पात से अपने मालिकों के नाम भी रोशन करते हैं। भला बताइए कि उस युवा कवयित्री की पोस्ट में गोबर गणेश की कविता से क्या लेना-देना था। मैंने खुद ही खुद को गोबर गणेश कहा है कि वे क्या कहेगें जो गोबर से भी कमतर हैं। गोबर गणेश दरअसल ‘नरक का कवि हूँ’ कविता में आता है-

जिस नरक का कवि हूं
जिस शहर का कवि हूं
कई लालाओं का खसरा-खतौनी है
तो कई पंडिज्जियों का पोथी-पत्रा
कई बंदों की इबादतगाह है
कई ठगों का हिंदीबाजार है
कई का उर्दूबाजार
लालाजी हां
पंडिज्जी हां
नरक का कवि हूं तो हूं
कुछ भी नहीं हूं तो क्या
गोबर का गणेश हूं तो क्या
हूं तो हूं नरक का कवि हूं
लालाजी नहीं हूं तो क्या
पंडिज्जी नहीं हूं तो क्या
पानीपांड़े हूं तो क्या
हूं तो हूं
खुश तो हूं
नरक का कवि होने पर
यहां से वहां तक सिरपर
दुनियाभर का मैला ढ़ोने पर
लो देख लो लालाजी
हां-हां पंडिज्जी देख लो गौर से
खड़ा तो हूं सामने
थोड़ा-सा मैला निकालकर
चंदन की जगह पोत लो
लालाजी हां
पंडिज्जी हां।
         जानता था कि एक दिन नरक के ये बोलता प्रसाद राय जैसे आचार्य कहेंगे कि गोबर गणेश हूँ। गनीमत यह कि पंडिज्जी और लाला जी ने अपने मुखारविन्द से अभी ऐसा तो नहीं कहा, लेकिन आचार्य बोलता प्रसाद राय ने आखिर ऊचे सुर में अंग-अंग से बोला। बोला कि गोबर गणेश की कृतियाँ मेलाघुमनी टाइप हैं। कहा कि गोबर गणेश साहित्यकार नहीं है। साहित्यकार एक बड़ा मूल्यवाची शब्द है और उसकी मूल आत्मा की दृष्टि से गोबर गणेश साहित्यकार नहीं हैं। इतने पर भी आचार्य चुप नही हुए, कहा कि गोबर गणेश क्या उनके कई पूर्वज लोग भी इसके लिए उपयुक्त नहीं बैठते। मैंने सोचा भाई चलो बोलता प्रसाद राय से ही पूछ लते हैं कि यहाँ के विश्वनाथ जी, रामदेव जी, अनंत जी इत्यादि साहित्यकार हैं या नहीं ? कविता में मेरे यहां के पूर्वज देवेंद्र कुमार साहित्यकार थे या नहीं ? मेरी तो कविता ही है-
कई कवि देखे
कई तरह के कवि देखे
कोई मधुकर था यहाँ
कोई काला था कोई दिलवाला
कोई परमानंद कोई विश्वनाथ।
देवेंद्र कुमार को यहीं देखा
अपनी हीर कविता के लिए राँझा बनते।
यहीं देखा फक्कड़ अनंत को
क्विता राधा को देखते और देखते रह जाते।
यहीं जाना मैंने
क्या होता है कविता के लिए मर मिटना। (1996)
  कहना यह है कि क्या आलोचना के लिए मर-मिटना जरूरी नहीं होता है। आलोचना के लिए मर-मिटने का मतलब पुरानी शब्दावली और लहजे को पीकर वमन करते रहना नहीं है। आखिर छोटे सुकुल आलोचना की टोनहिन क्यों कहते हैं ? आचार्य बोलता प्रसाद राय को तो छोटे सुकुल से भी बहुत ईर्ष्या है। पहले मेलाघुमनी टाइप कृतियों की बात। छूट न जाए। राय साहब ने अपनी दिव्य दृष्टि से मेरी कृतियों को मेला घुमनी टाइप कहा है। जानना चाहता हूँ कि उनके गॉडफादर के गॉडफादर विश्वनाथ जी की कृतियाँ भी फिर तो मेला घुमनी टाइप हुईं या नहीं ? उनकी कृतियाँ महान कैसे हुईं ? विश्वनाथ जी हों या अनंत जी या खुद मैं महान कवि नहीं हैं, लेकिन मेलाघुमनी टाइप भी नहीं हैं। कम से कम अपने बारे में दावे के साथ कहता हूँ कि तीस-पैंतीस वर्ष हुए मैंने इस शहर में एकल काव्यपाठ नहीं किया है। ऐसा इसलिए कि दृश्य पर तमाम मूर्खताएँ होती रहीं हैं। कविता से प्यार करता हूँ। उन जगहो पर रहना पसंद नहीं करता जहाँ आप जैसे लोग कविता का अपमान करते हों। देवेंद्र कुमार बंगाली आज जीवित होते तो जापानी बुखार पर कविता पहले उन्होंने ही लिखा होता, मुझसे भी अच्छा लिखा होता। मैंने उनका छोड़ा हुआ काम किया है। बाबू बोलता प्रसाद राय आपने किसका काम आगे बढ़ाया है ? रामचंद्र तिवारी का या परमानंद श्रीवास्तव का  ? किया क्या है ? कुछ किया भी है या साहित्य में मुहल्ला स्तर की लफंगई की है ? लफंगई भी ऐसी कर पाए हैं कि मैनेजर पाण्डेय ने जैसे छोटे सुकुल के लेख पर आलोचना में कहा कि यह अब तक की हिन्दी आलोचना की सबसे बड़ी लफंगई है, ऐसा कुछ कहें ? जिसके अपनें हाथ होते हैं, वह अच्छा या अच्छाबुरा दोनों कर सकता। जिसके पास अपने हाथ नहीं होते हैं अर्थात अपनी भाषा नहीं होती है, आलोचना के मुहावरे नहीं होते हैं, अपनी शैली नहीं होती है वे आलोचना के नाम पर केवल भूसा छाप प्लास्टिक की आलोचना लिखते हैं। बेजान, बेस्वाद। ऐसे कई नकली आलोचक लोग हैं। असली आलोचना की भाषा पठनीय और सर्जनात्मक तथा आलोचक की छापयुक्त होती है। चाहे रामचंद्र शुक्ल की आलोचना भाषा हो या रामविलास शर्मा या नामवर जी की। सब साफ-साफ लिखते हैं। जलेबी नहीं बनाते हैं। बताइए साहब, मेरी कविताएँ मेलाघुमनी हैं। मेरा रीफ उपन्यास मेला घुमनी है! जिस पर शिरीष ने भावुक होते हुए एसएमएस किया कि ‘‘अधबिच में हूँ पर आने को रोक नहीं पा रहा हूँ।’’ दुख बोलता प्रसाद राय जैसे लोगों पर उतना नहीं जितना विश्वनाथ जी पर है कि आखिर आप के उपरत्नों मे ऐसे लोग क्यों हैं ? क्यों आपके नवरत्न अपने नवरत्नों में ऐसे लोगों को शामिल करते हैं जो स्वाभिमानी लेखकों का अपमान करते हैं ? ऐसे लोग आलोचक क्या आलोचना का द्वारपाल भी नहीं बन सकते जो निष्ठापूर्वक अपना काम करने वाले लेखकों का अपमान करते हैं। साहित्य की मुश्किल यह कि जिनके पास बचपन में करधन में आगे पहनने वाली चाँदी की एक गुल्ली टाइप चीज भी नहीं है वे आलोचना का शेर बनना चाहता हैं। किताबें तो दूर जिनके पास एक ढ़ंग का लेख तक नहीं है, जिसे विश्वनाथ जी ने पढ़ा हो।
     उस सुंदर पोस्ट पर टपक पड़ने वाले महाशय को समझाने के लिए पहली टिप्पणी है- आप मुझसे उम्र में सात साल छोटे हैं पर विद्या की दुनिया में काफी बड़े हैं। बहुत पढ़ा है आपने। एक गणेश पाण्डेय को छोड़कर इस शहर और बाहर के सभी समकालीन लेखकों को पढ़ा है। मैं तो आज की तारीख में यहाँ कुछ भी नहीं हूँ। मैंने कुछ किया ही नहीं है। मुझे छोड़कर आप सब ने सारा काम किया है। यह सब इसलिए कह रहा हूँ कि मुझे आपके समक्ष या आप जैसे आचार्यों के समक्ष अपने को रखने की जरूरत नहीं अनुभव करता। विश्वनाथ जी भी-जिनकी टीम में आप जैसे कई लोग हैं-मुझे यह नहीं कहेंगे कि मैं आप सभी आचार्यों से प्रमाणपत्र लूँ। आप पूछ लें यदि वे कह दे ंतो मैं उसी तरह निवेदन करूँ, जैसा आपने अपने नितांत सर्जनात्मक और मौलिक आलोचनात्मक गद्य में किया है। पहले मैंने भी अनुभव किया कि आपको कुछ न कहूँ और हँसकर टाल जाऊँ, पर यह भी लगा कि ऐसा करना आपके प्रति अनादर होगा, इसलिए एक शब्द कह रहा हूँ। दो शब्द इसलिए नहीं कि आपने पहली बार कुछ कहा है और पूरा दो शब्द कहा है। पूरा का पूरा दो अविस्मरणीय शब्द। आपके दो शब्द के उत्तर में सिर्फ एक शब्द। इसकी भी जरूरत नहीं थी, काम सिर्फ इस एक कविता से चल जाता, जो आपके समक्ष रखने की गुस्ताखी कर रहा हूँ। हाँ, दूसरी बार भी कुछ कहिएगा तो भी पच्चीस वर्ष के आपके जीवन  को देखने के बाद भी आपका सम्मान करूँगा। तीसरी बार निवेदन जरूर करूँगा। टूटा-फूटा। कविता देखें-पहले संग्रह की कविता है, पर आज भी कुछ कहती है-शीर्षक है- ‘‘वे युवा थे, पटु थे, आलोचक थे’’-
वे कोई हीरामन नहीं थे
जायसी नहीं थे वे कोई
कुछ भी नहीं थे वे
साफ-साफ।
कभी दिखते थे पट्टू जैसे
करते मृदु संभाषण
कभी तो लगते थे चुकंदर जैसे
अति विशिष्ट।
वे जहाँ-जहाँ जाते थे
जिस संगोष्ठी में, जिस समारोह में
अपना पिजड़ा साथ ले जाते थे
एक बाहर, एक भीतर।
असल में, उन्हें दो से कम
कुछ भी नहीं चाहिए था
दो जीवन, दो जबान, दो नाव
दो निष्ठा, दो से अधिक मैना।
वे युवा थे
पटु थे, राघव चेतन के रिश्ते में थे
रहते थे खबरों में शीर्ष पर
और उतने ही सक्रिय।
जबकि उनके पास
कुछ भी नहीं था उनका अपना
यहाँ तक कि उनकी वह कंठस्थ
भाषा भी।
असाधारण यह, कि
इसी शहर ने दिया था उन्हें
प्रज्ञा च्युत मान।
इसी के साथ स्नेह और आशीष का दोना भी। फेंक दीजिएगा तो भी बुरा नहीं मानूँगा। वे माने नहीं। फिर कुछ कहा। फिर कहना ही पड़ा- मैंने ऊपर कहा था कि विश्वनाथ जी से पूछ लीजिए कि आप जैसे आचार्य को कुछ बताने की जरूरत है या नहीं, लेकिन आपने पूछा नहीं। शायद आपको साहित्य में बिना कुछ मूल्यवान किये ही विश्वनाथ जी से बड़ा होने का भ्रम है। ऐसा इसलिए कहा था कि उन्हें इतना तो पता ही होगा कि आपका काम और मेरा काम किस प्रकार का है। वे जरूर कोई एक शब्द आपसे कहेंगे। आप तो खुद ही आत्ममुग्धता के शिकार हैं। साहित्य के अध्यापक हैं और यह नहीं जानते हैं कि आज का आलोचक किन शर्तों पर किसी का नाम लेता है और क्यों नहीं लेता है। इसी शहर के किन-किन लेखकों-अलेखकों ने किन-किन आलोचकों का चरणरज लिया है। आपसे बात करना इसलिए तकलीफदेह है कि आपने पहले खुद बड़े-बड़े आलोचकों और कवियों के साथ रहने के बाद आज की तारीख तक कुछ (अविस्मरणीय) नहीं किया है। यह कहता नहीं, लेकिन सिर्फ उदाहरण देने के लिए उल्लेख कर रहा हूँ। कहने का आशय यह कि साहित्य की दुनिया में अक्सर कई लेखक अपने समय में अपनी शर्तों अर्थात दूसरों का पाजामा-धोती साफ न करने की जिद की वजह से कई बार चर्चा और पुरस्कार की दुनिया से दूर रहते है। आप जैसे लोग यह मान ही नहीं सकते हैं कि आज साहित्य में कहीं कोई महाभ्रष्टाचार है। भला वे क्यों ऐसा मानेंगे, जो बिना टिकट उस रेल में सफर कर रहे ह, जिसमें उन्हें नहीं होना चाहिएं। मेरा कहा हुआ सबके सामने है। अपने बारे में भी मंथन कीजिए कि आपका कहा हुआ किसके सामने है ? विश्वनाथ जी के सामने है या नहीं ? मैंने विश्वनाथ जी और परमानंद जी की भी आलोचना की है, लेकिन तब जब कुछ टूटा-फूटा कर लिया है। आपको खुद के मूल्यवान और क्रांतिकारी लेखन को सामने लाना चाहिए। जरूर आपके पास मौलिकता का कोई अक्षयभंडार होना चाहिए, जिसे दुर्भाग्यवश  अब तक देखा नहीं जा सका है और जो देखा गया है, वह मेरी समझ से साहित्य का भयानक है। साहित्य का आत्मसंघर्ष तो आप जैसे लोगों के पास है, हम लोगों के पास भला क्या है ? कुछ कहना तो नहीं चाहिए, फिर भी कह रहा हूँ कि जो दूसरों की बेईमान चर्चा और तिकड़मी पुरस्कार की वजह से किसी को बड़ा समझते हैं वे लोग साहित्य के कीट-पंतग होते हैं। जो खुद की आँख से साहित्य को देखते हैं वे सच्चे आलोचक होते हैं। दुर्भाग्यवश आपने इसे नहीं समझा है। आपने इसे भी नहीं समझा है कि जब दिल्ली के आलोचना के दरबार में कोई बच्चा पैदा कर दिया जाता था तो यहां के आलोचकों को डिठौना लगा कर दे दिया जाता था और वे दाई की तरह उसका पालन-पोषण करते थे। मैं तो पचास की उम्र के बाद दिल्ली गया। गोरखपुर में किस तरह का जीवन जिया हूँ उसे देखने की आँख आपके पास होती ही तो आप वह नहीं कहते जो कह रहे हैं। आप जिसे आत्मप्रचार कह रहे हैं, उसके बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं है। मेरा एक लेख ‘आत्ममुग्धता का संसार’ देख सकते हैं। कई लेख हैं, एक तो ‘साहित्यिकमुक्ति का प्रश्न उर्फ इस पापागार में स्वागत है संतो’ ही है। असल में आप खुद अभी साहित्य के पुरस्कारवाद और पीछेचलवाद के प्रभाव क्षेत्र में हैं। कुछ कहना नहीं है, इसलिए कुछ कह नहीं रहा हूँ। सबसे कहा भी तो नहीं जाता है। फिर अगली टिप्पणी में कहना पड़ा-ऊपर काफी कुछ है। मेरी एक सीमा यह है कि आपसे उम्र में थोड़ा बड़ा हूँ, इसलिए अधिक कुछ नहीं। र्प्याप्त है। बस अंत में आपके के ही इस कथन पर आपका ध्यान ले जाना चाहूँगा कि साहित्य पढ़ाने वाला अपने को साहित्यकार समझने लगता है। आप ऐसा समझते हैं कि आप साहित्यकार हैं और मैं नहीं हूँ तो मुझे कुछ नहीं कहना है। क्यों कहूँगा, क्यों कि आप जैसे लोग साहित्यकार होंगे तो जाहिर है कि मेरे जैसे लोग साहित्यकार नहीं होंगे। इस शहर के बारे में आज तक कम नहीं कहा है, कहना कुछ-कुछ आता भी है। पहले कह  चुका हूँ कि सबसे कुछ कहा नहीं जाता है। रहा सवाल आपका तो विनम्रतापूर्वक, बल्कि शीश झुकाकर कहता हूँ आपको अपने बारे में अच्छा कहने के लिए सौ जन्म में योग्य समझना मेरे लिए मुश्किल है, पर हाँ, कम से कम इस जन्म में आपको अपने (मेरे) बारे में बुरा तक कहने के योग्य नहीं समझता। आप चाहें तो इत्मीनान के लिए विश्वनाथ जी से पूछ लें कि आप मुझे बुरा कहने के योग्य हैं। एक मजेदार संदर्भ यह कि उसी पोस्ट पर जब समीर कुमार पाण्डेय ने कुछ कहा तो उसके नाम की स्पेलिंग पर आ गये। साहित्य रट लेने से साहित्य का संस्कार और विवेक नहीं आता। साहित्य जीने से आता है। एक साधारण व्यक्ति भी जानता है कि नाम और नाम की स्पेलिंग माता-पिता रखते या लिखते हैं या स्पेलिंग बनाने-बिगाड़ने का काम स्कूल के पंडिज्जी करते हैं। क्या बोलता प्रसाद राय जैसे लोग जन्म लेते ही अपने नाम की वर्तनी शुद्ध करते हैं। समीर से कहा कि नाम बदलना चाहिए था। भला मैनेजर पाण्डेय से क्यों नहीं कहा कि नाम बदलना चाहिए था, अंग्रेजी में है या हिन्दी में प्रबंधक पाण्डेय करना चाहिए था। हजारी प्रसाद द्विवेदी से भी कुछ कहना चाहिए था। धूमिल, जवरीमल पारख, जितेंद्र कुमार आदि बहुत से लोगों से कहना चाहिए था। बहरहाल यह सब कहता नहीं, यदि बिना किसी दुर्भावना के सीधे-सीधे अनगढ़ता से लय में वेग की तीव्रता को लेकर खुलेमन से कुछ जानने की निर्मल इच्छा व्यक्त की गयी होती। बहुत आसान था उत्तर देना, पर शुरू में ही मेज पर मुक्का मार-मार कर जोर-जोर से बोलने वाले मनोरोगी के रूप में मेरा स्वागत किया गया, मेरी कृतियों को मेला घुमनी कहा गया, साहित्यकर्मी पद से वंचित किया गया, दो दिनों से भाग रहे हैं कहा गया, तो आखिर मैं क्या करता, यह सब न कहता ! क्या समय आ गया है, एक समय में नामवर जी बोलते थे तो जादू छा जाता था, उनकी अपनी भाषा होती थी, सत्यप्रकाश मिश्र बोलते थे या मैनेजर पाण्डेय बोलते हैं तो श्रोता की आँख में आँख डाल कर बोलते हैं, लगता ही नहीं था सामने बोलने की कोई मशीन है, जैसे खुद वाणी ने रूप धर लिया हो, जो बोलने की मशीन बन जाते हैं, उनकी कोई और पहचान नहीं बन पाती है, कोई नाम नहीं हो पाता है, अच्छा-खास आदमी सिर्फ बोलने की मशीन बन जाता है। जाहिर है कि ऐसी मशीनों के ही नाम बोलता प्रसाद राय होते हैं, किसी सचमुच के आदमी के नहीं। अच्छे लेखक की निजी छाप कलम पर ही नहीं, जुबान पर भी होती है। अंत में अनगढ़ता से लय में तीव्रता के बिन्दु का सवाल तो उनके ही सबसे प्रिय कवि केदार जी के सामने धूमिल का नाम लेता हूँ। एक में कविता की कीमियागीरी है तो दूसरे में अनगढ़ता। देखें कि धूमिल की कतिता में कितना वेग (बल) है। अंत में अपनी ही एक अनगढ़ कविता दूसरे संग्रह से ऐसे ही दिनों और इसी शहर के लिए लिखी गयी, तनिक बल इसमें भी है-‘जहाँ’
अच्छा हुआ
कि मैं वहाँ कम जाना गया
जहाँ थोड़े-से आदमी रहते थे
और चूहे बहुत ज्यादा।














रविवार, 18 मई 2014

टेंघती हुई अम्मा क्या चाहती है

-गणेश पाण्डेय

पके हुए आम हैं बाऊ जी
कुछ ठीक नहीं

ज्यों कोई पत्ता खड़केगा
बगिया की चुप्पी तोड़ते हुए
कंपकंपी छूटने लगेगी अम्मा को

अम्मा की धँंसी हुई और पियराई
आंखों में झाँक सको तो देखो
पके हुए मोतियाबिंद को भेदते हुए
घरेलू लड़ाइयों का जुझारू इतिहास

पेड़ की जड़ों में पानी देती हुई
जवानी के दिनों की हँसमुख
और छपेली साड़ियों की शौकीन अम्मा
किस गली में चंपत हो गयी अचानक

यह कौन है टेंघती हुई अम्मा
क्या चाहती है

पूछो-पूछो अपनी जेब से पूछो
अम्मा की गिरवीं पाजेब से पूछो

तिजोरी के आगे बेचारी पाजेब
अपना दुखड़ा सुनाये भी तो
सावजी की मर्जी के खिलाफ
भला कैसे हो सकती हैं तिजोरियां
टस से मस।

(1982)