बुधवार, 18 नवंबर 2020

दीया

- गणेश पाण्डेय

पहला दीया
उनके लिए जो देख नहीं पाते
दूसरा उनके लिए जो दीया को दीया कह नहीं पाते
तीसरा उनके लिए जो दीया की कोई बात सुन नहीं पाते

एक दीया हिंदी के उन भयभीत दोस्तों के नाम 
जिन्होंने मुझे चींटी की मुंडी के बराबर दोस्ती के लायक़ नहीं समझा

हिंदी के उन दुश्मनों के नाम भी कुछ दीये ठीक उनकी अक़्ल के पिछवाड़े
जिन्होंने हमेशा चूहे की पीठ पर बैठकर शेर की पूँछ मरोड़ने की ज़िद की

ये दीये उन तमाम अदेख दोस्तों की नम आँखों के नाम 
इस वर्ष हारी-बीमारी और हादसों में छोड़ गये जिनके प्रिय और बुज़ुर्गवार
चाहे मारे गये मोर्चे पर जिनके बेटे
पति और पिता और गाँव के गौरव

पृथ्वी की समूची मिट्टी और आँसुओं से बने ये दीये
क्यों नहीं मिटा पाते हैं, सदियों से बढ़ता ही जाता अँधेरे का डर

एक थरथराती हुई स्त्री के जीवन में 
क्यों नहीं ला पाते हैं जरा-सा रोशनी
ये दीये क्यों नहीं जला पाते हैं 
हत्यारों का मुँह उनके हाथ 
और लपलपाती हुई जीभ

ये दीये उम्मीद के सही, हार के नहीं
ये दीये बारूद के न सही, प्यार के सही
ये दीये क्रांति के न सही, प्रतीक सही
दोस्तो फिर भी जलाता रहूँगा 
ऐसे ही ये दीये कविता के दोस्त सही
इनकी लौ में है पलभर में 
हमारी आत्मा को जगाने की शक्ति 

देखो अरण्य के समीप 
ग़रीब-गुरबा की बस्ती में जलते दीये
कैसे काटता है एक नौजवान टाँगे से जलौनी लकड़ी
कैसे इनकी रोशनी में डालती है एक माँ बच्चे के मुख में कौर

कैसे कनखियों से देखती है एक युवा स्त्री 
अपने पति के शरीर की मछलियों को उसकी वज्र जैसी छाती

पैसे की मार से 
दुखी लोगों के लिए कुछ दीये
उस बाप की ड्योढ़ी पर एक दीया 
जिसे बेटियों की फीस की चिंता है

जलायें न जलायें 
चाहे बड़े शौक से भाड़ में जायें
उन आलोचकों के लिए भी कविता के छोटी जाति के कुम्हारों के बनाये कुछ दीये
जिनके घर मुफ़्त पहुँचायी गयी हैं गाड़ियों में भरकर बिजली की विदेशी झालरें

विश्वविद्यालयों, अकादमियों, संस्थानों, अख़बारों, पत्रिकाओं, प्रकाशकों 
और हिन्दी के बाक़ी दफ़्तरों में 
एक-एक दीया ज़बरदस्त

हिन्दी की उन्नति के नाम पर 
उसकी किडनी बेचकर मलाई काटने वाले 
हज़ारों हरामज़ादों के लिए भी

हिन्दी के जालसाज़ों के छल में 
फँसे हुए बच्चों के लिखने की मेज पर
जीवनभर जलने वाला कविता का 
यह दीया ख़ास

हिन्दी बोलने वाले 
विपन्न बच्चों के लिए उम्मीद का एक दीया
इस साल वे भी बने कलक्टर चाहे कमाएं दो पैसा

हिन्दी बोलने वाले बच्चे पैदा करने वाली माँ के बिना चप्पल के पैरों के पास
मेरी, तेरी, उसकी, सबकी गुज़र गयी 
माँ की ज़िदा याद के पैरों के पास
चाँदी की पायल की जगह 
एक ग़रीब कवि की ओर से 
मिट्टी का यह दीया।


      




   


                                                                   - गणेश पाण्डेय

बुधवार, 28 अक्तूबर 2020

स्त्रीजीवन की कुछ कविताएं

- गणेश पाण्डेय

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भारतीय सास
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वह औरत
औरत नहीं है सास है
सास रहते हुए भी वह औरत
औरत रह सकती थी
ऐसा हुआ होता तो वह औरत
अपनी बहू की माँ हो सकती थी

औरत तो औरत होती है
माँ भी होती है सास भी होती है
जब कोई औरत कम औरत होती है
तो माँ भी कम होती है और सास भी
कठोर

माँ जन्म देती है
सास बहू को जन्म नहीं देती है
लेकिन सास अच्छी हो तो बहू को
सिर्फ़ अपना बेटा ही नहीं नित आशीष
अपनी गोद और अपना आँचल भी
ज़रूर देती है 

कम औरत 
जब कठकरेजी सास होती है
तो बहू की हारी-बीमारी चाहे जच्चगी में
उसके लिए आये दूध और फल
तीन चौथाई ख़ुद गटक जाती है
बेटे के सामने आदर्श सास बनकर
बहू को सेब काटकर देने का 
नाटक करती है
बेटे के बाहर जाने पर पूछती भी नहीं
बहू जी रही हो कि मर रही हो

ओह सासें भी
तरह-तरह की होती हैं
कुछ तो मोरनी जैसी होती हैं
नाचती रहती हैं नाचती रहती हैं
बहुओं के सिर पर
कुछ फ़िल्म की हीरोइनों की तरह
हरदम बनी-ठनी गोया बहू के संग
सौंदर्य प्रतियोगिता में भाग लेना हो
कुछ तो बिल्कुल सौत की तरह होती हैं
पत्लू से बाँधकर रखती हैं बेटे को
बहू को उसके साथ अकेले
कहीं जाने ही नहीं देतीं
और चला जाए तो दम पर दम
फोन करती रहती हैं
इंग्लिश मीडियम की सास होती हैं
वर्चस्व तनिक भी कम न होने पाए
कुछ नहीं तो फोन से ही बहू के रंग में
कुछ तो भंग पड़ जाए
ऐसी सासें प्रेम और प्रेमविवाह
दोनों की पैदाइशी शत्रु होती हैं
निन्यानबे फ़ीसद 
प्रेमविवाह की विफलता का मुकुट
इन्हीं के सिर पर सजता है
वैसे भारतीय सासों में
हिंदी मीडियम की सासों को भी
भोजपुरी और अवधी में
आते देर नहीं लगती है
जैसे हिंदी का सारा व्यंग्य बाण
इन्हीं के मुखारविंद से पैदा हुआ हो
इन्हें बेटे का घर बसे रहने में नहीं
बहू का घर उजड़ने में ख़ुशी होती है

भारतीय सासों के जंगल में टीवी पर
अशक्त सासों के पीटे जाने की ख़बरें
अब बिल्कुल विचलित नहीं करतीं
लगता है कि ज़रूर इसने कभी
अपनी बहू को ख़ूब सताया होगा
असल में इस देश में 
सासों की क्रूरता का लंबा इतिहास है
लोकगीतों और लोककथाओं में ही नहीं
हमारे समय में भी ऐसी सासें
अपनी-अपनी पारी खेल रही हैं
और अपने माँ-बाप से दूर बेटियाँ
पिस रही हैं रो रही हैं
रोज़ डर रही हैं
और ऐसी बदनसीब बेटियों के माँ-बाप
फोन की घंटी से भयभीत हो जाते हैं
राम जाने आज क्या किया होगा
डायन ने मेरी बच्ची के साथ

उफ़
वह औरत 
जो तनिक भी औरत नहीं है
न सिर्फ़ भारत की बल्कि
पृथ्वी की सबसे भयानक सास है
वह ज़रा-सा भी औरत होती
तो अपनी बहू को बेटी न भी समझती
तो कम से कम अपनी बहू तो 
समझती ही समझती
इस तरह किसी विदीर्णहृदय 
सुदूर निरुपाय पिता की बेटी को 
दासी न समझती वह भी समझ लेती
तो भी स्त्री तो समझती
अपने चरणों की धूल न समझती

ऐसी बहुओं के जीवन में
तिरस्कार के सिवा कुछ नहीं होता है
न प्यार न सुख न साज-सिंगार 
जिनके पति कान के कच्चे होते हैं
और जिनके लिए माँ की हर बात
पत्थर की लकीर होती है

सभी बेटे ऐसे नहीं होते हैं
तमाम बेटे माँ-बाप की भी आलोचना
ख़ूब करते हैं उनसे बहस करते हैं
उनकी कमियाँ बताते हैं
जिनके पति ऐसे नहीं होते हैं
जिनके पिता प्रभावशाली नहीं होते हैं
और जो कमज़ोर घरों से आती हैं
उन बहुओं का भाग्य ऐसी ज़ालिम सासें
अपने बाएँ पैर के अँगूठे से लिखती हैं।

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राग दौहित्री
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सद्यःप्रसूता
बेटी के कंधे पर 
उसकी नवजात आत्मजा
कोमलांगी अति गौरांगी
जैसे शस्यधरा के कंधे पर 
नयी-नयी बनी नन्ही पृथ्वी
यह सब देखना 
सबको नसीब नहीं होता

बोलती हुई पृथ्वी की आँखों से
निःशब्द सुनते चले जाना
ब्रह्मांड के अख़ीर तक
और फिर वापस लौट आना
बोलती हुई आँख की पुतली में
उसी में समा जाना
नाना नाना नाना
और कोई शब्द नहीं

उसकी एक नन्ही पंखुड़ी जैसी
स्मिति में ग़ुम हो जाना क्या होता है
सब कहाँ जान पाते हैं कहाँ छू पाते हैं 
अपने जीवन में इतना कुछ
इसके आगे निस्सार है 
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री का पद
चाहो तो प्रधानमंत्री जी से पूछ लो 
चाहे मुख्यमंत्री जी से पूछ लो
ईश्वर जिससे प्रसन्न होते हैं 
उसे यह नयी दुनिया दिखाते हैं
उसे सचमुच का मनुष्य बना देते हैं

बाक़ी आज की राजनीति क्या है
और साहित्य तो कुछ है ही नहीं
जो है सब एक गोरखधंधा है

मेरे लिए आज
मेरी बेटी की बेटी सबकुछ है
मेरी बेटी की आकृति है छवि है
उसकी रूह है उसकी आवाज़ है
मेरे कानों में मेरी आँखों में
मेरे घर के हर हिस्से में
आँगन में छत पर अहर्निश 
बजती हुई यह नन्ही-सी 
मद्धिम-सी प्यारी-सी आवाज़ 
मेरे जीवन के पुराने संतूर पर 
नई सुबह का एक राग है
राग दौहित्री।

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मायका
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बेटी 
आज मायके में आयी है
माँ को उसकी नवासी सौंपकर
तीसरे पहर से सो रही है जैसे
युगों की नींद लेकर आयी हो

रात हो गयी है 
ज़्यादा रात हो गयी है
पिता को न भूख लगती है न प्यास
बेटी जगेगी तो पहले उससे करेंगे बात
फिर कहीं करेंगे अन्न-जल ग्रहण

बहन को 
भांजी समेत लेकर लौटा भाई
बैठक में पिता को बताता है 
कैसे-कैसे सताया गया है बहन को

और 
कैसा सलूक किया गया है 
कुछ दिनों पहले पैदा हुई 
भांजी से

भाई 
भींचता है मुट्ठियाँ
पिता की आँखें डबडबाती हैं
फटा जाता है कलेजा

माँ
नवासी को बैठक में लाती है
नाना की गोद में रख देती है
नवासी नाना को देख मुस्काती है
नाना फिर से जी उठते हैं।

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माँओ दहेज में हिमालय देना
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माँओ
तुम्हारी बेटियाँ
डलिया-मौनी बनाना न सीखें
चादर और तकिए पर कढ़ाई न सीखें
अनेक प्रकार के व्यंजन बनाना न सीखें
भरतनाट्यम चाहे सुमधुर गायन न सीखें
तो तनिक भी अफ़सोस मत करना

माँओ
अपनी बेटियों को विदा करने से पहले
उन्हें बहुत पौष्टिक चीज़े खिलाना
जितना दूध बेटे को देना उससे ज़्यादा उन्हें
उनके हाथ-पाँव हाकी की तरह ख़ूब
मज़बूत करना सिर्फ़ खेलने के लिए नहीं
बड़ी से बड़ी मुसीबत से पार पाने के लिए 

माँओ
तुम्हारी बेटियाँ
सजने-सँवरने में मन न लगाएं
क्रीम-पावडर होंठ लाली न लगाएँ
तो उन्हें सुंदर दिखने का ज्ञान
मत देने बैठ जाना

माँओ
तुम्हारी बेटियाँ
पढ़ने में मन न लगाएँ तो उनकी
चुटिया कसके ज़रूर खींचना
गदेली से उनके गाल पूरा लाल कर देना
हेडमास्टर से अधिक सख़्ती करना

माँओ
दहेज जुटाने में अक़्ल से काम लेना
ऐसी चीज़ें देना जिसे आग जला न सके
पानी गला न सके चोर चुरा न सके
और शत्रु जिस पर विजय न पा सके
प्रतिभा और योग्यता का ऐसा हिमालय
बेटियों के ससुराल को भेंट करना
जिसे वे तोड़ न सकें।

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कारागृह
---------
बिटिया
आदमियों के इस जंगल में
अकेले जीना चाहे बच्चे को पालना
थोड़ा मुश्किल ज़रूर है
नामुमकिन नहीं

तुम्हारा पति 
तुम्हें महत्वहीन समझे
घर को सिर्फ़ अपना समझे तुम्हारा नहीं
सारे फ़ैसले ख़ुद करे तुम्हें पूछे तक नहीं
तुम्हारा पैसा तुमसे छीन ले

तुम्हारा शौहर कहे
कि सास-ससुर से पूछे बिना
तुम अपने मायके नहीं जा सकती
तो समझ लो कि तुम एक जेल में हो
तुम्हारा पति प्रेमी नहीं एक जेलर है
और तुम उम्रक़ैद की सज़ा भुगत रही हो

बिटिया
भगवान न करे 
कि ऐसा कुछ किसी के जीवन में घटे
लेकिन ऐसा कुछ हो ही तो डरना मत
अपने माँ-बाप से एक-एक बात करना
भाई से कहना ये सब तुम्हारे साथ होंगे

बिटिया
इस सामाजिक कारागृह के 
सींखचों को तोड़ना ही होगा
ऊँची चहारदीवारी को ढहाना ही होगा
तुम्हें बाहर खुली हवा में साँस लेना होगा
तुम्हें जीना होगा बिटिया अपने लिए
अपने बच्चों के लिए।






सोमवार, 28 सितंबर 2020

सोनू सूद

- गणेश पाण्डेय

प्रिय छेदी
इस देश को तुम्हारे जैसे
खलनायकों की ज़रूरत है

हालाँकि यूपी के
सुल्ताना डाकू की कहानी में
काफ़ी कुछ झोल है
लेकिन तुम्हारी कहानी तो
जीती-जागती हक़ीक़त है
तुम कोई लुटेरे नहीं हो
कि लूट के माल से भलाई करो
पसीना बहाते हो नक़ली हीरो से
मार खाते हो फिर पैसा कमाते हो

तुम भी चाहते तो एक कानी-कौड़ी
ग़रीब-गुरबा और ज़रूरतमंद पर 
अपने ही मुल्क़ में 
सबसे परेशानहाल
लोगों पर ख़र्च नहीं करते
सदी का महाखलनायक बनकर
अपनी आरामगाह में मुँह छिपाकर
सो रहे होते अपनी रातों की नींद
और दिन का सुकून बर्बाद नहीं करते

मैं तुम्हारे बारे में
और कुछ नहीं जानता
सिवाय इसके कि फ़र्श से अर्श पर
पहुँचने की कहानी तुम्हारी है
इस कहानी में ख़ास बात यह 
कि एक खलनायक की देह में
किसी हातिमताई की रूह 
आ जाती है और खलनायक से 
नायकों जैसे काम कराती है

एक खलनायक की सख़्त देह में
एक-एक हिस्से से तड़प उठती है
अपने लोगों के लिए झुक जाती है
आँखें डबडब हो जाती हैं

हाथ आगे बढ़ जाते हैं
पैर उसी ओर चल पड़ते हैं
जिधर लोग सिर्फ़ अपने पैरों पर
खड़े हैं बैठे हैं बच्चों को लाद रखा है
पत्नी सटकर खड़ी है 
टूटी-फूटी चीज़ों की पोटली
पैरों के सुख-दुख पूछ रही है

प्रिय छेदी
छेदी सिंह तुमने शेर की तरह
छलांग लगाई है आसमान में
किसी फ़िल्मी चमत्कार की तरह
रेल के डिब्बों में बसों में जहाज से
अपने देशवासियों को भेज रहे हो
मुश्किलों की सबसे लंबी घड़ी में
अपने घर

छेदी मैं नहीं जानता
कि तुमने सबसे कमज़ोर और उपेक्षित
लोगों में किसे देखा भारतमाता को देखा
कि अपनी माता और पिता 
और बीवी-बच्चों को देखा
कुछ तो तुमने अलग देखा
जो तुम्हारे समुदाय के लोगों ने नहीं देखा
तुम भी चाहते तो प्रधानमंत्री कोष में
कुछ करोड़ डालकर चैन की नींद सोते
तुमने अपनी नींदें क्यों ख़राब कीं
अपने बच्चों का वक़्त और प्यार
दूसरों के बच्चों को क्यों दिया

छेदी तुम्हारा पर्दे का नाम है
हालाँकि जीवन में तुमने आसमान में
छेद करने जैसा बड़ा काम किया है
पर्दे से जो कमाया मज़बूर लोगों पर
लुटाया सुल्ताना डाकू की तरह
हातिमताई जैसा कारनामा किया

तुमने अपने देश 
और अपनी मिट्टी के कर्ज़ का
मूलधन ही नहीं सूद भी लौटाया
मैं नहीं जानता कि तुम्हारे नाम में
यह सूद क्यों लगा हुआ है 
और तुम्हारा नाम सोनू जैसा 
बहुत प्यारा और घरेलू क्यों है

मैं मुंबई में 
लंबे समय से रहने वाले
हिंदी के कवियों की तरह रहता
तो कब को कोरोना पर अपनी
लंबी कविताओं के साथ तुम पर भी 
एक लंबी कविता लिख चुका होता
सोनू सूद

हिंदी में
फ़िल्मी हीरोइनों पर 
कविता लिखने का रिवाज़ है
मधुबाला से लेकर वहीदा रहमान तक
और वहीदा से माधुरी तक पर रीझकर
लिखते हुए कवियों और कथाकारों ने
अपनी क़लमें तोड़ दीं
ये पर्दे की चमक-दमक पर मुग्ध थे
मैं हिंदी के पर्दे और आसमान का नहीं
ज़मीन का आदमी हूँ मेरे बच्चे

जानते हो
छेदी नहीं-नहीं सोनू नहीं-नहीं दोनों
हिंदी में फ़िल्म वालों को सितारा कहते हैं
लेकिन सितारे 
सिर्फ़ आकाश पर नहीं होते
धरती पर भी होते हैं मिट्टी में लोटते हैं
लोकल ट्रेन में सफ़र करते हैं
अपनी लोकल आत्मा को
कभी नहीं बदलते हैं 

सितारों की दुनियाँ विचित्र है
पर्दे का खलनायक जीवन में
नायक हो सकता है
और नायक खलनायक
आए दिन ख़ुलासे होते हैं
मासूम और सुंदर नायिकाएं 
खलनायिका निकलती हैं
और अर्थपूर्ण फ़िल्म बनाने वाले चरित्रहीन
जब तक इनका सच सामने नहीं आता
इनका नायकत्व और महानायकत्व
चेहरे पर मेकअप की तरह सजा रहता है

सोनू 
चाहे पर्दे पर ऐसे ही आजीवन 
बड़े से बड़ा खलनायक बने रहना
जीवन में चाहे जितनी मुश्किल आए
चाहे जितने कमज़ोर क्षण आएं
अपने खलनायक को पर्दे से बाहर
न निकलने देना नहीं तो मेरी यह कविता
बहुत रोएगी इसके शब्द टूट-फूट जाएंगे
ऐसे ही जीवन में नायक बने रहना

जो सितारे
पैदा धरती पर होते हैं
और रहते हैं आसमानों में
ज़मीन के लोग उन्हें कभी भी
अपना नहीं समझते हैं
उनके बीवी-बच्चों को कभी इस तरह
दिल से दुआएं नहीं देते हैं
प्यार नहीं करते हैं

हाँ 
क्रिकेट के कुछ
भगवान की तरह
फ़िल्मों के भी कुछ 
नौटंकी भगवान होते हैं
ये अपनी मिट्टी अपने देश के कर्ज़ का
न मूलधन चुका पाते हैं न सूद
सब तुम्हारी तरह कहाँ हो पाते हैं
सोनू सूद।







पत्र

 प्रियवर गणेश पांडे जी,

कुशल से होंगे। हालांकि यह कहना भी अब मात्र एक औपचारिक मुहावरा बनकर रह गया है। जो भी व्यथित और जरा भी संवेदनशील है, वह बाहर से भले ही सकुशल दिखे, मन से तो हमेशा बेचैन और द्वंद्वग्रस्त ही रहता है। स्थितियां ही कुछ ऐसी हैं। जो दुनियादार हैं, वे स्थितियों में खुद को ढालकर अपने मन को समझा लेते हैं, अवसर के मुताबिक राह पकड़ लेते हैं। लेकिन जो स्थितियों की भयावहता, अमानवीयता, असहिष्णुता के बारे में सोचे बिना नहीं रह पाते-प्रायः उनकी नियति होती है - अकेलापन।

आपको वर्षों से लिखते-पढ़ते देख रहा हूं। इधर थोड़ा-बहुत ह्वाट्सएप, फेसबुक जैसे माध्यमों से थोड़ी-बहुत वाकफियत हो गयी है। फेसबुक पर भी आपकी चिंताओं से परिचित होता रहता हूं। आपकी चिंताओं में अपने को भी शामिल पाता हूं। अपने-अपने अकेलेपन के अंधेरे में, यह शामिल-पन का भाव कभी-कभी उम्मीद के जुगनुओं की तरह जग-मगा उठता है। कुछ साथी - कहीं भी हों, कितनी भी दूर- पर हैं तो, जो अब भी सोचने और महसूस करने की क्षमता बचाकर रखे हुए हैं। यह भी हम-आप जैसों के रचनात्मक सहारे के लिए कम बड़ी बात नहीं है।

आपने 2 अक्टूबर वाली पोस्ट में लिखा-‘ साहित्य में अंधेरा फैलाने वाले, आज गांधी पर प्रकाश डालेंगे!‘ यह विडम्बना यों तो मात्र साहित्य की नहीं, राजनीति-समाज-चिंतन वगैरह सभी क्षेत्रों की है, लेकिन आपने साहित्य का उल्लेख किया तो इसका मर्म मैं समझ सकता हूं। निराला ने ‘सरोज-स्मृति‘ में लिखा- ‘ मैं कवि हूं, पाया है प्रकाश! ‘ यह कोई व्यक्तिगत दंभ नहीं था। यह कवि होने या साहित्यकार होने की सबसे सारगर्भित परिभाषा थी। कवि होना गहरे अर्थो में ‘प्रकाश प्राप्त‘ होना है। प्रेमचंद ने भी राजनीति से नहीं, साहित्य से ही ज्यादा आशा की थी-‘साहित्य राजनीति के आगे-आगे चलने वाली मशाल है।‘ लेकिन आज ‘प्रकाश‘ और ‘मशाल‘ जैसे शब्दों को हमारे तथाकथित कवि और साहित्यकार ही अर्थहीन करते जा रहे हैं। राजनीति ने तो पहले ही इन शब्छों को मात्र चुनाव-चिह्न जैसा कुछ बनाकर रख दिया है। राजनीति में तो अंधेरा ही सर्वत्र अट्टहास कर रहा है। इस अट्टहास को ही प्रकाश की तरह बिखेरा जा रहा है। इस अट्टहास की चकाचौंध में प्रकाश का इतना भ्रम है कि आंखें चौंधियां जाती हैं। देखने की क्षमता ही जाती रहती है। और आपने इस विडम्बना की ओर ठीक ही इशारा किया है, गांधी के हवाले से। जिनको कुछ नहीं दिखता, वे ही सबकुछ देख लेने की डींग हांकते हैं। अंधता इतनी दंभी कि गांधी जैसा पुरुष-जो खुद अपनी आंखों से देखने पर विश्वास करता था, जिसने सत्य का प्रकाश पाने के लिए ‘सत्य का प्रयोग‘ करने की ठानी थी- उस पर अंधता प्रकाश डालने का दावा करती है।

मैंने कभी लिखा था,‘साहित्य एक प्रकार का रचनात्मक हठ है कि मनुष्य को सबसे पहले और सबसे आखिर तक सिर्फ मनुष्य के रूप में ही पहचाना जाए, न फरिश्ते के रूप में, न राक्षस के रूप में, न देवता के रूप में, न सिर्फ साधु या शैतान के रूप में।‘

गांधी को क्या मनुष्य के रूप में सचमुच हम अभी तक पहचान सके हैं? हमने मूर्तियां बना दीं, न्यायालयों और सरकारी दफ्तरों में उनके फोटो टांग दिए। इन सब रूपों में आज गांधी आज कितने दयनीय हो उठे हैं कि उन्हीं की फोटो के नीचे बैठे अधिकारीगण कैसे-कैसे स्वार्थ-लिप्सा भरे कारनामों को अंजाम दे रहे हैं।

गांधी को इस दयनीयता से क्या सिर्फ उन पर कविताएं लिखकर उबारा जा सकता है? है कोई ‘प्रकाश प्राप्त‘ कवि जो उनकी इस दयनीयता को सवमुच देख सके? महसूस कर सके? गांधी का अनुसरण करने-कराने का उपदेश देने वाले हर क्षेत्र में हैं। साहित्य में भी। पर गांधी बेचारे ऐसे अनुसरणकर्ताओं से बचने के लिए छिपते-छिपाते, टाट वाले बोरे में अपना चेहरा ढके चुपचाप मुकित्बोध की कविता में चले गए हैं।

सच पूछिए तो अब ‘अनुसरण‘ या ‘अनुयायी‘ जैसे शब्द पाखंड का पर्याय हो गए हैं। कोई किसी का अनुसरण नहीं करना करना चाहता है, सिर्फ अपने-आपके सिवा। अब अनुयायी होना नहीं, पिछलग्गू होना फिर भी कुछ अर्थवान शब्द है। पिछलग्गू ऐसे व्यक्तियों का, जो लाभ पहुंचाने की स्थिति में हों। थोड़ी ख्याति मिल जाए, पुरस्कार या उपाधि मिल जाय-बस इतना ही अभीष्ट है। आज के लेखक की महत्वाकांक्षाएं भी बड़ी क्षुद्र हैं। वह अपनी क्षुद्रता में अमर होना चाहता है।

ऐसी अमरता को हम-आप क्यों चाहें? क्योंकि हमारे लिए तो यह जीते जी मर जाने के समान है। ऐसे में तो अच्छा है, कबीर की तरह रहें-मेरो मन लागा ठाठ फकीरी में! हम साहित्य के फकीर बने रह सकें, यही कामना हमारे लिए ठीक है।

अभी इतना ही।

हां, इतना और कि ज्यादा शिकायती होने में वक्त जाया न करें। हर स्थिति में जितना रचनात्मक हो सकें, रहें।

आपकी सक्रियता और सार्थक चिंताओं में आपका सहभागी-

राजेंद्र कुमार


नोट : इलाहाबाद से वरिष्ठ लेखक राजेंद्र कुमार जी का  पत्र



रविवार, 27 सितंबर 2020

सोनू सूद

- गणेश पाण्डेय

प्रिय छेदी

इस देश को तुम्हारे जैसे

खलनायकों की ज़रूरत है


हालाँकि यूपी के

सुल्ताना डाकू की कहानी में

काफ़ी कुछ झोल है

लेकिन तुम्हारी कहानी तो

जीती-जागती हक़ीक़त है

तुम कोई लुटेरे नहीं हो

कि लूट के माल से भलाई करो

पसीना बहाते हो नक़ली हीरो से

मार खाते हो फिर पैसा कमाते हो


तुम भी चाहते तो एक कानी-कौड़ी

ग़रीब-गुरबा और ज़रूरतमंद पर 

अपने ही मुल्क़ में 

सबसे परेशानहाल

लोगों पर ख़र्च नहीं करते

सदी का महाखलनायक बनकर

अपनी आरामगाह में मुँह छिपाकर

सो रहे होते अपनी रातों की नींद

और दिन का सुकून बर्बाद नहीं करते


मैं तुम्हारे बारे में

और कुछ नहीं जानता

सिवाय इसके कि फ़र्श से अर्श पर

पहुँचने की कहानी तुम्हारी है

इस कहानी में ख़ास बात यह 

कि एक खलनायक की देह में

किसी हातिमताई की रूह 

आ जाती है और खलनायक से 

नायकों जैसे काम कराती है


एक खलनायक की सख़्त देह में

एक-एक हिस्से से तड़प उठती है

अपने लोगों के लिए झुक जाती है

आँखें डबडब हो जाती हैं


हाथ आगे बढ़ जाते हैं

पैर उसी ओर चल पड़ते हैं

जिधर लोग सिर्फ़ अपने पैरों पर

खड़े हैं बैठे हैं बच्चों को लाद रखा है

पत्नी सटकर खड़ी है 

टूटी-फूटी चीज़ों की पोटली

पैरों के सुख-दुख पूछ रही है


प्रिय छेदी

छेदी सिंह तुमने शेर की तरह

छलांग लगाई है आसमान में

किसी फ़िल्मी चमत्कार की तरह

रेल के डिब्बों में बसों में जहाज से

अपने देशवासियों को भेज रहे हो

मुश्किलों की सबसे लंबी घड़ी में

अपने घर


छेदी मैं नहीं जानता

कि तुमने सबसे कमज़ोर और उपेक्षित

लोगों में किसे देखा भारतमाता को देखा

कि अपनी माता और पिता 

और बीवी-बच्चों को देखा

कुछ तो तुमने अलग देखा

जो तुम्हारे समुदाय के लोगों ने नहीं देखा

तुम भी चाहते तो प्रधानमंत्री कोष में

कुछ करोड़ डालकर चैन की नींद सोते

तुमने अपनी नींदें क्यों ख़राब कीं

अपने बच्चों का वक़्त और प्यार

दूसरों के बच्चों को क्यों दिया


छेदी तुम्हारा पर्दे का नाम है

हालाँकि जीवन में तुमने आसमान में

छेद करने जैसा बड़ा काम किया है

पर्दे से जो कमाया मज़बूर लोगों पर

लुटाया सुल्ताना डाकू की तरह

हातिमताई जैसा कारनामा किया


तुमने अपने देश 

और अपनी मिट्टी के कर्ज़ का

मूलधन ही नहीं सूद भी लौटाया

मैं नहीं जानता कि तुम्हारे नाम में

यह सूद क्यों लगा हुआ है 

और तुम्हारा नाम सोनू जैसा 

बहुत प्यारा और घरेलू क्यों है


मैं मुंबई में 

लंबे समय से रहने वाले

हिंदी के कवियों की तरह रहता

तो कब को कोरोना पर अपनी

लंबी कविताओं के साथ तुम पर भी 

एक लंबी कविता लिख चुका होता

सोनू सूद


हिंदी में

फ़िल्मी हीरोइनों पर 

कविता लिखने का रिवाज़ है

मधुबाला से लेकर वहीदा रहमान तक

और वहीदा से माधुरी तक पर रीझकर

लिखते हुए कवियों और कथाकारों ने

अपनी क़लमें तोड़ दीं

ये पर्दे की चमक-दमक पर मुग्ध थे

मैं हिंदी के पर्दे और आसमान का नहीं

ज़मीन का आदमी हूँ मेरे बच्चे


जानते हो

छेदी नहीं-नहीं सोनू नहीं-नहीं दोनों

हिंदी में फ़िल्म वालों को सितारा कहते हैं

लेकिन सितारे 

सिर्फ़ आकाश पर नहीं होते

धरती पर भी होते हैं मिट्टी में लोटते हैं

लोकल ट्रेन में सफ़र करते हैं

अपनी लोकल आत्मा को

कभी नहीं बदलते हैं 


सितारों की दुनियाँ विचित्र है

पर्दे का खलनायक जीवन में

नायक हो सकता है

और नायक खलनायक

आए दिन ख़ुलासे होते हैं

मासूम और सुंदर नायिकाएं 

खलनायिका निकलती हैं

और अर्थपूर्ण फ़िल्म बनाने वाले चरित्रहीन

जब तक इनका सच सामने नहीं आता

इनका नायकत्व और महानायकत्व

चेहरे पर मेकअप की तरह सजा रहता है


सोनू 

चाहे पर्दे पर ऐसे ही आजीवन 

बड़े से बड़ा खलनायक बने रहना

जीवन में चाहे जितनी मुश्किल आए

चाहे जितने कमज़ोर क्षण आएं

अपने खलनायक को पर्दे से बाहर

न निकलने देना नहीं तो मेरी यह कविता

बहुत रोएगी इसके शब्द टूट-फूट जाएंगे

ऐसे ही जीवन में नायक बने रहना


जो सितारे

पैदा धरती पर होते हैं

और रहते हैं आसमानों में

ज़मीन के लोग उन्हें कभी भी

अपना नहीं समझते हैं

उनके बीवी-बच्चों को कभी इस तरह

दिल से दुआएं नहीं देते हैं

प्यार नहीं करते हैं


हाँ 

क्रिकेट के कुछ

भगवान की तरह

फ़िल्मों के भी कुछ 

नौटंकी भगवान होते हैं

ये अपनी मिट्टी अपने देश के कर्ज़ का

न मूलधन चुका पाते हैं न सूद

सब तुम्हारी तरह कहाँ हो पाते हैं

सोनू सूद।

                      
                                                                   

  

सोमवार, 13 जुलाई 2020

आलोचकनामा

- गणेश पाण्डेय

1

हिंदी का आलोचक है
हमारे समय का पुराना घाघ आलोचक है
इसके सुनहले फ्रेम के चश्मे पर मत जाइए
इसके भोले-भाले चेहरे पर मत जाइए
इसकी दुर्घटनाग्रस्त टूटी-फूटी आत्मा देखिए
उसे न देख पा रहे हों तो इसे ज़रा ग़ौर से देखिए
कैसे इसके रंग-बिरंगे कपड़े हैं देखिए
लालछींट का कुर्ता देखिए जैसे ख़ून के दाग़ हों
ओह बेढंगा पाजामा देखिए
कितना ढीला-ढाला है जैसे शहर का नाला है
थोड़ा नज़दीक से देखिए कुर्ता उठाकर देखिए
अरे इस नाशुकरे के पास तो ईमान का नाड़ा ही नहीं है।

2

हिंदी का आलोचक है
कैसी शक़्ल है इसकी गर्दन बिल्कुल शुतुरमुर्ग जैसी 
जिसे उठाकर और ऊपर और उसके ऊपर मुँह करके
उफ़ कैसे ज़ोर-जोर से थूकता है बारबार कोई नाम लेकर
और अपनी जगह से टस से मस नहीं होता है
एक बार भी सोचता नहीं कि सब उस पर ही पड़ता है
ओह कितना नशा है इसे अपने आलोचक होने पर
बेशर्मी देखिए पिटाई को प्रशंसा समझता है
जैसे नागार्जुन उसे धंधा करने का लाइसेंस दे गये हों -
अगर कीर्ति का फल चखना है आलोचक को ख़ुश रखना है
ओह कैसे शान से खोल रखा है उसने अपने शहर में
शुद्ध देशी घी का कीर्ति लड्डू भण्डार
उसने अपने कीर्ति लड्डू भण्डार के बाहर 
पुरोहिताई का अलग से एक स्टाल लगाकर 
कवि के गर्भाधान से लेकर 
अंत्येष्टि तक के सोलह संस्कारों के लिए
बाकायदा रेटलिस्ट टांग दिया है
आज्ञा से त्रिलोचन और साथ में यह लिखकर -
आलोचक है नया पुरोहित उसे खिलाओ
सकल कवि-यशःप्रार्थी, देकर मिलो मिलाओ
और सचमुच ऐसे मुग्ध कवियों का मेला लगा हुआ है
इस चोट्टे की दुकान के सामने।

3

हिंदी का आलोचक है
बड़ा पढ़ाकू है जी पट्ठे ने ख़ूब पढ़ रखा है
सोलह दर्जा पढ़ने के बाद सोलह दर्जा और पढ़ रखा है
कुल बत्तीस दर्जा पढ़ रखा है शायद उससे भी ज़्यादा
न न न सिर नहीं पैर धंसाकर पढ़ा है सिर से हो नहीं पाता
जितना पढ़ रखा है उससे एक इंच भी इधर-उधर नहीं होता है
असल में पट्ठे के दिमाग़ में दिमाग़ की जगह
आलमारियों पर किताब की तरह किताबें जमा हैं
सो दिमाग़़ में दिमाग़़ रखने के लिए जगह ही नहीं बची है
इसलिए कोई बीसेक साल से ख़ुद से कुछ सोचता ही नहीं है
बस आप समझ लें कि बंदा हिंदी का आलोचक-सालोचक नहीं 
हमारे समय की आलोचना की सिलाई कढ़ाई का कोई कारीगर है
दिमाग़ बंदकर और आंख मूंदकर धड़ल्ले से आलोचना कर रहा है।

4

हिंदी का आलोचक है
आलोचक क्या है पूरा रंगरेज़ है
आलोचना करता नहीं बस काग़ज़ रंगता है
फूल-पत्ती नदी-नाले गाँव-साँव बनाता है
उसके लिए यही कविता का लोक और जीवन है
उसके लोकजीवन में 
न किसान आंदोलन है न मज़दूर
पट्ठे को यह भी नहीं पता कि लोकजीवन में
महामारी की छाया भी है मलेरिया भी है 
जापानी बुख़ार भी है कोरोना भी है
पोलियो भी है कालाजार भी है
इतनी छोटी सी बात जानता नहीं आलोचक बनता है 
चरणरज लेने वालों को कवि समझता है महाकवि समझता है
जबकि ख़ुद दिल्ली के मठाधीशों के सामने
साष्टांग लेटकर चरणरज लेता है
जिस आलोचक का विकास केंचुए की तरह होगा 
वह हिंदी का आलोचक कैसे हो सकता है नहीं हो सकता है
ज़रूर यह आलोचना का संदिग्धकाल है।

5

हिंदी का आलोचक है
जिधर सब लोग जमा होते हैं उसी ओर भागता है
और वहीं उसी भीड़ में घुसकर तमाशा देखता रहता है
चाहे जो हो जाए चाहे सिर पर कुछ भी पड़ जाएं हज़ार
कोई कुछ भी कह ले बंदा हटने का नाम नहीं लेता है
उसका अपने आप से वादा है आलोचक का तमगा लिए बिना
ऐसी जगहों से हटना नहीं है
उसे मंच पर चढ़ना ही चढ़ना है पर्चा पढ़ना ही पढ़ना है
माइक पकड़कर मंच पर झूमना ही झूमना ही है
इस तरह आलोचक होना ही होना है
और अनंतकाल तक आलोचक बने रहना है
असल में वह इस बात को मान ही नहीं सकता है
कि आलोचक बनने के लिए भी ठोस वजह का होना ज़रूरी है।

6

हिंदी का आलोचक है
इसीलिए चिरकुट बना फिरता है मारा-मारा जगह-जगह
साहित्य के महाजनों और उप महाजनों के पीछे-पीछे
इसकी गठरी उसकी गठरी चोर-उचक्कों तक का सामान ढोता है
बंदे को कोई भला आदमी कुछ कह दे तो उस पर खौंखियाता है 
असल में उसके पास 
अपना कुछ ढोने के लिए है ही नहीं
आलोचना में दूस़रे का ढोना ही एक प्रकार से उसकी जीविका है।

7

हिंदी का आलोचक है
बड़ा ज़बर आलोचक है किसी को कुछ समझता ही नहीं है
ख़ुद को कवियों का मालिक बनता है सब उसके हिसाब से उठें-बैठें
जैसा कहे कविता लिखें माठा कर रखा है समझिए
कि कोई चूहा शेर के पास जाकर उसके कान में कह रहा हो
खड़े हो जाओ और फटाफट अपनी कविता दिखाओ
वह तो कहिए कि इस सदी में है निराला बाल-बाल बच गये
पिछली सदी में रहा होता तो निराला को छड़ी से कोंचकर जगाता
और कहता कविता दिखाओ यह अलग बात है कि निराला 
जागते बाद में पहले उसे जूते से लाल कर देते फिर कहते 
’हिंदी के सुमनों के प्रति पत्र’ लिखता हूं तो तेरे बाप क्या जाता है बे
अबे सुन बे गुलाब लिखता हूं तो अबे तेरा क्या जाता है
आलोचक नाम का यह जीव उस समय क्या करता 
या निराला इसे क्या करके लौटाते अनुमान का विषय है
फ़िलहाल तो पट्ठा कहता फिर रहा है
कि आज की कविता में वसंत का अग्रदूत वही होगा 
जो दिल्ली दरबार की गोद में पला-बढ़ा होगा
बाहर सुदूर प्रकृति की गोद में
धूल-मिट्टी में लोटने और आँधी-पानी में बड़े होने वाले कवि 
वसंत के अग्रदूत क्या झँटुही कवि भी नहीं हो सकते हैं
मैं पूछता हूं कि अबे कवियों का सुपरवाइजर
तुझे बनाया किसने है पहले उसे बुला
उसको जीभर कर दुरुस्त कर लूं
फिर तुझे बताता हूं उलटा लटकाकर डंडा करता हूं
अब आप लोग ही बताएं कि ऐसे 
नामाकूल आलोचक के साथ क्या-क्या किया जाय 
जिसे यह नहीं पता कि रामविलास शर्मा को आखि़र
निराला की साहित्य साधना लिखते समय
भाग एक लिखने की ज़रूरत क्यों पड़ी
कविता के साथ कवि का जीवन देखना क्यों ज़रूरी है
सच तो यह कि आलोचक का जीवन भी
उसके मूल्यांकन के लिए देखना उतना ही ज़रूरी है
यह न समझें कि हरामज़ादे आलोचकों को बर्दाश्त करना 
कविता की मजबूरी है।

8

हिंदी का आलोचक है
ये वाला और ये मेरी पीढ़ी का है
कहता है कि मैंने अपनी ख़राब कविताओं से
हिंदी कविता का इकलौता रजिस्टर भर दिया है
और अच्छी कविताओं को लिखने के लिए जगह नहीं बची है
अब कहाँ जाएंगे भला अच्छी कविता लिखने वाले कवि
अरे भाई माना कि मैंने रजिस्टर भर दिया है
अभी तुम्हारी पूरी कमीज पूरा पतलून
तुम्हारी ओढ़ने और बिछाने की चादर तुम्हारा तकिया 
तुम्हारी रूमाल और तुम्हारे आँगन का आसमान
तुम्हारी दीवारें और छत और पानी की टंकी
और तुम्हारे शरीर के कुछ हिस्से भी तो
अनलिखे बचे हैं अभी
वहाँ मेरी ख़राब कविता न सही
अपने प्रिय कवियों से हज़ारों
अच्छी कविताएं तो लिखवा ही सकते हो
अरे आलोचना के मुंशियों अच्छी कविता वह है ही नहीं
जिसके लिखे जाने में कोई बाधा खड़ी हो सकती हो
पहाड़ तोड़कर नदियों को पाटकर
यहाँ तक कि मर्द कवि की अपनी छाती पर
फूल की पंखुड़ियों पर तितलियों के परों पर
कहीं भी कभी भी जो कविता लिख दी जाय
वही अच्छी कविता है
अच्छी कविता भीख में काग़ज़ माँगकर नहीं लिखी जाती है
अच्छी कविता दरेरा देकर लिखी जाती है
जैसे मैं लिखता हूं ख़राब कविताएँ।

9

हिंदी का आलोचक है
मैं इसको और उसको और उन सबको अच्छी तरह
आगे से भी पीछे से भी ऊपर से भी नीचे से भी जानता हूं
किस-किस की पांच फुट तीन इंच की कद-काठी में
किस-किस मठाधीश और किस-किस उपमठाधीश 
और उनके झाड़ू-पोछा करने वाले तक का
ठप्पा कहाँ-कहाँ छपा हुआ है
साफ़-साफ़ लिखा हुआ है पुट्ठे पर बाजू पर
ललाट पर गाल पर वगैरह
कि यह आलोचक किस-किस 
बाऊ साहब और पंडिज्जी जी की गाय है
इस गाय में अलबत्ता एक भारी नुक़्स यह है 
कि उनके लिए मरकही गाय है जिनके पुट्ठे पर
बाऊ साहब और पंडिज्जी की छाप नहीं है
इन आलोचकों को गाय ही होना था
तो अल्ला मियाँ की गाय नहीं हो सकते थे।

10

हिंदी का आलोचक है
किसी तरह छोटे-मोटे काम करके गुज़ारा करता है 
रोज़़ एक-दो तो पुस्तक समीक्षा कर लेता है
अक्सर किसी किताब का लोकार्पण है तो आगे बढ़कर
ख़ुद ही कहकर आलेख-वालेख लिखकर पढ़ देता है
आजकल फेसबुक पर टिप्पणियों से भी पट्ठा
कुछ न कुछ कमा लेता है 
बस घर चला लेता है।

11

हिंदी का आलोचक है
अपने शहर के और बाहर के भी
महारथियों के रथ खींचता है रथियों के भी रथ खींचता है
जिनके पास रथ नहीं है उनकी पालकी ढोता है 
उतनी ही निष्ठा उतने ही समर्पण के साथ
अब तो रथ खींचने और पालकी ढोने में
इतना प्रवीण हो गया है कि यह सब 
किये बिना उसे नींद नहीं आती है
उसे रोज़ एक रथ या पालकी चाहिए
महाजन नहीं तो महाजन के पीछे का रथ
दिल्ली की नहीं तो अपने शहर की पालकी
रथ खींचने वालों का रथ
पालकी ढोने वालों की पालकी
ज़रूर से ज़रूर चाहिए उसे रोज़
एक रथ चाहे पालकी कुछ भी
यहां तक कि आदमी तो आदमी उसे
चूहे के रथ चाहे पालकी से भी 
सुकून और चैन मिल जाता है
उसे उम्मीद है ऐसे ही हिंदी आलोचना में
उसे एक दिन मोक्ष भी मिल जाएगा।

12

हिंदी का आलोचक है
हिंदी के सफल लेखकों के साथ
अपनी डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाता है
इस तरह सफल आलोचक कहलाता है
आलोचना के शेयर मार्केट का पक्का
दलाल है दलाल 
कवियों के नाम उछालता है भाव बढ़ाता है
हिंदी का आलोचक है वक़्त मौक़ा देखकर चलता है
कवि युवा है तो आगे-आगे चलता है
कवि बुज़ुर्ग है तो पीछे-पीछे चलता है
कह सकते हैं कि है तो आदमी पर
बुद्धि और कारनामे हैं किसी लोमड़ी की।

13

हिंदी का आलोचक है
अरे यह वाला तो रचनावलीबाज़ है
और यह वाला लेखक पर केंद्रित किताबबाज़ है
अरे यह बंदा तो एक नंबर का अकादमीबाज़ है
और यह जुल्फ़ रंगके और लहराके निकलने वाला 
पक्का तिकड़मबाज़ है
संपादक-प्रकाशक का ख़ुशामदबाज़ है 
आज की आलोचना का मशहूर दग़ाबाज़ है।

14

हिंदी का आलोचक है
देखो तो इसका घमंड इसके पतलून से चू रहा है
मिडिलस्कूल के हेडमास्टर की तरह
लेखकों से उठक-बैठक कराना चाहता है
ख़ुद कुछ किया नहीं दूसरों से सब कराना चाहता है
कहता है रामचरित मानस लिखो
तुलसीदास बनो कबीर बनो जायसी बनो
जैसी कविता लिखी जा रही है वैसी कविता मत लिखो
उपदेश और नीति की चौपाई लिखो
किसी कवि-आलोचक का चीरहरण मत करो
इन कुकर्मियों को छुट्टा साँड़ की तरह
ऊधम करने दो
बस कविता में राम भजो सीताराम भजो
राधाकृष्ण भजो चाहे सीधे 
बिहारी की तरह मकरध्वज घोलो
कुछ भी करो लेकिन कविता में
दुष्ट कवियों और आलोचकों की सर्जरी मत करो
हिंदी का आज का नक़ली आलोचक
सबको सीख देता फिरता है कि कैसी कविता लिखो
भू-अभिलेख निरीक्षक और लेखपाल की तरह
पैमाइश करके बताना चाहता है
कि आज सभी कवि लोग
उसकी बतायी जमीन पर कविता लिखें
पट्ठे को पता नहीं है कविता की परंपरा
और आलोचक बना जगह-जगह फिरता है
रामचंद्र शुक्ल ने तुलसी को बताया था
कि हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कबीर को
फिर तुम क्यों बावले हुए जा रहे हो
निराला ने छंद तुमसे पूछकर तोड़ा था
कि कुकुरमुत्ता झींगूर डटकर बोला
या गर्म पकौड़ी तुमसे पूछकर लिखा था
मुक्तिबोध को तुमने बताया था
कि मार्क्सवाद में ईमानवाद को
कैसे मिलाएं
छोटे केदार ने 
परमानंद से पूछकर लिखा था
औरों की नहीं जानता स्वयंभू आलोचक
मैं वही लिखूंगा जो अब तक 
नहीं लिखा गया है या कम लिखा गया है
गाँंठ में बाँध लो चाहे चुटिया में
चाहे हाफपैंट की जेब 
या पीटी शू के सफेद मोजे में 
छिपाकर रख लो मेरी बात
तुम मेरे आलोचक नहीं हो सकते हो
मेरा आलोचक 
अभी दूध पी रहा है बादाम खा रहा है
अखाड़े में अपनी देह पर मिट्टी मल रहा है
पसीना-पसीना ख़ूब दण्ड पेल रहा है
आएगा ज़रूर आएगा आलोचना का सोटा लेकर
बहुत बाद में आते हैं
ऐसे निडर ईमानदार और मज़़बूत आलोचक
तुम हमारे समय की कविता की आलोचना के
लिपिक हो सकते हो चाहे मुंशी जी हो सकते हो
हरगिज़-हरगिज़ आलोचक नहीं हो सकते हो।

(लंबी कविता : 5.7.20)







गुरुवार, 2 जुलाई 2020

दो सौ पचास ग्राम तुलसीदास तथा अन्य कविताएं

- गणेश पाण्डेय

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दो सौ पचास ग्राम तुलसीदास
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कितने भले
और सीधे सादे लोग हैं
कहते हैं जिसके पास प्रतिभा है
छंद है त्रिष्टुप है अनुष्टुप है पदलालित्य है
हिंदी उर्दू फ़ारसी कविता की समझ है 
वही आज का श्रेष्ठ कवि है

ओह 
निश्चय ही 
निश्चय ही निश्चय ही
जिसके पास इतनी विपुल राशि है
आज की तारीख़ में उसके
दो सौ पचास ग्राम तुलसीदास 
होने पर तनिक भी संदेह नहीं है
नहीं है नहीं है

कारयित्री प्रतिभा का 
यह रहस्य जानकर मेरी छोटी बुद्धि 
भ्रष्ट हो गयी है गहरे सदमे में है
शायद उसे दिल का दौरा पड़ गया है
यह एक कवि की पहचान है
कि कविता का हुदहुद तूफ़ान है
अरे भाई 
कबीरदास के पास प्रतिभा का
इतना बड़ा ज़लज़ला था
हिंदी की दुनिया में 
कवि होने के लिए
कविता का ईमान काफ़ी क्यों नहीं है
फटकार कर 
सच कहना काफ़ी क्यों नहीं है
और जिसके पास ईमान नहीं है
वह कवि क्यों है 
कविता का लिपिक क्यों नहीं है

मैं पूछता हूं कि 
अभी पिछले दिनों एक धूमिल कवि था 
इस लिहाज़ से धूमिल था कवि नहीं था
चुटकीभर प्रतिभा से कंठ में कैसे बसा
और वह जो कविता 
और आलोचना के हरामज़ादों से
अपनी कविता और आलोचना में
ईमान का डंडा लेकर तीस साल से
अकेले लड़ रहा है लहूलुहान है
क्या है

कवि होने के लिए
प्रतिभा के नाम पर किसी रटन्त विद्या
या छंद के पहाड़े की क्या ज़रूरत है
कवि होने के लिए 
सिर्फ़ चुटकीभर ईमान काफ़ी क्यों नहीं है
कवि वह है जो इतना तो आज़ाद हो ही
कि जिसके पुट्ठे पर किसी की छाप न हो
जो कविता के पाठकों का सगा हो
जिसने कभी 
उन्हें कविता के चमत्कार से ठगा न हो
उनके लिए जिया हो मरा हो
हिंदी के हरामज़ादों से लड़ा हो
और हिंदी के मर्दों से मुँह न चुराया हो।

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पियक्कड़ आलोचक
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कमअक़्ल 
आलोचक को
एक-दो बार में आप 
थोड़ा-बहुत समझा सकते हैं

लेकन
छलछंदी आलोचक को 
हरगिज़ नहीं बिल्कुल नहीं
वह तो टस से मस नहीं होगा

आलोचना के 
गटर में गिरकर
वहीं से चिल्लाता रहेगा
अरे कोई लाओ रे एक पैग
छंद की व्हिस्की लाओ रे

पियक्कड़
आलोचक को छंद की मदिरा से
दूर नहीं कर सकते मर जाएगा
उसका कुनबा बिखर जाएगा
उसे कोई डर नहीं है
कोई शर्म नहीं

उसकी आलोचना की कार
लड़ती है तो जल्द लड़ जाए
उसे कैंसर होता है तो हो जाए
लीवर सिरोसिस चाहे
एनीमिया डिमेंशिया
हृदयरोग कुछ भी हो जाए

हे ईश्वर 
फिर भी इतना करना
कि बेचारा छलछंदी आलोचक
अपने जीवनकाल में आज
छंद की अनिवार्यता पर
एक अमर अकाट्य अद्वितीय
और ’कविता का चाँद और 
आलोचना का मंगल’ से सुंदर
लेख लिख जाए।

(वैधानिक चेतावनी : युवा आलोचकों को ’छंद की अनिवार्यता’ की शराब पीने से बचना चाहिए।)

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कर्ज़
-----

जिस
आलोचक की आलोचना में
ईमान का छंद नहीं होता है

वही
प्रायः कविता में छंद के लिए
आठ-आठ आँसू रोता है

क्योंकि
उसे कुछ कवियों से लिया गया
पुराना कर्ज़ चुकाना होता है।

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कवि की ऐंठी हुई ऐंठ
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आप 
आप हैं तो आप हैं
ये ये हैं तो ये हैं हां हैं
वो वो हैं तो वो हैं हा हैं
मैं मैं हूं तो मैं हूं हां हूं
फिर भी आप समझते हैं
कि आज की कविता में
आप ही आप हैं ओह
कितने बड़े बेवकूफ़ हैं
आप

आप की माया है
जहाँ उम्मीद नहीं होती
वहाँ भी दिख जाते हैं आप
कोई भी शहर कोई भी क़स्बा
किसी भी गाँव में पहाड़ पर
बस आप ही आप होते हैं
हर जगह आप

अपने समय की कविता में
दो नहीं दो सौ कवि होते हैं
और आप सोचते हैं कि बस
आप ही आप हैं बाक़ी सब
हवा हैं च्यूंटे हैं आक्थू हैं
वाह कितने बड़े वाले आप हैं
यह नहीं पता कि लंबे वक़्त की 
छननी से छनते हैं नाम
कितने बेसब्र हैं आप
अभी तो मौज़ूद हैं
आपके बाप।

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डरे हुए आलोचक को मार दो
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नाम-इनाम की लूटमार में
कविता का असली रखवाला 
आलोचक को होना चाहिए था
चाहे इसकी शुरुआत 
उसने ही की थी

लेकिन आज जबकि 
कविता थरथर कांप रही है
एक डरा हुआ आलोचक
जो ख़ुद की हिफ़ाज़त 
कर नहीं सकता

हिंदी कविता की आबरू
ख़ाक बचाएगा सबसे पहले 
उसे मार दो 

फिर सोचो दूर खड़े
कविता के भाइयो और बहनो
अगरचे तुम भी इस लूटमार में
शामिल नहीं हो।

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हुनर
-----

कवि का हुनर
कविता से पाठक को
कसके जोड़ने के लिए होता है
फ़ासला पैदा करने के लिए नहीं

और
कवि का हुनर क़तई
महाकवि की कुर्सी पर बैठकर
इतराने के लिए नहीं होता है

मेरे पास 
आलोचना की एक ऐसी मशीन है
जिससे ऐंठे हुए कवियों के हुनर को
तोड़-ताड़ कर मुफ़्त में ठीक करता हूं।

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गिनतीकार
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अरे भाई
सुनो-सुनो मैं तो
किसी कविता दशक में
पैदा ही नहीं हुआ
बक़ौल गिनतीकार

चलो अच्छा हुआ
मैं तो अपने हमज़ाद
छोटे सुकल समेत फाट पड़ा
पांच फीट आठ इंच डैरेक्ट 
आधुनिककाल में

गिनतीकारो ने
रोज़-रोज़ कविगणना से
माठा नहीं कर रखा होता
तो मैं उनके ख़लिफ़ भला
ऐसी सख़्त कार्रवाई क्यों करता।

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आलोचक दोस्त से दिल की बात
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मेरे प्यारे आलोचक दोस्त 
हम कबीर और गौतम बुद्ध
छात्रावास में रहते थे 
रोज़ मिलते थे
नहीं मिल पाते थे तो हमारा
खाना हज़म नहीं होता था
हम दो बार एक बार रोज़ 
मिलते ही मिलते थे
जैसे कल की बात हो

अब कितना कुछ बदल गया है
वक़्त रास्ते और प्राथमिकताएं
सब कितनी आसानी से हुआ
मैं शायद ज़्यादा बदल गया
कवि के साथ आलोचक भी
हो गया मैं होना नहीं चाहता था
तुमने रोका भी नहीं हो गया

असली दुनिया में
बहुत मारें पड़ीं तो दिल हिल गया
तुमने रोका नहीं आभासी दुनिया में
आ गया काफ़ी पहले
वक़्त लगा तुम भी इस नयी दुनिया में 
खिंचे चले आये किसी आकर्षण में
मेरा क्या मैं तो मज़बूरी में आया

हम 
यहां भी साथ-साथ हैं
फेसबुक का हॉस्टल आसपास है 
लेकिन यहां कम दिखते हो
दिखते भी हो अगरचे कभी
तो मेरी दीवार की तरफ़
कोई काम निकालकर 
अब आते भी नहीं हो आओ तो
मेरी दीवार पर कुछ भी करो
बुरा नहीं मानूंगा

तुम 
इस दुनिया में 
किसी और काम से 
क्यों नहीं आते हो कुछ तो बड़ा 
कर रहे होगे शायद
कविता का इतिहास लिख रहे होगे
चाहे किसी की रचनावली 
संपादित कर रहे होगे
लेख तो दो दिन में हो जाता होगा
कुछ कवियों को बड़ा कवि बना रहे होगे
ज़रूर कुछ ख़ास है तभी यहां
बहुत नाप-तौल कर आते हो
दो मिनट में लौट जाते हो

किसी बड़े लेखक की पुण्यतिथि पर 
चाहे उसकी जयंती पर आते हो 
ज़्यादातर लेखकों के निधन पर ही
श्रद्धांजलि देने के लिए आते हो
मतलब बहुत ग़लत समय पर 
आते हो मित्र
मुझे तुमसे बहुत डर लगने लगा है
इस तरह तो आशंका की तरह 
यहां पहले कभी नहीं आते थे
कुछ माह पहले मेरी दीवार पर
आते थे कुछ पल के लिए
तो मित्र की तरह 

इस 
आभासी दुनिया में 
कभी-कभार दोस्तों से मिलने के लिए 
निकला करो जैसे पहले निकलते थे
चाय के लिए कविता सुनने के लिए
देखो आज कैसी कविता लिखी है
छंद के छलछंद के ख़लिफ़ लिखी है
ख़ुद तुलसीदास आए आशीष देने
और प्यार देते हुए कहा 
कविता और आलोचना के रावण से
लड़ना ज़रूरी है

तुम 
मेरी कविताओं को 
अब भी प्यार करते हो
किसी माफ़िया का डर भी होगा
तो भी मेरी कविताओं को ज़रूर
दिल ही दिल में प्यार करते होगे।

-----
तर्क
-----

किसी को
अपशब्दों की बौछार से
लज्जित करना चाहोगे तो
वह सिर्फ़ नाराज़ होगा

और
उसकी आँख में
आँख डालकर तर्क करोगे
तो उसकी आत्मा लज्जित होगी

बशर्ते 
उसने अपने हाथों
अपनी आत्मा का गला
घोंट न दिया हो

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मज़दूर क्रांति
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मज़दूर 
सिर से पैर तक मज़दूर होता है
न किसी का भाई होता है न बेटा न पिता 
न पति न प्रेमी न नागरिक न मतदाता
न मनुष्य

मज़दूर 
जैसा कोई और नहीं होता है
सिर्फ़ मज़दूर जैसा ही मज़दूर होता है
मज़दूर दुनिया का चाहे इस देश का
अद्वितीय प्राणी होता है
उसका दुख अद्वितीय होता है
उसका पसीना उसका आंसू
सब अद्वितीय होता है

मज़दूर
प्रगतिशील कविता का
प्रमुख विषय होता है कसौटी होता है
कवि जी की दृष्टि में वही प्राणी होता है
शेष पृथ्वी पर चाहे देश में मृतात्माएं हैं
सचल पाषाण प्रतिमाएं हैं 
उन्हें न दर्द होता है
न उन्हें छाला पड़ता है न आंसू बहता है
न बीमार होते हैं न भूख से मरते हैं
न कवि जी की सहानुभूति पाते हैं

आज़ादी के बाद से ही
सिर्फ़ राजनेताओं ने ही नहीं
कवियों ने भी भरपूर कोशिश की
कि देश के ग़रीब अमीर न होने पाएं
और मज़दूर मिल मालिक
यथास्थिति बनी रहे
कविता में रोना-धोना होता रहे
मज़दूरों को काम के लिए
दूर-दूर तक जाना पड़े
मुसीबत में पैदल आना पड़े
और कवि जी को कविता लिखना पड़े
और ऐसी करुणा विगलित कविताओं से 
वाहवाही के पहाड़ उठाना पड़े

हो न हो
यह दशक मज़दूर कविता के नाम रहेगा
आज के कवियों आलोचकों और
संपादकों के बहुत काम का रहेगा
दशक की बेवकूफ़ी में फंसे कवियों के लिए
मज़दूर दशक इस दशक की कविता का
नाम रहेगा

यह भी 
हो सकता है कि मज़दूर इंडिया नाम से 
धड़ाधड़ कई खंडों में संकलन आ जाएं
पत्रिकाओं में लाइव पर दीवार पर
चर्चा की बाढ़ आ जाए

आज यशपाल होते
तो हरगिज़ करवा का व्रत नहीं लिखते
कोरोना पर भी लंबी कहानी नहीं लिखते
मज़दूर का व्रत ज़रूर लिख रहे होते
केदारनाथ अग्रवाल भी हे मेरी तुम 
आज की तारीख़ में हरगिज़ नहीं लिखते
हे मज़दूर लिख रहे होते
और कविता में औचक हो रही
मज़दूर क्रांति पर
ख़ुश हो रहे होते।

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शास्त्रार्थ
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हे
सूथन वाले
पंडिज्जी पालागी 

ऊ पगलेटवा से
भिनसरवे से काहे
शास्त्रार्थ करत हौ

चोर उच्चकन से
मक्कार हरामजादन से
शास्त्रार्थ करब ठीक है

शास्त्रार्थ ज्ञानी पंडितन से 
ईमानदार मनइन से करबो
कि हिंदी कै दगाबाजन से

जौन सब
कबीर प्रेमचंद निराला
मुक्तिबोध कै बेचिखाइन

वोन्हनन सालन से
कब तक शास्त्रार्थ करबो
ई जिनगी बरबाद करबो

हम पूछित है पंडिज्जी 
एन्हनन कै कौने जनम में
डंडा करबो।

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पापी
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पहुंचभर जाता
साहित्य की काशी

किसी भी घाट पर
डुबकी लगा लेता

बहती हुई गंगा में 
मैं भी हाथ धो लेता

तो कोई बंदा आज
पापी नहीं कहता।

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सोने वालो
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जागते 
रहो

सोन का
इनाम
लेने वालो!

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कवि थे
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वे सब तेज़ी से
उधर ही भाग रहे थे

जिधर 
कुछ बंट रहा था

लॉकडाउन में
मुसीबत के मारे
मज़दूर नहीं थे

सब के सब
हिंदी के कवि थे।

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कवि नहीं कहा
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पापी कहा
पागल कहा
कुंठित कहा
असफल कहा
क्या-क्या नहीं
कहा ज़माने ने

बस एक 
कवि नहीं कहा।

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काँटों की सेज की कविता
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मैंने
उनकी बहुत सुंदर
और बहुत कोमल कविताओं को
बहुत-बहुत देखा 

वाह-वाह 
करते-करते थक गया
उन्हें और कुछ लिखना आता ही नहीं था
इतना तो देखा और कितना देखता

उन्होंने तो
मेरी कँटीली कविताओं को कभी
चाहे मुझे फूटी आँखों से भी नहीं देखा
फिर भी लंबे समय तक उन्हें देखता रहा

आख़रि ऐसे
महाकवियों की ओर कब तक देखता
जिनकी कविताएं फूल जैसी हैं
और कविता की समझ पत्थर की तरह

कोई महाकवि 
यह कैसे समझ सकता है कि कविता
कभी कांटों की सेज पर नहीं सोएगी
हमेशा फूल ही पंखुड़ियों में बंद रहेगी

कोई कवि 
सोचता है कि वह जैसी कविता लिखेगा
बस वही कविता होगी बाक़ी पागलपन
तो मुझे उसके कवि होने पर संदेह है।