बुधवार, 2 नवंबर 2016

यह न पूछें कि मैं क्यों लिखता हूं

- गणेश पाण्डेय

नवनीत जी, यह न पूछें कि मैं क्यों लिखता हूँ ? ‘सिर से सीने में कभी, पेट से पाँवों में कभी/ एक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है।’-दुष्यंत के एक शेर से शुरू करता हूँ। आप ने पूछा ही है तो कुछ तो कहूँगा। इसकी एक नहीं दो नहीं, कई वजहें हैं। पहली बात तो यह कि मेरी कुंडली में कवि होना लिखा था। दूसरी बात यह कि अपने भीतर का सब कहना बहुत जरूरी था, मैं उसके बगैर रह ही नहीं सकता था। तीसरी बात यह कि मुझे बंगाली जी मिल गये। चौथी बात कि मुझे हिन्दी के कापुरुषों से रोज लड़ना था। पाँचवी बात कि हिंदी के ये चोट्टे मुझे गुप्त कवि बना कर रखना चाहते थे। छठी बात यह कि यहाँ के एक डॉन ने हिंदी के राक्षसों की एक टीम बना ली थी और जिसे अक्सर मेरे खिलाफ प्रमोट करते रहते थे। अपने कंधे पर बैठाकर घूमते थे। सातवीं बात यह कि मैं हिंदी का मर्द था, मैदान छोड़कर भाग नहीं सकता था। आठवीं, नौवीं, दसवीं, न जाने कितनी वजहें। मैं समाज को शर्तिया बदल देने के लिए नहीं लिखता था, क्यों कि सिर्फ कविताएँ समाज को बदल देंगी, यह नहीं मानता था। हाँ, अलबत्ता इसलिए लिखता था कि यह दुनिया बदल जाय, सुंदर हो जाय, इस भाव से लिखता था। प्रतिरोध की चिंगारी को नित सुलगाते हुए यह जानता था कि दुनिया को कवि नहीं, कार्यकर्ता बदलते हैं, जनता क्रांति करती है, वह जनता जो ढं़ग से साहित्य पढ़ना भी नहीं जानती। इसीलिए खुद को कवि कम और कविता का कार्यकर्ता अधिक समझता था। यह भी जानता था कि हमारे समय के अधिकांश कवि डरपोक हैं, इसलिए कविता और दुनिया का सच एक साथ कहने के लिए लिखता था। नाम की लालसा बचपन में रही होगी, पर जब बालिग हुआ और साहित्य में कदम-कदम पर गंदगी के दर्शन हुए तो कविता का सफाई कर्मचारी बनना ज्यादा रास आया। यह सब जानते हैं कि नाम और इनाम के लिए मैं हरगिज-हरगिज नहीं लिखता और न कभी नाम और इनाम की इच्छा से प्रेरित होकर कोई काम करूँगा। लिखने के साथ पत्रिका निकालने की वजह भी साहित्य में हस्तक्षेप करना भी एक बड़ी वजह थी और है। आपने देखा है कि अब तक मैंने साहित्य के सच को फटकार कर कहा है। जब अपने भीतर के स्वार्थ को आदमी मार देता है तो वह पृथ्वी का सबसे निडर बन जाता है। आप जानते हैं कि मैं साहित्य के किसी भी डॉन-फान से नहीं डरता, हाँ डॉन-फान ही मुझसे डरने लगें तो दूसरी बात है।
साहित्य मेरे लिए सच का मंदिर है जो समाज को सुंदर बनाने के लिए स्वप्नों की दीवार और मेहराब पर टिका हुआ है। इस मंदिर में जब गंदगी फैलाने वालों को देखता हूँ तो आगबबूला हो जाता हूँ। साहित्य मेरे लिए मनुष्य की शक्ति का स्रोत है, विवेक और साहस का स्रोत है, मनुष्य की वृत्तियों और संवेदनाओं को परिष्कृत करने का स्रोत है। साहित्य मनुष्य की आत्मा के पीने के पानी का निर्मल झरना है। मुझे इस पानी के धंधे से शिकायत है। मिनरल वाटर जो बाजार में बिकता है, उससे भी शिकायत है तो इस स्तर पर कि सरकारें अगर देश में पीने का शुद्ध पानी नहीं मुहैया करा सकीं तो यह उनकी और इस पूँजीवादी निजाम की विफलता है। साहित्य के जिस पानी की बात कर रहा था, उस पवित्र झरने-आप चाहें तो नदी कह लें-में देश की साहित्य अकादमियों, विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभागों, प्रकाशन उद्योग, हिन्दी के नामी और इनामी डाकू-बदमाशों ने अपनी गंदगी का पनाला डाल रखा है। आप ही बताएँ कि इस देश और हिन्दी की दुनिया में एक लेखक अच्छा लिखे भी और अपनी किताबें छपवाने के लिए प्रकाशकों के दरबार में अपवना शीश झुकाए, ऐसा क्यों ? क्या यह हिन्दी साहित्य की बड़ी गंदगी नहीं है ? एक लेखक अच्छा लिखे और आलोचकों के चरणरज लेने के लिए साष्टांग प्रणाम करे, यह साहित्य की गंदगी नहीं है ? क्या तुलसीदास या मलिक मुहममद जायसी या सूरदास, रामचंद्र शुक्ल के पास चापलूसी करने के लिए आए थे ? कबीरदास, हजारी प्रसाद द्विवेदी के पास बनारस का पान लेकर पहुँचे थे ? निराला जी ने रामविलास जी का पैर दबाया था क्या ? फिर आज का आलोचक यह अपेक्षा क्यों करता है कि लेखक उसके चरणरज को अपने माथे से लगाए और अपनी पीठ पर उसको सवारी कराए ? आप ही बताएँ कि यह हिन्दी साहित्य की सबसे बड़ी गंदगी है कि नहीं ? आखिर नागार्जुन को यह क्यों कहना पड़ा - 
“अगर कीर्ति का फल चखना है
आलोचक को खुश रखना है“
त्रिलोचन को कहना पड़ा -  
“आलोचक है नया पुरोहित उसे खिलाओ
सकल कवि यशःप्रार्थी देकर मिलो मिलाओ।“
आलोचक पुलिस के सिपाही की तरह दो-दो रुपये के लिए कविता के ट्रकों को बीच सड़क पर रोक दे रहा है। बिना दो रुपये लिए जाने ही नहीं देता। यह तो कोई गणेश पाण्डेय की तरह कविता के ट्रक का उजड्ड ड्राइवर हो या बैलगाड़ी का मस्त गाड़ीवान तो बैरियर-सैरियर को तोड़-ताड़कर चल देगा। बाकी लोगों की तो जान साँसत में है। आपसे एक राज की बात बताता हूँ कि मैं तो सीधा-सादा एक छोटा-मोटा कवि था और हूँ, मैं आलोचना में आया ही हिंदी के बेईमान आलोचकों की बेईमानी के खिलाफ। कुछ आलोचक जरूर ऐसे हैं जिनमें गदगी कम है। कुछ में तो गंदगी बिल्कुल कम मिलेगी, लेकिन साहस की कमी तो हर जगह एक जैसी है। एक आलोचक को डरते देखा कि हाय अमुक का नाम लूँगा तो अमुक नाराज हो जाएंगे, अमुक मेरी बेटी को हिंदी विभाग में नियुक्त नहीं होने देंगे। एक आलोचक को देखा कि अमुक का नाम लूँगा तो अमुक विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में मेरी नियुक्ति की संभावना खत्म हो जाएगी, एक को डरते देखा कि अमुक की प्रशंसा करूँगा तो अमुक अलेखक और हिंदी का छुटभैया डॉन नाराज हो जाएगा। लंबी कहानी है भाई डरपोंक आलोचकों की। आलोचक तो आलोचक, नामी-गिरामी कवि भी बहुत डरपोंक दिखे। एक बड़े भारी कवि रहते हैं राजधानी में और पूरब के महाकवि समझे जाते है, वे भी डरते रहे कि हाय इस कवि से दूर रहो, मेरे चेले-चापड़, मेरे संगी-साथी नाराज हो जाएंगे, अलेखकों के साथ रह लेना ठीक, हिंदी के हरामजादों के साथ दारू पी लेना ठीक मगर इस फटीचर कवि से दूर रहो। कहा न, कहानी लंबी है।ं सार यह कि हिंदी की गंदगी को साफ करने के लिए कलम की धार को तेज किया। भीतर के स्वार्थ को नाम-यश की आकांक्षा को मार डाला, इन्हीं हाथों से किया है खून, लीजिए देखिए, तब कहीं जाकर सच कहना और सच के लिए लड़ना सीखा है। मेरे लिए साहित्य की कोई विधा हो फर्क नहीं पड़ता, दर्द अगर सच्चा है तो आप गद्य में ही नहीं कविता में भी जीवन का संग्राम लिख सकते हैं। अब एक कविता आपको न दिखाऊँ, यह कैसे हो सकता है-कविता का शीर्षक है-कम कविता के दिन थे-
कुछ करने के दिन न थे
कविता के लिए मरने के दिन न थे
जो मरे मारे गये, कोई न पूछ थी कहीं।
रोशनी का काम उनके जिम्मे न था
जिनके पास कुछ ढँका-छिपा न था।
गजब का मंजर था सामने
टुटही हरमुनिया थी
वक्त-बेवक्त राग जैजैवन्ती गवैया थे
वही झाँझ-करताल वही बजवैया थे
बड़े-बड़े घुटरुन चलवैया थे
कुछ थे जो 
बाहरी जहाजों पर कूद-कूद चढ़वैया थे
कई तो अपने ऊपर ग्रंथ छपवैया थे।
रटन्त विद्या के दिन थे
एक कविता दौर के अन्तिम दिन थे
दृश्य उन्हीं का था 
जिनके जीवन में कोई संग्राम न था
जीवन छोटा था
कम कविता के दिन थे
फिर भी कुछ पागल थे बचे हुए
जिनके हौसले थे कि कम न थे।

(‘जल में’ से)
यह कविता अपने समय की कविता और कवियों का पोस्टमार्टम है। इसे देने की वजह यह कि आप जान सकें कि एक खराब कविता और खराब कविता को दुरुस्त करने वाली कविता में क्या फर्क है ? एक वजह यह भी है कि आप जान सकें कि यह समय कविता के लिए कितना मुश्किल समय है। इस मुश्किल समय में जाहिर है कि मैं कोई आसान काम कैसे कर सकता था। आसान काम तो वह था जो ऊपर दिख रहा है कि एक पागल को छोड़कर बाकी लोग जिसे कर रहे थे। आप चाहे जितना बुरा मानें, लेकिन ‘‘मुश्किल काम’’ नाम ही एक कविता और यहाँ देना चाहूँगा, ताकि जान जान सकें कि कौन आसान काम कर रहा था और कौन मुश्किल काम-

यह कोई मुश्किल काम न था
मैं भी मिला सकता था हाथ उस खबीस से
ये तो हाथ थे कि मेरे साथ तो पर आजाद थे।
मैं भी जा सकता था वहाँ-वहाँ
जहाँ जाता था वह अक्सर धड़ल्ले से
ये तो मेरे पैर थे जो मेरे साथ तो थे
पर किसी के गुलाम न थे। 
मैं भी उन-उन जगहों पर मत्था टेक सकता था
ये तो कोई रंजिश थी अति प्राचीन
वैसी जगहों और ऐसे मत्थों के बीच।
मैं भी छपवा सकता था पत्रों में नाम
ये तो मेरा नाम था कमबख्त जिसने इंकार किया
उस खबीस के साथ छपने से
और इसमें उस अखबार का क्या
जिसे छपना था सबके लिए और बिकना था सबसे।
मैं भी उसके साथ थोड़ी-सी पी सकता था
ये तो मेरी तबीयत थी जो आगे-आगे चलती थी
अक्सर उसी ने टोका मुझे-
‘पीना और शैतान के संग ?’
यों यह सब कतई कोई मुश्किल काम न था।
(‘जल में’ से) 
दरअसल यह वह फर्क है जो मेरे जैसे कविता के मामूली कार्यकर्ता और हमारे समय के नामी-इनामी कवियों के बीच है। मैं यह नहीं कहता कि मैंने अचछी कविताएँ लिखी हैं, पर यह कहता हूँ कि मेरी कविताओं में मेरे जीवन का खुरदारापन भरपूर है। आप इस खुरदुरेपन को कोई भी नाम दे सकते हैं। आप ‘मर्दाना’ के अर्थ को लिंग से जोड़कर देखने की जगह शक्ति के चेहरे के रूप में देखें तो कह सकते हैं कि मैंने एक अर्थ में मर्दाना कविताएँ और गद्य लिखने की कोशिश की है। मेरा मानना है कि एक छोटे से छोटा कवि भी अपने भीतर सबसे निचले तल में पक्का घर बना कर रहने वाली नाम और इनाम की कमजोरियों को दूर कर ले तो वह भी अपने समय की कविता की सच्ची राह पर चल सकने का कमाल कर सकता है , जिस पर मैंने बस अभी पहला डग ही रखा है। 
कहना जरूरी हे कि साहित्य की भ्रष्ट सत्ताओं के सामने आत्मसमर्पण करने वाले लेखक साहित्य के कीट-पतंग तो हो सकते हैं, हिंदी के सच्चे लेखक नहीं। जाहिर है कि सिर्फ आत्मसंघर्ष ही लेखक के महत्व को जानने की पहली और सबसे बड़ी कसौटी है। एक लेखक जब हिंदी के किसी माफिया के सामने अपनी गर्दन झुकाता है तो सिर्फ़ उसकी गर्दन नहीं झुकती है, उसकी आत्मा झुक जाती है, उसका काव्यविवेक धूल धूसरित हो जाता है, उसकी आलोचना के लोचन मोतियाबिंद हो जाता है, वह अपने समय के झूठ-मूठ के महाजनों का पिछलग्गू बनकर लेखक के स्वाभिमान की हत्या करता है। ऐसे झुंड में भेड़-बकरियों की तरह जीना सबसे नहीं हो पाता है भाई। ऐसे लोगों को राजधानी के साहित्य का राजपथ मुबारक, मुझे अपनी स्वाधीन कुटिया भली। दरअसल साहित्य दृष्टि, विचार, मूल्य, संवेदना और स्वप्न का घर है, जब एक दुर्बल लेखक उसे नाम और इनाम का कारखाना समझ लेता है तो वह साहित्य में जीवन का नहीं मृत्यु का वरण करता है। मेरे लिए साहित्य आत्मा का फाँसीघर नहीं है। मेरे लिए कविता एक अर्थ में मनुष्य का पुनर्जीवन, जिस नये जीवन में हम अपने जीवन में हुई टूट-फूट को ठीक करने की कोशिश करते हैं। यह काम कविता के प्रति सच्चे समर्पण है। जब लेखक का ध्यान कुछ और पाने और जल्दी से पा जाने की ओर होगा तो वह अपने इस दायित्व से विमुख हो जाएगा।

मेरे लिए तनिक सुविधाजनक यह कि आपने यह पूछा है कि मैं क्यों लिखता हूँ, यह नहीं पूछा है कि जो लिखता हूँ, वह क्यों लिखता हूँ ? नही ंतो मुझे सच बताना पड़ता। सच यह कि जैसे और जो-जो और सब लिखते हैं, उस तरह और वह मैं नहीं लिखता हूँ। इसलिए कि मैं न तो फर्जी क्रांति का बिजूका बनना चाहता हूँ और न अपने समय के साहित्य की मुख्यधारा में बह जाना चाहता हूँ। एक लेखक खुद को समय के अँधेरे से नहीं बचाएगा तो दुनिया को सुंदर बनाने का स्वप्न क्या खाक देखेगा ? इस देश को फासीवादी ताकतों से मुक्त कराने का स्वांग करने वालों करी सच्चाई उस वक्त उनके पतलून से बाहर आ जाती है, जब वे साहित्य की भ्रष्ट और क्रूर सत्ता के सामने घुटने टेकते हैं। नाम और इनाम को छोड़िये, कुछ कार्यक्रमों बुलाये जाने के बहुत मामूली स्वार्थ में हिंदी के तमाम छुटभैयों को फिसड्डी महाप्रभुओं के सामने साष्टांग लेटकर प्रणाम की मुद्रा में देखता हूँ तो लगता है कि हम हिंदी के सचमुच के नर्क में तो नहीं आ गये हैं ? देखिए यह देखना बहुत आसान है कि सामने बैठा लेखक किस कोटि का है ? आप उसकी एक रचना को छुएँ या उसके मुखारबिंद से दो शब्द झरने दे ंतो पता चल जाएगा कि इस बंदे की असली जाति क्या है ? जैसे फर्जी भक्ति होती है, उसी तरह फर्जी सांप्रदायिकता विरोध होता है, उसी तरह पूँजीवाद का फर्जी विरोध होता है, ठीक वैसे ही सामंतवाद का फर्जी विरोध दिखता है। आखिर नाम और इनाम सामंती मूल्य है या नहीं ? भक्तिकाल की बड़ी कविता में नाम और इनाम की आकांक्षा है या मुक्ति की ? गौर से देखिए तो वह मुक्ति भी आध्यात्मिक मुक्ति के भीतर सामाजिक मुक्ति की बड़ी और जनाकांक्षा की अभिव्यक्ति है। मैं जो लिखता हूँ, वह इन्हीं फर्जी लेखकों की गंदगी साफ करने का साबुन है। झाग भले ही कम देता हो , पर मैल बहुत अच्छी तरह काटता है, यहाँ तक कि पतलून तो पतलून, चमड़ी भी बाजदफा कट जाती है। यह कहना गलत है कि मैं चमड़ी काटने के लिए लिखता हूँ, पतलून साफ करने के लिए नहीं। काफी पहले आलोचकों और आलोचना पर लिखे गये एक मामूली पर जिसे हमारे समय के दूसरे नंबर के एक आलोचक ने हिंदी आलोचना की अब तक की सबसे बड़ी लफंगई कहा था, उसका बड़ा विरोध हुआ कि उसमें लेखकों की चमड़ी काटी गयी है, जबकि मैंने तो सिर्फ मैल साफ करने की कोशिश की थी। आखिर उस लेख में जिस आलोचना में जिस जातिवाद पर प्रहार था, आलोचना में जिस मुंशीगीरी पर चोट थी, लेखिकाओं के साथ संपादक और आलोचक जो शोषण और नाइंसाफी कर रहे थे,, साहित्य के तमाम अँधेरों में दियासलाई जलाने की कोशिश की गयी थी, वह सब क्या था ? मेरा मानना है कि आलोचना की धंधई ही हिंदी की दुर्दशा की सबसे बड़ी वजह है। इसीलिए हिंदी के बेटे का फर्ज निभाता हूँ। जो जरूरी है, वह लिखना जरूरी है। सांप्रदायिकता के विरोध को न तो बारबार रिपीट करना जरूरी है और न सिर्फ किसी एक संगठन का नाम लेना जरूरी है, कहो तो ऐसे कि वह जितनी अपनी समय में हो उतना ही आने वाले समय में ? आज जो संगठन दिख रहे हैं, कल उसी तरह के दूसरे संगठन दूसरे नाम से आ सकते हैं। यह मेरा मानना है, मैं इस सोच के साथ सांप्रदायिकता का विरोध करता हूँ अपने लेखन में। ‘ओ ईश्वर’ लिखता हूँ, ‘गाय का जीवन’ लिखता हूँ तो ‘सबद एक पूछिबा’ भी लिखता हूँ। जो लिखता हूँ, वह इस तरह लिखता हूँ कि चेहरा खुला रहे और पाठक उसे पहचान ले। कविता लिखता हूँ, भाषण लिखने से बचता हूँ। पैर में पाजामा पहनता हूँ, बालों में कंघा करता हूँ अर्थात गद्य में गद्य लिखता हूँ और कविता में कविता। मैं लिखता हूँ तो अपनी तरह लिखता हूँ। अपने अँगूठे का निशान लगाता हूँ। किसी नामी-इनामी कवि का फर्जी दस्तखत अपनी कविता में नहीं करता हूँ। मैं लिखता हूँ तो सौ फीसदी मैं लिखता हूँ। मैं लिखता हूँ क्यों कि मैं लिखे बगैर रह नहीं सकता। लिखना छोड़ दूँगा और अपनी तरह लिखना छोड़ दूँगा तो मर जाऊँगा। जीने के लिए लिखता हूँ। अमर होने के लिए नहीं लिखता हूँ। कविता पर मर-मिटने के लिए लिखता हूँ। ऊपर कह चुका हूँ- कविता के लिए मरने के दिन न थे/जो मरे मारे गये, कोई न पूछ थी कहीं।’ फिर भी कवि स्वभाव का क्या करूँ। कुत्ते के स्वभाव में चमड़ा प्रेम है तो सहृदय का स्वभाव है अच्छी कविता पर रीझना। यहाँ मुझे कोई डरके मारे पूछे न पूछे कोई फर्क नहीं पड़ता। लगें रहें सब यहाँ के साहित्य के डॉन और उनके गैंग के छुटभैयों के पीछे-पीछे, धुलते रहें उनकी धोती और करते रहें उनकी पूजा, न पूछें मुझे जैसे बंगाली जी को नहीं पूछते, सच्ची कविता को नहीं पूछते। कोई फर्क नहीं पड़ता। आप जैसे मित्र बहुत हैं, पूछते रहें, बहुत है। दरअसल मैं हिंदी के धंधेबाजों के लिए नहीं, हिंदी के बेटों के लिए लिखता हूँ।










शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2016

दीया

- गणेश पाण्डेय

पहला दीया
उनके लिए जो देख नहीं पाते
दूसरा उनके लिए जो दीये को दीया कह नहीं पाते
तीसरा उनके लिए जो दीये की कोई बात सुन नहीं पाते

एक दीया हिंदी के उन भयभीत दोस्तों के नाम 
जिन्होंने मुझे चींटी की मुंडी के बराबर दोस्ती के लायक नहीं समझा

हिंदी के उन दुश्मनों के नाम भी कुछ दीये ठीक उनकी अक्ल के पिछवाड़े
जिन्होंने हमेशा चूहे की पीठ पर बैठकर शेर की पूँछ मरोड़ने की जिद की

ये दीये उन तमाम अदेख दोस्तों की नम आँखों के नाम 
इस वर्ष हारी-बीमारी और हादसों में छोड़ गये जिनके प्रिय और बुजुर्गवार
चाहे मारे गये मोर्चे पर जिनके बेटे, पति और पिता और गाँव के गौरव

पृथ्वी की समूची मिट्टी और आँसुओं से बने ये दीये
क्यों नहीं मिटा पाते हैं, सदियों से बढ़ता ही जाता अँधेरे का डर

एक थरथराती हुई स्त्री के जीवन में क्यों नहीं ला पाते हैं जरा-सा रोशनी
ये दीये क्यों नहीं जला पाते हैं हत्यारों का मुँह, उनके हाथ और लपलपाती हुई जीभ

ये दीये उम्मीद के सही, हार के नहीं
ये दीये बारूद के न सही, प्यार के सही
ये दीये क्रांति के न सही प्रतीक सही
दोस्तो फिर भी जलाता रहूँगा ऐसे ही ये दीये कविता के दोस्त सही
इनकी लौ में है पलभर में हमारी आत्मा को जगाने की शक्ति 

देखो अरण्य के समीप गरीब-गुरबा की बस्ती में जलते दीये
कैसे काटता है एक नौजवान टाँगे से जलौनी लकड़ी
कैसे इनकी रोशनी में डालती है एक माँ बच्चे के मुख में कौर

कैसे कनखियों से देखती है एक युवा स्त्री 
अपने पति के शरीर की मछलियों को, उसकी वज्र जैसी छाती

पैसे की मार से दुखी लोगों के लिए कुछ दीये
उस बाप की ड्योढ़ी पर एक दीया जिसे बेटियों की फीस की चिंता है

जलायें न जलायें चाहे बड़े शौक से भाड़ में जायें
उन आलोचकों के लिए भी कविता के छोटी जाति के कुम्हारों के बनाये कुछ दीये
जिनके घर मुफ्त पहुँचायी गयी हैं गाड़ियों में भरकर बिजली की विदेशी झालरें

विश्वविद्यालयों, अकादमियों, संस्थानों, अखबारों, पत्रिकाओं 
प्रकाशकों और हिन्दी के बाकी दफ्तरों के संडास में एक-एक दीया जबरदस्त

हिन्दी की उन्नति के नाम पर उसकी किडनी बेचकर 
मलाई काटने वाले हजारों हरामजादों के लिए भी

हिन्दी के जालसाजों के छल में फँसे हुए बच्चों के लिखने की मेज पर
जीवनभर जलने वाला कविता का यह दीया खास

हिन्दी बोलने वाले विपन्न बच्चों के लिए उम्मीद का एक दीया
इस साल वे भी बने कलक्टर चाहे कमायें दो पैसा

हिन्दी बोलने वाले बच्चे पैदा करने वाली माँ के बिना चप्पल के पैरों के पास
मेरी, तेरी, उसकी, सबकी गुजर गयी माँ की जिंदा याद के पैरों के पास
चाँदी की पायल की जगह एक गरीब कवि की ओर से मिट्टी का यह दीया।











सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

पांच छोटी कविताएं

- गणेश पाण्डेय

अकड़ 1

हे प्रभु
हिन्दी में ऐसा वक्त भी आये
जब कवि की अकड
कहीं और नहीं
साहित्य की सत्ता के सामने
दिखे।

अकड़ 2

हे प्रभु
आये जरूर आये
हिन्दी में ऐसा भी वक्त
जब आलोचक अपनी अकड़
निरीह कवि के सामने नहीं
साहित्य की सत्ता के सामने
दिखाए।

अकड़ 3

हे प्रभु
आप हो तो ठीक है
न हो तो भी
हिन्दी में ऐसा वक्त जरूर आये
जब पाठक ही पाठक हों
और पाठक के पास इतना बल हो
कि कवि और आलोचक की अकड़
तोड़कर उसकी जेब में डाल दें।

लज्जा

हे प्रभु
माइक के सामने
अखबार के बयान में
कविता लिखते हुए
अकड़ गयी है कवि की रीढ़
जहां-जहां झगड़ना था मीठा बोला
जहां-जहां तनकर खडा होना था झुका
जहां-जहां उदाहरण प्रस्तुत करना था छिपकर जिया
हे प्रभु
उसे सुख-शांति दीजिए न दीजिए
थोडी-सी सचमुच की लज्जा जरूर दीजिए।

फर्क

वे
साहित्यपति थे

उन्होंने कहा -
झण्डा लेकर चलो

मैंने कहा -
डण्डा लेकर चलो।


रविवार, 9 अक्टूबर 2016

रावण का पुतला

- गणेश पाण्डेय
                                          
रामलीला मैदान में
अवैध कब्जे की होड़ है
कमेटी के पदाधिकारियों में
आपस में काफी सिर फुटौवल
और तोड़-फोड़़ है
फिर भी किये जा रहे हैं
जैसे-तैसे
रामलीला

कुछ हैं
बस देख रहे हैं
लीलाभाव से
रामलीला
बच्चे हैं कि जिन्हें
बिल्कुल मजा नहीं आता
अब कोई ढ़ंग से
रावण का पुतला ही नहीं जलाता

कहां बीस-बीस फुट के रावण
और कहां चार-चार फुट के
राम जी
मजा आये तो आये कैसे
नये जमाने के बच्चों को
कोई समझाए कैसे
कहां भीमकाय रावण
कहां क्षीणकाय
और अतिशय दुर्बल
राम जी
कहां रामलीला मैदान में
तमाशबीन ज्यादा
और राम जी की सेना में
मुट्ठीभर
कुपोषणग्रस्त
किशोर
न कोई
हनूमान सरीखा बलशाली
न कोई लक्ष्मण
जाम्बवान और सुग्रीव जैसा
न कोई वानर-भालू जैसा
ताकतवर और जुझारू
जैसे चूहों की टुकड़ी चली हो
राम जी के पीछे-पीछे
रावण को जीतने

आखिर इस बेमेल लड़ाई में
बच्चों को
मजा आये तो कैसे आये
राम जी ने
सचमुच रावण को जीता होगा
यकीन आये तो कैसे आये
अपराधियों के अवैध कब्जे के बाद
सौ गुणे सौ मीटर के
छोटे-से
रामलीला मैदान में
इतनी बड़ी लड़ाई हो तो कैसे हो

कोई तो बताये
राम जी
रावण के भीमकाय पुतले में
आग लगायें तो कैसे लगायें
न तीर पकड़ना सीखा
न कहीं निशाना लगाना
न अपने से बड़े कद वाले पर
कभी प्रहार करना
जैसे-तैसे तीर चलायें भी तो
तीर में वह आग कहां से लायें
जो रास्ते में बुझ न जाये
जैसे-तैसे आउल-फाउल
तमाशबीनों और पटाखों की मदद से
आग लगायें भी तो बच्चों को
राम जी की शक्ति पर
यकीन कैसे आये

और जब
बार-बार दशहरे में
देखेंगे
इस तरह
रावण के पुतले को
जलाने की लीला
तो रावण के अंत पर
उन्हें यकीन आये तो कैसे आये
अब या तो राम जी का
और उनकी सेना का कद बढ़ायें
या रावण को छोटा बनायें

पहले काटें उसके पैर
फिर घेर कर मारें
लेकिन
यह सब करने से पहले
राम जी
लंका के सोने में नहीं
अपनी सीता को छुड़ाने में
मन लगायें।

 (‘जापानी बुखार’ से)


शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

कह दो अपने जनरल से

-गणेश पाण्डेय                      
                     
ओ गायिका !
क्यों गाती हो
इतना अच्छा
कि सुनने वाला
आना चाहे 
तुम्हारे बेहद करीब
बस जाना चाहे 
तुम्हारे देश में
और हो जाना चाहे 
मुसलमान

ओ गायिका !
तुम्हीं क्यों नहीं 
आ जाना चाहती
अपने चाहने वाले के पास
कह क्यों नहीं देती
अपने जनरल से
कोई बुलाता है तुम्हें 
देने के लिए
अपने दिल का हिन्दुस्तान   
                     
कैसा है तुम्हारा जनरल 
मचलता है जिसका दिल
जमीन के एक टुकड़े लिए 
कह दो 
अपने जनरल से 
तुम्हारे कंठ में वास है 
एक देवी का
जिसके पास है 
धरती का नायाब जादू 
न कोई गोला-बारूद 
न कोई छल-बल 
न कोई घृणा
बिना किसी खून-खराबे के
जब चाहे जीत ले दुनिया 

कश्मीर में क्या रखा है 
क्या रखा है 
ऐसे जिद्दी जनरल में
जो बंदूक को 
खुदा समझता है 
और अपनी वर्दी को 
ईश्वर की पोशाक
उसे छोड़ कर 
आ क्यों नहीं जाती 
धरती के इस स्वर्ग में

देखो तो 
कितना मचलता है
तुम्हें चाहने वाले का दिल
तुम्हारी एक आवाज पर 
कैसे निकल पड़ता है 
हथेली पर लेकर
अपना दिल
आओ 
और लो संभालो 
अपना हिन्दुस्तान। 

(‘‘परिणीता’’ से)






रविवार, 18 सितंबर 2016

इतनी अच्छी क्यों हो चंदा

(अच्छी कविताएं सबको अच्छी लगतीं हैं। जिन्हें अच्छी कविता की पहचान होती है, उन्हें अच्छी कविताएं अच्छी लगती ही हैं, लेकिन ऐसा बहुत कम होता है कि किसी कवि को किसी दूसरे कवि की कोई कविता इतनी अच्छी लग जाय कि वह उस कविता को चुनौती मान ले और उस कविता से आगे सोचने की हिमाकत करे। हालांकि हर दौर की नयी पीढ़ी का काम होता है, पहले की पीढ़ी के काम को आगे ले जाना अर्थात उससे आगे सोचना। इस पुरानी और नयी पीढ़ी के काम में अक्सर बहुत प्रभावित हो जाने या नकल करने का खतरा मौजूद होता है, लेकिन एक जिम्मेदार कवि इन खतरों से बचते आगे बढ़ता है। कितने कवियों ने कितने कवियों की कितनी कविताओं को चुनौती मानकर कुछ काम किया है, यह सब नहीं जानता, अलबत्ता मैंने एक गलती जरूर की है, त्रिलोचन की कविता ‘‘चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती’’ को चुनौती मानकर।) 

इतनी अच्छी क्यों हो चंदा
- गणेश पाण्डेय                           

तुम अच्छी हो
तुम्हारी रोटी अच्छी है
तुम्हारा अचार अच्छा है
तुम्हारा प्यार अच्छा है
तुम्हारी बोली-बानी
तुम्हारा घर-संसार अच्छा है
तुम्हारी गाय अच्छी है
उसका थन अच्छा है
तुम्हारा सुग्गा अच्छा है
तुम्हारा मिट्ठू अच्छा है
ओसारे में
लालटेन जलाकर
विज्ञान पढ़ता है
यह देखकर
तुम्हें कितना अच्छा लगता है
तुम
गुड़ की चाय
अच्छा बनाती हो
बखीर और गुलगुला
सब अच्छा बनाती हो
कंडा अच्छा पाथती हो
कंडे की आग में
लिट्टी अच्छा लगाती हो
तुम्हारा हाथ अच्छा है
तुम्हारा साथ अच्छा है
कहती हैं सखियां
तुम्हारा आचार-विचार
तुम्हारी हर बात अच्छी है
यह बात कितनी अच्छी है
तुम अपने पति का
आदर करती हो
लेकिन यह बात
बिल्कुल नहीं अच्छी है
कि तुम्हारा पति
तुमसे
प्रेम नहीं करता है
तुम हो कि बस अच्छी हो
इतनी अच्छी क्यों हो चंदा
चुप क्यों रहती हो
क्यों नहीं कहती अपने पति से
तुम उसे
बहुत प्रेम करती हो।

( चौथे संग्रह ‘परिणीता’ से। )










शनिवार, 17 सितंबर 2016

पितृपक्ष

- गणेश पाण्डेय

जैसे रिक्शेवाले भाई ने किया याद
पूछा जैसे जूतों की मरम्मत करनेवाले ने
जैसे दिया जल-अक्षत सामनेवाले भाई ने
जैसे दिया ज्ञानियों ने और कम ज्ञानियों ने
जैसे किया याद
अड़ोस-पड़ोस और गाँव-जवार ने
अपने-अपने पितरों को

मैंने भी किया याद
पिता को और पिता की उँगली को
बुआ को और बुआ की गोद को
और उसकी खूँट में बँधी दुअन्नी को
सिर से पैर तक माँ को
माँ के आँचल के मोतीचूर को
मामा को और मामा के कंधे को
दादी को और दादी की छड़ी को

अनुभव की चहारदीवारी में
और याद की चटाई पर
आते गए जो भी आप से आप
मैंने सबको किया याद
जिन्हें देखा और जिन्हें नहीं देखा

जैसे ठेलेवाले भाई ने किया याद
जैसे याद किया नाई ने
मैंने भी जल्दी-जल्दी खाली कराया
पितरों के बैठने के लिए अपना सिर ।