रविवार, 11 दिसंबर 2016

पहाड़, च्यूँटे और बुरा वक्त

- गणेश पाण्डेय

यहां से वहां तक
और वहां से न जाने कहां तक पसरा हुआ यह पहाड़ 
जैसे प्रलय तक टस से मस नहीं होगा 
सदियों की मूसलाधार बरसात इसे बहाकर नहीं ले जा सकती है 
पृथ्वी की बडी से बडी आँधियाँ इसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगी 
जैसे इस सबसे ठोस और सबसे भारी महांधकार को 
अपनी गोद में लेकर बैठा है यह हत्यारा समय
जैसे अहर्निश अकाट्य अभेद्य और अजर-अमर बना रहेगा यह अंधेरा
जैसे सूर्य अपने सबसे अच्छे दिनों में भी
अपने वक्त के इस सबसे काले मेघों की सबसे मोटी दीवार में 
सुई की नोंक जितनी सुराख नहीं कर पाएगा 
चाहे यहां की सारी घड़ियां बताएंगी 
और सारे ज्योतिषी कहेंगे चाहे सारे मुर्गे-चूजे बाँग देंगे 
फिर भी अंधेरा इतना तीव्र होगा कि रोम रोम से दिखेगा 
असंख्यस्वप्नदर्शी और सबसे चमकीली आंखें 
सुबह की एक किरण नहीं देख पाएंगी
सबसे ज्यादा अँधेरा सबसे सफेद कपड़ों के पीछे होगा 
सबसे काला चेहरा सत्ता के असंख्य शीर्ष पर दिखेगा
होंगे ऐसे लोग भी जो दिनरात 
त्रिपुंड की शक्ल में अंधेरा ललाट पर लगाएंगे
ऐसे भी भला क्यों नहीं होंगे 
जो अंधेरे का पहाड़ अपनी काली दाढ़ी में छुपाएंगे
कुछ लोग अंधेरे के पहाड़ पर छत्र लगाकर पिकनिक मनाएंगे
कुछ लोग जगह-जगह रुपया छापने की मशीन लगाएंगे
कुछ लोग बड़े-बड़े व्याख्यान कक्षों में 
अंधेरे के दर्शन पर सवेतन प्रकाश डालेंगे
कुछ लोग पहाड़ के सौंदर्य पर कविताएं लिखेंगे
कुछ लोग पहाड़ की अकादमियों में मत्था टेकेंगे
कुछ लोग अखबार छापेंगे अंधेरे में पहाड़ को टो-टो कर
कुछ लोग पहाड़ की चोटी पर 
अपनी मृत आत्मा की सबसे ऊँची बोली लगवाएंगे
ये कुछ लोग होंगे सिर्फ कुछ लोग 
जो पृथ्वी के सबसे चतुर लोग होंगे
जो पहाड़ की गोद में सुख की नींद सोएंगे
और अँधेरे का यह सबसे बड़ा पहाड़ 
कमजोरों की छाती पर चाहे उनके शीश पर टिका रहेगा
युगों-युगों तक चाहे अनंतकाल
इसके नीचे असंख्य केंचुए और असंख्य च्यूंटे दबे होंगे सदियों से
बहुत से कीट-पतंग अपनी संततियों के लिए उठाये होंगे सिर पर
अंधेरे की यह असीम पर्वत-श्रृंखला
वही होंगे वही होंगे वही होंगे श्रीमान जी
जो अपने सिर से 
किसी दिन उठाकर फेंक देंगे अंधेरे का यह असह्यभार
वही होंगे जो अंधेरे के पहाड़ को 
ढ़हाएंगे आततायी के प्रासाद की तरह
वही होंगे जो अंधेरे की तोंद को फोड़ेंगे 
ब्रह्मांड के सबसे बड़े ग्रह के आकार के गुब्बारे की तरह
चाहे अपनी पृथ्वी पर हजार कोस लंबे फोड़े की तरह 
चीर देंगे खच्च से
एक कविता की कुछ जरूरी पंक्तियां है श्रीमान 
सच बिल्कुल नहीं
सच सिर्फ इतना है कि अंधेरे का यह पहाड़ ढ़हेगा नहीं
इस बुरे वक्त में
छोटे-मोटे भूकंप इसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे
और उतना ही सच यह भी है श्रीमान
कि ये केंचुए, ये च्यूंटे, ये कीट-पतंग मरेंगे नहीं
उनकी आंखों में फिर भी खदबदाता रहेगा कुछ
उनके दिमाग में होती रहेगी उथलपुथल।

(यात्रा 12)







शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

अथ आलोचक कथा

- गणेश पाण्डेय

शुभ्रवसना वीणा वादिनी ने पहले वीणा बजाकर
मुझे गहरी नींद में जगाया और सिरहाने आकर
मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए
मां की तरह मुस्कायीं

बहुत दिनों बाद सपने में मां आयी
पूछा- काहेक रोवत हौ के मारिस है
फिर मां ने ही कहा- तूडि देव ओकर हड्डी-पसली
उसके बाद मां अन्तर्धान हो गयी

और 
इस तरह कविताई करते हुए 
मैंने आलोचना की लाठी थामी 
और इस लाठी को
वंचित पीडित लेखकों की आवाज बनाया.

किसी के आलोचक बनने की 
इससे अच्छी कहानी और क्या हो सकती है
और कहानी भी ऐसी जो सिर्फ कहानी न हो.

कृपया उनसे कोई कहानी न पूछें
जिन्होंने अघाये हुए लेखकों के लिए
पूजा-पाठ चाहे लठैती की

जिनके जीवन में 
खुद की कोई कहानी नहीं थी
कोई वजह नहीं थी आलोचक बनने की
किसी तरह की बेहतरी का स्वप्न नहीं था
जिन्हें न तो बडे सुकुल जी बनना था
न छोटे सुकुल
जिन्हें बस ऐसे ही आलोचक बनना था
ममूली चीजों के लिए
बन गये।

(यात्रा 12)