मंगलवार, 19 नवंबर 2019

ओ ईश्वर पार्ट टू

- गणेश पाण्डेय

ओ ईश्वर
सविनय निवेदन है
पहले भी एक बार
बाबरी मस्जिद ढ़हने के आसपास
सविनय विनयपत्रिका भेज चुका हूं

हे परमपिता
आपने मुझ पर अहेतुक कृपा की है
भारत वर्ष में एक टुकड़ा कृषियोग्य
ईमान की भूमि देकर

हे पालनहार हे जगन्नियंता
मैं जैसे ही हल लेकर खेत जोतने निकलता हूं
मेरे पीछे-पीछे लगे लाल हरे केसरिया रंग के सांड़
मेरी आत्मा के दो सुंदर और पुष्ट बैलों को दौड़ाकर
अपनी झुंड के सीगों से लहूलुहान कर देते हैं

हे अन्नदाता
मैं क्या करूंगा इस कृषियोग्य भूमि का
जिसके भाग्य में अनंतकाल तक बंजर रहना लिखा है
ईमान के इस टुकड़े को आप वापस ले जाएं नहीं तो
इसे कुएं में फेंक दूंगा आग लगा दूंगा
अजायबघर में रख दूंगा

हे सच्चिदानंद
मुझे स्वर्ग नहीं चाहिए मैं भी नर्क में जीना चाहता हूं प्रभु
जैसे जीते हैं सब बेईमानी की लहलहाती फसलों के बीच
मैं भी अपने बच्चों को खुशहाल देखना चाहता हूं
कम से कम सात पुश्तों के लिए इंतजाम करना चाहता हूं

हे नाथ
आपने बेईमानी की कई एकड़ कृषिभूमि
हिन्दी के हरामजादों को देकर किसी को
वाइसचांसलर तो किसी को मंत्री-वंत्री बनाया
आप ही बताइए खुलकर बताइए
हिंदी का ईमान लेकर मुझे क्या मिला घंटा

हे सर्वशक्तिमान
ईमान वालों के साथ न्याय नहीं कर सकते
तो उन्हें ईमान का प्लाट-व्लाट देते ही क्यों हैं
प्रेम करने वाले अपने भक्तों को आप इतना दुख देते हैं
और आपका नाम बेचने वालों को राजपाट

हे बाबा
गोरखनाथ
आप शिवावतार भी हैं और हिन्दी के कवि भी
आपकी छाया में मेरा घर है एक किलोमीटर पर
आपने कभी जानने की कोशिश क्यों नहीं की
कि कविता का ईमान ढोनेवाला कोई मजदूर भूखा क्यों है
और आपकी खिचड़ी हिन्दी के कैसे-कैसे लोगों में
बांट दी जाती है

ओ अंतर्यामी
अब इस उम्र में मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए
न सोना-चांदी न राजपाट और न यश का छत्र
मेरे जीवन में खुराफात की जड़ इस ईमान को
बस जल्द से जल्द वापस ले लीजिए

हे विधाता
मेरे दिमाग से ईमान को फौरन निकालकर
उसकी जगह धर्म का गोबर भर दीजिए चाहे
हिन्दी की पुरस्कार की टट्टी भर दीजिए
चाहे राजनीति की हरामजदगी भर दीजिए

ओ ईश्वर
बस बस बस बहुत हुआ देख लिया ले जाओ
अपना यह टूटा-फूटा ईमान का खिलौना
बहुत खेल लिया बहुत हार लिया बहुत रो लिया
अगले जन्म में मुझे भी चलता-पुर्जा आदमी बनाना
ईमान का चलता-फिरता पुतला नहीं।



                                                                     

बुधवार, 6 नवंबर 2019

हिंदीघर सीरीज

- गणेश पाण्डेय

(एक)
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जब किसी ने नहीं सुनी मेरी बात
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जब किसी ने
नहीं सुनी मेरी बात

तो आखिर मैं क्या करता
उन हंसी-ठट्ठा करते लोगों के बीच

खुद को बचाने के लिए मुझे
अलग होना ही था हुआ।

(दो)
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कितनी देर तक विनती करता
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कहां-कहां
किसके पास कितनी देर तक
विनती करता

सब पत्थर की चलती-फिरती
हंसती-बोलती नाचती-गाती
और काव्यपाठ करती मूर्ति थे

सब समय की बहती हुई धारा के
कण थे मृत पशु थे अस्थि थे
मानव-शव थे

कोई सुनता ही नहीं मेरी बात
पता नहीं क्या टेढ़ा था मेरा मुंह
कि मेरी बात

जैसे उनके लिए
मैं था फिर भी नहीं था
जैसे मैं कोई अदृश्य चीज था

हवा होता तो महसूस करते
उड़नतश्तरी होता तो देख लेते
शायद मैं उनके लिए बीता समय था

मैंनै चुपचाप अपना
कुछ सामान बोरिया-बिस्तर समेटा
और उस जगह से बाहर हो गया।

(तीन)
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शर्म से पानी-पानी हुआ
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तमाम लोग
बड़ी-बड़ी जगहों से
बाहर कर दिए जाते हैं
लेकिन उन्हें शर्म नहीं आती

कितना नासमझ हूं
उन जगहों की तुच्छ बातों को देखकर
मैं खुद ही शर्म से पानी-पानी हुआ खूब
और बिना देर किये बाहर आ गया।

(चार)
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मेरी उंगली और सभाध्यक्ष की आंख
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मैं सोचता था
कि मेरी उठी हुई उंगली की ओर
सभाध्यक्ष देखेंगे और सुधार लेंगे
अपनी बात

लेकिन उन्हें
झूठ बोलने की इतनी जल्दी थी
कि अपनी आंखें निकालकर
जेब में रख लीं

ओह मैं
बहुत से बहुत शर्मिन्दा हुआ
अपना सिर और उंगली झुकाकर 
सभागार से बाहर आ गया।

(पांच)
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हिंदीघर से मुझे बाहर फेंक दिया
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मुझे
हर ऐसी-वैसी बात पर
छींकने की बीमारी हो गयी थी
और उन्हें वह सब करने की आदत थी

मैं अपनी नाक को
बहुत समझाता था कि बस भी करो
लेकिन मेरी नाक पर मेरा वश नहीं था
आखिर वही हुआ जिसका डर था

किसी ने मेरी नाक किसी ने कान
किसी ने हाथ किसी ने पैर खींचा जोर से
और मेरे बाप-दादा-परदादा के बनाए
उस हिन्दीघर से मुझे बाहर फेंक दिया।


                                                                       

सोमवार, 4 नवंबर 2019

जागो सीरीज : छोटी कविताएं

- गणेश पाण्डेय

(1)
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उनकी चीख सुनो
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बेईमानों
चोर-उच्चकों
और लुटेरों का गिरोह होता है

ईमानवालों का
कोई गिरोह नहीं होता है
बाजदफा बिल्कुल तनहा होते हैं

उनकी चीख सुनो हिंदी के बच्चो
उनका दर्द और छाती पीटना सुनो
यकीनन यह सब तुम्हारे लिए है।

(2)
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आप चुप नहीं रह सकते
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हिन्दी के इस
चौराहे पर खड़े होकर
बस के नीचे आते बच्चों को देखकर
आप चुप नहीं रह सकते
अगर आप चीख नहीं सकते
तो गधा बैल कुत्ता बिल्ली हो सकते हैं
आदमी तो बिल्कुल नहीं हो सकते

हिन्दी के भले आदमी हैं
तो जागिए कुल्ला-दातून कीजिए
खेतों की तरफ भागिए
नील गायों को ललकारिए
हिन्दी की फसल को
बर्बाद होने से बचाइए।

(3)
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जवानी तुम्हारी है हिन्दी हमारी है
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तय करो
तुम्हें अपनी जवानी
लड़ाकों के संग
हिन्दी की उन्नति को देनी है
या साहित्य उत्सवों की मंडी में
प्रसूनों विश्वासों के संग बैठकर
बर्बाद करनी है

जवानी तो तुम्हारी है
किसी भी खूंटे में फंसा दो
ताल-तलैये में डुबो दो
किसी को भी दान कर दो
चाहे तो कोठे पर गंवा दो
तुम अपनी जवानी के संग
कुछ भी कर सकते हो
लेकिन हिन्दी के साथ
कोई बुरा काम नहीं कर सकते

लड़के
सम्हल जाओ
तुम्हारी जवानी तुम्हारी है
तुम्हारा जोश तुम्हारा है
तुम्हारी यशेषणा और वासना
तुम्हारी है तुम्हारी है
हिंदी हमारी है।

(4)
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तय करो
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चीखें
हमें जिंदा रखती हैं

और चुप्पी
हमें मार देती है

तय करो तुम्हें आगे
हिंदी में क्या करना है।

(5)
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टाफी
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बच्चे तो बच्चे हैं
वे थोड़ा-सा मचलते
फिर सम्हलकर
अपने काम में लग जाते

ये तो हिंदी के
मेरी उम्र के हरामजादे हैं
बच्चों को टाफी दिखाना
बंद नहीं करते।



           




सोमवार, 28 अक्तूबर 2019

सिद्धांत सीखा प्रयोग छोड़ दिया तथा अन्य कविताएं

- गणेश पाण्डेय
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सिद्धांत सीखा प्रयोग छोड़ दिया
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नयी सदी में
एक काम हमने बहुत अच्छा किया
भारतेंदु से लेकर आचार्य शुक्ल तक
और आचार्य शुक्ल से लेकर छोटे सुकुल तक
इससे पहले ऐसा कमाल हिंदी में नहीं कर पाए थे
हमने
अपने समय की सभी विद्याओं और ज्ञान की
शाखा-प्रशाखा और बाहर की शाखाओं में भी
मनोयोगपूर्वक प्रवेश किया कोई कोना छूटा नहीं
अलबत्ता आधा सीखा आधा छोड़ दिया
सिद्धांत सीखा और प्रयोग छोड़ दिया

असल में हम
हिंदी के बहुत व्यस्त लेखक थे
जगह-जगह जाना था हर तरफ जाना था
कहीं स्वतंत्रता और समता पर भाषण देना था
कहीं निराला और मुक्तिबोध को आदर्श बताना था
एक ही दिन में तीन मठाधीशों और चार उपमठाधीशों का
पैर दबाना था चंपी करना था गिलास में रसरंजन डालना था
और उसके बाद नाचने-गाने का प्रोग्राम अलग से करना था
थककर चूर होने के बाद हमारे पास
सिद्धांतों से जुड़े प्रयोग के लिए समय कहां था
सो हमने छोड़ दिया

असल में
हम हिंदी के नयी सदी के लेखक थे
हिंदी के पुरानी सदी के लेखकों की तरह पागल नहीं थे
कि हर चुनौती हर आदर्श के लिए दीवार पर माथा पटकते
लहूलूहान होते अपने समय के अंधेरे में गुम हो जाते
कि कोई आएगा हमें झाड़ से निकालकर
झाड़-पोंछकर खड़ा करेगा सबको बताएगा हमारे बारे में
एक ऐसे समय में जब हम अपने बाप को नहीं पहचानते
आने वाले वक्त के लेखकों पर कैसे भरोसा कर सकते थे

हमसे जो बन पड़ा हमने किया
हम हिंदी के लेखक थे कोई स्वतं़त्रता सेनानी नहीं
हम हिंदी के मामूली आदमी थे कोई देवता नहीं
हम अपनी सदी के लोग थे हमें पिछली सदी से क्या
हम हिंदी की दुक्की थे
तिग्गी थे चौका थे छक्का थे
गुलाम थे बहुत हुआ तो बेगम थे
हम हिंदी के बादशाह कैसे हो सकते थे
हम हिंदी के भगत सिंह नहीं थे
हम हिंदी के महात्मा गांधी नहीं थे
हम भला सत्य के प्रयोग कैसे कर सकते थे
हम बीच के लोग थे हमने बीच का रास्ता चुना
आधा सीखा आधा छोड़ दिया
सिद्धांत सीखा प्रयोग छोड़ किया।

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आज का भारत
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आज का भारत
बहुत मजबूत भारत है
बहुत कामयाब भारत है
पाकिस्तान को खूब डरा सकता है
हजार बार उसकी हेकड़ी निकाल सकता है

लेकिन आज का महाभारत
इस महादेश की गरीबी बेरोजगारी
और भ्रष्टाचार को हरगिज डरा नहीं सकता है
डराना तो दूर उसे चांटा भी नहीं दिखा सकता है

आज का भारत
अलबत्ता दावे बड़े बड़े कर सकता है
राजनीति में ऊटपटांग फैसले ले सकता है
संन्यासी को राजपाट और नागरिक को
भूख से मरने के काम में लगा सकता है
अपने अपने विषय के फिसड्डियों को
बड़े बड़े पद पर बैठा सकता है
और प्रतिभाओं को अहर्निश
घास छीलने के काम में लगा सकता है
सच तो यह कि कुलपतियों का
अधोवस्त्र धुलने वालों को
कुलपति बना सकता है

आज का भारत
झूठे का चेहरा चमका सकता है
सच्चे को हद से ज्यादा परेशान कर सकता है
अपराधियों के मुकदमें वापस ले सकता है
और निरपराध नागरिक को शक की बुनियाद पर
मरने के लिए छोड़ सकता है

आज का भारत
कल के भारत में
अपने राजनेताओं के लिए कम
और हिन्दी के खूंख्वार
इनामखोरों की बुजदिली के लिए
ज्यादा याद किया जा सकता है।

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बेहतरीन कवियों की लिस्ट
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हिन्दी के आज के
बेहतरीन कवियों की लिस्ट जारी हुई है
जिन्होंने जारी की है यह लिस्ट
भले जन हैं सामाजिक कार्यकर्ता हैं
बहुत आदरणीय हैं
शायद साहित्य के प्रति ईमानदार भी हैं

वाकई बहुत से बहुत भले हैं
बहुत से बहुत ज्यादा विचारवान हैं
देश और दुनिया की क्रूर सत्ताओं को
उखाड़ फेंकने का स्वप्न नित देखते हैं
पूंजीवाद के नाश के लिए सदैव सोचते हैं
जन को हित के लिए संघर्ष से जोड़ते हैं
ऐसे व्यक्ति के लिए सम्मान स्वाभाविक है

आज आंख खुली
उनकी हिन्दी के एक से एक बेहतरीन
कवियों की लिस्ट देखकर
साहित्य के प्रति यह अनुराग
कविता के प्रति यह प्रेम
कवियों के संसार की यह समझ उत्तम है
वाकई क्रांति इसी रास्ते से आएगी

जो कवि साहित्य में अपने आचरण से
जितना लज्जित करेगा उतना बेहतरीन होगा
जो कवि पुरस्कार के लिए जितना रोएगा
भ्रष्ट अकादमी की जितनी परिक्रमा करेगा
और अपनी कविता में जितना तीन-पांच करेगा
जो कवि साहित्य की सत्ता की पालकी ढोएगा
नित मठाधीशों के सामने उठक बैठक करेगा
जो कवि भीतर से जितना काला होगा
और खूब सुंदर क्रांतिकारी कविताएं लिखेगा
वह कवि उतना ही बेहतरीन होगा
धन्य है यह काव्य-विवेक

हे विचार के भले मानुष
हे परिवर्तन के वाहक
मुझ पर आपकी कृपा दृष्टि बनी रहे
मुझे अपनी बेहतरीन कवियों की सूची से
सौ कोस दूर रखिएगा
निश्चय ही मैं अपने समय का
सबसे खराब कवि हूं
मैंने बाकायदा खराब कविताएं लिखीं हैं
मैं साहित्य में विध्वंस चाहता हूं
साहित्य की भ्रष्ट सत्ताओं को
उखाड़ फेंकने का स्वप्न देखता हूं
मैं हिन्दी का पागल हूं
सिर्फ राजनेताओं की ही नहीं
लेखकों की भी पूंछ उठाकर देखता हूं
उनकी रचनाओं को ऊपर से नहीं
उसमें घुसकर देखता हूं
एक-एक छेद देखता हूं।

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अकेले कबीर
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कबीर
अपने समय के
पंडितों के बीच
कैसे रहे होंगे

कबीर को
उनके समय में
कितने लेखकों ने
पसंद किया होगा

कबीर
अपने समय में
कितना अकेला
रहे होंगे

कबीर
अपनी कविता में
पानी की जगह
आग क्यों लिखते रहे

कबीर
आज होते तो पंडितों से
इनाम ले रहे होते
या उन्हें लुकाठी से
दाग रहे होते

बड़ा सवाल यह
हिन्दी के इनामी डाकू
कबीर के साथ आज
कर क्या रहे होते!

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तुम्हारा नाम
--------------
लेखको
तुम सब चाहे जितना
नाच लो तान तोड़ लो

अपने समय के
न कबीर कहे जाओगे
न प्रेमचंद न मुक्तिबोध

चाहे जितना
अनुवाद करा लो
खुद पर किताब छपवा लो

अपने समय के
हिन्दी के कीट-पतंग भी
समझे जाओगे संदेह है

शायद ही कोई
तुम्हारा नाम उस तरह ले
जैसे मैं नाम लेता हूं

खुशी-खुशी
गुमनामी में जीने वाले
देवेंद्र कुमार बंगाली का।

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प्रकाश किसको प्रकाशित करता है
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खुश रहो
बेकार की चीजों
और लोगों में मत उलझो

आगे बढ़ो
बढ़ते ही जाओ पीछे नीचे
और दाएं बाएं मत देखो

प्रकाश का धर्म निभाओ
प्रकाश का स्वभाव अग्रगामी होता है
बस सामने देखो

एक गुरु ने
अपने प्रिय शिष्य को सीख देते हुए
बहुत आशीष दिया

शिष्य की मति मारी गयी थी
अंधकार के ढेर पर बेठे बैठे
गुरु से जिज्ञासावश पूछ लिया

हे गुरुश्रेष्ठ प्रकाश
किसको प्रकाशित करता है
प्रकाश को या अंधकार को

गुरु ने दुखी होकर कहा
जाओ बच्चा साहित्य में अब
तुम्हारा कुच्छ नहीं हो सकता।

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कहां कमी रह गयी
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ओह
इतने विश्वविद्यालय
और इतने महाविद्यालय

और
इतने सुयोग्य आचार्य
इतने सह आचार्य

असंख्य दीये
हर साल जलाए गये
भव्य दीक्षांत समारोह हुए

फिर भी
समाज में अंधेरा
और अंधविश्वास छंटा नहीं

आखिर
कहां कमी रह गयी
उस पर चोट क्यों नहीं हुई।

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आचरण की पाठशाला
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ज्ञान के बड़े बड़े
विश्वविद्यालय बने

ऐसे ही तमाम
महाविद्यालय बने

ऐसे ही ज्ञान के
असंख्य छोटे विद्यालय बने

कोई बता सकता है
इनसे कितने मनुष्य बने

क्यों क्यों क्यों ये ज्ञान के
चमकीले खंडहर बने

ओह आचरण की पाठशाला
आखिर ये क्यों नहीं बने।

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साहित्य के सत्य की खोज
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यश की कामना
क्या मानवता के हित में है

यश की कामना
क्या समाज के हित में है

यश की कामना
क्या देश के हित में है

यश की कामना
क्या न्याय के हित में है

यश की कामना
क्या साहित्य के हित में है

अपने समय में यशस्वी होने से
क्या कृतियां कालजयी हो जाती हैं

यशस्वी न होने से लेखक
क्या दस्तखत करना भूल जाता है

गुमनाम रहने से कोई लेखक
क्या गोबर गणेश हो जाता है

क्या यश सत्य है
क्या अपने समय के यशस्वी सत्य हैं

क्या यश की भूख सत्य है
या कृति के लिए की गयी मौन साधना

यश के चंद्रयान पर बैठकर चंद्रमा पर
विक्रम की तरह हार्ड लैंडिंग करने वाले

यशस्वी लेखक धरती के लेखकों को
क्या बता सकते हैं साहित्य का सत्य।








बात बोलेगी : राजेन्द्र कुमार का खत

                                                                                               दि.5अक्तू.2019, इलाहाबाद।
प्रियवर गणेश पांडे जी,
कुशल से होंगे। हालांकि यह कहना भी अब मात्र एक औपचारिक मुहावरा बनकर रह गया है। जो भी व्यथित और जरा भी संवेदनशील है, वह बाहर से भले ही सकुशल दिखे, मन से तो हमेशा बेचैन और द्वंद्वग्रस्त ही रहता है। स्थितियां ही कुछ ऐसी हैं। जो दुनियादार हैं, वे स्थितियों में खुद को ढालकर अपने मन को समझा लेते हैं, अवसर के मुताबिक राह पकड़ लेते हैं। लेकिन जो स्थितियों की भयावहता, अमानवीयता, असहिष्णुता के बारे में सोचे बिना नहीं रह पाते-प्रायः उनकी नियति होती है - अकेलापन।
आपको वर्षों से लिखते-पढ़ते देख रहा हूं। इधर थोड़ा-बहुत ह्वाट्सएप, फेसबुक जैसे माध्यमों से थोड़ी-बहुत वाकफियत हो गयी है। फेसबुक पर भी आपकी चिंताओं से परिचित होता रहता हूं। आपकी चिंताओं में अपने को भी शामिल पाता हूं। अपने-अपने अकेलेपन के अंधेरे में, यह शामिल-पन का भाव कभी-कभी उम्मीद के जुगनुओं की तरह जग-मगा उठता है। कुछ साथी - कहीं भी हों, कितनी भी दूर- पर हैं तो, जो अब भी सोचने और महसूस करने की क्षमता बचाकर रखे हुए हैं। यह भी हम-आप जैसों के रचनात्मक सहारे के लिए कम बड़ी बात नहीं है।
आपने 2 अक्टूबर वाली पोस्ट में लिखा-‘ साहित्य में अंधेरा फैलाने वाले, आज गांधी पर प्रकाश डालेंगे!‘ यह विडम्बना यों तो मात्र साहित्य की नहीं, राजनीति-समाज-चिंतन वगैरह सभी क्षेत्रों की है, लेकिन आपने साहित्य का उल्लेख किया तो इसका मर्म मैं समझ सकता हूं। निराला ने ‘सरोज-स्मृति‘ में लिखा- ‘ मैं कवि हूं, पाया है प्रकाश! ‘ यह कोई व्यक्तिगत दंभ नहीं था। यह कवि होने या साहित्यकार होने की सबसे सारगर्भित परिभाषा थी। कवि होना गहरे अर्थो में ‘प्रकाश प्राप्त‘ होना है। प्रेमचंद ने भी राजनीति से नहीं, साहित्य से ही ज्यादा आशा की थी-‘साहित्य राजनीति के आगे-आगे चलने वाली मशाल है।‘ लेकिन आज ‘प्रकाश‘ और ‘मशाल‘ जैसे शब्दों को हमारे तथाकथित कवि और साहित्यकार ही अर्थहीन करते जा रहे हैं। राजनीति ने तो पहले ही इन शब्छों को मात्र चुनाव-चिह्न जैसा कुछ बनाकर रख दिया है। राजनीति में तो अंधेरा ही सर्वत्र अट्टहास कर रहा है। इस अट्टहास को ही प्रकाश की तरह बिखेरा जा रहा है। इस अट्टहास की चकाचौंध में प्रकाश का इतना भ्रम है कि आंखें चौंधियां जाती हैं। देखने की क्षमता ही जाती रहती है। और आपने इस विडम्बना की ओर ठीक ही इशारा किया है, गांधी के हवाले से। जिनको कुछ नहीं दिखता, वे ही सबकुछ देख लेने की डींग हांकते हैं। अंधता इतनी दंभी कि गांधी जैसा पुरुष-जो खुद अपनी आंखों से देखने पर विश्वास करता था, जिसने सत्य का प्रकाश पाने के लिए ‘सत्य का प्रयोग‘ करने की ठानी थी- उस पर अंधता प्रकाश डालने का दावा करती है।
मैंने कभी लिखा था,‘साहित्य एक प्रकार का रचनात्मक हठ है कि मनुष्य को सबसे पहले और सबसे आखिर तक सिर्फ मनुष्य के रूप में ही पहचाना जाए, न फरिश्ते के रूप में, न राक्षस के रूप में, न देवता के रूप में, न सिर्फ साधु या शैतान के रूप में।‘
गांधी को क्या मनुष्य के रूप में सचमुच हम अभी तक पहचान सके हैं? हमने मूर्तियां बना दीं, न्यायालयों और सरकारी दफ्तरों में उनके फोटो टांग दिए। इन सब रूपों में आज गांधी आज कितने दयनीय हो उठे हैं कि उन्हीं की फोटो के नीचे बैठे अधिकारीगण कैसे-कैसे स्वार्थ-लिप्सा भरे कारनामों को अंजाम दे रहे हैं।
गांधी को इस दयनीयता से क्या सिर्फ उन पर कविताएं लिखकर उबारा जा सकता है? है कोई ‘प्रकाश प्राप्त‘ कवि जो उनकी इस दयनीयता को सवमुच देख सके? महसूस कर सके? गांधी का अनुसरण करने-कराने का उपदेश देने वाले हर क्षेत्र में हैं। साहित्य में भी। पर गांधी बेचारे ऐसे अनुसरणकर्ताओं से बचने के लिए छिपते-छिपाते, टाट वाले बोरे में अपना चेहरा ढके चुपचाप मुकित्बोध की कविता में चले गए हैं।
सच पूछिए तो अब ‘अनुसरण‘ या ‘अनुयायी‘ जैसे शब्द पाखंड का पर्याय हो गए हैं। कोई किसी का अनुसरण नहीं करना करना चाहता है, सिर्फ अपने-आपके सिवा। अब अनुयायी होना नहीं, पिछलग्गू होना फिर भी कुछ अर्थवान शब्द है। पिछलग्गू ऐसे व्यक्तियों का, जो लाभ पहुंचाने की स्थिति में हों। थोड़ी ख्याति मिल जाए, पुरस्कार या उपाधि मिल जाय-बस इतना ही अभीष्ट है। आज के लेखक की महत्वाकांक्षाएं भी बड़ी क्षुद्र हैं। वह अपनी क्षुद्रता में अमर होना चाहता है।
ऐसी अमरता को हम-आप क्यों चाहें? क्योंकि हमारे लिए तो यह जीते जी मर जाने के समान है। ऐसे में तो अच्छा है, कबीर की तरह रहें-मेरो मन लागा ठाठ फकीरी में! हम साहित्य के फकीर बने रह सकें, यही कामना हमारे लिए ठीक है।
अभी इतना ही।
हां, इतना और कि ज्यादा शिकायती होने में वक्त जाया न करें। हर स्थिति में जितना रचनात्मक हो सकें, रहें।
आपकी सक्रियता और सार्थक चिंताओं में आपका सहभागी-
राजेंद्र कुमार

शुक्रवार, 25 अक्तूबर 2019

भाई सीरीज

- गणेश पाण्डेय

(1)
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भाई बीमार हैं
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भाई बीमार हैं
अस्सी के पास पहुंचकर
सौ पार लग रहे हैं भाई

भाई बीमार हैं
बिस्तर पर लेटे लेटे भाई
कहते हैं बहुत लाचार हैं

ये मेरे कान नहीं सुन रहे हैं
आंखें सुन रही हैं बोल रही हैं
आप लोग तो जानते ही हैं
कि आंखों की भाषा
कितनी तरल होती है
क्या क्या भिगो देती हैं

भाई बीमार हैं
मैं उन्हें लंबे समय के बाद
इतने करीब सै देख रहा हूं
आमने-सामने बैठकर

भाई बीमार हैं
भाई की आंखों में
बीता हुआ समय फिर से
बीतता हुआ देख रहा हूं

भाई बीमार हैं
मेरे सामने सहसा
भाई की आंखों की पुतली
खेल का मैदान बन जाती है
भाई को हाकी खेलते हुए
देख रहा हूं

भाई बीमार हैं
और भाई की कलाई का जादू
फिर से चलते हुए देख रहा हूं
एक दो तीन चार लगातार
भाई को हाकी से गोल करते
देख रहा हूं और रोम रोम में
रोमांच से भर जा रहा हूं

भाई बीमार हैं
भाई की आंखों में
भाई की उंगली पकड़कर
खेल के मैदान से लौटते हुए
खुद को देख रहा हूं सोच रहा हूं

भाई बीमार हैं
काश भाई ने जिंदगी में भी
ऐसे ही लगातार गोल किए होते
तो इतना बीमार न हुए होते
इतनी बेकदरी न हुई होती

भाई बीमार हैं
भाई मेरे पास रहे होते
तो इतने बीमार न हुए होते
इतने उदास न होते
मेरे सहोदर मेरे सहचर होते

भाई बीमार हैं
मुझे भी अपने घर लौटना है
कुछ देर और ऐसे ही
बीमार भाई के सामने बैठा रहा
तो मैं पूरी तरह ढह जाऊंगा
और मुझे ढहता देख भाई
ढह जाएंगे।

(2)
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भाई तो हीरा थे
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भाई थे तो लगता था
हैं और रहेंगे कभी जाएंगे नहीं

कई बार कई मूल्यवान चीजें
पास में रहती हैं तो लगता ही नहीं
कुछ मूल्यवान भी है

कोई चीज गुम हो जाती है
तो लगता है अरे हीरा था खो गया है

भाई तो हीरा थे ही
वक्त की धूल से चमक छिप गयी थी
मजबूत पेड़ भी धराशायी हो जाता है
एक दिन

भाई कहां होंगे पिंजरे से निकलकर
ऊपर और ऊपर अधबीच में होंगे
या पहुंच चुके होंगे अम्मा के पास
चाहे बाबूजी के पास या दोनों के पास

बड़े भाई इसीलिए पैदा होते हैं
कि छोटे भाई को बुढ़ापे में भी
अकेला छोड़कर पहले चले जाएं
खूब रुलाने के लिए

जा तो रहे हो भाई
अम्मा पूछेंगी चले क्यों आए
छोटकू के नाती पोतों से मिले बगैर तो
अम्मा को बाबूजी को बुआ को दादी को
सबको कैसे समझाओगे भाई

अभी कितनी दूर पहुंचे होगे भाई
क्या लौट नहीं सकते भाई।

(3)
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भाई का अधखुला मुंह
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भाई का मुंह
खुला का खुला
अधखुला रह गया हो
ऐसा पहली और आखिरी बार हुआ है

क्या चाहिए भाई
पानी शरबत चाय कुछ तो बोलो
कोई दवाई कोई सिरप
क्या है भाई

इस अधखुले मुंह में
किसका कौर चाहिए भाई
अम्मा का कौर बुआ का कौर
कि चंदा मामा का कौर

मेरा भी कौर ले लो भाई
ये मेरा सोहन हलवा मेरी जलेबी
ये दो पैसे की आइसक्रीम
गंगाजल चाहिए भाई

ये सब कुछ नहीं चाहिए
तो बताओ भाई होंठ हिलाओ
बोलो तो क्या बचा रह गया है
अभी कहने से कंठ में

मुझे डांटना चाहते हो भाई
लो तुम्हारे सामने हूं डांट लो
प्यार कहना चाहते हो चूम लो
आशीष देना है सिर पर हाथ रख दो

जाते जाते बचपन की तरह
मेरा ऐसा इम्तहान न लो भाई
कि फेल हो जाऊं अम्मा से डांट खाऊं
अधखुले मुंह से कुछ तो बोलो भाई।

(4)
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मेरे भाई जल रहे हैं
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मेरे भाई
मेरी आंखों के सामने
जल रहे हैं

मैं चिता से
विनती करता हूं
हे चिता मद्धिम जलो

भाई
जैसे जैसे जल रहे होंगे
वैसे वैसे धिक रहे होंगे

हे अग्नि शीश नवाता हूं
भाई की आंखों के सपने
और प्यार मेरे लिए छोड़ देना

भाई का हदय
बहुत कोमल है फूल से भी
ज्यादा कोमल उसे छूना मत

हे अग्नि भाई का दिल
जिसमें मेरे लिए प्यार का सागर है
मेरी अंजुरी में लौटा देना

हे अग्नि दया करना
मेरे अति निश्छल निष्कलुष
गैर दुनियादार भाई पर

कैसे चिता पर भाई
धू-धू कर जल रहे है
रुई के फाहे की तरह

भाई जाते-जाते
एक बार फिर मेरे सामने
कौतुक कर रहे हैं

मैं रो रहा हूं बचपन की तरह
भाई के सताने पर
मार दूंगा भाई

अपने भाई के लिए मुझे
इस तरह कोने में टूटकर रोते हुए
देखकर

भाई की चिता के बिल्कुल पास
मेरी आत्मा छाती पीट-पीटकर
रो रही है विलाप कर रही है

हाय
मेरे भाई जल रहे हैं।

(5)
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लौट आओ भाई
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भाई के पास
पैसे बहुत कम थे
मेरे पास उनसे काफी ज्यादा पैसे थे
ऐसा नहीं होना चाहिए था

मेरे भाई
मुझसे कम योग्य नहीं थे
बस सफलताएं उनके हाथ से
फिसल जाया करती थीं

भाई पैदल चलते थे
मैं उनसे मिलने कार से जाता था
भाई को मुझसे कोई ईर्ष्या नहीं थी
वे तो मेरे लिए आशीर्वाद लुटाते थे

भाइयों के इस बुरे समय में
ऐसे भाई शायद और भी होते होंगे
पर भाई को देखने की मेरी आंख
औरों की तरह नहीं है

मैं जब भी भाई को देखता हूं
भाई की चिट्ठियां देखता हूं
बाहर की आंख से नहीं भीतर से
देखता रह जाता हूं

भाई की लिखावट में
भाई की उंगलियां देखता हूं
चूमता जाता हूं

एक-एक शब्द में
भाई का चित्र देखता हूं
छूता हूं पुकारता हूं
लौट आओ भाई।




                                                                                                              


सोमवार, 21 अक्तूबर 2019

भाई बीमार हैं

भाई बीमार हैं
अस्सी के पास पहुंचकर
सौ पार लग रहे हैं भाई

भाई बीमार हैं
बिस्तर पर लेटे लेटे भाई
कहते हैं बहुत लाचार हैं

ये मेरे कान नहीं सुन रहे हैं
आंखें सुन रही हैं बोल रही हैं
आप लोग तो जानते ही हैं
कि आंखों की भाषा
कितनी तरल होती है
क्या क्या भिगो देती हैं

भाई बीमार हैं
मैं उन्हें लंबे समय के बाद
इतने करीब सै देख रहा हूं
आमने-सामने बैठकर

भाई बीमार हैं
भाई की आंखों में
बीता हुआ समय फिर से
बीतता हुआ देख रहा हूं

भाई बीमार हैं
मेरे सामने सहसा
भाई की आंखों की पुतली
खेल का मैदान बन जाती है
भाई को हाकी खेलते हुए
देख रहा हूं

भाई बीमार हैं
और भाई की कलाई का जादू 
फिर से चलते हुए देख रहा हूं
एक दो तीन चार लगातार
भाई को हाकी से गोल करते
देख रहा हूं और रोम रोम में
रोमांच से भर जा रहा हूं

भाई बीमार हैं
भाई की आंखों में
भाई की उंगली पकड़कर
खेल के मैदान से लौटते हुए
खुद को देख रहा हूं सोच रहा हूं

भाई बीमार हैं
काश भाई ने जिंदगी में भी
ऐसे ही लगातार गोल किए होते
तो इतना बीमार न हुए होते
इतनी बेकदरी न हुई होती

भाई बीमार हैं
भाई मेरे पास रहे होते
तो इतने बीमार न हुए होते
इतने उदास न होते
मेरे सहोदर मेरे सहचर होते

भाई बीमार हैं
मुझे भी अपने घर लौटना है
कुछ देर और ऐसे ही
बीमार भाई के सामने बैठा रहा
तो मैं पूरी तरह ढह जाऊंगा
और मुझे ढहता देख भाई
ढह जाएंगे।

- गणेश पाण्डेय