शनिवार, 6 मार्च 2021

एक बूढ़े की प्रेमकथा

- गणेश पाण्डेय

बुढ़ापे में
जब-जब थाली धुलता हूँ
तो देखता रहता हूँ उसमें
प्रियतमा का झिलमिल मुख

आटा गूँथता हूँ
तो लगता है किसी 
कमनीय देह को गूँथता हूँ
किसी की हथेलियाँ
मेरी हथेलियों से खेल रही हैं

रोटी बेलता हूँ
तो लोई बनाने से बेलने
और तवे पर रखने तक
किसी की चूड़ियाँ संग-संग
बजती हैं बजती रहती हैं

गर्म तवा
उँगलियों से छूभर जाए
तो लगता है कि किसी के
तप्त होंठ हैं
बेध्यानी में प्रायः छू जाता है

सब्जी काटता हूँ
तो अक्सर चाकू की धार से
छू जाती हैं उँगलियाँ
लगता है किसी की आँखों को
छू लिया है

जब 
रोटी और सब्जी
लेकर खाने बैठता हूँ
तो झर-झर बहने लगती हैं 
दो बूढ़ी आँखें
तुम्हे सामने देखकर

ऐसा क्यों होता है
मेरी परिणीता मेरी मीता
मेरी कुसुमलता 
चाहे जीवन में 
लाख बेकदरी की हो
अब तुम्हारे बिना एक पल
रहा नहीं जाता है

कब आओगी
अब जब भी आओगी
बर्तन मैं धुलूँगा रोटी मैं बनाऊँगा
तुम्हारी वेणी चाँदनी के फूलों से
मैं सजाऊँगा।











शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

सोने की चिड़िया तथा अन्य कविताएं

- गणेश पाण्डेय

सोने की चिड़िया
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यह 
इस देश की विशेषता है
इसे बुरे लोगों ने ही अच्छा बनाया है
अंग्रेजों ने कितना विकास किया
रेल छापाखाना टेलीफोन स्कूल कालेज
ओह तमाम नयी-नयी चीज़ें लेकर आए

उन बुरे लोगों के जाने के बाद
दूसरे लोग आए जो हमारे अपने थे
उनसे किसी भी मामले में कम न थे
बड़े-बड़े कल-कारखाने 
चौड़ी-चौड़ी सड़कें तमाम हवाईअड्डे
जमींदारी ख़त्म खेतों की हदबंदी
रुपया कमाने की कोई पाबंदी नहीं
और राममंदिर का ताला भी खुलवाया
ढहाने वालों ने गुम्बद भी ढ़हाया
हमारे अपने लोगों ने कितनी सुंदरता से
सरकार चलाया और किस सरकार ने
दंगा और क़त्लेआम नहीं कराया
विकास तो अंग्रेजों से कम नहीं हुआ

राजनीति में बुरे लोग नहीं होते
तो लोगों को न तन ढकने के लिए 
एक जोड़ा वस्त्र मिलता
न जीने के लिए मुट्ठीभर अन्न
यह सब इसी देश में संभव है 
कि बुरे लोगों से जनता किस तरह
अच्छा काम कराती है

बुरे लोग ही
इस देश को आगे और अच्छा बनाएंगे
बस इस सरकार के जाने की देर है
आने वाले प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री
इस देश और प्रदेश को 
सोने की चिड़िया बनाने के लिए
जादू की छड़ी लेकर तैयार बैठे हैं
वह सोने की चिड़िया 
कितनी ऊँचाई पर उड़ेगी
जनता के हाथ आएगी या नहीं
यह सब एक मामूली कवि
कैसे बता सकता है!

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पेशा
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जैसे 
दाएँ हाथ का अपना पेशा है
उसी तरह बाएँ हाथ का भी अपना पेशा है

राजनीति करने वाले ही नहीं
साहित्य में अनीति करने वाले भी
इसी पेशे में हैं।

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पार्टी
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ओह 
सिर्फ़ अमुक पार्टी बुरी है
चरित्रहीन है क्रूर है हत्यारी है
तो इसे इसके चुनने वालों समेत 
ले जाओ जंगल में छोड़ आओ
जाओ जल्दी करो मैं मना नहीं करता

अमुक पार्टी ही
सच्चरित्र है पवित्र है परोपकारी है 
जनतारिणी है मोक्षदायिनी है
ईश्वर की गोद से उतरी पार्टी है तो इसे
अगले चुनाव में सरकार में लाने के लिए 
रूठे हुए लोगों को जंगल से बुलाओ
गला फाड़- फाड़कर पुकारो-चिल्लाओ
उन्हें मनाओ न मानें 
तो उनकी मर्जी की पार्टी बनाओ
मैं भर्ती होने के लिए तैयार बैठा हूँ।

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राजनीतिक रोटियाँ
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किसी वयस्क लोकतंत्र में
कोई आंदोलन हो प्रदर्शन हो अनशन हो 
उसमें पूरी शुचिता तो होती ही होगी
भला किसी जन आन्दोलन में राजनीतिक पार्टियां 
अपनी रोटी क्यों सेंकना चाहेंगी
अपने महान भारत में तो
बिल्कुल नहीं!

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अकाट्य सत्य
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नहीं-नहीं 
न्याय मूल्य सिद्धांत आदर्श वगैरह की 
बात करने वाले बेईमान नहीं हो सकते हैं

यह हमारे समय का अकाट्य सत्य है
क्यों साहित्य-प्रवर विचार-श्रेष्ठ आचार्य
बोलो शिष्यो बोलो 
बोलो अनुकरणकर्ताओ

अलबत्ता हाँ-हाँ पक्का
बेईमान तो इन पर शक करने वाले होंगे
क्यों साहित्य-राजन!

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वैचारिक शत्रुता
-------------------
शत्रुता
और राजनीतिक विवेक में
क्या फ़र्क है जानते हो वत्स

विवेक 
किसी भी व्यक्ति और दल के
गुण-दोष की बिना किसी भेदभाव के
पहचान करता है

इन्हें देखो 
शूकर नहीं हमारे समय के लेखक हैं
वैचारिक शत्रुता में कर क्या रहे हैं
शत्रु के नाश के लिए गंदा खा रहे हैं।


.........................................................................
ऐतिहासिक विदाई
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राजनीति
और साहित्य से
आदर्शों की विदाई

कब से शुरू हुई
और कब पूरी हुई
प्रक्रिया

कुछ याद है आपको
आचार्यप्रवर विचारप्रमुख
साहित्य-राजन!

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हमारे बच्चे
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महान विचार भी
आदर्शों की शवयात्रा में
अपने कंधे सौंप चुके हैं

अब ये
अपने हथियार 
और अपने विचारों का बोझ
रखेंगे कहाँ

बेचारे विचार
धूल में मिल जाएंगे
ऐसे खो जाएंगे कि फिर

सदियाँ ढूँढती रह जाएंगी
हमारी पीढियां हमारी नस्लें
ओह हमारे बच्चे कैसे जिएंगे।

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भय 
-----
ओह
इतना भय तो
मृत्युदण्ड में भी नहीं होता होगा

जितना
आज हिन्दी के लेखकों में है
वे अपनी मर्जी का लघुकार्य भी
नहीं कर सकते हैं

अपनी मर्जी का
लिखना और बोलना तो दूर
वे धारा के विरुद्ध छींक तक नहीं सकते हैं

जनमुक्ति का भार
और विचार का प्रभार
इन्हीं के सिर पर है 

ये पैदा हुए ही हैं
एक सुरक्षित और जोखिममुक्त 
गिरोह में रहने के लिए

ये देश के लिए जीने की
बात तो करते हैं लेकिन जी नहीं पाते हैं
इनके भय का नगाड़ा इनके पिछवाड़े 
बजता रहता है बजता ही रहता है।

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हाथी के पैरों से कुचल दी जाएंगी
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मेरे
राजनीतिक विचार
अपने समय के लेखकों से
रत्तीभर भी मेल नहीं खाते हैं

शायद
उन्हें भय है कि विचार की जगह
विवेक चुनेंगे तो उनके भविष्य को
गोली मार दी जाएगी

उन्हें भय है
कि उनकी कविताएँ
अपने समय के आलोचकों के
हाथी जैसे पैरों से कुचल दी जाएंगी

भला ऐसे लेखकों के विचारों से
किसी स्वाधीन लेखक के विचार
कैसे मेल खा सकते हैं।







बुधवार, 18 नवंबर 2020

दीया

- गणेश पाण्डेय

पहला दीया
उनके लिए जो देख नहीं पाते
दूसरा उनके लिए जो दीया को दीया कह नहीं पाते
तीसरा उनके लिए जो दीया की कोई बात सुन नहीं पाते

एक दीया हिंदी के उन भयभीत दोस्तों के नाम 
जिन्होंने मुझे चींटी की मुंडी के बराबर दोस्ती के लायक़ नहीं समझा

हिंदी के उन दुश्मनों के नाम भी कुछ दीये ठीक उनकी अक़्ल के पिछवाड़े
जिन्होंने हमेशा चूहे की पीठ पर बैठकर शेर की पूँछ मरोड़ने की ज़िद की

ये दीये उन तमाम अदेख दोस्तों की नम आँखों के नाम 
इस वर्ष हारी-बीमारी और हादसों में छोड़ गये जिनके प्रिय और बुज़ुर्गवार
चाहे मारे गये मोर्चे पर जिनके बेटे
पति और पिता और गाँव के गौरव

पृथ्वी की समूची मिट्टी और आँसुओं से बने ये दीये
क्यों नहीं मिटा पाते हैं, सदियों से बढ़ता ही जाता अँधेरे का डर

एक थरथराती हुई स्त्री के जीवन में 
क्यों नहीं ला पाते हैं जरा-सा रोशनी
ये दीये क्यों नहीं जला पाते हैं 
हत्यारों का मुँह उनके हाथ 
और लपलपाती हुई जीभ

ये दीये उम्मीद के सही, हार के नहीं
ये दीये बारूद के न सही, प्यार के सही
ये दीये क्रांति के न सही, प्रतीक सही
दोस्तो फिर भी जलाता रहूँगा 
ऐसे ही ये दीये कविता के दोस्त सही
इनकी लौ में है पलभर में 
हमारी आत्मा को जगाने की शक्ति 

देखो अरण्य के समीप 
ग़रीब-गुरबा की बस्ती में जलते दीये
कैसे काटता है एक नौजवान टाँगे से जलौनी लकड़ी
कैसे इनकी रोशनी में डालती है एक माँ बच्चे के मुख में कौर

कैसे कनखियों से देखती है एक युवा स्त्री 
अपने पति के शरीर की मछलियों को उसकी वज्र जैसी छाती

पैसे की मार से 
दुखी लोगों के लिए कुछ दीये
उस बाप की ड्योढ़ी पर एक दीया 
जिसे बेटियों की फीस की चिंता है

जलायें न जलायें 
चाहे बड़े शौक से भाड़ में जायें
उन आलोचकों के लिए भी कविता के छोटी जाति के कुम्हारों के बनाये कुछ दीये
जिनके घर मुफ़्त पहुँचायी गयी हैं गाड़ियों में भरकर बिजली की विदेशी झालरें

विश्वविद्यालयों, अकादमियों, संस्थानों, अख़बारों, पत्रिकाओं, प्रकाशकों 
और हिन्दी के बाक़ी दफ़्तरों में 
एक-एक दीया ज़बरदस्त

हिन्दी की उन्नति के नाम पर 
उसकी किडनी बेचकर मलाई काटने वाले 
हज़ारों हरामज़ादों के लिए भी

हिन्दी के जालसाज़ों के छल में 
फँसे हुए बच्चों के लिखने की मेज पर
जीवनभर जलने वाला कविता का 
यह दीया ख़ास

हिन्दी बोलने वाले 
विपन्न बच्चों के लिए उम्मीद का एक दीया
इस साल वे भी बने कलक्टर चाहे कमाएं दो पैसा

हिन्दी बोलने वाले बच्चे पैदा करने वाली माँ के बिना चप्पल के पैरों के पास
मेरी, तेरी, उसकी, सबकी गुज़र गयी 
माँ की ज़िदा याद के पैरों के पास
चाँदी की पायल की जगह 
एक ग़रीब कवि की ओर से 
मिट्टी का यह दीया।


      




   


                                                                   - गणेश पाण्डेय

बुधवार, 28 अक्तूबर 2020

भारतीय सास तथा अन्य कविताएं

(शृंखला)

- गणेश पाण्डेय

1
-----------------
भारतीय सास
-----------------

वह औरत
औरत नहीं है सास है
सास रहते हुए भी वह औरत
औरत रह सकती थी
ऐसा हुआ होता तो वह औरत
अपनी बहू की माँ हो सकती थी

औरत तो औरत होती है
माँ भी होती है सास भी होती है
जब कोई औरत कम औरत होती है
तो माँ भी कम होती है और सास भी
कठोर

माँ जन्म देती है
सास बहू को जन्म नहीं देती है
लेकिन सास अच्छी हो तो बहू को
सिर्फ़ अपना बेटा ही नहीं नित आशीष
अपनी गोद और अपना आँचल भी
ज़रूर देती है 

कम औरत 
जब कठकरेजी सास होती है
तो बहू की हारी-बीमारी चाहे जच्चगी में
उसके लिए आये दूध और फल
तीन चौथाई ख़ुद गटक जाती है
बेटे के सामने आदर्श सास बनकर
बहू को सेब काटकर देने का 
नाटक करती है
बेटे के बाहर जाने पर पूछती भी नहीं
बहू जी रही हो कि मर रही हो

ओह सासें भी
तरह-तरह की होती हैं
कुछ तो मोरनी जैसी होती हैं
नाचती रहती हैं नाचती रहती हैं
बहुओं के सिर पर
कुछ फ़िल्म की हीरोइनों की तरह
हरदम बनी-ठनी गोया बहू के संग
सौंदर्य प्रतियोगिता में भाग लेना हो
कुछ तो बिल्कुल सौत की तरह होती हैं
पत्लू से बाँधकर रखती हैं बेटे को
बहू को उसके साथ अकेले
कहीं जाने ही नहीं देतीं
और चला जाए तो दम पर दम
फोन करती रहती हैं
इंग्लिश मीडियम की सास होती हैं
वर्चस्व तनिक भी कम न होने पाए
कुछ नहीं तो फोन से ही बहू के रंग में
कुछ तो भंग पड़ जाए
ऐसी सासें प्रेम और प्रेमविवाह
दोनों की पैदाइशी शत्रु होती हैं
निन्यानबे फ़ीसद 
प्रेमविवाह की विफलता का मुकुट
इन्हीं के सिर पर सजता है
वैसे भारतीय सासों में
हिंदी मीडियम की सासों को भी
भोजपुरी और अवधी में
आते देर नहीं लगती है
जैसे हिंदी का सारा व्यंग्य बाण
इन्हीं के मुखारविंद से पैदा हुआ हो
इन्हें बेटे का घर बसे रहने में नहीं
बहू का घर उजड़ने में ख़ुशी होती है

भारतीय सासों के जंगल में टीवी पर
अशक्त सासों के पीटे जाने की ख़बरें
अब बिल्कुल विचलित नहीं करतीं
लगता है कि ज़रूर इसने कभी
अपनी बहू को ख़ूब सताया होगा
असल में इस देश में 
सासों की क्रूरता का लंबा इतिहास है
लोकगीतों और लोककथाओं में ही नहीं
हमारे समय में भी ऐसी सासें
अपनी-अपनी पारी खेल रही हैं
और अपने माँ-बाप से दूर बेटियाँ
पिस रही हैं रो रही हैं
रोज़ डर रही हैं
और ऐसी बदनसीब बेटियों के माँ-बाप
फोन की घंटी से भयभीत हो जाते हैं
राम जाने आज क्या किया होगा
डायन ने मेरी बच्ची के साथ

उफ़
वह औरत 
जो तनिक भी औरत नहीं है
न सिर्फ़ भारत की बल्कि
पृथ्वी की सबसे भयानक सास है
वह ज़रा-सा भी औरत होती
तो अपनी बहू को बेटी न भी समझती
तो कम से कम अपनी बहू तो 
समझती ही समझती
इस तरह किसी विदीर्णहृदय 
सुदूर निरुपाय पिता की बेटी को 
दासी न समझती वह भी समझ लेती
तो भी स्त्री तो समझती
अपने चरणों की धूल न समझती

ऐसी बहुओं के जीवन में
तिरस्कार के सिवा कुछ नहीं होता है
न प्यार न सुख न साज-सिंगार 
जिनके पति कान के कच्चे होते हैं
और जिनके लिए माँ की हर बात
पत्थर की लकीर होती है

सभी बेटे ऐसे नहीं होते हैं
तमाम बेटे माँ-बाप की भी आलोचना
ख़ूब करते हैं उनसे बहस करते हैं
उनकी कमियाँ बताते हैं
जिनके पति ऐसे नहीं होते हैं
जिनके पिता प्रभावशाली नहीं होते हैं
और जो कमज़ोर घरों से आती हैं
उन बहुओं का भाग्य ऐसी ज़ालिम सासें
अपने बाएँ पैर के अँगूठे से लिखती हैं।

2
--------------
राग दौहित्री
--------------

सद्यःप्रसूता
बेटी के कंधे पर 
उसकी नवजात आत्मजा
कोमलांगी अति गौरांगी
जैसे शस्यधरा के कंधे पर 
नयी-नयी बनी नन्ही पृथ्वी
यह सब देखना 
सबको नसीब नहीं होता

बोलती हुई पृथ्वी की आँखों से
निःशब्द सुनते चले जाना
ब्रह्मांड के अख़ीर तक
और फिर वापस लौट आना
बोलती हुई आँख की पुतली में
उसी में समा जाना
नाना नाना नाना
और कोई शब्द नहीं

उसकी एक नन्ही पंखुड़ी जैसी
स्मिति में ग़ुम हो जाना क्या होता है
सब कहाँ जान पाते हैं कहाँ छू पाते हैं 
अपने जीवन में इतना कुछ
इसके आगे निस्सार है 
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री का पद
चाहो तो प्रधानमंत्री जी से पूछ लो 
चाहे मुख्यमंत्री जी से पूछ लो
ईश्वर जिससे प्रसन्न होते हैं 
उसे यह नयी दुनिया दिखाते हैं
उसे सचमुच का मनुष्य बना देते हैं

बाक़ी आज की राजनीति क्या है
और साहित्य तो कुछ है ही नहीं
जो है सब एक गोरखधंधा है

मेरे लिए आज
मेरी बेटी की बेटी सबकुछ है
मेरी बेटी की आकृति है छवि है
उसकी रूह है उसकी आवाज़ है
मेरे कानों में मेरी आँखों में
मेरे घर के हर हिस्से में
आँगन में छत पर अहर्निश 
बजती हुई यह नन्ही-सी 
मद्धिम-सी प्यारी-सी आवाज़ 
मेरे जीवन के पुराने संतूर पर 
नई सुबह का एक राग है
राग दौहित्री।

3
---------
मायका
---------

बेटी 
आज मायके में आयी है
माँ को उसकी नवासी सौंपकर
तीसरे पहर से सो रही है जैसे
युगों की नींद लेकर आयी हो

रात हो गयी है 
ज़्यादा रात हो गयी है
पिता को न भूख लगती है न प्यास
बेटी जगेगी तो पहले उससे करेंगे बात
फिर कहीं करेंगे अन्न-जल ग्रहण

बहन को 
भांजी समेत लेकर लौटा भाई
बैठक में पिता को बताता है 
कैसे-कैसे सताया गया है बहन को

और 
कैसा सलूक किया गया है 
कुछ दिनों पहले पैदा हुई 
भांजी से

भाई 
भींचता है मुट्ठियाँ
पिता की आँखें डबडबाती हैं
फटा जाता है कलेजा

माँ
नवासी को बैठक में लाती है
नाना की गोद में रख देती है
नवासी नाना को देख मुस्काती है
नाना फिर से जी उठते हैं।

4
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दहेज में हिमालय
--------------------

माँओ
तुम्हारी बेटियाँ
डलिया-मौनी बनाना न सीखें
चादर और तकिए पर कढ़ाई न सीखें
अनेक प्रकार के व्यंजन बनाना न सीखें
भरतनाट्यम चाहे सुमधुर गायन न सीखें
तो तनिक भी अफ़सोस मत करना

माँओ
अपनी बेटियों को विदा करने से पहले
उन्हें बहुत पौष्टिक चीज़े खिलाना
जितना दूध बेटे को देना उससे ज़्यादा उन्हें
उनके हाथ-पाँव हाकी की तरह ख़ूब
मज़बूत करना सिर्फ़ खेलने के लिए नहीं
बड़ी से बड़ी मुसीबत से पार पाने के लिए 

माँओ
तुम्हारी बेटियाँ
सजने-सँवरने में मन न लगाएं
क्रीम-पावडर होंठ लाली न लगाएँ
तो उन्हें सुंदर दिखने का ज्ञान
मत देने बैठ जाना

माँओ
तुम्हारी बेटियाँ
पढ़ने में मन न लगाएँ तो उनकी
चुटिया कसके ज़रूर खींचना
गदेली से उनके गाल पूरा लाल कर देना
हेडमास्टर से अधिक सख़्ती करना

माँओ
दहेज जुटाने में अक़्ल से काम लेना
ऐसी चीज़ें देना जिसे आग जला न सके
पानी गला न सके चोर चुरा न सके
और शत्रु जिस पर विजय न पा सके
प्रतिभा और योग्यता का ऐसा हिमालय
बेटियों के ससुराल को भेंट करना
जिसे वे तोड़ न सकें।

5
---------
कारागृह
---------

बिटिया
आदमियों के इस जंगल में
अकेले जीना चाहे बच्चे को पालना
थोड़ा मुश्किल ज़रूर है
नामुमकिन नहीं

तुम्हारा पति 
तुम्हें महत्वहीन समझे
घर को सिर्फ़ अपना समझे तुम्हारा नहीं
सारे फ़ैसले ख़ुद करे तुम्हें पूछे तक नहीं
तुम्हारा पैसा तुमसे छीन ले

तुम्हारा शौहर कहे
कि सास-ससुर से पूछे बिना
तुम अपने मायके नहीं जा सकती
तो समझ लो कि तुम एक जेल में हो
तुम्हारा पति प्रेमी नहीं एक जेलर है
और तुम उम्रक़ैद की सज़ा भुगत रही हो

बिटिया
भगवान न करे 
कि ऐसा कुछ किसी के जीवन में घटे
लेकिन ऐसा कुछ हो ही तो डरना मत
अपने माँ-बाप से एक-एक बात करना
भाई से कहना ये सब तुम्हारे साथ होंगे

बिटिया
इस सामाजिक कारागृह के 
सींखचों को तोड़ना ही होगा
ऊँची चहारदीवारी को ढहाना ही होगा
तुम्हें बाहर खुली हवा में साँस लेना होगा
तुम्हें जीना होगा बिटिया अपने लिए
अपने बच्चों के लिए।

6
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बहू का तराना
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सास जी सास जी 
ऐसा ना सोचें आप जी 
केवल लड़कों के होते हैं 
मां बाप जी

सास जी सास जी
लड़कियों के भी होते हैं मां बाप जी 
ऐसा नहीं समझेंगी तो फूंक दूंगी
सास जी

सास जी सास जी
पैर से मसलने की सासगीरी छोड़कर
माँ बन जाएंगी तो भला करेंगे
राम जी

सास जी सास जी
आप भी बहू थीं यह भूल जाएंगी
तो चक्कू मारूंगी हंसिए से काटूंगी
सास जी

सास जी सास जी
पढ़-लिखकर दिमाग में गोबर भर लेंगी 
तो सबके सामने इज्जत उतार दूँगी 
सास जी

सास जी सास जी
रूल नहीं करेंगी डायन नहीं बनेंगी 
राम भजेंगी तो पूजा करूँगी आपकी
सास जी।

7
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यहाँ सब तुम्हारा है
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हे बेटी
ससुराल में
कोई बड़ा-बुज़ुर्ग
कुछ समझाए चाहे सिखाए
तो उसे सिर माथे लगाना

कोई ऐसा 
आदरणीय बुज़ुर्ग
अकारण डाँटने-फटकारने लगे 
चाहे बात-बात पर अपमानित करे
चाहे नीचा दिखाए चाहे ताने दे
किसी बेजा चीज़ के लिए
मज़बूर करे
तो उसका आदर-फादर 
एक झटके में नोचकर फेंक देना

और पहली ट्रेन से
चाहे पहली जहाज से उड़कर
अपने घर लौट आना

यहां 
तुम्हारा घोंसला 
उसका एक-एक तिनका
बिल्कुल वैसे का वैसा है
तुम्हारा कमरा 
तुम्हारी आलमारी
तुम्हारी मेज तुम्हारी किताबें
तुम्हारा गुलदस्ता तुम्हारी पेंटिंग
सब जस का तस हैं
तुम्हारी माँ तुम्हारी बहन
तुम्हारे पिता तुम्हारे भाई का
दिल कलेजा कंधा और बाहें
सब वही हैं

यहाँ क्या है जो तुम्हारा नहीं है
धरती और आसमान
सब तुम्हारा है।

8
---------------
बहादुर बेटी
---------------

हे बेटी
कभी कोई 
तुम्हारी बेटी का
बुरा चाहे तो
घूँघट फेंककर
शेरनी बन जाना

उसे 
चीर-फाड़ देना
उसकी बोटी-बोटी
चबा जाना

थाना-पुलिस कचहरी
जो होगा सब देख लूँगा
मेरी बहादुर बेटी।

9
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सुख
-----

बेटी 
तुम्हारी कलाई में 
यह सुनहला कंगन
बहुत अच्छा लगता है

तुम्हारे सुंदर गले में 
यह बड़ा-सा मंगलसूत्र
और भी अच्छा लगता है

तुम्हारी आँखों की अपूर्व चमक
दमकते हुए ललाट पर सुर्ख़ बिंदी
और लाल-लाल होंठों पर लाल मुस्कान
ख़ूब अच्छी लगती है

तुम्हारी गोद में बेटी
खिल-खिल करती दौहित्री की
किलकारी सबसे अच्छी लगती है
सृष्टि की सबसे सुंदर कलाकारी लगती है

एक साधारण 
भारतीय पिता के लिए 
इस सुख से ज़्यादा अच्छा 
और क्या हो सकता है।









सोमवार, 28 सितंबर 2020

सोनू सूद

- गणेश पाण्डेय

प्रिय छेदी
इस देश को तुम्हारे जैसे
खलनायकों की ज़रूरत है

हालाँकि यूपी के
सुल्ताना डाकू की कहानी में
काफ़ी कुछ झोल है
लेकिन तुम्हारी कहानी तो
जीती-जागती हक़ीक़त है
तुम कोई लुटेरे नहीं हो
कि लूट के माल से भलाई करो
पसीना बहाते हो नक़ली हीरो से
मार खाते हो फिर पैसा कमाते हो

तुम भी चाहते तो एक कानी-कौड़ी
ग़रीब-गुरबा और ज़रूरतमंद पर 
अपने ही मुल्क़ में 
सबसे परेशानहाल
लोगों पर ख़र्च नहीं करते
सदी का महाखलनायक बनकर
अपनी आरामगाह में मुँह छिपाकर
सो रहे होते अपनी रातों की नींद
और दिन का सुकून बर्बाद नहीं करते

मैं तुम्हारे बारे में
और कुछ नहीं जानता
सिवाय इसके कि फ़र्श से अर्श पर
पहुँचने की कहानी तुम्हारी है
इस कहानी में ख़ास बात यह 
कि एक खलनायक की देह में
किसी हातिमताई की रूह 
आ जाती है और खलनायक से 
नायकों जैसे काम कराती है

एक खलनायक की सख़्त देह में
एक-एक हिस्से से तड़प उठती है
अपने लोगों के लिए झुक जाती है
आँखें डबडब हो जाती हैं

हाथ आगे बढ़ जाते हैं
पैर उसी ओर चल पड़ते हैं
जिधर लोग सिर्फ़ अपने पैरों पर
खड़े हैं बैठे हैं बच्चों को लाद रखा है
पत्नी सटकर खड़ी है 
टूटी-फूटी चीज़ों की पोटली
पैरों के सुख-दुख पूछ रही है

प्रिय छेदी
छेदी सिंह तुमने शेर की तरह
छलांग लगाई है आसमान में
किसी फ़िल्मी चमत्कार की तरह
रेल के डिब्बों में बसों में जहाज से
अपने देशवासियों को भेज रहे हो
मुश्किलों की सबसे लंबी घड़ी में
अपने घर

छेदी मैं नहीं जानता
कि तुमने सबसे कमज़ोर और उपेक्षित
लोगों में किसे देखा भारतमाता को देखा
कि अपनी माता और पिता 
और बीवी-बच्चों को देखा
कुछ तो तुमने अलग देखा
जो तुम्हारे समुदाय के लोगों ने नहीं देखा
तुम भी चाहते तो प्रधानमंत्री कोष में
कुछ करोड़ डालकर चैन की नींद सोते
तुमने अपनी नींदें क्यों ख़राब कीं
अपने बच्चों का वक़्त और प्यार
दूसरों के बच्चों को क्यों दिया

छेदी तुम्हारा पर्दे का नाम है
हालाँकि जीवन में तुमने आसमान में
छेद करने जैसा बड़ा काम किया है
पर्दे से जो कमाया मज़बूर लोगों पर
लुटाया सुल्ताना डाकू की तरह
हातिमताई जैसा कारनामा किया

तुमने अपने देश 
और अपनी मिट्टी के कर्ज़ का
मूलधन ही नहीं सूद भी लौटाया
मैं नहीं जानता कि तुम्हारे नाम में
यह सूद क्यों लगा हुआ है 
और तुम्हारा नाम सोनू जैसा 
बहुत प्यारा और घरेलू क्यों है

मैं मुंबई में 
लंबे समय से रहने वाले
हिंदी के कवियों की तरह रहता
तो कब को कोरोना पर अपनी
लंबी कविताओं के साथ तुम पर भी 
एक लंबी कविता लिख चुका होता
सोनू सूद

हिंदी में
फ़िल्मी हीरोइनों पर 
कविता लिखने का रिवाज़ है
मधुबाला से लेकर वहीदा रहमान तक
और वहीदा से माधुरी तक पर रीझकर
लिखते हुए कवियों और कथाकारों ने
अपनी क़लमें तोड़ दीं
ये पर्दे की चमक-दमक पर मुग्ध थे
मैं हिंदी के पर्दे और आसमान का नहीं
ज़मीन का आदमी हूँ मेरे बच्चे

जानते हो
छेदी नहीं-नहीं सोनू नहीं-नहीं दोनों
हिंदी में फ़िल्म वालों को सितारा कहते हैं
लेकिन सितारे 
सिर्फ़ आकाश पर नहीं होते
धरती पर भी होते हैं मिट्टी में लोटते हैं
लोकल ट्रेन में सफ़र करते हैं
अपनी लोकल आत्मा को
कभी नहीं बदलते हैं 

सितारों की दुनियाँ विचित्र है
पर्दे का खलनायक जीवन में
नायक हो सकता है
और नायक खलनायक
आए दिन ख़ुलासे होते हैं
मासूम और सुंदर नायिकाएं 
खलनायिका निकलती हैं
और अर्थपूर्ण फ़िल्म बनाने वाले चरित्रहीन
जब तक इनका सच सामने नहीं आता
इनका नायकत्व और महानायकत्व
चेहरे पर मेकअप की तरह सजा रहता है

सोनू 
चाहे पर्दे पर ऐसे ही आजीवन 
बड़े से बड़ा खलनायक बने रहना
जीवन में चाहे जितनी मुश्किल आए
चाहे जितने कमज़ोर क्षण आएं
अपने खलनायक को पर्दे से बाहर
न निकलने देना नहीं तो मेरी यह कविता
बहुत रोएगी इसके शब्द टूट-फूट जाएंगे
ऐसे ही जीवन में नायक बने रहना

जो सितारे
पैदा धरती पर होते हैं
और रहते हैं आसमानों में
ज़मीन के लोग उन्हें कभी भी
अपना नहीं समझते हैं
उनके बीवी-बच्चों को कभी इस तरह
दिल से दुआएं नहीं देते हैं
प्यार नहीं करते हैं

हाँ 
क्रिकेट के कुछ
भगवान की तरह
फ़िल्मों के भी कुछ 
नौटंकी भगवान होते हैं
ये अपनी मिट्टी अपने देश के कर्ज़ का
न मूलधन चुका पाते हैं न सूद
सब तुम्हारी तरह कहाँ हो पाते हैं
सोनू सूद।







पत्र

 प्रियवर गणेश पांडे जी,

कुशल से होंगे। हालांकि यह कहना भी अब मात्र एक औपचारिक मुहावरा बनकर रह गया है। जो भी व्यथित और जरा भी संवेदनशील है, वह बाहर से भले ही सकुशल दिखे, मन से तो हमेशा बेचैन और द्वंद्वग्रस्त ही रहता है। स्थितियां ही कुछ ऐसी हैं। जो दुनियादार हैं, वे स्थितियों में खुद को ढालकर अपने मन को समझा लेते हैं, अवसर के मुताबिक राह पकड़ लेते हैं। लेकिन जो स्थितियों की भयावहता, अमानवीयता, असहिष्णुता के बारे में सोचे बिना नहीं रह पाते-प्रायः उनकी नियति होती है - अकेलापन।

आपको वर्षों से लिखते-पढ़ते देख रहा हूं। इधर थोड़ा-बहुत ह्वाट्सएप, फेसबुक जैसे माध्यमों से थोड़ी-बहुत वाकफियत हो गयी है। फेसबुक पर भी आपकी चिंताओं से परिचित होता रहता हूं। आपकी चिंताओं में अपने को भी शामिल पाता हूं। अपने-अपने अकेलेपन के अंधेरे में, यह शामिल-पन का भाव कभी-कभी उम्मीद के जुगनुओं की तरह जग-मगा उठता है। कुछ साथी - कहीं भी हों, कितनी भी दूर- पर हैं तो, जो अब भी सोचने और महसूस करने की क्षमता बचाकर रखे हुए हैं। यह भी हम-आप जैसों के रचनात्मक सहारे के लिए कम बड़ी बात नहीं है।

आपने 2 अक्टूबर वाली पोस्ट में लिखा-‘ साहित्य में अंधेरा फैलाने वाले, आज गांधी पर प्रकाश डालेंगे!‘ यह विडम्बना यों तो मात्र साहित्य की नहीं, राजनीति-समाज-चिंतन वगैरह सभी क्षेत्रों की है, लेकिन आपने साहित्य का उल्लेख किया तो इसका मर्म मैं समझ सकता हूं। निराला ने ‘सरोज-स्मृति‘ में लिखा- ‘ मैं कवि हूं, पाया है प्रकाश! ‘ यह कोई व्यक्तिगत दंभ नहीं था। यह कवि होने या साहित्यकार होने की सबसे सारगर्भित परिभाषा थी। कवि होना गहरे अर्थो में ‘प्रकाश प्राप्त‘ होना है। प्रेमचंद ने भी राजनीति से नहीं, साहित्य से ही ज्यादा आशा की थी-‘साहित्य राजनीति के आगे-आगे चलने वाली मशाल है।‘ लेकिन आज ‘प्रकाश‘ और ‘मशाल‘ जैसे शब्दों को हमारे तथाकथित कवि और साहित्यकार ही अर्थहीन करते जा रहे हैं। राजनीति ने तो पहले ही इन शब्छों को मात्र चुनाव-चिह्न जैसा कुछ बनाकर रख दिया है। राजनीति में तो अंधेरा ही सर्वत्र अट्टहास कर रहा है। इस अट्टहास को ही प्रकाश की तरह बिखेरा जा रहा है। इस अट्टहास की चकाचौंध में प्रकाश का इतना भ्रम है कि आंखें चौंधियां जाती हैं। देखने की क्षमता ही जाती रहती है। और आपने इस विडम्बना की ओर ठीक ही इशारा किया है, गांधी के हवाले से। जिनको कुछ नहीं दिखता, वे ही सबकुछ देख लेने की डींग हांकते हैं। अंधता इतनी दंभी कि गांधी जैसा पुरुष-जो खुद अपनी आंखों से देखने पर विश्वास करता था, जिसने सत्य का प्रकाश पाने के लिए ‘सत्य का प्रयोग‘ करने की ठानी थी- उस पर अंधता प्रकाश डालने का दावा करती है।

मैंने कभी लिखा था,‘साहित्य एक प्रकार का रचनात्मक हठ है कि मनुष्य को सबसे पहले और सबसे आखिर तक सिर्फ मनुष्य के रूप में ही पहचाना जाए, न फरिश्ते के रूप में, न राक्षस के रूप में, न देवता के रूप में, न सिर्फ साधु या शैतान के रूप में।‘

गांधी को क्या मनुष्य के रूप में सचमुच हम अभी तक पहचान सके हैं? हमने मूर्तियां बना दीं, न्यायालयों और सरकारी दफ्तरों में उनके फोटो टांग दिए। इन सब रूपों में आज गांधी आज कितने दयनीय हो उठे हैं कि उन्हीं की फोटो के नीचे बैठे अधिकारीगण कैसे-कैसे स्वार्थ-लिप्सा भरे कारनामों को अंजाम दे रहे हैं।

गांधी को इस दयनीयता से क्या सिर्फ उन पर कविताएं लिखकर उबारा जा सकता है? है कोई ‘प्रकाश प्राप्त‘ कवि जो उनकी इस दयनीयता को सवमुच देख सके? महसूस कर सके? गांधी का अनुसरण करने-कराने का उपदेश देने वाले हर क्षेत्र में हैं। साहित्य में भी। पर गांधी बेचारे ऐसे अनुसरणकर्ताओं से बचने के लिए छिपते-छिपाते, टाट वाले बोरे में अपना चेहरा ढके चुपचाप मुकित्बोध की कविता में चले गए हैं।

सच पूछिए तो अब ‘अनुसरण‘ या ‘अनुयायी‘ जैसे शब्द पाखंड का पर्याय हो गए हैं। कोई किसी का अनुसरण नहीं करना करना चाहता है, सिर्फ अपने-आपके सिवा। अब अनुयायी होना नहीं, पिछलग्गू होना फिर भी कुछ अर्थवान शब्द है। पिछलग्गू ऐसे व्यक्तियों का, जो लाभ पहुंचाने की स्थिति में हों। थोड़ी ख्याति मिल जाए, पुरस्कार या उपाधि मिल जाय-बस इतना ही अभीष्ट है। आज के लेखक की महत्वाकांक्षाएं भी बड़ी क्षुद्र हैं। वह अपनी क्षुद्रता में अमर होना चाहता है।

ऐसी अमरता को हम-आप क्यों चाहें? क्योंकि हमारे लिए तो यह जीते जी मर जाने के समान है। ऐसे में तो अच्छा है, कबीर की तरह रहें-मेरो मन लागा ठाठ फकीरी में! हम साहित्य के फकीर बने रह सकें, यही कामना हमारे लिए ठीक है।

अभी इतना ही।

हां, इतना और कि ज्यादा शिकायती होने में वक्त जाया न करें। हर स्थिति में जितना रचनात्मक हो सकें, रहें।

आपकी सक्रियता और सार्थक चिंताओं में आपका सहभागी-

राजेंद्र कुमार


नोट : इलाहाबाद से वरिष्ठ लेखक राजेंद्र कुमार जी का  पत्र



रविवार, 27 सितंबर 2020

सोनू सूद

- गणेश पाण्डेय

प्रिय छेदी

इस देश को तुम्हारे जैसे

खलनायकों की ज़रूरत है


हालाँकि यूपी के

सुल्ताना डाकू की कहानी में

काफ़ी कुछ झोल है

लेकिन तुम्हारी कहानी तो

जीती-जागती हक़ीक़त है

तुम कोई लुटेरे नहीं हो

कि लूट के माल से भलाई करो

पसीना बहाते हो नक़ली हीरो से

मार खाते हो फिर पैसा कमाते हो


तुम भी चाहते तो एक कानी-कौड़ी

ग़रीब-गुरबा और ज़रूरतमंद पर 

अपने ही मुल्क़ में 

सबसे परेशानहाल

लोगों पर ख़र्च नहीं करते

सदी का महाखलनायक बनकर

अपनी आरामगाह में मुँह छिपाकर

सो रहे होते अपनी रातों की नींद

और दिन का सुकून बर्बाद नहीं करते


मैं तुम्हारे बारे में

और कुछ नहीं जानता

सिवाय इसके कि फ़र्श से अर्श पर

पहुँचने की कहानी तुम्हारी है

इस कहानी में ख़ास बात यह 

कि एक खलनायक की देह में

किसी हातिमताई की रूह 

आ जाती है और खलनायक से 

नायकों जैसे काम कराती है


एक खलनायक की सख़्त देह में

एक-एक हिस्से से तड़प उठती है

अपने लोगों के लिए झुक जाती है

आँखें डबडब हो जाती हैं


हाथ आगे बढ़ जाते हैं

पैर उसी ओर चल पड़ते हैं

जिधर लोग सिर्फ़ अपने पैरों पर

खड़े हैं बैठे हैं बच्चों को लाद रखा है

पत्नी सटकर खड़ी है 

टूटी-फूटी चीज़ों की पोटली

पैरों के सुख-दुख पूछ रही है


प्रिय छेदी

छेदी सिंह तुमने शेर की तरह

छलांग लगाई है आसमान में

किसी फ़िल्मी चमत्कार की तरह

रेल के डिब्बों में बसों में जहाज से

अपने देशवासियों को भेज रहे हो

मुश्किलों की सबसे लंबी घड़ी में

अपने घर


छेदी मैं नहीं जानता

कि तुमने सबसे कमज़ोर और उपेक्षित

लोगों में किसे देखा भारतमाता को देखा

कि अपनी माता और पिता 

और बीवी-बच्चों को देखा

कुछ तो तुमने अलग देखा

जो तुम्हारे समुदाय के लोगों ने नहीं देखा

तुम भी चाहते तो प्रधानमंत्री कोष में

कुछ करोड़ डालकर चैन की नींद सोते

तुमने अपनी नींदें क्यों ख़राब कीं

अपने बच्चों का वक़्त और प्यार

दूसरों के बच्चों को क्यों दिया


छेदी तुम्हारा पर्दे का नाम है

हालाँकि जीवन में तुमने आसमान में

छेद करने जैसा बड़ा काम किया है

पर्दे से जो कमाया मज़बूर लोगों पर

लुटाया सुल्ताना डाकू की तरह

हातिमताई जैसा कारनामा किया


तुमने अपने देश 

और अपनी मिट्टी के कर्ज़ का

मूलधन ही नहीं सूद भी लौटाया

मैं नहीं जानता कि तुम्हारे नाम में

यह सूद क्यों लगा हुआ है 

और तुम्हारा नाम सोनू जैसा 

बहुत प्यारा और घरेलू क्यों है


मैं मुंबई में 

लंबे समय से रहने वाले

हिंदी के कवियों की तरह रहता

तो कब को कोरोना पर अपनी

लंबी कविताओं के साथ तुम पर भी 

एक लंबी कविता लिख चुका होता

सोनू सूद


हिंदी में

फ़िल्मी हीरोइनों पर 

कविता लिखने का रिवाज़ है

मधुबाला से लेकर वहीदा रहमान तक

और वहीदा से माधुरी तक पर रीझकर

लिखते हुए कवियों और कथाकारों ने

अपनी क़लमें तोड़ दीं

ये पर्दे की चमक-दमक पर मुग्ध थे

मैं हिंदी के पर्दे और आसमान का नहीं

ज़मीन का आदमी हूँ मेरे बच्चे


जानते हो

छेदी नहीं-नहीं सोनू नहीं-नहीं दोनों

हिंदी में फ़िल्म वालों को सितारा कहते हैं

लेकिन सितारे 

सिर्फ़ आकाश पर नहीं होते

धरती पर भी होते हैं मिट्टी में लोटते हैं

लोकल ट्रेन में सफ़र करते हैं

अपनी लोकल आत्मा को

कभी नहीं बदलते हैं 


सितारों की दुनियाँ विचित्र है

पर्दे का खलनायक जीवन में

नायक हो सकता है

और नायक खलनायक

आए दिन ख़ुलासे होते हैं

मासूम और सुंदर नायिकाएं 

खलनायिका निकलती हैं

और अर्थपूर्ण फ़िल्म बनाने वाले चरित्रहीन

जब तक इनका सच सामने नहीं आता

इनका नायकत्व और महानायकत्व

चेहरे पर मेकअप की तरह सजा रहता है


सोनू 

चाहे पर्दे पर ऐसे ही आजीवन 

बड़े से बड़ा खलनायक बने रहना

जीवन में चाहे जितनी मुश्किल आए

चाहे जितने कमज़ोर क्षण आएं

अपने खलनायक को पर्दे से बाहर

न निकलने देना नहीं तो मेरी यह कविता

बहुत रोएगी इसके शब्द टूट-फूट जाएंगे

ऐसे ही जीवन में नायक बने रहना


जो सितारे

पैदा धरती पर होते हैं

और रहते हैं आसमानों में

ज़मीन के लोग उन्हें कभी भी

अपना नहीं समझते हैं

उनके बीवी-बच्चों को कभी इस तरह

दिल से दुआएं नहीं देते हैं

प्यार नहीं करते हैं


हाँ 

क्रिकेट के कुछ

भगवान की तरह

फ़िल्मों के भी कुछ 

नौटंकी भगवान होते हैं

ये अपनी मिट्टी अपने देश के कर्ज़ का

न मूलधन चुका पाते हैं न सूद

सब तुम्हारी तरह कहाँ हो पाते हैं

सोनू सूद।