मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

गंगाजल तथा अन्य कविताएँ

- गणेश पाण्डेय

हमारा प्यार 
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तुम चाहती तो 
मेरा घर तोड़ सकती थी 

मैं तो चिता से भी उठकर 
तुम्हारे साथ भाग सकता था 

मैं चाहता तो 
तुम्हारा घर तोड़ सकता था 

तुम्हारे घर के आसपास
दीवारों पर तुम्हारा नाम लिखकर 

प्यार में कोई किसी को 
नुक़सान कैसे पहुँचा सकता है 

हम तो अपने प्यार को तमाम 
वक़्त के थपेड़ों से बचाते रह गये 

दिल के किसी पोशीदा तहखाने में 
यादों की संदूक में उसे रखा 

यही था यही था हमारा प्यार 
राख में बची हुई चिनगारी की तरह।

पोती पूछेगी 
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तीन दिन फोन पर बात नहीं हुई तो 
पोती ने कहा, बाबा कहाँ चले गये थे
बाबा ने कहा, मेरी तबीयत ख़राब थी 
पोती ने पूछा, तबीयत क्यों ख़राब थी
काश, उसके बाबा कभी बीमार न हों
काश, पोती की आँखों के सामने से 
उसके बाबा कभी ओझल ही न हों
पोती पूछेगी परेशान होगी।


फ़ज़ीहत के बाद 
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मुफ़्त सलाह देना 
समझदारी की बात नहीं थी 
नहीं देना चाहिए था कभी नहीं 
जहाँ मुफ़्त में देना बहुत ज़रूरी था 
वहाँ से भी बिना दिए चुपचाप 
हट जाना चाहिए पाँडे जी को 
अक़्ल आयी तो लेकिन तमाम
फ़ज़ीहत के बाद।

गंगाजल 
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बेटा 
दूसरे देश में नौकरी करता है
बुज़ुर्गवार कहीं गये ही नहीं 
यहीं पैदा हुए इसी मिट्टी में 
जवान हुए यहीं काम किया 
माँ-बाप की सेवा की 
बूढ़े हुए बीमारियाँ हुईं 
खाँसते-थूकते-जागते
बीतती है अब
सारी-सारी रात
बाबूजी की बनवायी बेंच पर 
तो कभी 
जिस आम के पेड़ को लगाया था 
उसके नीचे बैठकर 
रास्ता देखते-देखते दिन कटता है 
बेटा कभी आता है तो 
मरने के टाइम पर बिस्तर पर 
गू-मूत साफ़ करने के सपने 
दिखा जाता है 
बुज़ुर्गवार कभी नहीं पूछते
चारोधाम कब कराओगे 
बुज़ुर्गवार को अक्सर अपने 
बचपन की याद आती है 
किशोर जीवन की याद आती है 
पिता की याद आती है 
याद आता है अपने 
पिता का हाथ-पैर दबाना 
उनकी पीठ खुजलाना
नल के नीचे बैठाकर नहलाना 
बुज़ुर्गवार तो अपने 
बेटे की बड़ाई करते नहीं थकते 
बाहर रहता है दिरहम कमाता है 
उसकी कोई बुराई तो किसी से 
करते ही नहीं 
अलबत्ता 
जब कोई आसपास नहीं होता 
आसमान में देखकर कहते हैं 
मरते समय गू-मूत नहीं उठाओगे 
तो भी मर जाऊँगा बेटा 
कोई नहीं रोक पाएगा मरने से 
मरते समय क्या गू-मूत 
क्या गंगाजल 
जीते जी 
थोड़ा सा सुख मिल जाता तो
शायद थोड़ा और जी जाते।