रविवार, 11 दिसंबर 2016

पहाड़, च्यूँटे और बुरा वक्त

- गणेश पाण्डेय

यहां से वहां तक
और वहां से न जाने कहां तक पसरा हुआ यह पहाड़ 
जैसे प्रलय तक टस से मस नहीं होगा 
सदियों की मूसलाधार बरसात इसे बहाकर नहीं ले जा सकती है 
पृथ्वी की बडी से बडी आँधियाँ इसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगी 
जैसे इस सबसे ठोस और सबसे भारी महांधकार को 
अपनी गोद में लेकर बैठा है यह हत्यारा समय
जैसे अहर्निश अकाट्य अभेद्य और अजर-अमर बना रहेगा यह अंधेरा
जैसे सूर्य अपने सबसे अच्छे दिनों में भी
अपने वक्त के इस सबसे काले मेघों की सबसे मोटी दीवार में 
सुई की नोंक जितनी सुराख नहीं कर पाएगा 
चाहे यहां की सारी घड़ियां बताएंगी 
और सारे ज्योतिषी कहेंगे चाहे सारे मुर्गे-चूजे बाँग देंगे 
फिर भी अंधेरा इतना तीव्र होगा कि रोम रोम से दिखेगा 
असंख्यस्वप्नदर्शी और सबसे चमकीली आंखें 
सुबह की एक किरण नहीं देख पाएंगी
सबसे ज्यादा अँधेरा सबसे सफेद कपड़ों के पीछे होगा 
सबसे काला चेहरा सत्ता के असंख्य शीर्ष पर दिखेगा
होंगे ऐसे लोग भी जो दिनरात 
त्रिपुंड की शक्ल में अंधेरा ललाट पर लगाएंगे
ऐसे भी भला क्यों नहीं होंगे 
जो अंधेरे का पहाड़ अपनी काली दाढ़ी में छुपाएंगे
कुछ लोग अंधेरे के पहाड़ पर छत्र लगाकर पिकनिक मनाएंगे
कुछ लोग जगह-जगह रुपया छापने की मशीन लगाएंगे
कुछ लोग बड़े-बड़े व्याख्यान कक्षों में 
अंधेरे के दर्शन पर सवेतन प्रकाश डालेंगे
कुछ लोग पहाड़ के सौंदर्य पर कविताएं लिखेंगे
कुछ लोग पहाड़ की अकादमियों में मत्था टेकेंगे
कुछ लोग अखबार छापेंगे अंधेरे में पहाड़ को टो-टो कर
कुछ लोग पहाड़ की चोटी पर 
अपनी मृत आत्मा की सबसे ऊँची बोली लगवाएंगे
ये कुछ लोग होंगे सिर्फ कुछ लोग 
जो पृथ्वी के सबसे चतुर लोग होंगे
जो पहाड़ की गोद में सुख की नींद सोएंगे
और अँधेरे का यह सबसे बड़ा पहाड़ 
कमजोरों की छाती पर चाहे उनके शीश पर टिका रहेगा
युगों-युगों तक चाहे अनंतकाल
इसके नीचे असंख्य केंचुए और असंख्य च्यूंटे दबे होंगे सदियों से
बहुत से कीट-पतंग अपनी संततियों के लिए उठाये होंगे सिर पर
अंधेरे की यह असीम पर्वत-श्रृंखला
वही होंगे वही होंगे वही होंगे श्रीमान जी
जो अपने सिर से 
किसी दिन उठाकर फेंक देंगे अंधेरे का यह असह्यभार
वही होंगे जो अंधेरे के पहाड़ को 
ढ़हाएंगे आततायी के प्रासाद की तरह
वही होंगे जो अंधेरे की तोंद को फोड़ेंगे 
ब्रह्मांड के सबसे बड़े ग्रह के आकार के गुब्बारे की तरह
चाहे अपनी पृथ्वी पर हजार कोस लंबे फोड़े की तरह 
चीर देंगे खच्च से
एक कविता की कुछ जरूरी पंक्तियां है श्रीमान 
सच बिल्कुल नहीं
सच सिर्फ इतना है कि अंधेरे का यह पहाड़ ढ़हेगा नहीं
इस बुरे वक्त में
छोटे-मोटे भूकंप इसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे
और उतना ही सच यह भी है श्रीमान
कि ये केंचुए, ये च्यूंटे, ये कीट-पतंग मरेंगे नहीं
उनकी आंखों में फिर भी खदबदाता रहेगा कुछ
उनके दिमाग में होती रहेगी उथलपुथल।

(यात्रा 12)







शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

अथ आलोचक कथा

- गणेश पाण्डेय

शुभ्रवसना वीणा वादिनी ने पहले वीणा बजाकर
मुझे गहरी नींद में जगाया और सिरहाने आकर
मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए
मां की तरह मुस्कायीं

बहुत दिनों बाद सपने में मां आयी
पूछा- काहेक रोवत हौ के मारिस है
फिर मां ने ही कहा- तूडि देव ओकर हड्डी-पसली
उसके बाद मां अन्तर्धान हो गयी

और 
इस तरह कविताई करते हुए 
मैंने आलोचना की लाठी थामी 
और इस लाठी को
वंचित पीडित लेखकों की आवाज बनाया.

किसी के आलोचक बनने की 
इससे अच्छी कहानी और क्या हो सकती है
और कहानी भी ऐसी जो सिर्फ कहानी न हो.

कृपया उनसे कोई कहानी न पूछें
जिन्होंने अघाये हुए लेखकों के लिए
पूजा-पाठ चाहे लठैती की

जिनके जीवन में 
खुद की कोई कहानी नहीं थी
कोई वजह नहीं थी आलोचक बनने की
किसी तरह की बेहतरी का स्वप्न नहीं था
जिन्हें न तो बडे सुकुल जी बनना था
न छोटे सुकुल
जिन्हें बस ऐसे ही आलोचक बनना था
ममूली चीजों के लिए
बन गये।

(यात्रा 12)







मंगलवार, 8 नवंबर 2016

सलाम वालेकुम

- गणेश पाण्डेय

सब साहिबान को सलाम
जो मुझे छोड़ने आये थे सिवान तक
उन भाइयों को सलाम जो अड्डे तक आये थे
मेरी छोटी-छोटी चीजों को लेकर।

उन चच्चा को खासतौर से सलाम
जिन्होंने मेरा टिकट कटाया था
और कुछ छुट्टे दिये थे वक्त पर काम आने के लिए।

बचपन के उन साथियों को सलाम
जिन्होंने हाथ हिलाया था
और जिन्होंने हाथ नहीं हिलाया था।

अम्मी को सलाम
जिन्होंने ऐन वक्त पर गर्म लोटे से
मेरा पाजामा इस्त्री किया था और जल गयी थी
जिनकी कोई उँगली।

आपा को सलाम
जिनके पुअे मीठे थे खूब और काफी थे
उस कहकशाँ तक पहुँचे मेरा सलाम
जो मुझे कुछ दे न सकी थी
खिड़की की दरार से सलाम के सिवा।

उस याद को सलाम
जिसने जिन्दा किया मुझे कई बार
उस वतन को सलाम
जो मुझे छोड़कर भी मुझसे छूट नहीं पाया।

रास्ते की तमाम जगहों और उन लोगो को सलाम
जिन्होंने बैठने के लिए जगह दी
और जिन्होंने दुश्वारियाँ खड़ी कीं
उस वक्त को सलाम
जिसने मुझे मार-मार कर सिखाया यहाँ
किसी आदमी को रिश्तों से नहीं
उसकी फितरत से जानो।

ऐ जिन्दगी तुझे सलाम
जो किसी काम के वास्ते तूने चुना
किसी गरीब को। 

(‘जल में’ से)






शनिवार, 5 नवंबर 2016

साहित्य के इस राज्य में

- गणेश पाण्डेय

साहित्य के इस राज्य में 
दूध और दही की नदियां अनगिनत 
सुदर्शन पुरुष और सुंदर स्त्रियाँ असंख्य
वृद्ध, अधेड़, युवा और किशोरों की जगमग दुनिया का ओर-छोर नहीं 
कोई कभी रोता नहीं कोई कभी सोता नहीं 
सब हृष्ट-पुष्ट कोई रोग-शोक नहीं 
ऐसा स्वास्थ्य ऐसा मेल-मिलाप ऐसी संगत ऐसी लय 
किसी अन्य राज्य में नहीं 
कोई निराश नहीं 
जिधर देखिए सुंदर आशा ही आशा 
भव्य मंचों की असमाप्त श्रृंखला 
स्वर्णजड़ित पत्र-पत्रिकाएँ 
देवतुल्य सुपाद्य संपादक प्रवर 
आगे-पीछे परियों का मेला 
और यशःप्रार्थी कवियों के नतशीश 
जय-जयकार जय-जयकार 
भारतीय संस्कृति से भी ऊंची हिन्दी की साहित्य संस्कृति 
सब देवता सब सद्पुरुष 
सब उजले-धुले सुवासित पाद्य असुवासित अतिप्रकाशित रत्नजड़ित मुकुटधारी 
हिन्दी साहित्य के इस राज्य में 
कहने को भी एक दशानन नहीं 
सब स्वयंराम थे 
सबके पास विद्या-कला-साहित्य का मणिकांचन योग था 
दर्प के हिमालय से निकलती तीव्रवेगमयी हहराती विचारधारा थी सबके पास 
सब कवि थे सब कथाकार सब नखदंतहीन सुंदर आलोचक थे 
एक से एक बली-महाबली-महामहाबली 
धज ऐसी कि रावण भी लज्जित हो 
कर्म ऐसे कि इतिहास में न अँटें 
सब था इनके पास 
तीनों लोक का ऐश्वर्य था 
सुंदर सुखशय्या प्रीतिकर भोजन और अनेक प्रकार के रसपान 
अप्सराएँ इंद्रलोक से ज्यादा 
सबकी बारी थी छोटे-बड़े सिंहासनो पर बैठने की 
सब उसी प्रतीक्षा में अनन्तकाल से एक पैर पर खड़े थे 
एक पैर से चलते थे एक पैर पर खाते थे एक पैर से पीते थे एक पैर से आँख मारते थे
एक पैर से अप्सराएँ स्वागत करती थीं एक पैर से मनुहार 
ये लेखक इस सदी के इस राज्य के पूर्णकालिक एकपैरीय लेखक थे 
इन लेखकों के पास ढंग से जरा-सा खड़ा हो पाने के लिए 
दूसरा पैर था ही नहीं 
कोई कहता 
सबके एक-एक पैर ताजमहल बनाने वालों की तरह काटकर प्रधान आलोचक ने रख लिए 
कोई कहता कि सबके एक-एक पैर अफसर-कवि ने किसी संग्रहालय में चुनवा दिया 
कोई कहता कि सुंदर कविताएं लिखने वाले एक कृशकाय कवि ने सबके एक-एक पैर
अस्पतालों में सस्ते में बेचकर अकेले सारी असली महुआ वाली कच्ची एक पैर से पी लिया 
कोई कहता उपप्रधान आलोचक ने अपने और दूसरे लेखक संगठनों के साथ मिलकर 
गांव पर भूसे के मंडीले में सारे एक पैरों को रखवा दिया कि वक्त पर सिर्फ उनके काम आये 
जितने मुँह उससे अधिक बातें 
छोटे सुकुल कसम खाकर कहते थे कि इस दौर के सारे लेखक पैदाइशी तौर पर एक पैरीय थे।









बुधवार, 2 नवंबर 2016

मैं क्यों लिखता हूँ

- गणेश पाण्डेय

नवनीत जी, यह न पूछें कि मैं क्यों लिखता हूँ ? ‘सिर से सीने में कभी, पेट से पाँवों में कभी/ एक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है।’-दुष्यंत के एक शेर से शुरू करता हूँ। आप ने पूछा ही है तो कुछ तो कहूँगा। इसकी एक नहीं दो नहीं, कई वजहें हैं। पहली बात तो यह कि मेरी कुंडली में कवि होना लिखा था। दूसरी बात यह कि अपने भीतर का सब कहना बहुत जरूरी था, मैं उसके बगैर रह ही नहीं सकता था। तीसरी बात यह कि मुझे बंगाली जी मिल गये। चौथी बात कि मुझे हिन्दी के कापुरुषों से रोज लड़ना था। पाँचवी बात कि हिंदी के ये चोट्टे मुझे गुप्त कवि बना कर रखना चाहते थे। छठी बात यह कि यहाँ के एक डॉन ने हिंदी के राक्षसों की एक टीम बना ली थी और जिसे अक्सर मेरे खिलाफ प्रमोट करते रहते थे। अपने कंधे पर बैठाकर घूमते थे। सातवीं बात यह कि मैं हिंदी का मर्द था, मैदान छोड़कर भाग नहीं सकता था। आठवीं, नौवीं, दसवीं, न जाने कितनी वजहें। मैं समाज को शर्तिया बदल देने के लिए नहीं लिखता था, क्यों कि सिर्फ कविताएँ समाज को बदल देंगी, यह नहीं मानता था। हाँ, अलबत्ता इसलिए लिखता था कि यह दुनिया बदल जाय, सुंदर हो जाय, इस भाव से लिखता था। प्रतिरोध की चिंगारी को नित सुलगाते हुए यह जानता था कि दुनिया को कवि नहीं, कार्यकर्ता बदलते हैं, जनता क्रांति करती है, वह जनता जो ढं़ग से साहित्य पढ़ना भी नहीं जानती। इसीलिए खुद को कवि कम और कविता का कार्यकर्ता अधिक समझता था। यह भी जानता था कि हमारे समय के अधिकांश कवि डरपोक हैं, इसलिए कविता और दुनिया का सच एक साथ कहने के लिए लिखता था। नाम की लालसा बचपन में रही होगी, पर जब बालिग हुआ और साहित्य में कदम-कदम पर गंदगी के दर्शन हुए तो कविता का सफाई कर्मचारी बनना ज्यादा रास आया। यह सब जानते हैं कि नाम और इनाम के लिए मैं हरगिज-हरगिज नहीं लिखता और न कभी नाम और इनाम की इच्छा से प्रेरित होकर कोई काम करूँगा। लिखने के साथ पत्रिका निकालने की वजह भी साहित्य में हस्तक्षेप करना भी एक बड़ी वजह थी और है। आपने देखा है कि अब तक मैंने साहित्य के सच को फटकार कर कहा है। जब अपने भीतर के स्वार्थ को आदमी मार देता है तो वह पृथ्वी का सबसे निडर बन जाता है। आप जानते हैं कि मैं साहित्य के किसी भी डॉन-फान से नहीं डरता, हाँ डॉन-फान ही मुझसे डरने लगें तो दूसरी बात है।
साहित्य मेरे लिए सच का मंदिर है जो समाज को सुंदर बनाने के लिए स्वप्नों की दीवार और मेहराब पर टिका हुआ है। इस मंदिर में जब गंदगी फैलाने वालों को देखता हूँ तो आगबबूला हो जाता हूँ। साहित्य मेरे लिए मनुष्य की शक्ति का स्रोत है, विवेक और साहस का स्रोत है, मनुष्य की वृत्तियों और संवेदनाओं को परिष्कृत करने का स्रोत है। साहित्य मनुष्य की आत्मा के पीने के पानी का निर्मल झरना है। मुझे इस पानी के धंधे से शिकायत है। मिनरल वाटर जो बाजार में बिकता है, उससे भी शिकायत है तो इस स्तर पर कि सरकारें अगर देश में पीने का शुद्ध पानी नहीं मुहैया करा सकीं तो यह उनकी और इस पूँजीवादी निजाम की विफलता है। साहित्य के जिस पानी की बात कर रहा था, उस पवित्र झरने-आप चाहें तो नदी कह लें-में देश की साहित्य अकादमियों, विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभागों, प्रकाशन उद्योग, हिन्दी के नामी और इनामी डाकू-बदमाशों ने अपनी गंदगी का पनाला डाल रखा है। आप ही बताएँ कि इस देश और हिन्दी की दुनिया में एक लेखक अच्छा लिखे भी और अपनी किताबें छपवाने के लिए प्रकाशकों के दरबार में अपवना शीश झुकाए, ऐसा क्यों ? क्या यह हिन्दी साहित्य की बड़ी गंदगी नहीं है ? एक लेखक अच्छा लिखे और आलोचकों के चरणरज लेने के लिए साष्टांग प्रणाम करे, यह साहित्य की गंदगी नहीं है ? क्या तुलसीदास या मलिक मुहममद जायसी या सूरदास, रामचंद्र शुक्ल के पास चापलूसी करने के लिए आए थे ? कबीरदास, हजारी प्रसाद द्विवेदी के पास बनारस का पान लेकर पहुँचे थे ? निराला जी ने रामविलास जी का पैर दबाया था क्या ? फिर आज का आलोचक यह अपेक्षा क्यों करता है कि लेखक उसके चरणरज को अपने माथे से लगाए और अपनी पीठ पर उसको सवारी कराए ? आप ही बताएँ कि यह हिन्दी साहित्य की सबसे बड़ी गंदगी है कि नहीं ? आखिर नागार्जुन को यह क्यों कहना पड़ा - 
"अगर कीर्ति का फल चखना है
आलोचक को खुश रखना है"
त्रिलोचन को कहना पड़ा -  
"आलोचक है नया पुरोहित उसे खिलाओ
सकल कवि यशःप्रार्थी देकर मिलो मिलाओ।"
आलोचक पुलिस के सिपाही की तरह दो-दो रुपये के लिए कविता के ट्रकों को बीच सड़क पर रोक दे रहा है। बिना दो रुपये लिए जाने ही नहीं देता। यह तो कोई गणेश पाण्डेय की तरह कविता के ट्रक का उजड्ड ड्राइवर हो या बैलगाड़ी का मस्त गाड़ीवान तो बैरियर-सैरियर को तोड़-ताड़कर चल देगा। बाकी लोगों की तो जान साँसत में है। आपसे एक राज की बात बताता हूँ कि मैं तो सीधा-सादा एक छोटा-मोटा कवि था और हूँ, मैं आलोचना में आया ही हिंदी के बेईमान आलोचकों की बेईमानी के खिलाफ। कुछ आलोचक जरूर ऐसे हैं जिनमें गदगी कम है। कुछ में तो गंदगी बिल्कुल कम मिलेगी, लेकिन साहस की कमी तो हर जगह एक जैसी है। एक आलोचक को डरते देखा कि हाय अमुक का नाम लूँगा तो अमुक नाराज हो जाएंगे, अमुक मेरी बेटी को हिंदी विभाग में नियुक्त नहीं होने देंगे। एक आलोचक को देखा कि अमुक का नाम लूँगा तो अमुक विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में मेरी नियुक्ति की संभावना खत्म हो जाएगी, एक को डरते देखा कि अमुक की प्रशंसा करूँगा तो अमुक अलेखक और हिंदी का छुटभैया डॉन नाराज हो जाएगा। लंबी कहानी है भाई डरपोंक आलोचकों की। आलोचक तो आलोचक, नामी-गिरामी कवि भी बहुत डरपोंक दिखे। एक बड़े भारी कवि रहते हैं राजधानी में और पूरब के महाकवि समझे जाते है, वे भी डरते रहे कि हाय इस कवि से दूर रहो, मेरे चेले-चापड़, मेरे संगी-साथी नाराज हो जाएंगे, अलेखकों के साथ रह लेना ठीक, हिंदी के हरामजादों के साथ दारू पी लेना ठीक मगर इस फटीचर कवि से दूर रहो। कहा न, कहानी लंबी है।ं सार यह कि हिंदी की गंदगी को साफ करने के लिए कलम की धार को तेज किया। भीतर के स्वार्थ को नाम-यश की आकांक्षा को मार डाला, इन्हीं हाथों से किया है खून, लीजिए देखिए, तब कहीं जाकर सच कहना और सच के लिए लड़ना सीखा है। मेरे लिए साहित्य की कोई विधा हो फर्क नहीं पड़ता, दर्द अगर सच्चा है तो आप गद्य में ही नहीं कविता में भी जीवन का संग्राम लिख सकते हैं। अब एक कविता आपको न दिखाऊँ, यह कैसे हो सकता है-कविता का शीर्षक है-कम कविता के दिन थे-
कुछ करने के दिन न थे
कविता के लिए मरने के दिन न थे
जो मरे मारे गये, कोई न पूछ थी कहीं।
रोशनी का काम उनके जिम्मे न था
जिनके पास कुछ ढँका-छिपा न था।
गजब का मंजर था सामने
टुटही हरमुनिया थी
वक्त-बेवक्त राग जैजैवन्ती गवैया थे
वही झाँझ-करताल वही बजवैया थे
बड़े-बड़े घुटरुन चलवैया थे
कुछ थे जो 
बाहरी जहाजों पर कूद-कूद चढ़वैया थे
कई तो अपने ऊपर ग्रंथ छपवैया थे।
रटन्त विद्या के दिन थे
एक कविता दौर के अन्तिम दिन थे
दृश्य उन्हीं का था 
जिनके जीवन में कोई संग्राम न था
जीवन छोटा था
कम कविता के दिन थे
फिर भी कुछ पागल थे बचे हुए
जिनके हौसले थे कि कम न थे।

(‘जल में’ से)
यह कविता अपने समय की कविता और कवियों का पोस्टमार्टम है। इसे देने की वजह यह कि आप जान सकें कि एक खराब कविता और खराब कविता को दुरुस्त करने वाली कविता में क्या फर्क है ? एक वजह यह भी है कि आप जान सकें कि यह समय कविता के लिए कितना मुश्किल समय है। इस मुश्किल समय में जाहिर है कि मैं कोई आसान काम कैसे कर सकता था। आसान काम तो वह था जो ऊपर दिख रहा है कि एक पागल को छोड़कर बाकी लोग जिसे कर रहे थे। आप चाहे जितना बुरा मानें, लेकिन ‘‘मुश्किल काम’’ नाम ही एक कविता और यहाँ देना चाहूँगा, ताकि जान जान सकें कि कौन आसान काम कर रहा था और कौन मुश्किल काम-

यह कोई मुश्किल काम न था
मैं भी मिला सकता था हाथ उस खबीस से
ये तो हाथ थे कि मेरे साथ तो पर आजाद थे।
मैं भी जा सकता था वहाँ-वहाँ
जहाँ जाता था वह अक्सर धड़ल्ले से
ये तो मेरे पैर थे जो मेरे साथ तो थे
पर किसी के गुलाम न थे। 
मैं भी उन-उन जगहों पर मत्था टेक सकता था
ये तो कोई रंजिश थी अति प्राचीन
वैसी जगहों और ऐसे मत्थों के बीच।
मैं भी छपवा सकता था पत्रों में नाम
ये तो मेरा नाम था कमबख्त जिसने इंकार किया
उस खबीस के साथ छपने से
और इसमें उस अखबार का क्या
जिसे छपना था सबके लिए और बिकना था सबसे।
मैं भी उसके साथ थोड़ी-सी पी सकता था
ये तो मेरी तबीयत थी जो आगे-आगे चलती थी
अक्सर उसी ने टोका मुझे-
‘पीना और शैतान के संग ?’
यों यह सब कतई कोई मुश्किल काम न था।
(‘जल में’ से) 
दरअसल यह वह फर्क है जो मेरे जैसे कविता के मामूली कार्यकर्ता और हमारे समय के नामी-इनामी कवियों के बीच है। मैं यह नहीं कहता कि मैंने अचछी कविताएँ लिखी हैं, पर यह कहता हूँ कि मेरी कविताओं में मेरे जीवन का खुरदारापन भरपूर है। आप इस खुरदुरेपन को कोई भी नाम दे सकते हैं। आप ‘मर्दाना’ के अर्थ को लिंग से जोड़कर देखने की जगह शक्ति के चेहरे के रूप में देखें तो कह सकते हैं कि मैंने एक अर्थ में मर्दाना कविताएँ और गद्य लिखने की कोशिश की है। मेरा मानना है कि एक छोटे से छोटा कवि भी अपने भीतर सबसे निचले तल में पक्का घर बना कर रहने वाली नाम और इनाम की कमजोरियों को दूर कर ले तो वह भी अपने समय की कविता की सच्ची राह पर चल सकने का कमाल कर सकता है , जिस पर मैंने बस अभी पहला डग ही रखा है। 
कहना जरूरी हे कि साहित्य की भ्रष्ट सत्ताओं के सामने आत्मसमर्पण करने वाले लेखक साहित्य के कीट-पतंग तो हो सकते हैं, हिंदी के सच्चे लेखक नहीं। जाहिर है कि सिर्फ आत्मसंघर्ष ही लेखक के महत्व को जानने की पहली और सबसे बड़ी कसौटी है। एक लेखक जब हिंदी के किसी माफिया के सामने अपनी गर्दन झुकाता है तो सिर्फ़ उसकी गर्दन नहीं झुकती है, उसकी आत्मा झुक जाती है, उसका काव्यविवेक धूल धूसरित हो जाता है, उसकी आलोचना के लोचन मोतियाबिंद हो जाता है, वह अपने समय के झूठ-मूठ के महाजनों का पिछलग्गू बनकर लेखक के स्वाभिमान की हत्या करता है। ऐसे झुंड में भेड़-बकरियों की तरह जीना सबसे नहीं हो पाता है भाई। ऐसे लोगों को राजधानी के साहित्य का राजपथ मुबारक, मुझे अपनी स्वाधीन कुटिया भली। दरअसल साहित्य दृष्टि, विचार, मूल्य, संवेदना और स्वप्न का घर है, जब एक दुर्बल लेखक उसे नाम और इनाम का कारखाना समझ लेता है तो वह साहित्य में जीवन का नहीं मृत्यु का वरण करता है। मेरे लिए साहित्य आत्मा का फाँसीघर नहीं है। मेरे लिए कविता एक अर्थ में मनुष्य का पुनर्जीवन, जिस नये जीवन में हम अपने जीवन में हुई टूट-फूट को ठीक करने की कोशिश करते हैं। यह काम कविता के प्रति सच्चे समर्पण है। जब लेखक का ध्यान कुछ और पाने और जल्दी से पा जाने की ओर होगा तो वह अपने इस दायित्व से विमुख हो जाएगा।

मेरे लिए तनिक सुविधाजनक यह कि आपने यह पूछा है कि मैं क्यों लिखता हूँ, यह नहीं पूछा है कि जो लिखता हूँ, वह क्यों लिखता हूँ ? नही ंतो मुझे सच बताना पड़ता। सच यह कि जैसे और जो-जो और सब लिखते हैं, उस तरह और वह मैं नहीं लिखता हूँ। इसलिए कि मैं न तो फर्जी क्रांति का बिजूका बनना चाहता हूँ और न अपने समय के साहित्य की मुख्यधारा में बह जाना चाहता हूँ। एक लेखक खुद को समय के अँधेरे से नहीं बचाएगा तो दुनिया को सुंदर बनाने का स्वप्न क्या खाक देखेगा ? इस देश को फासीवादी ताकतों से मुक्त कराने का स्वांग करने वालों करी सच्चाई उस वक्त उनके पतलून से बाहर आ जाती है, जब वे साहित्य की भ्रष्ट और क्रूर सत्ता के सामने घुटने टेकते हैं। नाम और इनाम को छोड़िये, कुछ कार्यक्रमों बुलाये जाने के बहुत मामूली स्वार्थ में हिंदी के तमाम छुटभैयों को फिसड्डी महाप्रभुओं के सामने साष्टांग लेटकर प्रणाम की मुद्रा में देखता हूँ तो लगता है कि हम हिंदी के सचमुच के नर्क में तो नहीं आ गये हैं ? देखिए यह देखना बहुत आसान है कि सामने बैठा लेखक किस कोटि का है ? आप उसकी एक रचना को छुएँ या उसके मुखारबिंद से दो शब्द झरने दे ंतो पता चल जाएगा कि इस बंदे की असली जाति क्या है ? जैसे फर्जी भक्ति होती है, उसी तरह फर्जी सांप्रदायिकता विरोध होता है, उसी तरह पूँजीवाद का फर्जी विरोध होता है, ठीक वैसे ही सामंतवाद का फर्जी विरोध दिखता है। आखिर नाम और इनाम सामंती मूल्य है या नहीं ? भक्तिकाल की बड़ी कविता में नाम और इनाम की आकांक्षा है या मुक्ति की ? गौर से देखिए तो वह मुक्ति भी आध्यात्मिक मुक्ति के भीतर सामाजिक मुक्ति की बड़ी और जनाकांक्षा की अभिव्यक्ति है। मैं जो लिखता हूँ, वह इन्हीं फर्जी लेखकों की गंदगी साफ करने का साबुन है। झाग भले ही कम देता हो , पर मैल बहुत अच्छी तरह काटता है, यहाँ तक कि पतलून तो पतलून, चमड़ी भी बाजदफा कट जाती है। यह कहना गलत है कि मैं चमड़ी काटने के लिए लिखता हूँ, पतलून साफ करने के लिए नहीं। काफी पहले आलोचकों और आलोचना पर लिखे गये एक मामूली पर जिसे हमारे समय के दूसरे नंबर के एक आलोचक ने हिंदी आलोचना की अब तक की सबसे बड़ी लफंगई कहा था, उसका बड़ा विरोध हुआ कि उसमें लेखकों की चमड़ी काटी गयी है, जबकि मैंने तो सिर्फ मैल साफ करने की कोशिश की थी। आखिर उस लेख में जिस आलोचना में जिस जातिवाद पर प्रहार था, आलोचना में जिस मुंशीगीरी पर चोट थी, लेखिकाओं के साथ संपादक और आलोचक जो शोषण और नाइंसाफी कर रहे थे,, साहित्य के तमाम अँधेरों में दियासलाई जलाने की कोशिश की गयी थी, वह सब क्या था ? मेरा मानना है कि आलोचना की धंधई ही हिंदी की दुर्दशा की सबसे बड़ी वजह है। इसीलिए हिंदी के बेटे का फर्ज निभाता हूँ। जो जरूरी है, वह लिखना जरूरी है। सांप्रदायिकता के विरोध को न तो बारबार रिपीट करना जरूरी है और न सिर्फ किसी एक संगठन का नाम लेना जरूरी है, कहो तो ऐसे कि वह जितनी अपनी समय में हो उतना ही आने वाले समय में ? आज जो संगठन दिख रहे हैं, कल उसी तरह के दूसरे संगठन दूसरे नाम से आ सकते हैं। यह मेरा मानना है, मैं इस सोच के साथ सांप्रदायिकता का विरोध करता हूँ अपने लेखन में। ‘ओ ईश्वर’ लिखता हूँ, ‘गाय का जीवन’ लिखता हूँ तो ‘सबद एक पूछिबा’ भी लिखता हूँ। जो लिखता हूँ, वह इस तरह लिखता हूँ कि चेहरा खुला रहे और पाठक उसे पहचान ले। कविता लिखता हूँ, भाषण लिखने से बचता हूँ। पैर में पाजामा पहनता हूँ, बालों में कंघा करता हूँ अर्थात गद्य में गद्य लिखता हूँ और कविता में कविता। मैं लिखता हूँ तो अपनी तरह लिखता हूँ। अपने अँगूठे का निशान लगाता हूँ। किसी नामी-इनामी कवि का फर्जी दस्तखत अपनी कविता में नहीं करता हूँ। मैं लिखता हूँ तो सौ फीसदी मैं लिखता हूँ। मैं लिखता हूँ क्यों कि मैं लिखे बगैर रह नहीं सकता। लिखना छोड़ दूँगा और अपनी तरह लिखना छोड़ दूँगा तो मर जाऊँगा। जीने के लिए लिखता हूँ। अमर होने के लिए नहीं लिखता हूँ। कविता पर मर-मिटने के लिए लिखता हूँ। ऊपर कह चुका हूँ- कविता के लिए मरने के दिन न थे/जो मरे मारे गये, कोई न पूछ थी कहीं।’ फिर भी कवि स्वभाव का क्या करूँ। कुत्ते के स्वभाव में चमड़ा प्रेम है तो सहृदय का स्वभाव है अच्छी कविता पर रीझना। यहाँ मुझे कोई डरके मारे पूछे न पूछे कोई फर्क नहीं पड़ता। लगें रहें सब यहाँ के साहित्य के डॉन और उनके गैंग के छुटभैयों के पीछे-पीछे, धुलते रहें उनकी धोती और करते रहें उनकी पूजा, न पूछें मुझे जैसे बंगाली जी को नहीं पूछते, सच्ची कविता को नहीं पूछते। कोई फर्क नहीं पड़ता। आप जैसे मित्र बहुत हैं, पूछते रहें, बहुत है। दरअसल मैं हिंदी के धंधेबाजों के लिए नहीं, हिंदी के बेटों के लिए लिखता हूँ।








शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2016

दीया

- गणेश पाण्डेय

पहला दीया
उनके लिए जो देख नहीं पाते
दूसरा उनके लिए जो दीये को दीया कह नहीं पाते
तीसरा उनके लिए जो दीये की कोई बात सुन नहीं पाते

एक दीया हिंदी के उन भयभीत दोस्तों के नाम 
जिन्होंने मुझे चींटी की मुंडी के बराबर दोस्ती के लायक नहीं समझा

हिंदी के उन दुश्मनों के नाम भी कुछ दीये ठीक उनकी अक्ल के पिछवाड़े
जिन्होंने हमेशा चूहे की पीठ पर बैठकर शेर की पूँछ मरोड़ने की जिद की

ये दीये उन तमाम अदेख दोस्तों की नम आँखों के नाम 
इस वर्ष हारी-बीमारी और हादसों में छोड़ गये जिनके प्रिय और बुजुर्गवार
चाहे मारे गये मोर्चे पर जिनके बेटे, पति और पिता और गाँव के गौरव

पृथ्वी की समूची मिट्टी और आँसुओं से बने ये दीये
क्यों नहीं मिटा पाते हैं, सदियों से बढ़ता ही जाता अँधेरे का डर

एक थरथराती हुई स्त्री के जीवन में क्यों नहीं ला पाते हैं जरा-सा रोशनी
ये दीये क्यों नहीं जला पाते हैं हत्यारों का मुँह, उनके हाथ और लपलपाती हुई जीभ

ये दीये उम्मीद के सही, हार के नहीं
ये दीये बारूद के न सही, प्यार के सही
ये दीये क्रांति के न सही प्रतीक सही
दोस्तो फिर भी जलाता रहूँगा ऐसे ही ये दीये कविता के दोस्त सही
इनकी लौ में है पलभर में हमारी आत्मा को जगाने की शक्ति 

देखो अरण्य के समीप गरीब-गुरबा की बस्ती में जलते दीये
कैसे काटता है एक नौजवान टाँगे से जलौनी लकड़ी
कैसे इनकी रोशनी में डालती है एक माँ बच्चे के मुख में कौर

कैसे कनखियों से देखती है एक युवा स्त्री 
अपने पति के शरीर की मछलियों को, उसकी वज्र जैसी छाती

पैसे की मार से दुखी लोगों के लिए कुछ दीये
उस बाप की ड्योढ़ी पर एक दीया जिसे बेटियों की फीस की चिंता है

जलायें न जलायें चाहे बड़े शौक से भाड़ में जायें
उन आलोचकों के लिए भी कविता के छोटी जाति के कुम्हारों के बनाये कुछ दीये
जिनके घर मुफ्त पहुँचायी गयी हैं गाड़ियों में भरकर बिजली की विदेशी झालरें

विश्वविद्यालयों, अकादमियों, संस्थानों, अखबारों, पत्रिकाओं 
प्रकाशकों और हिन्दी के बाकी दफ्तरों के संडास में एक-एक दीया जबरदस्त

हिन्दी की उन्नति के नाम पर उसकी किडनी बेचकर 
मलाई काटने वाले हजारों हरामजादों के लिए भी

हिन्दी के जालसाजों के छल में फँसे हुए बच्चों के लिखने की मेज पर
जीवनभर जलने वाला कविता का यह दीया खास

हिन्दी बोलने वाले विपन्न बच्चों के लिए उम्मीद का एक दीया
इस साल वे भी बने कलक्टर चाहे कमायें दो पैसा

हिन्दी बोलने वाले बच्चे पैदा करने वाली माँ के बिना चप्पल के पैरों के पास
मेरी, तेरी, उसकी, सबकी गुजर गयी माँ की जिंदा याद के पैरों के पास
चाँदी की पायल की जगह एक गरीब कवि की ओर से मिट्टी का यह दीया।











सोमवार, 17 अक्तूबर 2016

पांच छोटी कविताएं

- गणेश पाण्डेय

अकड़ 1

हे प्रभु
हिन्दी में ऐसा वक्त भी आये
जब कवि की अकड
कहीं और नहीं
साहित्य की सत्ता के सामने
दिखे।

अकड़ 2

हे प्रभु
आये जरूर आये
हिन्दी में ऐसा भी वक्त
जब आलोचक अपनी अकड़
निरीह कवि के सामने नहीं
साहित्य की सत्ता के सामने
दिखाए।

अकड़ 3

हे प्रभु
आप हो तो ठीक है
न हो तो भी
हिन्दी में ऐसा वक्त जरूर आये
जब पाठक ही पाठक हों
और पाठक के पास इतना बल हो
कि कवि और आलोचक की अकड़
तोड़कर उसकी जेब में डाल दें।

लज्जा

हे प्रभु
माइक के सामने
अखबार के बयान में
कविता लिखते हुए
अकड़ गयी है कवि की रीढ़
जहां-जहां झगड़ना था मीठा बोला
जहां-जहां तनकर खडा होना था झुका
जहां-जहां उदाहरण प्रस्तुत करना था छिपकर जिया
हे प्रभु
उसे सुख-शांति दीजिए न दीजिए
थोडी-सी सचमुच की लज्जा जरूर दीजिए।

फर्क

वे
साहित्यपति थे

उन्होंने कहा -
झण्डा लेकर चलो

मैंने कहा -
डण्डा लेकर चलो।


रविवार, 9 अक्तूबर 2016

रावण का पुतला

- गणेश पाण्डेय
                                          
रामलीला मैदान में
अवैध कब्जे की होड़ है
कमेटी के पदाधिकारियों में
आपस में काफी सिर फुटौवल
और तोड़-फोड़़ है
फिर भी किये जा रहे हैं
जैसे-तैसे
रामलीला

कुछ हैं
बस देख रहे हैं
लीलाभाव से
रामलीला
बच्चे हैं कि जिन्हें
बिल्कुल मजा नहीं आता
अब कोई ढ़ंग से
रावण का पुतला ही नहीं जलाता

कहां बीस-बीस फुट के रावण
और कहां चार-चार फुट के
राम जी
मजा आये तो आये कैसे
नये जमाने के बच्चों को
कोई समझाए कैसे
कहां भीमकाय रावण
कहां क्षीणकाय
और अतिशय दुर्बल
राम जी
कहां रामलीला मैदान में
तमाशबीन ज्यादा
और राम जी की सेना में
मुट्ठीभर
कुपोषणग्रस्त
किशोर
न कोई
हनूमान सरीखा बलशाली
न कोई लक्ष्मण
जाम्बवान और सुग्रीव जैसा
न कोई वानर-भालू जैसा
ताकतवर और जुझारू
जैसे चूहों की टुकड़ी चली हो
राम जी के पीछे-पीछे
रावण को जीतने

आखिर इस बेमेल लड़ाई में
बच्चों को
मजा आये तो कैसे आये
राम जी ने
सचमुच रावण को जीता होगा
यकीन आये तो कैसे आये
अपराधियों के अवैध कब्जे के बाद
सौ गुणे सौ मीटर के
छोटे-से
रामलीला मैदान में
इतनी बड़ी लड़ाई हो तो कैसे हो

कोई तो बताये
राम जी
रावण के भीमकाय पुतले में
आग लगायें तो कैसे लगायें
न तीर पकड़ना सीखा
न कहीं निशाना लगाना
न अपने से बड़े कद वाले पर
कभी प्रहार करना
जैसे-तैसे तीर चलायें भी तो
तीर में वह आग कहां से लायें
जो रास्ते में बुझ न जाये
जैसे-तैसे आउल-फाउल
तमाशबीनों और पटाखों की मदद से
आग लगायें भी तो बच्चों को
राम जी की शक्ति पर
यकीन कैसे आये

और जब
बार-बार दशहरे में
देखेंगे
इस तरह
रावण के पुतले को
जलाने की लीला
तो रावण के अंत पर
उन्हें यकीन आये तो कैसे आये
अब या तो राम जी का
और उनकी सेना का कद बढ़ायें
या रावण को छोटा बनायें

पहले काटें उसके पैर
फिर घेर कर मारें
लेकिन
यह सब करने से पहले
राम जी
लंका के सोने में नहीं
अपनी सीता को छुड़ाने में
मन लगायें।

 (‘जापानी बुखार’ से)


शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

कह दो अपने जनरल से

-गणेश पाण्डेय                      
                     
ओ गायिका !
क्यों गाती हो
इतना अच्छा
कि सुनने वाला
आना चाहे 
तुम्हारे बेहद करीब
बस जाना चाहे 
तुम्हारे देश में
और हो जाना चाहे 
मुसलमान

ओ गायिका !
तुम्हीं क्यों नहीं 
आ जाना चाहती
अपने चाहने वाले के पास
कह क्यों नहीं देती
अपने जनरल से
कोई बुलाता है तुम्हें 
देने के लिए
अपने दिल का हिन्दुस्तान   
                     
कैसा है तुम्हारा जनरल 
मचलता है जिसका दिल
जमीन के एक टुकड़े लिए 
कह दो 
अपने जनरल से 
तुम्हारे कंठ में वास है 
एक देवी का
जिसके पास है 
धरती का नायाब जादू 
न कोई गोला-बारूद 
न कोई छल-बल 
न कोई घृणा
बिना किसी खून-खराबे के
जब चाहे जीत ले दुनिया 

कश्मीर में क्या रखा है 
क्या रखा है 
ऐसे जिद्दी जनरल में
जो बंदूक को 
खुदा समझता है 
और अपनी वर्दी को 
ईश्वर की पोशाक
उसे छोड़ कर 
आ क्यों नहीं जाती 
धरती के इस स्वर्ग में

देखो तो 
कितना मचलता है
तुम्हें चाहने वाले का दिल
तुम्हारी एक आवाज पर 
कैसे निकल पड़ता है 
हथेली पर लेकर
अपना दिल
आओ 
और लो संभालो 
अपना हिन्दुस्तान। 

(‘‘परिणीता’’ से)






रविवार, 18 सितंबर 2016

इतनी अच्छी क्यों हो चंदा

(अच्छी कविताएं सबको अच्छी लगतीं हैं। जिन्हें अच्छी कविता की पहचान होती है, उन्हें अच्छी कविताएं अच्छी लगती ही हैं, लेकिन ऐसा बहुत कम होता है कि किसी कवि को किसी दूसरे कवि की कोई कविता इतनी अच्छी लग जाय कि वह उस कविता को चुनौती मान ले और उस कविता से आगे सोचने की हिमाकत करे। हालांकि हर दौर की नयी पीढ़ी का काम होता है, पहले की पीढ़ी के काम को आगे ले जाना अर्थात उससे आगे सोचना। इस पुरानी और नयी पीढ़ी के काम में अक्सर बहुत प्रभावित हो जाने या नकल करने का खतरा मौजूद होता है, लेकिन एक जिम्मेदार कवि इन खतरों से बचते आगे बढ़ता है। कितने कवियों ने कितने कवियों की कितनी कविताओं को चुनौती मानकर कुछ काम किया है, यह सब नहीं जानता, अलबत्ता मैंने एक गलती जरूर की है, त्रिलोचन की कविता ‘‘चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती’’ को चुनौती मानकर।) 

इतनी अच्छी क्यों हो चंदा
- गणेश पाण्डेय                           

तुम अच्छी हो
तुम्हारी रोटी अच्छी है
तुम्हारा अचार अच्छा है
तुम्हारा प्यार अच्छा है
तुम्हारी बोली-बानी
तुम्हारा घर-संसार अच्छा है
तुम्हारी गाय अच्छी है
उसका थन अच्छा है
तुम्हारा सुग्गा अच्छा है
तुम्हारा मिट्ठू अच्छा है
ओसारे में
लालटेन जलाकर
विज्ञान पढ़ता है
यह देखकर
तुम्हें कितना अच्छा लगता है
तुम
गुड़ की चाय
अच्छा बनाती हो
बखीर और गुलगुला
सब अच्छा बनाती हो
कंडा अच्छा पाथती हो
कंडे की आग में
लिट्टी अच्छा लगाती हो
तुम्हारा हाथ अच्छा है
तुम्हारा साथ अच्छा है
कहती हैं सखियां
तुम्हारा आचार-विचार
तुम्हारी हर बात अच्छी है
यह बात कितनी अच्छी है
तुम अपने पति का
आदर करती हो
लेकिन यह बात
बिल्कुल नहीं अच्छी है
कि तुम्हारा पति
तुमसे
प्रेम नहीं करता है
तुम हो कि बस अच्छी हो
इतनी अच्छी क्यों हो चंदा
चुप क्यों रहती हो
क्यों नहीं कहती अपने पति से
तुम उसे
बहुत प्रेम करती हो।

( चौथे संग्रह ‘परिणीता’ से। )










शनिवार, 17 सितंबर 2016

पितृपक्ष

- गणेश पाण्डेय

जैसे रिक्शेवाले भाई ने किया याद
पूछा जैसे जूतों की मरम्मत करनेवाले ने
जैसे दिया जल-अक्षत सामनेवाले भाई ने
जैसे दिया ज्ञानियों ने और कम ज्ञानियों ने
जैसे किया याद
अड़ोस-पड़ोस और गाँव-जवार ने
अपने-अपने पितरों को

मैंने भी किया याद
पिता को और पिता की उँगली को
बुआ को और बुआ की गोद को
और उसकी खूँट में बँधी दुअन्नी को
सिर से पैर तक माँ को
माँ के आँचल के मोतीचूर को
मामा को और मामा के कंधे को
दादी को और दादी की छड़ी को

अनुभव की चहारदीवारी में
और याद की चटाई पर
आते गए जो भी आप से आप
मैंने सबको किया याद
जिन्हें देखा और जिन्हें नहीं देखा

जैसे ठेलेवाले भाई ने किया याद
जैसे याद किया नाई ने
मैंने भी जल्दी-जल्दी खाली कराया
पितरों के बैठने के लिए अपना सिर । 







मंगलवार, 13 सितंबर 2016

जापानी बुखार

 - गणेश पाण्डेय    
  
हे बाबा
किसका है यह
जो अभी - अभी था
और इस क्षण नहीं है
जिसके मुखड़े के बिल्कुल पास
बिलख रहे हैं परिजन और स्वजन
राहुल - राहुल कह कर
किसका है यह नन्हा - सा
राजकुमार
जिसे अपनी छाती से लगाये
चूमती जा रही है बेतहाशा
एक लुटी-लुटी - सी बदहवास युवा स्त्री
जिसकी पथराई आँखों से झर रहे हैं
आँसू
झर-झर-झर
कौन है यह
अटूट विलाप करती हुई
अभागी कोमलांगी
जिसे अड़ोस - पड़ोस की बुजुर्ग औरतें
चुप करा रही हैं -
यशोधरा - यशोधरा कह कर
यह किसकी यशोधरा है बाबा
किसका है राहुल यह
तुमसे क्या नाता है

पिपरहवा के किसी सिधई अहीर
और गनवरिया के किसी बुधई कोंहार से
इस कालकथा का क्या रिश्ता है
कितने राहुल हैं बाबा
कितनी यशोधरा
ढाई हजार साल बाद
यह कैसी पटकथा लिख रहा है
काल
कपिलवस्तु के एक - एक गाँव में
कपिलवस्तु के बाहर गाँव - गाँव में
फूस की झोपड़ियों
और खपरैल के कच्चे - पक्के मकानों में
इक्कीसवीं सदी के एक - एक राहुल को
चुन - चुन कर
कैसे डँस लेता है काल
मच्छर का रूप धर कर
क्या पहले भी मच्छर के काटने से
मर जाते थे कपिलवस्तु के लोग
क्या पहले भी धान के सबसे अच्छे खेतों में
छिपे रहते थे जहरीले मच्छर
और देखते ही फूल जैसे बच्चों को
डँस लेते थे ऐसे ही
जापानी बुख़ार - जापानी बुख़ार
कह - कह कर
हमारे पुरखों के  पुरखों के  पुरखे
शालवन और पीपल के पेड़ वाले
बाबा
आज भी जिस जापान में बजता है
तुम्हारे नाम का डंका
सीधे वहीं से फाट पड़ी है यह महामारी
तीर्थों के तीर्थ बुद्ध प्रदेश में
पूर्वी उत्तर प्रदेश में
शोक में डूबी हुई है
यह विदीर्ण धरती
जहाँ - जहाँ पड़े हैं
तुम्हारे चरणकमल
श्रावस्ती हो या मगध
कपिलवस्तु हो या कोसल
लुम्बिनी हो या कुशीनारा
या हो सारनाथ
हर जगह है तुम्हारा राहुल
अनाथ
आमी हो या राप्ती
सरयू हो या गंगा या कोई और
जिन - जिन नदियों ने छुए हैं
तुम्हारे पांव
डबडब हैं यशोधरा के आँसुओं की बाढ़ से
देखो तो कैसे कम पड़ गया है
तुम्हारी करुणा का पाट
तुम्हीं बताओ बाबा
क्या
मेरी माँ यशोधरा
मेरी चाची यशोधरा
मेरी बुआ यशोधरा
मेरी दादी
मेरी परदादी की परदादी
यशोधरा के असमाप्त रुदन से
जीवित हैं इस अंचल की नदियाँ
क्यों नहीं सूख जाती हैं ये नदियाँ
क्यों नहीं खत्म हो जाता है
राहुल की चिन्ता न करने वाला
राजपाट
क्यों नहीं हो जाता सिंहासन को
जापानी बुखार
बोलो बाबा
कुछ तो बोलो
हे मेरे अच्छे बाबा कुछ तो नया बोलो
यशोधरा के महादुख पर रोशनी डालो
आलोकित करो पथ

क्या गोरखपुर क्या देवरिया
और क्या महराजगंज
क्या सिद्धार्थनगर
क्या अड़ोस - पड़ोस के जनपद
क्या पडोस के बिहार के गांव-गिरांव
और क्या नेपाल बार्डर - अन्दर
हर जगह पसरा हुआ है
मौत का सन्नाटा
और डर
घर - घर में कर गया है घर
किसी
नई - नई हुई माँ से
उसे रह-रह कर पुकारती हुई
उसकी नटखट पुकार को
छीन लेना
सहसा
किसी
पिता की डबडब आँख से
उसके चाँद-तारे को
अलग कर देना
किसी मासूम तितली से
एक झटके में
उसके पंख नोच लेना
और गेंदा और गुलाब से
उसकी पंखुड़ियों को लूटकर
मसल देना
किसी कविता का अंत है
कि जीवन की अवांछित विपदा
कि सभ्यता का कोई अनिवार्य शोकगीत
बोलो बाबा
क्या है यह
जपानी बुखार है तो यहां क्यों है
क्यों पसंद है इसे सबसे अधिक
इसके फंदेनुमा पंजे में
गिरई मछली की तरह तड़प-तड़प कर
शांत हो जाने वाले
इस अंचल के विपन्न , हतभाग्य
और दुधमुंहे
यह कोई बुखार है
बुखार है तो उतरता क्यों नहीं
महामारी है महामारी
नई महामारी
सबसे ज्यादा नये पौधों को
धरती से विलग करने वाली
मौत की तेज आंधी है
बुझाये हैं जिसने
इस अंचल के
हजारों नन्हे कुलदीप
कहां हैं मर्द सब
बेबस
और विलाप करती हुई मांओं की गोद
शिशु शवों से पाट देने वाला
हत्यारा जापानी बुखार
बचा हुआ है कैसे अबतक
कहां है पुलिस
और कहां है सेना
क्यों नहीं करती इसे गिरिफ्तार
जिंदा या मुर्दा
कोई विपक्ष है
है तो क्यों नहीं मांगता
जीने के अधिकार की गारंटी
कोई सरकार है कहीं
है तो कहां है
आये हाईकमान
कोई भारी-भरकम मंत्री-संत्री
कोई राजधानी का पत्रकार आये
और
टीवी पर जिंदगी की दो बूंद देने वाले
महानायक को पकड़कर लाये
कोई तो बतलाये-
जापान में एटमबम से
कितने शिशुओं की आंखें हुईं बंद
वर्ल्ड टेªड सेंटर पर हुए हमले में
मारे गये कितने अमेरिकी
आखिर कितना है अभी यहां कम
आने से कतराता है
सरकार का मुखिया
करता है वक्त का इंतजार
और हिसाब-किताब
अस्पतालों और सेहत का महकमा
पता नहीं किस अहमक के जिम्मे है
क्या शहर और क्या देहात
क्या धान के खेत
और क्या गड्ढे का पानी
किस सूअर
और किस मच्छर की बात करें
हर कोनें-अंतरे में बठी हुई है मौत
सफेद लिबास में
एक कहता है
हेलीकाप्टर में बैठकर
अपने नुकीले नाखूनों वाले पंजे से
छिड़केंगे दवा
गांव-खेत , ताल-पोखर
चल चुकी है राजधानी से
दवा लगी मच्छरदानियों की भारी खेप
हर मुश्किल में आपके साथ है
एक खानदानी पंजा
दूसरा
पहले शंख बजाता है फिर गाल-
बुखार जापानी हो या पाकिस्तानी
मार भगायेंगे
मर्ज कैसा भी हो
काफी है छूमंतर होने के लिए
कमल की पंखुड़ियों से बनी
एक गोली
तीसरा आता है बाद में
रहता है सरकार में मगन
कहता है कुछ करता है कुछ
मिनट-मिनट पर सोचता है
नफा-नुकसान
क्या खूब फबती है
उसकी दस लाख की गाड़ी पर
हरे और लाल रंग के मखमल जैसे
छोटे से झण्डे में कढ़ी हुई
सुनहली साइकिल
जिसके पास खड़ा होकर
किसी पुराने दर्द भरे गाने की तरह
कहता है-
जो हुआ उसके लिए बेहद अफसोस है
टीके और दवा का करते हैं इंतजाम
लीजिए फौरन से पेश्तर
ले आया हूं आठ करोड़
बस पकड़े रहें
साइकिल की मूठ
आते हैं एक से बढ़कर एक
हाथी नहीं आता
मुमकिन है कभी आये हाथी
गिरते-पड़ते
चाहे हाथी के हौदे पर आये
कोई गुस्सैल
चिंघाड़ते हुए-
नहीं-नहीं , यह नहीं जापानी बुखार
न इंसेफेलाइटिस न मस्तिष्क ज्वर
यह तो है सीधे-सीधे
मनुवादी बुखार
कमजोर तबके पर है जिसकी ज्यादे मार
कोई नहीं आता ऐसा
कोई वैद्य कोई डाक्टर
कोई लेखक कोई कलावंत
जीवन का कोई इंजीनियर
कोई पथ-प्रदर्शक
कोई माई का लाल
माई से कहने-
घबड़ाओ नहीं माई
लो
मेरी त्वचा की रूमाल से
पोंछ लो अपने आंसू
हर पंजे से बचायेंगे
बचायेंगे कमल से
साइकिल से बचायेंगे
बचायेंगे हाथी से
शर्तिया बचायेंगे माई
इस भगोड़े जापानी बुखार से
सूअर से बचायेंगे
बचायेंगे मच्छर से
सबसे बचायेंगे
माई ।

(तीसरे कविता संग्रह ‘‘जापानी बुखार’’ से)










रविवार, 4 सितंबर 2016

एक अफवाह है दिल्ली

गणेश पाण्डेय

कोई तो होगा मेरे जैसा
जो कह सके शपथपूर्वक
चालीस पार किया 
गया नहीं दिल्ली
नयी कि पुरानी

देखा नहीं कनाट प्लेस
बहादुर शाह जफर मार्ग
चांदनी चौक, मेहरौली
अनकनंदा, दरियागंज

मुझे अक्सर लगा
एक डर है दिल्ली
किसी शहर का नाम नहीं
जो फूत्कार करता है
लेखकों की जीभ पर
हृदय के किसी अंधकार में

जब-जब बताते रहे एजेंट सगर्व
दिल्ली दरबार के किस्से
लेखकों की जुटान के ब्योरे
कैसे बंटती हैं रेवड़ियां
और पुरस्कार

हाय ! सुनता रहा किस्सों में
कैसे मचलते हैं नए कवि
किसी उस्ताद की कानी उंगली से
एक डिठौने के लिए

और 
नाचते हैं कैसे आज के किस्सागो
किसी दरियाई भालू के आगे
उसकी एक फूंक के लिए
निछावर करने को आतुर
अपना सबकुछ 

बेशक होता रहा हांका
कुल देश में कि खैर नहीं
मार दिये जाएंगे वे 
जो जाएंगे नहीं
दिल्ली

मैं हंसता रहा
कि दिल्ली से
दिल्ली के लिए उड़ायी गयी
एक अफवाह है दिल्ली

देखो तो
बचा हुआ है गणेश पाण्डेय
गोरखपुर में साबूत।

( "अटा पड़ा था दुख का हाट" से)





शुक्रवार, 25 मार्च 2016

अच्छी कविता में आत्मरक्षा का गुण होता है

 - गणेश पाण्डेय
बात कहीं से भी शुरू की जा सकती है। छायावाद से भी कि छायावाद आधुनिक हिंदी कविता की सबसे ऊँची मंजिल है। लेकिन जरूरी नहीं कि इस बात से या किसी बात से सब सहमत हो। क्योंकि यह एक ऐसा समय है जब हिंदी के अनेक स्वनामधन्य आचार्य अपने काव्य विवेक से अधिक अपने समय के नामी-गिरामी आलोचकों के काव्यविवेक या किसी अन्य आग्रह पर अधिक भरोसा करते हैं। भरोसा ही नही बाकायदा उनकी पूजा करते हैं। हो सकता है कि ऐसे काव्यालोचक कहें कि प्रगतिवाद सबसे उंची मंजिल है। पर मेरे देखेने में अच्छाइयों के बावजूद प्रगतिवाद आधुनिक कविता की सबसे ऊँची मंजिल नहीं है। मैं ही नहीं और भी कई लोग ऐसा ही अनुभव करते हैं। पर हो सकता है कि ग्लोकोमा की वजह से मैं इससे अधिक देख न पा रहा होऊँ। असल में हिंदी साहित्य में यह भ्रम जोरों पर है कि सूरदास तो सिर्फ कविता में होते हैं और वह भी आज के जमाने में सिर्फ लच्छीपुर खास में होते हैं, आलोचना में हरगिज-हरगिज नहीं होते हैं। जबकि मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि हिंदी साहित्य के मौजूदा परिदृश्य पर आलोचना में सूरदासों की भरमार है। सूरदास ही नहीं बल्कि इनमें गजब-गजब के दास होते हैं। कोई परम आनंद में डूबा दास होता है तो कोई विश्वभ्रमण पर निकला संसारी दास। कोई नया-नया दासानुदास। ये कब कहां कैसे क्या करते हैं, यह सब बताने की बात नहीं है। बस इतना समझ लीजिए कि ये किसी नयी बात से या किसी बात को नयी तरह से देखने से डायबिटीज के मरीजों की तरह सख्त परहेज करते हैं। ऐसे आचार्य कविता की विकास यात्रा को किस दृष्टि से देखते हैं, यह दुर्भाग्यवश किसी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं हो सकता है। आधुनिक हिंदी कविता के पाठ्यक्रम में छायावाद ही नहीं छायावादोŸार कविता का भी विशिष्ट स्थान है। लेकिन जैसा कि कहा गया कि छायावाद आधुनिक कविता का शिखर है, तो इसके पुष्ट आधार हैं। छायावादी कविता द्विवेदीयुग की कविता की तरह टेढ़ामेढ़ा लड्डू नहीं है। बल्कि संुदर, स्वादिष्ट और सुपाच्य, कविता का नायाब प्रसाद है। कविता की उर्वर और श्रेष्ठ कल्पना का असीम आकाश ही नहीं है बल्कि अनुभव का अद्वितीय लोक है। कवि अपने पूरे वुजूद के साथ कविता का सहचर और भोक्ता है। एक ऐसी काव्यभूमि है जहां प्रकृति सिर्फ नई ही नहीं होती है बल्कि कुछ और भी बन जाती है, एक जीती जागती और प्रेयसि जैसी प्रिय स्त्री। छायावाद में स्त्री बिल्कुल नये रूप में सामने आती है। स्त्री की चिंता भी कहीं ज्यादा ईमानदार है। एक और राम की शक्तिपूजा में सीता की मुक्ति की चिंता है तो दूसरी ओर देवी जैसी रचना में अति साधारण और हाशिये की स्त्री के जीवन और सरोकारों की चिंता। विधवा स्त्री की भी चिंता कवि को उसी तरह विकल करती है। प्रायः कवियों ने नयी स्त्री को देखने की कोशिश की है। इन कवियों की स्त्री एक ओर देवि, सहचरि, मां है तो दूसरी ओर इष्टदेव के मंदिर की पूजा-सी विधवा और पत्थर तोड़ती मजदूरनी भी। निराला कविता को जब परिवेश की पुकार कहते हैं तो उनके सामने जाहिर है कि छायावाद की कविता होती है। आचार्य शुक्ल ने छायावाद को जब चित्रभाषा शैली कहने  साथ-साथ उसे बाहर से आया बतलाया तो उनके इस आग्रह को स्वीकार करने में जिन कारणों से दिक्कत हुई, स्पष्ट है। रहस्यवाद छायावादी कविता का एक छोटा-सा अंश है पूरा छायावाद नहीं। इस तरह का रहस्यवादी छायावाद पहले रवींद्रनाथ की कविताओं में फिर वहां से हिंदी में आया, इसे भी स्वीकार करने में मुश्किल हुई। यदि इसे ही छायावाद मान लेंगे तो फिर स्वाधीनता संधर्ष जैसे साहित्य के वृहत्तर उद्देश्य का क्या होगा ? क्या उससे बड़ा कविता का सरोकर कहा जायेगा - बीसवीं सदी और अब नयी सदी में - छायावाद का रहस्यवादी सरोकार ? यह ठीक है कि छायावादी कविता का पाट जिन दो छोरों से बनता है, उसमें एक ओर विराट का साक्षात्कार है तो दूसरी ओर लघुता के प्रति दृष्टिपात ही नहीं बल्कि उनके और विशेषरूप से देश के लिए संघर्ष चेतना की प्रतिष्ठा है। कविता का शाश्वत परिसर तो है ही। जाहिर है कि कविता की सलिला जिन दो पाटों के बीच बहती है उनमें एक है प्रकृति और दूसरा है अपने समय के समाज का परिदृश्य। छायावाद में प्रकृति पहलीबार जीती-जागती और किसी सुंदर और सौम्य स्त्री की तरह बहुत नयी-नयी और बेहद आत्मीय और अंतरंग लगती है। आगे कुछ कवियों के यहां तो अल्हड़ और नितांत अपनी लगती है। कविता में निजता का तत्व कविता का विरोधी नहीं है। बल्कि कविता को और विश्वसनीय और तरल बनाने वाला तत्व है। यह तरलता ही कविता को पठनीयता और सम्प्रेषणीयता जैसे आलोचनात्मक प्रश्नों से मुक्त करती है। वैयक्तिकता और सामाजिकता के प्रश्न छायावादी कविता को अशक्त नहीं करते हैं, बल्कि ताकत देते हैं। निराला लिखते है- ‘मैंने मैं शैली अपनायी’ और दूसरी ओर कहते हैं कि ‘कविता परिवेश की पुकार है’। जाहिर है कि परिवेश केवल प्रकृति का आंगन नहीं है। उसके भीतर आसपास का सब शामिल है। आसपास का ही नहीं, बल्कि हमारी चेतना के भीतर जो कुछ भी अंट सकता है, सब शामिल है। क्या समाज और क्या देश। क्या यहां और क्या वहां। क्या इस पार और क्या उस पार। छायावादी कविता की श्रेष्ठता का आधार उसके कवियों का महत्वपूर्ण अवदान है। कोई भी काव्यांदोलन, काव्यांदोलन ही नहीं बल्कि कोई भी साहित्यिक आंदोलन अपने आग्रहों और अपनी वैचारिकी से महत्वपूर्ण नहीं होता है, बल्कि उसे उससे जुड़े लेखकों के कद और योगदान के आधार पर याद किया जाता है। कभी-कभी बिना किसी घोषित काव्यांदोलन के एक कालखण्ड विशेष के भीतर के लेखकों में आप से आप अपने समय और परिवेश की पुकार के आधार पर मिलती-जुलती काव्य प्रवृत्तियां दिखने लगती हैं। सच बात तो यह कि कोई सजग कवि जब कविता रच रहा होता है तो उस समय वह पुलिस की परेड नहीं कर रहा होता है। उसकी अपनी काव्यदृष्टि बहुत-सी चीजों को तय करती है। उदाहरण के लिए कह सकते हैं कि इसीलिए हिंदी के सारे मार्क्सवादी कवि मुक्तिबोध से छोटे हैं। छोटा या बड़ा होना किसी सीमित अर्थ में लेने से कभी-कभी अनर्थ भी हो जाता है। छायावादी कविता के बड़े होने के अपने पुष्ट अकाट्य आधार हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि बाद की कविता अवांछित या महत्वहीन है।  छायावादोत्तर कविता एक अर्थ में छायावादी कविता का ही विकास है। द्विवेदीयुग की कविता की प्रतिकिरिया में छायावाद के लिए स्थूल के विरुद्ध सूक्ष्म का स्वागत जैसा सूक्ष्म के विरुद्ध स्थूल जैसी कोई चीज नहीं। न तो उसकी भयंकर प्रतिक्रिया में अलग से कविता की दृष्टि से कोई क्रांतिकारी चीज है। इंकिलाब है तो कथ्य के स्तर पर पहले के जन सरोकारों के स्वर की तीव्रता तक सीमित है। हिंदी के प्रिय विद्यार्थियों और भविष्य के कर्णधारों से विनती है कि वे छायावादोत्तर कविता को आधुनिक हिंदी कविता के विकासक्रम में अगले और एक छोटे पड़ाव लेकिन महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखने की कृपा करें। इसे एक ऐसे पड़ाव के रूप में लें कि जहाँ कविता के पाठकों को गला तर करने के लिए एक छोटा-सा कुआँ है, एक छोटी-सी रस्सी है और एक छोटा-सा घड़ा है। थोड़ी-सी मौज है थोड़ी-सी मस्ती है। प्यास का थोड़ा-सा दीवानापन है। यों तो एक अध्यापक रूप मेे अपने विद्यार्थियों से कहना हो तो कहेंगे कि छायावाद के बाद हिंदी कविता मोटेतौर पर जिन दो रास्तों पर आगे बढ़ती है, उनमें पहला रास्ता प्रगतिवाद कहलाता है जिसे कुछ लोग अज्ञानवश बंद गली का आखिरी मकान भी कहते हैं। दूसरा रास्ता प्रयोगवाद कहलाता है जिसे वही कुछ लोग बंद गली के आखिरी मकान के बगल से दाहिने निकला हुआ रास्ता कहते हैं। वे यह भी कहते हैं कि जब प्रगतिवाद में कविता के तत्वों की बहुत अनदेखी होने लगी तो कुछ कवियों ने कविता के पक्ष में और एक अर्थ में कुछ कवियों ने जनता के पक्ष में खड़ी होने वाली कविता के पक्ष में खड़े होने की कोशिश की। पर आगे बढ़ने से पहले  छायावादोत्तर या उत्तर छायावाद जैसी छतरी के नीचे मौजूद कुछ ताकतवर कवियों की कविता पर भी गौर करना जरूरी होगा। ये सीधे और उन अर्थों में प्रगतिवादी तो नहीं कहलाये पर जिनकी रचनाओं में जनपक्षधरता के स्वर मौजूद हैं। लेकिन ऐसे भी कवि हैं जो समाज के वृहत्तर दुख को दूर करने या सामाजिक सौहार्द के शर्तिया इलाज के लिए मयखाने में बैठना ज्यादा जरूरी समझते हैं। आधुनिकता की वैचाारिकी से इस मयखाने का रिश्ता या मय की ताजपोशी समझना औरों के लिए भले ही मुश्किल चीज हो पर हिंदी आलोचकों के लिए अतिसरल है। मधु तो छायावाद में भी है पर शाला का निर्माण तो छायावादोत्तर या कि छायावाद से थोड़ा आगे और प्रगतिवाद से थोड़ा पहले के मील के पत्थर के पास जन अरण्य में ही संभव होता है। निराला की कविताओं में सामान्यजन की प्रतिष्ठा और उनके पक्ष में डटकर खड़े होने का जैसा जज्बा मौजूद है, बाद की कविताओं में संधर्ष के दृश्य उनसे अलग नहीं बल्कि उनके स्वर के आलाप हैं। आशय यह नहीं कि छायावादोत्तर कवियों का उपक्रम कहीं से कम है या नगण्य है। कहना चाहिए कि नगण्य और वंचितों की चिंता का स्वर उनके यहाँ तीव्र है। प्रगतिवाद के कवियों में कथ्य की सबलता और स्वर की तीव्रता ने जाहिर है कि कविता के तत्वों की अनदेखी की तो कविता के तत्वों की मजबूती के लिए प्रयोगवाद से जुड़े कवियों को आगे आना पड़ा। उनमें भी अज्ञेय तो जैसे आगे की कविता का सारा कील-कांटा जानते थे सो उन्हें सबसे आगे रहने के लिए प्रयोगवाद एक अवसर था। हालाकि वे वादी कहलाने के पक्ष में नहीं थे। पर जिन्हें उन्हें वादी कहना था, उन्होंने वादी कहा। तार सप्तक का प्रकाशन सचमुच गौरतलब है। सप्तक के कवियों के बारे में दिलचस्प यह कि ये कवि विचारधारा के स्तर पर एक नहीं थे। उनमें फर्क था। दूसरी बात यह कि ये कवि युवा थे पर कविदृष्टि वयस्क थी। तीसरी बात यह कि इस संकलन में शामिल कवियों की कविताएं, उन कवियों की सर्वोत्तम कविताएं नहीं थीं। सर्वोत्तम क्या प्रतिनिधि कविताएं भी नहीं थीं। इसके बावजूद संकलन के कवियों और उनकी कविताओं ने नई राह के अन्वेषण को संभव किया। यही इस संकलन का शायद उद्देश्य भी था। तार सप्तक के बाद दूसरा सप्तक फिर तीसरा सप्तक आया। सप्तकों ने और जो भी किया हो, कविता को नई कविता का एक खुला आसमान दिया। कहने को तो अज्ञेय चौथा सप्तक भी लेकर आये पर वह चौथा ही बनकर रह गया। सात तो दूर एक भी तार ठीक से बज नहीं पाया। जबकि तीसरे सप्तक तक के कवियों में कई कवि ऐसे हुए जिन्हांेने अपने समय की कविता को तो प्रभावित किया ही है बाद की कविता को भी प्रभावित किया है। कविता की यात्रा हो या साहित्य की किसी भी विधा की विकास यात्रा,  कम प्रतिभा के ऐसे कवियों की भरमार रहती है जो किसी भी तरह उछल-कूद करके अमर हो जाने के लिए विकल रहते हैं। आलोचक या संपादक को खुश करने के लिए कुछ भी करने को तो तैयार रहते ही हैं, कविता या रचना की हत्या करने तक के काम को करने में तनिक भी दुखी नहीं होते। कविता मरती है तो मर जायें, बस ये अमर हो जायें। कविता की सुफरफास्ट रेलगाड़ी के दरवाजे पर हैंडिल को कस कर पकड़कर या बिना टिकट बर्थ पर लेटकर सफर करने वाले ऐसे कातिलों को आज भी देखा जा सकता है। साहित्य में कई आंदोलन ऐसे मीडियाकर अमर होने की आकांक्षा में चलाते हैं। कई संपादक अपनी पत्रिका या खुद को संपादक के रूप में स्थापित करने के लिए भी ऐसे प्रायोजित आंदोलन खड़ा करते रहते हैं। पर बिना अच्छी रचना के कोई भी आंदोलन जीवित नहीं रहता है। कईबार अपने समय की कविता या कवियों को चर्चित करने या अंधेरे में रखने में प्रतिष्ठित आलोचक भी कम बेईमानी या कम बड़ी चूक नहीं करते हैं। कुछ वक्त पहले एक नामचीन आलोचक ने  एक इंटरव्यू में कहा था कि फणीश्वरनाथ रेणु के महत्व को समझने में देर हुई। शायद यह आधा सच है। यह सच है कि उन्होंने रेणु के महत्व को देर से स्वीकार किया। पर यह सच नहीं लगता कि हमारे समय का कोई नामचीन आलोचक रेणु जैसे लेखक के महत्व को देर से समझ पायेगा। यह सिर्फ एक उदाहरण है। हिंदी आलोचना में आज कई ऐसे आलोचक हैं जो अपने समय की कविता और आलोचना को इसी तरह कलंकित करते हैं। दुर्भाग्य यह कि हमारे समय की युवा आलोचना कभी अपने पैरों पर खड़ी ही नहीं हुई। लेकिन सौभाग्य से हिंदी कविता की निर्मल आत्मा कभी भी ऐसी कुचेष्टाओं से मलिन हुई ही नहीं। शुरू में ही ंिहदी कविता की नींव इतनी मजबूत बनी कि कोई आलोचक या दंद-फंद में लगा हुआ कवि  अपनी दबंगई या बुरी नजर से उसे हिलाना तो दूर, छू भी नहीं सकता है। कविता की आत्मा के पास पहुंचते ही अपात्र सूर्य जैसे ताप में राख हो जाता है। लेकिन कई बार एक पूरा का पूरा दौर ही आंख पर पट्टी बांध लेता है। किसी महाजन की जगह किसी महादुर्जन के फतवे को ही अपने समय का सत्य समझ लेता है। पर जब समय का सारा पानी बह जाता है तो रेत की तरह सच सामने होता है। अपने समय के सब चर्चित भुला दिये गये होते हैं। याद रहते हैं वे जिनकी कविताओं में कुछ होता है। कभी-कभी कुछ वाले भी अपने समय में अपनी हैसियत से अधिक पा जाते हैं। 
       नई कविता और नई कहानी दोनों आधुनिक काल का महत्वपूर्ण पड़ाव है। कविता में नई कविता के बाद कुछ पानी के बुलबुले जैसे काव्यांदोलन भी आते हैं। पर कविता के एक समृद्ध और मजबूत देश में अकविता के लिए कितनी गुंजाइश हो सकती है। सो आये और गये की तरह कविता और कहानी में ऐसे आंदोलन कहने के लिए आये और चले गये। साठ के बाद कविता के मिजाज में जो परिवर्तन दिखता है, वह अचानक और किसी एक कवि के प्रादुर्भाव से नहीं होता है। यह सोचना नासमझी होगी कि एक धूमिल के आने से साठ के बाद की कविता चमकी। वह एक ऐसा कालखण्ड था जब देश की परिस्थितियों में काफी कुछ नाउम्मीदी और विकलता और विश्वास का संकट युवा लेखकों को मथ रहा था। बाहर और भीतर काफी कुछ टूट रहा था। नई कविता के कई कवियों में अपने समय के दंश और उसकी तीव्रता का अनुभव मौजूद है। जहां तक राजनीतिक कविता का प्रश्न है, यह कहने में संकोच नहीं कि मुक्तिबोध के बाद रधुवीर सहाय ध्यान खींचते हैं। साठोत्तरी कविता में जिसे मोहभंग की कविता भी कहा गया, राजनीति और खासतौर से लोकतंत्र और समाजवाद को लेकर कविता में बहुत बोलने वाली मुहावरेबाज कविता का एक दौर आता है। जिसमें कविता की भाषा को धरना-प्रदर्शन में चीखने वाली भाषा में बदलने की छटपटाहट दिखती है। धूमिल के लिए एक नामचीन आलोचक इतने व्यग्र होते हैं, शायद उतना कभी अपने बच्चों के लिए भी विकल नहीं हुए होंगे। धूमिल एक प्रतिभाशाली कवि हैं। इसमें कुछ खास बुरा नहीं है किसी पत्रिका में उन्हें किस तरह और उनकी कविता को कैसे करके छापा गया होगा। संपादक एक अभिभावक की तरह होता है। नये रचनाकार को अपने बच्चे की तरह सजाता और संवारता है। लेकिन किसी संपादक या  आलोचक को दूसरे बच्चे दिखें ही नहीं, यह बुरा है। साठोत्तरी कविता में धूमिल के अलावा लीलाधर जगूड़ी और देवेंद्र कुमार जैसे कवि भी शामिल हैं। पटना के युवा लेखक सम्मेलन में धूमिल ने जिस देवेंद्र कुमार की काव्य भाषा को अपनी कावयभाषा से बेहतर बताया था, दुर्भाग्य यह कि हम पूर्वांचल में धूमिल को तो पढ़ाते हैं पर देवेंद्र कुमार की कविता को नहीं। ऐसा क्यों ? क्या इसलिए कि देवेंद्र कुमार न तो श्रीवास्तव थे न तिवारी ? या कि तिवारियों और श्रीवास्तवों की कविता से पहले किसी अन्य जाति में जन्म लेने वाले कवि की कविता पढ़ाने में कोई साहित्यिक या नैतिक बाधा है ? या विश्वविद्यालयों के आचार्य कभी अपने कूपों से बाहर निकलेंगे ही नहीं ? या.... जब ये आचार्य चले जायेंगे और नये आचार्य आयेंगे, जो कूपों में नहीं बल्कि कविता के खुले परिसर में बैठेंगे, तब देवेंद्र कुमार ही नहीं देवेंद्र कुमार के बाद कविता के जो भी सच्चे सपूत होंगे, उनकी कविता पढ़ाएंगे। जब हमारा समय बीत जायेगा और हम बीत जायेंगे तो शायद कुछ और लोग आयेंगे जो आज की दरिद्र युवा आलोचना को समृद्ध, ताकतवर और भरोसेमंद बनाएंगे। तब तक शायद न नामचीन आलोचक रहेंगे और न उनका डर। आज की मुश्किल यह कि हर शहर में एक-दो नामचीन रहते हैं। जो लेखक अपने समय के नामचीनों से डर कर लिखते हैं। जाहिर है कि वे लिखते नहीं हैं, बल्कि कुछ और करते हैं। आठवें दशक की कविता और उसके बाद की कविता की अपनी मुश्किलें हैं। अच्छे कवियों को तनाव में रहना पड़ता है और कम अच्छे कवियों को साहित्य अकादमी टॉफी की तरह दी जाती है। नवें दशक की कविता हो या अंतिम दशक की कविता और या नई सदी की कविता, इस पूरे दौर की कविता को एक अदद आलोचक की दरकार है जो सच को फटकार कर कह सके और राजधानी की ओर मुंह करके फटकार सके। लेकिन फटकारेगा कौन ? फटकारेगा वह जिसके पास एक टका ही सही, उसका अपना हो। अंत में कहना चाहूंगा कि फटकारने वाले आलोचक का प्रादुर्भाव नहीं होता है तो न सही। अच्छी कविता में आत्मरक्षा का गुण अनिवार्य रूप से होता है। अच्छी कविता किसी आलोचक का मुंह नहीं देखती। एक आलोचक को ही अच्छा आलोचक बनने के लिए अच्छी कविता के पास जाना पड़ता है। मैं यह मान नहीं सकता कि तुलसीदास आचार्य शुक्ल के पास गये थे। अच्छा कवि आलोचक के पास नहीं जाता है। आचार्य शुक्ल ही तुलसीदास और सूरदास और जायसी के पास गये थे। फिर आज के कवि क्यों दौड़-दौड़ कर राजधानी जाते हैं ? हिंदी कविता की यात्रा से जो लोग परिचित हैं जानते होगे कि अच्छी कविता राजधानी से दूर रहती है। कविता अपना जासूस आप होती है। किसी भी दौर की कविता हो, छायावाद की कविता हो या छायावादोत्तर कविता या उसके बाद की कविता अपनी खूबियों और खामियों को छुपाकर रख नहीं सकती है। इसे आप कविता की देवी का वरदान कहें या शाप, पर यह है और सौ फीसदी है।