रविवार, 28 अप्रैल 2013

लेखक का जीवन

-गणेश पाण्डेय

पहली बात: अजीब आदमी हूँ। कहीं भी कुछ कहने लगता हँू। साहित्य का दारोगा हूँ कि चौकीदार ? क्यों नहीं उन्हें कुछ भी कहने देता हूँ। मुक्तिबोध ने भी तो कहा कि ‘कहने दो उन्हें जो यह कहते हैं’। मैं भी कहाँ कुछ कह रहा हूँ। किसे फुरसत है जो इस तरह की बेमतलब बात सुनेगा। सब अपने-अपने ‘‘कीर्ति यश रेशम पूनों की चाँदनी..’’ के लिए विकल हैं। संदर्भ दूसरा है पर मुक्तिबोध की कविता यहाँ भी अपना काम कर रही है-
सूखे हुए कुओं पर झुके हुए झाड़ों में
बैठे हुए घुग्घुओं व चमगादड़ों के हित
जंगल के सियारों और
घनी-घनी छायाओं में छिपे हुए
भूतों और प्रेतों तथा
पिचाशों और बेतालों के लिए-
मनुष्य के लिए नहीं-फैली यह
सफलता की, भद्रता की,
कीर्ति यश रेशम की पूनों की चाँदनी।
           यह मेरी कमी है कि मैं इस अंश को यहाँ साहित्य के पूँजीपतियों पर लागू करने की नासमझी कर रहा हूँ। पूँजीपति के अर्थ के साथ भी थोड़ा-सा अनर्थ कर रहा हूँ। यहाँ थोड़ी देर के लिए पूँजी को यश की पूँजी मान ले रहा हूँ। पूँजी पति के रूप में आज के प्रगतिशील और गैर प्रगतिशील, दोनों तरह के सफल लेखकों की जमात को देख रहा हूँ। इसी कविता की आरंभिक पंक्ति भी देना चाहता हूँ, यह कहने के लिए कि यहाँ भी लोग कुछ ऐसा ही कहते हैं-
तरक्की के गोल-गोल
घुमावदार चक्करदार
ऊपर बढ़ते हुए जीने पर चढ़ने की
चढ़ते ही जाने की
उन्नति के बारे में
तुम्हारी ही जहरीली
उपेक्षा के कारण, निरर्थक तुम व्यर्थ तुम!!
    मित्रो, कहना यह है कि गोल-गोल घुमावदार चक्करदार सीढ़ी से ऊपर न चढ़ने की जिद की कीमत हर दौर के लेखक चुकाते हैं। जैसे आज अच्छे और बुरे दोनों तरह के लेखक हैं, ऐसे ही तब भी थे। अलबत्ता तब सफलता के लिए अपनी आत्मा का सौदा करने वाले लेखक शायद कुछ कम रहे होंगे। आज लेखक ‘कीर्ति यश रेशम की पूनों की चाँदनी’ के लिए किसी भी सीमा तक नंगा हो जाने के लिए सहर्ष प्रस्तुत है। जैसे पहले राजनीति और साहित्य में कुछ समानताएँ थीं, आज भी कुछ समानताएँ हैं। मुक्तिबोध के समय में देश की बागडोर संभालने के लिए लोकसभा का चुनाव लड़ना पड़ता था, साहित्य में महत्वपूर्ण रचना होता था। आज जैसे जनता के बीच जाकर चुनाव लड़े बिना आप देश की बागडोर संभाल सकते हैं, उसी तरह साहित्य में महत्वपूर्ण काम किये बिना किसी भी संस्था का प्रधान बन सकते हैं, कोई भी पुरस्कार अपने नाम कर सकते हैं। बस आपके पास प्रतिभा हो या न हो, गोल-गोल घुमावदार-चक्करदार सीढ़ी पर चढ़ने की कला जरूर हो। आपके हाथ में कलम या लाठी हो या न हो, बैसाखी जरूर हो। साहित्य में कई तरह की सीढ़ियाँ हैं। संगठन आज के जमाने की बड़ी मजबूत सीढ़ी है। किसी भी लेखक संगठन में घुस कर देख सकते हैं। जो संगठन में न घुसना चाहें, उनके लिए गोरखपुर में हैंडलूम की बनी पिस्तौलछाप धोती है। उसमें घुस कर भी कई तरह की सफलता पा सकते हैं। जैसे ही आपने इन सीढ़ियों से दूर रहने का व्रत लिया तो इन सीढ़ियों के डंडे आपको दौड़ाने लगेंगे। रहने नहीं देना चाहेंगे, साहित्य के परिसर में। ये आपके प्राण लें या न लें, पर इनका पहला वार सीधे आपके स्वाभिमान पर होगा। इनके लिए एक लेखक का जीवन साफ-सुथरा होना गैर जरूरी है, गैर जरूरी क्या, कहें कि बकवास है। असल में ये चाहते हैं कि किसी के पास इज्जत-विज्जत नाम की कोई फालतू चीज रह ही न जाय। इनके स्वाभिमान और स्वच्छ जीवन लेखक के लिए नहीं है, सिर्फ नेताओं के लिए है। नेता हरगिज भ्रष्ट न हों, यें हो सकते हैं। क्योंकि इन्होेने अपने लिए भी कुछ विशेषाधिकार बना रखा है। अव्वल तो कोई इनके जीवन को रचना के बरक्स रखकर न देखे, दूसरे इन्हें भ्रष्ट न कहे।
    मित्रो, अब तो ऐसे-ऐसे तर्क ढ़ूँढ कर लाये जा रहे हैं कि आप हिम्मत न जुटा पायें उन्हें बुरा कहने के लिए। बस वे आपको बुरा कहते रहें कि आप कामयाब नहीं हुए तो अपनी बेवकूफी से। किसने कहा था कि अच्छा लिखने के लिए, साहित्य के जीवन को साफ-सुथरा रखें। वे तो खुले आम कहते हैं कि अच्छा लिखने के लिए अच्छा जीना जरूरी नहीं। एक भ्रष्ट लेखक भी अच्छा लिख सकता है। इसलिए उसके जीवन को मत देखिए, उसके लिखे को देखिए। असल में वे यह समझते हैं कि वे जो कुछ भी लिख देंगे, सब अच्छा होगा। मैं अपनी नासमझी का क्या करूँ ? यह समझ ही नहीं पा रहा हूँ कि बुरा जीवन जीकर बहुत अच्छा लिखा जा सकता है। वे दुनिया भर के साहित्य का जिक्र करते हैं। मैं सोचता हूँ कि हिंदी के ऐसे सभी भ्रष्ट लेखकों के बारे में क्यों नहीं कुछ बताते, जिन्होेंने बहुत अच्छा लिखा है। सोचता हूँ कि पहले उन्हीं कवियों का नाम लूँ, जिन्हें वे भी बड़ा मानने से इंकार नहीं करते। कबीर, निराला और मुक्तिबोध कर ही नाम ले लूँ और पूछँू कि इनसे जुड़े भ्रष्टाचार के कितने मामले हैं ? साहित्य में कुछ लोगों के खुल्लम-खुल्ला भ्रष्टाचार प्रेम को देखकर दंग रह गया हँू। प्रश्न हैं कि बहुत बेचैन करते हैं। बुरा रहते हुए भला अच्छा कैसे लिखा जा सकता है ?
1- क्या आज की तारीख में भाजपा में शामिल होकर अच्छा लेखन या प्रगतिशील लेखन किया जा सकता है ?
2- कोई सनद मिल सकती है, जो वक्त पर काम आवे ?
3- क्या लेखक संगठनों से जुड़े प्रगतिशील मित्र उस लेखक का विरोध नहीं करेंगे ?
4- उसे या उसकी कृति को उतना ही सम्मान देंगे जितना अपने पक्ष या संगठन के लेखक को देंगे ?
5- बुरा जीवन जी कर हिंदी में बहुत अच्छा लिखने वाले बड़े लेखक अधिक हैं या अच्छा जीवन जीकर मूल्यवान रचने वाले ?
6-कोई छिपी हुआ एजेंडा तो नहीं है ?
7- कहीं कोई ऐसी शर्त तो नहीं बनायी जा रही है कि लिखने के लिए बुरा होना अनिवार्य शर्त है ?
  ये सात सवाल दरअसल मेरे लिए सात फाटक हैं, जो मुझे रोकते हैं। मुझसे कुछ कहते हैं। कहते तो ये उनसे भी हैं जो अघाये हुए लोग हैं। सीढ़ीवादी लोग हैं। आज हम जिस समय में हैं, यह जैसे रातनीति में निर्लज्जता का समय है, वैसे ही साहित्य में भी निर्लज्जता का समय है। तनिक भी शर्म नहीं है। ढ़ंग का लिखना तो दूर कुछ भी लिखा हो चाहे न लिखा हो, आप किसी का झोला ढ़ोकर झोलाछाप लेखक बन सकते हैं। कभी-कभी तो पुरस्कार छाप लेखक भी बन सकते हैं। कुछ मित्र लेखक संगठनों में हैं और साहित्य बघारने के लिए विकल रहते हैं। कुछ अच्छे लोग भी अपवाद के रूप में हो सकते हैं, पर अधिकांश बेईमान लोग हैं। यहाँ मैं साहित्य के ईमान की बात कर रहा हँू।
  जो लोग आज कह रहे हैं कि अच्छा साहित्य लिखने के लिए अच्छा जीवन जरूरी नहीं है, दरअसल वे लोग अपने लिए भागने का रास्ता बनाना चाहते हैं। वे साहित्य से आत्मसंघर्ष की लंबी परंपरा को ही मिटा देना चाहते हैं। वे लेखक को एक मशीन बना देना चाहते हैं। जो व्यक्तित्वहीन रहकर सिर्फ बिकने के लिए उत्पाद बनाये। हिंदी में अभी भ्रष्ट लेखकों से उत्तम कृतियों की जानकारी और लोगांे को नहीं है, उन्हें हो तो कह नहीं सकता। मैं यह नहीं कहता हूँ कि सब महान ही रचें। क्या यह जरूरी है कि सब महान रचें ? रचना आपकी आंतरिक विवशता है या पुरस्कार और यश की आकांक्षा ? दिक्कत यहाँ है। ऐसे भी लिखने वाले हैं जो मानते हैं कि अपनी बात कहना जरूरी है। एक ड्यूटी है। क्या चौकीदार बेईमान होगा तो रखवाली अच्छी तरह कर पायेगा ? जो लेखक खुद गंदा होगा वह गंदगी दूर करने की बात कितनी ताकत से कर पायेगा ? सवाल यह है कि आप गंदगी दूर करने के लिए साहित्य में आये हैं या गंदगी करने के लिए ? यह एक मुश्किल सवाल है। सच तो यह कि आज सफलता की कीमत चुकाना सबके वश की बात नहीं।
      दूसरी बात: मैं जब अच्छा-अच्छा कहता हूँ तो इसका अर्थ यह नहीं कि इतना अच्छा होना कि भगवान होना। लेखक का जीवन इकहरा नहीं होता है। उसका एक जीवन उसके परिवार से जुड़ा होता है, जहाँ वह पिता, पति, पुत्र, भाई आदि रिश्तों का धर्म निभाता है। उनके लिए जीवन में समझौते भी करता है। सच तो यह कि वह जीवन वह उनके लिए जीता है। उनके भरण-पोषण के लिए मन मारकर दस तरह के काम करता है। लेकिन जैसे ही वह जीवन भी सात पीढ़ियों के लिए संचय में बदलता है, भ्रष्ट हो जाता है। उसके उद्देश्य बदल जाता है। सिर्फ जीने के लिए नहीं, विलासिता और अकूत पूँजी खड़ी करने का पथ हो जाता है। यह रास्ता लेखक का रास्ता नहीं रह जाता है। लेखक का जो दूसरा जीवन होता है, वह साहित्य के परिसर से जुड़ा होता है। जिसमें सिर्फ और सिर्फ लेखक, संपादक, आलोचक और प्रकाशक और पाठक होते हैं। जैसे नेता का चेहरा जनता के सामने होता है, उसी तरह लेखक का चेहरा पाठक के सामने होता है। जैसे भ्रष्ट नेता विकास का झूठा दावा करता है, उसी तरह भ्रष्ट लेखक पाठक के सामने अपनी रचना और जीवन के जरिये झूठे दावे करता है। साहित्य का भ्रष्टाचार मुख्य रूप से मूल्य से जुड़ा होता है और राजनीति का भ्रष्टाचार मुख्य रूप से पैसे से जुड़ा होता है। राजनीति में जो स्थान कुर्सी का है, साहित्य में वही स्थान पुरस्कार और साहित्य की संस्थाओं के पद का है। एक लेखक अपने पहले वाले और दूसरे वाले जीवन के बीच एक संतुलन बनता है। लेखक साहित्य मे जैसे ही अपनी कमजोर रचना पर भारी पुरस्कार की आकांक्षा से संचालित होता है, तुरत भ्रष्ट हो जाता है। थोड़ी देर के लिए यश को एक जरूरी तत्व मान लें तो भी कहना यह कि यश तो अच्छी रचना के लिए होता है, फिर आप खराब रचना पर यश क्यों चाहते हैं ? अर्थात यश तो उा अच्छा रचने वाले की चीज हुई जिसे आप संपादक और आलोचक की सांठगांठ से पाठक को धोखा देकर प्राप्त करना चाहते हैं, जैसे एक खराब नेता साड़ी और पाउच की रिश्वत देकर वोट खरीदता है उसी तरह एक लेखक अपने स्वाभिमान को ताक पर रखकर दस तरह से आलोचक और संपादक को खुश करके प्राप्त करता है। हर शहर में पुरस्कार बाँटने वाले हिंदी के कापुरुषों की कृपा प्राप्त करके पुरस्कृत होता है। ऐसे-ऐसे पुरस्कार देने वाले होते हैं जो पुरस्कार का धंधा करते हैं। विद्यार्थियों को पानी वाला गोल्डमेडल, डॉक्टरों और व्यापारियों आदि को नगरगौरव या श्रमवीर आदि सम्मान के साथ लेखकों के भी सम्मान का धंध करते हैं। कई प्रोफेसर भी साहित्य के इस सबसे गंदे धंधे में शामिल होते हैं। कहना यह है कि इस तरह के रास्ते पर चल कर चर्चा और पुरस्कार इत्यादि के लिए दिल्ली और दूसरे शहरों की गोल-गोल और घुमावदार-चक्करदार सीढ़ियों पर दिनरात उछलना साहित्य का भ्रष्टाचार है। यहाँ तक भी होता तो शायद लोग आँख मूँद लेते। लेकिन ऐसे रास्तों पर चल कर ईमानदारी से साहित्य में काम करने वाले लोगों के सिर पर, छोटे बच्चों की तरह किसी की गोद में बैठ कर ऊपर से सू-सू करना हरगिज-हरगिज बर्दाश्त करने के लायक नहीं है। भाई जाओं तुम फलाना जी के साथ उनके ड्राइंगरूम में कुछ भी करो। बाहर आकर हेकड़ी क्यों दिखाते हो। पुरस्कार की मदिरा पीकर हल्ला-दंगा मत करो, जाओ चुपचाप अपने घर में सो जाओ। लेकिन धोतियों पाजामों और पतलूनों की कृपा से प्राप्त व्याघ्रचर्म ओढ़कर अपनी उम्र के बाकी लेखकों के सामने शेर बनोगो तो दूसरा उस चर्म को तुम्हारी चमड़ी से अलग भी कर सकता है। फर्जी ढंग से ही सही, चलो ले जाओ पुरस्कार, पर जिन्होंने तुम्हारी तरह दिल्ली की धोती से लेकर गोरखपुर की धोती तक की परिक्रमा नहीं की है, अपनी उम्र के उन समकालीनों को कभी बहुत छोटा समझोगो या कभी अपमानित करोगे तो तुम्हारा फर्जी सम्मान कितनी देर तक टिकेगा ? ऐसे पुरस्कार लेने और देने वालों को सारा काम बिना किसी शोर-शराबे के करना चाहिए। कोई कुछ नहीं कहेगा। कहना तो यह है कि यह सब साहित्य का बचपना है। बच्चे सचमुच का जहाज नहीं चला सकते। कागज की या प्लास्टिक की जहाज चलाते हैं। उसी तरह इस बचपने से ऊपर न उठने वाले लोग कैसे अच्छा रचेंगे ? कैसे सचमुच की बड़ी रचना संभव करेंगे ? पहले तो उन्हें अपने पैरों को मजबूत करना है। सहित्य में संपादक, आलोचक और प्रकाशक के गठजोड़ ने हिंदी में एक शर्मनाक स्थिति पैदा कर दी है। बहरहाल, कहना यह कि बुरे जीवन से अच्छी रचना का सिद्धांत देने वाले राजधानी के लेखक या लेखकनुमा लोग अपनी समझ अपने पास रखें। जो साहित्य में कुछ टूटा-फूटा अपने ईमान को साथ लेकर करना चाहते हैं , उन्हें करने दें। अपने काम पर बहुत अभिमान हो तो कभी दूसरों के काम से अपने काम को मिलाकर भी देख लें। शायद हिंदी में भ्रष्टाचार के पक्ष में फतवा जारी करने की फजीहत से बचने में मदद मिले।
  तीसरी बात: हिंदी का लेखक समाज बहुत डरा हुआ समाज है। इतनी डरी हुई तो किसी शहर की जनता भी नहीं है। असल में दिक्कत यह है कि सचमुच के लेखकों की जगह इधर नकली लेखकों का प्रादुर्भाव हुआ है। जैसे असली समाजवादी, असली मार्क्सवादी और दूसरी विचारधारा के असली लोगों की जगह ज्यादातर नकली लोग जहाँ-तहाँ बैठे हैं, उसी तरह साहित्य में भी है। नकली लेखकों की एक पूरी फौज है। किसी को विश्वास न हो तो यहाँ देखने के लिए पधारें। ये नकली लेखक अपने आकाओं से बहुत डरते हैं। इनके आका किसी भी विचारधारा के हो सकते हैं। कोई जरूरी नहीं कि वे असली लेखक हों। असली होगे तो नकली के साथ रहेंगे कैसे  ? बहरहाल ये नकली लेखक किस हद तक डरते हैं, यह बता कर अपनी बात खत्म करूँगा। मेरे एक आलोचक मित्र हैं, जिनसे नेट और फोन पर लंबी बातचीत होती है। मैं उनका नाम इसलिए नहीं ले रहा हूँ कि यह एक व्यक्तिगत बातचीत का हिस्सा है, इसलिए उनका नाम लिए बगैर  एक छोटा-सा अंश-सिर्फ दो पंक्ति- उद्धृत करूँगा-‘‘ आपके लेखन में मूल नक्षत्र का दबदबा है इसलिए लोगों को बातें आसानी से नहीं पचतीं। जो लोग आपको पसंद भी कर रहे होते हैं, वे इस डर से आक्रांत रहते हैं कि ये शख्स कहीं मुझे ही किसी दिन न नाप दे।’’ क्षमा कीजिएगा मित्र कि आज दो पंक्ति सबसे साझा कर रहा हूँ। सिर्फ यह बताने के लिए कि मैं तो कुछ भी नहीं हूँ, न राजधानी की किसी बड़ी संस्था का अध्यक्ष, न राजधानी का कवि-आलोचक, न राजधानी का संपादक, फिर भी साहित्य के कुछ बुरे लोग मुझसे डरते हैं। डरना इस रूप में कि अमुक जी यह देख न लें कि मेरे साथ हैं। फलाना जी नाराज हो गये तो हाय दिल्ली या कहीं और के कार्यक्रमों में कैसे बुलाया जाऊँगा। कोई पुरस्कार कैसे मिलेगा। ये इतने डरे हुए लोग हैं कि साहित्य की सत्ताओं से टकराने वाले साहित्य के मुझ जैसे बहुत छोटे से कार्यकर्ता से हजार किलोमीटर दूर रहना पसंद करते हैं। नये लेखक तो नये हैं, पुराने भी इसी वजह से दूर रहना पसंद करते हैं। मेरी उम्र के आसपास के कुछ लेखक और एक तो बड़े भारी संपादक हैं, वे डर कर दूर रहते हैं कि फलाना जी कहीं नाराज न हो जाएँ। मित्रो, यह व्यक्तिगत प्रसंग सिर्फ यह कहने के लिए कि जब मुझसे इतना डर है तो ये डरने वाले लोग साहित्य के बड़े-बडे़ लोगों से कितना डरते होंगे, आप सहज समझ सकते हैं। दूसरी बात साफ कर दूँ कि कुछ लोग ऐसे जरूर हो सकते सकते हैं जो मेरे लिखने की वजह से डरते हों, पर ऐसे लोग सिर्फ और सिर्फ बुरे लोग होंगे। अच्छे लोग मेरे लिखने से डरते नहीं बल्कि उसके साथ होते हैं। क्योंकि मेरी बात मेरी बात है ही नहीं, सबकी बात है।              
     मित्रो आज सबसे बड़ी दिक्कत वाम के डरे हुए कवियों और लेखकों की है। वाम के बेहद ईमानदार सक्रिय कार्यकर्ता तो बहुत मिल सकते हैं। कई को जानता हूँ। पर लेखकों में मिलेंगे भी तो बहुत कम मिलेंगे। मैं पहले भी कह चुका हूँ कि वाम को साहित्य में सिपाही का पक्ष मानता हूँ। इसीलिए कहता हूँ कि चोर को बाद में पकड़ेंगे, पहले सिपाही की तलाशी लो। मैं कोई बहुत अच्छा आदमी नहीं हँू, कुछ कमियाँ मुझमें भी जरूर हांेगी। बच्चों के लिए मुझे भी समझौते करने पड़े होगे। पर साहित्य में हरगिज नहीं। साहित्य मेरे लिए यश का पथ नहीं है। मेरी आंतरिक विकलता है। मेरा एक और जीवन है, जिसमें पहले के जीवन के टूट-फूट को ठीक करने की कोशिश करता हूँ। अंत में अपनी कविता-‘‘बुरा यह कि मैं कम बुरा हुआ’’ का यह अंश-
बुरा यह
कि मैं कम बुरा हुआ
किसी स्त्री से कुछ न छिपाया
किसी का दिल न दुखाया
किसी बच्चे से छल न किया
और बच्चे की मां को छोड़कर
कहीं और गया नहीं
उस स्त्री से पूछने भी नहीं गया
कि उसने मेरा दिल क्यों दुखाया
यह सोच-सोच कर
मेरा हाल और बुरा हुआ
कि उस वक्त कहां था कमबख्त मैं
जब बंट रही थी बुराई
बेहिसाब...



शनिवार, 27 अप्रैल 2013

इस डरी हुई दुनिया में


      दिल्ली में तो किसी घटना पर जोशीले नौजवान निकल पड़ते हैं। कुछ संस्कृतिकर्मी और कुछ पत्रकार हरकत में आते हैं। लेकिन इस शहर का क्या करूँ जो डरता है। अभी हाल में अनुभव साझा किया था-‘‘अभी-अभी बहुत दुखी होकर लौटा हूँ। हुआ यह कि मुख्यमार्ग पर तीन दबंग लड़के एक नौजवान शौहर के साथ उसकी पत्नी के सामने ही मारपीट कर रहे थे। भीड़ लग गयी थी। कुछ लोग बचाव के लिए उन दबंग लड़कों से चले जाने के लिए प्रार्थना कर रहे थे। कह रहे थे कि छोड़ दो बेटा। पर वे दबंग किसी के बेटे नहीं थे। शायद अपनी माँ के भी बेटे नहीं थे। माँ के बेटे रहे होते तो भला किसी लड़की के साथ अभद्रता करते। मोटर साइकिल में ठोकर मारते। उस लड़के ने उन दबंगों को बदमाशी करने से रोका था। एक पति जैसा भी हो भला अपनी पत्नी के साथ अभद्रता का विरोध क्यों नहीं करेगा ? दबंग लड़के ईंट उठा कर चलाने लगे तो बीच-बचाव करने वाले उम्रदराज पीछे हट गये। पर वहाँ से भागे नहीं। ताकत रही होती तो शायद इस्तेमाल भी करते। दबंग नंगा नाच करने के बाद खुद ही चले गये। उस लड़की में संसार की सभी लड़कियाँ दिख रही थीं। उसके पति में सभी बेटे दिख रहे थे। उन दबंगों में सिर्फ बदमाश दिख रहे थे। गंुडे दिख रहे थे। एक सिपाही कहीं से आया तो कुछ करने पर बोला कि आप लोगों को कुछ करना चाहिए था। किसी ने कहा कि आप तो ऐसे मौके पर कुछ करने की नौकरी करते हैं, आपके पास तो बंदूक और वायलेस भी है। बहरहाल ना-नुकुर के बाद उसने अगली पुलिस चौकी को दबंगों की गाड़ी का नंबर नोट कराया। लड़की के दो-तीन कम उम्र और कोमल काया के भाई भी आए। पर वे उन दबंगों से जीत पाएंगे ? क्या हर भाई और पति अपनी बहन और पत्नी की हिफाजत के लिए बंदूक लेकर चले ? क्या बंदूक से ऐसे दबंगों पर कार्रवाई करने के बाद कानून उन्हें छोड़ देगा ? क्या शरीफ लोगों के लिए यह दुनिया नहीं है ? यहाँ बड़ी-बड़ी बात करने वाले अधिक उम्र के दोस्त ऐसे दबंगों के सामने क्या करें ? बदमाशों को अपनी जान वहीं देकर घर अपने बच्चों के पास लौटना चाहिए ? क्या करना चाहिए ? जिम्मेदार लोगों के पास ऐसे मौकों के लिए क्या विकल्प है ?’’ कई मित्रों ने सुझाव दिये। सुझाव सबके पसंद आये। पर एक भोली प्रतिक्रिया ने मेरा ध्यान खासतौर खींचा-‘‘क्या कहें...’’ मुझे लगता है कि इन स्थितियों में स्तब्ध हो जाना भी एक ईमानदार प्रतिक्रिया है। जब तंत्र संवेदनहीन हो। कानून का डर खत्म हो गया हो। पत्रकारिता बिचौलिये की भूमिका में हो और लेखक सबसे पतित हो गये हों। कुछ ही दिन पहले अपने नोट ‘‘वीआईपीवाद के पंजे में फँसा जनसुरक्षा का टेंटुआ’’ में लिखा में-‘‘ यह किताब भी अजीब किताब है। कुछ होते ही कई पन्ने आप से आप फड़फड़ाने लगते हैं। कभी इसका रंग लाल दिखता है तो कभी काला तो कभी केशरिया और कभी इंद्रधनुष जैसा लुभावना। कभी-कभी तो इतना बेमेल दिखता है कि देखने का मन नहीं करता है। देश एक पाँच बरस की बेटी के साथ हुए हादसे से सदमें में है और एक लेखक अपनी फोटो बदल रहे हैं, एक संपादक अपना शब्द ज्ञान बघार रहे हैं। दुर्भाग्य यह कि आज ऐसे लेखक और पत्रकार ही देश और समाज के दुश्मन नम्बर एक हैं। कुछ लेखक या लेखकनुमा लोग इस घटना पर प्रवचन में दुश्मन नम्बर एक के रूप में पूँजीवाद को पहले गिरिफ्तार करने की बात करते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि भाई पूँजीवाद कोई घुरहुआ-निरहुआ नहीं है कि उसे आप कहीं से पकड़ कर जेल में ठूँस देंगे और सारी समस्या पलक झपकते ही छूमंतर हो जाएगी। अरे भाई पूँजीवाद एक बड़ी बीमारी है, जाते-जाते जाएगी, एक लंबी लड़ाई है। साल-दो साल में कुछ नहीं होने वाला। जब किसी व्यवस्था को राजरोग हो जाता है तो उसकी लंबी दवाई होती है। किसी आदमी को तपेदिक हो और उसका पैर भी टूट जाए तो पैर टूटने का इलाज क्या तपेदिक ठीक होने के बाद किया जाएगा ? या पैर को दिखाने हड्डी के चिकित्सक के पास जाएँगे ? प्लास्टर वगैरह जो जरूरी होगा, करेंगे ? कहना यह कि मौजूदा लोकतंत्र के फेफड़े में क्षय रोग हो गया है, जिसकी उपयुक्त चिकित्सा की जरूरत है। गंभीर बात यह कि लोकतंत्र को राजरोग के साथ पोलियो भी हो गया है। इससे भी गंभीर बात यह कि पोलियो दाहिने हाथ में हो गया है। सीधे-सीधे कहूँ तो पुलिसतंत्र को पोलियो हो गया है। विचारणीय यह कि यह पोलियो किसी टीके से नहीं दूर होगा, इसे दूर करने के लिए पुलिसतंत्र को ही कहीं दूर व्यवस्थित करना पड़ेगा। जब तक पुलिस का पोलियो ठीक न हो जाए तब तक उसे लालबत्ती अर्थात वीआईपी ड्यूटी या वीआईपीवाद से दूर रखना पड़ेगा। उसे जनता का सेवक और रक्षक बनाने के लिए राजनीतिक गुलामी से मुक्त करना पड़ेगा। उसकी सेवाशर्तों में बड़े फेरबदल की जरूरत है। उसे पहले जनता की रक्षा करने के लिए बाध्य करना पड़ेगा। इस घटना पर कुछ लोग कहते हैं कि फाँसी की सजा हो जाए तो क्या ऐसे अपराध बंद हो जाएंगे ? मैं कहना चाहता हूँ कि फाँसी की सजा नहीं है तो क्या ऐसे अपराध बंद हैं ? मानवाधिकारों की बात करने वाले कुछ लोग बड़े अपराधियों को फाँसी न देने की वकालत करते दिख जाते हैं। उनका कहना है कि फाँसी की सजा न हो। जानने की इच्छा होती है कि भाई जब एक या दस हत्या करने वाले अपराधी को फाँसी न देने की बात की जाती है, या ऐसा कानून बनाने की बात की जाती है तो फिर सेनाओं को दुश्मनों को मौत के घाट उतारने की अनुमति क्यों दा जाती है ? आखिर दुश्मन भी तो मानव है, उसके भी जिंदा रहने का अधिकार उस समय कहाँ होता है ? क्या उस समय संकीर्ण मानवाधिकार की बात करने वाली बहन या भाई को युद्ध के मोर्च पर भेज देना चाहिए ? क्या जिसकी हत्या होती है या जिसके देह के साथ क्रूरतम व्यवहार किया जाता है, उसके दर्द का कोई मोल नहीं है ? बस मानवाधिकार की ओर से निंदा के दो बोल काफी हैं ? क्या शरीर में गंभीर बीमारी होने पर कभी उसके अंग को अलग नहीं किया जाता है ? यहाँ फाँसी के दंड के पक्ष में कोई बहस नहीं कर रहा हूँ। सिर्फ यह कह रहा हूँ कि लकीर के फकीर मत बनिए। प्रगतिशीलता को पहले तर्क की कसौटी पर कसिए। फिर आप यह मुनासिब पाते हैं कि फाँसी की सजा एकदम से खत्म कर दी जाए तो खत्म कर दीजिए। लेकिन देखना यह है कि आप इस धरती पर सिर्फ फाँसी की सजा खत्म कर देने का स्वप्न देखने के लिए पैदा हुए हैं या समाज को हिंसा मुक्त कराने के लिए ? जिस देश में रहते हैं, उसे बेटियों और बहनों को सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए बेहतर बनाने के लिए योगदान करना चाहते हैं ? तर्क सिर्फ फाँसी की सजा तक ही नहीं रह जाएगा, फिर तो यह भी पूछना पड़ेगा कि भाई हथियार की क्या जरूरत ? बैंकों की सुरक्षा तो मानवाधिकार वाले लोग कर ही लेंगे ? बाहर की सेनाओं को भी अपने भाषण से प्रभावित कर लेंगे ? क्या मानवाधिकार की सोच का दायरा तंग है ? मानवाधिकार की बात क्या वहाँ नहीं करनी चाहिए जहाँ शासन की पुलिस या अन्य बल निहत्थे लोगों पर क्रूरताएँ करते हैं ? पिछड़े लोगों को ताकत के बल पर दबाते हैं, उनका सबकुछ छीन लेते हैं। उनकी आबरू लूट लेते हैं। फिर यहाँ आबरू लूटने वालों के साथ जान की माफी की बात क्यों ? जिस स्त्री या बच्ची के साथ ऐसा कुछ होता है, उसे न जाने कितनी बार, शायद रोज मरना होता होगा। पर यह जानता हूँ कि फाँसी की सजा से भी हमारा समाज सचमुच बदल नहीं जाएगा। हत्याएँ रुक गयीं क्या ? दूसरे अपराध खत्म हो गये क्या ? दरअसल सबसे बड़ा सवाल कानून के राज का है। कानून के डर का है। संविधान के प्रति निष्ठा का है। लेकिन यह होगा कैसे ? क्या हमारे देश के राजनेताओं की निष्ठा सचमुच संविधान के प्रति सच्ची है या सब दिखावा है ? कानून का डर वीआईपी को नहीं होगा तो जनता को कानून का डर कैसे होगा ? राजा कानून तोड़ेगा तो जनता  कानून का पालन कैसे करेगी ? यह सब यह कहने के लिए कह रहा हूँ कि हमारे लोकतंत्र के चुनाव में पैसे की भूमिका सबसे खतरनाक है। इसी पैसे के लिए कानून तोड़ने का खेल चलता है। यह सब विचारणीय है पर सबसे पहले वीआईपी की सेवा से पुलिस को मुक्त करने की जोरदार पहल हो। सरकारें सबसे पहले जनता की पुलिस से अपना काम लेना बंद करें अपनी सुरक्षा लिए दूसरे बल का गठन करें, चाहें तो दूसरी फौज बना लें। पर जनता की सुरक्षा में संेध न लगाएँ। सच तो यह कि आज की तारीख में जनसुरक्षा का टेंटुआ वीआईपीवाद के पंजें में है। इस वीआईपीवाद से टकराना ही होगा। वे जिस दिन पुलिस को अपनी सेवा से मुक्त कर देंगे, कम से कम कानून में भी इससे बेहतर हो जाएगा।’’ आगे कहा कि ‘‘यहाँ समस्या के केंद्र में पुलिस के चरित्र और उसकी सेवाशर्तों में सुधार का मुद्दा है। सिर्फ राजधानी ही नहीं, देश के बाकी हिस्सों में भी इस तरह के हादसे बच्चियों और महिलाओं के साथ हो रहे हैं। जिन पर मीडिया का फोकस कम है। पुलिस के चरित्र की समस्या वहाँ भी कमोबेश ऐसी ही है। अपराध छिपाना और अल्पीकरण करना या गलत दिशा देना, आम बात है। पुलिस परिवार की बच्चियों को भी कई बार यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है। फिर भी अपराध छिपाना और अल्पीकरण करना या गलत दिशा देना, आम बात है तो ऐसा इसलिए कि पूरे देश में पुलिस कानून की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि सत्ता और वीआईपी की रक्षा के लिए काम करती है। जाहिर है कि यह सब खुशी-खुशी नहीं, बल्कि अपनी सेवाशर्तों की वजह से ऐसा करती है।’’ 
        यदि पुलिस का चरित्र जनपक्षधर होता तो सबसे पहले दंपति के मोटर साइकिल को ठोकर मारने वाली घटना का वह सिपाही खुद संज्ञान लेता। हरकत में आता। बदमाशों से लड़ना सामान्य लोगों के वश की बात है ? पुलिस को क्या प्राथमिक सूचना लिखाने की प्रतीक्षा करनी चाहिए ? खुद नहीं दर्ज कर लेना चाहिए ? क्यों एक सिपाही तीन बदमाशों से लड़ने के लिए नाकाफी है ? राज्य की ताकत क्यों इतनी कम है ? बदमाशों के सामने प्रायः क्यों डरा हुआ रहता है सिपाही ? बदमाशो के पास असली बंदूक क्यों होती है और सिपाही के पास लकड़ी की बंदूक क्यों होती है ? लालबत्ती की सुरक्षा में चलने वाले दस्ते में ही असली बंदूक क्यों होती है ? ऐसा क्यों कि अपराध, जनता के लिए मुसीबत है तो अखबार और चैनल के लिए फायदे की चीज ? जब पैंसठ साल बाद देश को अपराध मुक्त नहीं कर सके तो गरीबी से मुक्त क्या खाक करेंगे ? बीमारी से भला कैसे मुक्त करेंगे ? बेरोजगारी भला कैसे खत्म करेंगे ? ये सरकारें आखिर काम क्या कर रही हैं ? समाज को धर्म, सिनेमा और क्रिकेट का अफीम सस्ते में बेंचने काम कर रही हैं ?  
       आखिर अपराध क्यों इतना बढ़ गये ? क्या जनसंख्या की वजह से ? क्या बेरोजगारी की वजह से ? क्या पैसे की वजह से ? कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ है। है, पूँजीवाद जिम्मेदार है। पर सीधे पूँजीवाद पर निर्णायक चोट नहीं हो सकती है तो क्या  उसकी बाँह मरोड़ने की कोशिश भी नहीं हो सकती ? क्या देश को किसी सांस्कृतिक नीति की जरूरत नहीं है ? यहाँ मेरा आशय भारतीय संस्कृति के राजनीतिकरण की नहीं है। सीधे-सीधे कहना चाहता हूँ कि चैनलों और अखबारों और फिल्मों में आयी अश्लीलता की बाढ़ पढ़े लिखे या अनपढ़ युवाओं की मानसिकता को विकृत करने के लिए जिम्मेदार नहीं है ? सरकारें यदि समाज को खराब बनाये रखनें में अपना भला देखती हैं तो हम ऐसी सरकारों के पक्ष में मतदान क्यों करते हैं ? यदि कमोबेश सभी राजनीतिक दल यथास्थितिवादी हैं तो क्यों हम इन्हें वोट देने के लिए गीत गाते हुए जाते हैं ? कहना सिर्फ यह है कि हम बंदूक वाले अपराधियों से सीधे लड़ नहीं सकते तो कम से कम वोट देते समय क्यों नहीं कुछ सोचते ? मतदान का प्रतिशत कम होता है। यदि कभी ऐसा हो जाय कि यह प्रतिशत घट कर ‘‘दस’’ हो जाय तो भी सरकारें रहेंगी ? हम देश भर में फिलहाल कोई आंदोलन एक साथ नहीं चला सकते तो क्या विकल्प का विचार भी देश भर में नहीं ले जा सकते ? मित्रो, विचार की दुनिया का तो और भी बुरा हाल है....राहत की बात सिर्फ इतनी है कि कुछ लोग अभी भी इन स्थितियों से लड़ रहे हैं। पीड़ितों के पक्ष में कोर्ट में जा रहे हैं। मीटिंग कर रहे हैं। संभव मदद कर रहे हैं। पर दुखद यह कि ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है। दिक्कत यह कि पैसे वाला मीडिया ऐसे लोगों का साथ नहीं देता है।


सोमवार, 22 अप्रैल 2013

परिणीता

- गणेश पाण्डेय                       

यह तुम थी !
पके जिसके काले लंबे बाल असमय
हुए गोरे चिकने गाल अकोमल
यह तुम थी !
छपी जिसके माथे पर अनचाही इबारत
टूटा जिसका कोई कीमती खिलौना
एक रेत का महल था जिसका
एक पल में पानी में था
कितनी हलचल थी कितनी पीड़ा थी
भीतर एक आहत सिंहनी कितनी उदास थी
यह तुम थी !
ढ़ल गया था चांद जिसका
और चांद से भी दूर हो गया प्यार जिसका
यह तुम थी !
श्रीहीन हो गया जिसका मुख
खो गया था जिसका सुख यह तुम थी !
यह तुम थी एक-एक दिन
अपने से लड़ती-झगड़ती खुद से करती जिरह
यह तुम थी ! औरत और मर्द दोनों का काम करती
और रह-रह कर किसी को याद करती
यह तुम थी !
कभी गुलमोहर का सुर्ख फूल
और कभी नीम की उदास पीली पत्ती
यह तुम थी !
अलीनगर की भीड़ में अपनी बेटी के साथ
अकेली कुछ खरीदने निकली थी
यह तुम थी !
यह मैं था
साथ नहीं था आसपास था
मैं भी अकेला था तुम भी अकेली थी
मुझसे बेखबर यह तुम थी !

बहुमूल्य
चमचमाती और भागती हुई
कार के पैरों के नीचे एक मरियल काले पिल्ले-सा
मर रहा था किसी का प्यार
और तुम बेखबर थी
यह तुम थी ! जिसकी किताब में लग गया था
वक्त का दीमक
कुतर गये थे कुछ शब्द कुछ नाम कुछ अनुभव
एक छोटी-सी दुनिया अब नहीं थी
जिसकी दुनिया में यह तुम थी !
जो अपनी किताब में थी और नहीं थी
जो अपने भीतर थी और नहीं थी
घर में थी और नहीं थी
यह तुम थी !
बदल गयी थी
जिसके घर और देह की दुनिया
जुबान और आंख की भाषा
बदल गया था
जिसके चश्मे का नंबर और मकान का पता
यह तुम थी !
जिसकी आलीशान इमारत ढ़ह चुकी थी
मलबे में गुम हो चुकी थी जिसकी अंगूठी
और हार छिप गया था किसी हार में
यह तुम थी!

जीवन के आधे रास्ते में
बेहद थकी हुई झुकी हुई
देखती हुई अपनी परछाईं
समय के दर्पण में
जो इससे पहले कभी
इतनी कमजोर न थी
इतनी उदास न थी
यह तुम थी
किसी की परिणीता!























और
यह !
तुम थी !!
मेरी तुम !!!
जो अहर्निश
मेरे पास थी
जिसकी त्वचा
मेरी त्वचा की सखी थी
जिसकी सांसों का
मेरी सांसों के संग
आना-जाना था
मेरे बिस्तर का आधा हिस्सा जिसका था
और जिसका दर्द मेरे दर्द का पड़ोसी था
जिसके पैर बंधे थे मेरे पैरों से
जिसके बाल कुछ ही कम सफेद थे
मेरे बालों से
जिसके माथे की सिलवटें कम नहीं थीं मेरे माथे से
जिससे मुझे उस तरह प्रेम न था
जैसा कोई-कोई प्रेमी और प्रेमिका किताबों में करते थे
पर अप्रेम न था कुछ था जरूर
पर शब्द न थे जो भी था एक अनुभव था
एक स्त्री थी
जो दिनरात खटती थी
सूर्य देवता से पहले चलना शुरू करती थी
पवन देवता से पहले दौड़ पड़ती थी
हाथ में झाड़ू लेकर
बच्चों के जागने से पहले
दूध का गिलास लेकर
खड़ी हो जाती थी मुस्तैदी से
अखबार से भी पहले
चाय की प्याली रख जाती थी
मेरे होठों के पास मीठे गन्ने  से भी मीठी
यह तुम थी
मेरे घर की रसोई में
सुबह-शाम सूखी लकड़ी जैसी जलती
और खाने की मेज पर
सिर झुकाकर
डांट खाने के लिए तैयार रहती
यह तुम थी!
बावर्ची
धोबी
दर्जी
पेंटर
टीचर
खजांची
राजगीर
मेहतर
सेविका
और दाई
क्या नहीं थी तुम!
यह तुम थी!
क्या हुआ
जो इस जन्म में मेरी प्रेमिका नहीं थी
क्या पता मेरे हजार जन्मों की प्रेयसी
तुम्हारे अंतस्तल में छुपी बैठी हो
और तुम्हें खबर न हो
यह कैसी उलझन थी मेरे भीतर कई युगों से
यह तुम थी अपने को मेरे और पास लाती थी
जब-जब मैं अपने को तुमसे दूर करता था
यह तुम थी !
जो करती थी मेरे गुनाहों की अनदेखी

मेरे खेतों में
अपने गीतों के संग पोछीटा मार कर
रोपाई करती हुई मजदूरनी कौन थी!
अपनी हमजोलियों के साथ
हंसी-ठिठोली के बीच
बड़े मन से मेरे खेतों में एक-एक खर-पतवार
ढूंढ-ढूंढ कर निराई करती हुई
यह तन्वंगी कौन थी!
मेरे जीवन के भट्ठे पर पिछले तीस साल से
ईंट पकाती हुई झाँवाँ जैसी यह स्त्री कौन थी
यह तुम थी!

और यह मैं था एक अभिशप्त मेघ !
जिसके नीचे न कोई धरती थी न ऊपर कोई आकाश
और जिसके भीतर पानी की जगह प्यास ही प्यास
कभी
मैं ढू़ंढ़ता उस तुम को !
और कभी इस तुम को !
कभी किसी की प्यास न बुझाई
न किसी के तप्त अंतस्तल को
सींचा
न किसी को कोई उम्मीद बंधायी
यह मैं था प्रेम का बंजर
इतनी बड़ी पृथ्वी का
एक मृत और विदीर्ण टुकड़ा
अपनी विकलता और विफलता के गुनाह में
डूबा
यह मैं था! यह मेरे हजार गुनाह थे
और तुम मेरे गुनाहों की देवी थी!
यह तुम थी!
जिससे
मेरी छोटी-सी दुनिया में
गौरैया की चोंच में अंटने भर का
उसके पंख पर फैलने भर का
एक छोटा-सा जीवन था
एक छोटी-सी खिड़की थी
जहां मैं खड़ा था
सुप्रभात का एक छोटा-सा
दृश्यखंड था
यह तुम थी! मेरी आंखों के सामने
मेरी तुम थी
यह तुम थी!
मेरे गुनाहों की देवी!
मुझे मेरे गुनाहों की सजा दो
चाहे अपनी करुणा में
सजा लो मुझे
अपनी लाल बिन्दी की तरह
अपने अंधेरे में भासमान इस उजास का क्या करूं
जो तुमसे है इस उम्मीद का क्या करूं
आत्मा की आवाज का क्या करूं
अतीत का क्या करूं अपने आज का क्या करूं
तुम्हारा क्या करूं
जो मेरे जीवन की सखी थी और सखी है
जिसके संग लिए सात फेरे
मेरे सात जन्म के फेरे हैं
जो मेरी आत्मा की चिरसंगिनी थी मेरा अंतिम ठौर है
यह तुम थी!
यह तुम हो!!
मेरी मीता                      
मेरी परिणीता।

(परिणीता)

रविवार, 21 अप्रैल 2013

जमुआर नाला


- गणेश पाण्डेय

पता नहीं
कहां चला जाता है इसका पानी
कोई अदृश्य छेद है इसके हृदय में
जहां से कहीं और चला जाता है
इसका पानी देखते-देखते

कोई राक्षस है भीमकाय अदेख
इसके भीतर किसी सुरंग में छिपा हुआ
हजार-हजार जन्मों का प्यासा
एक सांस में पी जाता है
सारा डबडब पानी
एक-एक बूंद

आधा नींद में और आधा जागते
जाड़े की काली-काली
और लंबी सुनसान रातों में
जमुआर नाले के किस्से सुनाती थी
नानी

कभी जमुआर के राक्षस से
कभी समय के किसी प्रेत से
चुड़ैल से कभी
किसी टोनहिन के बान से
तो किसी धोकरकस के जाल से
कभी ठंड के तूफान से
कभी प्रचण्ड ताप से
औचक अकाल से
तो कभी काल से
अपनी रजाई में कभी
आंचल के नीचे कभी
कभी पलकों के भीतर
तो कभी अंतस्तल में
दिनरात
अपने नवासों को
लोहे के संदूक में
अपनी प्यारी-प्यारी
रंगीन छपेली साड़ियों की तरह
बड़े जतन से छुपाये रखनेवाली
मेरी अच्छी नानी
ओ मेरी नानी!

तम्बाकूवाले पान की शौकीन थी नानी
पान में बसी रहती थी नानी की जान
कहती थी सीखा था नाना की सोहबत में
क्या पता मुहब्बत में !
उसी प्यारी-प्यारी नानी की
प्यारी-प्यारी उंगलियों को पकड़कर
सीखा था पार करना
यह जमुआर नाला
जिसे अक्सर नानी
कहती थी आफत का परकाला

सचमुच
आफत के मारे थे
पास-पड़ोस के तमाम निर्धन खेत
एकटक ताकते हुए
बस खड़े रहते थे हरदम हाथ जोड़े
जब-जब सूखता था असमय
धान की नस-नस में बचा-खुचा पानी
याद आती थी बहुत नानी
खाली घड़े की तरह औंधे मुंह
पड़ा रहता था बेशर्म जमुआर
खूब गुस्साती थी नानी
छड़ी उठाती थी
खूब खरा-खोटा सुनाती थी

यों तो कमबख्त देखने में
गजब का भोला-भाला था
क्या ये लंबे-लंबे
प्यारे-प्यारे खट्मिट्ठे जामुन के दरख्त
और क्या झुंड के झुंड कंटीले बबूल
क्या बिना दाढ़ी-मूंछ के ये बड़े-बड़े
लड़के
और क्या बित्ता-बित्ता भर की बकरियां
जिनके संग घास जुटाती
ये लंबी-लंबी लड़कियां हंसती-बोलती
क्या कोई जिंदा और क्या मुर्दा
क्या अपना तेतरी बाज़ार
और क्या नौगढ़
कहने को
सबका रखवाला था
किसी अल्हड़ पहाड़ी नदी से निकलकर
किसी और नदी में घुस जाने वाला
आधा मामूली और आधा गैरमामूली
आधा शरीफ और आधा बदमाश
नाला था
जमुआर नाला    

जब भी आती थी नानी
जमुआर के एक से एक किस्से
सुनाती थी नानी
जब-जब बरसता था पहाड़ पर पानी खूब
रह-रह कर घबराती थी नानी खूब
अब फूलेगा जमुआर का पेट
अब फटेगा जमुआर का पेट
फैल जाएगा दूर-दूर तक
जमुआर का पानी
अड़ोस-पड़ोस, कस्बा, गांव-गिरांव
हजार-हजार घरों में घुस जाएगा
इसका पानी

ठीक-ठीक समझ नहीं पाती थी नानी
यह पहाड़ पर बरसने वाला पानी है
या जमुआर नाले के राक्षस का उत्पात
किस-किस की लेगा जान
ढहाएगा किस-किस का घर
उठा ले जाएगा किस-किस का
ढोर-डंगर
जानना चाहती थी नानी यह बात
जामुन जैसे अपने मासूम नवासों को
बताना चाहती थी नानी यह बात

नहीं रही नानी
कब को चली गयी नानी
बहुत कुछ अनकहा छोड़कर
वापस अपनी कहानी के परियों के देश में
नहीं रहा
काठ का वह छोटा-सा मजबूत पुल
ठीक हमारी तरह जमुआर नाले पर
जहां हमने दोस्ताना बातें की थीं जी भर
कभी तेजी से अस्त होते हुए सूर्य के संग
कभी जल्दी-जल्दी पंख हिलाकर
सूर्य को विदा करते हुए पक्षियों से
कभी किया था जहां
किसी चांद का जी भर दीदार
और फिर एक लंबा इंतजार

यह कोई और पुल बन गया है
लंबा-सा कोई बहुत आधुनिक
आधुनिक से भी आगे
जो मुझे नहीं पहचानता
मेरी नानी को नहीं जानता

यह जमुआर नाला
अब उस तरह नहीं रहा
परदेस में मेरी दिनचर्या का हिस्सा
शायद यह कोई और नाला है
जमुआर है कि समय कि जीवन
जो बह रहा है धीरे-धीरे
जो कह रहा है धीरे-धीरे
कुछ मेरे भीतर
यह क्या है मेरे भीतर
ये कहां से आकर बस गयी हैं मुझमें
जामुन के लंबे-लंबे दरख्तों की परछाइयां
मेरी जीभ और मेरे दांतों को
किसने रंग दिया है जामुन के रंग से
ये कैसी हवा चल रही है
फड़फड़ा रहे हैं
मेरी आत्मा के पन्ने
जिस पर दर्ज है
जामुन के स्वाद की कैफियत
और नानी के हजार किस्से
ये मेरी आंखों को क्या हो गया है
अचानक
बह रही हैं जमुआर नाले की तरह अबाध
कहां से आ गया है इतना सारा पानी।
                                       
(‘जापानी बुखार’ संग्रह से)




शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

आलोचना की पठनीयता उर्फ एक सफाईकर्मी की वेदना


-गणेश पाण्डेय

    अजीब आदमी हूँ। रोज सोचता हूँ कि अच्छा अब कुछ समय के लिए आलोचनात्मक गद्य नहीं। अवकाश लेता हँू। तुरत फिर कोई बात हाथ पकड़ लेती है। कहाँ तक बचने की कोशिश करूँगा। बच नहीं पाऊँगा। एक लड़ाई चल रही है तो इससे छुटकारा नहीं मिल सकता। जब तक हँू, किसी खास विधा में कोई बहुत चाहा हुआ लिखने का काम करने के लिए फुरसत निकाल पाना मुश्किल है। इसी में जो बन पड़ेगा, करूँगा। एक मित्र ने कहा कि मेरी आलोचना की भाषा आमतौर पर आलोचना के नाम पर लिखे जा रहे गद्य की तरह नहीं  है। मैंने सोचा कि हाँ ठीक तो कह रहे हैं। कहाँ मेरी भाषा औरों की आलोचना भाषा की तरह है। पर वे चाहते हैं कि मैं भी वैसा ही लिखूँ। लिख तो लेता, कोई मुश्किल काम नहीं है। पर उस तरह लिखते हुए आलोचकों को देख रहा हूँ कि वे क्या कर रहे हैं। मुझे लगता है कि साहित्य में सच और झूठ की भाषा भी अलग तरह की होती है। मेरा एक ढ़िलपुक दोस्त लगातार उस भाषा में भंडारण करता रहा है। मैंने अपने ग़द्य का रास्ता उसे और उस जैसे तमाम आलोचकों को देख कर ही अलग किया है। मुझे लगा कि मेरी उम्र के आलोचक साफ-साफ कहने से बचते हैं। कोई डर है, जिसे छिपाने के लिए एक बनावटी और नखदंतहीन और कभी अतिशुष्क तो कभी अति चिकनी-चुपड़ी भाषा का इस्तेमाल करते हैं। अधिकांश आलोचक - जिसमें मेरे वक्त के ही नहीं, मुझसे पहले के भी-आलोचना की भाषा के नाम पर बेस्वाद और हलवाई भाई से भी अधिक पेंचदार जलेबियाँ बनाने के लिए मशहूर रहे हैं। मेरे आसपास ही उदाहरण हैं। पर हर बार वही नहीं। मेरा मानना है कि कविता की तरह आलोचना की भाषा भी आलोचना का मुखड़ा है। चेहरा है। जिसे देखकर हम पहचानते हैं कि ये अमुक हैं। आचार्य शुक्ल की भाषा पाठक को बता देती है कि आप फलां से मुखातिब हैं। यहाँ तक कि उनका इतिहास भी आलोचना की भाषा का बहुत अच्छा उदाहरण है। अंदाजे-बयां ऐसा कि लगे कि आप इतिहास नहीं कोई रचना पढ़ रहे हैं। आखिर कविता के पाठक होंगे तो अलोचना के पाठक क्यों नहीं होंगे या होने चाहिए ? ये संप्रेषण की समस्या कवि के साथ होगी और आलोचक के साथ नहीं होगी या नहीं होनी चाहिए ? कवि अपनी कविता संप्रेषित नहीं करेगा तो हम उसे फाँसी लगा देंगे और आलोचक अबूझ गद्य रचेगा तो उसकी सचमुच की पूजा करेंगे। मैं तो पूजा भी करूँगा तो ऐसे आलोचक की तो ढ़ंग से करूँगा, अपनी शैली में। मित्रो, आलोचना भी एक रचना है, कालाजादू नहीं। पठनीयता उसके लिए भी अनिवार्य शर्त है। लेकिन जब आलोचक बेवकूफ होता है या आलोचना के नाम बाहर का अनुवाद करने की बेवकूफी कर रहा होता है तो उसका गद्य या तो भूसे का मंडीला हो जाता है या प्लास्टिक का पहाड़। कभी-कभी तो ऐसा वजनी पत्थर हो जाता है कि इच्छा होती है कि उठाकर उसके मुँह पर दे मारूँ। ये बड़ी-बड़ी आदालतों की तरह ऐसी भाषा में अपनी बात कहते हैं कि साधारण जन समझ न पायें कि क्या कहा। जैसे शादी-ब्याह में पंडिज्जी संस्कृत में बुदबुदाते रहते हैं और दूल्हा-दुल्हन इस कान से सुन कर बिना कुछ समझे उस कान से निकाल देते हैं। अरे बाबा ये रोबोट हैं कि आदमी ? क्यों ऐसी भाषा में आलोचना लिखते हैं ? इतना ही नहीं हद तो यह कि ये हिंदी में लिख कर भी हिंदी में नहीं लिखते हैं। ये क्या लिखते हैं और क्यों लिखते हैं ? इसे समझना मुश्किल भी है और आसान भी। आसान मेरे लिए है। मैं जानता हूँ कि ये क्या छिपाने के लिए लिखते हैं ? बनना चाहते हैं बड़ा आलोचक और पैर हैं नन्हे-नन्हे, करें क्या, बस पाजाम या जींस या प्लास्टिक का पाइप जो भी मिल जाय लंबा-सा, तुरत अपना पैर उसमें डाल देते हैं। उसी में फँस कर अपनी हालत चाहे जितने बड़े विदूषक की कर लें इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है। क्योंकि ये आलोचक हैं। इन्हें कुछ भी बोलने और लिखने का हक है। ये खूब पहुँच वाली कविता या कथा पर ऐसी आलोचना लिख मारेंगे कि भगवान भी न समझ पायें। भगवान इसलिए कह रहा हूँ कि वे तो दुनिया की हजारों भाषाएँ जानते होगे। लेकिन दोस्तो आपको लग रहा होगा कि आलोचना में सभी ऐसे ही आलोचक हैं क्या ? बड़ी विनम्रता से कहना चाहूँगा कि नहीं। कई ऐसे आलोचक हैं जिनकी आलोचना भाषा उदाहरण है। सीखना चाहिए। हमारे समय के नये आलोचकों को जरूर सीखना चाहिए। मेरी बात और है, शुरुआत में ही मुझे अखाड़े में खींच कर फ्री स्टाइल कुश्ती का पहलवान बना दिया गया। मैं कविता का कार्यकर्ता, कुछ कथा साहित्य का कार्यकर्ता, मैंने तो स्वप्न में भी आलोचक बनने के लिए नहीं सोचा था। पर हमारे समय की आलोचना के कातिलों ने मुझे विवश किया कि मैं उनकी तफतीश करूँ। उनके गुनाहों की ओर आपका ध्यान खींचूँ। मैंने और कुछ भी नहीं किया है। बस, उनकी कलाई पकड़ने की जानबूझकर हिमाकत की है। 
         मैं चाहता हूँ कि नये आलोचक जिस भी इलाके में रहें, अपनी भाषा में संवाद करें। भोजपुरी या अवधी इलाके में रहकर पानी को पानी कहें, आब नहीं। नहीं तो पानी के बिना उसी तरह मर जायेंगे, जैसे बहुत से कवि असमय चले जाते हैं। जिससे कुछ कहना है उसकी भाषा में कहो, उसकी निकटतम भाषा और लहजे में कहो। आखिर आलोचना किसके लिए लिखते हो ? किसे बताना चाहते हो कि तुम किसी कविता या रचना को अच्छी तरह समझते हो ? यह मत भूलो आलोचकों कि तुम्हारा पाठक भी वही है जो कविता का या कहानी का पाठक है। कवि और कथाकार को अपना प्रथम पाठक समझने की नासमझी मत करो। ‘आलोचना क्या है’ जैसा कोई लेख तो अब तक हिंदी में किसी आलोचक ने नहीं लिखा है, पर मैंने ‘आलोचना क्या नहीं है’ लिखा है। आचार्य शुक्ल को पता रहा होता कि एकदिन आलोचना में आलोचना के कातिल भी आ जायेंगे तो यह जरूर लिखा होता कि ‘आलोचना क्या है’। बहरहाल शुक्ल जी ने जो लिखा है वह इतना अधिक है कि अब उनके छेद देखने के लिए मेरे पास फुरसत ही नहीं कि उनके यहाँ क्या नहीं है। आज की आलोचना के छेदीलालों को ही देखने में काफी व्यस्त हूँ। सच तो यह कि आचार्य शुक्ल ने सब को आलोचक समझा भी नहीं। बताया कि आलोचक में क्या-क्या होना चाहिए। आलोचना में क्या होना चाहिए, इसके लिए तो उनका आलोचनाकर्म खुद प्रमाण है। बात भाषा की हो रही है। आचार्य शुक्ल की भाषा आलोचना की सर्जनात्मक भाषा है। सर्जनात्मकता की तमाम खूबियाँ उनके यहाँ मौजूद हैं। उनकी भाषा मंें सौन्दर्य के साथ खासतौर से जो तंज और नमक है, वह बाद के कितने आलोचकों में है ? इसे अलग रखें तो भी कहना यह कि आचार्य शुक्ल को हिंदी आलोचना के प्रतिमान तय करने का जरूरी काम करना था। साहित्य की समझ के विकास और अध्ययन का व्यवस्थित मार्ग प्रशस्त करना था। पहले से चले आ रहे महत्वपूर्ण काम को आगे बढ़ाना था। हिंदी की मीनार बनाना था। ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ उदाहरण है कि विद्यार्थियों के लिए भी किस तरह बेशकीमती काम करते हैं। उन्हें सैद्धांतिक और व्यावहारिक आलोचना का पथ सुदृढ़ करना था। आचार्य शुक्ल ने बाहर की पारिभाषिक शब्दावलियों की हड्डी गले में लटका कर आलोचना का तांत्रिक नहीं बनना चाहा, जैसा आज के कुछ आलोचक करते हैं। उन्होंने खुद पारिभाषिक शब्द गढ़े। मेरे एक बहुत अच्छे शिक्षक थे डॉ. रामचंद्र तिवारी, उन्होंने हिंदी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली पर अच्छा काम किया है। आचार्य शुक्ल आलोचना कोश बनाया है। शुक्ल जी की पारिभाषिक शब्दावलियों की व्याख्या की है। आचार्य शुक्ल ने व्यावहारिक समीक्षा का जो आदर्श उपस्थित किया वह आज भी गौरतलब है। बड़ी कविता के प्रसंग में आचार्य ने ही बताया कि प्रबंधकाव्य में भी कुछ मार्मिकस्थल होते हैं। अर्थात शुरू से अंत तक सब मार्मिक ही मार्मिक नहीं होता है। इसी से समझ सका कि किसी लंबी कविता की सभी पंक्तियाँ महत्वपूर्ण अथवा मार्मिक नहीं होती हैं। आगे चलकर कई लंबी कविताओं में भी इसे देखा। पर कहना यह कि हिंदी आलोचना वहीं ठहर नहीं गयी जहाँ आचार्य ने उसे छोड़ा था। उनके समय की आलोचना की भाषा भी भले ही सर्जनात्मकता का शिखर उदाहरण है, फिर भी आलोचना आगे चलकर और अधिक पठनीय और अधिक संप्रेष्य हुई। रामविलास शर्मा ही नहीं बल्कि जिन नामवर जी में साहित्य की राजनीति समेत कई दुर्गुण देखता रहा हूँ, उनकी भी आलोचना की भाषा अधिक पारदर्शी, अधिक प्रभावशाली रही है। इसी शर्मा-सिंह युग में आलोचना की भाषा सच्चे अर्थों में संवादधर्मी हुई। हालांकि मुक्तिबोध की आलोचना की भाषा इनसे अलग है। फिर भी कहना यह कि आलोचना भी रचना की तरह पाठक से संवाद है। एक अर्थ में हर पाठक से एक निजी बातचीत जितना आत्मीय उपक्रम। आलोचना की जटिल-कृत्रिमभाषा और सहज-तरलभाषा का उदाहरण किन्हीं दो भाइयों के बीच देना हो तो मेघ जी और शिवकुमार जी को याद किया जा सकता है। मेघ जी से एक आलोचना संगोष्ठी में मैंने कभी अपने भाषण में पूछा था कि आचार्य शुक्ल ने कितनी किताबों का लोकार्पण किया था ? जाहिर है कि मेरा इशारा आज के लोकार्पण बाबाओं की ओर था। मिनट-मिनट पर लोकार्पण और चर्चा का खेला। आलोचना के पतन की वजहें तमाम हैं। उस पर फिर कभी। फिलहाल, बात भाषा की।
          ये ठहरे आलोचक गण। मैं ठहरा साहित्य का कार्यकर्ता। कार्यकर्ता की भाषा वही नहीे होगी, जो नेता या अधिकारी की होगी। सो मेरी भाषा आचार्य शुक्ल की तरह या रामविलास जी की तरह या किसी और की तरह कैसे हो सकती है। इनके बाद के उन आलोचकों की भाषा की तरह निर्जीव भी नहीं हो सकती है, जिन्होंने भूसाछाप गद्य को आलोचना की भाषा का पर्याय बना दिया है। कह सकते हैं कि प्लास्टिक युग की प्लास्टिक भाषा बना दिया है। जिसमें कोई जीवन नहीं है। मैं भाषा को रचना और आलोचना दोनों का मुखड़ा मानता हूँ। आलोचना की भाषा शुरु में ही आपको खींचेगी नही तो आप उसके भीतर प्रवेश कैसे करेंगे। हिंदी साहित्य की कोई परीक्षा पास करने की कोई मजबूरी तो नहीं कि जैसे-तैसे रोते-गाते पढ़ना ही है। कोई मजबूरी की शादी तो नहीं कि निर्वाह करना ही है। कुछ दूर साथ चलना ही है। मैं पहले भी कह चुका हूँ कि आलोचना में भी आलोचक की छाप दिखनी चाहिए। क्या आचार्य शुक्ल और रामविलास शर्मा की आलोचना की भाषा में उनकी छाप नहीं दिखती है ? पहले का समय कुछ और था। आज का समय कुछ और है। आचार्य शुक्ल के समय में हिंदी भाषी समाज में साहित्य का संस्कार बचा हुआ था। आज सब उस संस्कार की ऐसी-तैसी कर चुके हैं। आज हिंदी भाषी समाज में कविता के लिए ही जगह नहीं है तो आलोचना के लिए खाक जगह होगी ! आलोचना तो कविता से भी अधिक दिलचस्प और पारदर्शी भाषा में लिखने की जरूरत है। ऐसी भाषा में जो पाठक से तुरत दोस्ती कर ले। पाठक आलोचना को भी रचना की तरह पढ़े। मैं सिर्फ ऐसा ही सोचता और लिखता हँू। जब तक हँू और ंिहंदी कविता और आलोचना के गुम पाठकों की खोज तब तक ऐसे ही करता रहूँगा। वैसे क्या ऐसा नहीं सोचा जा सकता है कि जैसे कविता या कहानी के अलग-अलग पाठक होते हैं, उसी तरह ऐसी आलोचना लिखें कि उसके भी अपने पाठक हों ? वह भी पढ़े जो न कविता पढ़ता हो, न  कहानी ? एक मित्र के यह कहने पर कि मेरे आलोनात्मक लेखों में आलोचना की भाषा नहीं है, भावना की तीव्रता है। मैंने विनम्र निवेदन किया कि यह मेरी सीमा है कि मैं उस तरह की आलोचना नहीं लिख पाता हूँ या लिखना ही नहीं चाहता हूँ। क्योंकि उस तरह तो तमाम मित्र लिख ही रहे हैं। अपने को अलग कर आलोचना लिख पाना मेरे लिए संभव नहीं है। अपने दर्द को टूटे-फूटे ढ़ंग से कहने की कोशिश करता हूँ। यहाँ यह कहना भी बहुत जरूरी है कि इसीलिए मैं हिंदी का दर्द हिंदी में हिंदी के लोगों से कहने की कोशिश करता हूँ। जिनके पास हिंदी का कोई दर्द ही नहीं होगा, बल्कि जिनकी जीभ पुरस्कार के लिए बित्ता भर निकली होगी, वे तो हिंदी आलोचना को भी अंग्रेजी में चाहे किसी अन्य कूटभाषा में लिखेंगे। मेरे लिए हिंदी के लोग सिर्फ विश्वविद्यालयों में पढ़ाने और पढ़ने वाले लोग या केवल कविता-कविता या पुरस्कार-पुरस्कार का खेल खेलने वाले लोग नहीं हैं। विश्वविद्यालय तो हिंदी के फाँसीघर हैं ही। आलोचना न तो शोधप्रबंध की भाषा है, न प्राध्यापक की भाषा है। हालांकि हिंदी के कई अगड़मबाइस आलोचक प्राध्यापकीय भाषा ही नहीं पूरी प्राध्यापकीय आलोचना की ही नकल करते या लिखते पाये जाते हैं। मैं यहाँ अपनी बात को साफ करना जरूरी समझता हूँ कि किसी को यह भ्रम नहीं होना चाहिए जो प्राध्यापक लिखे वह प्राध्यापकीय आलोचना है, आचार्य शुक्ल से लेकर कण से भी छोटे और उससे भी छोटे अति छोटे, छोटे सुकुल तक सब प्राध्यापक रहे हैं। ऊपर जिन रामविलास जी और नामवर जी का जिक्र किया वे भी प्राध्यापक रहे हैं। पर ये प्राध्यापकीय आलोचक नहीं हैं। प्रायः प्राध्यापक अपने इमामजस्ते में हजारबार कूटे गये लोहे को फिर-फिर उसी तरह कूटता है, ंटाइप कराता है और जहाँ-तहाँ भेज देता है। यही काम गैरप्राध्यापक आलोचक भी आजकल खूब करते हैं। ये न अपने दिमाग का इमामजस्ता (इमामदस्ता) बदलते हैं ? न नया लोहा लाते हैं, न पुराने लोहे को नये ढ़ंग से कूट पाते हैं। बाजदफा नये लोहे की जगह चमड़ा उठा लाते हैं और कहते हैं कि यही नया लोहा है। सच तो यह कि नये से इनका सात पीढ़ियों से बैर है। रचना और आलोचना तो दूर ये अपने हाथ की रेखाएँ भी नहीं देखते हैं। यह भी नहीं देखते कि आखिर क्या बात है कि उनके हाथों की छाप उनके लिखे पर नहीं है। ये सामूहिक रूप से अपठनीय आलोचना लिखने का जुर्म करते हैं। इन्हें इस जुर्म की सजा भला कौन दे सकता है ? ये आलोचना की अदालत और उसके जजों के खासमखास होते हैं। यहाँ तक कि वे बड़े भारी आलोचक भी अपनी पत्रिका में आतंककारी ठसगद्य में लिखे गये इनके आलोचनात्मक लेख छापते रहे हैं। उन्होंने तनिक भी नहीं सोचा कि भाई जिस तरह मेरी आलोचना की भाषा पारदर्शी है, उस तरह की भाषा को बढ़ावा दूँ। हिंदी की पत्रिका में ये किस भाषा में विचार परोस रहा हूँ ? सर्जनात्मक गद्य है कि सचमुच का ही कोई लोहे का चना ?
          बहरहाल मैं कोई उस तरह का आलोचक थोड़े हूँ कि कविता हुई नही ंतो चलो आलोचना से ही थोड़ा इश्क कर लेते हैं। मैं तो कविता से शुरुआती इश्क के दौरान ही हिंदी के राक्षसों से भिड़ने के लिए आलोचना में फाट पड़ा। असल में वे तंग बहुत करते थे। वे यह चाहते ही नहीं थे कि हिंदी का कोई मास्टर कविता-फविता लिखे। वे चाहते थे कि सब उनकी तरह नौमीनाथ से लेकर चिरकुटप्रसाद तक का झोला ढ़ोयें और जयजयकार करें। बस। और कोई काम न करें। मेरी हिमाकत देखिए कि मैं जल में रह कर मगर से बैर करने लगा। फिर हुआ वही जो होना था। मगर मुझे आहत करते और मैं मगर को पानी से निकाल-निकाल कर धोता। मेरी ऐसी किस्मत न थी या उसके लिए शर्तें पूरी करना मेरे लिए संभव न था कि मैं सरस्वती के सबसे बड़े मंदिर में पुजारी या महंत की गोद या चरणों में बैठने की जगह पाता। फिर मैंने तय किया कि मंदिर की ही सफाई जरूरी है। कहते हैं कि जब जुल्म हद से ज्यादा बढ़ जाता है तो एक कमजोर से कमजोर व्यक्ति भी बागी हो जाता है। बंदूक उठा लेता है। वे भाग्यशाली होते हैं जिन्हें महाबली की गोद में बैठते ही लेखक हों या न हों सोने की कलम इनाम में मिल जाती है। वे क्यों लोहे की बंदूक छुएँगे ? वे खुशकिस्मत लेखक होते हैं जिन्हें पैदा होते ही शुरू में कोई गॉडफादर मिल जाता है। कोई ऐसा रामचंद्र जो उन्हें हिंदी के राक्षसों के उत्पात से बचा कर रखता है और वे रचना का यज्ञ चुपचाप करते रहते हैं। वे बदनसीब लेखक होते हैं जो एक हाथ से हिंदी के राक्षसों से लगातार लड़ते हैं तो दूसरे हाथ से रचने का काम करते हैं। साहित्य के इस सबसे मुश्किल जीवन को सब नहीं समझ सकते हैं। कुछ होते हैं जिन्हें कोई बड़ा गॉडफादर नहीं मिल पाता है, उसका असस्टिेंट मिल जाता है, उसके जरिये द्विस्तरीय सुरक्षा पा जाते हैं। कुछ हैं जो उससे भी कम सुरक्षा में रहकर कभी-कभी पुरस्कार के लिए रो-रोकर रचना करते रहते हैं, ताकि कभी पुरस्कार पा सकें। आलोचना में भी ठीक यही स्थिति है। सुविधाजनक, सुरक्षित और ‘प्रगतिशील’ लेखन। कई लेखक ढ़ंग का गॉडफादर न मिलने पर लेखक संगठन में शामिल हो जाते हैं। सारी जिम्मेदारी संगठन पर डाल कर बिना किसी आत्मसंघर्ष के रचना और आलोचना करते रहते हैं। लेखक संगठन उनके लिए सुरक्षाचक्र और सीढ़ी दोनों का काम करने लगता है। कुछ दादा टाइप लेखक देशभर में राज करने के लिए संगठनोें के अध्यक्ष भी बने। किया भी। कई बार ऐसे संगठन इनके नेताओं को डुबाने का भी काम करते हैं। खुद उनकी आलोचना से ईमान गुम हो जाता है। अच्छा हुआ कि मैं इन संगठनों में नहीं गया, कोई गॉडफादर नहीं बनाया। बड़े-बड़े दिग्गज आते थे। चले जाते थे। उनके इर्दगिर्द हिंदी के राक्षसों का जमावड़ा और उनके बीच खुद उनका अट्टहास...लगता कि अरे ये तो खुद दशानन हैं। किधर से देखूँ ? हटाओ....हटाओ इसे.....
           अच्छा यह कि मैं स्वेच्छा से बल्कि कहें कि अपनी आत्मा की पुकार पर सरस्वती के मंदिर में झाड़ूवाला बन गया। सफाई करने लगा। मेरे पिछले लेख ‘कविता की पहुँच’ पर एक टीप में नीलकमल ने ठीक ही कहा कि ‘‘ जो है उससे बेहतर चाहिए पर अमूमन एक आम सहमति तो बनती है लेकिन जैसे ही ‘बेहतर’ के निमित्त ‘मेहतर’ बनने की बात आती है, अच्छे-अच्छे लोग खामोश पाए जाते हैं। एक जेनुइन आलोचक-समीक्षक सबसे पहले साहित्य का सफाई कर्मचारी ही होता है। आपके इस आलेख का स्वागत और उद्योग को पूरा समर्थन।’’ ध्यान देने की बात है कि नील कमल जैसे निर्मल कमल ही साहित्य का सच कह और स्वीकार कर सकते हैं। आज के लाल और पीले कमलों के शीश कहाँ-कहाँ कितने नत हैं और किस-किस तिकड़म में रहते हैं, सब जानते हैं। कौन-कौन कविता और आलोचना में बाबू या मुंशी की तरह काम करता है, यह जानना मुश्किल नहीं है। बहुत से लोग आलोचना की बाबूगीरी में लगे हैं। कोई इन्हें मुंशी भी कह सकता है तो कोई मुनीम भी कह सकता है। हैं सब एक ही तरह के आलोचक। अभिनय ऐसा करेंगे जैसे इतनी गंभीरता से इसके पहले कभी विचार ही नहीं हुआ था, ये गंभीरता का पहाड़ अपनी धराऊँ या बहुप्रचलित, दोनों तरह की शब्दावली से करते हैं। अनुवाद की ऐसी हिंदी लिखते हैं कि हिंदी भी शरमा जाए। असल में इनकी अतिबौद्धिकता के आतंक के पीछे सिर्फ और सिर्फ इनका डर होता है। ये डरते हैं कि सब जान न जायें कि ये डरते हैं। बौद्धिकता इनके लिए सच और ईमान को छुपाने का खोल है। ऐसे में जिसमें रत्तीभर साहित्य का ईमान होगा, वह इनकी तरह बनने से रहा। वह सफाई कर्मचारी बन जाएगा, झाड़ू लेकर जगह-जगह खड़ा रहेगा पर बेईमान बाबू बन कर आलोचना की पुरानी फाइलें नहीं पलटेगा। इस सफाई वाले को भी कुछ लोग गौर से देखते हैं। हालचाल पूछते हैं। उसकी झाड़ू को इज्जत देते हैं। खुशी इस बात की कि ऐसे एक ही नहीं हैं, कई हैं। जिन्हें मैं देख रहा हूँ और जिनके साथ हूँ। सच के साथ रहने वालों की भाषा और झूठ के साथ रहने वालों की भाषा में फर्क होता है। कविता और आलोचना दोनों की भाषा में इसे देखा जा सकता है। कविता और आलोचना के स्वर्ग में रहने वाला कवि-आलोचक नहीं हूँ। अपनी ही एक कविता ‘नरक का कवि हूँ’ का जिक्र करना चाहूँगा। एक अंश-

नरक का कवि हूं तो हूं
कुछ भी नहीं हूं तो क्या
गोबर का गणेश हूं तो क्या
हूं तो हूं नरक का कवि हूं
लालाजी नहीं हूं तो क्या
पंडिज्जी नहीं हूं तो क्या
पानीपांड़े हूं तो क्या
हूं तो हूं 
खुश तो हूं 
नरक का कवि होने पर
यहां से वहां तक सिरपर
दुनियाभर का मैला ढ़ोने पर
लो देख लो लालाजी
हां-हां पंडिज्जी देख लो गौर से
खड़ा तो हूं सामने
थोड़ा-सा मैला निकालकर
चंदन की जगह पोत लो...
    
     साहित्य में क्यों एक लेखक के सिर पर अपने अंचल चाहे दुनियाभर के पंडिज्जी लोगों का मैला है और मैला करने वाले पंडिज्जी लोगों के ललाट पर चंदन का टीका ? आखिर क्यों एक लेखक पंडिज्जी लोगों से कहता है कि चंदन की जगह थोड़ा-सा मैला पोत लो। यह कैसा प्रतिरोध है ? यह कैसी खराब कविता है कि चंदन की जगह मैला देखना चाहती है ? यह साहित्य का कोई विमर्श क्यों नहीं है ? साहित्य के अछूत या हाशिये के कार्यकर्ताओं का यह विद्रोह क्यों नहीं दिखता है ? विमर्शवादी खुद क्यों पंडिज्जी और बाऊसाहब या लाला जी लोगों के दरबार में शीश नवाते हैं ? उन्हें आखिर पुरस्कार और चर्चा से इतना प्रेम क्यों है ? साहित्य के समाज में पहले हाशिये के लोगों और पंडिज्जी लोगों की लड़ाई में क्यों नहीं अपना पक्ष चुनते हैं ? जाहिर है कि चुनने के नाम पर ये सत्ता की गोद चुनते हैं। टीका चुनते हैं, चरण चुनते हैं, खड़ाऊँ चुनते हैं। यह कैसी प्रगतिशीलता है ? ये विमर्शवादी क्यों संस्कृतीकरण का शिकार होकर साहित्य की प्रभुजातियों की तरह उनके रहन-सहन और सोच-विचार और आचरण का अनुकरण करते हैं। क्यों नहीं अपनी आलोचना को पाठकों तक ले जाने के लिए सोचते हैं ? क्यों नहीं हिंदी में हिंदी लिखते हैं ? किसका डर है ? कोई चाहे तो हवा निकालने के लिए पूछ सकता है कि रचना या आलोचना की भाषा ठीक वही है जो बोली जाती है ? हूबहू बोलचाल की भाषा ? नहीं भाई। वही भी है और सिर्फ वही नहीं है। सजर्नानात्मक भाषा बोलचाल की भाषा पर आधारित हो सकती है, पर वह एक उन्नत भाषा होती है। पाठकों को संप्रेषित होने वाली उन्नत सर्जनात्मक भाषा से बैर नहीं है। बैर उसके अबूझपन या अमूर्तन या जलेबीपन से हैं। सर्जनात्मक भाषा का जीवन उसकी अभिव्यक्ति के वैशिष्ट्य पर निर्भर करता है। यहाँ जोर सिर्फ साफ-साफ कहने पर है और पूरा सच कहने पर है। भाषा को छल से मुक्त करने पर है। कह सकते हैं कि सारा बल भाषा को ईमान की रोशनाई से लिखने पर है।








गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

कविता की पहुँच

-गणेश पाण्डेय

मित्रो, संकट सिर्फ दूर से दिख रहा हो तो उतनी बेचैनी नहीं होती है, जितना वह दिख रहा हो चाहे न दिख रहा हो, बस निरंतर अनुभव हो रहा हो कि है खतरा है...तो बेचैनी भीतर से मथ डालती है। अपने समय के कवि समाज और कविता के सामने संकट के अहसास से इधर काफी दिनों से बहुत बेचैन हूँ। मेरे पिछले लेख ‘‘ क्रांति भी, रोना भी, प्यार भी....’’ पर पाँच शब्दों की एक छोटी-सी टीप के रूप में कवि विमल कुमार ने एक जरूरी बात पूछ कर मेरी बेचैनी को थोड़ा-सा और बढ़ा दिया है-‘‘कविता पहुँचे कैसे दूर तक ?’’ जाहिर है कि मेरे लिए इस प्रश्न से भी टकराना फिलवक्त बेहद जरूरी हो गया है। इसे मैं सिर्फ पाँच छोटे-छोटे शब्दों की एक साधारण टीप मान कर स्थगित नहीं कर सकता था। सच तो यह कि यह सिर्फ एक प्रश्न नहीं, जैसे मेरे कलेजे से उठती हुई कोई लंबी टीस है। मैंने विमल जी से कहा भी कि आपकी कविता मुझ तक तो पहुँचती है। मुझ तक पहुँचने में संप्रेषण का संकट नहीं है। पर यह हमारे समय की कविता का एक बड़ा संकट तो है कि वह अपने पाठक तक नहीं पहुँचती है। कविता के देहात का एक साधारण कार्यकर्ता हूँ, थोड़ा उजड्ड ही सही, इस नाते से यह हक तो बनता ही है कि हमारे समय में लिखी जा रही सभी कविताएँ कम से कम मुझ तक तो जरूर पहुँचें या मेरी तरह जितने भी लोग हैं, उन तक जरूर पहुँचें। अभी बाँदा, कोलकाता, दिल्ली, मेरठ, बलिया और दूसरी जगहों के तमाम मित्र भी कह रहे थे कि कविताएँ उनके यहाँ भी कम पहुँच रही हैं। जबकि कविता की लदनी तो खूब हो रही है। पर असल में सुपाच्य और श्रेष्ठ अन्न गरीबों तक पहुँच कहाँ पाता है ? गरीब बेचारा तो साँवाँ-कोदो इत्यादि से गुजर-बसर करता है। फिर कविता के हम गरीबों तक बासमती कविताएँ भला कैसे पहुँचेंगी ? वाह रे कविता ! आज जैसे राजनीति में गरीबों की बात केवल वोट लेने के लिए की जाती है और उनका कोई सचमुच का शुभचिंतक नहीं है। उसी तरह साहित्य की संसद में तीज-त्योहार पर कविता के पाठक की बात रह-रह कर की तो जाती है पर सचमुच में उनका कोई शुभचिंतक नहीं है। असल में यह देश अघाये हुए लोगों कर देश है। खूब तेल-घी पीकर मस्त लोगों का देश है। कोई-कोई उजड्ड लड़के खून पीकर मोटा हुए खटमल से भी इनकी तुलना करने का अकाव्यात्मक काम करते हैं। हाँ तो साहब किस्साकोताह यह कि अघाये हुए लोग ही साहित्य की सरकार भी चला रहे हैं। साहित्य में भी कोई जनता की सचमुच की सरकार थोड़े है। भला अघाये हुए लोगों को भ्रष्टाचार से क्या लेना-देना। उनके पास संसद है वे कानून बना सकते हैं कि आज से कोई भ्रष्टाचार को भ्रष्टाचार नहीं कहेगा, बल्कि शिष्टाचार कहेगा। साहित्य की संसद में कोई कानून तो नहीं बनता है पर हाँ एक रवायत शुरू कर दी जाती है। जिसमें तरह-तरह के भ्रष्टाचार और गड़बड़झाले होते हैं। दूसरे साहित्य में ऊपर चढ़ने की सीढ़ी भी तरह-तरह की होती है। इन्हीं सीढ़ियों में कुछ बाहर से मँगायी हुई सीढ़ियाँ भी होती हैं। इधर कविता में आयातित वैश्विक सीढ़ी के लिए बहुत से नये बच्चे मचल रहे हैं, कविता के पुराने घाघ तो उसे लगाकर साहित्य की संसद में कूद जाने का विफल उपक्रम कर ही चुके हैं। कहते हैं कि कोई पुराने ‘‘गद्यकाव्य’’ की जगह इधर विदेश से कोई नयी सीढ़ी ‘गद्य कविता’ की आयी है। कहते हैं कि यह सीढ़ी अन्तरराष्ट्रीय कविता की सीढी है। इस पर चढ़ते ही कवि दो मिनट में अन्तरराष्ट्रीय हो जाता है। इस सीढ़ी को ही कोई-कोई गद्य कविता भी कहते हैं। हमारे यहाँ यह सीढ़ी पहले नहीं थी। कोई देसी सीढ़ी थी। हमारे यहाँ महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘‘ कवि कर्तव्य ’’ नाम का निबंध लिखा था। उन्होंने यह कभी कहा था कि जैसे संस्कृत में सब छन्द तुकान्त नहीं हैं, उसी तरह तुम भी अपनी कविता का रूप बदलो। उन्होंने कहा था कि पर्वत से कण तक, समुद्र से बूँद तक और हाथी से चींटी तक सब कविता के विषय हो सकते हैं। उन्होंने हिंदी काव्यभाषा का आधार खड़ी बोली को बनाने का भारी उद्योग किया था। पर उन्हें कुछ ऐसा आता ही नहीं था, जैसा आज के संपादक करते हैं। उन्होंने सरस्वती को ‘‘साहित्य का झटका और थियरी का तड़का’’ कभी नहीं कहा था। आज की साहित्यिक पत्रिकाएँ खुद को क्या कहती हैं और क्या करती हैं, यह चिंता का विषय है या लज्जा का, यह मुझे मालूम नहीं है। पर कविता की चिंता तो मुझे है। भले की ‘कविकर्तव्य’ या ‘कविता क्या है’ जैसा लेख लिखने की कूवत मेरे पास न हो। इसीलिए मैंने छोटा काम किया, लिखा ‘कविता क्या नहीं है’। कविता की दुनिया में छंद-वंद बदलने की कूवत भी मेरे पास नहीं है। मुक्तछंद-वंद की बात-वात भी नहीं करना है मुझे। कवित्त का आधार कैसे हटा और सिर्फ लय कैसे छंद का काम करने लगी, इसे भी छोड़ो। इस बात को पकड़ो कि कैसे कुछ बंदे लय का कचूमर निकाल कर उसकी ऐसी-तैसी कर रहे हैं। वे कविता से कवितापन निकालकर उसे जटिल आशय का अति बौद्धिक निबंध और जटिल शिल्प की अमूर्त कथा और कुछ-कुछ अगड़मबाइस फैंटेसी का कॉकटेल बना देना चाहते हैं। ‘कविता का चाँद और आलोचना का मंगल’ लेख में एक लालबत्ती कवि की कविता का अंश रखकर बता चुका हूँ कि यह लेख का टुकड़ा है, कविता नहीं। ऐसे कवि कविता के पाठक को पहले अंधा बनाते हैं-जैसे कुछ राहजन आँख में मिर्ची झोंक कर राहगीरों को लूट लेते हैं- फिर कहते हैं कि लो छूकर देखो, यही कविता है। वे कविता से कविता के सारे जीवनोपयोगी अंग काट कर निकाल देना चाहते हैं। कोई चाहे तो कह सकता है कि कविता की किडनी निकाल कर उसे बेचने के बाद जो पाएंगे उससे दो-चार पुरस्कार खरीदेंगे और कुछ संपादकों और आलोचकों को दारू पिलाएंगे। जाने भी दो ऐसे नशेड़ियों को, जो घर के बर्तन बेच कर पीने की सोचते हैं। बीवी और माँ के गहने बेचकर पुरस्कार का जुआ खेलते हैं। लंबे-लंबे पैराग्राफ, तत्सम या कहीं-कहीं तद्भव की छौंक का मिलाजुला प्रकाशवृत्त, जैसे कोई नकली बाणभट्ट खुद गद्यकविता के लिए आ गये हों। बात या कथ्य या संवेदना या विचार, प्लास्टिक की जलकुंभी से ढ़के हुए तालाब के मैले जल की तरह अदृश्य, भीतर कहीं गहरे में अबूझ और अथाह। बेचारा बिना नाव का पाठक कैसे पहुँचेगा वहाँ तक ? मैं और मेरे जैसे कविता के सभी कार्यकर्ता डूब मरेंगे , कविता के पानी को न साफ कर पाने वाली प्लास्टिक की जलकुंभी में फँसकर। दुख यह कि मित्र विमल भी नही बचेंगे। जो भी कविता का कार्यकर्ता होगा, बचेगा नहीं। सब किस्सा खतम हो जायेगा। कोई कविता का उठाईगीर हो तो उसके बारे मेें कह नहीं सकता। असल में ये बाहर की सीढ़ी वाले, हिंदी कविता का किस्सा ही खतम कर देना चाहते हैं। यह चाहते हैं कि एक भी पाठक हिंदी में बचे ही नहीं। जिससे कि कोई ये कह ही न सके कि साहब आपकी गद्यकविता तो मुझ तक संप्रेषित हुई ही नहीं। ये कविकर्म के लिए नहीं जाने जाएंगे, कभी जाने भी गए तो कविता के शीर्षासन के लिए जाने जाएंगे। ये कवि गरीबी नहीं गरीब को ही खत्म करने के रास्ते पर चल रहे हैं। कोई पूछे इनसे कि फिर आप किसके लिए लिखते हैं ? असल में ये आलोचक महराज को खुश करने के लिए लिखते हैं। ये अंटशंट कुछ भी लिखकर कहते हैं कि आप हमें कविता का एवरेस्ट फतह करने का पुरस्कार दे दीजिए हुजूर। यह सब मगजमारी करने का आशय सिर्फ यह कि आप जो कविता लिख रहे हैं, किसके लिए लिख रहे हैं साफ-साफ बताइए ! लाख टके का सवाल यह कि आज कविताएँ पाठक को ध्यान में रखकर लिखी जा रही हैं या नहीं ? तुम मेरी कविता आँख मूँद कर देखो और अद्भुत कहो और मैं तुम्हारे साथ यही करूँ। कहना यह कि कविता और कवियों-आलोचकों का यह लेन-देन ही कविता का शत्रु है। 
     आज की हिंदी कविता के हजार शत्रु हैं। ऊपर जिस गद्यकविता की बात की गयी है, हालाँकि वह हमारे समय की कविता का दो फीसदी भी नहीं है। दो-चार भटके हुए मुसाफिर हैं। अर्थात यह संकट नहीं सिर्फ संकट की छाया है। कविता के बड़े शत्रु तो दूसरे हैं। सच तो यह कि कविता के कोई एक-दो शत्रु हों तो छोटा-बड़ा भी कहें। शत्रु तो हजार हैं। एक से बढ़कर एक। पर विमल जी की बात को केंद्र में रखते हुए कहना चाहूँगा कि कविता की पहुँच का संकट आज की कविता के ठीक सामने है। मित्रो, ये जो बार-बार गद्यकविता कह रहा हूँ, उससे आप यह न समझ लें कि मैं लौट कर छंदकविता के युग में जाने की बात कर रहा हूँ। ऐसी कोई बेवकूफी करने से रहा। कोई और करे तो उसकी मर्जी। मैंने पहले भी कहा था कि खराब कविता छंदबद्ध कविता में हो सकती है और छंदमुक्त कविता में भी। अच्छी कविता छंद में भी हो सकती और छंद मुक्त कविता में भी। सवाल अच्छी कविता का है। अलबत्ता, गीतों या जनगीतों और खंडकाव्य वगैरह की सीमा जानता हूँ। आप भी जानते हांेगे। इसलिए यह नहीं कह सकता कि सब छोड़छाड़ कर फिर से गीतों की पुरानी दुनिया में लौटिए। गीतों में ‘अँधेरे में’ नहीं लिख सकते। गीतों से ही देवेंद्र कुमार और दूसरे तमाम कवि नयीकविता और उसके बाद की कविता में आए थे। आप किसी खास मौके लिए अभियान गीत जरूर लिख और गा सकते हैं पर उसकी सीमा है। इधर छंद मे हिंदी गजल या दोहा इत्यादि कहने का एक छोटा दौर जरूर चला पर उसके साथ भी आज के यथार्थ और दर्द को व्यक्त करने का वैसा ही संकट है। गजल में आप ‘जापानी बुखार’ नहीं लिख सकते हैं। हर विधा की अपनी मूल प्रकृति होती है। आप धोती को फाड़कर रूमाल तो जरूर बना सकते हैं, पर जनाब रूमाल को धोती नहीं बना सकते। कविता और लंबी कविता का रूप थिर होने में भी वक्त लगा। महाकाव्य की जगह गद्य में उपन्यास ने ली तो कविता में लंबी कविता ने। कहानी विधा के साथ कई छोटी गद्यविधाओं का भी विकास हुआ। पर ऐसा नहीं हुआ कि कहानी, कविता बन जाय और कविता, कहानी। दोनों मे लेन-देन तो हुआ प्यार-मुहब्बत की तरह, पर गौर फरमाइए हुजूर कि दोनों का चेहरा नहीं बदला। ये दूसरे लोग हैं जो कविता को लड़की से लड़का या लड़का से लड़की बना रहे हैं। बहरहाल छोड़िए इन फरेबियों को, बात कविता की कीजिए। हाँ, कविता कैसे पहुँचे दूर तक ? बताते हैं कि एक जमाने में जब कविता राजाओं के दरबार में कैद हो गयी थी या कवियों को चंद अशर्र्फी देकर गुलाम बना लिया गया था, तो कविता को जनोन्मुख करने के लिए कविसम्मेलनों की शुरुआत हुई। यह विदित है कि एक समय में कविसम्मेलनों ने जनता को कवितामय करने में बड़ा योगदान किया है। समाज में कविता को फिर से प्रतिष्ठित किया था। आधुनिकाल के कई बड़े कवियों ने मंचों पर कविता पाठ किया था। आज की तारीख में गंभीर कही जाने वाली कविता के कितने कवि मंच पर टिक सकते हैं ? कोई ससुर गीत या हिंदी गजल पढ़कर हटेगा तो उसके बाद किस तरह की कविता टिक पाएगी ? कविता में वह ताकत होगी ? फिर एक उदाहरण दूँगा कि एक बार यहाँ दूरदर्शन के एक कार्यक्रम में गलेबाज कवियों के बाद पाठ करना मुश्किल काम था। मैं दृश्य देख रहा था कि उनके पास कविता कम और गला ज्यादा था। बहरहाल मैं सुर में गजल पढ़ने वाले कवि के बाद आया और मैंने इस कविता का पाठ किया। मैं जानता था कि ,‘‘एक चाँद कम पड़ जाता है’’ कविता ही उस कवि की कविता का बेहतर जवाब है-

कई बार एक जीवन कम पड़ जाता है
एक प्यार कम पड़ जाता है कई बार
कई बार हजार फूलों के गुलदस्ते में
चंपे का एक फूल कम पड़ जाता है
एक कोरस ठीक से गाने के लिए 
एक हारमोनियम कम पड़ जाता है
कई बार।
सांसे लंबी हैं अगर
और हौसला थोड़ा ज्यादा
तो तबीअत से जीने के लिए
एक रण कम पड़ जाता है
जो है और जितना है उतने में ही
एक दुश्मन कम पड़ जाता है।
दिल से हो जाय बड़ा प्यार अगर
तो कई बार 
एक अफसाना कम पड़ जाता है
एक हीर कम पड़ जाती है
ठीक से बजाने के लिए 
सितार का एक तार कम पड़ जाता है
एक राग कम पड़ जाता है।
कई बार 
आकाश के इतने बड़े शामियाने में
एक चाँद कम पड़ जाता है
दुनिया के इस मेले में देखो तो
एक दोस्त कहीं कम पड़ जाता है
एक छोटी-सी बात कहने के लिए
कई बार एक कागज कम पड़ जाता है
एक कविता कम पड़ जाती है।
(परिणीता)

कुछ और प्रेम कविताएँ पढ़ीं। सुनने वाले इन कविताओं में भी पूरी तरह डूबे। बताना यह था कि अपनी कई नई कविताओं के बाद भी ज्ञानेंद्रपति ने जब चेतना पारीक वाली कविता का पाठ किया तब कहीं जाकर श्रोता उनसे तृप्त हुए। यह तो दूरदर्शन का कार्यक्रम था जहाँ कुछ विशिष्ट वर्ग के श्रोता थे। कविसम्मेलन और मुशायरे के अधिकांश श्रोता सतह की श्रृंगारिक कविताओं और फूहड़ हास्य कविता के रसिया होते हैं। मुशायरे में जरूर बद्र और राहत वगैरह कुछ दूसरे तरह के शायर होते हैं। वहाँ भी अब कृष्णबिहारी नूर जैसे शायर कम रह गए हैं, जिनके शेर अपने समय के युवाओं के दिमाग बदल देते थे-

‘‘ मैं एक कतरा हूँ मेरा वुजूद तो है
हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है।

अपने दिल की किसी हसरत का पता देते हैं
मेरे बारे में जो अफवाह उड़ा देते हैं।

चाहे सोने के फ्रेम में जड़ दो
आईना झूठ बोलता ही नहीं। ’’


    कहना यह है कि आज की हिंदी कविता कम से कम पाठकों और श्रोताओं के पास नहीं है। उनके बीच है जो कविता या आलोचना लिखते हैं। यह हमारे समय की कविता की सीमा है कि वह अपने पाठकों से कट गयी है। कह सकते हैं कि कविता के पाठक गुम हो गये हैं। जिन्हें ढ़ूँढना बेहद जरूरी हैं। जगह-जगह स्टेशनों पर पोस्टर लगाइए, चाहे लाउडस्पीकर लगाकर रिक्शे पर घूमिए। पर उसे ढ़ूँढिए। चाहे जाइए कविसम्मेलनों के मंचों पर उससे मिन्नत कीजिए कि अच्छे बच्चे की तरह घर लौट आये। इस सिलसिले में कहना यह कि सच्चाई कुछ और है। कविसम्मेलन का जो स्वरूप है, उससे हिंदी कविता के पुराने दिन लौट नहीं सकते हैं। उसके पहले हमें गोष्ठियों और चर्चाओं में उन कविताओं की ओर ध्यान केंद्रित करना होगा जो हिंदी कविता के नये पाठक या श्रोता वर्ग के निर्माण के लिए कारगर हों। यह काम हमें बिना भेदभाव और बेईमानी के करना होगा। यह भूल जाना होगा कि इस कवि ने मेरा पैर छुआ है या नहीं, इस कवि ने मुझे फलां वक्त पर गाली दिया था या नहीं इत्यादि। पाठक बचेगा, तभी कविता बचेगी और तुम भी तभी बचोगे बुद्धू ! दरअसल हिंदी पाठकों की रुचियों का परिष्कार करने से पहले हमें हिंदी के कुकवियों का परिष्कार करना होगा। क्योंकि इनकी चिंता में तो पाठक-साठक नहीं, बस पुरस्कार है। हिंदी जाय भाड़ में बस एक अदद मिल जाय कविता का तमगा। एक लालबत्ती। मूर्खता इस हद तक है दोस्तो कि कुछ लोगों को लगता है कि वही कवि बचेंगे जो किसी अकादमी द्वारा तैयार किये गये कविता संकलनों में होंगे। वही इतिहास में जिंदा रहेंगे। अरे इन मूर्खों से कौन पूछे कि जितने बड़े कवि हैं अकादमी के संकलनो की बदौलत जिंदा हैं ? क्यों नये बच्चों का दिमाग खराब कर रहे हो। बंद करो साहित्य का यह धंधा-पानी। इतिहास अकादमियाँ लिखेंगी या पैसे देकर लिखवाएंगी तो क्या आने वाले वक्त के समर्थ आलोचक भाड़ झोंकंेगे ? पद के मद में कालपात्र जमीन के अन्दर गड़वा कर देख लो, बाद में कोई उस पर थूकने भी नहीं आएगा। लेखक हमेशा अपनी रचना से जिंदा रहता है, इतिहास से नहीं। इतिहास से राजे-रजवाड़े याद किये जाते हैं, लेखक नहीं बुद्धू ! समर्थ आलोचक हमेशा बाद में आते हैं। समर्थ आलोचक ही विद्यार्थियों के लिए सच्चा इतिहास लिखते हैं। वे आयेंगे....जरूर आयेंगे। कमजोर आलोचक, लेखक ही नहीं, संस्थाओं की भी चाकरी करते हैं। मेरे शहर के एक बुजुर्ग आलोचक ने पिछले चालीस साल की कविता पर देश में सबसे ज्यादा लिखा है, पर एक भी लेख ऐसा नहीं है जिसे कभी कोई याद करेगा। जिन कवियों-लेखकों और लेखिकाओं का बारबार नाम लेते-लेते नाममात्र के आलोचक कहलाए, वे भी उन्हें याद नहीं करेंगे। इसी शहर के जिन लोगों को पीछे लेकर घूमते थे, आज कोई उनके घर झाँकने भी नहीं जाता है। ऐसे आलोचक खुद को तो बर्बाद करते ही हैं, कविता को भी बर्बाद कर देते हैं। दूध पीते बच्चों को महाबली का तमगा देने वाले आलोचक खुद जीवन भर दूध पीते बच्चे रह जाते हैं। यह अलग बात है कि उनके शहर के ही कुछ बच्चे गंभीर हो जाते हैं। किसी का शेर है। नाम इस वक्त याद नहीं आ रहा है-

हमारे दौर के बच्चे हो गये गंभीर
बुजुर्ग हैं कि अभी तितलियाँ पकड़ते हैं।

   आलोचकों ने ही नहीं, संपादकों ने भी इधर हिंदी कविता को काफी नुकसान पहुँचाया है। यह जरूरी नहीं कि कथासंपादक की कविता संबंधी समझ अच्छी हो। कथासंपादक ही नहीं अखबार के साहित्य संपादकों की भी सीमा है। उन्हें भी अच्छी कविता की या तो समझ नहीं है या चयन में बेईमानी करते हैं। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि उनका पाठक कैसा है, सब कवि ही पाठक हैं या कोई सिर्फ पाठक भी है ? कैसी कविता दें कि उसकी कविता संबंधी रुचि का परिष्कार हो। वह अच्छी कविता से जुड़े। दिक्कत सबसे बड़ी यह कि देश का बड़े से बड़ा संपादक कवि का महत्व उसको मिले पुरस्कार से आँकने की नासमझी करता है। क्या किसी कथित बड़े पद पर पहुँच जाने से उस व्यक्ति की लिखी हुई चीजें भी अचानक बड़े महत्व की हो जायेंगी ? आलोचक भी ऐसी ही नासमझी और खासतौर से आला दरजे की बेईमानी का शिकार है। ऐसे में कविता कैसे दूर तक पहुँचेगी ? यह एक बड़ा सवाल है।
    हिंदी पाठकों की कविताविमुखता के पीछे और भी कई कारण हैं। कविता ही नहीं साहित्य मात्र के लिए उसकी दिलचस्पी कम क्यों हो रही है, इसे इस रूप में देखें। आज का जीवन क्या तीस साल पहले का जीवन है ? राजनीति के विकेंद्रीकरण ने गाँव-गाँव से साहित्य और संस्कृति को बेदखल कर दिया है। किसे फुरसत है, पैसे के फेर से। मोबाइल और चैनल ही नहीं, आभासी दुुनिया और मेल की सुविधा ने लोगों को कागज से ही दूर कर दिया है फिर क्या साहित्य और क्या कविता ? प्रकाशकों ने बेचने का धंधा कर रखा है। बेचना जरूरी है, अच्छा साहित्य बेंचें जरूरी नहीं। कथित बड़े प्रकाशकों के यहाँ से कमजोर से कमजोर संकलन पता नहीं कैसे छाप दिए जाते हैं और अच्छे संकलन धूल फाँकते हुए पाये जाते हैं। कीमत ज्यादा होने की समस्या अलग से। पत्रिकाओं में भी बिकने की होड़ है। विमर्श स्त्री और दलित का और रचनाएँ देह की । लघु पत्रिकाओं के सामने सबसे बड़ी दिक्कत तो यह कि उन्हें मालूम नहीं है कि वे क्यों निकल रही हैं या उनके पास अपने समय के साहित्य में हस्तक्षेप जैसा कोई सरोकार नहीं है, बस अपने को जनाने के लिए निकल रही हैं कि हम निकल रही हैं। अपने समय की कविता और आलोचना और खुद के संपादन में व्याप्त भेड़चाल, भयंकर नासमझी और भ्रष्टाचार से टकराना उद्देश्य नहीं है। भला ऐसी पत्रिकाएँ कहाँ तक पहुँचेंगी ? जब इन पत्रिकाओं की ही कोई पहुँच नहीं है तो ये जो भी और जैसी भी कविता है उसे कहाँ तक ले जायेंगी ? डर-डर कर हम अपने भीतर के डर से नहीं लड़ सकते। पहले साहित्य की छोटी-बड़ी दगी और बिना दगी या बिना बारूद की तोपों से डरना बंद करना होगा। बारूद अपने भीतर पैदा करना होगा। जगह-जगह मौजूद साहित्य के भ्रष्ट किले को तोड़ने के लिए। मित्रो, इन हजार मुश्किलों के बीच किसी जादू की छड़ी की उम्मीद तो नहीं है, पर उम्मीद एकदम से खत्म भी नहीं हुई है। दो चरणों में हम कविता की पहुँच को दूर तक ले जाने के लिए काम कर सकते हैं। पहले चरण में साहित्य की दुनिया में सक्रिय ईमान वाले मित्र अपने हाथ में झाड़ू लें और सबसे पहले कविता के नाम पर हर गंदगी को साफ करें। डरें नहीं। बड़े से बड़ा हो और कविता विरोधी हो तो उस पर झाड़ू कस कर लगायें, ऐसे कि याद रखे। कविता का परिसर इससे कम पर साफ हो ही नहीं सकता। चाहे कोई अपनी जान ही क्यों न दे दे। जब हम कविता के कार्यकर्ताओं और ठेकेदारों को दुरुस्त करेंगे तभी अगले चरण में कविता की जनता भी दुरुस्त होगी। तभी कविता का नया पाठक समाज बनेगा। तभी कविता दूर तक जायेगी।