गुरुवार, 2 जुलाई 2020

दो सौ पचास ग्राम तुलसीदास तथा अन्य कविताएं

- गणेश पाण्डेय

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दो सौ पचास ग्राम तुलसीदास
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कितने भले
और सीधे सादे लोग हैं
कहते हैं जिसके पास प्रतिभा है
छंद है त्रिष्टुप है अनुष्टुप है पदलालित्य है
हिंदी उर्दू फ़ारसी कविता की समझ है 
वही आज का श्रेष्ठ कवि है

ओह 
निश्चय ही 
निश्चय ही निश्चय ही
जिसके पास इतनी विपुल राशि है
आज की तारीख़ में उसके
दो सौ पचास ग्राम तुलसीदास 
होने पर तनिक भी संदेह नहीं है
नहीं है नहीं है

कारयित्री प्रतिभा का 
यह रहस्य जानकर मेरी छोटी बुद्धि 
भ्रष्ट हो गयी है गहरे सदमे में है
शायद उसे दिल का दौरा पड़ गया है
यह एक कवि की पहचान है
कि कविता का हुदहुद तूफ़ान है
अरे भाई 
कबीरदास के पास प्रतिभा का
इतना बड़ा ज़लज़ला था
हिंदी की दुनिया में 
कवि होने के लिए
कविता का ईमान काफ़ी क्यों नहीं है
फटकार कर 
सच कहना काफ़ी क्यों नहीं है
और जिसके पास ईमान नहीं है
वह कवि क्यों है 
कविता का लिपिक क्यों नहीं है

मैं पूछता हूं कि 
अभी पिछले दिनों एक धूमिल कवि था 
इस लिहाज़ से धूमिल था कवि नहीं था
चुटकीभर प्रतिभा से कंठ में कैसे बसा
और वह जो कविता 
और आलोचना के हरामज़ादों से
अपनी कविता और आलोचना में
ईमान का डंडा लेकर तीस साल से
अकेले लड़ रहा है लहूलुहान है
क्या है

कवि होने के लिए
प्रतिभा के नाम पर किसी रटन्त विद्या
या छंद के पहाड़े की क्या ज़रूरत है
कवि होने के लिए 
सिर्फ़ चुटकीभर ईमान काफ़ी क्यों नहीं है
कवि वह है जो इतना तो आज़ाद हो ही
कि जिसके पुट्ठे पर किसी की छाप न हो
जो कविता के पाठकों का सगा हो
जिसने कभी 
उन्हें कविता के चमत्कार से ठगा न हो
उनके लिए जिया हो मरा हो
हिंदी के हरामज़ादों से लड़ा हो
और हिंदी के मर्दों से मुँह न चुराया हो।

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पियक्कड़ आलोचक
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कमअक़्ल 
आलोचक को
एक-दो बार में आप 
थोड़ा-बहुत समझा सकते हैं

लेकन
छलछंदी आलोचक को 
हरगिज़ नहीं बिल्कुल नहीं
वह तो टस से मस नहीं होगा

आलोचना के 
गटर में गिरकर
वहीं से चिल्लाता रहेगा
अरे कोई लाओ रे एक पैग
छंद की व्हिस्की लाओ रे

पियक्कड़
आलोचक को छंद की मदिरा से
दूर नहीं कर सकते मर जाएगा
उसका कुनबा बिखर जाएगा
उसे कोई डर नहीं है
कोई शर्म नहीं

उसकी आलोचना की कार
लड़ती है तो जल्द लड़ जाए
उसे कैंसर होता है तो हो जाए
लीवर सिरोसिस चाहे
एनीमिया डिमेंशिया
हृदयरोग कुछ भी हो जाए

हे ईश्वर 
फिर भी इतना करना
कि बेचारा छलछंदी आलोचक
अपने जीवनकाल में आज
छंद की अनिवार्यता पर
एक अमर अकाट्य अद्वितीय
और ’कविता का चाँद और 
आलोचना का मंगल’ से सुंदर
लेख लिख जाए।

(वैधानिक चेतावनी : युवा आलोचकों को ’छंद की अनिवार्यता’ की शराब पीने से बचना चाहिए।)

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कर्ज़
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जिस
आलोचक की आलोचना में
ईमान का छंद नहीं होता है

वही
प्रायः कविता में छंद के लिए
आठ-आठ आँसू रोता है

क्योंकि
उसे कुछ कवियों से लिया गया
पुराना कर्ज़ चुकाना होता है।

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कवि की ऐंठी हुई ऐंठ
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आप 
आप हैं तो आप हैं
ये ये हैं तो ये हैं हां हैं
वो वो हैं तो वो हैं हा हैं
मैं मैं हूं तो मैं हूं हां हूं
फिर भी आप समझते हैं
कि आज की कविता में
आप ही आप हैं ओह
कितने बड़े बेवकूफ़ हैं
आप

आप की माया है
जहाँ उम्मीद नहीं होती
वहाँ भी दिख जाते हैं आप
कोई भी शहर कोई भी क़स्बा
किसी भी गाँव में पहाड़ पर
बस आप ही आप होते हैं
हर जगह आप

अपने समय की कविता में
दो नहीं दो सौ कवि होते हैं
और आप सोचते हैं कि बस
आप ही आप हैं बाक़ी सब
हवा हैं च्यूंटे हैं आक्थू हैं
वाह कितने बड़े वाले आप हैं
यह नहीं पता कि लंबे वक़्त की 
छननी से छनते हैं नाम
कितने बेसब्र हैं आप
अभी तो मौज़ूद हैं
आपके बाप।

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डरे हुए आलोचक को मार दो
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नाम-इनाम की लूटमार में
कविता का असली रखवाला 
आलोचक को होना चाहिए था
चाहे इसकी शुरुआत 
उसने ही की थी

लेकिन आज जबकि 
कविता थरथर कांप रही है
एक डरा हुआ आलोचक
जो ख़ुद की हिफ़ाज़त 
कर नहीं सकता

हिंदी कविता की आबरू
ख़ाक बचाएगा सबसे पहले 
उसे मार दो 

फिर सोचो दूर खड़े
कविता के भाइयो और बहनो
अगरचे तुम भी इस लूटमार में
शामिल नहीं हो।

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हुनर
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कवि का हुनर
कविता से पाठक को
कसके जोड़ने के लिए होता है
फ़ासला पैदा करने के लिए नहीं

और
कवि का हुनर क़तई
महाकवि की कुर्सी पर बैठकर
इतराने के लिए नहीं होता है

मेरे पास 
आलोचना की एक ऐसी मशीन है
जिससे ऐंठे हुए कवियों के हुनर को
तोड़-ताड़ कर मुफ़्त में ठीक करता हूं।

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गिनतीकार
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अरे भाई
सुनो-सुनो मैं तो
किसी कविता दशक में
पैदा ही नहीं हुआ
बक़ौल गिनतीकार

चलो अच्छा हुआ
मैं तो अपने हमज़ाद
छोटे सुकल समेत फाट पड़ा
पांच फीट आठ इंच डैरेक्ट 
आधुनिककाल में

गिनतीकारो ने
रोज़-रोज़ कविगणना से
माठा नहीं कर रखा होता
तो मैं उनके ख़लिफ़ भला
ऐसी सख़्त कार्रवाई क्यों करता।

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आलोचक दोस्त से दिल की बात
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मेरे प्यारे आलोचक दोस्त 
हम कबीर और गौतम बुद्ध
छात्रावास में रहते थे 
रोज़ मिलते थे
नहीं मिल पाते थे तो हमारा
खाना हज़म नहीं होता था
हम दो बार एक बार रोज़ 
मिलते ही मिलते थे
जैसे कल की बात हो

अब कितना कुछ बदल गया है
वक़्त रास्ते और प्राथमिकताएं
सब कितनी आसानी से हुआ
मैं शायद ज़्यादा बदल गया
कवि के साथ आलोचक भी
हो गया मैं होना नहीं चाहता था
तुमने रोका भी नहीं हो गया

असली दुनिया में
बहुत मारें पड़ीं तो दिल हिल गया
तुमने रोका नहीं आभासी दुनिया में
आ गया काफ़ी पहले
वक़्त लगा तुम भी इस नयी दुनिया में 
खिंचे चले आये किसी आकर्षण में
मेरा क्या मैं तो मज़बूरी में आया

हम 
यहां भी साथ-साथ हैं
फेसबुक का हॉस्टल आसपास है 
लेकिन यहां कम दिखते हो
दिखते भी हो अगरचे कभी
तो मेरी दीवार की तरफ़
कोई काम निकालकर 
अब आते भी नहीं हो आओ तो
मेरी दीवार पर कुछ भी करो
बुरा नहीं मानूंगा

तुम 
इस दुनिया में 
किसी और काम से 
क्यों नहीं आते हो कुछ तो बड़ा 
कर रहे होगे शायद
कविता का इतिहास लिख रहे होगे
चाहे किसी की रचनावली 
संपादित कर रहे होगे
लेख तो दो दिन में हो जाता होगा
कुछ कवियों को बड़ा कवि बना रहे होगे
ज़रूर कुछ ख़ास है तभी यहां
बहुत नाप-तौल कर आते हो
दो मिनट में लौट जाते हो

किसी बड़े लेखक की पुण्यतिथि पर 
चाहे उसकी जयंती पर आते हो 
ज़्यादातर लेखकों के निधन पर ही
श्रद्धांजलि देने के लिए आते हो
मतलब बहुत ग़लत समय पर 
आते हो मित्र
मुझे तुमसे बहुत डर लगने लगा है
इस तरह तो आशंका की तरह 
यहां पहले कभी नहीं आते थे
कुछ माह पहले मेरी दीवार पर
आते थे कुछ पल के लिए
तो मित्र की तरह 

इस 
आभासी दुनिया में 
कभी-कभार दोस्तों से मिलने के लिए 
निकला करो जैसे पहले निकलते थे
चाय के लिए कविता सुनने के लिए
देखो आज कैसी कविता लिखी है
छंद के छलछंद के ख़लिफ़ लिखी है
ख़ुद तुलसीदास आए आशीष देने
और प्यार देते हुए कहा 
कविता और आलोचना के रावण से
लड़ना ज़रूरी है

तुम 
मेरी कविताओं को 
अब भी प्यार करते हो
किसी माफ़िया का डर भी होगा
तो भी मेरी कविताओं को ज़रूर
दिल ही दिल में प्यार करते होगे।

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तर्क
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किसी को
अपशब्दों की बौछार से
लज्जित करना चाहोगे तो
वह सिर्फ़ नाराज़ होगा

और
उसकी आँख में
आँख डालकर तर्क करोगे
तो उसकी आत्मा लज्जित होगी

बशर्ते 
उसने अपने हाथों
अपनी आत्मा का गला
घोंट न दिया हो

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मज़दूर क्रांति
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मज़दूर 
सिर से पैर तक मज़दूर होता है
न किसी का भाई होता है न बेटा न पिता 
न पति न प्रेमी न नागरिक न मतदाता
न मनुष्य

मज़दूर 
जैसा कोई और नहीं होता है
सिर्फ़ मज़दूर जैसा ही मज़दूर होता है
मज़दूर दुनिया का चाहे इस देश का
अद्वितीय प्राणी होता है
उसका दुख अद्वितीय होता है
उसका पसीना उसका आंसू
सब अद्वितीय होता है

मज़दूर
प्रगतिशील कविता का
प्रमुख विषय होता है कसौटी होता है
कवि जी की दृष्टि में वही प्राणी होता है
शेष पृथ्वी पर चाहे देश में मृतात्माएं हैं
सचल पाषाण प्रतिमाएं हैं 
उन्हें न दर्द होता है
न उन्हें छाला पड़ता है न आंसू बहता है
न बीमार होते हैं न भूख से मरते हैं
न कवि जी की सहानुभूति पाते हैं

आज़ादी के बाद से ही
सिर्फ़ राजनेताओं ने ही नहीं
कवियों ने भी भरपूर कोशिश की
कि देश के ग़रीब अमीर न होने पाएं
और मज़दूर मिल मालिक
यथास्थिति बनी रहे
कविता में रोना-धोना होता रहे
मज़दूरों को काम के लिए
दूर-दूर तक जाना पड़े
मुसीबत में पैदल आना पड़े
और कवि जी को कविता लिखना पड़े
और ऐसी करुणा विगलित कविताओं से 
वाहवाही के पहाड़ उठाना पड़े

हो न हो
यह दशक मज़दूर कविता के नाम रहेगा
आज के कवियों आलोचकों और
संपादकों के बहुत काम का रहेगा
दशक की बेवकूफ़ी में फंसे कवियों के लिए
मज़दूर दशक इस दशक की कविता का
नाम रहेगा

यह भी 
हो सकता है कि मज़दूर इंडिया नाम से 
धड़ाधड़ कई खंडों में संकलन आ जाएं
पत्रिकाओं में लाइव पर दीवार पर
चर्चा की बाढ़ आ जाए

आज यशपाल होते
तो हरगिज़ करवा का व्रत नहीं लिखते
कोरोना पर भी लंबी कहानी नहीं लिखते
मज़दूर का व्रत ज़रूर लिख रहे होते
केदारनाथ अग्रवाल भी हे मेरी तुम 
आज की तारीख़ में हरगिज़ नहीं लिखते
हे मज़दूर लिख रहे होते
और कविता में औचक हो रही
मज़दूर क्रांति पर
ख़ुश हो रहे होते।

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शास्त्रार्थ
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हे
सूथन वाले
पंडिज्जी पालागी 

ऊ पगलेटवा से
भिनसरवे से काहे
शास्त्रार्थ करत हौ

चोर उच्चकन से
मक्कार हरामजादन से
शास्त्रार्थ करब ठीक है

शास्त्रार्थ ज्ञानी पंडितन से 
ईमानदार मनइन से करबो
कि हिंदी कै दगाबाजन से

जौन सब
कबीर प्रेमचंद निराला
मुक्तिबोध कै बेचिखाइन

वोन्हनन सालन से
कब तक शास्त्रार्थ करबो
ई जिनगी बरबाद करबो

हम पूछित है पंडिज्जी 
एन्हनन कै कौने जनम में
डंडा करबो।

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पापी
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पहुंचभर जाता
साहित्य की काशी

किसी भी घाट पर
डुबकी लगा लेता

बहती हुई गंगा में 
मैं भी हाथ धो लेता

तो कोई बंदा आज
पापी नहीं कहता।

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सोने वालो
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जागते 
रहो

सोन का
इनाम
लेने वालो!

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कवि थे
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वे सब तेज़ी से
उधर ही भाग रहे थे

जिधर 
कुछ बंट रहा था

लॉकडाउन में
मुसीबत के मारे
मज़दूर नहीं थे

सब के सब
हिंदी के कवि थे।

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कवि नहीं कहा
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पापी कहा
पागल कहा
कुंठित कहा
असफल कहा
क्या-क्या नहीं
कहा ज़माने ने

बस एक 
कवि नहीं कहा।

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काँटों की सेज की कविता
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मैंने
उनकी बहुत सुंदर
और बहुत कोमल कविताओं को
बहुत-बहुत देखा 

वाह-वाह 
करते-करते थक गया
उन्हें और कुछ लिखना आता ही नहीं था
इतना तो देखा और कितना देखता

उन्होंने तो
मेरी कँटीली कविताओं को कभी
चाहे मुझे फूटी आँखों से भी नहीं देखा
फिर भी लंबे समय तक उन्हें देखता रहा

आख़रि ऐसे
महाकवियों की ओर कब तक देखता
जिनकी कविताएं फूल जैसी हैं
और कविता की समझ पत्थर की तरह

कोई महाकवि 
यह कैसे समझ सकता है कि कविता
कभी कांटों की सेज पर नहीं सोएगी
हमेशा फूल ही पंखुड़ियों में बंद रहेगी

कोई कवि 
सोचता है कि वह जैसी कविता लिखेगा
बस वही कविता होगी बाक़ी पागलपन
तो मुझे उसके कवि होने पर संदेह है।





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