सोमवार, 27 मार्च 2017

विचारधारा तथा अन्य कविताएं

-गणेश पाण्डेय

विचारधारा

विचारधारा
सोने की मुर्गी नहीं
मुर्गी का अंडा भी नहीं विचारधारा
बहुत सोचा-विचारा फिर पाया
कि पैंट, पाजामा या हॉफपैंट नहीं है विचारधारा
जवाहर जैकेट और गाँधी टोपी कुच्छ नहीं विचारधारा
चचा होते तो कहते आज खखारकर गला-
इक आग का दरिया
उनके लिए जो इसमें डूब-डूब जाना चाहते हैं
बुझने नहीं देना चाहते हैं जो इक आग
जिन लेखकों के लिए रसरंजन है विचारधारा
उनकी बात न करें जनाब वे पीकर मूत देते हैं बात-बात पर
गोरखपुर से लखनऊ तक और लखनऊ से दिल्ली तक
कहाँ-कहाँ नहीं है विचारधारा की सुपारी लेने और खाने वाले आलोचक
मेरी तो बात ही छोड़िये श्रीमान जी ऐसे लेखक से बेलेखक भला
जब धरी की धरी रह जाएगी सोने की यह दुनिया
क्या करूँगा नाम और इनाम लेकर
किसकी जेब में रखूँगा किसके डिब्बे में डालूँगा
मेरे लिए विचारधारा जब तक मेरे पास है शुद्ध हवा है
साफ पानी है
मेरा प्यार है मेरा घर-संसार है मेरे बेटें बेटियाँ मेरा अड़ोस-पड़ोस
और घड़कन है विचारधारा
इंकिलाब हो न हो जीने की ताकत है विचारधारा।



पुरस्कार

सोने का मृग देखा है कभी
सुना है कभी रामकथा में उसका जिक्र
राम के जीवन में एक सीता आती हैं
फिर एक स्वर्णमृग आता है
कथावाचक कहता है कि किसी राक्षस के छिपने के लिए
सोने से अच्छी जगह भला और कौन हो सकती है 
सीता के दुख के मूल में सोने का वही मृग था
जो राम की इच्छा में था
और जब मैंने कथावाचक महाशय से पूछा-
राम कथा रचने वाले कवियों के दुख का मूल क्या सोना नहीं
बोले कथावाचक, नहीं-नहीं श्रीमन् पहले की बात नहीं जानता पर आज
कवि के फँसने के लिए तो सोने की भी जरूरत नहीं
चाँदी-सादी तांबा-पीतल भी नहीं
वह तो चमड़े के एक चिथड़े पुरस्कार के लिए भी फँस सकता है
आप ही बताएँ कि हजार -पाँच सौ में कितना सोना मिलता है
कितना चाँदी
मैंने कहा-जी आप रामकथा कहें, कवि कथा मुझे कहने दें।
बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में और उसके बाद कवियों ने 
जहाँ-जहाँ और जिस-जिस सड़क पर लिखी थी कविता 
उसकी जगह लिख दिया पुरस्कार
और कहा-फर्क नहीं पड़ता 
कि मैं तुलसी या कि सूर या कि कबीर-सबीर का वंशज नहीं हूँ
कहा कि मैं कविता का डाकू हूँ कोई वाल्मीकि नहीं
और तुम कैसे अहमक हो
जो नहीं जानते जंगल और जेएनयू का फर्क
भाड़ में जायें तुम्हारे तुलसी के राम डूब मरें कबीर-सबीर के राम
उन सबसे सुखी अपने राम ये देखो ये सोने का है ये चाँदी का यह रहा नकदी
जिंदाबाद-जिंदाबाद पुरस्कृत कवि जिंदाबाद-जिंदाबाद।


अच्छाई 

अच्छाई का घर अच्छे-अच्छे विचारों के पिछवाड़े नहीं होता है
अच्छी से अच्छी किताबें हों मुफ्त में नहीं सिखाती हैं अच्छाई
अच्छाई आकाश से नहीं झरती है शरद पूर्णिमा की रात
अच्छाई शहर के किसी मँहगे मॉल में 
या गाँव की छोटी-सी दुकान में सस्ते में बिकने वाली चीज नहींे
अच्छाई कोई लैपटॉप नहीं जिसे बाँटती फिरें सरकारें
कोई भभूत नहीं है अच्छाई कोई प्रसाद नहीं 
जिसे हलवा-पूड़ी के बदले में दें धर्माचार्य
अच्छाई माँ-बाप से विरासत में मिलने वाली सम्पत्ति नहीं
खेत-खलिहान, मकान 
और कल-कारखाने में गड़ा हुआ धन नहीं है अच्छाई
पृथ्वी की सबसे सुंदर प्रेमिका की झील से भी गहरी आँखों में 
अच्छाई का बेशकीमती खजाना छिपा नहीं होता है
किसी मंदिर या मस्जिद की नींव में भी नहीं रखी गयी होती है अच्छाई
पूजा की ईंट की तरह
अच्छाई तो सिर्फ अपने खून-पसीने से कमाई जाती है दोस्तो।

बुराई

बुराई 
कोई मिठाई नहीं जो बिकती हो किसी मिष्ठान्न भण्डार पर
अखबार में छपी हुई कोई कविता भी नहीं जिसे पढें़ सब
वेद की कोई ऋचा भी नहीं बुराई
कोई इत्र नहीं है बुराई कोई सूट-बूट नहीं है बुराई
बड़े बजट की कोई लटके-झटके वाली फिल्म नहीं है बुराई
किसी स्कूल किसी कॉलेज की सर्टिफिकेट नहीं है बुराई
कद-काठी में कोई हेडमास्टर नहीं है बुराई
शक्ल-सूरत और शैतानी के मामले में
यूनिवर्सिटी के किसी एचओडी का थोबड़ा नहीं है बुराई
किसी खद्दर के सूत या सफेद रंग
या पार्टी के झण्डे-सण्डे की तरह दिखती नहीं है बुराई
बुराई किसी अदालत के हुक्म पर फाँसी का फंदा भी नहीं

बहुत सुंदर बहुत प्यारी बेसुध कर देने वाली
अपनी भुजाओं में कसकर हर लेती है प्राण
मुई छोटी से छोटी बुराई
मन के किसी तहखाने में होता है उसका राज
उसका तख्त और ताज 
जिसे एक कमजोर आदमी छिपकर पहनता है
और भेस बदलकर बाहर निकलता है
घड़ी-घड़ी बदलता रहता है अपना चेहरा
अपनी आँखें अपनी आवाज अपनी चाल
वह अपनी बुराई के बारे में एक शब्द भी नहीं बोलता है
और बुराई उसके बारे में कुछ नहीं छुपाती है।

(यात्रा 12 से)

मंगलवार, 14 मार्च 2017

यह कौन है जो हमें अच्छा करने से रोकता है

-गणेश पाण्डेय

मेरे गाँव से सिवान तक
उसके सिवान से उसके गाँव तक
दूर-दूर तक खेतों की छाती डबडब पानी से जुड़ाएगी नहीं 
चाहे उर्वरधरा की अनगिन दिनों की लंबी प्यास बुझेगी नहीं
जड़ों में पहुँचेगी नहीं गोबर की खाद चाहे यूरिया - स्यूरिया 
तो कैसे लहलहाएंगी फसलें 
कैसे झूमेंगी नाचेंगी गाएंगी धान की लंबी-लंबी बालियां छातियों से ऊँचीं
कैसे रास्ता रोक कर बाबूजी जी को बताएंगी अपनी बहादुरी के किस्से 
कैसे गेहूँ हाथ मिलाएगा छूकर स्कूल जाते बच्चों से एक-एक करके 
कुछ चीजें बहुत जरूरी होती हैं आदमी के जीने के लिए 
जैसे मजबूत से मजबूत फेफड़े के लिए मुट्ठीभर हवा 
अँजुरीभर मीठा पानी दो कौर दालभात 
औकातभर दवाएं
बस  
और क्या चाहिए किसी गरीब को जमाने से 
राजा-महाराजा से किसी मंत्री-संत्री से और क्या चाहिए
इतना भी नहीं देते तो किसलिए होते हैं राजा और महाराजा
अपना पेट भरने के लिए कि अपनी तिजोरी
राजा का बेटा खाए दूधभात 
हमारा एक मुट्ठी कोदो-साँवा
राजा के बेटे के लिए आकाशमार्ग 
हमारे बेटे के लिए लीक भी ठीक नहीं
धन्नासेठ की बीवी का जन्मदिन दो सौ करोड़ में
हमारी बीवी का कोई जन्मदिन ही नहीं
कौन हैं जो सच को चोर की तरह छिपाकर रखना चाहते हैं
ये लेखक, विद्वान, आचार्य और अखबारनवीस 
सब धन्नासेठ और राजा के पालतू इनामी कुत्ते
अक्सर किसी झूट्ठे को राजा-महाराजा बनाकर रखना चाहते हैं
हम क्यों देखते हैं दूसरों के मुखारविंद
यह कौन है जो हमारे भीतर छुपा है और हमें कुछ अच्छा करने से रोकता है
कोई लालच का पुतला है
कि कोई डर। 

(यात्रा 12)


रविवार, 5 मार्च 2017

बस यह जरा-सा बुरा वक्त है लड़ लूँ इससे

- गणेश पाण्डेय

कोई सेवक मुल्क लूटता है कोई सूबा और कोई शहर
कोई सोना लूटता है कोई हीरे-जवाहरात कोई कुछ 
मैं चाहता हूँ अपने पसीने की इतनी कीमत 
जिससे खरीद सकूँ अपने बच्चों के खाने-पीने और पहनने-ओढ़ने के लिए 
कुछ चीजें और थोड़ी-सी खुशियां 
इससे ज्यादा कामयाबी और नसीब नहीं चाहिए मुझे 
नहीं चाहिए मुझे दूसरे के मुँह का निवाला और दूसरे के हिस्से का प्यार 
नहीं चाहिए मुझे मेरे पड़ोसी के पैरों के नीचे की जमीन 
मुझे अपने छप्पर के लिए सिर्फ उसका हाथ चाहिए 
उसका साथ चाहिए 
नहीं चाहिए मुझे जरायम की काली दुनिया की अकूत कमाई 
अपनी गरीबी के उजाले में अपनी आत्मा को तृप्त करना आता है मुझे 
अपने बच्चों को अँधेरे के राक्षस से बचाना आता है मुझे 
उनकी आँखों में सच्चाई और संघर्ष के सपने बसाना आता है मुझे 
बस यह जरा-सा बुरा वक है लड़ लूँ इससे 
फिर कर लूँगा सब आता है मुझे 
बस यह जरा-सा बुरा है वक्त बिल्कुल जरा-सा 
और कितने हैं हमलोग इतने सारे लोग।

(यात्रा 12)






मारे जाने की असल वजह अच्छाई क्यों है

- गणेश पाण्डेय

यह बुराई 
नये जमाने की बुराई है जनाब 
बला की खूबसूरत देखिये तो
ताकत में बेजोड़ और उतनी ही मिलनसार और दिलकश
आसान और सस्ती इतनी कि जो चाहे उसकी हो जाए
रात-बिरात कहीं भी चली जाए किसी के संग 
क्या राजा की सभा क्या उसका रनिवास 
क्या ईश का मंदिर और क्या महंत का भुंइधरा 
क्या कचहरी क्या अस्पताल क्या अखबार का दफ्तर 
और क्या विश्वविद्यालय-सिद्यालय
हवा में मिली हुई खुशबू की तरह पसर जाए दसों दिशाओं में
सबके दरवाजे की सांकल बजाए
कहाँ कहाँ नहीं चली जाए
जिसके पास हो
समय का पारस हो
छू दे तो कुर्सी सोने की हो जाए
जेब में हो तो पलभर में दुनिया अपनी हो जाए
कवि की मुश्किल यह कि कहे तो क्या कहे
जिसके पास हो इस समय का महाकवि हो जाए
जादू है जादू छोटी से छोटी बुराई 

पहले जेब में छिपाकर रखते थे बुराई की चाँदी का एक रुपया
अब दिखाकर रखते हैं सिर पर उसका भारी-भरकम मुकुट
पहले अच्छाई सहज थी 
साँस की तरह आप से आप आती-जाती थी
अब बुराई की हल्दी बाँटी जाती है घर-घर
ऐसा क्यों है बाबा गोरख 
अच्छाई अति कठिन तप क्यों बुराई क्यों सरल अजपाजाप
राजनीति की संसद में पहुंचना सरल अति
अध्यात्म की ऊंचाई पर समाधि लेना अति कठिन
यह सोचकर डर लगता है कि ऐसे बुरे वक्त में 
जिन लोगों के पास सोने और चाँदी का चश्मा नहीं है 
ऐसे लोगों के मारे जाने की असल वजह भूख और बीमारी की जगह
अच्छाई क्यों है ?

(यात्रा 12)






शनिवार, 14 जनवरी 2017

जासूस छोड़ जाऊँगा

- गणेश पाण्डेय

छोड़कर जाऊँगा
तो अपने सबसे अच्छे जासूस छोड़ जाऊँगा हरामजादो
नाम और इनाम जैसी दो कौड़ी की चीजें होतीं
तो उन्हें भी अपनी लंगोट में छिपाकर नहीं ले जाता लो
अपनी बेशकीमती आँखें छोड़ जाऊँगा बिजली के खम्भे पर
लट्टू की तरह लटकाकर
यह देखने के लिए कि मेरे जाने बाद कब तक करते हैं साजिश
अपनी भाषा, अपने साहित्य और अपने उस समाज के खिलाफ
जिसने पैदा किया इतने अच्छे उन जैसे हिन्दी के हरामजादे
अपने कान छोड़ जाऊँगा चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस की छतरी पर
जहाँ से सुनायी देती रहेंगी चीखें, भिड़न्त और रोने की आवाजें
एक गरीब लेखक की कातर पुकार जरूर सुनायी देंगी
सुनायी देगा किसी के कत्ल के बाद कातिलों का अट्टहास

मैं नहीं चाहता कि मेरे बच्चे 
मेरे सबसे भेरोसेमंद जासूसों को भी मेरे साथ मेरी चिता पर जला दें
फालतू कागज-पत्तर चाहे कबाड़-सबाड़ समझकर

एक सेंकेंड के लिए भी बिना डरे और बिना रुके चलने वाली
सच और निडरता की सखी
अपनी सबसे प्यारी जुबान छोड़ जाऊँगा खून से तरबतर
पूरे शहर का चक्कर लगाते रहने के लिए दिनरात
अपना लहजा अपनी बारूद अपने विचार छोड़ जाऊँगा हरामजादो
हाँ अपने हाथ भी छोड़ जाऊँगा डालकर निकालने के लिए
आगे-पीछे छिपाकर रखे गये हजार-हजार के कड़क नोट
जो उन्हें मिलते ही रहते हैं हिंदी की किड़नी के धंधे में

मर रहा है हिन्दीप्रदेश ऐसे ही रहा तो एक दिन मर जाएगा
हिंदी के लाडलों का भविष्य
फिर भी नहीं मरेंगे हिंदी के ये खूँख्वार हत्यारे
जब तक नहीं मरेगा इनका डॉन
जब तक बमबारी नहीं होगी इनके ठिकानों पर
तब तक नहीं खिलेंगे इस अंचल में नन्हे-नन्हे चाँदनी के फूल
अचिरावती तब तक नहीं धुलेगी अपने मटमैले केश
तब तक नहीं तोड़ेगी अपने बेटों के लिए निर्जलाव्रत
तब तक नहीं बनेगा हिन्दी का बच्चा
देश के ताज और तख्त का वारिस
तब तक नहीं बनेगा फिर से हिंदी का बेटा
फटकार कर सच बोलने वाला नन्हा कबीर 

मेरे बेटो
मेरे मरने के बाद एक दिन ये भी मरेंगे
पर मेरी तरह कहाँ मरेंगे मृत्युशय्या पर अपनी ललकार के साथ
किसी गली में किसी श्वानमुद्रा में मरेंगे ये मुँहबाये।

(यात्रा 12 से)







रविवार, 11 दिसंबर 2016

पहाड़, च्यूँटे और बुरा वक्त

- गणेश पाण्डेय

यहां से वहां तक
और वहां से न जाने कहां तक पसरा हुआ यह पहाड़ 
जैसे प्रलय तक टस से मस नहीं होगा 
सदियों की मूसलाधार बरसात इसे बहाकर नहीं ले जा सकती है 
पृथ्वी की बडी से बडी आँधियाँ इसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगी 
जैसे इस सबसे ठोस और सबसे भारी महांधकार को 
अपनी गोद में लेकर बैठा है यह हत्यारा समय
जैसे अहर्निश अकाट्य अभेद्य और अजर-अमर बना रहेगा यह अंधेरा
जैसे सूर्य अपने सबसे अच्छे दिनों में भी
अपने वक्त के इस सबसे काले मेघों की सबसे मोटी दीवार में 
सुई की नोंक जितनी सुराख नहीं कर पाएगा 
चाहे यहां की सारी घड़ियां बताएंगी 
और सारे ज्योतिषी कहेंगे चाहे सारे मुर्गे-चूजे बाँग देंगे 
फिर भी अंधेरा इतना तीव्र होगा कि रोम रोम से दिखेगा 
असंख्यस्वप्नदर्शी और सबसे चमकीली आंखें 
सुबह की एक किरण नहीं देख पाएंगी
सबसे ज्यादा अँधेरा सबसे सफेद कपड़ों के पीछे होगा 
सबसे काला चेहरा सत्ता के असंख्य शीर्ष पर दिखेगा
होंगे ऐसे लोग भी जो दिनरात 
त्रिपुंड की शक्ल में अंधेरा ललाट पर लगाएंगे
ऐसे भी भला क्यों नहीं होंगे 
जो अंधेरे का पहाड़ अपनी काली दाढ़ी में छुपाएंगे
कुछ लोग अंधेरे के पहाड़ पर छत्र लगाकर पिकनिक मनाएंगे
कुछ लोग जगह-जगह रुपया छापने की मशीन लगाएंगे
कुछ लोग बड़े-बड़े व्याख्यान कक्षों में 
अंधेरे के दर्शन पर सवेतन प्रकाश डालेंगे
कुछ लोग पहाड़ के सौंदर्य पर कविताएं लिखेंगे
कुछ लोग पहाड़ की अकादमियों में मत्था टेकेंगे
कुछ लोग अखबार छापेंगे अंधेरे में पहाड़ को टो-टो कर
कुछ लोग पहाड़ की चोटी पर 
अपनी मृत आत्मा की सबसे ऊँची बोली लगवाएंगे
ये कुछ लोग होंगे सिर्फ कुछ लोग 
जो पृथ्वी के सबसे चतुर लोग होंगे
जो पहाड़ की गोद में सुख की नींद सोएंगे
और अँधेरे का यह सबसे बड़ा पहाड़ 
कमजोरों की छाती पर चाहे उनके शीश पर टिका रहेगा
युगों-युगों तक चाहे अनंतकाल
इसके नीचे असंख्य केंचुए और असंख्य च्यूंटे दबे होंगे सदियों से
बहुत से कीट-पतंग अपनी संततियों के लिए उठाये होंगे सिर पर
अंधेरे की यह असीम पर्वत-श्रृंखला
वही होंगे वही होंगे वही होंगे श्रीमान जी
जो अपने सिर से 
किसी दिन उठाकर फेंक देंगे अंधेरे का यह असह्यभार
वही होंगे जो अंधेरे के पहाड़ को 
ढ़हाएंगे आततायी के प्रासाद की तरह
वही होंगे जो अंधेरे की तोंद को फोड़ेंगे 
ब्रह्मांड के सबसे बड़े ग्रह के आकार के गुब्बारे की तरह
चाहे अपनी पृथ्वी पर हजार कोस लंबे फोड़े की तरह 
चीर देंगे खच्च से
एक कविता की कुछ जरूरी पंक्तियां है श्रीमान 
सच बिल्कुल नहीं
सच सिर्फ इतना है कि अंधेरे का यह पहाड़ ढ़हेगा नहीं
इस बुरे वक्त में
छोटे-मोटे भूकंप इसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे
और उतना ही सच यह भी है श्रीमान
कि ये केंचुए, ये च्यूंटे, ये कीट-पतंग मरेंगे नहीं
उनकी आंखों में फिर भी खदबदाता रहेगा कुछ
उनके दिमाग में होती रहेगी उथलपुथल।

(यात्रा 12)







शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

अथ आलोचक कथा

- गणेश पाण्डेय

शुभ्रवसना वीणा वादिनी ने पहले वीणा बजाकर
मुझे गहरी नींद में जगाया और सिरहाने आकर
मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए
मां की तरह मुस्कायीं

बहुत दिनों बाद सपने में मां आयी
पूछा- काहेक रोवत हौ के मारिस है
फिर मां ने ही कहा- तूडि देव ओकर हड्डी-पसली
उसके बाद मां अन्तर्धान हो गयी

और 
इस तरह कविताई करते हुए 
मैंने आलोचना की लाठी थामी 
और इस लाठी को
वंचित पीडित लेखकों की आवाज बनाया.

किसी के आलोचक बनने की 
इससे अच्छी कहानी और क्या हो सकती है
और कहानी भी ऐसी जो सिर्फ कहानी न हो.

कृपया उनसे कोई कहानी न पूछें
जिन्होंने अघाये हुए लेखकों के लिए
पूजा-पाठ चाहे लठैती की

जिनके जीवन में 
खुद की कोई कहानी नहीं थी
कोई वजह नहीं थी आलोचक बनने की
किसी तरह की बेहतरी का स्वप्न नहीं था
जिन्हें न तो बडे सुकुल जी बनना था
न छोटे सुकुल
जिन्हें बस ऐसे ही आलोचक बनना था
ममूली चीजों के लिए
बन गये।

(यात्रा 12)