शुक्रवार, 18 मई 2012

आलोचना को ईमान, साहस और धीरज की जरूरत है

 
                             -गणेश पाण्डेय
        आलोचना का प्राण है रचना। जैसे कोई प्राण के बिना जीवित नहीं रह सकता, ठीक उसी तरह रचना के बिना आलोचना का जीवन नहीं है। खबरदार, मेरा यह आशय कतई नहीं है कि आलोचना रचना से छोटी है या दूसरे दर्जे की चीज है। ऐसा नहीं है कि आलोचना के बिना रचना के जीवन की संपूर्णता की कल्पना की जा सकती है। मैथ्यू आनार्ल्ड के इस टुकड़ से बात और साफ हो जायेगी कि कविता जीवन की आलोचना है। आलोचना है क्या ? एक खास दृष्टि से चीजों को भेद कर देखना। यही काम एक रचनाकार भी करता है। एक कवि रोज अपने घर के सामने यूकिलिप्टस के लंबे-लंबे वृक्षों की कतार देखता है और रोज इन्हें सिर्फ एक पेड़ समझता है, एक दिन जोर की बारिश होती है और हवाएँ तेज चलती हैं, यूकिलिप्टस के पेड़ ऐसे झूमते हैं जैसे आसमान से बरसी शराब पीकर बेसुध हो गये हों और झूम रहे हों। इतना ही नहीं अपने बरामदे में दरवाजे से टिक कर खड़ा कवि एक खास तरह से जरा-सा झुक कर इस दृश्य को गौर से देखता है और सहसा उसे लगता है कि अरे ! यह गोराचिट्टा यूकिलिप्टस तो पूरा अंग्रेज है। कवि कविता लिखता है- छोड़ो भारत। कहना यह चाहता हूँ कि जैसे एक कवि रोज के किसी दृश्य को एक दिन कविता के विशेष दृश्य के रूप में देख लेता है, उसी तरह एक आलोचक भी कई बार किसी साधारण-सी रचना को असाधारण ढ़ंग से देख सकता है। बशर्ते उसमें भी कवि की तरह ईमानदारी और साहस और उतना ही धीरज हो। अन्यथा वह आलोचना को नित्य या क्षणप्रतिक्षण का कार्यक्रम बना देने के लिए स्वतंत्र है।
 तीन बातों को लेकर आगे बढ़ता हूँ- ईमानदारी, साहस और धीरज। जहाँ तक मैं समझ पा रहा हूँ, आलोचना में ठहराव या कि दुहराव की मुख्य वजहें यही तीन हैं। अब इस ईमानदारी की कमी की वजह के रूप में दो बातें देखता हूँ। एक तो लेखक का कविमुखी हो जाना या रचनाकार के ओहदे से बिल्कुल चिपक जाना। दूसरी बात है, स्वार्थ ओर आने वाले समय की जरूरतों की वजह से रचना का सच न कह पाना। एक रथ की कामना में महारथियों से डरते रहना। रचना और अपने समय के साहित्य का सच कहने का रत्तीभर साहस का न होना। तीसरी बात है, रेल के तत्काल टिकट की तरह अपनी आलोचना को जो आलोचना नहीं बल्कि रिव्यू है, उसके तत्काल किसी पत्रिका में छप जाने का लोभ संवरण न कर पाना ओर इसलिए बड़े अगंभीर ढ़ंग से जिसे कुछ लोग चलताऊ ढ़ंग से भी कहते हैं, लिख मारना। उसमें भी ईमान की जगह संबंधों की मजबूती पर बल देना, आलोचना को कमजोर तो करता ही है, आलोचक को भी कमजोर आलोचक बनाता है। कई मित्रों ने सिर्फ पुस्तक समीक्षाएँ ही लिखी हैं और उनको एकत्रित कर आलोचना की किताब बनाते रहे हैं। एक भी अपने समय की रचनाशीलता का शास्त्रीय विवेचन वाला लेख नहीं मिलेगा। रचना के तत्वों को सामने लाकर अपने समय की रचनाशीलता की पहचान तय करने वाला लेख। मेरा आशय पुराने काव्यशास्त्र के आचार्यों की तरह खण्डन-मण्डन में लगना नहीं है।
   हिंदी आलोचना की परंपरा को देखने से बहुत-सी बातें साफ होती हैं। यह अंभीरता या अधैर्य की समस्या के लिए हिंदी की आलोचना परंपरा में गंभीरता और बड़े धैर्य के साथ लिखी गयी आलोचना को खासतौर से रेखांकित किया जाना चाहिए। रामचंद्र शुक्ल यहीं बस्ती के थे ( जो पहले मेरा भी जिला हुआ करता था, अब नया बन गया है ) जानते थे कि सब धान बाइस पसेरी का नहीं होता है। इसलिए उन्होंने चुनाव किया और जो मूल्यवान थे उन पर बड़ी गंभीरता से लिखा जो आज भी व्यावहारिक समीक्षा का आदर्श है। जायसी होें चाहे तुलसी चाहे सूर। लिखने को तो इस दौर के भी कुछ आलोचकों ने अपने तिकड़म के हिसाब से चुन कर किसी एक कवि पर बहुत सारा और बहुत साधारण लिखा है, दूसरों पर भी सब धान बाइस पसेरी के हिसाब से ही लिखा है। यों कुछ बहुत बड़े कहे जाने वाले आज के एक आलोचक ने भी लिख कर नही ंतो बोल कर वही काम किया है। अब पूर्वाचल से जुड़े नामीगिरामी आलोचक ही जब ऐसा करने लगेंगे तो फिर दूसरे जगहों के बारे में क्या कहा जाय। बोलना कभी गंभीर आलोचना कर्म मान लिया जायेगा, शायद यह बड़े शुक्ल जी को पता नहीं रहा होगा। बड़े शुक्ल जी पता नहीं आज के आलोचकों की तरह अपनी फौज बना कर रखते और चलते थे या नहीं। सुना है कि मौजूदा समय में कई ‘बापू‘ हैं जो प्रवचन करते हैं और जहाज से अपनी फौज साथ लेकर चलते हैं। शायद ऐसे ही आज के कुछ बहुत बड़े आलोचक चाहे पूरा जहाज बुक करके अपनी फौज लेकर साथ चलते हों या न चलते हों, पर उन्होंने भी अपने पीछे युवा आलोचकों की एक जमात खड़ी की है। यह इसलिए कह रहा हूँ कि आलोचक वरिष्ठ हो चाहे युवा जैसे ही वह आलोचना के स्वाधीन आसन से गिरेगा, उसका ईमान, उसका स्वाभिमान और साहस सब चूरचूर हो जायेगा। जो आलोचक भीतर से खोखला होगा, वह भरी हुई आलोचना कर ही नहीं सकता है। फिर मैं कहना चाहता हूँ कि जीवन एक रचनाकार की रचना को ही प्रभावित नहीं करता है बल्कि एक आलोचक का जीवन भी उसकी आलोचना को प्रभावित करता है। जैसे कोई राजनेता भ्रष्ट होकर या अनेक घोटालों में शामिल रहते हुए देश और समाज के लिए सचमुच का कोई बड़ा काम नहीं कर सकता है, वैसे ही एक आलोचक भी जीवन में घटिया होकर अच्छी आलोचना नहीं लिख सकता है। एक आलोचक के घटिया जीवन के उत्कृष्ट नमूने दिये जा सकते हैं। पर यहाँ मकसद किसी आलोचक के सम्मान पर चोट पहुँचाना नहीं है।
   सवाल यह है कि आलोचक के जीवन में जिस ईमान और धैर्य का संकट है, उसके लिए किया क्या जा सकता है ? कोई ऐसी मशीन या दवा की पुड़िया है कि आलोचक के गले में डाल दिया जाय जो उसके भीतर की आलोचना की बदहजमी को पहले शांत करे और उसके बाद उसके विवेक के भीतर पहुँचकर ऐसे असर करे जो उसे कुछ भी लिखने और पढ़ने से पहले यह देखने की शक्ति दे कि वह सोचे कि इसमें नया क्या है और नये में महत्वपूर्ण क्या है ? दूसरे अपने समय की रचनाशीलता के परिदृश्य के बीच उसकी जरूरत क्या है ? जब तक इसका उचित उत्तर न मिल जाय, एक शब्द न लिखे। क्या किसी आलोचक से इस तरह के आत्मसंयम की उम्मीद की जा सकती है ? एक सवाल और है कि आलोचना क्यों ? किसी कृति के बारे में जो आकलन है, वही सच क्यों ? सच क्या है ? रचना का सच ही क्या आलोचना का सच है ? सवाल यह कि आलोचना के सच को जानने की तनिक भी इच्छा आज के आलोचक के भीतर है ? आलोचना के अंतरंग से उसके अपने अंतरंग से कोई रिश्ता बनता है या उसे अपने समय के केवल बड़े नामीगिरामी आलोचक की आँख से आज की रचना और आलोचना दोनों को देखना है ? जब कोई फतवा जारी होगा अमुक कवि या कविता संग्रह या कविता के बारे में तभी वे उस पर कोई विचार करेंगे अन्यथा नहीं ? आखिर किसी तरह का कोई स्वाधीन आलोचनात्मक विवेक इनके भीतर है या नहीं ? जब एक चोर की हथेली का निशान भी शीशे की गिलास पर पड़ जाता है तो इनकी अपनी छाप इनकी आलोचना पर क्यों नहीं होनी चाहिए ? ये अपने समय की आलोचना के सिर्फ संगतकार बन कर क्यों रहना चाहते हैं ? मैं बात को उदाहरण से आगे बढ़ाना चाहता हूँ। यदि नामीगिरामी आलोचक कुछ कवियों को प्रमोट करे तो इन्हें क्यों नहीं देखना चाहिए कि यह उचित प्रमोशन है या सिर्फ लेनदेन का मामला ? यदि पुलिस ही चोरी करने लगेगी तो चोर को कैसे पकड़ेगी ? आलोचक ही चोरी करने लगेगा अर्थात अपने समय के बहुत कामयाब आलोचकों की नकल करने लगेगा तो वह आलोचना की दुनिया में सच की खोज कैसे करेगा ? नकल करने वाले  कवियों की पहचान कैसे करेगा ? यहाँ एक बात साफ कर दूँ कि नकल करना और बात है और प्रभावित होना और बात है और किसी कृति को चुनौती मान कर उससे आगे का काम और बात है। यहाँ तीन बातें हैं। लेकिन जब मेरा आलोचक मित्र इन तीन बातों पर ध्यान नहीं देता है तो औरों से क्या उम्मीद करूँ ? वह तो खुद ही उन्हीं-उन्हीं रास्तों पर गोल-गोल घुमावदार साढ़ियों पर चढ़ कर आलोचना के शीर्ष पर पहुँचना चाहता है। उसे भी इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि कौन-कौन प्रमोटी कवि प्रगतिशील कवित्रयी की लोकधर्मी कविताओं की कैसे नकल करते हैं ? वे किसी प्रिय कविता को चुनौती मान कर आगे का काम करते हैं या नहीं ?
  उसे इस बात से कोई नहीं पड़ता कि आज कैसे कोई कवि किसी पहले के कवि की किसी कविता को चुनौती मान कर आगे की सोचता है ? उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि कैसे पहले के कवि की कोई कविता आज के किसी कवि के लिए चुनौती हो सकती है और वह पहले के कवि की काव्य मनःस्थिति और संवेदना का विकास अपने ढ़ंग से करता है। उदाहरण है। सोचता हूँ कि एक दिन अपने आलोचक मित्र के सामने इस कविता को रख दूँ -    
इतनी अच्छी क्यों हो चंदा
                   
                               
तुम अच्छी हो
तुम्हारी रोटी अच्छी है
तुम्हारा अचार अच्छा है
तुम्हारा प्यार अच्छा है
तुम्हारी बोली-बानी
तुम्हारा घर-संसार अच्छा है
तुम्हारी गाय अच्छी है
उसका थन अच्छा है
तुम्हारा सुग्गा अच्छा है
तुम्हारा मिट्ठू अच्छा है
ओसारे में
लालटेन जलाकर
विज्ञान पढ़ता है
यह देखकर
तुम्हें कितना अच्छा लगता है
तुम
गुड़ की चाय
अच्छा बनाती हो
बखीर और गुलगुला
सब अच्छा बनाती हो
कंडा अच्छा पाथती हो
कंडे की आग में
लिट्टी अच्छा लगाती हो
तुम्हारा हाथ अच्छा है
तुम्हारा साथ अच्छा है
कहती हैं सखियां
तुम्हारा आचार-विचार
तुम्हारी हर बात अच्छी है
यह बात कितनी अच्छी है
तुम अपने पति का
आदर करती हो
लेकिन यह बात
बिल्कुल नहीं अच्छी है
कि तुम्हारा पति
तुमसे
प्रेम नहीं करता है
तुम हो कि बस अच्छी हो
इतनी अच्छी क्यों हो चंदा
चुप क्यों रहती हो
क्यों नहीं कहती अपने पति से
तुम उसे
बहुत प्रेम करती हो।
   और पूछूँ कि इसे पढ़ कर किसी कविता की याद आ रही है या नहींे ? कहीं कोई गूँज सुनायी पड़ रही है या नहीं ? यह किसी कविता की नकल है या उससे आगे के काव्यानुभव और यथार्थ को पकड़ने की एक छोटी-सी कोशिश ? मैं जानता हूँ कि मेरा मित्र इस तरह की कविताओं को तब तक न देखेगा जब तक आलोचना का कोई ऊपर का अफसर उससे कहेगा नहीं। इस तरह कविताओं को देखने की जब दृष्टि या साहस ही आज के आलोचक के पास नहीं है तो हम उन आलोचकों से कैसे बड़े शुक्ल जी की तरह गंभीर आलोचना की माँग कर सकते हैं। यह उन   आलोचक के साथ ज्यादती होगी। वे कहीं और फंसे हुए हैं। उन्हें उनके हाल पर छोड़िए। उनकी स्थिति उस दूध की जाँच करने वाले इंस्पेक्टर से भी बहुत कम है जो एक मिनट में जान लेता है कि दूध में कितना पानी है और कितना दूध ? जब नीयत में खोट हो, ईमान का सौदा कर लिया जाता हो तो फिर उनसे अच्छी आलोचना की बात बेमानी है।
  अच्छी आलोचना के लिए विचार और यथार्थ को जानने और समझने के विवेक साथ बहुपठित होना, तीक्ष्ण अन्वीक्षण बुद्धि और मर्म ग्राहिणी प्रज्ञा की जरूरत पर भी पहले के आचार्यों ने काफी बल दिया है। पश्चिम के आचार्यों का भी कहा हुआ काफी कुछ है। लेकिन इन सूत्रों के बाद भी आखिर आलोचना का पूरा ढ़ाँचा आज फेल क्यों दिख रहा है ? जब पता ही था कि यह-यह रहे तो अच्छा आलोचक बना जा सकता है, तो अच्छे आलोचकों की किल्लत आखिर हुई कैसे ? कौन लोग हैं जिन्होंने फेल किया इन पुराने रास्तों को या इन पर चलने से मना किया या जानबूझ कर इनसे दूर भागे ? या कि उस पर चलने के बावजूद वह प्रभाव नहीं पैदा कर सके, जिसकी जरूरत आज सबसे ज्यादा है ? कहीं ईमान और साहस और धीरज की कमी जैसी छोटी-मोटी व्याधियों ने तो नहीं सब चौपट कर दिया ? यह सोचने की बात है कि इन मुश्किलों से कैसे छुटकारा पायें। कहते हैं कि कभी छोटे-मोटे नट-बोल्ट ढ़ीले हो जाने या रास्ते में कहीं गिर जाने से बड़ी से बड़ी गाड़ी रास्ते में खड़ी हो जाती है। एक पहिया कहीं पंक्चर हो जाने से गाड़ी रुक जाती है। दुर्घटनाएँ तो ड्राइवरों के बेसुध हो कर गाड़ी चलाने पर भी हो जाती हैं। देख लें ठीक से, खराबी कहाँ है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि अब पुरानी गाड़ियों को गैराज में रख देने का वक्त आ गया है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि आलोचना में भी नई आमद के इंतजार का वक्त आ गया है ? खबर करें।

                                                                                                                       गणेश पाण्डेय



                                                                           
 






                                                                

मंगलवार, 15 मई 2012

एक चांद कम पड़ जाता है

           -गणेश पाण्डेय
कई बार एक जीवन कम पड़ जाता है
एक प्यार कम पड़ जाता है कई बार
कई बार हजार फूलों के गुलदस्ते में
चंपे का एक फूल कम पड़ जाता है
एक कोरस ठीक से गाने के लिए
एक हारमोनियम कम पड़ जाता है
कई बार।
सांसें लंबी हैं अगर
और हौसला थोड़ा ज्यादा
तो तबीअत से जीने के लिए
एक रण कम पड़ जाता है
जो है और जितना है उतने में ही
एक दुश्मन कम पड़ जाता है।
दिल से हो जाय बड़ा प्यार अगर
तो कई बार
एक अफसाना कम पड़ जाता है
एक हीर कम पड़ जाती है
ठीक से बजाने के लिए
सितार का एक तार कम पड़ जाता है
एक राग कम पड़ जाता है।
कई बार
आकाश के इतने बड़े शामियाने में
एक चांद कम पड़ जाता है
दुनिया के इस मेले में देखो तो
एक दोस्त कहीं कम पड़ जाता है
एक छोटी-सी बात कहने के लिए
कई बार एक कागज कम पड़ जाता है
एक कविता कम पड़ जाती है।
(‘‘परिणीता’’ से)
                                                                                                   गणेश पाण्डेय

                                                                                                

शुक्रवार, 4 मई 2012

भरभराकर ढ़ह गया है

 -गणेश पाण्डेय

ढलान पर चलते हुए
सोचता हूं कि यह कैसी तेजी है
भागते हैं पैर आप से आप
कहां पहुंचकर चाहते हैं
सुस्ताना
धरती के किस भाग पर
होना चाहते हैं मुझसे अलग
और मेरी बांहें भी पैरों के संग-संग
किससे मिलने की जल्दी में हैं
मेरी देह का हर हिस्सा
छोड़ना चाहता है मुझे
दुर्दिन की यह कैसी बरसात है
कि चू रहा है जगह -जगह
देह का घर
जरा-सी बरसात में
भरभरा कर
ढ़ह गया है दिल का कमरा
आंखों के बरामदे में
अब कैसे बीतता है
खाली-खाली दिन
और काली-काली रातें
किसे सुनाऊं -
जीवन की कमजोर पटकथा
किस रचयिता से कहूं -
मुझ गरीब की कथा में ला दे
कोई मोड़
ढलान पर बिछा दे हरियाली
थके हुए पैरों को मिला दे
कल-कल करते झरने से
आंखों में भर दे जीवन का रंग
और धरती का असीम आकाश
आतुर कानों के पास कर दे 
किसी की पुकार
एक साधारण हृदय को बना दे
प्रेम का असाधारण सभागार
मेरी कविता को कर दे
फिर से जीवित
और इस कवि को बना दे
नवजीवन का कवि।
(चौथे संग्रह से)

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

उसका नन्हा चांद



-गणेश पाण्डेय

चालीस वर्ष हुए
उसे देखते हुए
एक ऋतु को आने
और एक ऋतु को जाने में
देर कहां लगती है
छतपर
फैली हुई धूप की चादर पर
बर्फीली हवाओं को आ धमकने में
देर कहां लगती है
चालीस वर्ष पुरानी रूखी त्वचा को
पंखड़ी की तरह चूमकर
निकल जाने वाली दोस्त हवाओं को
सुई की तरह हड्डियों में
चुभने में
देर कहां लगती है
जीवन के इस आगार में
सहमी-सहमी-सी
एक विह्वल स्त्री को
अपने एकांत की आंधी में
ढह जाने में
देर कहां लगती है
देर लगती है
किसी के लिए
पूरी आस्तीन का
एक लाल स्वेटर बुनते हुए जीने में
एक नन्हा मोजा
पूरी उम्र तैयार करते हुए रह जाने में
कोई पूछता क्यों नहीं
पत्तियों की तरह झरती हुई नित
उसकी कोमल इच्छाओं से
देर कहां लगती है
कोई पूछता क्यों नहीं उससे कुछ
जिसके जीवन में
हजार कांटों के बीच
एक छोटा-सा फूल खिलने में
एक छोटा-सा जीवन रचने में
कभी-कभी तो लग जाता है
पूरा जीवन
और जीवन की कविता में
एक नन्हा फूल नहीं खिलता है
धरती के हजार काले-काले मेघों से घिरी
और डरी हुई एक स्त्री के
जीवनरस से डबडब
पयोधरों के विकल आकाश में
एक नन्हा चांद नहीं निकलता है
प्रतिपल हजार सूर्य का ताप सहती हुई
एक अकेली स्त्री ढूंढती है नित
चांद-तारों की भीड़ में
सोते-जागते
कहां है उसका नन्हा चांद
अभी कितनी देर है
देर है कि अंधेर है
अलबत्ता
कवि जी की कविता में 
चांद की बारात निकलने में
देर कहां लगती है
उसे
जो किसी की बेटी है
किसी की बहू है
कहां है उसकी बेटी
उसकी बहू
बोलो पृथ्वी के सबसे बड़े कवि
कितनी अधूरी है
तुम्हारी सबसे अच्छी कविता।
( चौथे संग्रह ‘परिणीता’ से)
















                                                                                                              गणेश पाण्डेय

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

एक दुख ही तो है मेरे पास


 -गणेश पाण्डेय                                
एक दुख ही तो है
मेरे पास
जहां-जहां
और जितनी जगह है
सब में दुख का वास
एक-एक रोम में
एक-एक सांस में
दुख का डेरा
उसका शामियाना
उसका तम्बू-कनात
इतनी बड़ी पृथ्वी पर
एक दुख ही मिला मुझे
मेरा सगा बनकर
कभी बचपन का सखा
कभी मुड़ी-तुड़ी कमीज
कभी मटमैला कागज
तो कभी
रुक-रुक कर चलने वाली
कलम बनकर
कभी रास्ते का पत्थर और कांटा
कभी बिना डोर की बेजान पतंग
कभी बिना नमक की रोटी
तो कभी
साथी की खरीखोटी बनकर
जैसे भी मिला मुझे दुख
रखा मैंने उसे संभालकर
अपने पास
कि चलो ईश्वर ने कुछ तो दिया
मुझ गरीब को
एक जीवन दिया छोटा-सा
और दुख से भर दिया
डब-डब
बहुत दिया
दुख का अविस्मरणीय स्वाद दिया
दुख ने खोलीं मेरी पलकें
दुख ने किया
मेरी जर्जर देह में
जीवन का स्पंदन
कांपे मेरे होंठ
उठीं मेरी भुजाएं
पैरों में हुई खुजली
धन्यवाद मेरे ईश्वर
मनुष्य होने का अवसर दिया
                         
कभी सूरज ने पंहुचायी
दुख की गठरी
कभी चंदा लेकर आयी
दुख को मेरे घर स्वप्न-तश्तरी में
कभी दोस्तों ने भेजा
बड़े-बड़े गुलदस्ते में
तो कभी
तीन-तीन फुट के दुश्मनों ने
मेरे माथे पर फोड़ना चाहा
दुख का हथगोला ताबड़तोड़
ईश्वर का नाम लेकर
दुख के बम पर दे मारा
मैंने अपना सिर
धन्यवाद मेरे ईश्वर
दुख दिया तो दिया
सही सलामत
एक सिर दिया
अच्छा किया मेरे ईश्वर
जो भी दिया
नाप-तौल कर दिया
बस कमी हुई जरा-सी
प्रेम असीम दिया और दिल एक
हे मेरे ईश्वर कितनी दिक्कत हुई
दुख और प्रेम
एक ही बर्तन में रखने में
मैं ही जानता हूं
दुख बांटता तो लेता कौन
सो आंख मूंद कर
खोल दिया
प्रेम के शक्कर का गोदाम
जो भी मिला
न तराजू न बांट
भर-भर दोनों हाथ दिया
दिया तो उन्हें भी
जिन्हें डायबिटीज था
उन्हें तो दिया ही दिया
जिन्हें डायबिटीज नहीं था
आंखों के सामने
मीठा बनकर दिखाया
कानों के पास
मीठा बोलकर सुनाया
जिन्हें शक्कर की जगह
मेरी शक्ल से परहेज था
कहां से लाता भला उनके लिए
दूसरी शक्ल
कोई अफसोस नहीं मेरे ईश्वर
जिस दुनिया में
दस-दस शक्लें लेकर
अकड़कर घूमते हैं लोग
मुझे एक ही क्यों दिया

यह क्या कम है मेरे ईश्वर
मुझ गरीब को बनाया
दुख का राजा
दुख की रानी मिली
और दुख का राजपाट
धन्यवाद मेरे ईश्वर
जो भी दिया
बेशुमार दिया
दुख है मेरे पास
जीवन की झिंलगी चारपाई
और मैले-कुचैले बिस्तर पर
सिरहाने पुआल के तकिये पर
सबसे सुंदर स्वप्न की तरह
जीवन की सख्त धरती पर
आसमान से बरसती हुई
आग के बीचोबीच
खम्भे जैसी देह से छूटते
पानी के फव्वारे की तरह
कपिलवस्तु में रहूं
कि जाऊं कहीं और
नीम के नीचे रहूं
कि किसी और वृक्ष की छाया में
जाऊं
इस दुख से बचने के लिए
अपनी धरती छोड़कर
कहां जाऊं
जिसके बिना जीना भी
मेरे लिए अब क्या जीना
और मरना भी अब क्या मरना
क्षमा करना मेरे ईश्वर
मैं कहीं और नहीं जा सकता 
दुख को छोड़कर
एक दुख ही तो है मेरे पास
चाहो तो इसे भी ले लो ।        
(चौथे संग्रह से)

शनिवार, 17 मार्च 2012

आलोचना की दास परंपरा

                                           
               - गणेश पाण्डेय
बात कहीं से भी शुरू की जा सकती है। छायावाद से भी कि छायावाद आधुनिक हिंदी कविता की सबसे ऊँची मंजिल है। लेकिन जरूरी नहीं कि इस बात से या किसी बात से सब सहमत हो। क्योंकि यह एक ऐसा समय है जब हिंदी के अनेक स्वनामधन्य आचार्य अपने काव्य विवेक से अधिक अपने समय के नामी-गिरामी आलोचकों के काव्यविवेक या किसी अन्य आग्रह पर अधिक भरोसा करते हैं। भरोसा ही नही बाकायदा उनकी पूजा करते हैं। हो सकता है कि ऐसे काव्यालोचक कहें कि प्रगतिवाद सबसे उंची मंजिल है। पर मेरे देखने में अच्छाइयों के बावजूद प्रगतिवाद आधुनिक कविता की सबसे ऊँची मंजिल नहीं है। मैं ही नहीं और भी कई लोग ऐसा ही अनुभव करते हैं। पर हो सकता है कि ग्लोकोमा की वजह से मैं इससे अधिक देख न पा रहा होऊँ। असल में हिंदी साहित्य में यह भ्रम जोरों पर है कि सूरदास तो सिर्फ कविता में होते हैं और वह भी आज के जमाने में सिर्फ लच्छीपुर खास में होते हैं, आलोचना में हरगिज-हरगिज नहीं होते हैं। जबकि मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि हिंदी साहित्य के मौजूदा परिदृश्य पर आलोचना में सूरदासों की भरमार है। सूरदास ही नहीं बल्कि इनमें गजब-गजब के दास होते हैं। कोई अपने समय की आलोचना के शिखर पुरुष के श्रीचरणों के परम आनंद में डूबा हुआ डूबादास होता है तो कोई अपने बाहुबल और साहित्य के छलबल से विश्वभ्रमण पर निकला संसारी दास। कोई नया-नया दासानुदास। कोई एक नहीं। अनेक दासानुदास। बाकायदा आलोचना की सुदीर्घ दास परंपरा मौजूद है। ये कब कहां कैसे क्या करते हैं, यह सब बताने की बात नहीं है। बस इतना समझ लीजिए कि ये किसी नयी बात से या किसी बात को नयी तरह से देखने से डायबिटीज के मरीजों की तरह सख्त परहेज करते हैं। ऐसे आलोचक या आचार्य कविता की विकास यात्रा को किस दृष्टि से देखते हैं, यह दुर्भाग्यवश किसी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं हो सकता है। आधुनिक हिंदी कविता के पाठ्यक्रम में छायावाद ही नहीं छायावादोŸार कविता का भी विशिष्ट स्थान है। लेकिन जैसा कि कहा गया कि छायावाद आधुनिक कविता का शिखर है, तो इसके पुष्ट आधार हैं। छायावादी कविता द्विवेदीयुग की कविता की तरह टेढ़ामेढ़ा लड्डू नहीं है। बल्कि संुदर, स्वादिष्ट और सुपाच्य, कविता का नायाब प्रसाद है। कविता की उर्वर और श्रेष्ठ कल्पना का असीम आकाश ही नहीं है बल्कि अनुभव का अद्वितीय लोक है। कवि अपने पूरे वुजूद के साथ कविता का सहचर और भोक्ता है। एक ऐसी काव्यभूमि है जहां प्रकृति सिर्फ नई ही नहीं होती है बल्कि कुछ और भी बन जाती है, एक जीती जागती और प्रेयसि जैसी प्रिय स्त्री। छायावाद में स्त्री बिल्कुल नये रूप में सामने आती है। स्त्री की चिंता भी कहीं ज्यादा ईमानदार है। एक और राम की शक्तिपूजा में सीता की मुक्ति की चिंता है तो दूसरी ओर देवी जैसी रचना में अति साधारण और हाशिये की स्त्री के जीवन और सरोकारों की चिंता। विधवा स्त्री की भी चिंता कवि को उसी तरह विकल करती है। प्रायः कवियों ने नयी स्त्री को देखने की कोशिश की है। इन कवियों की स्त्री एक ओर देवि, सहचरि, मां है तो दूसरी ओर इष्टदेव के मंदिर की पूजा-सी विधवा और पत्थर तोड़ती मजदूरनी भी। निराला कविता को जब परिवेश की पुकार कहते हैं तो उनके सामने जाहिर है कि छायावाद की कविता होती है। आचार्य शुक्ल ने छायावाद को जब चित्रभाषा शैली कहने  साथ-साथ उसे बाहर से आया बतलाया तो उनके इस आग्रह को स्वीकार करने में जिन कारणों से दिक्कत हुई, स्पष्ट है। रहस्यवाद छायावादी कविता का एक छोटा-सा अंश है पूरा छायावाद नहीं। इस तरह का रहस्यवादी छायावाद पहले रवींद्रनाथ की कविताओं में फिर वहां से हिंदी में आया, इसे भी स्वीकार करने में मुश्किल हुई। यदि इसे ही छायावाद मान लेंगे तो फिर स्वाधीनता संधर्ष जैसे साहित्य के वृहत्तर उद्देश्य का क्या होगा ? क्या उससे बड़ा कविता का सरोकर कहा जायेगा - बीसवीं सदी और अब नयी सदी में - छायावाद का रहस्यवादी सरोकार ? यह ठीक है कि छायावादी कविता का पाट जिन दो छोरों से बनता है, उसमें एक ओर विराट का साक्षात्कार है तो दूसरी ओर लघुता के प्रति दृष्टिपात ही नहीं बल्कि उनके और विशेषरूप से देश के लिए संघर्ष चेतना की प्रतिष्ठा है। कविता का शाश्वत परिसर तो है ही। जाहिर है कि कविता की सलिला जिन दो पाटों के बीच बहती है उनमें एक है प्रकृति और दूसरा है अपने समय के समाज का परिदृश्य। छायावाद में प्रकृति पहलीबार जीती-जागती और किसी सुंदर और सौम्य स्त्री की तरह बहुत नयी-नयी और बेहद आत्मीय और अंतरंग लगती है। आगे कुछ कवियों के यहां तो अल्हड़ और नितांत अपनी लगती है। कविता में निजता का तत्व कविता का विरोधी नहीं है। बल्कि कविता को और विश्वसनीय और तरल बनाने वाला तत्व है। यह तरलता ही कविता को पठनीयता और सम्प्रेषणीयता जैसे आलोचनात्मक प्रश्नों से मुक्त करती है। वैयक्तिकता और सामाजिकता के प्रश्न छायावादी कविता को अशक्त नहीं करते हैं, बल्कि ताकत देते हैं। निराला लिखते है- ‘मैंने मैं शैली अपनायी’ और दूसरी ओर कहते हैं कि ‘कविता परिवेश की पुकार है’। जाहिर है कि परिवेश केवल प्रकृति का आंगन नहीं है। उसके भीतर आसपास का सब शामिल है। आसपास का ही नहीं, बल्कि हमारी चेतना के भीतर जो कुछ भी अंट सकता है, सब शामिल है। क्या समाज और क्या देश। क्या यहां और क्या वहां। क्या इस पार और क्या उस पार। छायावादी कविता की श्रेष्ठता का आधार उसके कवियों का महत्वपूर्ण अवदान है। कोई भी काव्यांदोलन, काव्यांदोलन ही नहीं बल्कि कोई भी साहित्यिक आंदोलन अपने आग्रहों और अपनी वैचारिकी से महत्वपूर्ण नहीं होता है, बल्कि उसे उससे जुड़े लेखकों के कद और योगदान के आधार पर याद किया जाता है। कभी-कभी बिना किसी घोषित काव्यांदोलन के एक कालखण्ड विशेष के भीतर के लेखकों में आप से आप अपने समय और परिवेश की पुकार के आधार पर मिलती-जुलती काव्य प्रवृत्तियां दिखने लगती हैं। सच बात तो यह कि कोई सजग कवि जब कविता रच रहा होता है तो उस समय वह पुलिस की परेड नहीं कर रहा होता है। उसकी अपनी काव्यदृष्टि बहुत-सी चीजों को तय करती है। उदाहरण के लिए कह सकते हैं कि इसीलिए हिंदी के सारे मार्क्सवादी कवि मुक्तिबोध से छोटे हैं। छोटा या बड़ा होना किसी सीमित अर्थ में लेने से कभी-कभी अनर्थ भी हो जाता है। छायावादी कविता के बड़े होने के अपने पुष्ट अकाट्य आधार हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि बाद की कविता अवांछित या महत्वहीन है। छायावादोŸार कविता एक अर्थ में छायावादी कविता का ही विकास है। द्विवेदीयुग की कविता की प्रतिक्रिया में छायावाद के लिए स्थूल के विरुद्ध सूक्ष्म का स्वागत जैसा सूक्ष्म के विरुद्ध स्थूल जैसी कोई चीज नहीं। न तो उसकी भयंकर प्रतिक्रिया में अलग से कविता की दृष्टि से कोई क्रांतिकारी चीज है। इंकिलाब है तो कथ्य के स्तर पर पहले के जन सरोकारों के स्वर की तीव्रता तक सीमित है। हिंदी के प्रिय विद्यार्थियों और भविष्य के कर्णधारों से विनती है कि वे छायावादोŸार कविता को आधुनिक हिंदी कविता के विकासक्रम में अगले और एक छोटे पड़ाव लेकिन महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखने की कृपा करें। इसे एक ऐसे पड़ाव के रूप में लें कि जहाँ कविता के पाठकों को गला तर करने के लिए एक छोटा-सा कुआँ है, एक छोटी-सी रस्सी है और एक छोटा-सा घड़ा है। थोड़ी-सी मौज है थोड़ी-सी मस्ती है। प्यास का थोड़ा-सा दीवानापन है। यों तो एक अध्यापक रूप मेे अपने विद्यार्थियों से कहना हो तो कहेंगे कि छायावाद के बाद हिंदी कविता मोटेतौर पर जिन दो रास्तों पर आगे बढ़ती है, उनमें पहला रास्ता प्रगतिवाद कहलाता है जिसे कुछ लोग अज्ञानवश बंद गली का आखिरी मकान भी कहते हैं। दूसरा रास्ता प्रयोगवाद कहलाता है जिसे वही कुछ लोग बंद गली के आखिरी मकान के बगल से दाहिने निकला हुआ रास्ता कहते हैं। वे यह भी कहते हैं कि जब प्रगतिवाद में कविता के तत्वों की बहुत अनदेखी होने लगी तो कुछ कवियों ने कविता के पक्ष में और एक अर्थ में कुछ कवियों ने जनता के पक्ष में खड़ी होने वाली कविता के पक्ष में खड़े होने की कोशिश की। पर आगे बढ़ने से पहले छायावादोŸार या उŸार छायावाद जैसी छतरी के नीचे मौजूद कुछ ताकतवर कवियों की कविता पर भी गौर करना जरूरी होगा। ये सीधे और उन अर्थों में प्रगतिवादी तो नहीं कहलाये पर जिनकी रचनाओं में जनपक्षधरता के स्वर मौजूद हैं। लेकिन ऐसे भी कवि हैं जो समाज के वृहŸार दुख को दूर करने या सामाजिक सौहार्द के शर्तिया इलाज के लिए मयखाने में बैठना ज्यादा जरूरी समझते हैं। आधुनिकता की वैचाारिकी से इस मयखाने का रिश्ता या मय की ताजपोशी समझना औरों के लिए भले ही मुश्किल चीज हो पर हिंदी आलोचकों के लिए अतिसरल है। मधु तो छायावाद में भी है पर शाला का निर्माण तो छायावादोŸार या कहें कि छायावाद से थोड़ा आगे और प्रगतिवाद से थोड़ा पहले के मील के पत्थर के पास जन अरण्य में ही संभव होता है। निराला की कविताओं में सामान्यजन की प्रतिष्ठा और उनके पक्ष में डटकर खड़े होने का जैसा जज्बा मौजूद है, बाद की कविताओं में संधर्ष के दृश्य उनसे अलग नहीं बल्कि उनके स्वर के आलाप हैं। आशय यह नहीं कि छायावादोŸार कवियों का उपक्रम कहीं से कम है या नगण्य है। कहना चाहिए कि नगण्य और वंचितों की चिंता का स्वर उनके यहाँ तीव्र है। प्रगतिवाद के कवियों में कथ्य की सबलता और स्वर की तीव्रता ने जाहिर है कि कविता के तत्वों की अनदेखी की तो कविता के तत्वों की मजबूती के लिए प्रयोगवाद से जुड़े कवियों को आगे आना पड़ा। उनमें भी अज्ञेय तो जैसे आगे की कविता का सारा कील-कांटा जानते थे सो उन्हें सबसे आगे रहने के लिए प्रयोगवाद एक अवसर था। हालाकि वे वादी कहलाने के पक्ष में नहीं थे। पर जिन्हें उन्हें वादी कहना था, उन्होंने वादी कहा। तार सप्तक का प्रकाशन सचमुच गौरतलब है। सप्तक के कवियों के बारे में दिलचस्प यह कि ये कवि विचारधारा के स्तर पर एक नहीं थे। उनमें फर्क था। दूसरी बात यह कि ये कवि युवा थे पर कविदृष्टि वयस्क थी। तीसरी बात यह कि इस संकलन में शामिल कवियों की कविताएं, उन कवियों की सर्वोत्तम कविताएं नहीं थीं। सर्वोत्तम क्या प्रतिनिधि कविताएं भी नहीं थीं। इसके बावजूद संकलन के कवियों और उनकी कविताओं ने नई राह के अन्वेषण को संभव किया। यही इस संकलन का शायद उद्देश्य भी था। तार सप्तक के बाद दूसरा सप्तक फिर तीसरा सप्तक आया। सप्तकों ने और जो भी किया हो, कविता को नई कविता का एक खुला आसमान दिया। कहने को तो अज्ञेय चौथा सप्तक भी लेकर आये पर वह चौथा ही बनकर रह गया। सात तो दूर एक भी तार ठीक से बज नहीं पाया। जबकि तीसरे सप्तक तक के कवियों में कई कवि ऐसे हुए जिन्हांेने अपने समय की कविता को तो प्रभावित किया ही है बाद की कविता को भी प्रभावित किया है। कविता की यात्रा हो या साहित्य की किसी भी विधा की विकास यात्रा,  कम प्रतिभा के ऐसे कवियों की भरमार रहती है जो किसी भी तरह उछल-कूद करके अमर हो जाने के लिए विकल रहते हैं। आलोचक या संपादक को खुश करने के लिए कुछ भी करने को तो तैयार रहते ही हैं, कविता या रचना की हत्या करने तक के काम को करने में तनिक भी दुखी नहीं होते। कविता मरती है तो मर जायें, बस ये अमर हो जायें। कविता की सुफरफास्ट रेलगाड़ी के दरवाजे पर हैंडिल को कस कर पकड़कर या बिना टिकट बर्थ पर लेटकर सफर करने वाले ऐसे कातिलों को आज भी देखा जा सकता है। साहित्य में कई आंदोलन ऐसे मीडियाकर अमर होने की आकांक्षा में चलाते हैं। कई संपादक अपनी पत्रिका या खुद को संपादक के रूप में स्थापित करने के लिए भी ऐसे प्रायोजित आंदोलन खड़ा करते रहते हैं। पर बिना अच्छी रचना के कोई भी आंदोलन जीवित नहीं रहता है। कईबार अपने समय की कविता या कवियों को चर्चित करने या अंधेरे में रखने में प्रतिष्ठित आलोचक भी कम बेईमानी या कम बड़ी चूक नहीं करते हैं। कुछ वक्त पहले एक नामचीन आलोचक ने  एक इंटरव्यू में कहा था कि फणीश्वरनाथ रेणु के महत्व को समझने में देर हुई। शायद यह आधा सच है। यह सच है कि उन्होंने रेणु के महत्व को देर से स्वीकार किया। पर यह सच नहीं लगता कि हमारे समय का कोई नामचीन आलोचक रेणु जैसे लेखक के महत्व को देर से समझ पायेगा। यह सिर्फ एक उदाहरण है। हिंदी आलोचना में आज कई ऐसे आलोचक हैं जो अपने समय की कविता और आलोचना को इसी तरह कलंकित करते हैं। दुर्भाग्य यह कि हमारे समय की युवा आलोचना कभी अपने पैरों पर खड़ी ही नहीं हुई। लेकिन सौभाग्य से हिंदी कविता की निर्मल आत्मा कभी भी ऐसी कुचेष्टाओं से मलिन हुई ही नहीं। शुरू में ही ंिहदी कविता की नींव इतनी मजबूत बनी कि कोई आलोचक या दंद-फंद में लगा हुआ कवि  अपनी दबंगई या बुरी नजर से उसे हिलाना तो दूर, छू भी नहीं सकता है। कविता की आत्मा के पास पहुंचते ही अपात्र सूर्य जैसे ताप में राख हो जाता है। लेकिन कई बार एक पूरा का पूरा दौर ही आंख पर पट्टी बांध लेता है। किसी महाजन की जगह किसी महादुर्जन के फतवे को ही अपने समय का सत्य समझ लेता है। पर जब समय का सारा पानी बह जाता है तो रेत की तरह सच सामने होता है। अपने समय के सब चर्चित भुला दिये गये होते हैं। याद रहते हैं वे जिनकी कविताओं में कुछ होता है। कभी-कभी कुछ वाले भी अपने समय में अपनी हैसियत से अधिक पा जाते हैं।
नई कविता और नई कहानी दोनों आधुनिक काल का महत्वपूर्ण पड़ाव है। कविता में नई कविता के बाद कुछ पानी के बुलबुले जैसे काव्यांदोलन भी आते हैं। पर कविता के एक समृद्ध और मजबूत देश में अकविता के लिए कितनी गुंजाइश हो सकती है। सो आये और गये की तरह कविता और कहानी में ऐसे आंदोलन कहने के लिए आये और चले गये। साठ के बाद कविता के मिजाज में जो परिवर्तन दिखता है, वह अचानक और किसी एक कवि के प्रादुर्भाव से नहीं होता है। यह सोचना नासमझी होगी कि एक धूमिल के आने से साठ के बाद की कविता चमकी। वह एक ऐसा कालखण्ड था जब देश की परिस्थितियों में काफी कुछ नाउम्मीदी और विकलता और विश्वास का संकट युवा लेखकों को मथ रहा था। बाहर और भीतर काफी कुछ टूट रहा था। नई कविता के कई कवियों में अपने समय के दंश और उसकी तीव्रता का अनुभव मौजूद है। जहां तक राजनीतिक कविता का प्रश्न है, यह कहने में संकोच नहीं कि मुक्तिबोध के बाद रधुवीर सहाय ध्यान खींचते हैं। साठोत्तरी कविता में जिसे मोहभंग की कविता भी कहा गया, राजनीति और खासतौर से लोकतंत्र और समाजवाद को लेकर कविता में बहुत बोलने वाली मुहावरेबाज कविता का एक दौर आता है। जिसमें कविता की भाषा को धरना-प्रदर्शन में चीखने वाली भाषा में बदलने की छटपटाहट दिखती है। धूमिल के लिए एक नामचीन आलोचक इतने व्यग्र होते हैं, शायद उतना कभी अपने बच्चों के लिए भी विकल नहीं हुए होंगे। धूमिल एक प्रतिभाशाली कवि हैं। इसमें कुछ खास बुरा नहीं है किसी पत्रिका में उन्हें किस तरह और उनकी कविता को कैसे करके छापा गया होगा। संपादक एक अभिभावक की तरह होता है। नये रचनाकार को अपने बच्चे की तरह सजाता और संवारता है। लेकिन किसी संपादक या  आलोचक को दूसरे बच्चे दिखें ही नहीं, यह बुरा है। साठोत्तरी कविता में धूमिल के अलावा लीलाधर जगूड़ी और देवेंद्र कुमार जैसे कवि भी शामिल हैं। पटना के युवा लेखक सम्मेलन में धूमिल ने जिस देवेंद्र कुमार की काव्य भाषा को अपनी काव्यभाषा से बेहतर बताया था, दुर्भाग्य यह कि हम पूर्वांचल में धूमिल को तो पढ़ाते हैं पर देवेंद्र कुमार की कविता को नहीं। ऐसा क्यों ? क्या इसलिए कि देवेंद्र कुमार न तो श्रीवास्तव थे न तिवारी ? या कि तिवारियों और श्रीवास्तवों की कविता से पहले किसी अन्य जाति में जन्म लेने वाले कवि की कविता पूर्वांचल में पढ़ाने में कोई साहित्यिक या नैतिक बाधा है ? या विश्वविद्यालयों के आचार्य कभी अपने कूपों से बाहर निकलेंगे ही नहीं ? आखिर ये आचार्य अपने कूपों से बाहर कब निकलेंगे ? या.... जब ये आचार्य चले जायेंगे और नये आचार्य आयेंगे, जो कूपों में नहीं बल्कि कविता के खुले परिसर में बैठेंगे, तब देवेंद्र कुमार ही नहीं देवेंद्र कुमार की कविता के भी बाद के जो सच्चे सपूत होंगे, उनकी कविता पढ़ाएंगे। जब हमारा समय बीत जायेगा और हम बीत जायेंगे तो शायद कुछ और लोग आयेंगे जो आज की दरिद्र युवा आलोचना को समृद्ध, ताकतवर और भरोसेमंद बनाएंगे। तब तक शायद न नामचीन आलोचक रहेंगे और न उनका डर। आज की मुश्किल यह कि हर शहर में एक-दो नामचीन रहते हैं। जो लेखक अपने समय के नामचीनों से डर कर लिखते हैं। जाहिर है कि वे लिखते नहीं हैं, बल्कि कुछ और करते हैं। आठवें दशक की कविता और उसके बाद की कविता की अपनी मुश्किलें हैं। अच्छे कवियों को निरंतर तनाव में रहना पड़ता है। कम अच्छे कवियों को साहित्य की अनेक अकादमियाँ रेवड़ी की तरह पुरस्कार बाँटती हैं। नवें दशक की कविता हो या अंतिम दशक की कविता और या नई सदी की कविता, इस पूरे दौर की कविता को एक अदद आलोचक की दरकार है जो सच को फटकार कर कह सके और राजधानी की ओर मुंह करके फटकार सके। लेकिन फटकारेगा कौन ? फटकारेगा वह जिसके पास एक टका ही सही, उसका अपना हो। अंत में कहना चाहूंगा कि फटकारने वाले आलोचक का प्रादुर्भाव नहीं होता है तो न सही। अच्छी कविता में आत्मरक्षा का गुण अनिवार्य रूप से होता है। अच्छी कविता किसी आलोचक का मुंह नहीं देखती। एक आलोचक को ही अच्छा आलोचक बनने के लिए अच्छी कविता के पास जाना पड़ता है। मैं यह मान नहीं सकता कि तुलसीदास आचार्य शुक्ल के पास गये थे। अच्छा कवि आलोचक के पास नहीं जाता है। आचार्य शुक्ल ही तुलसीदास और सूरदास और जायसी के पास गये थे। फिर आज के कवि क्यों दौड़-दौड़ कर राजधानी जाते हैं ? हिंदी कविता की यात्रा से जो लोग परिचित हैं जानते होगे कि अच्छी कविता राजधानी से दूर रहती है। कविता अपना जासूस आप होती है। किसी भी दौर की कविता हो, छायावाद की कविता हो या छायावादोत्तर कविता या उसके बाद की कविता अपनी खूबियों और खामियों को छुपाकर रख नहीं सकती है। इसे आप कविता की देवी का वरदान कहें या शाप, पर यह है और सौ फीसदी है।

                                                                 गणेश पाण्डेय

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

आलोचना की सामाजिकता का रास्ता और चंद राहजन


                      - गणेश पाण्डेय

मैनेजर पाण्डेय हमारे समय के एक बड़े आलोचक हैं। जाहिर है कि आलोचना की बड़ी परंपरा में यह बड़ा होने का रिश्ता देह की ऊंचाई या आलोचना के नाम पर अनुयायिओं की हनुमानजी की पूंछ जैसी लंबी पंक्ति से नहीं बनता है। बड़ा होने का यह रिश्ता, आलोचना की समग्रता में उसकी शर्तों और आलोचना की कसौटी पर खुद को परखते रहने से बनता है। अपने समय की चुनौतियों और विकलताओं का सच के साथ सामना करने से बनता है। आलोचक का कद न तो उसकी धोती का घेरा तय करता है, न पाजामा, न कोई अन्य अंगरखा, जहां तक मैं जान पाता हूं, एक आलोचक आलोचना की सचाई के पैमाने से बड़ा या छोटा होता है। केवल लिखना और लिखना और कुछ लिखते जाना या बोलना और बोलना और कुछ भी बोलते जाना ही आलोचना नहीं है। अच्छी आलोचना तो कतई नहीं है। हमारे समय में दो ऐसे उदाहरण बिल्कुल सटे हुए हैं जिनमें पहले में अति वक्तृता है तो दूसरे में -जो पहले के ही सहायक के रूप में अधिक प्रसिद्ध हैं-अतिलेखन और आशुलेखन। यह जो अतिबोला और अतिलेखन या आशुलेखन का संसार है, जिस-तिस पर कभी भी कुछ भी शानदार, अद्वितीय से कम नहीं, यह जो एक अर्थ में आलोचना का ‘‘सामाजिक कार्य’’ है, क्या यही आलोचना की सामाजिकता है ? आखिर सार्वजनिक रूप से यह सब करते हुए आलोचक कितना सामाजिक होता है, किसी विधायक या सांसद की तरह किसी के निवेदन पर तत्काल अपनी संस्तुति बांटता चाहे बेचता हुआ? यह दृश्य क्या आज की हिंदी आलोचना का नहीं है? क्या इसे ही मैनेजर पाण्डेय आलोचना की सामाजिकता कहते हैं ? मैनेजर पाण्डेय छोटे आलोचक होते तो शायद ऐसा कह सकते थे, लेकिन जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा कि मैनेजर पाण्डेय बड़े आलोचक हैं, इसलिए पाण्डेय जी का कतई यह आशय नहीं है। गौर करने पर यकीनन आप पायेंगे कि पाण्डेयजी की आलोचना की सामाजिकता का आशय आलोचना की बड़ी परंपरा की व्यापकता और सार्थकता से मेल खाने वाला है। मैं ‘पक्का’ आलोचक नहीं हूं। पक्का आलोचक तो मेरा ढ़िलपुक दोस्त है। मेरे समझने में कुछ दिक्कतें जरूर हैं, पर समझने के इस क्रम में समझते-समझते मैं भी किसी हद तक समझ जाऊंगा। अपनी ही बात से आगे बढ़ने की कोशिश करता हूं। यह जो ‘व्यापकता’ और ‘सार्थकता’ है, शायद मेरी कुछ मदद करे।
   पाण्डेय जी का आलोचना की सामाजिकता वाला लेख शायद आलोचना में पहलीबार देखा था। शायद क्या, यकीनन देखा था। इसी नाम की किताब में दूसरी बार देख रहा हूं। यह लेख हमारे समय की आलोचना पर जितना मौजू है, शायद उससे ज्यादा आने वाले वक्त की आलोचना पर मौजँू होगा। पर मेरे सामने आज का समय है। मैनेजर पाण्डेय के सामने भी उनका समय है। एक सही आलोचक अपने समय को जब भी देखता है, आलोचना की खुली आंख से देखता है। पाण्डेय जी भी अपनी खुली और धुली-पुंछी आंख और सही नंबर के चश्मे से अपने समय को साफ-साफ देखते हैं-‘आजकल भारत पूंजीवादी सभ्यता के आतंककारी प्रभावों का सामना कर रहा है। पंूजीवाद का स्वभाव है हर सार्वजनिक वस्तु का निजीकरण करना। पूंजीवाद अपने वर्तमान दौर में प्रकृति के पांचों तत्वों-पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु का पूंजी के संचय और विस्तार के लिए निजीकरण में लगा हुआ है। जब प्रकृति का निजीकरण हो रहा हो तब संस्कृति कब तक और कितनी देर तक सामाजिक या सार्वजनिक रह सकती है। पूंजीवाद का वर्तमान दौर सचमुच ‘सामाजिक की मृत्यु’ का समय है।’ ऐसे मुश्किल वक्त में मैनेजर पाण्डेय चुनौती के रूप में एक प्रश्न खड़ा करते हैं और उस चुनौती से दो-दो हाथ करने के लिए आस्तीन चढ़ाते हुए पाठकों को यह बताना नहीं भूलते हैं कि भाई- यह जो आलोचना की सामाजिकता नाम की बेशकीमती चीज है, आखिर है क्या और रचना की वैयक्तिकता से इसका क्या रिश्ता है-‘ साहित्य के विभिन्न रूपों में वैयक्तिकता और सामाजिकता की स्थिति एक समान नहीं होती। अगर कविता स्वभाव से अधिक व्यक्तिगत होती है तो उपन्यास अधिक सामाजिक। आलोचना रचना की व्याख्या करती हुई, उसे व्यापक पाठक समुदाय तक पहुंचने में मदद करती हुई खुद सामाजिक बनती है और रचना को भी सामाजिक बनाती है।’ पाण्डेय जी आगाह करते हैं-‘जो लोग रचना और आलोचना दोनों को नितांत व्यक्तिगत बनाते हैं वे अभिजन एक तरह से साधारण जन को साहित्य-संसार से बाहर रखने की कोशिश करते हैं और पूंजीवाद के निजीकरण में सहायक भी बनते हैं।’ और यहीं पाण्डेय जी आलोचना की सामाजिकता के व्यापक निहितार्थ को स्पष्ट करते हैं -‘आलोचना की सामाजिकता की चिंता असल में पूंजीवाद द्वारा प्रकृति और संस्कृति के निजीकरण के प्रयत्न के विरुद्ध प्रतिरोध की चिंता से जुड़ी हुई है।’
  जाहिर है कि साहित्य की आत्मा जिन दो छोरों के बीच डोलती है, वे असहमति और प्रतिरोध ही हैं। प्रसंग से तनिक इतर होकर यहां मैं कहना चाहूंगा कि एक अर्थ में करुणा जैसे शुद्ध मनोभाव के मूल में भी असहमति और दुख के विरुद्ध कोमल प्रतिकार है। दुख के विरुद्ध जाना उस सŸाा के विरुद्ध भी जाना है जो दुख का कारण है या दुख देती है। आदिकवि से लेकर आज तक के कवियों ने अपने ढंग से और अपने समय के भीतर असहमति और प्रतिकार की संस्कृति को कविता की आत्मा का सहचर बनाया है। मैथ्यू आर्नाल्ड ने कविता को जीवन की आलोचना कहा है। आशय यह कि आलोचना की व्याप्ति कविता के भीतर अनिवार्य रूप से मौजूद है। उस आलोचना की व्याप्ति है जो असहमति और प्रतिरोध की संस्कृति से जुड़ी हो। मैनेजर पाण्डेय के लिए आलोचना की सामाजिकता का अर्थ है-‘ आलोचना, चाहे समाज की हो या साहित्य की, वह सामाजिक बनती है, एडवर्ड सईद के शब्दों में-सŸाा के सामने सच कहने के साहस से।’ यहां मैनेजर पाण्डेय सावधान करते हुए बेहद जरूरी बात कहते हैं कि-‘ सत्ता केवल राजनीति की ही नहीं होती। धर्म,संस्कृति और साहित्य की भी सत्ताएं होती हैं, जो एक ओर बौद्धिक दमन और अपने वर्चस्व की स्थापना का प्रयत्न करती हैं तो दूसरी ओर राजनीतिक सत्ता को मजबूत करने में सहयोग भी करती हैं। ऐसी सत्ताओं के सामने सच कहने का साहस जिस आलोचना में होता है वह मनुष्य की स्वतंत्रता के पक्ष में खड़ी होती है, इसलिए वह सामाजिक होती है।’ यहां यह कहना जरूरी है कि राजनीति, धर्म, संस्कृति की सत्ताएं किसी हद तक अमूर्त होती हैं जबकि साहित्य की सत्ताएं प्रायः मूर्त होती हैं। कभी हाथी छाप, कभी घोड़ा छाप, कभी तलवार छाप, कभी बाऊ साहब छाप, कभी मोटी चुटिया छाप, कभी पतली मोरी का पाजामा छाप, कभी लाला जी छाप, कभी पंडिज्जी छाप, कभी सुर्ती छाप तो कभी कोई और छाप। दिल्ली हो या गोरखपुर या कोई भी शहर, साहित्य की सत्ताएं बड़ी, मझोली, छोटी या पिद्दी हर जगह होती ही होती हैं। मजे की बात यह कि ऐसी किसी भी मामूली से मामूली साहित्य की सत्ता के विरुद्ध खड़े होने का साहस शायद ही कहीं दिखता हो। एक रहस्य यह भी कि साहित्य की सत्ता हासिल करने के लिए अच्छा लिखना कतई जरूरी नहीं है। कोई भी मीडियाकर अपने दंद-फंद से ऐसी सत्ता पलक झपकते हासिल कर लेता है। अब साहित्य की सत्ता हासिल करने के लिए किसी का नामवर होना या आलोचना या रचना में खूंटा गाड़ना अर्थात महत्वपूर्ण करना कतई जरूरी नहीं रहा। सच तो यह कि साहित्य की सत्ता बनने के लिए तो कहीं-कहीं लेखक होना भी जरूरी नहीं रहा। जैसे समुद्री डाकू पानी के तमाम जहाज चुटकी बजाते हुए लूट लेते हैं, उसी तरह आज साहित्य के लुटेरे लाखों-करोड़ों रुपये के सरकारी और गैर सरकारी अनुदान से चलने वाली भारी-भरकम और नामी-गिरामी साहित्यिक संस्थाओं और अकादमियों को लूट रहे हैं। देश के हिन्दी भाषी क्षेत्र के अनेक हिस्से आज अपराध की दुनिया में शूटरों और आतंकवादियों के लिए ही नहीं बदनाम हुए हैं, साहित्य के क्षेत्र में भी लूट और कत्ल के पेशेवर गिरोहों के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर जाने-पहचाने जा रहे हैं। कहना यह है कि आज ऐसे लुटेरों और हिंदी के हत्यारों के खिलाफ बोलने का रŸाीभर साहस जब बहुत बोलने वाले लेखकों में नहीं है तो दूसरे सामान्य लेखकों के बारे में क्या कहें। बस इतना समझ लीजिए कि ऐसे साहित्यिक माफियाओं के सामने जब कुछ  विश्वविद्यालयों के हिंदी के कई प्रोफेसर साहबान और कई स्वनामधन्य लेखक चूहा और चुहिया बन जाते हों-बन क्या जाते हों,बल्कि हों ही- तो फिर साहित्य के युवा लेखकों और बच्चों के भविष्य के बारे में क्या कहना। फिर भी शायद कुछ हैं, हैं कुछ सिरफिरे जो ताल ठोंकते हैं और साहित्य के परिसर का सच साहस के साथ कहते हैं। पर ऐसे कितने हैं ? साहस के साथ सच कहने वाले को बुजदिलों की फौज देख नहीं पाती है या देख कर शर्म से मुंह फेर लेती है ? साहित्य की सत्ता की क्रूरता और कदाचार के साथ जो बड़ा सवाल पैदा होता है, उससे टकराये बिना क्या समाज, राजनीति, धर्म और संस्कृति की सत्ता से टकराने की बात मौजँू है ? प्रतिरोध की संस्कृति पहले जमीन पर दिखनी चाहिए या आसमान पर ? साहित्यकार पहले साहित्य की क्रूर और भ्रष्ट सत्ता से नहीं टकराएगा तो फिर हम कैसे तय करेंगे कि उसका बारूद असली है? या वह खुद असली है? या कि उसमें वाकई दम है? क्या साहित्य की सत्ता के सामने आत्मसमर्पण करने वाले लोग दुनिया की बाकी सत्ताओं के खिलाफ सचमुच ताल ठोंक कर खड़े हो सकते हैं या आरपार की लड़ाई लड़ सकेंगे? या कोई फर्जी लड़ाई करेंगे ? या सिर्फ लड़ाई-लड़ाई खेलेंगे? क्या प्रतिरोध की संस्कृति एक खेल है ? असली सवाल यह है। यह पाण्डेय जी बेहतर बता सकते हैं कि साहित्य की सत्ता से कैसे टकरायें ? क्योंकि पाण्डेय जी को वर्तमान साहित्य के आलोचना विशेषांक में छपे लेख ‘ आलोचक का बाहर-भीतर ’ में हिंदी आलोचना की अब तक की सबसे बड़ी लफंगई दिखती है। यहां यह सवाल जरूरी है  कि क्या वह लेख आलोचना और साहित्यिक पत्रकारिता अर्थात साहित्य की सत्ता की अंधेरगर्दी ,लूटपाट और महाभ्रष्टाचार के खिलाफ हिंदी के सिपाहियों की ओर से किया गया जवाबी हमला नहीं है ? क्या आततायियों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई गैरकानूनी है ? क्या साहित्य की क्रूर और भ्रष्ट सत्ताओं के खिलाफ फूलों का हार ले जाकर देवभाषा में नतमस्तक होकर दबी जुबान से निवेदन करने से हिंदी के वे क्रिमिनल अपनी साहित्यिक धंधई बंद कर देंगे? गुनाह से तौबा कर लेंगे ? क्या उस लेख में आलोचकों और संपादकों का जो यथार्थ है वह सही नहीं है? एक आलोचक को, एक संपादक को बुरे से बुरा साहित्यिक जीवन जीने का हक है, वह चाहे जितनी गंदगी फैलाये, पर उसे कठोर और कबीर की तरह फटकार की भाषा में कुछ न कहा जाये? उसे देवभाषा में जल-अक्षत चढ़ाते हुए देवताओं की तरह पूजा जाये? पाण्डेय जी बतायें कि हिंदी की लाज सरेआम लूटने वाले इन गुनाहगारों के साथ क्या किया जाए? कमतर कवियों को प्रमोट करने के मामले हों, चाहे कमतर रचनाकारों को पुरस्कारों की रेवड़ी बांटने का धंधा हो, हिंदी के इन माफियाओं के गुनाह कौन नहीं जानता है और जानकर चुप रहने के गुनाह का हिस्सेदार नहीं बनता है। कथासाहित्य का एक छोटा-सा उदाहरण है। दो लेखिकाओं के पहले उपन्यासों - जो उपन्यास की ‘पहली’ शर्त ‘पठनीयता’ के सामने ही फेल हो जाते हैं-को आसमान पर पहुंचाने वाले आलोचकों और संपादकों के इस भ्रष्टाचार की सजा क्या होनी चाहिए ? या इन्हें बेवकूफ या मक्कार या बेईमान वगैरह समझ कर माफ कर देना चाहिए ? इस देश की या शायद दुनिया भर में ऐसा कहीं नहीं होता होगा-जहां किसी भी परीक्षा में प्रारम्भिक और मुख्य परीक्षाएं होती होंगी- कि प्रारम्भिक परीक्षा में फेल होने के बाद अर्थात प्रारम्भिक परीक्षा पास किये बगैर मुख्य परीक्षा का गोल्डमेडल दे दिया जाय, ये तो साहित्य के महाभ्रष्ट ही ऐसा कर सकते हैं। क्या ऐसे कांड साहित्य में होटल ताज के 26/11 कांड की तरह नहीं हैं, जिसमें उपन्यास और आलोचना के ‘‘ईमान’’ और पाठकों के ‘भरोसे’ का लगातार बर्बर कत्ल किया जाता है ? साहित्य की लाज को तार-तार किया जाता है। क्या न्यायालयों के जजों के गलत काम पर उन्हें दण्ड नहीं मिलता है ? अभी आज ही (27नवंबर10 को) खबर छपी है कि सुप्रीम कोर्ट ने शेक्सपीयर का उल्लेख करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के बारे में कहा है कि ‘‘विलियम शेक्सपीयर ने ‘हेमलेट’ में कहा था कि डेनमार्क राज्य में कुछ गड़बड़ है। उसी तर्ज पर कहा जा सकता है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में कुछ गड़बड़ है।’’ काश कभी सुप्रीम कोर्ट का ध्यान साहित्य के हाईकोर्टों पर भी जाता और यहां की साफ-सफाई के लिए कुछ हो पाता। साहित्य के न्यायालयों के लिए शायद हमारे संविधान में कोई व्यवस्था नहींे है, वहां सिर्फ स्वेच्छाचार है। इसीलिए साहित्य के हाईकोर्ट हों या सुप्रीमकोर्ट, सब भ्रष्ट हैं। हमारे शहर में तो साहित्य का हाईकोर्ट भ्रष्ट ही नहीं बल्कि महाभ्रष्ट है। क्या साहित्य के माफियाओं के खिलाफ किसी साहित्यिक फौजी कार्रवाई की जरूरत नहीं है? वैसे पाण्डेय जी का ध्यान इस ओर दिलाना जरूरी है कि जब कानून का राज नहीं रहता है तो जनता कानून को अपने हाथ में ले लेती है। साहित्य के नैतिक ‘कानून’ और ‘मूल्यों’ का कत्ल करने वालों के साथ साहित्य के गरीब बेटे और कुछ कर सकें या न कर सकें पर वह दिन दूर नहीं जब साहित्यिक सभा-गोष्ठियों में बेईमानों और लुटेरों पर हमारे समय की राजनीति की तरह तीव्र असहमति व्यक्त करने के लिए जूते फेंकने का दौर शुरू हो जाय ? साहित्य की सामाजिकता के रास्ते में राहजनी बंद नहीं होगी तो शायद ऐसे राहजनों के खिलाफ साहित्य की जनता या साधारण कार्यकर्ता खुद ‘साहित्यिक हथियार’ लेकर चलना शुरू कर देंगे? जब बड़े - बड़े साहित्यकारों ने कविता , कथा और आलोचना के रास्ते के राहजनों को प्रश्रय देना और महत्व देना और मान्यता देना शुरू कर दिया हो और खुद भी उनके साथ मिलकर राहजनी करने लगे हों तो यह कहना मुश्किल है कि ऐसे लोगों के लिए देवभाषा की जगह लफंगई और जूता फेंकने की घटनाओं जैसी स्वतःस्फूर्त जनता की देसी प्रतिरोध की संस्कृति साहित्य में नहीं विकसित होगी? अपराध के साथ दंड का भी विधान होता है। कुछ ऐसे अपराध होते हैं जिनके खिलाफ बौद्धिक और शालीन असहमति खुद एक अपराध है। यों जिस लेख पर पाण्डेय जी को एतराज है उसके बारे में ‘यात्रा’ के अंक तीन में ‘छोटे सुकुल के प्राइवेट नोट्स’ में यह सफाई है कि कैसे उस लेख में कथाकंस की जगह लंगड़सांई या कुछ और दूसरी चीजें आयीं, जिन्हें नहीं आना चाहिए था। हालाकि पाण्डेय जी ने भी उस लेख को अबतक की सबसे बड़ी लफंगई कहते हुए उसी पैराग्राफ में खुद ही उन हालात और दिक्कतों का जिक्र किया है जिसकी वजह से उस तरह के लेख लिखने जैसे हालात पैदा होते हैं-‘‘ आलोचना की सामाजिक विश्वसनीयता एक और कारण से कम हुई है। कुछ लोग व्यक्तिगत राग-द्वेष के कारण रचनाओं और रचनाकारों की कभी अतिरंजित प्रशंसा करते हैं तो कभी रक्तरंजित निंदा। ऐसी आलोचना प्रायः अतिरंजना और सरलीकरण के सहारे चलती है और वह अपनी विश्वसनीयता के साथ-साथ आलोचना कर्म की सामाजिकता का भी नाश करती है।’’ आलोचना की सामाजिकता का नाश करने वालों के साथ आखिर क्या सलूक हो ? क्या आलोचना की सामाजिकता का नाश करने वालों के सिर पर एक छोटा-सा भाषा का ही सही साहित्य के ईमान के बारूद से बनाया गया बम भी नहीं फोड़ा जा सकता है, तब क्या हिंदी के सच्चे सपूत आलोचना की सामाजिकता का नाश करने वालों के सिर पर चमेली का तेल रखकर चम्पी करें ? पूर्वांचल में कहा जाता है कि जैसा देवता वैसा अक्षत। लेखक की बात पर भरोसा उसके जीवन को देखकर किया जाता है। आलोचना की सामाजिकता के रास्ते पर बहुत से बहुरूपिये राहजन तरह-तरह के भेस बनाकर घूम रहे हैं, जिनकी पहचान उनके मुखौटे को उतार कर ही की जा सकती है। आलोचना की सामाजिकता को जाहिर है कि पाण्डेय जी शिद्दत के साथ महसूस करते हैं और उस पर खुले दिमाग से रोशनी भी डालते हैं-‘ आलोचना की सामाजिकता पर विचार करने की शुरुआत इस प्रश्न से हो सकती है कि वह किसके लिए लिखी जाती है या उसे कौन पढ़ता है। इससे आलोचनात्मक सोच की प्रक्रिया प्रभावित होती है और उसका उद्देश्य भी तय होता है। यही नहीं इससे आलोचना की शैली और भाषा भी निर्धारित होती है। आजकल हिन्दी में आलोचना के नाम से कई तरह का लेखन हो रहा है। एक छोर पर अखबारी आलोचना है तो दूसरे छोर पर अकादमिक आलोचना। अखबारी आलोचना साहित्य के बारे में खबरें देती है, इसलिए जिनकी दिलचस्पी साहित्य संसार में होती है, वे ही अखबारी आलोचना पढ़ते हैं। ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक नहीं है। अकादमिक आलोचना के पाठक मुख्यतः छात्र-छात्राएं हैं।’ मैनेजर पाण्डेय आगे कहते हैं- ‘टेरी इग्लटन ने लिखा है कि आजकल आलोचना या तो साहित्य-उद्योग के जन-सम्पर्क का हिस्सा है या शिक्षा संस्थाओं का आन्तरिक मामला। उसका कोई सामाजिक लक्ष्य या कार्य नहीं है।’ जाहिर है कि साहित्य के ऐसे भारी उद्योग का सबसे बड़ा मुनाफा हिंदी में पुरस्कार के लिए तिकड़म है और इस तिकड़म को साहित्य के पवित्र कार्य में बदलने या आधार देने का काम गैर-जिम्मेदार या भ्रष्ट आलोचना बखूबी कर रही है।
  मैनेजर पाण्डेय आलोचना की सामाजिकता के रास्ते की एक रुकावट के रूप में बेहद जरूरी बात आलोचना की राजधानी क्षेत्र की भाषा को लेकर करते हैं-‘ आज की हिंदी आलोचना को अभिजन संस्कृति का हिस्सा बनाने और उसकी सामाजिकता को सीमित करने का काम आलोचना की भाषा भी कर रही है। हाल के वर्षों में हिंदी आलोचना में संस्कृत से अधिक अंग्रेजी का आतंक बढ़ा है। इस आतंक का अनुभव करना हो तो बहुवचन-7 में छपे सुधीश पचौरी के लेख ‘कबीर धर्मवीर और फूको की जीनियोलाजी’ को पढ़ना उपयोगी होगा, हिंदी में ऐसे आलोचक पहले भी रहे हैं और आज भी हैं जो शायद पाठकों के हिंदी ज्ञान पर संदेह के कारण या किसी अन्य कारण से हिंदी शब्दों के समानार्थी अंग्रेजी शब्दों से अपने लेखों को सजाते रहे हैं, लेकिन सुधीश पचौरी ऐसा नहीं करते। वे देवनागरी लिपि में अंग्रेजी लिखते हैं। उदाहरण के लिए उनके लेख से उद्धरण देखिए: इंटरटेक्स्चुएलिटी के जमाने में सिर्फ मूर्ख ही दलित को कबीर में ढ़ूंढ सकते हैं। जीनियोलाजिकल डिकंस्ट्रक्शन की यही खास बात है कि दलित कबीर की किताब में भले न हो, लेकिन जीनियोलोजी के वर्तमानत्व और दलितवाद के युद्ध में कबीर एक प्राथमिक सांस्कृतिक टेक्स्ट हो सकते हैं।’ हिंदी आलोचना की सामाजिकता के रास्ते में आने वाली एक और बाधा का जिक्र पाण्डेय जी करते हैं-‘हिंदी आलोचना की सामाजिकता को संदेहास्पद बनाने वाली एक प्रवृŸिा वह है जो किसी रचना की समीक्षा के दौरान उसमें मौजूद समाज पर ध्यान नहीं देती।’ इस प्रसंग में वे ललित कार्तिकेय की लिखी अल्मा कबूतरी की समीक्षा का जिक्र करते हुए कहते हैं कि ‘समीक्षक की सारी बौद्धिकता ‘अल्मा कबूतरी’ को एक प्रकृतवादी रचना साबित करने में लगी है। जब आलोचनात्मक चेतना धारणाओं के पीछे-पीछे चलती हुई रचनाओं के बारे में फैसला करती है तब ऐसी ही अदालती आलोचना लिखी जाती है।’ यहां कहना जरूरी है कि उसी लेखिका के शुरुआती उपन्यास को अपठनीय, ठस और भूसाछाप कथाभाषा होने के बावजूद एक संपादक जी ने और कुछ आलोचकों ने सिर पर रखकर जो भांगड़ा किया था, वह क्या था ? क्या यह कहने की जरूरत है कि कथाभाषा में कथारस का चार सौ बोल्ट का करेंट प्रवाहित होता है जो पाठक को न सिर्फ प्यार से अपने सीने से चिपका लेता है, बल्कि किसी कथाकृति को यादगार बनाता है ? यह ठीक है कि ललित कार्तिकेय की आलोचनादृष्टि में बौद्धिकता और नागरबोध की दिक्कत है, पर इस दिक्कत से कहीं बड़ा अपराध कूड़ा कृतियों को आसमान पर बैठा देने से है। क्योंकि एक में अज्ञान या दृष्टिदोष है तो दूसरे में आलोचक के ईमान का लोप ही नहीं बल्कि बाकायदा कदाचार है। क्या यह आलोचना की असामाजिकता नहीं है ? यहां याद दिलाना है कि पाण्डेय जी ने खुद ही ग्राम्शी के इस कथन का उल्लेख आगे किया है कि ‘महत्वपूर्ण साहित्यिक रचना एक कलाकृति होने के साथ ही अपने समय और समाज की सभ्यता का एक हिस्सा भी होती है।’ महत्वपूर्ण बात यह कि ग्राम्शी के इस कथन में यह स्पष्ट है कि एक साहित्यिक रचना का समय और समाज से जुड़ाव होने के साथ ‘एक कलाकृति होना’ भी जरूरी है। इसी नजरिये से दलित विमर्श या स्त्री विमर्श से जुड़ी रचनाओं के साथ एक अविस्मरणीय ‘कलाकृति’ न हो पाने की विफलता की बात की जाती है। बहरहाल मैनेजर पाण्डेय यहां ललित कार्तिकेय के बहाने बेशक बौद्धिकता के खतरों की ओर ध्यान खींचने का जरूरी काम करते हैं। इस क्रम में वे नामवर सिंह को याद करते हुए लिखते हैं-‘नामवर सिंह ने ठीक ही कहा है कि आलोचना अपने समय की बौद्धिकता की उपस्थिति है।’ फिर आर-पार देखते हुए सवाल करते हैं-‘सवाल यह है कि कैसी बौद्धिकता। जाहिर है अपनी सेवा में लगी बौद्धिकता नहीं, बल्कि अपने समाज की वर्चस्ववादी विमर्श की काल्पनिक सहमति के छद्म की निर्मम आलोचना करने वाली बौद्धिकता। ऐसी ही बौद्धिकता अपने समय के समाज के आलोचनात्मक विवेक का प्रतिनिधित्व करती है। वह एक ऐसी निरंतर सतर्क बौद्धिकता होती है जो अपने समय की हलचलों को जानती है और धड़कनों को पहचानती है। उसमें अपने समाज, संस्कृति और साहित्य के प्रति गहरी जिज्ञासा और ऐसी प्रश्नात्मकता होती है, जिसकी पहुंच के बाहर न परंपरा की स्मृति होती है, न वर्तमान का बोध और न भविष्य की चिंता। उस बौद्धिकता का लक्ष्य मनुष्य की स्वाधीनता है, मनुष्य की अमूर्त अवधारणा की दार्शनिक स्वतंत्रता, समाज में पराधीनता के शिकार मनुष्यों की सामाजिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता।’ यही आलोचना की सामाजिकता की बुनियाद भी है। सवाल फिर यहां साहित्य की दुनिया में लेखक की स्वाधीनता का है। क्यों लेखकों का कोई छोटा या बड़ा समूह अपनी स्वाधीनता किसी साहित्य की सŸाा को भेंट कर देता है। लेखकों का समाज हो या वृहŸार समाज उसके स्वास्थ्य से बहुत-सी चीजें तय होती हैं। ‘ अगर समाज का बौद्धिक वातावरण उन्मुक्त और संवादधर्मी होगा तो आलोचना भी मूलगामी, उत्सुक, तेजस्वी, प्रश्नाकुल और सत्यनिष्ठ होगी, लेकिन अगर बौद्धिक वातावरण रूढ़िवादी, पीछे देखू और सहमतिवादी होगा तो आलोचना वैसी ही होगी। हिन्दी आलोचना के बेजान और बीमार होने का एक कारण हमारे समाज का वह बौद्धिक वातावरण है जिसमें साहित्यवाद का सहयोगी सहमतिवाद है। ऐसे वातावरण में पलने वाली आलोचना अगर असामाजिक हो तो आश्चर्य की क्या बात है।’ मैनेजर पाण्डेय आलोचना की सामाजिकता के रास्ते में जगह-जगह घात लगाकर बैठे राहजनों की हरकतों पर बारीक नजर रखते हैं। तभी तो कहते हैं- ‘हिन्दी आलोचना को असामाजिक बनाने में कुछ भूमिका उन आलोचकों की भी है जो अतिरंजना, सरलीकरण, धमकी, फतवा, आशीर्वाद और दुविधा की भाषा में आलोचना लिखते हैं। ऐसी आलोचना गैर जिम्मेदार होती है, इसलिए असामाजिक की होती है।’ कहना बेहद जरूरी है कि आज ऐसे आलोचकों, उप आलोचकों, सहायक आलोचकों की एक पूरी जमात राहजनी के धंधे में लगी हुई है। आलोचकों की यह खेप प्रतिभा की जगह अपनी धंधई से बड़े सुकुल जी का बाप बनना चाहती है, ऐसा इसलिए कि उसके पास आलोचना में आत्मसंघर्ष की कूवत सिरे से गायब है। सच तो यह कि आज आलोचना की सामाजिकता को असली खतरा ऐसे राहजनों से ज्यादा है।