सोमवार, 13 जुलाई 2015

साठ की कविताएँ

-गणेश पाण्डेय


(साठ पर लिखी ये कविताएँ बिल्कुल अच्छी नहीं होंगी, बहुत छोटा कवि हूँ। “सबद एक पूछिबा“ में गोरखनाथ से कहा है कि इस शहर के सबसे बड़े कवि आप और सबसे छोटा मैं - कविता के कछार का गरीब बेटा। हाँ, मद्धिम आवाज में यह जरूर कहना चाहूँगा कि “कवि का जीवन“ खराब नहीं जिया है, वह सब नहीं किया है, जिसे करके कुछ लोग ऊँची कुर्सी हथिया लेते हैं। 
     साहित्य के राक्षसों से मिला एक-एक दर्द याद है, पर जाने देता हूँ उन्हें, नहीं कहूँगा कि मेरे साठ साल की कथा “ जीवन ऐसे जिया “ से मिलाकर अपना जीवन देख लो...यह कविता हिन्दी के राक्षसों के पढ़ने के लिए है भी नहीं। इस माध्यम पर मुझे जो बड़े भाई, मित्र और प्यारे अनुज मिले हैं उनके लिए हैं...बड़ी-छोटी बहनों के लिए है...शिष्यों के लिए है...जाहिर है कि हिन्दी के सभी सज्जनों और देवियों के लिए है।)



जीवन ऐसे जिया


कागज में भी आज साठ का हुआ, 
हाँ-हाँ, पक्का हुआ साठ का हुआ
बाबूजी हुआ 
आपके हिसाब से हुआ
माँ आज गणेश चतुर्थी नहीं है
फिर भी तेरा बेटा साठ का हुआ
बुआ देख मेरी कनपटियों के ऊपर
झक सफेद टोपी
तेरी गोदी में छीछी करने वाला बच्चा
साठ का हुआ

चले गये जब सब अपने
क्या-क्या हुआ बताऊँ किसको
पाया क्या-क्या खोया क्या
जीवन ऐसे जिया
जैसे कोई निर्धन
फटी बनियान के भीतर
लेकर अपना टूटा-फूटा ईमान 
जिया

कवि तो हुआ 
बस हुआ नहीं अब तक 
कविता का एकल पाठ कहीं
लिखा नहीं किसी ने 
मेरी कविताओं पर कोई लंबा लेख 
कौन छापता भला 
मुझ देहाती भुच्चड़ का कोई इंटरव्यू  
मेरे नाम नहीं कोई इनाम 
मिला नहीं हिन्दी का कोई प्रभु अब तक
शीश झुकाता जहाँ
बनाता जिसको साहित्य का अपना परमपिता

इस पथ में मिले एक से एक
रंगेसियार
घड़ी-घड़ी आते थे दुश्मन भेस बदल
लड़ता रहा हमेशा जिनसे 
हँसता 
देख हिन्दी के बड़े-बड़े डरपोक निरंतर
सबको बैरी करता ऐसे ही हँस-हँस कर


मत पूछो कैसे-कैसे शत्रु मिले
गुरुओं ने भी किया प्रहार गुरुतर -
‘‘पहला बाण 
जो मारा मुख पर
आंख से निकला पानी।
दूसरे बाण से सोता फूटा
वक्षस्थल से शीतल जल का।
तीसरा बाण जो साधा पेट पर
पानी का फव्वारा छूटा।
खीजे गुरु
मेरी हत्या का कांड करते वक्त
कि आखिर कहाँ छिपाया था मैंने
अपना तप्त लहू।’’

क्या गुरु ,क्या गुरुभाई, सब-
जब भी आते बाहर से साहित्य सितारे
मेरे चेहरे पर लंबा घूँघट कर देते थे
हाथ बाँधकर पीछे 
मिट्टी में नीचे दफना देते थे 
और मैं देहाती भुँईंफोर बन
बाहर आ जाता था

पूछो मत
कितना गरीब था मैं इन साठ सालों में-
दोस्त भी मिले तो ढ़िलपुक 
जो बाद में महाढ़िलपुक हुए और उसके बाद अदृश्य
मेरे जीवन की नीच से भी नीच विडम्बना यह 
कि मेरा ढ़िलपुक दोस्त दिल्ली का पेटेंट भक्त था 
सत्ता किसी की भी हो मान हो अपमान हो
वह दिल्ली का था
हर दिल्ली जाने-आने वाले का सगा था
और मैं कमबख्त किसी का भक्त-सक्त नहीं था
मैं तो लड़ाई में था मुझे फुर्सत कहाँ थी
और कोई देवता मेरे पास फटकता नहीं था

हाय-हाय 
समय बीत गया प्रिये
चतुरकवि नहीं बन पाया 
मठाधीशों की गोद मेरे लिए खाली नहीं थी
निश्चिंतभाव से कविता की कीमियागीरी के लिए
उनके पास वक्त ही वक्त था मेरे पास वक्त नहीं था 

दर्ज किया जाय जहाँपनाह
मेरे पास उन जैसा नहीं था उनके पास मुझ जैसा नहीं
मैं तो लहूलुहान था मुझे सचमुच का लड़ना था
तानाशाह और फासिस्ट पर बिना लड़े कविताएँ कैसे लिखता
कितना अलग-थलग था मैं कविता की नकली दुनिया में
जहाँ अच्छा कवि बनने के मंत्र भी नकली थे
हर चमकता हुआ कवि नकली था
आलोचक भी नकली

एक जुल्फीसँवार चिर युवा आलोचक दिखे, 
खूब बातें होतीं थीं, खूब चाय पीते थे 
उम्र में अपने से छोटे 
हिन्दी के एक जुगाड़ी के पीछे चलने से उन्हें मना करता,
कहता किसी पाजामा, किसी पैंट के पीछे नहीं, साहित्य के पीछे चलो,
वे दिल्ली की गाड़ी के छोटे-छोटे पुर्जे 
चाहे मामूली से मामूली नट-बोल्ट के पीछे जा सकते थे, 
पर मेरे साथ नहीं चल सकते थे
उनको भी नमस्कार किया

चला अकेले
बढ़ा अकेले
चलता रहा, चलता रहा अकेले 
आभासी दुनिया में मित्र मिले वे प्रियवर 
ढ़ूँढ़ता रहा जिन्हें मैं नित्य इस अरण्य में 
यह शहर साहित्य का महा अरण्य 
हैं जहाँ गुफाएँ बड़ी डरावनी
एक से एक हिंस्र और भयभीत साहित्यपशुओं की 
जहाँ संस्थाओं की प्रयोगशाला में शोधित किये जाते हैं 
साहित्य के अतितीव्र विष
जीवन अब तक ऐसे इन्हीं हत्यारों के बीच जिया

यों बाहर भी कुछ हिंस्र दिखे
डरपोक दिखे कुछ
सत्ता से जुड़े एक संपादक को नानी जी की याद आ गयी
हिन्दी के सुमनों पर लिखी मेरी एक मामूली कविता छापने में
कई तो मेरा नाम देखकर डर जाते थे
कि कोई देख न ले उन्हें मेरा नाम देखते हुए 
वे राजनीति के फासिस्टों का अँगरखा तार-तार कर सकते थे
उसे चिंदी-चिंदी करके आसमान में उड़ा सकते थे
पर साहित्य की फासिस्ट सत्ता के आगे
क्षणभर में अपने वस्त्र उतार देते थे

यह साहित्य का एक भयानक समय था
जहाँ मैं था और पूरी ताकत के साथ था
मेरी तरह और लोग भी थे लगभग चीखते हुए
इस बुरे समय में हम साथ-साथ थे
यह भी साहित्य का एक जीवन था

कई लेखकों ने 
साठ पर षडयंत्रपूर्वक
खुद पर खास अंक निकलवाये
कई चिरकुटों ने तो बाकायदा
किताबें संपादित करायीं खुद पर 
मुंशियों से

और कलिकाल में 
षष्टिपूर्ति का पाप इसप्रकार बहुत बढ़ गया 
देखकर 

मेरी जान ने 
अपनी जान के लिए कुर्ता सिलवाया है
देखते नहीं कितना खिल रहा है
एक नाराज कवि की काठी पर

जीवन क्या जिया
कुछ तो बहुत अच्छा जिया
कुछ कम अच्छा जिया
न जीभर का घूमना हुआ
न दुनियाभर की किताबें पढ़ पाया
न घर के फर्श पर टाइल्स लगा सका
न बच्चों के जिए जहाज-वहाज खरीदा
न एक फटीचर कवि की नेक बीवी के लिए 
सोना-चाँदी
जो था सौंप दिया जो किया सो किया

जीवन से अधिक कविता को प्रेम किया
कविता के सरकारी कागज पर लिख दिया
जीवन ऐसे जिया।



साठ का होने पर


साठ तक पहुँचते-पहुँचते
पता चल जाता है कि आ गया है बुढापा दरवाजे पर 
बजाता है साँकल जरा-जरा-सा रुक-रुक कर
किवाड़ की दरार से भी जरा-सा झाँककर देखो तो सीधे घुस आता है 
धड़धड़ाता हुआ बैठक में
पसर जाता है सोफे पर बूट समेत
सोने के कमरे में घुसते उसे देर नहीं लगती
और गुसलखाने में तो पहले से कमोड पर बैठा मिलता है

साठ तक पहुँचते-पहुँचते बात-बेबात चटकने लगती हैं हड्डियाँ
खूबसूरत चमड़ी कट-फट जाती है जगह-जगह
बिखर जाती हैं एक-एक करके सारी पंखुड़ियाँ बूढ़ी त्वचा की
कहां हो तुम देखो किस तरह घेर लिया है मुझे
अच्छे दिनों की याद की झुर्रियों ने
कमबख्त इस बुढ़ापे ने किसी रोज तुम्हें भी छेड़ा होगा सरेराह

मुझे अब क्यों नहीं लगता कि जिंदगी कोई जवांकुसुम है
बबूल भी कम लगता है नाम देने के लिए
और बेईमान दोस्त कहते हैं, नहीं-नहीं, इश्क है इबादत है सबकुछ है 
मैं कहता हूँ नहीं-नहीं 
हद से हद सख्त पहाड़ों के बीच सूखा हुआ सोता कह सकते हो

क्या से क्या कर गुजरने वाली नजर अब अक्सर जाती है ठहर 
बस इससे आगे और इससे साफ दिखता नहीं है कुछ 
तुम कहते हो मेरी नज़र को कुछ हो गया है 
मैं कहना चाहता हूँ कि तुम्हारी सोच को क्या हो गया है 
मुश्किल यह कि हम बाहर चाहे जितना शोर कर लें 
कविता के घर में गुस्सा हो या प्यार इशारे में कहना जरूरी है 
नहीं तो बाहर रहना जरूरी है
कई दिनों से आलोचना के भद्रजनों से कहना चाहता हूँ
और कह नहीं पा रहा हूँ कि मेदा कमजोर हो गया है 
कि भारी गैस बुढ़ापे की निशानी है 
थक गया हूँ 
हर दो मिनट पर धूम-धड़ाके के साथ गैस छोड़ते-छोड़ते
सभा-सोसाइटी हो एसी थ्री या टू का डिब्बा हो या सब्जीमंडी
इज्जत के साथ निकलना मुश्किल है देखते हैं लोग पलट के
लेकिन यह बात कविता में कहना मुश्किल है 

अलबत्ता कह सकता हूँ 
उनदिनों इश्क में भी इतनी तेज नहीं थी खून की रफ्तार 
सब कहते हैं कि रक्तचाप ने मुझे चाप दिया है कसके
और हैरान हूँ कि खून में भी आ गयी है शरबत जितनी मिठास 
एक बूढ़े की पेशाब की एक बूँद के हजारवे हिस्से को चखने के लिए 
न जाने कहाँ-कहाँ से चले आते हैं असंख्य च्यूंटे
कविता की पुलिस मुझे गिरफ्तार न करे तो जानना चाहूँगा 
कि किस देश के बाशिंदे होते हैं ऐसे च्यूंटे 
जरा-सी मिठास के लिए चलते ही चले जाते हैं हजार कोस 
इन्हें धिक्कारूं या झुक कर सलाम करूँ 
बुढ़ापे की मद्धिम आवाज में 

मेरे जैसे असंख्य विपन्न बूढ़े आखिर क्यों मारे-मारे फिरते हैं 
जिन्दगी में जरा-सी मिठास के लिए
गोया समय के पहाड़ के नीचे दबी हुई गुड़ की सबसे छोटी डली हो
और पहाड़ को छाप लिया हो च्यूंटों की दुनिया की सबसे बड़ी फौज ने
और पहाड़ तो पहाड़, टस से मस नहीं

यह जानते हुए कि जिनके पास है, सोने का तमगा नहीं बचेगा
नहीं बचेगा चांदी का विशाल छत्र 
फिर भी सोचता हूँ कि बचा रह जाएगा मुझमें से मेरा कुछ
कोई ढ़ूँढेगा हजार बार मेरे दिल के तहखाने में
मेरा टूटा-फूटा प्यार
ढ़ूंढ़ेगा कोई मुझे मेरी बकवास कविताओं में 
शायद मेरे आगे-आगे गुस्से में चलता मेरा गुस्सा बचा रह जाए
मेरा हौसला बचा रह जाएगा शायद एक कण जितना
और कैसा भी हो मेरा सोचना जो सिर्फ मेरे लिए नहीं है
बचा रहेगा बचा रहेगा बचा रहेगा मेरा दिल कहता है
जलेंगी तो जलेंगी सिर्फ्र आँखें, स्वप्न बचा रहेगा
पृथ्वी की सबसे बड़ी जलती हुई चिता भी उसे नहीं कर सकेगी राख

मेरे बेटो, मेरे प्यारो, तुम भी एक दिन साठ के पास पहुंचोगे
हड्डियां कमजोर होती हैं, टूटती हैं, जुड़ती हैं, 
पृथ्वी पर नयी हड्डियों का कारखाना कभी बंद नहीं होता
आती है हड्डियां नयी-नयी
उतनी ही सफेद, उतनी ही मजबूत और उतनी ही
यह दुनिया खराब और अच्छी हड्डियों का गोदाम है
अंत में आखिर हड्डियों के कुछ टुकड़े ही तो बचते हैं
न रुपया बचता है, न प्रधानमंत्री की कुर्सी
अकादमी का संडास भी साथ छोड़ देता है
किताबें भी धरी की धरी रह जाती हैं, ज्ञान किसी काम का नहीं रहता
साठ का होने पर एक नयी किताब शुरू होती है
लेकिन सबके साथ ऐसा कहां होता है
कुछ लोग साठ के बाद दूसरी योनि में चले जाते हैं
कुछ के पीछे दुम निकल आती है
कुछ के जबड़े में खून लग जाता है
कुछ के नाखून और लंबे हो जाते हैं
कुछ रुपया खाते-खाते
अन्न की जगह हीरे-जवाहरात खाने लगते हैं
कुछ तो रुपये की हाफपैंट पहनकर
देश की सरकार चलाने लगते हैं

कितना दुर्बल हूँ 
कि साठ का होने पर ढ़ंग से एक घर नहीं चला पाता
न किसी जंगल से लकड़ी काटकर ला पाता हूँ
न खेत से मनचाही चीजें
कितना बूढ़ा हो गया हूँ काँपते रहते हैं हाथ
डर के मारे फिसल जाता है दो रुपये का सिक्का

कुछ लोग साठ का होने पर बूढ़े क्यों नहीं होते हैं
जिसके पास बंदूक नहीं होती है
जिसके पास फौज नहीं होती है
जिसके पास लालबत्ती की गाड़ी नहीं होती है
जिसके पास खाना-खजाना नहीं होता है
और जिसके पास तुम नहीं होती हो मेरी जान
सब बूढ़े क्यों हो जाते हैं साठ का होने पर
क्या तुम सब बूढ़ी नहीं होती होगी 
साठ का होने पर।




                        


शनिवार, 4 अप्रैल 2015

गाय का जीवन

- गणेश पाण्डेय

वे गुस्से में थे बहुत
कुछ तो पहली बार इतने गुस्से में थे


यह सब
उस गाय के जीवन को लेकर हुआ
जिसे वे खूँटे से बाँधकर रखते थे
और थोड़ी-सी हरियाली के एवज में
छीन लिया करते थे जिसके बछड़े का
सारा दूध


और वे जिन्हें नसीब नहीं हुई
कभी कोई गाय, चाटने भर का दूध
वे भी मरने-मारने को तैयार थे
कितना सात्त्विक था उनका क्रोध


कैसी बस्ती थी
कैसे धर्मात्मा थे,
जिनके लिए कभी
गाय के जीवन से बड़ा हुआ ही नहीं
मनुष्य के जीवन का प्रश्न ।

(‘अटा पड़ा था दुख का हाट’ से)








बुधवार, 25 मार्च 2015

मैं कहाँ हूँ

- गणेश पाण्डेय

(मेरी यह नयी कविता ‘‘ मैं कहाँ हूँ ’’ मेरे किसी संग्रह में अब तक नहीं शामिल है, बल्कि साक्ष्य के तौर पर मेरी आलोचना की नयी किताब ‘‘ आलोचना का सच ’’ में है। श्री जयप्रकाश मानस जी मेरी इस किताब के बड़े प्रशंसक हैं, उन्होंने कृपापूर्वक इस कविता को ‘‘आलोचना का सच’’ से लेकर और टाइप करके  अपनी वॉल पर दिया है। इसे वहीं से आभार सहित ले लिया है। कई और मित्र भी हैं, जिन्होंने बढ़कर ‘‘आलोचना का सच’’ का स्वागत खुलेमन से और गर्मजोशी से किया है। जाहिर है कि ये सभी मित्र मेरे शहर से बाहर के हैं। मैं इन सभी मित्रों का बहुत आभारी हूँ। इस शहर के हिन्दी के लगभग सभी दुश्मन लेखक इसे देखना पसंद करेंगे, मुझे संदेह है। बाहर भी ऐसे कम न होंगे जिनका रास्ता साहित्य में प्रभुजाति से जुड़े लेखकों की शुद्ध चापलूसी का है, शायद वे सब इस किताब के फ्लैप का यह प्रकाशकीय भी पढ़ना पसंद न करें कि-कवि गणेश पाण्डेय की आलोचना का रंग अलग है। एक खास तरह की निजता गणेश पाण्डेय की आलोचना की पहचान है। उनकी आलोचना नये प्रश्न उठाती है। उनकी आलोचना साहित्यिक मुक्ति की बात करती है। यह पहलीबार है।...गणेश पाण्डेय की आलोचना एक अर्थ में समकालीन आलोचना का प्रतिपक्ष है। मुहावरे सिर्फ कविता में ही नहीं बनते हैं, एक ईमानदार आलोचक अपनी आलोचना का मुहावरा खुद गढ़ता है। गणेश पाण्डेय अपनी आलोचना का मुहावरा खुद बनाते हैं। आलोचना की सर्जनात्मक भाषा का जो प्रीतिकर वितान खड़ा करते हैं, बिल्कुल नया है। हमारे समय की निर्जीव आलोचना को नयी चाल में ढ़ालने का काम करते हैं।...- इस अंश को अपने ब्लॉग पर देने का आशय अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना नहीं है, बल्कि यह बताना है कि यदि मैं भी तमाम मित्रों की तरह साहित्य के अनगिन दरबारों में क्षण-प्रतिक्षण शीश नवाता फिरता तो मुंशीछाप आलोचना लिखता, जैसा कि मेरे कुछ झूठमूठ के मित्र लिखते हैं। यह बताना जरूरी है कि मैंने खुद को अलग बनाने के लिए यह सब कतई नहीं किया है, बल्कि एक लेखक के रूप में यह मेरी ड्यूटी थी कि साहित्य का सच फटकार कर कहूँ। यह अलग बात है कि आज के शीर्ष कवि-लेखक से लेकर छोटे से छोटे लेखक तक मानते हैं कि उनकी ड्यूटी साहित्य का सच फटकार कर कहना नहीं है, बल्कि इनाम लेना है। जाहिर है कि पहले से दो रास्ते रहे हैं साहित्य में। मैं जिस रास्ते पर हूँ, इस शहर में अकेला हूँ, लेकिन बाहर बहुत से मित्र हैं, जिनका रास्ता भी मेरे रास्ते से अलग नहीं है। उन्हीं के लिए लिखता हूँ, उन्हीं के लिए साहित्य में जीता-मरता हूँ। बहरहाल प्रसंगवश यह सब कहना जरूरी था। लीजिए कविता पढ़िए-मैं कहाँ हूँ। इस कविता का मैं जाहिर है कि हर ईमानदार कवि-लेखक है। सिर्फ कोई एक मैं नहीं।)

मैं कहाँ हूँ

मैं कहाँ हूँ, कहाँ हूँ, कहाँ हूँ
इस सूची में नहीं हूँ उस सूची में नहीं हूँ
इस पृष्ठ पर नहीं हूँ उस पृष्ठ पर नहीं हूँ
इस चर्चा में नहीं हूँ उस चर्चा में नहीं हूँ
इस अखबार में नहीं हूँ उस अखबार में नहीं हूँ
इस किताब में नहीं हूँ उस किताब में नहीं हूँ
इसकी जेब में नहीं हूँ उसकी जेब में नहीं हूँ 
इस संगठन में नहीं हूँ उस संगठन में नहीं हूँ
मैं कहाँ हूँ कहाँ हूँ ,कहाँ हूँ ,कहाँ हूँ
किसी आलोचक की आँख में नहीं हूँ
किसी संपादक की काँख में नहीं हूँ
युवा लेखकों के आगे नहीं हूँ
वरिष्ठ लेखकों के पीछे नहीं हूँ 

मैं कहाँ हूँ
यह इक्कीसवीं सदी है 
कि हिंदीसमय की वही नदी है 
जो निकलती है राजधानी से सारा कचरा लेकर 
और फैल जाता है पूरे देश में जहर
यह रचना का कैसा देश है
यह आलोचना का कैसा देश है 
जिसमें बने हुए हैं दाएँ-बाएँ 
बड़े-बड़े बाड़े और फाँसीघर
एक स्वाधीन लेखक क्या चुने जाये तो जाये किधर
किससे पूछँू कि मैं कहाँ हूँ कौन-सा देश है मैं जहाँ हूँ

मैं हूँ कि नहीं हूँ
नहीं हूँ तो फिर क्या हूँ 
हिंदी का कोई कवि हूँ कि कविता का कोई भूत हूँ 
प्रेत हूँ 
किस देवता से पूछूँ किस असुर से पूछूँ  
थक गया हूँ पूछते-पूछते
खग मृग बाघ सबसे पूछते-पूछते
मैं कहाँ हूँ, कहाँ हूँ , कहाँ हूँ , कहाँ हूँ
यह क्या है 
जो किसी झुरमुट में छिपा हुआ है
यह क्या है जो किसी मेघ की ओट में 
है कुछ है जैसा किससे कहूँ कि देखो जरा
किससे कहूँ कि मुझे बताओ जरा
कि मैं कहाँ हूँ किसके पास हूँ किसके साथ हूँ
इस बंदे से पूछूँ कि उस बंदे से पूछूँ
आखिर किससे पूछूँ

मैं कहाँ हूँ।





शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

फुलझड़ी जैसी हँसी का एक पवित्र फूल

- गणेश पाण्डेय

साठ के पास पहुँचते-पहुँचते प्रेम की अंतःसलिला बाहर से बहुत शांत दिखने लगती है या कह सकते हैं कि जीवन के पारिवारिक दायित्व के बीच अवकाश ढ़ूँढते-ढ़ूँढते मद्धिम हो जाती है। उसका हहराता हुआ वेग थम-सा जाता है। यह अलग बात है कि आत्मा के एकांत में प्रेम का मौन माउथआर्गन जब-तब बजता रहता है। कई मौके ऐसे आते हैं, जैसे आज, हमारे भीतर के सितार के तार को छेड़ने के लिए।
‘‘मेरे लिए प्रेम 
बिल्कुल निजी घटना है 
आत्मा का एकांत आलाप
अभिव्यक्ति के सारे दरवाजे बंद हैं जहां 
बस एक अद्वितीय अनुभव है
प्रौढ़ता का एक शालीन विस्फोट
जिसने मेरे प्रेम को 
त्वचा की अभेद्य सतह को भेदकर
भीतर कहीं गहराई में पहुंचा दिया है
शायद मेरे लिए प्रेम
एकांत में किसी फूल से मिलना है।’’ (जापानी बुखार )

      दरअसल इस दिन का अर्थ बूढ़ों के लिए कितना खास हो सकता है और किस तरह, इसे इस बात से अनुभव कर सकते हैं कि एक बूढ़ा इस दिन अपनी जीवनसंगिनी से कहता है कि आज एक फूल मेरी ओर से और भद्र महिला बड़े सम्मान के साथ अपनी फुलझड़ी जैसी हँसी का एक पवित्र फूल वापस कर देती हैं। इससे अधिक अब और क्या हो सकता है। उम्र की ढ़लान पर। शायद यह छोटी-सी हँसी-खुशी  ही अब हमारी जिम्मेदारियों के बोझ से हमें कुछ देर के लिए मुक्त करती है। अच्छा है कि पर्व और इस बहाने मिलने वाले अवसर हमें क्षणभर के लिए ही सही थोड़ा अलग से जी लेने का स्पेस देते हैं।
    हम जिस उम्र और समाज में हैं, बहुत-सी सि़्त्रयाँ अपने बच्चों के लिए घर से बाहर निकलती हैं। ये खरीदना है, वो खरीदना है, इसके लिए यह करना है, उसके लिए वह करना है। बच्चों के साथ उनके जन्मदिन या अन्य अवसर जैसे दिन पर बाहर निकल पाती हैं। सच तो यह कि पुरुष पैसा कमाने की मशीन है तो सामान्य सि़्त्रयाँ घर का पहिया हैं, नींव हैं, साँस हैं, धड़कन हैं और धरती हैं। अपनी साँस को उसकी लय को घर की लय में विलीन कर देना कोई इनसे सीखे। मैं जब भी अपनी जीवनसंगिनी के बारे में सोचता हूँ तो अपने को बहुत कम पाता हूँ। पैसा तो कोई डाँड़ीमार भी कमा लेता है, पर घर को बनाने का काम स्त्री ही करती है।
‘‘एक स्त्री थी
जो दिनरात खटती थी
सूर्य देवता से पहले
चलना शुरू करती थी
पवन देवता से पहले 
दौड़ पड़ती थी हाथ में झाड़ू लेकर
बच्चों के जागने से पहले
दूध का गिलास लेकर
खड़ी हो जाती थी
मुस्तैदी से
अखबार से भी पहले
चाय की प्याली 
रख जाती थी
मेरे होठों के पास
मीठे गन्ने से भी मीठी
यह तुम थी 
मेरे घर की रसोई में 
सुबह-शाम
सूखी लकड़ी जैसी जलती
यह तुम थी!
बावर्ची
धोबी
दर्जी
पेंटर 
टीचर 
खजांची
राजगीर 
सेविका
और दाई
क्या नहीं थी तुम!
यह तुम थी! 
क्या हुआ
जो इस जन्म में
मेरी प्रेमिका नहीं थी
क्या पता
मेरे हजार जन्मों की
प्रेयसी
तुम्हारे अंतस्तल में
छुपी बैठी हो
और तुम्हें खबर न हो
यह कैसी उलझन थी
मेरे भीतर कई युगों से
यह तुम थी
अपने को 
मेरे और पास लाती थी 
करती थी
मेरे गुनाहों की अनदेखी
मेरे खेतों में अपने गीतों के संग
पोछीटा मार कर रोपाई करती हुई 
मजदूरनी कौन थी! 
अपनी हमजोलियों के साथ
हंसी-ठिठोली के बीच 
बड़े मन से मेरे खेतों में
एक-एक खर-पतवार 
ढूंढ-ढूंढ कर निराई करती हुई
यह तन्वंगी कौन थी!
मेरे जीवन के भट्ठे पर
पिछले तीस साल से
ईंट पकाती हुई
झाँवाँ जैसी
यह स्त्री कौन थी
यह तुम थी! 
जिससे 
मेरी छोटी-सी दुनिया में
गौरैया की चोंच में
अंटने भर का 
उसके पंख पर फैलने भर का
एक छोटा-सा जीवन था
एक छोटी-सी खिड़की थी जहां मैं खड़ा था
सुप्रभात का एक छोटा-सा
दृश्यखंड था
यह तुम थी!
मेरे गुनाहों की देवी! 
मुझे मेरे गुनाहों की सजा दो
चाहे अपनी करुणा में
सजा लो मुझे
अपनी लाल बिन्दी की तरह 
अपने अंधेरे में भासमान
इस उजास का क्या करूं 
जो तुमसे है
इस उम्मीद का क्या करूं
आत्मा की आवाज का क्या करूं
अतीत का क्या करूं
अपने आज का क्या करूं
जिसके संग लिए सात फेरे
मेरे सात जन्म के फेरे हैं
जो मेरी आत्मा की चिरसंगिनी थी
मेरा अंतिम ठौर है
यह तुम थी! 
यह तुम हो!! 
मेरी मीता
मेरी परिणीता।’’ (परिणीता)

       मैं बूढ़ों की बात कर रहा हूँ। कह रहा हूँ कि यह दिन अपने जीवन साथी से सिर्फ ‘‘ प्रेम है’’ कहने का नहीं है। अपनी चूकों और गलतियों के लिए माफी माँगने का भी है। यह सिर्फ बूढ़ो ंही नहीं युवाओं के लिए भी अपनी कमियों के सुधार और परिष्कार का दिन भी है।
        आमतौर पर साधारण भारतीय परिवार के वरिष्ठ जनों के लिए इस दिन का वह अर्थ उस रूप में नहीं है, युवा इसे जिस रूप में लेते हैं। सिर्फ मिलकर निकटता का अनुभव करना ही इसका उद्देश्य नहीं होना चाहिए, इसे उच्चतर भावभूमि पर आत्माओं की मैत्री का रंग भी देना चाहिए। अच्छा हो कि हम आज के दिन अपनी एक-एक बुराइयों को तजने का व्रत लें। अपने मित्रों से झूठ न बोलने और उनके विश्वास
को ठेस न पहुँचाने का व्रत लें। मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि पान-तम्बाकू जैसे किसी भी नशे से दूर करने में मेरी श्रीमती जी की बहुत रचनात्मक भूमिका है। मुझे याद है जब मैंने शुरू में पान-तम्बाकू छोड़ा था तो लिखने-पड़ने का काम करने में काफी दिक्कत होती थी। कविता सूझती ही नहीं थी। तब मेरी पत्नी ने सम्बल का काम किया। अनगिनत चाय की कप में अपना न जाने कितना प्रेम मिलाया है कि मुझे फिर कभी पान’तम्बाकू की जरूरत ही नहीं पड़ी। कविताएँ, कहानियाँ, उपन्यास , आलोचना, किस क्षेत्र में यहाँ पान-तम्बाकू खाने वाले लेखकों से कम काम किया है ? आज सिर्फ फूल देने और लेने का दिन नहीं है, अपने साथियों से सीख लेने और देने का दिन भी है। उनके महत्व को स्वीकार करने का भी दिन है। आभार व्यक्त करने का दिन है।
    सच्चा प्रेम मनुष्य को बड़ा बनाता है। उसके भीतर शक्ति का संचार करता है। उसे कमजोर होने से बचाता है। उसे माँजता है। उसे चमकाता हैं। बड़े से बड़े संघर्ष में उसका साथ देता हैं। जब जमाना खिलाफ होता है तो उसका प्रेम ही उसका साथ देता है। आज कहने का मन है कि यहाँ  मैंने जो लंबी लड़ाइयाँ की हैं, घर के किसी अँधेरे कोने में बहुत चुप रहा हूँ, उस भयानक एकांत में मेरी श्रीमती का बल मेरे साथ नहीं रहा होता तो मैं आज इस रूप में आपके सामने नहीं होता। जल्द ही आलोचना पर केंद्रित मेरी आने वाली किताब की पाण्डुलिपि को तैयार करने के लिए बराबर टोकती रहीं कि कब बना रहे हैं। घर और बच्चों को संभालने में बड़ी भूमिका उनकी ही रही है। शायद तभी मैं कुछ समाज के लिए रच पाया, कुछ कर पाया। कहना जरूरी है कि उन्होंने मुझ अकिंचन से जीवन में लिया बहुत कम और दिया बहुत। यह उदाहरण भी मुझे उन्होंने ही दिया कि प्रेम में सिर्फ पाना ही नहीं होता है, देना भी होता है।
       आज बच्चों के पास अपने बुजुर्गों को देने के लिए वक्त बहुत कम होता हैं, उन्हें अपनी दुनिया से अवकाश मिले तब तो। सबसे सुंदर स्वप्न के अद्वितीय रथ पर सवार होकर मेरे अंचल, मेरे समाज और देशभर के बच्चो तुम प्रेम के जिस महाकाश में विचरण कर रहे हो जरा नीचे देखो, किस तरह माँ तुम्हारे लिए आँचल फैलाये खड़ी है-
‘‘मेरे जैसे किसी गुमनाम 
कवि के जीवन की कविता से
इस बूढ़ी स्त्री का
चित्र निकाल कर
ले जाओ
और
मिलाओ इसे
उस बूढ़ी स्त्री से
जिसे तुम जानते तो हो
पर तुम्हारे पास जिसके लिए 
वक्त सबसे कम है
जाओ 
उस मां के पास जाओ 
जिसने दी है तुम्हें 
अपनी लोहे जैसी जवानी
गला कर 
कुंदन जैसी यह तरुणाई...’’(परिणीता) 
      प्रेम  के सातवें आसमान पर भी पहुँचकर अपनी उस माँ की अनदेखी मत करना, जिसे तुम्हारा बूढ़ा पिता बहुत-बहुत प्रेम करता है।                                                                                                                                                                                                                           

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

बच्चों पर कुछ कविताएँ

-गणेश पाण्डेय

कबाड़
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वे दो थे 
भाई जैसे थे छोटे-बड़े
लड़के थे जाने किस धातु के
लोहा थे पीतल थे कि सोना थे चाँदी थे
जो थे जैसे थे खुश थे उस कबाड़ में
जिधर देखते थे कबाड़ ही कबाड़ देखते थे
कबाड़ दुनिया देखते थे।
कंधे से उतारते थे अपना थैला मैला
खोलते थे मुँह और उठाते थे टिफिन बॉक्स
डिब्बी-डिब्बे, टुकड़े प्लास्टिक के
सब थैले में गड़प।
देखते थे छागल का कोई लंबा टुकड़ा
हँसते थे उस बाई की भूल पर
जिसने फेंका होगा।
उठाते थे किसी का लाल रिबन
और चल देते थे गले में बाँधकर
एक कबाड़ से दूसरे कबाड़ में।
 (‘जल में’ से)


तुम्हें कैसा लगता है प्रधानमंत्री
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देखो तो कितना सलोना है दस बरस का लड़का
अखबार लहराते हुए हवा से बात करता है किस तरह
हर सुबह करतब दिखाता है लड़का
अपने से अधिक उम्र की साइकिल पर।

देखो तो छूकर कितनी नन्ही-नन्ही हैं उँगलियाँ
हाथ की रेखाएँ पढ़ो, क्या लिखा है
जिनसे बाँटता है संसद में प्रधानमंत्री की घोषणाएँ
और दुनियाभर की खबरें।

देखो तो पुतलियाँ नचाते हुए लड़का
किस तरह देखता देखता है घरों को
सुनो तो कितना सुरीला है लड़के का कंठ
मुर्गे की तरह बाँग देता हुआ-‘पेपर’।

तुम्हें कैसा लगता है प्रधानमंत्री,
अखबार बाँटता हुआ दस बरस का लड़का
बहुत अच्छा, बहुत प्यारा
अभी-अभी इधर से निकला है हवा में लहराते हुए
राष्ट्रपति का अभिभाषण।
(‘अटा पड़ा था दुख का हाट’ से)


बाबू क्लीनर 
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बाबू क्लीनर 
इतने गंदे क्यों रहते हो
क्यों खाते हो हरदम पान
बात-बात पर हँसते क्यों हो
हो-हो।
हर गाने पर 
मूड़ी खूब हिलाते क्यों हो
लगता है तुम सचमुच 
इस गाड़ी के मालिक हो।
कुछ तो बोलो
बाबू क्लीनर 
खुश दिखने का भेद तो खोलो
हँसकर दर्द छुपाते क्यों हो।
(‘जल में’ से)


किसका है यह पेंसिलबॉक्स 
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जिस किसी का हो
आये और ले जाये
अपना यह पेंसिलबॉक्स
जो मुझे अभी-अभी मिला है
पागल पहिये और पैरों केबीच।
जिस पर कुछ फूल बने हैं
कुछ तितलियाँ हैं उड़ती-सी
और कम उम्र उँगलियों की ताजा छाप है
जिसका भी हो आये और ले जाये
अपना यह पेंसिलबॉक्स।
जिसके भीतर साबुत है आधी पेंसिल
और व्यग्र है उसकी नोंक
किसी मानचित्र के लिए
एक दूसरी पेंसिल है जो उससे छोटी है
बची हुई है उसमें अभी थोड़ी-सी जान
और किसी का नाम लिखने की इच्छा
मिटने से बचा हुआ है एक चौथाई रबर
काफी कुछ मिटा देने की उम्मीद में
किसी तानाशाह का चेहरा
किसी पैसे वाले की तोंद।
किसका है यह
किस दुलारे का किस अभागे का
किस रानी का किस कानी का
जिसका भी हो आये और ले जाये
अपना यह पेंसिलबॉक्स।
(‘जल में’ से)

बोर्ड परीक्षा का पहला दिन
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मेरी सीट
ओ मेरी सीट
कहां है मेरी सीट
उचक-उचक कर ढ़ूढते हैं
इतने सारे बच्चे एक साथ
हाईस्कूल बोर्ड परीक्षा के पहले दिन
नोटिस बोर्ड पर अपनी सीट का पता

मिलते हैं अन्दर घुसते ही कमरे में
एक तुनकमिजाज और कड़कआवाज
अजीब तरह के मास्टर जी
उसपर एक ढ़िलपुक मेज
और आगे-पीछे होती कुर्सी

और
उसके बाद मिलते हैं
परचे के जंगल में कुछ खरहे जैसे प्रश्न
कुछ होते हैं चीते की तरह आक्रामक
और कुछ हाथी जैसे भारी-भरकम

जिसके उत्तर में
निकालकर रख देना पड़ता है
एक पिता का कांपता हुआ कलेजा
और एक मां का आसभरा
और धड़कता हुआ दिल

देखो तो परचे के आगे-पीछे
पंक्तियों के बीच में लुका-छिपी करता है
एक मासूम सवाल-
कैसे करता है करतब
यह सब इतना कोई किशोर
पहली दफा

कोई बताए 
तो सौ में दो सौ पाए !
 (‘जल में’ से)

अभी 
====
बची हुई है अभी थोड़ी-सी शाम
बची हुई है अभी थोड़ी-सी भीड़
नित्य उठती-बैठती दुकानों पर

रह-रह कर सिहर उठती है
रह-रह कर डर जाती है
नई-नई लड़की
छोटी-सी 
श्यामवर्णी
जिसके पास बची हुई है अभी
थोड़ी-सी मूली

और
मूली के पत्तों से गाढ़ा है
जिसके दुपट्टे का रंग
जिससे ढाँप रखा है उसने
आधा चेहरा आधा कान

अनमोल है 
जिसकी छोटी-सी हँसी
संसार की सभी मूलियाँ
जिसके दाँतों से 
सफ़ेद हैं कम

और
पाव-डेढ़ पाव मूली 
एक रुपए में देकर
छुट्टी पाती है 
मण्डी से
ख़ुश होती है काफ़ी
एक रुपये से कहीं ज्यादा

मण्डी से लौटते हुए 
मुझे लगता है-
मूली से छोटी है 
अभी उसकी उम्र
और मूली से बीस है 
अभी उसकी ताज़गी

घर में घुसता हूँ तो  होता है-
अरे!
ये तो मूली में छिपकर
घुस आई है नटखट 
मेरे संग
अभी-अभी 
शामिल हो जाएगी
बच्चों में ।
(‘जल में’ से)

धर्मशाला बाजार के आटो लड़के   
====================
वे दूर से देखते थे और पहचान लेते थे
मद्धिम होता मेरा प्याजी रंग का कुर्ता
थाम लेते थे बढ़कर कंधे से
मेरा वही पुराना आसमानी रंग का झोला
जिसे तमाम गर्द-गुबार ने
खासा मटमैला कर दिया था
वे मेरे रोज के मुलाकाती थे
मैं चाचा था उन सबका
मेरे जैसे सब उनके चाचा थे
कुछ थे जो दादा जैसे थे
इस स्टैंड से उस स्टैंड तक
फैल और फूल रहे थे
छाते की कमानियों की तरह
कई हाथ थे उनके पास
रंगदारी के रंग कई
दो-दो रुपये में
जहां बिकती थी पुलिस
वे तो बस
उसी धर्मशाला बाजार के
आटो लड़के थे हंसते-मुस्कराते
आपस में लड़ते-झगड़ते
एक-एक सवारी के लिए
माथे से तड़-तड़ पसीना चुआते
पेट्रोल की तरह खून जलाते
वे मुझे देखते थे
और खुश हो जाते थे
वे मेरे जैसे किसी को भी देखते थे
खुश हो जाते थे
वे मुझे खींचते थे चाचा कहकर
और मैं उनकी मुश्किल से बची हुई
एक चौथाई सीट पर बैठ जाता था
अंड़सकर
वे पहले आटो चालू करते थे
फिर टेप-
किसी खोते में छिपी हुई
किसी अहि रे बालम चिरई के लिए
फुल्ले-फुल्ले गाल वाले लड़के का
दिल बजता था
उनका टेप बजता था
आटो में ठुंसे हुए लोगों में से
किसी की सांसत में फंसी हुई
गठरी बजती थी
किसी की टूटी कमानियों वाला
छाता बजता था
किसी के झोले में
टार्च का खत्म मसाला बजता था
और अंधेरे में
किसी बच्चे की किताब बजती थी
किसी छोटे-मोटे बाबू की जेब में
कुछ बेमतलब चाबियां बजती थीं
कुछ मामूली सिक्के बजते थे
किसी के जेहन में-
धर्मशाला बाजार की फलमंडी में
देखकर छोड़ दिया गया
अट्ठारह रुपये किलो का
दशहरी आम
और कोने में एक ठेले पर
दोने में सजा
आठ रुपये पाव का जामुन बजता था
और घर पर इन्तजार करते बच्चों की आंखें
बजती थीं सबसे ज्यादा।
(‘जल में’ से)

खेलो छोटे बहादुर
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आओ बहादुर
बैठो बहादुर
खाओ बहादुर
ये खुरमा
ये सेवड़ा
ये देखो रंग-वर्षा
खेलो छोटे बहादुर।
छोड़ो बहादुर
सम्भ्रांत पंक्ति का
पनाला
रहने दो आज जाम
बहने दो जहाँ-तहाँ
छोड़ो कुदाल
फेंको बाँस
लो खुली साँस।
आओ छोटे बहादुर
बताओ छोटे बहादुर
क्या कर रही होगी
इस वक्त पहाड़ पर माँ
माँ के मुख-रंग बताओ
छोटे बहादुर।
कितनी दूर है
तुम्हारा पर्वत-प्रदेश
मुझे ले चलो अपने घर
अकलुष आँख की राह
आओ छोटे बहादुर
अपने अगाये कंठ से
बोलो छोटे बहादुर
मद्धिम क्यों है आज
मुखाकृति।
(दूसरे संग्रह ‘जल में’ से)

आप सौ साल जियें पापा
================

छोड़ दीजिए पापा 
पान के बीड़े चबाना
और तरह-तरह के जर्दे की 
गमकने वाली खुशबू।
तम्बाकू-चूना मलना, ठोंकना
और होंठ के भीतर दाबकर
चुनचुनाहट के मजे लेना
बंद की जिए पापा बंद।
मुझे नहीं पसंद है पापा
मम्मी को नहीं पसंद है पापा।
ये लीजिए पापा सौंफ
इलायची लीजिए पापा
आप सौ साल जियें पापा।
सफेद फ्रॉकों वाली गुडिया जैसी
दस बरस की बिटिया
करती है प्रार्थना।
(‘जल में’ से)


जापानी बुख़ार
=========
   

हे बाबा 
किसका है यह 
जो अभी - अभी था 
और इस क्षण नहीं है 
जिसके मुखड़े के बिल्कुल पास 
बिलख रहे हैं परिजन और स्वजन 
राहुल - राहुल कह कर 

किसका है यह नन्हा - सा 
राजकुमार 
जिसे अपनी छाती से लगाये 
चूमती जा रही है बेतहाशा 
एक लुटी-लुटी - सी बदहवास युवा स्त्री 
जिसकी पथराई आँखों से झर रहे हैं 
आँसू 
झर-झर-झर 

कौन है यह 
अटूट विलाप करती हुई 
अभागी कोमलांगी 
जिसे अड़ोस - पड़ोस की बुजुर्ग औरतें 
चुप करा रही हैं -
यशोधरा - यशोधरा कह कर 
यह किसकी यशोधरा है बाबा 
किसका है राहुल यह 
तुमसे क्या नाता है 

पिपरहवा के किसी सिधई अहीर 
और गनवरिया के किसी बुधई कोंहार से 
इस कालकथा का क्या रिश्ता है 
कितने राहुल हैं बाबा
कितनी यशोधरा 

ढाई हजार साल बाद 
यह कैसी पटकथा लिख रहा है 
काल 
कपिलवस्तु के एक - एक गाँव में 
कपिलवस्तु के बाहर गाँव - गाँव में 
फूस की झोपड़ियों 
और खपरैल के कच्चे - पक्के मकानों में 
इक्कीसवीं सदी के एक - एक राहुल को 
चुन - चुन कर 
कैसे डँस लेता है काल
मच्छर का रूप धर कर

क्या पहले भी मच्छर के काटने से 
मर जाते थे कपिलवस्तु के लोग 
क्या पहले भी धान के सबसे अच्छे खेतों में 
छिपे रहते थे जहरीले मच्छर 
और देखते ही फूल जैसे बच्चों को 
डँस लेते थे ऐसे ही 
जापानी बुख़ार - जापानी बुख़ार 
कह - कह कर 

हमारे पुरखों के  पुरखों के  पुरखे 
शालवन और पीपल के पेड़ वाले 
बाबा 
आज भी जिस जापान में बजता है 
तुम्हारे नाम का डंका 
सीधे वहीं से फाट पड़ी है यह महामारी 
तीर्थों के तीर्थ बुद्ध प्रदेश में 
पूर्वी उत्तर प्रदेश में 

शोक में डूबी हुई है 
यह विदीर्ण धरती 
जहाँ - जहाँ पड़े हैं 
तुम्हारे चरणकमल 
श्रावस्ती हो या मगध 
कपिलवस्तु हो या कोसल 
लुम्बिनी हो या कुशीनारा 
या हो सारनाथ 
हर जगह है तुम्हारा राहुल 
अनाथ 

आमी हो या राप्ती 
सरयू हो या गंगा या कोई और 
जिन - जिन नदियों ने छुए हैं 
तुम्हारे पांव 
डबडब हैं यशोधरा के आँसुओं की बाढ़ से 
देखो तो कैसे कम पड़ गया है 
तुम्हारी करुणा का पाट 
तुम्हीं बताओ बाबा 
क्या 
मेरी माँ यशोधरा 
मेरी चाची यशोधरा
मेरी बुआ यशोधरा
मेरी दादी 
मेरी परदादी की परदादी 
यशोधरा के असमाप्त रुदन से 
जीवित हैं इस अंचल की नदियाँ 

क्यों नहीं सूख जाती हैं ये नदियाँ 
क्यों नहीं खत्म हो जाता है 
राहुल की चिन्ता न करने वाला 
राजपाट 
क्यों नहीं हो जाता सिंहासन को 
जापानी बुखार 

बोलो बाबा 
कुछ तो बोलो 
हे मेरे अच्छे बाबा कुछ तो नया बोलो 
यशोधरा के महादुख पर रोशनी डालो 
आलोकित करो पथ 


क्या गोरखपुर क्या देवरिया 
और क्या महराजगंज 
क्या सिद्धार्थनगर 
क्या अड़ोस - पड़ोस के जनपद 
क्या पडोस के बिहार के गांव-गिरांव 
और क्या नेपाल बार्डर - अन्दर 
हर जगह पसरा हुआ है 
मौत का सन्नाटा 
और डर 
घर - घर में कर गया है घर 

किसी 
नई - नई हुई माँ से 
उसे रह-रह कर पुकारती हुई 
उसकी नटखट पुकार को 
छीन लेना 
सहसा
किसी
पिता की डबडब आँख से 
उसके चाँद-तारे को 
अलग कर देना 
किसी मासूम तितली से 
एक झटके में 
उसके पंख नोच लेना 
और गेंदा और गुलाब से 
उसकी पंखुड़ियों को लूटकर 
मसल देना 
किसी कविता का अंत है 
कि जीवन की अवांछित विपदा 
कि सभ्यता का कोई अनिवार्य शोकगीत 
बोलो बाबा

क्या है यह
जपानी बुखार है तो यहां क्यों है
क्यों पसंद है इसे सबसे अधिक
इसके फंदेनुमा पंजे में
गिरई मछली की तरह तड़प-तड़प कर
शांत हो जाने वाले
इस अंचल के विपन्न , हतभाग्य
और दुधमुंहे

यह कोई बुखार है
बुखार है तो उतरता क्यों नहीं
महामारी है महामारी
नई महामारी
सबसे ज्यादा नये पौधों को
धरती से विलग करने वाली
मौत की तेज आंधी है
बुझाये हैं जिसने 
इस अंचल के
हजारों नन्हे कुलदीप

कहां हैं मर्द सब
बेबस
और विलाप करती हुई मांओं की गोद
शिशु शवों से पाट देने वाला
हत्यारा जापानी बुखार
बचा हुआ है कैसे अबतक
कहां है पुलिस
और कहां है सेना
क्यों नहीं करती इसे गिरिफ्तार
जिंदा या मुर्दा
कोई विपक्ष है
है तो क्यों नहीं मांगता
जीने के अधिकार की गारंटी
कोई सरकार है कहीं
है तो कहां है

आये हाईकमान 
कोई भारी-भरकम मंत्री-संत्री
कोई राजधानी का पत्रकार आये
और 
टीवी पर जिंदगी की दो बूंद देने वाले
महानायक को पकड़कर लाये
कोई तो बतलाये-
जापान में एटमबम से
कितने शिशुओं की आंखें हुईं बंद
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले में
मारे गये कितने अमेरिकी
आखिर कितना है अभी यहां कम

आने से कतराता है
सरकार का मुखिया
करता है वक्त का इंतजार
और हिसाब-किताब
अस्पतालों और सेहत का महकमा
पता नहीं किस अहमक के जिम्मे है
क्या शहर और क्या देहात
क्या धान के खेत
और क्या गड्ढे का पानी
किस सूअर
और किस मच्छर की बात करें 
हर कोनें-अंतरे में बठी हुई है मौत
सफेद लिबास में

एक कहता है
हेलीकाप्टर में बैठकर
अपने नुकीले नाखूनों वाले पंजे से
छिड़केंगे दवा
गांव-खेत , ताल-पोखर 
चल चुकी है राजधानी से
दवा लगी मच्छरदानियों की भारी खेप
हर मुश्किल में आपके साथ है
एक खानदानी पंजा

दूसरा
पहले शंख बजाता है फिर गाल-
बुखार जापानी हो या पाकिस्तानी
मार भगायेंगे
मर्ज कैसा भी हो 
काफी है छूमंतर होने के लिए
कमल की पंखुड़ियों से बनी
एक गोली 

तीसरा आता है बाद में
रहता है सरकार में मगन
कहता है कुछ करता है कुछ
मिनट-मिनट पर सोचता है 
नफा-नुकसान
क्या खूब फबती है 
उसकी दस लाख की गाड़ी पर
हरे और लाल रंग के मखमल जैसे
छोटे से झण्डे में कढ़ी हुई
सुनहली साइकिल 
जिसके पास खड़ा होकर
किसी पुराने दर्द भरे गाने की तरह
कहता है-
जो हुआ उसके लिए बेहद अफसोस है
टीके और दवा का करते हैं इंतजाम
लीजिए फौरन से पेश्तर 
ले आया हूं आठ करोड़ 
बस पकड़े रहें 
साइकिल की मूठ

आते हैं एक से बढ़कर एक
हाथी नहीं आता 
मुमकिन है कभी आये हाथी
गिरते-पड़ते
चाहे हाथी के हौदे पर आये
कोई गुस्सैल
चिंघाड़ते हुए-
नहीं-नहीं , यह नहीं जापानी बुखार
न इंसेफेलाइटिस न मस्तिष्क ज्वर
यह तो है सीधे-सीधे
मनुवादी बुखार 
कमजोर तबके पर है जिसकी ज्यादे मार

कोई नहीं आता ऐसा
कोई वैद्य कोई डाक्टर
कोई लेखक कोई कलावंत
जीवन का कोई इंजीनियर

कोई पथ-प्रदर्शक
कोई माई का लाल
माई से कहने-
घबड़ाओ नहीं माई
लो 
मेरी त्वचा की रूमाल से 
पोंछ लो अपने आंसू 
हर पंजे से बचायेंगे
बचायेंगे कमल से
साइकिल से बचायेंगे
बचायेंगे हाथी से
शर्तिया बचायेंगे माई
इस भगोड़े जापानी बुखार से
सूअर से बचायेंगे
बचायेंगे मच्छर से
सबसे बचायेंगे
माई ।
(जापानी बुखार से)



                                                          



सोमवार, 5 जनवरी 2015

स्वर एकादश के कवि

- गणेश पाण्डेय

बोधि प्रकाशन के ‘स्वर एकादश’ संकलन की वजह से कई कवियों ने खासतौर से ध्यान खींचा है। संकलन में संकलित कवियों के स्वर की विविधता ने ही नहीं, बल्कि तीव्रता ने भी चौंकाया है। इनमें कई ऐसे कवि हैं जो काफी समय से लिख रहे हैं। अलग-अलग अवसरों पर उनकी कविताओं ने पहले भी ध्यान खींचा है। पर यहाँ ठहर कर और एक साथ कई कवियों की रोशनी के बीच देखने पर इनका महत्व बढ़ जाता है। भूमिका में ठीक ही कहा गया है कि इनके स्वर अलग-अलग हैं। हर कवि के स्वर की निजता कविकर्म की बुनियाद है। जो कवि अपने कविता-संसार में अपनी निजता की रक्षा नहीं कर पाते हैं, वे अपनी कविता को नकली कविता की जमात में पहुँचा देते हैं। अच्छे कवि विचारधारा के आग्रह के बावजूद कविताई में अपनी छाप रखते हैं। विचारधारा ही नहीं, संवेदना के स्तर पर भी हर मजबूत कवि अपनी निजता को बचाये रखता है। तभी उसकी कविता नकल होने से बचती है। इस संग्रह की कविताओं में अपने परिवेश के प्रति जो लगाव है, दरअसल वह कवि जीवन का कविता के प्रति स्वाभाविक व्यवहार है। प्रकृति, समाज, रिश्ते, प्रेम इत्यादि से इस संकलन के कवियों की कविता का परिसर बनता है। एक खास बात, अपनी धरती से जुड़ाव की है। इस संकलन के कुछ कवियों में तो लोक संवेदना और काव्य संवेदना के बीच एक झीना-सा आवरण रहता है। कई बार लगता है कि यही कविता की असली दुनिया है। पर दरअसल यह सिर्फ लोक की ताकत नहीं है, लोक को कवि जीवन में जीने की ताकत है। शहरी जीवन पर लिखी तमाम कविताएँ कवि के जीवनानुभव की विपन्नता की वजह से इसीलिए सिर्फ एक काव्य प्रवृत्ति बन कर रह जाती हैं। अपना प्रभाव खो देती हैं। जिन कविताओं में जीवनानुभव की तीव्रता को काव्यानुभव मे बदलने की ईमानदार कोशिश होती है, वे चाहे लोक संवेदना की कविताएँ हों या कस्बाई या शहरी जमीन की, अपनी शक्ति और सौंदर्य का अनुभव कराती हैं। इन कवियों में कई कवि पचास पार के हैं, इसलिए कम से कम मैं उन्हें युवा कवि नहीं कह सकता। उनकी कविताएँ भी कविताई की दृष्टि से युवा कविता से भिन्न हैं। अपनी कविता की बनावट और बुनावट, दोनों स्तरो पर ये प्रभावित करते हैं। मुखातिब होते ही अपनी कविता की बाहों में भर लेते हैं। अपने प्रेम और अपने दर्द, अपने एकांत और अपने संघर्ष का साथी बना लेते हैं।
        अग्निशेखर की कविताओं को पहले भी देखने का अवसर मिला है। पर इस बार खास यह कि कोई ग्यारह कवियों की पंक्ति में क्रम ही ऐसा और अच्छा था कि सबसे पहले उन्हें ही देखा। कश्मीर राजनीति में भले ही एक सौदा रहा हो जिसे राजनीति करने वालों ने अपने-अपने नफे-नुकसान के नजरिये से देखा हो, पर साहित्य में कश्मीर को कभी इस नजरिये नहीं देखा गया है। कश्मीर उसी तरह वहाँ के लोगों के लिए जीवन का आधार है जैसे हमारे लिए पूर्वांचल या अवध या दूसरे अंचल। अपनी धरती से लगाव का क्या मतलब है, यह बताने की चीज नहीं है। अपनी धरती से बिछुड़ने का दर्द भी कितना दुख देता है, कहने की बात नहीं। पर जब यह जीवनानुभव  कविता का हिस्सा बनता है तो कविता कैसे हमारे अंतस्तल में रच-बस जाती है, कैसे हमारे विचार-स्फुलिंग जाग जाते हैं, कैसे हम एक गहरी बेचैनी से भर उठते हैं, कैसे हम उस दर्द के पहाड़ पर अपना सिर पटक देना चाहते हैं, कैसे हम देर तक स्तब्ध रहते हैं, यह सब एक अच्छी कविता ‘पुल पर गाय’ से पता चलता है-

सब तरफ बर्फ है खामोश
जले हुए हमारे घरों से ऊँचे हैं
निपते पेड़
एक राह-भटकी गाय
पुल से देख रही है
खून की नदी
रंभाकर करती है
आकाश में सुराख
छींकती है जब भी मेरी माँ
यहाँ विस्थापन में
उसे याद कर रही होती है गाय
इतने बरसों बाद भी
नहीं थमी है खून की नदी
उस पार खड़ी है गाय
इस पार है मेरी माँ
और आकाश में
गहराता जा रहा है
सुराख।

    दो-दो माँएँ हैं इस कविता में। एक गाय, एक माँ। गाय धरती माँ है। कश्मीर है। जिसके दर्द की आवाज से आकाश में सुराख हो रहा है और बढ़ता ही जा रहा है सुराख। अर्थात दर्द की आवाज और तेज होती जा रही है। कविता इससे आगे कहती यह है, इस विडम्बना से साक्षात्कार कराती है कि आसमान से अमन की जगह हिंसा की बारिश जारी है। गाय माँ की भटकती हुई आत्मा भी बन जाती है। गाय एक हिंदू परिवार की आवाज भी बन जाती है। कई अर्थछवियाँ हैं, इस कविता में। यह कवि की खूबी है कि वह अनेक अर्थछवियों को अस्पष्ट होने से बचाता है। अग्निशेखर की और भी कविताएँ इस संकलन में हैं, दिल्ली में पुश्किन,  पीजा, बर्गर और नाजिम हिकमत, बिरसे में गाँव, याद करजा है बच्चा, तेरी डायरियाँ, माली।  इन कविताओं में संवेदना की बारीक बुनावट के भीतर विचार का एक कोड़ा भी है, जो हमारे समय के यथार्थ से मुठभेड़ करता है। जैसे अग्निशेखर कश्मीर की जगह जम्मू में हैं, उसी तरह केशव तिवारी प्रतापगढ़ की जगह बाँदा में हैं। पर यह दर्द उतना बड़ा नहीं है। इसलिए कि केशव बाँउा में रह कर भी एक प्रतापगढ़ बना लेते हैं। कहना चाहिए कि बाँदा में रच-बस जाते हैं। वहाँ के लोक का हिस्सा हो जाते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि अपने जनपद में नहीं हैं। जहाँ हैं वही उनका जनपद हो जाता है। केशव की कविता में जन के पद की और जनपद की, दोनों की गूँज है। यही बात केशव में मुझे काफी अच्छी लगती है। कई जनवादियों को इधर हिंदी कविता और आलोचना में विलक्षणतावादी होते इतना देखा है कि लगता है कि वे हैं तो शुद्ध विलक्षणतावादी पर अपनी प्रगतिशीलता की दुकान बचाए रखने के लिए संगठनों में शामिल हो गये हैं। वे जनविरोधी भाषा में जनवादी कविताएँ और आलोचना लिखते हैं। कविता और आलोचना के इस अकाल में इधर के कवियों में केशव अच्छे लगते हैं। इसलिए कि जो लिखते हैं, वह जीते हैं। जीवनानुभव के धनी कवि केशव की कुछ कविताओं पर एक छोटे-से नोट पहले भी कह चुका हूँ कि कुछ नये कवि शोर बहुत करते हैं और काम कम। कुछ कवि चुपचाप अपना काम करते हैं। शयद ऐसे ही कवि हैं केशव तिवारी। केशव की कविताओं से मिलकर बहुत अच्छा लगा। हमारे समय और जीवन और खासतौर से लोकजीवन की भूमि पर रची साफ-सुथरी कविताएँ भला किसे अच्छी नहीं लगेंगी। केशव की कविताएँ इसलिए भी अच्छी लगती हैं कि इनमें जीवन की सहजता और लय की तरह कविता का जीवन भी बहुत सहज और आत्मीय है। केशव के लोक की एक बड़ी विशेषता है कि केशव का लोक अपने परिसर का विस्तार करता है। अपने अंचल से बाहर जहाँ-जहाँ लोक है, लोक के जन हैं सब केशव की कविता में रच-बस जाते हैं। जीवन जहाँ भी है, सुख-दुख की डोर के बीच तना है। ‘कल रात’ का छत्तीसगढ़िया मजदूर भी केशव की कविता की आत्मा का सहचर बन जाता है-

‘सोचता हूँ जैसे मैं अवध
और बुदेलखण्ड को चाहता हूँ
मेवाती मेवात को
भेजपुरिया भोजपुर को चाहता होगा
क्ल रात बतिया रहा था
दोस्त के ईंट-भट्ठे पर
सपरिवार काम करने आये एक छत्तीसगढ़िया मजदूर से
वह शराब में डूबा बता रहा था अपने लोगों की बदमाशी
कैसे अपने ही लोगों ने लिखाया झूठा मुकदमा
सयानी होती बिटिया पर कसे छींटे
कई-कई बार बोला वह
एक रोटी खाकर भी न छोड़ता देश
रोटी ही नहीं ये वजहें भी थीं सब छोड़ने की
बोला सालों से नहीं गया दुर्ग और न जाना चाहता है
चलते-चलते मैंने कहा-
कल में जा रहा हूँ दुर्ग
तुम भी तो पाटन के लिए उतरते होगे वहीं
जाने क्या छुपा था उसकी
नाराज आँखों के बीच
कि अचानक छलकने लगा बाहर
शराब के नशे में शिथिल
उदास आखों को इस तरह रोते मैंने
देखा पहली बार।’

    इस कविता में एक लोकमन को ही नहीं, कवि की आत्मा के साथ अपनी आत्मा को भी रोते हुए देख रहा हूँ। मजदूर तो कविता के भीतर रो रहा है। हम बाहर। यह कविता की ताकत है। कश्मीर कहाँ नहीं हैं। जुल्म ढ़ाने वाले कहाँ नहीं हैं। कभी रोटी की वजह से तो कभी बेदखल करने की वजह से, विस्थापन कर क्रम चलता रहता है। जीवन का यह क्रम हर जगह है। लेकिन सच्चाई यह कि हम जहाँ जाते हैं और जिन्दगी के बीस-तीस साल गुजारते हैं, वह जगह हमारी भी हो जाती है। हम उस जगह के हो जाते हैं। स्वर एकादश में केशव की कुछ और अच्छी कविताएँ हैं-दिल्ली में एक दिल्ली यह भी, रातों में कभी-कभी रोती थी मरचिरैया, बिसेसर। सभी कविताएँ अच्छी हैं। सब के बारे में कहने का न तो अवकाश नहीं हैं। अग्निशेखर और केशव तिवारी के बाद बाकी कवियों में जिन कवियों ने ध्यान खींचा है, बिना क्रम के मैं उनके नाम लेना चाहूँगा। कवि की उम्र का कविता के अच्छे होने या यादगार होने से कोई संबंध नहीं है। मुझे अच्छा यह लगा कि हिंदी की पारंपरिक शिक्षा न लेने वाले कई कवि जिन्होंने इतर विषयों में डिग्री ली है, उनकी कविताएँ पानी की तरह तरल, सहज और सरल हैं। इतनी पारदर्शी और इतनी कोमल कि पूछिए मत। सीधे हृदय को छू जाती है। इन कवियों में सबको एक जैसे महत्व का कह पाना मेरे लिए मुश्किल है। कविताएँ सभी कवियों की अच्छी हैं, पर मेरे लिए सभी कवियों की सभी कविताओं को उल्लेख के लिए पसंद कर पाना मुश्किल है। संतोष चतुर्वेदी, महेश पुनेठा, भरत प्रसाद, सुरेश सेन निशांत, राज्यवर्द्धन, राजकिशोर राजन और कमल जीत चौधरी की कुछ कविताएँ काफी पसंद आयीं। जबकि काव्यभाषा की दृष्टि से अधिक ध्यान खींचा है संतोष कुमार चतुर्वेदी, राजकिशोर राजन, महेश पुनेठा और कमलजीत चौधरी ने। अधिक उम्र के कवियों की भाषा तो अच्छी है ही। इसलिए उनका नाम नहीं ले रहा हूँ। पर ध्यान देने की बात यह कि काव्यभाषा अच्छी होने के बावजूद किसी कविता के उल्लेखनीय बनने की और भी वजहें होती हैं। विषय का चुनाव और कविता की बनावट और बुनावट और फिर कविता को एक निश्चित परिणति तक ले जाने का हुनर, इन सब कई बातों पर मेरा ध्यान जाता है। संतोष चतुर्वेदी की कविताओं ने इन्हीं खूबियों की वजह से खासतौर से ध्यान खींचा है। सच तो यह कि इधर हिंदी की पारंपरिक पढ़ाई न करने वाले कई कवियों ने अपनी प्रतिभा और कविता के प्रति दीवानगी की वजह से अच्छा काम किया है या अपनी कविताई के प्रति भरोसा पैदा किया है। संतोष, महेश, राज्यवर्द्धन आदि शायद ऐसे ही रचनाकार हैं। संतोष कुमार चतुर्वेदी की ‘पानी का रंग’ कविता को देखकर मैं दंग था। जैसे एक-एक शब्द से छन कर बह रहा है कविता का पानी। संतोष की कविता का पानी, जीवन का पानी है, सार है, अर्थ है-

‘अनोखा रंग है पानी का
सुख में सुख की तरह उल्लसित होते हुए
दुख में दुख के विषाद से गुजरते हुए
कहीं कोई अलगा नहीं पाता पानी से रंग को 
रंग से पानी को कोई छननी छान नहीं पाती
कोई सूप फटक नहीं पाता
और अगर ओसाने की कोशिश की किसी ने
तो खुद ही भीग गया आपादमस्तक.....’                

           महेश चंद्र पुनेठा की अपनी पहली ही कविता ‘प्रार्थना’ से अपनी कविताई और खासतौर से काव्यसंवेदना के प्रति भरोसा पैदा करते हैं-

‘विपत्तियों से घिरे आदमी का
जब नहीं रहा होगा नियंत्रण परिस्थितियों पर
फूटी होगी उनके कंठ से पहली प्रार्थना
विपत्तियों से उसे बचा पायी हों या नहीं प्रार्थना 
पर विपत्तियों ने अवश्य बचा लिया प्रार्थना को।’       

      पर महेश की कोई आठ कविताओं में मुझे एक नई दुनिया के निर्माण की तैयारी इसलिए ज्यादा अच्छी लगी कि कवि कविता के नये क्षेत्रों में जाने का साहस है। आटा गूँथती स्त्रियों के बहुत से चित्र कविताओं में मिल जायेंगे। पर तेरह बरस के बेटे को आटा गूँथते हुए देखना और उस पूरे प्रसंग में किसी सपने को पकते हुए देखना, देखते बनता है। कविता में इधर नये चरित्रों की मौजूदगी कम हुई है। लेकिन अभी भी कई कवि स्मृतियों के बहाने ही सही जीवन को भासमान करने वाले चरित्रों को लेकर आ रहे हैं। राजकिशोर राजन अपनी पीढ़ी के कवियों में ध्यान खींचते हैं। इस पीढ़ी के कवि सचमुच अच्छा लिख रहे हैं। राजन की ‘सुनैना चूड़ीहारिन’ एक ऐसी ही उम्दा कविता है। राजन का संग्रह भी देख चुका हूँ। संभावनाशील कवि हैं राजन। नोट की सीमा है, इसलिए राजन की कविता का अंश नहीं दे रहा हूँ। राजन से उम्र में छोटे पर उतने ही संभावनाशील कवि कमलजीत चौधरी की भी कविता का अंश नहीं दे पा रहा हूँ। कमलजीत चौधरी की भाषा ध्यान खींचती है। छोटी-छोटी पंक्ति में टटके बिम्ब हैं। भरत प्रसाद भी अपनी कविता की ताजगी की वजह से ध्यान खींचते हैं। ताजगी सिर्फ नये विषयों की खोज में नहीं होती, कभी-कभी पुराने विषयों की नयी कहन में भी ताजगी दिख जाती है, ‘रेड लाइट एरिया’ एक ऐसी ही कविता है-

‘सब कुछ लुट जाने के बावजूद
उसकी आँखों में अभी कितना पानी शेष है
यकीन नहीं होता कि वह अभी भी
हँस सकती है, रो सकती है, नाच सकती है, खुश हो सकती है
सबसे आश्चर्यजनक यह कि वह अभी भी प्यार कर सकती है
खैर मनाइएआपके आदमी होने से अभी उसका विश्वास नहीं उठा है’            
        
          इन कवियों की सभी कविताओं में कविता होने का भरपूर अहसास भी जिन्दा है। निशांत की ‘गुजरात’ कविता गुजरात को पिछले दिनों की साम्प्रदायिक घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में देखते हुए भी उस धरती में भरोेस के बीज अंकुरण किया है। भले ही बेटे के गुजरात जाने के संदर्भ विशेष की वजह से। पूरी कविता अपनी लंबाई ही नहीं बल्कि गहराई से भी पाठक को बाँधकर रखती है। संपादक राज्यवर्द्धन की यह चिंता स्वाभाविक है कि समकालीन हिंदी कविता में ‘अमूर्तन की प्रवृत्ति बढ़ी है तथा अबूझ बिम्बों की बाढ़ आयी हुई है। कतिवा जो कहना चाहती है, वह पाठकों तक ठीक-ठीक संप्रेषित नहीं हो पा रहा है।’ इस नजरिये से ‘स्वर एकादश ’को देखें तो कहना होगा कि संपादक राज्यवर्द्धन का यह प्रयास अपने उद्देश्य में सफल है। यह तो पक्का है कि इस संकलन में संप्रेषण का सकंट नहीं है। लेकिन मित्रो, जितना जरूरी है किसी कविता को अबूझ बनने से बचाने का उपक्रम उतना ही जरूरी है किसी कविता को अच्छी कविता बनाने की कोशिश। एक पहिए में जरा-सा नुक्स होगा तो दूसरा ठीक से काम नहीं कर पाएगा। अभी इस पर रास्ते पर काफी काम बाकी है। अंत में कवियों से यह कि पसंद करने वालों के भरोसे पर ध्यान देंगे तो आगे अपनी कविता को और बेहतर करेंगे। बेहतर की उम्मीद है।