शनिवार, 14 सितंबर 2013

हिंदी का भविष्य

-गणेश पाण्डेय

      हिंदी कभी देश की बेटी रही होगी। इस देश का उजास रही होगी कभी। अपने हृदय प्रदेश के ललाट पर सूरज के गोले की तरह दमकती हुई बिंदी रही होगी कभी। हमारी नसों में हमारे रक्त को दौड़ाती हुई बिजली रही होगी कभी। देश की स्वाधीनता का परचम रही होगी कभी। हाँ, लो, कहता हूँ, झाँसी की रानी भी रही होगी कभी हिंदी। सच तो यह कि हिंदी विचार और संवेदना के वाहक के रूप में शुरू से ही सामाजिक सरोकारों और लोक की अभिव्यक्ति में अपने जीवन की खोज करती रही है। अपने को अर्थ देती रही है। आघ्यात्मिक मुक्ति के साथ सामाजिक मुक्ति को भी जोड़ती रही है। सामाजिक मुक्ति की खोज में राजनीतिक मुक्ति को भी स्वर देती रही है। साहित्य के छोटेमोटे कार्यकर्ता के रूप में ही सही, खुद मैंने इस हिंदी विरोधी समय में साहित्यिक मुक्ति का स्वप्न अपने लेख ‘साहित्यिक मुक्ति का प्रश्न उर्फ इस पापागार में स्वागत है संतो’ में देखने की हिमाकत की है। इस पर यहाँ कुछ नहीं। यहाँ बात हिंदी के बारे में, तब और अब के बीच उभरते तनिक कुछ और जटिल प्रश्नों के बारे में। आज हिंदी का परिदृश्य वह नहीं है जो हिंदी के स्वर्णकाल में था। हिंदी का वह स्वर्णकाल समाज या राजनीति की किसी सत्ता ने नहीं रचा था। उसे बनाया था सीधे-सादे लोगों ने। जनता ने। जनता के भरोसे उस कारनामे को अंजाम दिया था, उस दौर के हिंदी के लेखकों और सेवियों ने। कवियों और कविता प्रेमियों ने हिंदी को उस समय जिस आसन पर बैठाया था, वह अब धराशायी हो चुका है। प्रगतिशील कह भर देने से कोई भाषा आगे नहीं बढ़ती। किसी भाषा को आगे बढ़ने के लिए एक जीवन जीना होता है। जीवन के लिए संघर्ष करना होता है। जनजीवन का प्रतिनिधि बनाना होता है। हिंदी या कोई भी भाषा पुरस्कारो से दीर्घजीवी नहीं है, हाँ पुरस्कारों और भाषा तथा साहित्य की राजनीति से मृत्युमुख जरूर हो जाती है। कहने के लिए हिंदी वही है, पर वह हिंदी नहीं है। वह हिंदी जो उम्मीद की हिंदी थी। वह हिंदी जो इस मातृभूमि की तरह हमारी मातृभाषा थी। वह हिंदी जो हमारी माँ थी। हिंदी तो आज भी है, पर किस हाल में है, यह जानने से पहले रधुवीर सहाय के समय की हिंदी को उनकी कविता ‘ हमारी हिंदी’ में देखें-

हमारी हिंदी एक दुहाजू की नई बीवी है
बहुत बोलनेवाली बहुत खानेवाली बहुत सोनेवाली

गहने गढ़ातंे जाओ
सर पर चढ़ाते जाओ

वह मुटाती जाए 
पसीने से गंधाती जाए घर का माल मैके पहुँचाती जाए

      रधुवीर सहाय ने हिंदी का जो चित्र खींचा है, वह डराता है। ऐसी हिंदी जिसे देखकर और खासतौर से जिसके बारे में सोचकर डर लगे। रधुवीर सहाय पत्रकार भी थे। उनकी यह कविता सिर्फ हिंदी को ही नहीं, हिंदी पत्रकारिता को भी आईना दिखाती है, बशर्ते अखबारों से जुड़े पत्रकार-संपादक इस पर नजर डालना पसंद करें। 
       कभी हिंदी बहुत बोलने में नहीं, फटकार कर बोलने में यकीन करती थी। बहुत खानेवाली और बहुत सोनेवाली तो खैर तब थी ही नहीं। तब तो उसे देश को और समाज को जगाने का काम करना था, खुद भूखों रह कर जन की जठराग्नि का उपाय ढ़ूँढ़ने का काम करना था, सदियों की गुलामी से जनता को मुक्त कराने का काम करना था। तब लेखक भी इतने र्बइमान कहाँ थे ? जगह-जगह प्रचारिणी सभाएँ थीं। कई संस्थाएँ सामाजिक उद्देश्यों के लिए ईमान के भरोसे चल रही थीं। हिंदी के नाम पर धंधा तो बाद में चला है। हिंदी के अखबार भला आजादी के पहले ऐसे ही धंधा करते थे ? हिंदी के लेखक और पत्रकार पुरस्कारों के पीछे भागते थे ? हिंदी उस वक्त ईमान की भाषा थी। इसी भाषा में व्यापार भी होता था, पर हिंदी का व्यापार नहीं होता था। कितना फर्क आ गया है ? आज हिंदी बाजार की भाषा नहीं, खुद एक बाजार है। विज्ञापन की हिंदी देखिए। हिंदी के अखबार और हिंदी की फिल्में और हिंदी के चैनल देख लीजिए। हिंदी को कहाँ आजादी के बाद जन-जन का कंठहार बनाना था, जन के जीवन का आधार बनाना था और कहाँ आज हिंदी जनता के लिए नित्य ठगे जाने और पिछड़े रहने की भाषा है। हिंदी न इस देश की माँ है न बेटी। मुझे क्षमा करेंगे हिंदी के बेटे यह कहने के लिए कि आज अमीरों के पैरों की जूती की भी हैसियत नहीं है उसकी। पूरा देश जैसे अंग्रेजी भाषा के शराब के नशे की गिरफ्त में है, आज अभिभावक अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई से अपने बच्चों के जीवन को बेहतर बनाने का स्वप्न देखते हैं। सोचने की बात है कि जो हिंदी देश की आजादी के महास्वप्न की वाहक रही है, आज युवाओं की बेहतरी के स्वप्न का माध्यम क्यों नहीं बन पा रही है ? अंग्रेजों से लड़ने वाली हिंदी आज देशी अंग्रेजों से क्यों नहीं लड़ पा रही है ? हिंदी के कई लेखक अंग्रेजी पीते रहते पर हिंदी में सोचते रहते तब भी ठीक था, यहाँ तो वे सोचते भी अंग्रेजी में है और जीते भी अंग्रेजी में है। फेसबुक पर हिंदी का राष्ट्रीय चाहे अंतरराष्ट्रीय लेखक बनने वाले अनेक लोगों को अक्सर अंग्रेजी लिखते देख सकते हैं। कभी-कभी तो लगता है कि जैसे हिंदी फिल्म के कलाकार फिल्म के बाहर कैमरे पर अक्सर अंग्रेजी में बोलते हैं, उसी तरह ये लेखक भी उन्हीं की नकल करते हैं। मैं ये नहीं कहता कि आप अंग्रेजी न पढें या न बोलें, पढ़ें खूब और बोलेें भी खूब, पर जब हिंदी वाले से कुछ कहना हो तो सिर्फ हिंदी में कहें। दिक्कतें कम नहीं हैं। ये अंग्रेजीदां लेखक हिंदी में किस्सा कहानी लिखने के साथ-साथ हिंदी में विज्ञान की किताबों का सुंदर और सर्जनात्मक भाषा में अनुवाद करने में भी मदद करते तो क्या कम अच्छा होता ?
   आज हिंदी इंजीनियरिंग की पढ़ाई का माध्यम क्यों नहीं है ? चिकित्सा की पढ़ाई का माध्यम क्यों नहीं है ? ऐसी दूसरी तमाम पढ़ाई का माध्यम क्यों नहीं है ? हिंदी ही नहीं, सभी भारतीय भाषाओं में विज्ञान और तकनीक इत्यादि की पढ़ाई क्यों नहीं ? हिंदी दिवस क्या इन सवालों के लिए नहीं याद किया जाना चाहिए ? राजभाषा बनने या न बनने से क्या और कितना फर्क पड़ता है ? अपनी भाषा में पढ़ाई न होने से देश की गरीब जनता पर बहुत फर्क पड़ता है। कह सकते हैं कि अब हिंदी एक अर्थ में गरीब की बेटी है । कोई भी कभी भी कहीं भी जिसे नुकसान पहुँचा सकता है, जिसके संग हिंसा कर सकता है। अमीर-उमरा तो होते ही किसलिए हैं ? हिंदी का राजपाट आज जिन हाथों में है, वे हिंदी के कितने शुभचिंतक हैं ? हिंदी के हृदय प्रदेश में हिंदी की लूट है। कितनी बेबस है बेचारी हिंदी। जब तक हिंदी लुटती रहेगी, हिंदी के जन लुटते रहेंगे।
  सच तो यह कि आज हिंदी कहीं ज्यादा राजनीति की शिकार है। हिंदी वाले ही हिंदी के साथ राजनीति कर रहे हैं। राजनीति ही नहीं, उसके साथ हिंसा भी कर रहे हैं। राजनेता ही नहीं, हमारे साहित्य के नेता भी हिंदी में वही कर रहे हैं जो राजनेता देश के साथ कर रहे हैं। भ्रष्टाचार राजनीति ही नहीं आज साहित्य का भी सबसे बड़ा और दुष्ट ग्रह है। सरकारी संस्थान तो वर्ष में एक बार हिंदी दिवस मना कर हिंदी का श्राद्ध करते हैं, पर शिक्षण संस्थाओं के हिंदी विभाग तो नित्य, बल्कि क्षण-प्रतिक्षण हिंदी का श्राद्ध करते रहते हैं। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हिंदी का विद्यार्थी किस हिंदी को पढ़ रहा है ? इससे उसका भविष्य कितना सुरक्षित है ? इस पढ़ाई का उसके जीवन और जीविका के लिए क्या मोल है ? इससे उसे नौकरी मिलेगी या चरित्रवान बनेगा या उसकी संवेदना का परिष्कार होगा ? हिंदी पढ़ाने वाले अब उसके लिए आदर्श क्यों नहीं रहे ? क्या यह सवाल हिंदी दिवसों के लिए गैर जरूरी हैं ? कहाँ चूक हुई कि हिंदी आज गहन चिकित्सा कक्ष के बाहर हिंदी के चिकित्सकों की प्रतीक्षा कर रही है ? कहाँ हैं हिंदी के सब पत्रकार, क्यों नहीं खबर लिखते हैं कि हिंदी खतरे में है। 
        हिंदी खतरे में है तो इसके लिए कौन हैं जो जिम्मेदार हैं ? किसने हिंदी को इस हाल में पहुँचाया है ? हिंदी के पाठकों ने या हिंदी के लेखकों और संपादकों ने ? हिंदी की किताबों के पाठक हैं भी या सब सरकारी खरीद का धंधा है ? पाठक की चिंता क्या हिंदी की चिंता नहीं है ? आज की कविता के पाठक कहाँ हैं ? कितने कम हैं ? हैं भी या नहीं ? कहानी के पाठक हैं या कविता जैसी स्थिति है ? दरअसल आज हिंदी साहित्य में शुद्ध पाठकों का टोटा है। पाठक वे हैं जो या तो कविता-कहानी लिखते हैं या आलोचक हैं या विद्यार्थी हैं और मजबूरी में हिंदी पढ़ते हैं या दुर्भाग्य से कोई किताब उनके हाथ लग गयी है। कुछ ऐसे भी पाठक हो सकते हैं जो सचमुच साहित्य के शुद्ध पाठक हैं, पर यह सच है कि वे सिर्फ कहानी या उपन्यास छूते होंगे, कविता या आलोचना नहीं। आलोचना की पठनीयता पर पहले भी कह चुका हूँ। कविता और साहित्य की दूसरी विधाओं के सामने पठनीयता का संकट है। हिंदी की दुनिया से पाठकों को बेदखल करने में प्रकाशकों की भी कम भूमिका नहीं है। वे भी ठस गद्य की भूसाछाप किताबें छापना अधिक पसंद करते हैं। ऐसी किताबें जो अकादमिक जरूरतों के हिसाब से तैयार की गयी हों या जिसमें नमक कहीं न हो। आलोचना की किताबें तो हद दर्जे की ठस होती है। लेखक के पास अपनी कोई भाषा नहीं। कहीं कोई आकर्षण नहीं। उपन्यास के बारे में कह सकते हैं कि ज्यादातर सतही भाषा में अखबारी वृत्तांत कथानक के रूप में परोस दिया जाता है। प्रगतिशीलता के नाम पर या विचार के नाम पर उन्नत कथाभाषा की खोज न करना कथाकार की बड़ी समस्या होती है। प्रेमचंद ने ‘साहित्य का उद्देश्य’ में उन्नत कथाभाषा की वकालत की है। आज जरूरत है हिंदी को फिर से जन-जन का कंठहार बनाने की। इसके लिए लेखक को अपनी भाषा और छाप पर ध्यान देना जितना जरूरी है, उतना ही पाठक की रुचि का परिष्कार करना जरूरी है। हिंदी भले ही आज नौकरी की गारंटी वाली भाषा नहीं है। हिंदी का विकास और महत्व भले ही वोट की राजनीति में कहीं कोई मुद्दा नहीें है, लेकिन चिंता की बात सिर्फ हिंदी के लिए ही नहीं, उर्दू के लिए भी है, उसके विकास के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है। कहना यह है कि आज सरकारों के लिए भाषा और साहित्य और संस्कृति दो कौड़ी की चीज है। संस्कृति मंत्रालय खोल लेने से क्या होता है ? भाषा और साहित्य का धंधा जारी है। अब राजनीति और सार्वजनिक जीवन में वह पीढ़ी नहीं है जो भाषा और साहित्य की चिंता करे। बुरा यह नहीं कि राजनीति में अब वह पीढ़ी नहीं है। बुरा यह कि आज राजनीति और साहित्य, दोनों में वह पीढ़ी नहीं है। 
     आज दृश्य पर हिंदी का राजपाट जिनके हाथों में है, वे आलोचक हैं, संपादक हैं, पुरस्कार बाँटने वाले अलेखक हैं, जिन्होंने हिंदी को जीवन और जरूरत की भाषा की जगह बैठे-ठाले की भाषा बना दिया है। जिस हिंदी को देश के विकास का रथ बनाना चाहिए था, वह खुद दरिद्र स्थिति में हैं। हिंदी के नाम पर चलने वाली संस्थाएँ और अकादमियाँ अपात्र लोगों के हाथ में पड़कर लूट-खसोट का अड्डा बन चुकी हैं। जहाँ हिंदी के सच्चे साधक नहीं, पक्के स्वार्थी, पुरस्कारकामी और अलेखक जाते हैं। हिंदी के संत भला किस सीकरी में जाते थे ? आज समाज और धर्म में ही नहीं, साहित्य में भी असंतो का ही बोलबाला है। ऐसे में हिंदी दिवस क्या और कितना कर सकते है, यह सवाल जितना महत्वपूर्ण है, उससे ज्यादा यह कि हम क्या कर सकते हैं ? हम सच्चे संत नहीं बन सकते हैं तो कोई बात नहीं, क्या हम इतने कमजोर हैं कि साहित्य और भाषा का सच फटकार कर कह भी नहीं सकते हैं ? क्यों नहीं कह सकते हैं हम कि हिंदी को बाहर वालों ने नहीं, खास हिंदी के लोगों ने मारा है। अम्बार लगा हुआ है हिंदी की दुनिया में क्रांतिकारी विमर्शों से। कभी दलित के नाम पर तो कभी स्त्री के नाम पर। कभी क्रांति के नाम पर तो कभी गरीबों के नाम पर। सवाल यह है कि यह विमर्श कितने काम है, जब उसका पाठक उसे देखने के लिए हिंदी के परिसर में मौजूद नहीं है। उसे ही नहीं, महान संत काव्य तक से दूर है। स्त्री और दलित की चिंता जरूरी है, बहुत जरूरी है, उसे जगह मिलनी ही चाहिए, लेकिन भाई मेरे हिंदी की चिंता भी जरूरी है। हिंदी रहेगी और जन-जन का कंठहार बनेगी तभी सारे अच्छे विचार और संवेदनाएँ उस तक पहुँचेंगी। आजादी के छाछठ साल बाद भी क्या हिंदी इस देश के विकास की वाहक है ? क्या हिंदी जनता के स्वाभिमान और सम्मान की वाहक है ? क्या हिंदी सभी सरकारी और गैरसरकारी क्षेत्रों में जनता की भागीदारी सुनिश्चित करने का माध्यम है ? अनुवाद की दृष्टि से क्या आज भी जनता के लिए जो शब्द गढ़े जाते हैं वे संप्रेषणीय हैं ? क्या बोलचाल की सुबोध भाषा में सभी सरकारी आवेदनपत्र का प्रारूप हिंदी में सुलभ है ? क्या हिंदी में बातचीत छोटे से लेकर उच्चतर स्तर तक प्रतिष्ठा का पयार्य है ? क्या अंग्रेजी के विकल्प के रूप में प्रतिष्ठित करने की कोई कामयाब कोशिश की गयी ? क्या आनेवाला वक्त अच्छा होगा ? क्या हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि हिंदी भाषा का जादू सत्ता पर छा जाएगा ? सत्ता हिंदीमय हो जाएगी ? क्या हिंदी सिर्फ वोट माँगने की भाषा बनकर रह जाएगी ? कोई भाषा किसी समाज की सिर्फ जुबान नहीं होती दोस्तो, उसके हाथ और पैर भी होती है। समाज की आँख और दिमाग का भी काम करती है, लेकिन क्या कर सकते हैं हम, जब भाषा के जादूगर, चाहे भाषा के इंजीनियर, चाहे भाषा के सौदागर, चाहे भाषा के आचार्य सबसे भ्रष्ट के रूप में जाने जाएंगे और अपनी इस कामयाबी पर इतराएंगे। 
       कभी हिंदीसेवी पद सम्मान का प्रतीक था, वे हिंदी के लिए पूरा जीवन समर्पित कर देते थे। वे हिंदी को जीवन देते थे। आज हिंदीसेवी नहीं दिखते हैं। हिंदी के छलिया दिखते हैं। ढ़ोंगी दिखते हैं। हिंदी की इस मुश्किल घड़ी में जिन जगहों को हिंदी के जीवनरक्षक की भूमिका का निर्वाह करना था, यह कहने में कोई संकोच नहीं कि आज हिंदी शिक्षण से जुड़े वे उच्च शिक्षा संस्थान हिंदी के वधस्थल हैं। जब तक इन संस्थानों को हिंदी का सच्चा मंदिर नहीं बनाएंगे, जहाँ हिंदी के पुजारियों का सम्मान नहीं करेंगे, जहाँ से हिंदी के चापलूसों और धंधेबाजों को बाहर नहीं करेंगे, हिंदी जिस हाल में है, उससे बेहतर की उम्मीद बेमानी है। आज हिंदी प्रदेश मुश्किल में है। उच्चशिक्षा संस्थानों से जुड़े हिंदी विभाग सफेद हाथी हैं। आप हाथी की जगह चूहा या कुछ और भी कहना चाहें तो कह सकते हैं। सिर्फ कुछ लोगों को छोड़ दें तो दृश्य बहुत निराशाजनक है।  अधिकांश आचार्य व्यवस्था की विसंगति के संगतकार हैं। जहाँ बोलना चाहिए, अक्सर वहाँ चुप रहते हैं। ऐसे-ऐसे आचार्य हैं कि पूछिए मत, जिन्हें कहीं किसी और सरकारी या गैर सरकारी दफ्तर में इंस्पेक्टर या मुंशी होना चाहिए, आचार्य हैं। ऐसे लोग जिन्हें आचार्य होना चाहिए था किसी और सरकारी या गैर सरकारी दफ्तर में हैं। कई नाम हैं जो हिंदी के विद्यार्थियों को बेहतर दे सकते थे और उन्हें बेहतर बना सकते थे। कम से कम एक माहौल तो बना ही सकते थे। जैसे एक बैलसे खेती नहीं हो सकती, उसी तरह एकाध प्रतिभाएँ पूरे विभाग का माहौल दुरुस्त नहीं कर सकतीं। हिंदी के इस वधस्थल में रहते हुए अपने को बचा ले जाएँ तो इतना ही बहुत हैं। मैं हिंदी का कोई ज्योतिषी नहीं हूँ, फिर भी कहता हूँ कि हिंदी का भविष्य मुश्किल में है। हिंदी के बच्चे मुश्किल में हैं, हिंदी के देश में जहाँ हिंदी में पी-एच.डी. करने के बाद हमारे बच्चे पाँच हजार रुपये महीने पर काम करते हों, वहाँ हिंदी का भविष्य कैसे और किनके भरोसे बेहतर होगा ? हिंदी के बच्चे बहुत मुश्किल में हैं।
(यह लेख ‘फरगुदिया’ ब्लॉग पर भी है। ) 





गुरुवार, 29 अगस्त 2013

हँसो कि नक्कारखाने में तूती की आवाज हूँ

-गणेश पाण्डेय

जब मैं कहता हूँ कि काजल की इस कोठरी को ढहा दो तो जानता हूँ कि काजल की यह कोठरी किसी गरीब की मड़ई नहीं है, जिसे कोई दबंग चुटकी बजाते हुए गिरा देगा। यह भी जानता हूँ कि जब तमाम साथी इस व्यवस्था को बदलने की बात करते हैं तो उन्हें यह अच्छी तरह पता रहता है कि यह व्यवस्था एक मिनट में नहीं बदल जाएगी। उन्हें पता है कि गरीब, पिछड़े, आदिवासी की मुश्किलें हमारे जीवनकाल में खत्म नहीं होने जा रही हैं। मैं भी जानता हूँ। साथी भी जानते हैं। हम बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि हमारे जीवित रहते इस दुनिया से पूँजीवाद का नाश नहीं होने जा रहा है। यह भी पता है कि राजधानी में भ्रष्टाचार का विरोध करने के लिए चाहे लाख नहीं, करोड़ लोग जमा हो जाएँ, भ्रष्टाचार खत्म नहीं होने जा रहा है। गांधी जी फिर से आएँ, चाहे मार्क्स-एंगेल्स और लेनिन तुरत या अगले कुछ सालों में ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा है कि उनकी जरूरत खत्म हो जाए। हम जानते हैं कि सूरज को निकलने में कोई बारह घंटे लगते हैं, रात होते ही कहाँ झट से सूरज निकल आता है। हम जानते हैं कि इस दुनिया और इस देश को जस की तस चलाने वाली ताकतें बड़े बदलाव का विरोध इसी तरह करती रहेंगी। हम यह भी जानते हैं कि बदलाव की आवाज इसी तरह गूँजती रहेगी। जहाँ तक साहित्य की बात है, यह जानता हूँ कि मैं साहित्य के इस नक्कारखाने में तूती की आवाज हूँ। मेरी तरह दूसरे भाई भी तूती की आवाज हैं। अलबत्ता हमारे बहुत से भाई जिन्हें बदलाव की इस लड़ाई में साथ होना चाहिए था, अलग-अलग वजहों से हमारे साथ नहीं होते हैं। फिर भी कुछ लोग क्यों पूरी दुनिया में, इस देश में, समाज और साहित्य में दीवानों की तरह बदलाव के गीत गाते रहते हैं ? क्यों गाँव-गाँव, जंगल-जंगल, शहर-शहर बदलाव के ऐसे दीवानों की आवाज सुनाई देती है ? क्यों दुनिया के असंख्य नक्कारखाने में कहीं भी कभी भी कोई तूती चुप नहीं होती है ? ऐसा इसलिए कि हम बदलाव के गीत गाये बिना साँस तक नहीं ले सकते हैं ? हमारे जिंदा रहने की शर्त ही प्रतिरोध है, असहमति है, संघर्ष है।
      जब मैं कहता हूँ कि साहित्य में भ्रष्टाचार की इमारत ढहा दो तो जानता हूँ भाई कि मेरे जीते जी यह काम नहीं होने जा रहा है। मेरे लिए जीवन भी एक कविता है। जब आप कविता लिखते हैं तो कविता में बदलाव की सुबह का इशारा क्यों करते हैं, क्या सचमुच बदलाव की सुबह हो रही होती है ? इसी तरह दोस्त, इसी तरह, काजल की कोठरी को ढहाने की बात करता हूँ। मैं जानता हँू कि साहित्य में नायकों की धोती में दाग बहुत है, इसे एक मिनट में साफ करने का कोई डिटर्जेंट पावडर मेरे पास नहीं है। फिर भी इसलिए कहता हूँ कि मेेरे जीवनकाल में नहीं, सौ - दो  सौ साल बाद सही, उसके भी  बाद सही, साहित्य से ये भ्रष्टाचार दूर हो, अन्याय दूर हो। क्या एक छोटे से छोटे लेखक के पास यह स्वप्न नहीं होना चाहिए ? बहुत अच्छी तरह जानता हूँ कि जब तक साहित्य, कला और संस्कृति के परिसर से अँधेरा नहीं हटेगा, समाज और राजनीति से अँधेरा रत्तीभर कम नहीं होगा। क्या दुनिया में जहाँ-जहाँ बदलाव आया है, वहाँ के लेखक साहित्य के हर तरह के काले कारमाने में जुटे थे या उनके पास साहित्य का थोड़ा-सा ईमान बाकी था ? क्या अपने देश में विचार और संस्कृति से जुड़े प्रबुद्ध और गंभीर कार्यकर्ता अपने ईमान के साथ पीड़ित जन के साथ नहीं हैं ?
    जैसे जनता का एक बड़ा हिस्सा व्यवस्था की खुरचन के प्रलोभन में फँसा रहता है, हजार तरह के डर उसके सामने होते हैं, उसी तरह कुछ लोगों को छोड़कर हिंदी के लेखकों बहुत बड़ा हिस्सा डरा हुआ रहता है। हाय, पाँच सौ की टॉफी, हाय इस अकादमी, हाय उस अकादमी, हाय इस पीठ, हाय उस पीठ का इनाम हाथ से निकल जाएगा। फिर भी जनता तो आंदोलन करती है। दफ्तर घेरती है। ये लेखक जिस जनता को बड़ी-बड़ी सीख्  देते है , उससे तनिक भी सीख नहीं लेते हैं। मैं पूछता हूँ कि यार अच्छा लिखोगे तो कौन-सा आलोचक है जो तुम्हारी अच्छी चीज छीन लेगा, उसे भूसे के मंडीले में छिपा देगा ? या उसे जमीन में गाड़ देगा ? कौन है जो तुम्हारी अच्छी रचना को बम से उड़ा देगा ? नाम तो बताओ जरा उस आलोचक का ? कौन है आज की तारीख में महाबली ? क्यों मरे जाते हो कि कोई आलोचक जरा-सा नाम ले ले ? क्यों मरे जाते हो अमुक अखबार में, अमुक पत्रिका में अपना नाम देखने के लिए ? अपमान के साथ कहीं मत छपो, अपमान के साथ किसी मंच पर मत बैठो, अपमान के साथ कोई पुरस्कार मत लो। अपनी पत्रिका निकालो, चाहे दस पेज का ही सही। अपनी किताब छपवाओ। आएगा कोई तुम्हें पढ़ने वाला। तुम्हें देखने वाला। दूसरे संग्रह की अपनी ही एक कविता ‘मुश्किल काम’ फिर याद आ रही है, ऐसा इसलिए कि इस मिजाज की हमारे समय की कोई और कविता फिलहाल मुझे याद नहीं आ रही है-

यह कोई मुश्किल काम न था
मैं भी मिला सकता था हाथ उस खबीस से
ये तो हाथ थे कि मेरे साथ तो थे पर आजाद थे।
मैं भी जा सकता था वहाँ-वहाँ
जहाँ-जहाँ जाता था अक्सर वह धड़ल्ले से
ये तो मेरे पैर थे
जो मेरे साथ तो थे पर किसी के गुलाम न थे।
मैं भी उन-उन जगहों पर मत्था टेक सकता था
ये तो कोई रंजिश थी अतिप्रचीन
वैसी जगहों और ऐसे मत्थों के बीच।
मैं भी छपवा सकता था पत्रों में नाम
ये तो मेरा नाम था कमबख्त जिसने इन्कार किया
उस खबीस के साथ छपने से
और फिर इसमें उस अखबार का क्या
जिसे छपना था सबके लिए और बिकना था सबसे।
मैं भी उसके साथ थोड़ी-सी पी सकता था
ये तो मेरी तबीयत थी जो आगे-आगे चलती थी
अक्सर उसी ने टोका मुझे-‘पीना और शैतान के संग’
यों यह सब कतई कोई मुश्किल काम न था।

         एक लेखक का जीवन भी पतित जीवन हुआ तो फिर उसमें और किसी दुष्कर्मी बाबा-साबा में क्या फर्क रह जाएगा ? बोलो दोस्तो ? बाबा गंदा है और तुम गंदे नहीं हो ? राजनीति और धर्म के नायक पवित्र हो जाएँ और तुम ? राजनीति में सब सेकुलर हो जाएँ और तुम इनाम के मामले में सांप्रदायिक बने रहोगे ? दुष्कर्म में लगे रहोगे ? हँसो कि मैं बेवकूफी की बात करता हूँ। हँसो कि मैं नहीं जानता, पुरस्कार ही आज बहुसंख्यक लेखक के जीवन का प्रयोजन है। हँसो कि मैं दूध में पानी की तरह कमल जाने की कला नहीं जानता। हँसो कि मैं बड़ों का सम्मान करना नहीं जानता। हँसो कि मैं गँवार हूँ। हँसो कि मैं उजड्ड हूँ। हँसो कि मैं लेखक संगठन का रास्ता नहीं जानता हूँ। हँसो कि मैं फलाना शहर की भूलभुलैया नहीं जानता हूँ। हँसो कि साठ के पास पहुँचकर भी अपने प्रदेश की राजधानी में किसी चर्चित पत्रकार के साथ युवा कवियों-लेखकों के योग्य पुरस्कार लेने वाले पचहत्तर साल के कवि के जीवन से कुछ सीख नहीं लेता। हँसो कि मेरे गले में प्रगतिशील होने का कोई पट्टा नहीं है। इस तरह के पुरस्कारों को छ़ोड़ो और देश के हिंदी के तमाम पुरस्कारों को देखकर सच-सच बताओ दोस्तो कि क्या आज तमाम पुरस्कार लेखकों को पालतू बनाने का सुनहला पट्टा नहीं है ? कौन-कौन हैं जो साहित्य में अपने ‘पुरस्कारघर’ को जुआघर की तरह नहीं चला रहे हैं ? इन्हें क्यों नही पहचान रहे हो भाई ? क्यों जानबूझकर लेखक का जीवन हार रहे हो। मैं यह कहाँ रहा हूँ कि तुम कोई सम्मान और पुरस्कार न लो, बस इतना ही तो कह रहा हूँ कि नंगा हो जाने की कीमत पर यह सब न करो। कहना तो यह चाहता हूँ कि संास्थानिक और व्यावसायिक या साहित्य की राजनीति के तहत कोई पुरस्कार मत लो। जनता का कोई स्वतःस्फूर्त पुरस्कार और सम्मान इन पुरस्कारों से हजार गुना ज्यादा तृप्ति देगा। अव्वल तो ऐसा होगा नहीं फिर भी कभी कोई ऐसा संयोग बना तो मैं तो किसी मोची भाई की कमाई का और उसके हाथ से एक नये पैसे का पुरस्कार लेकर अपने इस तुच्छ लेखक जीवन को सार्थक समझूँगा। तुम भी ऐसा क्यों नहीं चाहते ?
    दोस्तो देवेंद्र कुमार का जिक्र यहाँ जरूरी है। देवेंद्र कुमार पंडित नहीं थे, लाला नहीं थे, हरिजन थे, पर आज की तारीख में यहाँ जितने भी असली या नकली तोप हैं, उन सबसे अच्छे थे और हैं। अपनी कविता को लेकर अति संकोची थे। आत्मप्रचार से दूर रहने वाले। सिर्फ और सिर्फ कविता से प्रेम करने वाले। बात-बात पर राजधानी की परिक्रमा न करने वाले। उन्हें कभी पुरस्कारों के लिए दौड़धूप करते नहीं देखा। मैं ही नहीं, मेरा दोस्त अरविंद भी उन्हें ही बेहतर कहता है। फिर अपनी ही एक कविता का अंश, साक्ष्य के रूप में -

कई कवि देखे
कई तरह के कवि देखे
कोई मधुकर था यहाँ
कोई काला था, कोई दिलवाला
कोई परमानंद, कोई विश्वनाथ।
देवेंद्र कुमार को यहीं देखा
अपनी हीर कविता के लिए राँझा बनते।

      अपनी कविता से प्रेम करना है, अच्छी कविता से प्रेम करना है तो उन्हें मत देखो जो पुरस्कार के लिए अपनी कविता को गिरा चुके हैं। यह क्यों नहीं सोचते कि एजेंडा अच्छी कविता लिखने का है, नामी-गिरामी पुरस्कार लेने का नहीं है। क्या मुक्तिबोध को उतने पुरस्कार मिले, जितने पुरस्कार काँख में दाब कर आज दो कौड़ी के कवि यहाँ-वहाँ घूम रहे हैं ?
      दोस्तो, क्यों उस धोती वाले पंडित या बाऊ साहब के हाथ से गले का सुनहला पट्टा ले रहे हो ? या लेने के लिए कतार में हो ? मैं जानता हूँ मेरी बातें सबको अच्छी नहीं लगती हैं लेकिन यह भी जानता हूँ कि मेरी बातें उन साथियों को अच्छी लगती हैं जो साहित्य में अच्छाई का पक्ष लेते हैं। बुराई का पक्ष लेने वाले जरूर बंद कमरे में छिपकर मुझ पर हँसते होंगे। हँसो भाई खूब हँसो, हँसो कि मैं नक्कारखाने में तूती की आवाज हूँ।



शनिवार, 24 अगस्त 2013

दुखी रहे फिर भी कुछ पाजी

-गणेश पाण्डेय
यह सुख और दुख की दुनिया भी अजीब है, सबके लिए न दुख है और न सबके लिए सुख। साहित्य और पत्रकारिता की दुनिया में भी सुखी और दुखी दोनों तरह के लोग रहे हैं। आज भी जहाँ देखिए मिल जायेंगे, एक ओर हाल में निकाले गये पत्रकार  हैं तो दूसरी तरफ संपादक, निदेशक इत्यादि कुर्सियों पर बैठकर इत्र सूँघते हुए चंद सुखी लोग। साहित्य में भी कभी कोई संघर्ष न करने वाले तिकड़मी लोग हैं जो अकादमियों में मालपुआ खा रहे हैं और आज की तारीख में साहित्य में लड़ाई लड़ते हुए लगातार तनाव में रहने वाले दूसरे तरह के दुखी लोग भी हैं। साहित्य के भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रतिदिन, प्रतिक्षण लड़ने वाले लोग कम हो सकते हैं, पर हैं। जाहिर है कि ऐसे लोग सुखी लोग नहीं है।
      इस दुनिया में कई तरह के लोगों को देखने के लिए आँखें पूरी खुली रखना देखने की पहली शर्त है। मुश्किल यह भी है कि बहुत से लोग दुख और संघर्ष देखना ही नहीं चाहते हैं। जाहिर है कि जिनका पेट भरा होगा वे भूख के बारे में क्यों बात करेंगे ? बड़े तो बड़े , एक बच्चा भी अघाये हुए लोगों की भाषा और दुखीजन की भाषा में फर्क कर लेगा। आज किसी की भाषा अलग है तो इसे जाना जा सकता हैं कि ऐसा क्यों है। क्यों किसी की भाषा में इतना बारूद है, साहित्य में यह लेखक जब पैदा हुआ था तब तो ऐसा नहीं था, क्या देखा और भोगा है कि ऐसा हो गया है, किसे-किसे किस हाल में देख लिया है कि तब से गुस्से में है। कोई लेखक, कोई संपादक बताए भला! बहरहाल, अपना काम सिर्फ कहना है, अर्थ-अनर्थ करना पढ़ने वाले के जिम्मे। हाँ, तो मैं बात कर रहा था साहित्य के सुखिया और दुखिया संप्रदाय के बारे में। यह सब कहने की जरूरत क्यों आन पड़ी, इसके बारे में सिर्फ इतना ही कि सरसरी तौर पर एक मशहूर पत्रकार के स्टेटस पर यह चिंता दिखी कि भाई इस माध्यम पर लोग अपना रोना क्यों रोते हैं ? क्यों नहीं नित्य सुखीजीवन के गीत गाते हैं ? क्यों नहीं मनोरम दृश्य उपस्थित करते हैं ? क्यों नहीं हँसी-मजाक और हँसी-ठट्ठा करते रहते हैं ? क्यों नहीं संग्रहालयों की फोटो छापते रहते हैं, इत्यादि सुखी जीवन का व्यापार करते हैं ? क्यों नहीं इस माध्यम के लोग उनके सामने से शव, बीमार और बूढ़े आदमी चित्र हटा देते हैं, जिस तरह सिद्धार्थ के सामने से हटा दिया जाता था। ऐसा चाहने वालों की दिक्कत हर तरह के गरीबों को लेकर है, खासतौर से साहित्य के दीन-हीन, शोषित-पीड़ित की ऊँची आवाज को लेकर उनकी दिक्कत सबसे ज्यादा है। वे उन कवियों और लेखकों को पसंद करते हैं और बड़े गर्व से नाम लेते हैं , जो खुशामद के रास्ते पर चलता हो। साहित्य में लड़ने वाला, हरगिज नहीं। आलोचकों, संपादकों और अकादमियों के अधिकारियों के जूते में पालिश लगाने वाला लेखक चलेगा, इसी रास्ते से पुरस्कार पाने वाला लेखक चलेगा ही नहीं, दौड़ेगा। जाहिर है कि लूट का माल खाकर अघाये हुए लोग सुखी और स्वस्थ रहते हैं।
       पत्रकार मित्र ने अपने स्टेटस में हालाकि यह सीधे नहीं कहा है कि दुख की बातें एकदम से न कहें, उन्होंने कहा है कि कहें पर सिर्फ वही-वही हरदम न कहें। शायद उनका आशय है कि प्रकृति, सौंदर्य, कला, प्रेम, उत्सव आदि की बातें भी बढ़चढ़कर करें। जो लोग ऐसा करते हैं उनकी तारीफ करता हूँ, पर सबके लिए ऐसा कर पाना संभव होगा, यह नहीं कह सकता। भला जिस स्त्री का नवजात शिशु अस्पताल से चोरी हो जाएगा, वह जीवन भर कैसे उत्सव मना पाएगी, जिसके जवान बेटों को हत्यारे कत्ल कर देंगे, वह माँ कैसे और कितना और कब-कब उत्सव मना पाएगी ? वह माँ, नाच पाएगी, वह माँ फोटो खींच पाएगी ? वह माँ यात्रा का किस तरह आनंद ले पाएगी ? इत्यादि बातें हैं। जिनके लिए हिंदी धंधा नहीं है, हालाकि कुछ लोगों के लिए नौकरी है, पर कुछ लोगों के लिए सिर्फ नौकरी नहीं है, जीवन है। जिनके लिए साहित्य यश और इनाम का जरिया नहीं, एक ड्यूटी है, चौकीदार जैसी, वह रातों में सो कैसे सकते हैं ? मजे कैसे ले सकते हैं, उन्हें तो सुनसान रातों में सीटी बजाते, जागते रहो कहते और सड़क पर लाठी से आवाज पैदा करते हुए रहना है। आशय यह कि जिसे हिंदी की लंका के तनाव में तीन बार स्कूटर दुर्घटना में मरने के करीब का दृश्य देखना होगा भला वह हिंदी की दुनिया में बहुत अधिक उत्सवधर्मी कैसे हो पाएंगे ? हिंदी के राक्षसों का अट्टहास उन्हें कितना उत्सवधर्मी बनने देगा ? कहने का यह आशय यह नहीं कि ऐसे लोग अपने घर में भी योद्धा की मुद्रा में ही रहते होंगे, निश्चितरूप से वे वहाँ अपने बच्चों से प्यार करते होंगे, हँसते होंगे, शादी-ब्याह में नाचते भी होंगे, लेकिन इस माध्यम पर ऐसे लोग उत्सव मनाने के लिए ही नहीं रह सकते हैं। ऐसा भी होता है कि एक लेखक अपने शहर में हिंदी की लंका में बिल्कुल अलग-थलग रहता हो और जब वह इस माध्यम पर आए तो अपने दर्द और संघर्ष के साथ मौजूद हो। ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो किसी विचारधारा और समाज के दुखी लोगों से प्यार करते हों, ऐसे लोग बहुत ज्यादा आनंदवादी नहीं हो सकते हैं। दरअसल दुखी लोगों के लिए यह माध्यम समाज का कोई ललित माध्यम नहीं हो सकता है। चित्रहार नहीं हो सकता है। जो लोग इसे एक ललित माध्यम के रूप में देखते हैं, वे अपनी जगह और दृष्टि और विचारधारा के आधार पर इसे अनंतकाल तक ललित माध्यम के रूप में ले सकते हैं, पर जिसकी बात कोई और माध्यम कम सुनता हो, जिसकी बातों से साहित्य के भ्रष्ट लोगों के कान पर जूँ न रेंगता हो, वह इस माध्यम पर अपनी आवाज समानधर्मा मित्रों तक क्यों नहीं ले जाएगा ? जाहिर है कि वह कानफोड़ू आवाज में भी अपनी बात कहने की सीमा तक जा सकता है, अच्छा हो कि आप सुखवादी है, संतुष्टिवादी है, ललितवादी हैं इत्यादि तो अपनी मित्र सूची से ऐसे दुखवादियों को अलग कर दें।
     साहित्य और पत्रकारिता के सुखी लोग, दुखी लोगों को पसंद नहीं करते हैं तो न करें, लेकिन दुखी लोगों के रोने पर एतराज करेंगे तो जाहिर है कि दुखी लोग भी उनके ललितवाद पर एतराज करेंगे। सुखी लोग यह न समझें कि दुखी लोग उन रास्तों को नहीं जानते हैं, जहाँ से सारा सुख उन्हें भीख में मिलता है। दुखी लोग भीख नहीं, अपना हक चाहते हैं और उसके लिए रोते हैं, लड़ते हैं, हार जाते हैं, फिर लड़ते हैं, फिर रोते हैं और लड़ते ही रहते हैं। कबीर ने कहा है कि-
सुखिया सब संसार है, खावै अरु सोवै
दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै।
कबीर का उदाहरण देने का आशय यह कि आज कबीर भी इस माध्यम पर होते तो ऐसे पत्रकार जी लोग उनसे भी कहते कि कबीरदास जी ये क्या आप रोना-धोना करते रहते हैं। ये क्या जीव-ब्रह्म करते रहते हैं, ये गरीबों और पिछड़ों की चिंता क्यों ? ये हिंदू-मुसलमान क्यों ? ये आग लगाने वाली बातें क्यों ? कुछ मीठा कीजिए कबीर दास जी। निराला होते इस माध्यम पर तो उन्हें भी डाँटते कि अरे भाई निराला ये क्या हरदम कहते रहते हो कि दुख ही जीवन की कथा रही...हिंदी के सुमनों के प्रति क्यों अनाप-शनाप कहते रहते हो, संपादक को बुरा-भला क्यों कहते रहते हो...अरे अजीब आदमी हो ये आराध्य की मूर्ति पर डंडे से चोट क्यों करते हो...ये साहित्यिक अन्याय और भ्रष्टाचार की बात क्यों करते हो भाई...क्या हुआ जो दूसरे तुम्हारे हिस्से की मलाई काट रहे हैं...इसमें रोने की कौन-सी बात है...हटाओ अपना ये रोना-धोना। कुछ अच्छी बातें करो। कुछ मस्ती करो। अरे भाई, पत्रकार जी ! आपके अज्ञेय ने भी तो कहा है कि दुख सबको माँजता है। आपको दुख माँजता नहीं है क्या ? कम माँजता है क्या ?
       दरअसल ये कहना तो चाहते होंगे आज के राजनीतिक, सामाजिक और साहित्यिक सरोकारों के लिए लड़ने वाले तमाम लोगों से कि भाई ये क्या हर समय दुख की बातें। ये क्या हर समय शोषण-उत्पीड़न का रोना। ये क्या हर समय सोनी सोरी की चिंता, ये क्या दामिनी जैसी तमाम बेटियों के लिए रोज-रोज गुस्सा, छोड़ो ये सब, हँसो-हँसो, हँसो कि हँसने से सेहत को फायदा है, हँसो कि रोना सत्ता को पसंद नहीं है। हजार झूठ छापते हुए तमाम पत्रकार -संपादक अपनी कुर्सी पर हँसते है जोर-जोर से। कहना सिर्फ इतना है कि यह माध्यम अपनी तमाम कमियों के बावजूद वह सब सबसे साझा करता है जिसे किन्हीं कारणों तमाम पत्रकार अपने अखबार में दे नहीं सकते हैं। जहाँ तक मैं जानता हूँ देश की संसद में पहुँचने वाले दागी लोगों के बारे में ये जितना छापते हैं, उसका एक बटा हजार भी साहित्य की अकादमियों में पहुँचने वाले दागी लोगों के बारे में नहीं छापते हैं । असल में ये सच के देवता नहीं , सौदागर हैं। सच, उतना ही और वही सच छापते हैं जिसमें जोखिम रत्तीभर न हो। इन्हें जनता के दुख से नहीं, सत्ता के सुख से प्रेम है। जनता का दुख भी इनके लिए दुख नहीं एक वस्तु है, जिसे उचित समय और उचित दाम पर ये बेचने के लिए मजबूर होते हैं। हाय, इस दुनिया में कितने मजबूर लोग रहते हैं। जाहिर है कि ये मजबूर लोग दुख के सिपाही नहीं, सुख के चाकर हैं। खुद चुना है सुख की यह नौकरी। आखिर दुख की नौकरी चुनने वाले भी कुछ कम पाजी तो नहीं हैं।
अंत में कविता का यह अंश -

सुखी हुए वे जन
त्याग दिया जिन्होंने
क्रोध

सुखी हुए वे भी
जिन्होंने एवज में दिया
शील

वे महाशय भी सुखी हुए
साध लिया जिन्होंने
चिंता से बैरभाव

परम सुखी हुए वे मनुष्य
जो हुए नित्य
सत्तामुख

दुखी रहे फिर भी कुछ पाजी
जिनके पास हुई गर्दन
तनी हुई।











बुधवार, 31 जुलाई 2013

प्रेमचंद और हमारा समय

- गणेश पाण्डेय

     आज प्रेमचंद के स्मरण का अर्थ सिर्फ कथापितामह का परचम लहराना है या उनके साहित्यिक और जीवन मूल्यों की अनदेखी करते हुए उनकी कृतियों पर केंद्रित कोई औपचारिक लेख लिखना है तो मित्रो मैं यह काम करने से रहा। मेरे लिए साहित्य के वे पुरखे जिन्होंने अशर्फियों और इनाम इत्यादि के लिए लेखन नहीं किया है, बल्कि देश और समाज के लिए अपनी ड्यूटी पूरी की है, सचमुच श्रद्धा के केंद्र हैं। जाहिर है कि प्रेमचंद उनमें से एक हैं। आज का समय श्रद्धा के मामले में बेढ़ंगा है। बेढ़ंगा इस अर्थ में कि आज साहित्य में श्रद्धा सिर्फ पुरस्कार और प्रमोशन इत्यादि के लिए दिखती है, वह भी असली नहीं होती। काम निकलते ही श्रद्धा को श्राद्ध में बदलते देर नहीं लगती है। यों आज प्रेमचंद का नाम ले-ले कर अपने को रोशनी में लाने के लिए विकल लेखक कम नहीं हैं, पर प्रेमचंद के साहित्यक मूल्यों को जीने वाले बहुत कम मिलेंगे। उस लेखक संघ में भी कम ही मिलेंगे जिसके अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए 1936 में प्रेमचंद ने कहा था कि ‘‘प्रगतिशील लेखक संघ’, यह नाम ही मेरे विचार से गलत है। साहित्यकार या कलाकार स्वभावतः प्रगतिशील होता है। अगर उसका यह स्वभाव न होता तो शायद वह साहित्यकार ही न होता। उसे अपने अन्दर भी एक कमी महसूस होती है और बाहर भी। इसी कमी को पूरा करने के लिए उसकी आत्मा बेचैन रहती है। अपन कल्पना में वह व्यक्ति और समाज को सुख और स्वछंदता की जिस अवस्था में देखना चाहता, वह उसे दिखाई नहीं देती। इसलिए, वह वर्तमान मानसिक और सामाजिक अवस्थाओं से उसका दिल कुढ़ता रहता है। वह इन अप्रिय अवस्थाओं का अन्त कर देना चाहता है, जिससे दुनिया जीने और मरने के लिए इससे अधिक अच्छा स्थान हो जाय।’’ प्रेमचंद की दृष्टि में लेखक वह है जिसके भीतर इस दुनिया जीने और मरने के लिए और अधिक अच्छा बनाने की बेचैनी हो, लेकिन क्या सचमुच आज के लेखक के भीतर भी यह बेचैनी है या बेचैनी का दिखावा है ? क्या हम अपने भीतर साध्य की पवित्रता के बिना मंजिल तक पहुँच सकते हैं ? प्रेमचंद अपने इसी प्रसिद्ध लेख/भाषण में यह भी कहते हैं कि साहित्य जीवन की आलोचना है। मैथ्यू आर्नाल्ड ने भी कविता को जीवन की आलोचना कहा है। जहाँ तक मैं समझ पाता हूँ, प्रेमचंद विचार की आलोचना नहीं, जीवन की आलोचना इसलिए कहते हैं कि निरा विचार की आलोचना ज्ञान और सामाजिकविज्ञान के दूसरे अनुशासनों की चीज है। वह साहित्य को जीवन की आलोचना इसलिए कहते हैं कि साहित्य संवेदना का व्यापार है। इसका आशय यह कतई नहीं कि जीवन विचारशून्य है या मनुष्य का विचार से कुछ लेना-देना नहीं। जब वे दुनिया जीने और मरने के लिए अच्छा बनाने की बात करते हैं तो यह बात अपने आप में एक अच्छा विचार है। वह लेखक के स्वभावतः प्रगतिशील होने की बात इसीलिए करते हैं। जीवन की आलोचना की बात इसीलिए करते हैं। लेखक के जीवन की आलोचना की बात भी करते हैं। लेखक की दृष्टि की बात करते हैं-‘‘ हमें सुंदरता की कसौटी बदलनी होगी। अभी तक यह कसौटी अमीरी और विलासिता के ढ़ंग की थी। हमारा कलाकार अमीरों का पल्ला पकड़े रहना चाहता था, उन्हीं कह कद्रदानी पर उसका अस्तित्व अवलंबित था और उन्हीं के सुख-दुख, आशा-निराशा, प्रतियोगिता और प्रतिद्वन्दिता की व्याख्या कला का उद्देश्य था। उसकी निगाह अंतःपुर और बंगलों की ओर उठती थी। झोपड़े और खंडहर उसके ध्यान के अधिकारी न थे।’’ प्रेमचंद, जाहिर है कि लेखक की प्रगतिशीलता की परीक्षा भी करते हैं। वे जिस लेखक नाम की संस्था को स्वभावतः प्रगतिशील कहते हैं, उस लेखक नाम की संस्था के भीतर मौजूद खतरों की ओर भी इशारा करते हैं और बताते हैं कि कैसे कोई लेखक अप्रगतिशील भी हो सकता है। आज भी यह खतरा टला नहीं है। प्रगतिशीलता की सुपरफास्ट गाड़ी के बावजूद गैर प्रगतिशीलता की यह मालगाड़ी नई दिल्ली जंक्शन से बदस्तूर चलती चली जा रही है। श्रृंगारिकता और विलासिता का घराना अपनी गायकी में उसी तरह तल्लीन है, पर प्रेमचंद के ठीक पहले के समय में जहाँ यह मुख्यधारा  थी, वहीं अब यह सूखकर एक मामूली पनाले में तब्दील हो चुकी है। प्रेमचंद के सामने अपने सामने की दुनिया को बेहतर बनाने की बेचैनी में दरअसल अपने देश को, अपने समाज को और अपने समय के साहित्य को भी बेहतर बनाने की बेचैनी शामिल है। प्रेमचंद को पता है कि लेखक की असल कर्मभूमि साहित्य है। प्रेमचंद कहते हैं कि ‘‘ जिन्हें धन-वैभव से प्यारा है, साहित्य-मंदिर में उसके लिए स्थान नहीं है।...हमारी परिषद ने कुछ इसी प्रकार के सिद्धांतों के साथ कर्मक्षेत्र में प्रवेश किया है। साहित्य का शराब-कबाब और राग-रंग का मुखापेक्षी बना रहना उसे पसंद नहीं। वह उसे उद्योग और कर्म का संदेश-वाहक बनाने का दावेदार है। उसे भाषा से बहस नहीं। आदर्श व्यापक होने पर भाषा अपने आप सरल हो जाती है। भाव-सौंदर्य बनाव-सिंगार से बेपरवाही दिखा सकता है। जो साहित्यकसा अमीरों का मुँह जोहने वाला है, वह रईसी रचना-शैली स्वीकार करता है, जो जन-साधारण का है, वह जन-साधारण की भाषा में लिखता है।’’ प्रेमचंद यहाँ साफतौर पर साहित्य की संप्रेषणीयता पर विचार कर रहे होते हैं। जाहिर है कि उनके सामने साहित्य की पहुँच का बड़ा प्रश्न है, लेकिन प्रेमचंद बड़े लेखक हैं इसलिए वे शुरू में ही बता देते हैं कि साहित्य की भाषा ठीक वही नहीं हो सकती है जो बोलचाल की भाषा है-‘‘ भाषा साधन है, साध्य नहीं।...भाषा बोलचाल की भी होती है और लिखने की भी।...मेरा अभिप्राय यह नहीं कि जो कुछ लिख दिया जाय, वह सब साहित्य है। साहित्य उसी रचना को कहेंगे, जिसमें कोई सचाई प्रकट की गयी हो, जिसकी भाषा प्रौढ़, परिमार्जित और सुदर हो और जिसमें दिल और दिमाग पर असर डालने वाला गुण हों और साहित्य में यह गुण पूर्णरूप में उसी अवस्था में उतपन्न होता है, जब उसमें जीवन की सचाइयां और अनुभूतियां व्यक्त की गयी हों।’’ इसीलिए अंत में भी प्रेमचंद कहते हैं कि ‘‘हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव, सौंदर्य का सार हो, सुजन की आत्मा हो, जीवन की सचाइयों का प्रकाश हो-जो हममें गति और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं, क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।’’ सवाल यह कि आज प्रेमचंद जैसा खरापन कहाँ है ? क्या लेखक संगठनों के पास और उसमें शामिल कच्चे-पक्के प्रगतिशील लेखकों के पास प्रेमचंद का ईमान है ? क्या वे लोग सचमुच रचना और आलोचना और जीवन में रईसी-शैली से मुक्त हैं ? ये आलोचकों के पीछे-पीछे भागना, उनकी पूजा करना, उनसे सर्टिफिकेट लेना, सेठों और सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के पुरस्कारों के पीछे-पीछे भागना जनता के लेखक का काम है या रईसी-शैली के लेखकों का काम है ? पहले की अशर्फियों और आज के पुरस्कारों में कोई बहुत अंतर नहीं है। क्या ऐसे ही लेखक दुनिया को बेहतर बनाने का काम करेंगे, जो अपनी उपलब्धियों के लिए मरे जा रहे हैं ? क्या ऐसे लेखक प्रगतिशील हैं जो यौन-संदर्भों को चटखारे के लिए लिखते हैं और अतिश्रृंगारिक कथा की पत्रिका में छपने के लिए लालायित रहते हैं ? सब जानते हैं कि ऐसी कहानियों का छापाखाना प्रेमचंद के नाम पर कथापत्रिका का धंधा करने वाले किस बुजुर्ग लेखक के पास है। प्रेमचंद का विपुल कथासाहित्य कया आज के कथाकारों और कथासंपादकों के लिए प्रमाण नहीं है कि प्रगतिशील कथा का परिसर किसे कहते हैं ? असल में प्रेमचंद के सामने साहित्य का उद्देश्य कुछ और था और आज के लेखकों के सामने साहित्य का उद्देश्य कुछ और है। प्रेमचंद के सामने बेचैनी का सबब रचना और अपने समय का तीखा यथार्थ था, बदलाव की आकांक्षा आत्मा को मथती थी। आज तो लेखक प्रगतिशीलता की आड़ में यश, इनाम, चर्चा का धंधा करने में लगे हैं। प्रेमचंद देश और समाज को देखते थे, ये अपने आप को देखते हैं, अपना तमगा, अपना नाम और अपना सर्टिफिकेट देखते हैं। यह बेहद तकलीफदेह है कि बकौल प्रेमचंद जिनके ऊपर अपने समय के समाज को जगाने की जिम्मेदारी है, सो रहे हैं। विडम्बना यह कि ये सोने वाले जिन्हें हिंदी का जगाने वाला बनना था, नींद में अमरता का स्वप्न देख रहे हैं। ये खुली आँखों से स्वप्न देख रहे हैं कि अमुक आलोचक और अमुक संपादक और अमुक इनाम उन्हें अमर बना रहा है, उन्हें हिंदी कथा साहित्य या कविता या आलोचना का हीरो बना रहा है। क्या पानी के बुलबुले जैसी नायकत्व की यह आकांक्षा अच्छी रचना या आलोचना को जन्म दे सकती है ? प्रेमचंद जैसी रचना की बात करते हैं, वह इन कमजोर हाथों से संभव है ? ऐसे ही लेखक समाज को बेहतर बनाने का जीवित स्वप्न पाठकों की आँखों में भर सकते हैं ? ऐसे लेखक पाठकों के लेखक बन सकते हैं ? क्या यह बताने की बात है कि प्रेमचंद आलोचकों के लेखक हैं या पाठकों के ? पाठकों की जगह आलोचकों और संपादकों की पूजा करने वाले लेखक कभी भी हिंदी के सच्चे लेखक हो ही नहीं सकते हैं। पुरस्कार बड़ा लेखक नहीं बनाता है, पाठक बड़ा लेखक बनाते हैं। पाठकों के लिए लिखी गयी रचना ही बड़ी रचना बनती है। पाठक ही समाज है। आज हिंदी के परिसर से पाठक गायब हैं। कुछ हैंे जो कविता-कहानी-आलोचना लिखते हैं और कुछ किताब और पत्रिकाएँ खरीद लेते हैं, बाकी पुस्तकालयों की शोभा की चीज हैं। कभी नाव पर रखकर पत्रिकाएँ और किताबें गाँव में पहुँचती थीं, प्रेमचंद घरों में पढ़े जाते थे। आज का दृश्य क्या वही है ? पाठकों की शक्ति पर भरोसा न करने वाले या पाठाकों की अभिरुचि को उन्नत न करने वाले लेखक समाज को बेहतर बनाने का स्वप्न जनता के दिल और दिमाग में पहुँचा सकते हैं ? कह सकते हैं कि आज राजनीति ने और व्यवस्था के इस मॉडल ने समाज को भ्रमित किया है, तो समाज को विचार और मूल्य से जोड़ने का काम किसका है ? राजनीति करने वालों का ? जनता को राजनीति के इस अँधेरे से निकालने का काम किसका है ? बिना आँख वालों को बिना आँख वाले खुली हवा में ले जाएंगे ? क्या राजनेताओं की तरह लेखकों ने जनता का विश्वास खो नहीं दिया है ? यह हमारे समय का बड़ा सवाल है ? इस सवाल से टकराना क्या आज लेखक संगठनों की जिम्मेदारी नहीं है ? शायद इस बड़ी कमी की वजह से ही आज साहित्य राजनीति से आगे नहीं है। प्रेमचंद ने जब कहा था-‘‘ साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफिल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है, उसका दरजा इतना न गिराइए। वह देश-भक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सचाई भी नहीं, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई है।’’ जाहिर है कि तब इस नसीहत की जरूरत जितनी थी, उससे कम आज नहीं है। आज भी महफिल सजाने और मनोरंजन का सामान जुटाने का काम लेखक बढ़-चढ़कर कर रहे हैं।  राजे-रजवाड़े नहीं हैं तो क्या हुआ राजनीति और साहित्य के राजे-रजवाड़े हैं। अपने को गिराने की ऐसी होड़ शायद अशर्फियों के जमाने में भी इतनी न रही होगी। क्या यह प्रगतिशील लेखकों और लेखक संगठनों के लिए गौरतलब नहीं है ? प्रेमचंद के स्मरण का अर्थ आज और क्या हो सकता है।
(यह लेख ‘पीपुल्स समाचार’ के 31 जुलाई 2013 के अंक में भी है।)






शनिवार, 13 जुलाई 2013

ऋण है मुझ पर

 -गणेश पाण्डेय

उस खेत का, उस बीज का
उस धूप का, उस पानी का
उस किसान का ऋण है
मुझ पर
उस हवा का , उस जगह का
उस चौखट का, उस छत का
उस दुलार का ऋण है
मुझ पर
उस छड़ी का, उस किताब का
उस पाठशाला का, उस विचार का
उस गुरु का ऋण है
मुझ पर
उस चरण का , उस आशिष का
उस मोतीचूर का, उस हृदय का
उस बुआ का ऋण है
मुझ पर
उस भाई का, उस मित्र का
उस साथ का, उस चाह का
उस अपनत्व का ऋण है
मुझ पर
उस चितवन का, उस स्पर्श का
उस गंध का , उस स्मृति का
उस प्यार का ऋण है
मुझ पर
उस शत्रु का, उस वरिष्ठ का
उस घात का, उस कायर का
उस नाग का ऋण है
मुझ पर
उस आक्रोश का, उस ललकार का
उस साहस का, उस दर्प का
उस रक्त का ऋण है
मुझ पर
उस धारा का, उस यकीन का
उस शक्ति का, उस पृथ्वी का
उस अभिन्न संगिनी का ऋण है
मुझ पर
कोई देखे कितना सुख है
अपने होने की खोज में
कितनी तृप्त है मेरी आत्मा
अपनी इस अतिशय दरिद्रता में।


( ‘अटा पड़ा था दुख का हाट’ से )
(यह कविता ई पत्रिका सृजनगाथा पर भी उपलब्ध है।)






गुरुवार, 4 जुलाई 2013

आलोचना की सामाजिकता का रास्ता और चंद राहजन

- गणेश पाण्डेय

मैनेजर पाण्डेय हमारे समय के एक बड़े आलोचक हैं। ज़ाहिर है कि आलोचना की बड़ी परंपरा में यह बड़ा होने का रिश्ता देह की ऊँचाई या आलोचना के नाम पर अनुयायिओं की हनुमानजी की पूँछ जैसी लंबी पंक्ति से नहीं बनता है। बड़ा होने का यह रिश्ता, आलोचना की समग्रता में उसकी शर्तों और आलोचना की कसौटी पर ख़ुद को परखते रहने से बनता है। अपने समय की चुनौतियों और विकलताओं का सच के साथ सामना करने से बनता है। आलोचक का कद न तो उसकी धोती का घेरा तय करता है, न पाजामा, न कोई अन्य अंगरखा, जहाँ तक मैं जान पाता हूँ, एक आलोचक आलोचना की सचाई के पैमाने से बड़ा या छोटा होता है। केवल लिखना और लिखना और कुछ लिखते जाना या बोलना और बोलना और कुछ भी बोलते जाना ही आलोचना नहीं है। अच्छी आलोचना तो कतई नहीं है। हमारे समय में दो ऐसे उदाहरण बिल्कुल सटे हुए हैं जिनमें पहले में अति वक्तृता है तो दूसरे में -जो पहले के ही सहायक के रूप में अधिक प्रसिद्ध हैं-अतिलेखन और आशुलेखन। यह जो अतिबोला और अतिलेखन या आशुलेखन का संसार है, जिस-तिस पर कभी भी कुछ भी शानदार, अद्वितीय से कम नहीं, यह जो एक अर्थ में आलोचना का ‘‘सामाजिक कार्य’’ है, क्या यही आलोचना की सामाजिकता है ? आख़िर सार्वजनिक रूप से यह सब करते हुए आलोचक कितना सामाजिक होता है, किसी विधायक या सांसद की तरह किसी के निवेदन पर तत्काल अपनी संस्तुति बाँटता चाहे बेचता हुआ? यह दृश्य क्या आज की हिंदी आलोचना का नहीं है? क्या इसे ही मैनेजर पाण्डेय आलोचना की सामाजिकता कहते हैं ?
मैनेजर पाण्डेय छोटे आलोचक होते तो शायद ऐसा कह सकते थे, लेकिन जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा कि मैनेजर पाण्डेय बड़े आलोचक हैं, इसलिए पाण्डेय जी का कतई यह आशय नहीं है। गौर करने पर यकीनन आप पायेंगे कि पाण्डेयजी की आलोचना की सामाजिकता का आशय आलोचना की बड़ी परंपरा की व्यापकता और सार्थकता से मेल खाने वाला है। मैं ‘पक्का’ आलोचक नहीं हूँ। पक्का आलोचक तो मेरा ढ़िलपुक दोस्त है। मेरे समझने में कुछ दिक्कतें ज़रूर हैं, पर समझने के इस क्रम में समझते-समझते मैं भी किसी हद तक समझ जाऊँगा। अपनी ही बात से आगे बढ़ने की कोशिश करता हूँ। यह जो ‘व्यापकता’ और ‘सार्थकता’ है, शायद मेरी कुछ मदद करे।
पाण्डेय जी का आलोचना की सामाजिकता वाला लेख शायद आलोचना में पहली बार देखा था। शायद क्या, यकीनन देखा था। इसी नाम की किताब में दूसरी बार देख रहा हूँ। यह लेख हमारे समय की आलोचना पर जितना मौजू है, शायद उससे ज़्यादा आने वाले वक़्त की आलोचना पर मौजूँ होगा। पर मेरे सामने आज का समय है। मैनेजर पाण्डेय के सामने भी उनका समय है। एक सही आलोचक अपने समय को जब भी देखता है, आलोचना की खुली आँख से देखता है। पाण्डेय जी भी अपनी खुली और धुली-पुंछी आँख और सही नंबर के चश्मे से अपने समय को साफ़-साफ़ देखते हैं-‘आजकल भारत पूँजीवादी सभ्यता के आतंककारी प्रभावों का सामना कर रहा है। पूँजीवाद का स्वभाव है हर सार्वजनिक वस्तु का निजीकरण करना। पूँजीवाद अपने वर्तमान दौर में प्रकृति के पाँचों तत्वों-पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु का पूँजी के संचय और विस्तार के लिए निजीकरण में लगा हुआ है। जब प्रकृति का निजीकरण हो रहा हो तब संस्कृति कब तक और कितनी देर तक सामाजिक या सार्वजनिक रह सकती है। पूँजीवाद का वर्तमान दौर सचमुच ‘सामाजिक की मृत्यु’ का समय है।’ ऐसे मुश्किल वक़्त में मैनेजर पाण्डेय चुनौती के रूप में एक प्रश्न खड़ा करते हैं और उस चुनौती से दो-दो हाथ करने के लिए आस्तीन चढ़ाते हुए पाठकों को यह बताना नहीं भूलते हैं कि भाई- यह जो आलोचना की सामाजिकता नाम की बेशक़ीमती चीज़ है, आख़िर है क्या और रचना की वैयक्तिकता से इसका क्या रिश्ता है-‘ साहित्य के विभिन्न रूपों में वैयक्तिकता और सामाजिकता की स्थिति एक समान नहीं होती। अगर कविता स्वभाव से अधिक व्यक्तिगत होती है तो उपन्यास अधिक सामाजिक। आलोचना रचना की व्याख्या करती हुई, उसे व्यापक पाठक समुदाय तक पहुँचने में मदद करती हुई ख़ुद सामाजिक बनती है और रचना को भी सामाजिक बनाती है।’ पाण्डेय जी आगाह करते हैं-‘जो लोग रचना और आलोचना दोनों को नितांत व्यक्तिगत बनाते हैं वे अभिजन एक तरह से साधारण जन को साहित्य-संसार से बाहर रखने की कोशिश करते हैं और पूँजीवाद के निजीकरण में सहायक भी बनते हैं।’ और यहीं पाण्डेय जी आलोचना की सामाजिकता के व्यापक निहितार्थ को स्पष्ट करते हैं -‘आलोचना की सामाजिकता की चिंता असल में पूँजीवाद द्वारा प्रकृति और संस्कृति के निजीकरण के प्रयत्न के विरुद्ध प्रतिरोध की चिंता से जुड़ी हुई है।’
ज़ाहिर है कि साहित्य की आत्मा जिन दो छोरों के बीच डोलती है, वे असहमति और प्रतिरोध ही हैं। प्रसंग से तनिक इतर होकर यहाँ मैं कहना चाहूँगा कि एक अर्थ में करुणा जैसे शुद्ध मनोभाव के मूल में भी असहमति और दुख के विरुद्ध कोमल प्रतिकार है। दुख के विरुद्ध जाना उस संघर्ष के विरुद्ध भी जाना है जो दुख का कारण है या दुख देती है। आदिकवि से लेकर आज तक के कवियों ने अपने ढंग से और अपने समय के भीतर असहमति और प्रतिकार की संस्कृति को कविता की आत्मा का सहचर बनाया है। मैथ्यू आर्नाल्ड ने कविता को जीवन की आलोचना कहा है। आशय यह कि आलोचना की व्याप्ति कविता के भीतर अनिवार्य रूप से मौजूद है। उस आलोचना की व्याप्ति है जो असहमति और प्रतिरोध की संस्कृति से जुड़ी हो। मैनेजर पाण्डेय के लिए आलोचना की सामाजिकता का अर्थ है- ‘आलोचना, चाहे समाज की हो या साहित्य की, वह सामाजिक बनती है, एडवर्ड सईद के शब्दों में-सत्ता के सामने सच कहने के साहस से।’ यहाँ मैनेजर पाण्डेय सावधान करते हुए बेहद ज़रूरी बात कहते हैं कि-‘ सत्ता केवल राजनीति की ही नहीं होती। धर्म,संस्कृति और साहित्य की भी सत्ताएँ होती हैं, जो एक ओर बौद्धिक दमन और अपने वर्चस्व की स्थापना का प्रयत्न करती हैं तो दूसरी ओर राजनीतिक सत्ता को मजबूत करने में सहयोग भी करती हैं। ऐसी सत्ताओं के सामने सच कहने का साहस जिस आलोचना में होता है वह मनुष्य की स्वतंत्रता के पक्ष में खड़ी होती है, इसलिए वह सामाजिक होती है।’ यहाँ यह कहना ज़रूरी है कि राजनीति, धर्म, संस्कृति की सत्ताएँ किसी हद तक अमूर्त होती हैं जबकि साहित्य की सत्ताएँ प्रायः मूर्त होती हैं। कभी हाथी छाप, कभी घोड़ा छाप, कभी तलवार छाप, कभी बाऊ साहब छाप, कभी मोटी चुटिया छाप, कभी पतली मोरी का पाजामा छाप, कभी लाला जी छाप, कभी पंडिज्जी छाप, कभी सुर्ती छाप तो कभी कोई और छाप। दिल्ली हो या गोरखपुर या कोई भी शहर, साहित्य की सत्ताएँ बड़ी, मझोली, छोटी या पिद्दी हर जगह होती ही होती हैं। मज़े की बात यह कि ऐसी किसी भी मामूली से मामूली साहित्य की सत्ता के विरुद्ध खड़े होने का साहस शायद ही कहीं दिखता हो। एक रहस्य यह भी कि साहित्य की सत्ता हासिल करने के लिए अच्छा लिखना कतई ज़रूरी नहीं है। कोई भी मीडियाकर अपने दंद-फंद से ऐसी सत्ता पलक झपकते हासिल कर लेता है। अब साहित्य की सत्ता हासिल करने के लिए किसी का नामवर होना या आलोचना या रचना में खूँटा गाड़ना अर्थात महत्वपूर्ण करना कतई ज़रूरी नहीं रहा। सच तो यह कि साहित्य की सत्ता बनने के लिए तो कहीं-कहीं लेखक होना भी ज़रूरी नहीं रहा। जैसे समुद्री डाकू पानी के तमाम जहाज चुटकी बजाते हुए लूट लेते हैं, उसी तरह आज साहित्य के लुटेरे लाखों-करोड़ों रुपये के सरकारी और ग़ैर सरकारी अनुदान से चलने वाली भारी-भरकम और नामी-गिरामी साहित्यिक संस्थाओं और अकादमियों को लूट रहे हैं। देश के हिन्दी भाषी क्षेत्र के अनेक हिस्से आज अपराध की दुनिया में शूटरों और आतंकवादियों के लिए ही नहीं बदनाम हुए हैं, साहित्य के क्षेत्र में भी लूट और कत्ल के पेशेवर गिरोहों के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर जाने-पहचाने जा रहे हैं। कहना यह है कि आज ऐसे लुटेरों और हिंदी के हत्यारों के ख़िलाफ़ बोलने का रत्ती भर साहस जब बहुत बोलने वाले लेखकों में नहीं है तो दूसरे सामान्य लेखकों के बारे में क्या कहें। बस इतना समझ लीजिए कि ऐसे साहित्यिक माफियाओं के सामने जब कुछ विश्वविद्यालयों के हिंदी के कई प्रोफेसर साहबान और कई स्वनामधन्य लेखक चूहा और चुहिया बन जाते हों-बन क्या जाते हों,बल्कि हों ही- तो फिर साहित्य के युवा लेखकों और बच्चों के भविष्य के बारे में क्या कहना। फिर भी शायद कुछ हैं, हैं कुछ सिरफिरे जो ताल ठोंकते हैं और साहित्य के परिसर का सच साहस के साथ कहते हैं। पर ऐसे कितने हैं ? साहस के साथ सच कहने वाले को बुजदिलों की फौज देख नहीं पाती है या देख कर शर्म से मुँह फेर लेती है ? साहित्य की सत्ता की क्रूरता और कदाचार के साथ जो बड़ा सवाल पैदा होता है, उससे टकराये बिना क्या समाज, राजनीति, धर्म और संस्कृति की सत्ता से टकराने की बात मौजूं है ? प्रतिरोध की संस्कृति पहले ज़मीन पर दिखनी चाहिए या आसमान पर ? साहित्यकार पहले साहित्य की क्रूर और भ्रष्ट सत्ता से नहीं टकराएगा तो फिर हम कैसे तय करेंगे कि उसका बारूद असली है? या वह ख़ुद असली है? या कि उसमें वाकई दम है? क्या साहित्य की सत्ता के सामने आत्मसमर्पण करने वाले लोग दुनिया की बाक़ी सत्ताओं के ख़िलाफ़ सचमुच ताल ठोंक कर खड़े हो सकते हैं या आरपार की लड़ाई लड़ सकेंगे? या कोई फर्जी लड़ाई करेंगे ? या सिर्फ़ लड़ाई-लड़ाई खेलेंगे? क्या प्रतिरोध की संस्कृति एक खेल है ? असली सवाल यह है। यह पाण्डेय जी बेहतर बता सकते हैं कि साहित्य की सत्ता से कैसे टकरायें ? क्योंकि पाण्डेय जी को वर्तमान साहित्य के आलोचना विशेषांक में छपे लेख ‘ आलोचक का बाहर-भीतर ’ में हिंदी आलोचना की अब तक की सबसे बड़ी लफंगई दिखती है। यहाँ यह सवाल ज़रूरी है कि क्या वह लेख आलोचना और साहित्यिक पत्रकारिता अर्थात साहित्य की सत्ता की अंधेरगर्दी, लूटपाट और महाभ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ हिंदी के सिपाहियों की ओर से किया गया जवाबी हमला नहीं है ? क्या आततायियों के ख़िलाफ़ जवाबी कार्रवाई ग़ैरक़ानूनी है ? क्या साहित्य की क्रूर और भ्रष्ट सत्ताओं के ख़िलाफ़ फूलों का हार ले जाकर देवभाषा में नतमस्तक होकर दबी जुबान से निवेदन करने से हिंदी के वे क्रिमिनल अपनी साहित्यिक धंधई बंद कर देंगे? गुनाह से तौबा कर लेंगे ? क्या उस लेख में आलोचकों और संपादकों का जो यथार्थ है वह सही नहीं है? एक आलोचक को, एक संपादक को बुरे से बुरा साहित्यिक जीवन जीने का हक़ है, वह चाहे जितनी गंदगी फैलाये, पर उसे कठोर और कबीर की तरह फटकार की भाषा में कुछ न कहा जाये? उसे देवभाषा में जल-अक्षत चढ़ाते हुए देवताओं की तरह पूजा जाये? पाण्डेय जी बतायें कि हिंदी की लाज सरेआम लूटने वाले इन गुनाहगारों के साथ क्या किया जाए? कमतर कवियों को प्रमोट करने के मामले हों, चाहे कमतर रचनाकारों को पुरस्कारों की रेवड़ी बांटने का धंधा हो, हिंदी के इन माफ़ियाओं के गुनाह कौन नहीं जानता है और जानकर चुप रहने के गुनाह का हिस्सेदार नहीं बनता है। कथासाहित्य का एक छोटा-सा उदाहरण है। दो लेखिकाओं के पहले उपन्यासों - जो उपन्यास की ‘पहली’ शर्त ‘पठनीयता’ के सामने ही फेल हो जाते हैं-को आसमान पर पहुँचाने वाले आलोचकों और संपादकों के इस भ्रष्टाचार की सज़ा क्या होनी चाहिए ? या इन्हें बेवकूफ़ या मक्कार या बेईमान वगैरह समझ कर माफ़ कर देना चाहिए ? इस देश की या शायद दुनिया भर में ऐसा कहीं नहीं होता होगा-जहाँ किसी भी परीक्षा में प्रारम्भिक और मुख्य परीक्षाएँ होती होंगी- कि प्रारम्भिक परीक्षा में फेल होने के बाद अर्थात प्रारम्भिक परीक्षा पास किये बग़ैर मुख्य परीक्षा का गोल्डमेडल दे दिया जाय, ये तो साहित्य के महाभ्रष्ट ही ऐसा कर सकते हैं। क्या ऐसे कांड साहित्य में होटल ताज के 26/11 कांड की तरह नहीं हैं, जिसमें उपन्यास और आलोचना के ‘‘ईमान’’ और पाठकों के ‘भरोसे’ का लगातार बर्बर क़त्ल किया जाता है ? साहित्य की लाज को तार-तार किया जाता है। क्या न्यायालयों के जजों के ग़लत काम पर उन्हें दण्ड नहीं मिलता है ? अभी आज ही (27नवंबर10 को) ख़बर छपी है कि सुप्रीम कोर्ट ने शेक्सपीयर का उल्लेख करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के बारे में कहा है कि ‘‘विलियम शेक्सपीयर ने ‘हेमलेट’ में कहा था कि डेनमार्क राज्य में कुछ गड़बड़ है। उसी तर्ज पर कहा जा सकता है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में कुछ गड़बड़ है।’’ काश कभी सुप्रीम कोर्ट का ध्यान साहित्य के हाईकोर्टों पर भी जाता और यहाँ की साफ़-सफाई के लिए कुछ हो पाता। साहित्य के न्यायालयों के लिए शायद हमारे संविधान में कोई व्यवस्था नहीं है, वहाँ सिर्फ़ स्वेच्छाचार है। इसीलिए साहित्य के हाईकोर्ट हों या सुप्रीमकोर्ट, सब भ्रष्ट हैं। हमारे शहर में तो साहित्य का हाईकोर्ट भ्रष्ट ही नहीं बल्कि महाभ्रष्ट है। क्या साहित्य के माफ़ियाओं के ख़िलाफ़ किसी साहित्यिक फौजी कार्रवाई की ज़रूरत नहीं है? वैसे पाण्डेय जी का ध्यान इस ओर दिलाना ज़रूरी है कि जब क़ानून का राज नहीं रहता है तो जनता क़ानून को अपने हाथ में ले लेती है। साहित्य के नैतिक ‘क़ानून’ और ‘मूल्यों’ का कत्ल करने वालों के साथ साहित्य के ग़रीब बेटे और कुछ कर सकें या न कर सकें पर वह दिन दूर नहीं जब साहित्यिक सभा-गोष्ठियों में बेईमानों और लुटेरों पर हमारे समय की राजनीति की तरह तीव्र असहमति व्यक्त करने के लिए जूते फेंकने का दौर शुरू हो जाय ? साहित्य की सामाजिकता के रास्ते में राहजनी बंद नहीं होगी तो शायद ऐसे राहजनों के ख़िलाफ़ साहित्य की जनता या साधारण कार्यकर्ता ख़ुद ‘साहित्यिक हथियार’ लेकर चलना शुरू कर देंगे? जब बड़े - बड़े साहित्यकारों ने कविता, कथा और आलोचना के रास्ते के राहजनों को प्रश्रय देना और महत्व देना और मान्यता देना शुरू कर दिया हो और ख़ुद भी उनके साथ मिलकर राहजनी करने लगे हों तो यह कहना मुश्किल है कि ऐसे लोगों के लिए देवभाषा की जगह लफंगई और जूता फेंकने की घटनाओं जैसी स्वतःस्फूर्त जनता की देसी प्रतिरोध की संस्कृति साहित्य में नहीं विकसित होगी? अपराध के साथ दंड का भी विधान होता है। कुछ ऐसे अपराध होते हैं जिनके ख़िलाफ़ बौद्धिक और शालीन असहमति ख़ुद एक अपराध है। यों जिस लेख पर पाण्डेय जी को एतराज है उसके बारे में ‘यात्रा’ के अंक तीन में ‘छोटे सुकुल के प्राइवेट नोट्स’ में यह सफाई है कि कैसे उस लेख में कथाकंस की जगह लंगड़सांई या कुछ और दूसरी चीज़ें आयीं, जिन्हें नहीं आना चाहिए था। हालाकि पाण्डेय जी ने भी उस लेख को अबतक की सबसे बड़ी लफंगई कहते हुए उसी पैराग्राफ में ख़ुद ही उन हालात और दिक्कतों का ज़िक्र किया है जिसकी वजह से उस तरह के लेख लिखने जैसे हालात पैदा होते हैं-‘‘ आलोचना की सामाजिक विश्वसनीयता एक और कारण से कम हुई है। कुछ लोग व्यक्तिगत राग-द्वेष के कारण रचनाओं और रचनाकारों की कभी अतिरंजित प्रशंसा करते हैं तो कभी रक्तरंजित निंदा। ऐसी आलोचना प्रायः अतिरंजना और सरलीकरण के सहारे चलती है और वह अपनी विश्वसनीयता के साथ-साथ आलोचना कर्म की सामाजिकता का भी नाश करती है।’’ आलोचना की सामाजिकता का नाश करने वालों के साथ आख़िर क्या सलूक हो ? क्या आलोचना की सामाजिकता का नाश करने वालों के सिर पर एक छोटा-सा भाषा का ही सही साहित्य के ईमान के बारूद से बनाया गया बम भी नहीं फोड़ा जा सकता है, तब क्या हिंदी के सच्चे सपूत आलोचना की सामाजिकता का नाश करने वालों के सिर पर चमेली का तेल रखकर चम्पी करें ? पूर्वांचल में कहा जाता है कि जैसा देवता वैसा अक्षत। लेखक की बात पर भरोसा उसके जीवन को देखकर किया जाता है। आलोचना की सामाजिकता के रास्ते पर बहुत से बहुरूपिये राहजन तरह-तरह के भेस बनाकर घूम रहे हैं, जिनकी पहचान उनके मुखौटे को उतार कर ही की जा सकती है। आलोचना की सामाजिकता को ज़ाहिर है कि पाण्डेय जी शिद्दत के साथ महसूस करते हैं और उस पर खुले दिमाग़ से रोशनी भी डालते हैं-‘ आलोचना की सामाजिकता पर विचार करने की शुरुआत इस प्रश्न से हो सकती है कि वह किसके लिए लिखी जाती है या उसे कौन पढ़ता है। इससे आलोचनात्मक सोच की प्रक्रिया प्रभावित होती है और उसका उद्देश्य भी तय होता है। यही नहीं इससे आलोचना की शैली और भाषा भी निर्धारित होती है। आजकल हिन्दी में आलोचना के नाम से कई तरह का लेखन हो रहा है। एक छोर पर अख़बारी आलोचना है तो दूसरे छोर पर अकादमिक आलोचना। अख़बारी आलोचना साहित्य के बारे में ख़बरें देती है, इसलिए जिनकी दिलचस्पी साहित्य संसार में होती है, वे ही अख़बारी आलोचना पढ़ते हैं। ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक नहीं है। अकादमिक आलोचना के पाठक मुख्यतः छात्र-छात्राएँ हैं।’ मैनेजर पाण्डेय आगे कहते हैं- ‘टेरी इग्लटन ने लिखा है कि आजकल आलोचना या तो साहित्य-उद्योग के जन-सम्पर्क का हिस्सा है या शिक्षा संस्थाओं का आन्तरिक मामला। उसका कोई सामाजिक लक्ष्य या कार्य नहीं है।’ ज़ाहिर है कि साहित्य के ऐसे भारी उद्योग का सबसे बड़ा मुनाफ़ा हिंदी में पुरस्कार के लिए तिकड़म है और इस तिकड़म को साहित्य के पवित्र कार्य में बदलने या आधार देने का काम ग़ैर-ज़िम्मेदार या भ्रष्ट आलोचना बख़ूबी कर रही है।मैनेजर पाण्डेय आलोचना की सामाजिकता के रास्ते की एक रुकावट के रूप में बेहद ज़रूरी बात आलोचना की राजधानी क्षेत्र की भाषा को लेकर करते हैं-‘ आज की हिंदी आलोचना को अभिजन संस्कृति का हिस्सा बनाने और उसकी सामाजिकता को सीमित करने का काम आलोचना की भाषा भी कर रही है। हाल के वर्षों में हिंदी आलोचना में संस्कृत से अधिक अँगरेज़ी का आतंक बढ़ा है। इस आतंक का अनुभव करना हो तो बहुवचन-7 में छपे सुधीश पचौरी के लेख ‘कबीर धर्मवीर और फूको की जीनियोलाजी’ को पढ़ना उपयोगी होगा, हिंदी में ऐसे आलोचक पहले भी रहे हैं और आज भी हैं जो शायद पाठकों के हिंदी ज्ञान पर संदेह के कारण या किसी अन्य कारण से हिंदी शब्दों के समानार्थी अँगरेज़ी शब्दों से अपने लेखों को सजाते रहे हैं, लेकिन सुधीश पचौरी ऐसा नहीं करते। वे देवनागरी लिपि में अंग्रेजी लिखते हैं। उदाहरण के लिए उनके लेख से उद्धरण देखिए: इंटरटेक्स्चुएलिटी के ज़माने में सिर्फ़ मूर्ख ही दलित को कबीर में ढ़ूँढ सकते हैं। जीनियोलाजिकल डिकंस्ट्रक्शन की यही ख़ास बात है कि दलित कबीर की किताब में भले न हो, लेकिन जीनियोलोजी के वर्तमानत्व और दलितवाद के युद्ध में कबीर एक प्राथमिक सांस्कृतिक टेक्स्ट हो सकते हैं।’ हिंदी आलोचना की सामाजिकता के रास्ते में आने वाली एक और बाधा का ज़िक्र पाण्डेय जी करते हैं-‘हिंदी आलोचना की सामाजिकता को संदेहास्पद बनाने वाली एक प्रवृत्ति वह है जो किसी रचना की समीक्षा के दौरान उसमें मौज़ूद समाज पर ध्यान नहीं देती।’ इस प्रसंग में वे ललित कार्तिकेय की लिखी अल्मा कबूतरी की समीक्षा का ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि ‘समीक्षक की सारी बौद्धिकता ‘अल्मा कबूतरी’ को एक प्रकृतवादी रचना साबित करने में लगी है। जब आलोचनात्मक चेतना धारणाओं के पीछे-पीछे चलती हुई रचनाओं के बारे में फ़ैसला करती है तब ऐसी ही अदालती आलोचना लिखी जाती है।’ यहाँ कहना ज़रूरी है कि उसी लेखिका के शुरुआती उपन्यास को अपठनीय, ठस और भूसाछाप कथाभाषा होने के बावजूद एक संपादक जी ने और कुछ आलोचकों ने सिर पर रखकर जो भांगड़ा किया था, वह क्या था ? क्या यह कहने की ज़रूरत है कि कथाभाषा में कथारस का चार सौ बोल्ट का करेंट प्रवाहित होता है जो पाठक को न सिर्फ़ प्यार से अपने सीने से चिपका लेता है, बल्कि किसी कथाकृति को यादगार बनाता है ? यह ठीक है कि ललित कार्तिकेय की आलोचनादृष्टि में बौद्धिकता और नागरबोध की दिक्कत है, पर इस दिक्कत से कहीं बड़ा अपराध कूड़ा कृतियों को आसमान पर बैठा देने से है। क्योंकि एक में अज्ञान या दृष्टिदोष है तो दूसरे में आलोचक के ईमान का लोप ही नहीं बल्कि बाक़ायदा कदाचार है। क्या यह आलोचना की असामाजिकता नहीं है ? यहाँ याद दिलाना है कि पाण्डेय जी ने ख़ुद ही ग्राम्शी के इस कथन का उल्लेख आगे किया है कि ‘महत्वपूर्ण साहित्यिक रचना एक कलाकृति होने के साथ ही अपने समय और समाज की सभ्यता का एक हिस्सा भी होती है।’ महत्वपूर्ण बात यह कि ग्राम्शी के इस कथन में यह स्पष्ट है कि एक साहित्यिक रचना का समय और समाज से जुड़ाव होने के साथ ‘एक कलाकृति होना’ भी ज़रूरी है। इसी नज़रिये से दलित विमर्श या स्त्री विमर्श से जुड़ी रचनाओं के साथ एक अविस्मरणीय ‘कलाकृति’ न हो पाने की विफलता की बात की जाती है। बहरहाल मैनेजर पाण्डेय यहाँ ललित कार्तिकेय के बहाने बेशक बौद्धिकता के ख़तरों की ओर ध्यान खींचने का ज़रूरी काम करते हैं। इस क्रम में वे नामवर सिंह को याद करते हुए लिखते हैं-‘नामवर सिंह ने ठीक ही कहा है कि आलोचना अपने समय की बौद्धिकता की उपस्थिति है।’ फिर आर-पार देखते हुए सवाल करते हैं-‘सवाल यह है कि कैसी बौद्धिकता। ज़ाहिर है अपनी सेवा में लगी बौद्धिकता नहीं, बल्कि अपने समाज की वर्चस्ववादी विमर्श की काल्पनिक सहमति के छद्म की निर्मम आलोचना करने वाली बौद्धिकता। ऐसी ही बौद्धिकता अपने समय के समाज के आलोचनात्मक विवेक का प्रतिनिधित्व करती है। वह एक ऐसी निरंतर सतर्क बौद्धिकता होती है जो अपने समय की हलचलों को जानती है और धड़कनों को पहचानती है। उसमें अपने समाज, संस्कृति और साहित्य के प्रति गहरी जिज्ञासा और ऐसी प्रश्नात्मकता होती है, जिसकी पहुँच के बाहर न परंपरा की स्मृति होती है, न वर्तमान का बोध और न भविष्य की चिंता। उस बौद्धिकता का लक्ष्य मनुष्य की स्वाधीनता है, मनुष्य की अमूर्त अवधारणा की दार्शनिक स्वतंत्रता, समाज में पराधीनता के शिकार मनुष्यों की सामाजिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता।’ यही आलोचना की सामाजिकता की बुनियाद भी है। सवाल फिर यहाँ साहित्य की दुनिया में लेखक की स्वाधीनता का है। क्यों लेखकों का कोई छोटा या बड़ा समूह अपनी स्वाधीनता किसी साहित्य की सत्ता को भेंट कर देता है। लेखकों का समाज हो या वृहत्तर समाज उसके स्वास्थ्य से बहुत-सी चीज़ें तय होती हैं। ‘ अगर समाज का बौद्धिक वातावरण उन्मुक्त और संवादधर्मी होगा तो आलोचना भी मूलगामी, उत्सुक, तेजस्वी, प्रश्नाकुल और सत्यनिष्ठ होगी, लेकिन अगर बौद्धिक वातावरण रूढ़िवादी, पीछे देखू और सहमतिवादी होगा तो आलोचना वैसी ही होगी। हिन्दी आलोचना के बेजान और बीमार होने का एक कारण हमारे समाज का वह बौद्धिक वातावरण है जिसमें साहित्यवाद का सहयोगी सहमतिवाद है। ऐसे वातावरण में पलने वाली आलोचना अगर असामाजिक हो तो आश्चर्य की क्या बात है।’ मैनेजर पाण्डेय आलोचना की सामाजिकता के रास्ते में जगह-जगह घात लगाकर बैठे राहजनों की हरक़तों पर बारीक नज़र रखते हैं। तभी तो कहते हैं- ‘हिन्दी आलोचना को असामाजिक बनाने में कुछ भूमिका उन आलोचकों की भी है जो अतिरंजना, सरलीकरण, धमकी, फ़तवा, आशीर्वाद और दुविधा की भाषा में आलोचना लिखते हैं। ऐसी आलोचना ग़ैर ज़िम्मेदार होती है, इसलिए असामाजिक की होती है।’ कहना बेहद ज़रूरी है कि आज ऐसे आलोचकों, उप आलोचकों, सहायक आलोचकों की एक पूरी ज़मात राहजनी के धंधे में लगी हुई है। आलोचकों की यह खेप प्रतिभा की जगह अपनी धंधई से बड़े सुकुल जी का बाप बनना चाहती है, ऐसा इसलिए कि उसके पास आलोचना में आत्मसंघर्ष की कूवत सिरे से गायब है। सच तो यह कि आज आलोचना की सामाजिकता को असली ख़तरा ऐसे राहजनों से ज़्यादा है।


(यह लेख ‘प्रस्थान’ के मैनेजर पाण्डेय पर केंद्रित अंक और उसके 
पुस्तकाकार संस्करण में भी है। ई पत्रिका सृजनगाथा पर भी उपलब्ध है।)














मंगलवार, 25 जून 2013

एकता का पुष्ट वैचारिक आधार

- गणेश पाण्डेय

एक वीर ने उन्हें तब घूरा
जब वे सच की तरह कुछ बोल रहे थे ।

एक वीर ने उन्हें तब टोका
जब वे किसी की चमचम खाए जा रहे थे ।

एक वीर ने उन्हें तब फटकारा
जब वे किसी मोढ़े की परिक्रमा कर रहे थे ।

असल में
एक वीर ने दम कर रखा था
उनकी उस अक्षुण्ण नाक में
जिसे तख़्ते-ताउस की हर गंध
एक जैसी प्यारी थी ।

एक दिन वे एकजुट हुए
क्योंकि एकता का पुष्ट वैचारिक आधार उनके सामने था ।

पाठ्यक्रम समिति की उस बैठक में
लिया उन्होंने निर्णय
कि ‘सच्ची वीरता’ को
जीवन से निकाल दिया जाय ।



सच्ची वीरता’ = अध्यापक पूर्ण सिंह का महत्त्वपूर्ण निबंध ।

( दूसरे संग्रह ‘जल में’ से )