शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

दोस्त सीरीज

- गणेश पाण्डेय

---------------
दोस्त 1/
अच्छी कीमत
----------------
जैसे
सबके पास होते हैं
मेरे पास भी कुछ दोस्त थे

मैं उन्हें खोना नहीं चाहता था
ये तो मेरे दुश्मन थे जिन्होंने
उन्हें चुटकी में खरीद लिया

ऐसा नहीं है
कि मेरे दोस्त बिकना नहीं चाहते थे
बस उन्हें अच्छी कीमत का इंतजार था।

---------
दोस्त 2/
बिकना
---------

सब
बिक जाते हैं

साथी दोस्त रिश्तेदार
कौन नहीं बिकता है आज
सब बिक जाते हैं

कोई बड़ा ओहदा हो
चाहे टेंट में खूब अशर्फियां
कौन नहीं बिक जाता है
सब बिक जाते हैं

माफ करें
मैं उन पागलों की बात नहीं करता
जो बिकने के लिए पैदा ही नहीं होते
फटीचर हैं कमबख्त

वर्ना कौन
बिकने के लिए पैदा नहीं होता
सब बिक जाते हैं।

------------
दोस्त 3/
पतंगबाज
------------

मेरे कुछ दोस्तों को
दिल्ली की हवा लग गयी है
वे कई साल उन्हीं हवाओं में रहे
कभी दाएं कभी बाएं डगमगाकर
संभाला है उन्होंने खुद को

उनके लिए साहित्य
शुद्ध शुभ-लाभ का जरिया है
नाम-इनाम की लंबी पतंग उड़ाना
उन्होंने उन्हीं हवाओं में सीखा है

दूसरे की पतंग काटना
और अपनी चढ़ाते चले जाना
अपनी तो अपनी
किसी मामूली उम्मीद में
दूसरे की पतंग दिनरात उड़ाना
यह सब उन्हें दिल्ली ने सिखाया है

दिल्ली की हवाओं ने उन्हें
एक मजबूत लेखक की जगह
शातिर पतंगबाज बना दिया है

आजकल
मेरे कुछ पतंगबाज दोस्त
अकादमी अध्यक्ष की
भैंस की सींग पर बैठकर
कुछ पीठ पर लेटकर
कुछ पूंछ पकड़कर
पतंग उड़ा रहे हैं।

---------------------------------
दोस्त 4/
कुछ दोस्त तो होने ही चाहिए
----------------------------------

एक आदमी के पास
कुछ दोस्त तो होने ही चाहिए
चाय पर साथ देने के लिए क्यों न हो

एक आदमी के पास
कुछ दोस्त तो होने ही चाहिए
कोई गम भूलने के लिए क्यों न हों

एक आदमी के पास
कुछ दोस्त तो होने ही चाहिए
किसी की बुराई करने के लिए क्यों न हों

एक आदमी के पास
कुछ दोस्त तो होने ही चाहिए
धोखा खाने के लिए ही क्यों न हों।

-----------------------------
दोस्त 5/
जब आप विद्रोह करते हैं
-----------------------------
जब आप 
साहित्य में विद्रोह करते हैं
तो अपने सभी ढिलपुक दोस्त
एक-एक करके खो देते हैं

ऐसे दोस्त
फोन पर भी कम मिलते हैं
करो तो बाथरूम चले जाते हैं
भूले-भटके मिल भी जाएं
तो खुलकर नहीं मिलते
जैसे मैला हो गया हो 
मन

ऐसे डरते हैं 
ऐसे दोस्त लोग डान से
जैसे उनके मोबाइल में 
जुबान के नीचे कान के अन्दर
बालों में बनियान के नीचे
छिपे हों असंख्य जासूस

कहीं दिख जाएं
सड़क पर औचक ऐसे दोस्त
तो साफ बचके निकल जाते हैं
जैसे उपग्रह से कोई देख न ले
और फैल न जाए हवाओं में
कोई बात।

-----------------------------
दोस्त 6/
बागी बनना खून में नहीं है
------------------------------
आप कवि हैं
और किसी कवि से 
पक्की दोस्ती चाहते हैं
तो उससे खराब कविताएं लिखिए
खराब नहीं लिख सकते तो 
अच्छी कविताएं छिपाकर रखिए
छिपा नहीं सकते तो उसके 
कोप के लिए तैयार रहिए

किसी आलोचक से
दोस्ती चाहते हैं तो औसत लिखिए
कोई किताब उससे पूछे बिना
मत छपवाइए
एक डग भी उससे आगे मत बढ़ाइए
किताब छपवाइए तो ध्यान रहे
ब्लर्ब उसी से लिखवाइए
ताकि वह कह सके कि उसने
अमुक कवि को पैदा किया है

दोस्ती-फोस्ती कुछ नहीं चाहते
और बागी बनना खून में नहीं है
सिर्फ सिर छिपाने की जगह चाहिए
चाहे कविता पाठ और लोकार्पण
पुरस्कार वगैरह साहित्य का उद्देश्य है
तो प्रलेस जलेस जसम-फसम 
किसी में चुपके से शामिल हो जाइए।

------------------
दोस्त 7/
दोस्ती में नुक्स
------------------

दोस्ती करके देख ली
दोस्ती जीकर देख ली

दोस्ती में कच्चा-पक्का होता है
दुश्मनी में जो होता है पक्का होता है

दुश्मनी में लड़ना है तो लड़ना है
दुश्मनी में हमेशा चौकन्ना रहना होता है

दोस्ती में नुक्स यह है
बिना आंख मूंदे हो नहीं सकती है

थक गया हूं दोस्ती का बोझ ढोते-ढोते
छोड़कर चले जाएं मुझे मेरे ऐसे दोस्त

ऐसी दोस्ती से
हजार गुना अच्छी है दुश्मनी।





मंगलवार, 7 अगस्त 2018

भारत माता की बेटियां

- गणेश पाण्डेय

कुशीनगर में
बुद्ध चिरनिद्रा में थे
और पावा नगर में महावीर
उन्हें किसी ने जगाकर बताया नहीं
कि मुजफ्फरपुर से देवरिया तक
और देवरिया से न जाने कहां-कहां तक
पहुंच गये हैं स्त्री-अस्मिता-भक्षी

बुद्ध को 
किसी ने नहीं बताया
कि ढ़ाई हजार साल बाद
गणतंत्र किन हाथों में आ गया है

जागेंगे बुद्ध
जागेंगे महावीर
तो क्या पूछेंगे नहीं 
कि यह कैसी आजादी है
आखिर यह कैसा विकास है
क्या यही है कल्याणकारी राज्य

सभ्यता 
और मनुष्यता में
छिड़ गयी है खूनी जंग
संस्कृति के निकल आए हैं नुकीले दांत
राजनीति के नाखून बहुत लंबे हो गये हैं
कांक्रीट और लोहे से बनी बस्ती
और हिंस्र पशुओं के जंगल में 
कम फर्क रह गया है

हर जगह 
बेखौफ विचरण कर रहा है
बूढ़े और जवान गिद्धों का झुंड
एक-एक को चुन-चुन कर खा रहा है
बालिका गृह की नवदेवियों की देह
और उनकी जीवित आत्मा

ये बेटियां
क्या भारत माता की बेटियां नहीं हैं
कोई दुर्गा है कोई लक्ष्मी कोई सरस्वती
कोई नूर कोई मरियम कोई मलका
अब और क्या प्रमाण चाहिए
इनके वुजूद का
आखिर सरकारें क्यों मान लेती हैं
इन्हें जीते जी मुर्दा 
कोई भी आए
नोच खाए

ऐसी
सरकारें 
जो बेटियों की लाज नहीं बचा सकतीं
खुद लाज से मर क्यों नहीं जातीं।





सोमवार, 30 जुलाई 2018

भीड़ तथा अन्य कविताएं

- गणेश पाण्डेय

----------
बेवकूफो
----------
तुम
इनाम से दूर
जिन्दा नहीं रह सकते हो
वे
कुर्सी के लिए
किसी की भी जान ले सकते हैं
बेवकूफो
तुम्हारी भी।
-----------------------------
तुम्हें शर्म क्यों नहीं आती
------------------------------
जिसे
तुम्हारा पाठक होना चाहिए था
देखो कैसे मारकाट कर रहा है
सड़क पर किस चीज के लिए
उसके हाथ में
तुम्हारी किताब होती
तो कितना अच्छा होता
लेकिन तुम्हें यह फिक्र क्यों नहीं है
जिसे
एक आदर्श नागरिक बनना था
जिसे क्रांति करना चाहिए था
तुम्हारी कविताएं पढ़कर
वह भी
आखिर तुम जैसा निकला
लालची चापलूस बिना रीढ़ का
सत्ता का मामूली पुर्जा
तुम्हें
शर्म क्यों नहीं आती
जन की चिंता क्यों नहीं करते
तुच्छ चीजों के लिए जीते हो
और आए दिन नाटक करते हो
प्रतिरोध का।
------
भीड़
------
पहले
हम कितने बड़े बेवकूफ थे
समझते थे कि भीड़ है तो आदमी
भीड़ में बिल्कुल सुरक्षित है
कहां चली गयी
वह प्यारी-सी सालों पुरानी बेवकूफी
जिसमें हमारे बच्चे सुरक्षित रहते थे
आखिर
अब आदमियों की भीड़ में
कैसे आ जाते हैं भेड़िए
कितना मुश्किल हो गया है
भीड़ के बीच से भीड़ के सामने से
भीड़ के पास से भीड़ के इलाके से
किसी भले आदमी और औरत
किसी बच्चे और बूढ़े का
गुजरना
और तो और
इस भीड़ में एक बकरी तक
सुरक्षित नहीं रह गयी है
यह कैसा विकासशील देश है
नहीं-नहीं
यह आदमियों की भीड़
नहीं हो सकती है
यह आदमियों के मुखौटे में
पशुओं की भीड़ हो सकती है
कैसे कह दूं कि इस मुल्क को
इस अतार्किक अवैज्ञानिक
अमानवीय असंवेदनशील
असभ्य अधर्मी
हिंसक भीड़ से कोई खतरा नहीं है!


शनिवार, 23 जून 2018

गाय पर तीन कविताएं

- गणेश पाण्डेय 
-----------------------------
मैं उस गाय को जानता हूं
------------------------------

मैं उस गाय को जानता हूं
जो मेरी मां की सखी थी
ठीक मेरी मां की तरह
गोरी और सीधी

मां जैसे ही 
उस गाय के पास 
छोटी-सी बाल्टी
चाहे भगोना लेकर पहुंचती थी

वह गाय 
जान जाती थी कि अब
सखी की छातियों से
दूध नहीं उतरता

गाय बोलती 
कि ले लो सखी जितना चाहो
अपने बड़कू और छोटकू के लिए
मौसी का दूध

मां
उसके लिए 
पुआ गुलगुला बखीर
सब लाती थी

मैं कई बार
अपनी दाल-भात की कटोरी
बछड़े के सामने रख देता

मैं बहुत छोटा था
मौसी को छूता था
चूमता था प्यार करता था
उसके बछड़े से 
पक्की दोस्ती हो गयी थी मेरी
मैं उसके संग खेलता था

मैं 
उस गाय को जानता हूं
जिसकी छातियों को 
सिर्फ मां छू सकती थी

और 
एक दिन
जिस गाय के न रहने पर
उसके गले से लिपट कर
रोती रही मां रातभर

वह गाय
मां की बहुत प्यारी सखी थी
मां ने उससे कभी नहीं पूछा
तुम्हारा नाम क्या है
तुम हिन्दू हो कि मुसलमान

वह गाय
न संस्कृत बोलती थी
न हिन्दी-उर्दू चाहे अरबी-फारसी

लेकिन उसके पास
प्रेम की अद्भुत भाषा थी
वह अल्ला मियां की गाय थी।
(2018)

--------------
हे गाय माता
--------------
हे गाय माता 
आप हम हिन्दुओं की
सचमुच की माता क्यों नहीं हुईं
आपने बछियों और बछड़ों को
क्यों जन्म दिया

हे गाय माता
आपने हम हिन्दुओं पर 
यह कृपा क्यों नहीं की
आपने हमें और हमारे पूर्वजों को
अपनी कोख से क्यों नहीं पैदा किया

हे गाय माता
हम जो आपका
जन्म देने वाली अपनी मांओं से 
कहीं ज्यादा खयाल रखते हैं
हम जो आपकी हत्या के बाद
मामूली शक की बिना पर
पलक झपकते
मुसलमानों की जान ले लेते हैं
आपके सगे बच्चे क्यों नहीं हुए

हे गाय माता
हम मनुष्यों को जन्म देने वाली
अपनी माताओं और बहनों के संग
होने वाली हजार हिंसाओं पर
एक चुप हजार चुप रहते हैं

हे गाय माता
ये लोग रिश्ते में आपके कौन हैं 
जो हमें आपके लिए
छोटी-बड़ी जनसभाओं से लेकर 
विश्वविद्यालयों तक में 
जान लेने-देने की शिक्षा देते हैं

हे गाय माता
हम आपके लिए किसी को
थाना-पुलिस-सरकार के सामने
पीट-पीट कर मार क्यों डालते हैं
कहीं हम भी मनुष्य की जगह
सचमुच बैल तो नहीं हो गये हैं!
(2018)

------------------
गाय का जीवन
-------------------

वे गुस्से में थे बहुत
कुछ तो पहली बार इतने गुस्से में थे

यह सब
उस गाय के जीवन को लेकर हुआ
जिसे वे खूँटे बाँधकर रखते थे
और थोड़ी-सी हरियाली के एवज में
छीन लिया करते थे जिसके बछड़े का
सारा दूध

और वे जिन्हें नसीब नहीं हुई
कभी कोई गाय, चाटने भर का दूध
वे भी मरने-मारने को तैयार थे
कितना सात्त्विक था उनका क्रोध

कैसी बस्ती थी
कैसे धर्मात्मा थे, जिनके लिए कभी
गाय के जीवन से बड़ा हुआ ही नहीं
मनुष्य के जीवन का प्रश्न ।
(1996)



मंगलवार, 22 मई 2018

बिटिया सीरीज

 - गणेश पाण्डेय

एक/
बिटिया धोखा वही देगा
----------------------------
बिटिया
जिससे बहुत उम्मीद करोगी
धोखा वही देगा

बिटिया
जिससे नजदीकी रिश्ता रखोगी
धोखा वही देगा

बिटिया
जिस पर ज्यादा भरोसा करोगी
धोखा वही देगा

बिटिया
जिससे तनिक हंसकर बोलोगी
धोखा वही देगा

बिटिया
जिसको पास बैठने को कहोगी
धोखा वही देगा

बिटिया
जिससे टूटकर प्रेम करोगी
धोखा वही देगा।

---------------------------
दो/
बिटिया याद करना
---------------------------
बिटिया
कोई दिल तोड़ दे
चाहे कहीं से मिले कोई दुख
मुझे चाहे मां दीदी भाई को 
याद करना

बिटिया
साइकिल की चेन में
कैसे फंस गयीं थीं उंगलियां
और चेन उतारा था खट से पापा ने
याद करना

बिटिया
भाई ने जब तारपीन पी लिया था
मम्मी उसे लेकर कैसे दौड़ी थीं
कितना रोयी थी दिदिया संग तुम
याद करना

बिटिया
जब भी दुख हो बहुत
कोई बात कचोटती हो बहुत
छलनी होता हो कलेजा बहुत
रोने के लिए मेरे कंधे को तुम
याद करना।

------------------------------------
तीन/
बिटिया कांटा सुई से निकालना
------------------------------------
बिटिया
कोई कांटा चुभे
तो सुई से निकालना

बिटिया
कोई दुष्ट तंग करे
तो सीधे भइया को बताना
ठीक कर देगा

बिटिया
कोई भी दिक्कत हो
छोटी से छोटी बड़ी से बड़ी
मैं जिंदा हूं मुझे बताना।

--------------------------
चार/
बिटिया चौकन्ना रहना
---------------------------------
बिटिया
संभलकर चलना
जगह-जगह बिखरे होते हैं 
ईंट-पत्थर

बिटिया
सफर में देखते रहना
चारो तरफ होते हैं तमाम
उचक्के-ऐयार

बिटिया
सड़क पर चलना 
तो हाथी की तरह इत्मीनान से
रुकना खरगोश की तरह तुरत

बिटिया
हाथ में स्मार्ट घड़ी जरूर लगाना 
बैग में सेव के साथ जरूर रखना 
नमक-मिर्च और चाकू

बिटिया
घर हो चाहे बाहर चौकन्ना रहना 
जांबाज शेरनी की तरह हर वक्त
जंगल हो कि शहर का जंगल।

---------------------------------------
पांच/
बिटिया बाघ दिखे तो भिड़ जाना
--------------------------------------
बिटिया
पहाड़ दिखे डर मत जाना
कूदना और कूद कर चढ़ जाना

बिटिया
नदी दिखे तो डर मत जाना
सांस भरना तैर कर पार कर जाना

बिटिया
वटवृक्ष दिखे तो डर मत जाना
घोड़े पर चढ़े-चढ़े चढ़ जाना

बिटिया
भूत-प्रेत दिखे तो डर मत जाना
सबसे बाज जाना

बिटिया
बाघ दिखे तो डर मत जाना
दादू की मूंछो को यादकर भिड़ जाना

बिटिया
जैसे दिखे कोई वहशी-दरिंदा 
बिना देर किये चीरफाड़ देना।

-------------------------------------
छ:/
बिटिया मृत्यु की देवी लिख लेना
-------------------------------------
बिटिया
वक्त आए तो
अपनी आंखों को
ज्वालामुखी बना लेना

बिटिया
वक्त आए तो
अपनी छातियों में
बारूद भर लेना

बिटिया
वक्त आए तो
अपने कपोलों पर
विष पोत लेना

बिटिया
वक्त आए तो
अपने बाजुओं को
फौलाद का बना लेना

बिटिया
वक्त आए तो
अपनी हथेली पर
मृत्यु की देवी लिख लेना।

-------------------------------------------
सात/
बिटिया खुद को इतना मजबूत करना
--------------------------------------------
बिटिया
फूल बनकर सुगंध बिखेरना
मेघ बनकर धरती को सींचना
जीवन को अर्थ देना सृष्टि चलाना
सत्कर्म करना

बिटिया
अपने काम से 
सबका दिल जीतना
चारों तरफ उजाला फैलाना
दर्प से बचना नम्र रहना

बिटिया
खुद को इतना मजबूत करना
कि कोई आंधी हिला न पाए
कोई बारिश गला न पाए
कोई आग जला न पाए।

-----------------------------
आठ/
बिटिया जीने की कला है
------------------------------
बिटिया
जीने की कला है
जिसे सबको आनी चाहिए
पर सबको आती नहीं
और जिन्हें नहीं आती है 
मुश्किल होती है

बिटिया
जब हम सड़क पर निकलते हैं
तो गाड़ी को अक्सर ठोकर लगती है
टूट-फूट होती है मरम्मत होती है
फिर अगले दिन निकल पड़ते हैं

बिटिया
हमारे शहर में कितना मुश्किल है
बाइक और आटो बाएं से निकलते हैं
दाएं देखें बाएं देखें या सामने
फिर भी ड्यूटी पर जाते हैं

बिटिया
सब इसी में सफर पूरा करते हैं
तुम्हें भी करना होगी ऐसे ही
ठोकरें खानी होंगी संभलना होगा।

----------------------------------------
नौ/
बिटिया बनते हुए मकान को देखना
------------------------------------------
बिटिया
दुनिया चाहे जितनी बुरी हो
इसी में ढूंढते हैं थोड़ी-सी जगह
कोई प्यारी सखी कोई सच्चा दोस्त

बिटिया
धूप चाहे जितनी तेज होगी
इतनी बड़ी दुनिया में जरूर दिखेगी
कोई छत कोई बरामदा कोई दरख्त

बिटिया 
कुछ न दिखे कहीं ढंग का 
तो थोड़े समय के लिए किसी नये 
बनते हुए मकान की छांव में खड़े होना
उसे बनते हुए देखोगी तो देखना
उसकी महक तुम्हें उम्मीद से भर देगी।

-----------------------------------------
दस/
बिटिया गुलमोहर से मुंह मत फेरना
------------------------------------------
बिटिया
चालीस डिग्री हो पारा
गर्म हवाएं चाहे जितनी तेज हों
तुम सामने खड़े गुलमोहर को
देखने से मुंह मत फेरना
बस उसके सिर पर 
सुर्ख फूलों का मुकुट हो

बिटिया
सारे दरख्त गुलमोहर नहीं होते
और जो गुलमोहर होते हैं कभी
तेज धूप में साथ नहीं छोड़ते हैं
जरूरी नहीं कि सारे गुलमोहर
एक जैसा खिलते हों
देखना होता है ढूंढना होता है
पाना होता है अपने हिस्से का
प्यार।

- गणेश पाण्डेय

मंगलवार, 20 मार्च 2018

जब आप रिटायर हो रहे हों

- गणेश पाण्डेय

मेरे भीतर 
कोई है कोई है
जो मुझे झिंझोड़-झिंझोड़कर
कहता है बार-बार

जब आप रिटायर हो रहे हों
तो साहित्य की बड़ी से बड़ी 
लड़ाई भूलकर
घर के छोटे-बड़े जरूरी काम 
निबटाएं

मकान हो तो ठीक 
पुराना हो तो मरम्मत कराएं
न हो तो जल्द से जल्द बनवाएं
गांव-गिरांव के मुकदमे में
ज्यादा तेजी लाएं

सबसे जरूरी है 
बेटियों के हाथ पीले करें
बेटे की शादी के बारे में सोचें
इस तरह जीवन की कविता को
आगे बढाएं

बीपी और शुगर पूरा कंट्रोल करें
स्पांडिलाइटिस के चक्कर से बचें
कुछ दिन गाड़ी खुद न चलाएं
खूब पैदल चलें
उठते-बैठते सोते-जागते 
जीवन की कविता के बारे में सोचें

महाकाव्य का क्या है कवि जी
नहीं भी लिख पाएंगे तो भी पृथ्वी पर 
नये-नये नन्हे-मुन्ने प्यारे-प्यारे
असंख्य कवि आएंगे
बेहतर करेंगे
जब वे आएंगे तो आप
सारे महाकाव्य भूल जाएंगे

धरती की 
बड़ी से बड़ी कविता से बड़ा है
जीवन का यह अद्वितीय संसार
जिसे आप छोड़ जाएंगे।






बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

गरीब सीरीज

- गणेश पाण्डेय 

गरीब 1/
गरीब का दिल
---------------
कितनी अजीब बात है
कि तमाम लोगों ने मिलकर 
किसी गरीब का दिल दुखाया

और उस गरीब ने बेबसी में
तमाम लोगों का दिल दुखाया

कितना उदास है 
बेचारे गरीब का दिल
दुख के इस खेल में

एक ही जिन्दगी तो मिली थी
उसने यों ही उसे गंवा दिया।


गरीब 2/
गरीब का कुर्ता
---------------
वह जितना गरीब था
उसका कुर्ता उससे ज्यादा गरीब था
जिसे देखो उसके कुर्ते को दुखी कर देता
गिरेबान पकड़ते ही उसका कलेजा चाक हो जाता

कोई इधर से 
तो कोई उधर से खींचता 
किसी ने एक आस्तीन खींचा 
तो किसी ने दूसरा पूरा का पूरा निकाल लिया

किसी ने 
एक-एक कर सारी बटनें तोड़ डालीं
किसी ने आगे से खींचा चर्र से
तो किसी ने पीछे से खींचकर पूरा निकाल लिया

गरीब का कुर्ता था
एक ही कुर्ता था खूब रोया
किसी को भी जरा-सा तरस नहीं आया
अमीरजादे थे किसी के साहबजादे थे
शाहजादे थे

किसी गरीब की नंगी देह 
उनके लिए सिर्फ एक राखदान थी
जलती हुई सिगरेट से दागते जाते थे
गरीब की सिसकारी उनके खुश होने का सामान थी

अपनी देह से छूटा आधा-अधूरा कुर्ता 
आज अपने कुर्ता होने पर शर्मिंदा था
वह खादी का कोई कड़क कुर्ता नहीं था
रेशम का कोई चमकीला कुर्ता भी नहीं था
हैण्डलूम का एक मामूली कुर्ता था मटमैला

आज एक कुर्ता
जितना इस देश का कुर्ता होने पर शर्मिंदा था
उससे ज्यादा किसी गरीब का कुर्ता होने पर शर्मिंदा था।


गरीब 3/
गरीब बच्चे
------------
भारत 
एक अच्छा देश है
भारत में सब बराबर हैं
भारत में सबके लिए एक कानून है

भारत में 
कोई भी पैदा हो सकता है
सबको पैदा होने की एक जैसी छूट है
चाहे अमीर का बच्चा हो चाहे गरीब का

भारत में
सभी बच्चों के लिए एक स्कूल नहीं है
अमीर के लिए अलग स्कूल है 
गरीब के लिए अलग

भारत में
गरीब बच्चे पैदा होते ही काम पर लग जाते हैं
क्या-क्या नहीं करते हैं ये गरीब बच्चे
पूछिए मत देखिए मत कहिए मत

भारत में 
ज्यादातर अमीर बच्चे राज करते हैं
और गरीब बच्चे उनकी खिदमत करते हैं।

गरीब 4/
सबसे बड़ी अछूत गरीबी है
-----------------------------
गरीब गंदे होते हैं गंध छोड़ते हैं
उनके पास पसीने से भीगे हुए 
मैले कपड़े होते हैं

अमीर लोगों की नाक लंबी होती है 
दूर से सूंघ लेते हैं कौन-सा आदमी कैसा है
किसी गरीब के कार के पास आते ही 
खिड़की का शीशा तेजी से बंद कर लेते हैं
उसके हाथ फैलाने से पहले ही 
अपने हाथ हिलाकर मना कर देते हैं

अमीर के लिए 
रुपया दो रुपया देना बड़ी बात नहीं
हाथ छू जाने का डर होता है
बीमारी आ जाने का खतरा होता है
जैसे डेंगू और स्वाइन फ्लू 
गरीब का भेस धरकर घूमते हों
और अमीर तो
खुद से कभी बीमार होते ही न हों
सूअरों और मच्छरों से 
बीमारी सीधे उन्हें होती ही न हो

अमीर लोग 
सब्जी वाले कम गरीब से कम डरते हैं
कपड़ा धोने वाले
और बाल काटने वाले कम गरीब से भी 
कम-कम डरते हैं
माल में तो बिल्कुल नहीं डरते हैं
जैसे वहां गरीब काम नहीं करते
सारे नौकर अमीर होते हैं

ये अमीर भी 
कम अहमक नहीं होते हैं
अमीर भूलकर भी यह नहीं सोचते
कि वह गरीब जिसे भगा दिया 
खिड़की के अन्दर रहा होता
और वे खुद बाहर होते तो क्या होता
यह देश कितना उनका होता

अब इस देश में जाति नहीं 
सबसे बड़ी अछूत गरीबी है
अब जातियां इस तरह होती हैं
गरीब ज्यादा गरीब उससे ज्यादा गरीब
अमीर ज्यादा अमीर उससे ज्यादा अमीर
बहुत से बहुत उससे भी बहुत अमीर
बहुत से बहुत उससे भी बहुत गरीब।

गरीब 5/
गरीब का गड़खुल्ला बच्चा
----------------------------
जैसे देश खड़ा है
खड़ा है गरीब का गड़खुल्ला बच्चा

उसके हाथ में कटोरा है उसमें बासी भात है
भात में न नमक है न तेल

जैसे देश का सारा नमक और तेल
हजार पीढियों के लिए सुरक्षित कर लिया हो
धन्नासेठों और माननीयों ने
कोई सौदा करके

जैसे वह गड़खुल्ला बच्चा कह रहा है
सब ले लो साहब जी सब ले लो
देश का सारा रुपया ले लो
सारी जमीन ले लो जंगल ले लो
खनिज ले लो

राजपाट ले लो हमेशा के लिए
ये बड़े-बड़े जहाज 
और चौड़ी-चौड़ी चिकनी-चिकनी सड़कें ले लो
हमारे हिस्से का रेशम हमारे हिस्से की विद्या
हमारे हिस्से की बाकी सारी खुशियां
हमारा आज और हमारा कल सब ले लो

गरीब का गड़खुल्ला बच्चा
जिसे देखता है उससे कहता है
अपनी तोतली भाषा में-
छाहब हमाले हिच्छे का
एक चुटकी नमक
और दो बूंद
कड़ुवा तेल दे दो।

गरीब 6/
गरीब की मशीन
-----------------
सब कहते हैं बुरा वक्त है
आदमी मशीन बन गया है
सब कहते हैं
तो झूठ नहीं कहते होंगे

यह समय 
तरह-तरह की मशीनों का है
झूठ बोलने वाली मशीन है
तो झूठ पकड़ने वाली

कविता में
दोनों तरह की मशीन है
आलोचना में तो दो से ज्यादा तरह की

यह देश जमीन पर नहीं
बल्कि कहना चाहिए मशीनों पर खड़ा है
देश को आदमी नहीं मशीन चला रहे हैं 
किसी के पास गरीबी हटाने की मशीन है
तो किसी के पास मंदिर वहीं बनाने की 
किसी के पास मस्जिद वहीं बनाने की मशीन है
तो किसी के पास 
जाति के नाम पर नौकरी देने की मशीन है

यह अलग बात है
कि सभी मशीनें ठीक से काम नहीं करती हैं
किसी का कुछ तो किसी का कुछ
बिगड़ा रहता है

अलबत्ता अमीरों के पास 
नोट छापने की उम्दा मशीन हैं
रोज का कारोबार है उनका अरबों का
मशीन की देखभाल के लिए भी
काफी पैसा खर्च करते हैं
कहते हैं कि सरकारें
ऐसी मशीनों के पुर्जे की तरह काम करती हैं
कहते तो यह भी हैं कि अमीरों ने
अपनी मशीन में
आलादर्जे का चुंबक भी लगा रखा है
जो दूसरे का पैसा भी खींच लेता है

गरीबों के पास 
आंख मूंद कर वोट छापने की मशीन है
जो पांच साल में एक दिन चलती है
बाकी वक्त अपनी किस्मत पर रोती है
गरीब के पास इतना बल कहां है
कि अपनी मशीन की मरम्मत करवा सके।

गरीब 7/
गरीब सरस्वती
----------------
सरस्वती
गरीब की बेटी है
एक दिन स्कूल जाती है
तो चार दिन बीमार मां की जगह 
बर्तन मांजने चली जाती है

सरस्वती
बहुत समझदार बच्ची है
अमीर बच्चों के पुराने कपड़े को 
नये कपड़े की तरह पहन लेती है
जैसे गरीब बच्चे पुरानी किताबों पर
नया कवर चढ़ा लेते हैं

सरस्वती
अपने मां-बाप को कभी परेशान नहीं करती
होली-दिवाली में भी कुछ नहीं मांगती है
मां ही बड़े घरों से कई चीजें उसके लिए
मांगकर ले आती है

सरस्वती
अपने लंबे-लंबे काले से भी काले केश 
मुल्तानी मिट्टी से रगड़-रगड़कर चमकाती है
शैम्पू-फैम्पू में पैसा बर्बाद नहीं करती है

सरस्वती को
कभी नहीं लगता कि वह गरीब है
उसे अपने मां-बाप तनिक भी गरीब नहीं लगते
भला वे गरीब होते तो उसे इतना प्यार कैसे करते

एक दिन 
मालकिन के घर 
कोई सामान गुम होने पर 
जब मालकिन ने उसे चोर कहा 
तो वह बहुत से भी बहुत रोयी
उसे लगा कि वह सचमुच गरीब है
नहीं तो मालकिन क्यों कहतीं
कि वह चोर है

सरस्वती ने 
अपनी मां से पूछा पिता से पूछा 
कि मुझे देखकर बताओ क्या मैं चोर हूं
उस दिन सरस्वती की मां फूट-फूटकर रोयी
उसका पिता पीपल के पेड़ से लिपटकर
ऐसे रोया जैसे उसके भीतर कुछ मर गया हो
और अपना घंट बांधने आया हो

मां ने कलेजे से लगाकर कहा
नहीं बेटी नहीं तू चोर नहीं है
गरीब है

नन्ही सरस्वती 
उस रात सो नहीं पायी
सुबकती रही सोचती रही 
वह गरीब क्यों है
क्या अमीर चोर नहीं होते हैं।