गुरुवार, 4 जून 2026

कविता की जान लेने के सौ तरीके

कविता की हार्दिकता
------------------------
-गणेश पाण्डेय

कविता से हार्दिकता नष्ट हो रही है, यांत्रिकता बढ़ती जा रही है। कल्पनाशीलता का नाश हो रहा है। भाषा से सर्जनात्मकता कम होती जा रही है। बुद्धि, अपनी नैसर्गिकता खो रही है। कुछ लोग हैं, जो कविता का अतिक्रमण कर रहे हैं, उसे लेख की दासी बना रहे हैं। जो लोग, यह सब कर रहे हैं, यह सोचकर कर रहे हैं कि कविता में कमाल कर रहे हैं। वे आचार्य शुक्ल से आगे का काम जिसे समझ रहे हैं, दरअसल वह उनकी समझ का फेर है। शायद उन्हें कविता की बुनियाद, दीवारों और मंजिलों के बारे में कम पता है या उन्होंने हिन्दी साहित्य से बाहर, अपने पुरखे और आदर्श चुन लिए हैं। यह हमारे समय की कविता का एक हिस्सा है, जिस ओर कविता का हृदय पक्ष नहीं है, हड्डियों का एक टूटा-फूटा ढाँचा है, धोखा है, उस ओर आज के युवा सरपट दौड़े चले जा रहे हैं, लेकिन अभी पूरा मैदान उनके दौड़ने के लिए खाली नहीं हुआ है। फिर भी इन युवाओं के आका कविता की पीठ में छुरा घोंपने से बाज नहीं आ रहे हैं। असल में इनकी पीठ पर किसी न किसी संगठन, गैंग और साहित्य की भ्रष्ट संस्थाओं का हाथ है। कोई कितना ही बलवान क्यों न हो, कितनी ही बड़ी फौज उसके पास क्यों न हो, चाहे उसके पास करोड़ों का फंड हो, दरबारियों का हुजूम हो, कविता किसी के मारने से न कभी मरी है, न मरेगी। इन्होंने अब तक कविता की जान लेने के सौ तरीक़े आज़माए, लेकिन कविता अपने आसन से कभी डिगी नहीं। कविता की हत्या के लिए सन्नद्ध हिन्दी के ये हत्यारे, शार्पशूटर अलबत्ता की समय हाथों मारे जाएँगे।

      हे भगवान, हे भगवान इसलिए कहता हूँ, क्योंकि अपने समय के हिन्दी साहित्य में मुझे कोई ऐसा लेखक मिला ही नहीं, जो दूध का धुला न हो तो, कम से कम पानी का धुला तो हो ही, जिसे अपना गॉडफ़ादर बना सकूँ। नामवर सिंह में न ऐसा कुछ दिखा, न अपने गृह जनपद सिद्धार्थनगर के बिस्कोहर गाँव के विश्वनाथ त्रिपाठी में। त्रिपाठी जी तो महाढिलपुक निकले। मेरे सामने इलाहाबाद और गोरखपुर के एक-एक गीतकारों का नाम जैसे लिया, तभी मैं समझ गया कि पंडिज्जी अब कितने पानी में आ गये हैं, पानी तो धुलने भर का भी नहीं है। मैंने सीधे विश्वनाथ त्रिपाठी लिख दिया है, जिला -जवार कै मनई पढ़ेंगे तो मुझे गाली देंगे, नालायक तो कहेंगे ही कहेंगे, जिला-जवार कै बुजुरुक का नाम इज्ज़त से नाहीं लिया। हमारे यहाँ किसी बुजरुक के बारामंड पर लाठी बजाना होता है, तो पहले पैलगी करते हैं, फिर लाठी बजाते हैं। सो पाठको, पं विश्वनाथ त्रिपाठी जी के आगे चार बार परम आदरणीय लिखता हूँ। पंडिज्जी के बाद बाऊ साहब का जिक्र। 
      केदारनाथ सिंह, मेरे प्रिय कवि बंगाली जी के बहुत निकट थे, लेकिन सिंह साहब की पालकी ढोने वालों की संख्या का अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि गोरखपुर में चार तो मुख्य पालकी ढोने वाले थे, ऊपर से चौदह सहायक भी थे। सहायक तो नामवर जी के भी कई थे। एक प्रमुख सहायक तो गोरखपुर में ही थे। मैं कहाँ से किसको पकड़कर कहता कि आप मेरे गॉडफ़ादर बन जाओ। वाजपेयी जी में गॉडफ़ादर बनाने लायक़ कुछ था ही नहीं, वे तो चिरकुट लेखकों-अलेखकों तक के गॉडफ़ादर रहे हैं। आजकल तो कहीं से लंबा हाथ मारकर फंड हथिया लिया है, उसी लेखकों का गाडफादर वगैरा बनते हैं। हमारे समय में किसी का एक गॉडफ़ादर होना तो बहुत मामूली बात है, मेरी पीढ़ी में तो एक-एक के दस-दस गॉडफ़ादर रहे हैं। गॉडफ़ादर भी बहुत छोटे थे। बहुत छोटे। छोटे इसलिए थे कि बाद की किसी भी पीढ़ी में एक भी मज़बूत लेखक नहीं पैदा कर सके। गॉडफ़ादर-प्रसंग यहाँ मुख्य या सहायक विषय नहीं हैं। यह तो औचक भगवान के सामने फाट पड़ा। 
     तो फिर से, हे भगवान भले मुझे नातिनों और पोतियों का ब्याह देखने तक का समय न दीजिए, लेकिन मुझे इतना समय ज़रूर दीजिए कि कविता के आज के बीसियों डॉन और उनके शूटरों की ख़राब कविताओं पर थोड़ा-बहुत कह सकूँ। कविता या साहित्य को नुक़सान पहुँचाने वालों पर चोट कर सकूँ। बुरी कविता के कुछ प्रतिमान थिर कर सकूँ और कविता के देवता की पोशाक पहनकर जगह-जगह विचरण करने वाले, कविता के कापुरुषों की पहचान कर सकूँ। उन्हें रेखांकित कर सकूँ। अपने समय की कविता का एक काला इतिहास लिख सकूँ। एक ऐसा दस्तावेज़ लिख सकूँ, जो मेरे न रहने के बाद, वक़्त पर काम आये।

    सोचता हूँ कि यह शुरुआती हिस्सा किसी प्रिंट या वेब-पत्रिका को दे दूँ, लेकिन कविता को लेकर हमारे समय के संपादकों के क्या आदर्श हैं, हमारे समय के कौन से कवि उनके प्रतिनिधि कवि हैं, उनकी दृष्टि में अच्छी कविता के प्रतिमान क्या हैं, क्या सब धान बाईस पसेरी हैं या कविता को लेकर उनकी कोई समझ है या नहीं, जान तो लूँ।

       कोई संपादक के साथ प्रोफ़ेसर भी हो, तो मतलब यह कि करेला नीम पर चढ़ा हुआ है। वैसे भी प्रोफेसर होना बड़ी चीज है। इस अर्थ में कि उसकी नौकरी पक्की है, कुछ भी लिखे; मोदी और भाजपा की चाहे जितनी तीव्र आलोचना करे, फासिस्ट-विरोध की बुनियाद पर लेखक संगठन चलाये। प्रोफेसर अगर लेखक संगठन को जेब में रखकर देश भर में दौरा करने लगे, कवियों का जमावड़ा लगाये और एक  पत्रिका में छापने लगे, तब तो वह कम उम्र में ही साहित्य की एक सत्ता बन सकता है। उसके साथ चलने वालों में, उसकी पत्रिका में छपने वालों में हिम्मत नहीं होगी कि उसकी आलोचना कर सकें, उसके खि़लाफ़ चूँ बोल सकें। वैसे जो लोग प्रोफ़ेसर नहीं हैं, सिर्फ संपादक हैं, उन्होंने भी कम मठाधीशी नहीं की है। राजेन्द्र यादव तो बड़े मठाधीश थे। मंगलेश डबराल भी साहित्य संपादक होने की वजह से छोटे -मोटे मठाधीश ही थे। इनके अनुयायी और उपकृत आज भी हैं। इस तरह के सभी लेखक कभी भी साहित्य की भ्रष्ट सत्ताओं की आलोचना नहीं करते हैं। साहित्य के अँधेरे पर सवाल नहीं उठाते हैं। मेरा मानना है कि एक लेखक को प्राथमिक रूप से भाजपा, कांग्रेस, सपा, तृणमूल, सीपीआई, सीपीएम वगैरह राजनीतिक दलों का काम नहीं करना चाहिए। कोई आज़ादी की लड़ाई नहीं चल रही है। अंग्रेज़ों से संघर्ष नहीं करना है।

     आज़ादी के बाद कई-कई बार केंद्र में और प्रांतों में सरकार बनाने वाले और सत्तारूढ़ दल को हराने वाले, उठाने और गिराने का बेहतर काम कर रहे हैं। जनता, इस मामले में हिन्दी के आज के लेखकों से हज़ार गुना ज्यादा मजबूत है।

      लेखक को अपने दायरे में रहना चाहिए। विपक्ष की पार्टियाँ मर नहीं गयी हैं। वे अपना काम कर रही हैं। हाँ, वे न कर पा रही हों, तो उन्हें चार चाँटा मार कर सभी विपक्षी पार्टियों की बागडोर अपने हाथ में ले लेना चाहिए। कविता और पत्रिका छोड़कर चुनाव में कूद पड़ना चाहिए।

      फ़िलहाल तो मेरे विचार से इस समय लेखक जी लोगों को साहित्य के अँधेरे के ख़लिफ़ लड़ना चाहिए। साहित्य की अपसंस्कृति और अंधविश्वास के ख़लिफ़ लड़ना चाहिए। साहित्य के पूँजीवाद से लड़ना चाहिए। अकादमियों की साफ़ सफ़ाई में लग जाना चाहिए। अफ़सोस, ये लेखक आज़ादी के बाद भी आज़ाद नहीं हैं, अपने राजनीतिक आकाओं के अनुचर हैं। ऐसे लेखक साहित्य में अँधेरा कम करने का काम नहीं, बढ़ाने का काम करते हैं। पैदा होते ही शुरू कर देते हैं। संपादक अवसर सुलभ कराते हैं। चलो बच्चे, जिस कवि से मतलब गाँठना है, उस पर पचास पेज लंबा लेख लिख मारो। प्रशंसा इतनी ज़ोर ज़ोर से करो कि प्रशंसा की टाँग ही टूट जाए। तीनों लोक दाँतो तले उँगली दबा ले। असल में एक लेखक को अपने किशोर और युवा काल में बहुत सँभलकर रहना चाहिए। कोई भी किसी भी तरह का बेजा फायदा न उठा सके। कम उमरी में ऐसा हो जाता है। होने को तो साठ पार करने के बाद भी आलोचक वयस्क नहीं हो पाता है। अपने समय के तीन तीन औसत कवियों पर किताब संपादित कर रहा होता है।  यह वयस्क आलोचना नहीं है। मैंने आज तक कभी किसी कवि पर लेख नहीं लिखा। यहाँ तक कि अपने प्रिय कवि देवेन्द्र कुमार बंगाली पर भी नहीं। जबकि मेरे मित्र अरविंद त्रिपाठी ने अपने समय के कोई हजार कवियों पर लेख या ज्यादातर उनकी पुस्तकों की समीक्षाएँ लिखीं। हमारे समय में अधिकांश आलोचकों ने कमोबेश यही सब किया है। असल में आलोचना की दुश्मन हैं, तीन चीज़ें। संबंध, स्वार्थ और संगठन। उदाहरण के लिए अशोक वाजपेयी से संबंध है तो उन्हें संस्कृति पुरुष कहने लगेंगे, संगीत और कलाओं के क्षेत्र में उनके काम को महान बताकर उन्हें रामचंद्र शुक्ल से बड़ा आलोचक कहने लगेंगे। टैगोर के समकक्ष बताने लगेंगे। लेखक संगठन से जुड़े हैं तो अपने कवियों को महान बताने लगेंगे। यह आलोचना नहीं है। अतिप्रशंसामूलक आलोचना, आलोचना नहीं, मुंशीगीरी है। आलोचकों को अपने समय के लेखकों पर लेख लिखने से बचना चाहिए। बहुत ज़रूरी हुआ तो बिल्कुल नये लेखकों को प्रोत्साहित करने के लिए संयमित टिप्पणी करनी चाहिए। लिखने वाले से अधिक छापने वाले की जिम्मेदारी है कि वह साहित्य का सच छापे, झूठी प्रशंसा नहीं।

    हर लेखक और संपादक मेरी तरह लगातार मुखर होकर साहित्य की भ्रष्ट सत्ताओं का विरोध करता रहे, तलवार चलाता रहे, ज़रूरी नहीं। विरोध और आलोचना, दोनों के लिए, पुष्ट आधार और तर्कशीलता की ज़रूरत होती है। किसी का किसी ने पक्ष ले लिया या विरोध कर दिया तो हम उसका कुर्ता नहीं फाड़ सकते हैं। बड़े तार्किक ढंग से उसका विरोध करेंगे। नामवर जी ने बेईमानी करके अपने एक प्रिय कवि को उठाने के लिए छंद की अनिवार्यता की बात की, तो मैंने अपने लेख ‘ कविता का चाँद और आलोचना का मंगल’ में समझाया कि छंद या छलछंद अच्छी कविता की गारंटी नहीं है। अगर आज अच्छी या बड़ी की गारंटी छंद है, तो केदार नाथ सिंह तो गीतों की दुनिया से आये हैं, छंदमुक्त कविता की जगह छंद की कविता में लौटकर महाकवि या बड़ा कवि या कालजयी कवि क्यों नहीं बन जाते हैं? मैंने अपने लेख के निष्कर्ष में कहा कि छंद में भी और छंदमुक्त में भी, दोनों में अच्छी कविता भी हो सकती है और ख़राब कविता भी हो सकती है। तुलसीदास और केशवदास का उदाहरण भी दिया। जहाँ तक मुझे याद है ख़राब कविता के रूप में राजेश जोशी की किसी कविता का उदाहरण दिया था। परमानंद श्रीवास्तव जी ने मुझे बताया था कि राजेश जी ने वागर्थ का वह लेख पढ़ लिया है। विश्वनाथ जी ने भी पढ़ा था और कहा था कि बड़े तर्क के साथ लिखा है। आशय यह कि लेखकों को साहित्य और लेखकों की आलोचना में तर्क को महत्व देना चाहिए। हमारे आग्रह निजी पसंद से नहीं, तर्क से पुष्ट होते हैं।

     हमारे समय का कोई कवि हमारा बहनोई या साला नहीं है, सिर्फ़ एक कवि है, हमें अच्छा लग सकता है; इसका मतलब यह नहीं कि उसमें कमियाँ नहीं होंगी। पूजाभाव नहीं होना चाहिए। आजकल तमाम युवा लेखक और संपादक, अशोक वाजपेयी की पूजा करते हैं, ज़ाहिर है भक्त भी हैं, बहुत उपकृत भी हैं। अशोक वाजपेयी जी की आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सकते। कई मठाधीश हैं, सबके भक्त हैं। कुछ तो वैचारिक साम्य की वजह से कुछ लेखकों को बहुत निकट का मानते हैं, लेकिन ध्यान देना चाहिए कि हमारे राजनीतिक विचार कविता की कसौटी नहीं हो सकते हैं। ऐसा होता तो वामपंथी राजनीतिक दलों के सभी कार्यकर्ता कविता लिख रहे होते। कविता में कबीर क्या कम आदर्श हैं? विचार के आधार पर ही नहीं, धर्म के आधार पर भी कवि की पहचान नहीं बननी चाहिए। कवि की पहचान, कवि के रूप में थिर होनी चाहिए। साहित्य में राजनीतिक संघर्ष की जगह लेखक के आत्मसंघर्ष का महत्व है। किसी कवि को उसका राजनीतिक संघर्ष नहीं, आत्मसंघर्ष बड़ा बनाता है। आत्मसंघर्ष ही हर कवि की एक अलग छाप उपस्थित करता है। यह आत्मसंघर्ष, कवि के साहित्यिक जीवन में ही नहीं, मूल्यों के लिए उसके संघर्ष में ही नहीं, उसके लेखन में भी दिखता है, उसकी भाषा की खोज में दिखता है, उसके मुहावरे में आता है।

    हमारे समय की कविता में राजनीति का सच बहुत कहा जा चुका है, चलिए थोड़ा सा और कह लें; लेकिन साहित्य का सच बहुत कम कहा गया है, ज़रूरी है कि लेखक लोग अपने समय के साहित्य का सच भी कहें। लेखक संगठनों को , लेखकों और साहित्य की समस्याओं की ओर रुख़ करना चाहिए। नयी सदी की कविता पर केंद्रित यात्रा के दो विशेषांकों के बाद कर्ण सिंह चौहान जी के साथ साहित्य का कृष्णपक्ष पर विशेषांक लाना चाहते थे। पर्याप्त रूप से लिखने वाले लोग नहीं मिल पाये। दिल्ली के एक फ्रीलांसर त्रिपाठी जी थे, पता नहीं हैं या नहीं, एनएसडी के खिलाफ यहाँ खूब लिखते थे, जब उनसे साहित्य के भ्रष्टाचार पर लिखने के लिए कहा तो सीधे मना करने की जगह उन्होंने पूछा, कितना पैसा देंगे। ग़नीमत यह कि वे आज़ादी की लड़ाई में नहीं थे वरना गांधी जी से पूछते, कितना पैसा देंगे। इस तरह, हमारे पास दो विकल्प थे, पहला यह कि जैसे हमने पिछले विशेषांक में एक सौ पच्चीस पेज का और चालीस पेज का लेख लिखा था, फिर से साहित्य के भ्रष्टाचार पर लंबे लेख लिखते या कुछ समय के लिए पत्रिका का प्रकाशन स्थगित करते। हमने दूसरा विकल्प चुना। हम लिखते रहे हैं, आगे भी लिखेंगे, हमारा तरीक़ा और हमारी विधा दूसरी हो सकती है। इस पर फिर बात करेंगे।

    आज के संपादकों और लेखकों को केवल लेखक संगठनों से जुड़े लेखकों की ही नहीं, हिन्दी के लिए संघर्ष करने वाले दूसरे लेखकों की भी फ़िक्र होनी चाहिए। हिन्दी के अँधेरे के खिलाफ भी विशेषांक लाना चाहिए। एक बात छूट रही थी, देखिए, कोई बात है कि कोई ज़रूरी बात छूट नहीं पाती है। नयी सदी की कविता पर केंद्रित यात्रा के अंक कविता के धंधे और अँधेरे पर भी बात की गयी है। कहा गया है कि हमारे समय की कविता को भाभूअ पुरस्कार ने कितना नुक़सान पहुँचाया है। शायद यह सब आलोचना के ताजा विशेषांकों में नहीं कहा गया होगा। नयी सदी की कविता सिर्फ़ फ़ासिस्ट-विरोध की कविता नहीं है। उसे फ़ासिस्ट-विरोध तक सीमित कर देना, कविता के पंख कतर देना है, उसका टेंटुआ दबा देना है। कविता, जीवन, समाज और प्रकृति की सहचर है।

     आज हिन्दी कविता संकट में है। उसे खतरा न  फासिस्टवाद से है, न राष्टवाद से, न मार्क्सवाद से, न साम्यवाद से, न समाजवाद से, किसी विचारधारा या वाद से नहीं, हिन्दी के इन वादों के भ्रष्ट अनुयायियों से है। खतरा बाहर से नहीं, हिन्दी के खासतरह के बेईमान लेखकों से है। न इन्हें कविता के भविष्य की चिंता है, न वर्तमान और न इतिहास की। ये लेखक कम यश और पुरस्कार के लुटेरे अधिक हैं। ये मशहूर होने और कविता की दुनिया में दहशत पैदा करने के लिए किसी भी दौर की कविता की जान ले सकते हैं, कविता के लिए जान देने वालों की जान वक्त से पहले ले सकते हैं। उसे अपने समय की काल कोठरी में डाल सकते हैं, फाँसी पर चढ़ा सकते हैं। हिन्दी का एक बड़ा पब्लिकेशन हाउस कविता का फाँसीघर बना हुआ है। उसके एडीटर इन चीफ का हाल तो पूछो ही मत। ओह हिन्दी कविता के साथ क्या-क्या नहीं किया।
     कविताहीन कविता के इस दौर में, पाठकों के भीतर डर पैदा करने के लिए यह सब नहीं कह रहा हूँ। अच्छी कविता के प्रति प्रेम बना रहे। उसे कोई मार न सके, इसलिए कह रहा हूँ। एक कवि के पास उसकी सभी कविताएँ एक ही तरह की नहीं होनी चाहिए। संघर्ष की हों तो प्यार की हों, भरोसे की हों तो प्रकृति की हों, मनुष्य जीवन की हों तो मनुष्येतर प्राणियों की हों। आशय यह कि कुछ भी कविता के लिए वर्जित नहीं है। जिन विषयों को वर्जित माना गया, उन पर भी कविताएँ लिखी गयी हैं। मेरे पहले संग्रह में ही गुरु सीरीज है। बहरहाल अपनी एक बिल्कुल नयी प्रेम कविता पढ़वाता चलूँः

ओ चाँद के मुसाफ़िर
------------
ओ चाँद के मुसाफ़िर
चाँद पर अपनी गाड़ी
बहुत आहिस्ता से उतारना
चाँद की अँजुरी में
फूल की मानिंद रखना पग
अपना भारी-भरकम
बूट-सूट पहनकर ऐसे चलना
जैसे रुई का फाहा हो
चाँद को बहुत प्यार से छूना
उसे कोई खरोंच न लगने पाए
उस पर चलना तो उड़ना
तितलियों की तरह पंख फैलाए
इस कोने से उस कोने तक
सुगंध की तरह विचरण करना
उसमें बेकार की चीज़ें मत ढूँढने लगना
चलो तुम्हारा बहुत मन करे
तो अपनी लोहे की बैलगाड़ी में
कंकड़-पत्थर
चाहे हीरे-जवाहरात भी रख लेना
लेकिन ख़बरदार जो दिए बिना लौटे
सखी को मेरा संदेशा मेरा प्यार
भेंट-अँकवार
ये सिल्क की साड़ी
ये पेटीकोट और ब्लाउज
और लाल बिंदी का पत्ता
और मेरे हाथ की बनी हुई
खीर
तो ऊपर लटके रह जाओगे
मेरा भी नाम सोनौरा गाँव की
सबसे ज़िद्दी सुमिन्तरा देवी है
मैं कोई चार किताबें पढ़ने वाली
मतिमंद स्त्री थोड़े हूँ
जो मुझे और बातों में उलझाकर
चाहे तरह-तरह का लालच देकर
अपना जहाज़ उतार लोगे
उतरने तो तभी पाओगे बच्चू
जब तीनों लोक के
सबसे बड़े प्रेमी की फोटो
सखी से मांगकर लाओगे
ओ चाँद के अलबेले मुसाफ़िर
जहाज़ को सोनौरा गांव की मेरी
सबसे ऊँची छत पर उतारने की जगह
किसी समुद्र में उतारने की ग़लती मत करना
मेरी सखी चाँद की पाती
और सबसे बड़े प्रेमी की फ़ोटो भीग न जाए
मेरा ब्याह उसी से होगा
कहे देती हूँ।

      साहित्य की मुख्यधारा धारा, जो युवाओं के लिए कविता की धारा नहीं, विचारधारा या फासिस्ट-विरोध की धारा हो गयी है, जिसके पास ‘आलोचना’ और दूसरी ऐसी पत्रिकाएं हैं, जिसके साथ दिल्ली का इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा एडिटर इन चीफ है, उस धारा के आलोचक आएँ, चापलूस आएँ, गुंडे आएँ और ऊपर दी गयी मेरी कविता का वध कर दें। उन्हें आमंत्रित करता हूँ। आएँ, उनका स्वागत करता हूँ और बताएँ कि यह कविता अच्छी कविता क्यों नहीं है? हिन्दू-मुसलमान ही अच्छी कविता क्यों है? आएँ, आएँ, कहें कि ‘ओ चाँद के मुसाफ़िर’ अवैज्ञानिक कविता है, कवि को विज्ञान की बुनियादी जानकारी नहीं है, कवि इतना कूढ़मगज है कि चाँद पर प्रज्ञान और विक्रम की जगह बैलगाड़ी चलवा रहा है? कितना बड़ा अहमक है, गणेश पाण्डेय, चंद्रयान को समुद्र की जगह छत पर उतरवा रहा है? भला कविता में अँगने में कल्पना का क्या काम है? काव्यभाषा का क्या काम है? यह तो स्त्रीविमर्श-विरोधी कविता है। नकल है। चोरी की कविता है। जाहिर है, इस तरह की बातें आज कविता की जान लेने वाले ही कर सकते हैं। इसीलिए तो आमंत्रित किया है कि फ़ैसला हो जाए कि कविता का हत्यारा कौन है? यहाँ अपनी ‘ओ ईश्वर’ कविता उद्धृत नहीं कर रहा हूँ। सिर्फ़ यह बताने के लिए उसका नाम ले रहा हूँ कि 1992 में जब इस गैंग के नये शूटर पैदा ही नहीं हुए थे, तब 6 दिसंबर के बाबरी-प्रकरण के तुरत बाद 13-19 दिसम्बर के साप्ताहिक हिंदुस्तान में यह कविता आयी थी। यह सब इसलिए कह रहा हूँ कि एक कवि को  जीवनभर हिन्दू-मुसलमान नहीं करते रहना चाहिए। इस विषय पर एक बार, दो बार, चलो दस बार लिख दो, उसके बाद तो तुम्हें कविता के दूसरे इलाक़े में जाना चाहिए। ताकि तुम्हारी कविता यांत्रिक होने से बच सके। मेरे कहने से नयी पीढ़ी नहीं सुधरेगी। कविता कोई खिलौना नहीं है। कविता कोई अनाथ नहीं है। उसकी आत्मा से उठने वाली चीखें सुनने वाले हैं। कविता का एक भरा-पूरा जीवन है और उसका जीवन तुम सबके जीवन से बहुत-बहुत लंबा है। कविता का एक सम्पूर्ण संसार है। साहित्य के संसार में कविता के जीवित सगे-संबंधी हैं। उनके रहते कविता की हत्या करना कठिन है। नामुमकिन है। क्योंकि सिर्फ़ आज ही नहीं, हर समय में एक ओर यांत्रिक कविताएँ लिखी जाती रहेंगी, तो दूसरी ओर कविता की हार्दिकता के पक्ष में लिखने वाले कवि और आलोचक, चुनौती देते रहेंगे। कविता की जान लेने की कोशिश करने वालों के मंसूबों को भसम करते रहेंगे।

       नोट : काफी पहले यात्रा के कालम को पढ़कर लेखक-पत्रकार राजकिशोर जी ने मुझसे फोन पर पूछा था कि कचिता की जान लेने के सौ तरीके़ नाम की किताब कहाँ से छपी है? मैंने बताया कि कालम में सिर्फ  ज़िक्र है। मैंने किताब अभी लिखी नहीं है। तब भी कविता के हत्यारे प्रचुर मात्रा में थे, आज तो ख़ैर जिस दिल्ली रिटर्न को देखिए हत्यारा दिखता हैं। तब किताब शुरू नहीं कर पाया था। अब कर दिया है। यह किताब भक्तिकाल या आधुनिककाल की प्रगतिशील कविता पर नहीं है। हमारे समय की फर्जी प्रगतिशील कविता पर है, कविता और सच्ची प्रगतिशील कविता के तरीकों और हत्यारों पर है। कविता की जान लेने के सौ तरीके का यह पहला अध्याय है- कविता की हार्दिकता। यह तुरंता कापी है। 




सोमवार, 13 अप्रैल 2026

दिल्ली जाऊँगा

- गणेश पाण्डेय 

दिल्ली जाऊँगा
------------------
मई-जून में 
दिल्ली में कितनी गर्मी रहती होगी 
वहाँ के लेखक बाहर धूप में 
निकलते होंगे या नहीं निकलते होंगे 
निकलते होंगे तो उनका माथा 
कितना गर्म रहता होगा 

सोचता हूँ गर्मियों में 
बच्चों के पास एनसीआर जाऊँ
जाऊँ तो सबसे पहले 
उस लेखक से मिलूँ
जिसका माथा हमेशा ठंडा रहता हो
और जो दिल्ली में रहकर भी 
सादादिल हो सादामिज़ाज हो
और जिससे मिलने के बाद 
आग बरसाती हुई दोपहरी में भी 
रूहअफ़ज़ा शर्बत पीने जैसी
ताज़गी मिलती हो

दूसरे लेखकों से मिलने के लिए 
कौन सा दिन और वक़्त सही होगा
किससे स्वागत की उम्मीद करूँगा
कौन मुँह लटकाकर मिलेगा 
किसे कुर्सी का घमंड होगा
किसे नहीं होगा
किससे मिलना ज़रूरी होगा 
किससे ग़ैर-ज़रूरी
किससे मिलकर 
वज़नी होकर लौटूँगा
किससे लुट जाऊँगा

किसी से मिलूँ तो कितना झुकूँ
कितना मुँह खोलूँ कितनी चाय पिऊँ
सुड़कूँ या ख़ामोशी से पिऊँ
नमकीन खाऊँ या नहीं खाऊँ

अव्वल तो मेट्रो में अकेले 
चढ़ नहीं पाऊँगा गिर जाऊँगा
कोई सामान चुरा लेगा
मोबाइल पर्स पानी की बोतल 

एक गमछे से इतनी बड़ी दिल्ली में 
ऐन दोपहरी में लू के थपेड़ों से 
कैसे बच पाऊँगा मुश्किल होगी 
फिर भी दिल्ली जाऊँगा

पहली बार गर्मियों में कुछ हफ़्ते
एनसीआर में रहने की मजबूरी हो 
तो मुझे क्या करना चाहिए 
और क्या नहीं करना चाहिए 
मदद करो ओ दिल्ली वालो
ओ दिल्ली आने-जाने वालो

इकहत्तर 
पार कर चुका हूँ 
एक बार दिल्ली के दिल को
एकदम से मेरे दिल से मिला दो
दोनों एक-दूसरे का सुख-दुख 
जान लें 

आग बरसती हो या पानी 
चाहे चलती हो आँधी
जब दिल्ली आऊँगा ही तो
दिल्ली के मज़े मुझे भी चखा दो 
लेखकों की रंगीन शामें महफ़िलें
और रक़्स दिखा दो दिखा दो
मुझे भी थोड़ी-सी 
पिला दो पिला दो पिला दो
उनकी तरह 
एक बूढ़ी रक़्क़ासा बना दो

लेकिन 
रक़्स ख़त्म होने के बाद 
देर रात मुझे रास्ता कौन बताएगा
मुझे मेरे बच्चों के पास 
कौन पहुँचाएगा
मेरी मदद कौन करेगा 
मैं वापस अपने ठिकाने पर अकेले 
देर रात कैसे लौट पाऊँगा

नहीं-नहीं मैं दिल्ली की
रंगीन रातों को देखने के लिए 
क़तई रुक नहीं पाऊँगा
दिन ढलने से पहले लौट आऊँगा।

                                           
                                                                                                   

बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

फ़रवरी सिर्फ़ एक महीना है तथा अन्य कविताएँ

- गणेश पाण्डेय 

बलई मिसिर एमए पीएचडी हिन्दी 
------------------------------------

न फूल की दुकानें थीं
न छिपकर बैठने की जगहें 
एक स्वेटर एक जूता तो था नहीं 
हवाई चप्पल पहनकर घूमते थे 
वहाँ न यूनिवर्सिटी थी न कॉलेज 
कितनी नदियों को पार करके 
कितनी मुश्किलों में हुई थी 
बलई मिसिर की पढ़ाई लिखाई
फिर तो जीवन में कभी 
फ़रवरी आयी ही नहीं 
जो आयी सीधे 
सूर्यमुखी बीबी आयी 
चार बच्चे आये
बेचारे 
बलई मिसिर तो जीवन में 
जनवरी की हाड़ कँपाती 
ठंड के पहाड़ से सीधे 
अप्रैल मई जून की आग में 
कूद पड़े थे
चारों तरफ़ 
आग ही आग थी 
न गुलमोहर न अमलतास 
न फ़रवरी न मार्च ओह 
जन्म-जनम के फ़रवरी-वंचित 
बलई मिसिर 
एम ए पी-एच डी हिन्दी।

फ़रवरी सिर्फ़ एक महीना है 
-----------------------------

मैं इसी महीने में 
उस नदी के पास गया था 
नदी उसी तरह बह रही थी 
नदी वही थी पानी नया था 

नये लड़के और लड़कियाँ 
तट पर हूबहू उसी तरह बैठे थे 
एक पैर जल में था एक तट पर

सूरज की किरणों से उनका 
चेहरा उसी तरह दमक रहा था 

सूरज डूब रहा है डूब जाएगा 
उन्हें पता नहीं था जैसे हमें 
पता नहीं था 

सूरज डूब जाएगा 
नदी का पानी बह जाएगा 
फूल मुरझा जाएगा 
कौन बताए उन्हें 

जीवन में 
फ़रवरी सिर्फ़ एक महीना है 
बीत जाएगा।

जगह वही है 
--------------
यह पेड़ वह पेड़ नहीं है 
यह हरा है वह सूख गया था 
जगह वही है 
यह गुलमोहर नया है 
यह अमलतास नया है फूल नये हैं 
उस पर बैठी कोकिला नयी है 
उसका कंठ नया है 
उसकी पुकार नयी है 
दोनों का साहचर्य नया है 
यह फ़रवरी नयी है।

मेरी जान
----------

पार्क में सीमेंट की बेंच वही है 
कुर्ती उसी तरह लाल है छींटदार है 
और सलवार उतनी ही सफ़ेद 
लड़की नयी है लड़का नया है 
और बगल में खड़ी लाल बाइक 
नयी है 

सीमेंट की बेंच भी 
हमें कहाँ अलग होने से बचा पायी 
वह जगह भी हमें नहीं रोक पायी 
वह घास भी कहाँ हमें बाँध पायी 
जिस पर हम नंगे पैर चलते थे 
बिना कुछ बिछाये लेट जाते थे 
आसमान को निहारा करते थे 
आसमान भी हमें बचा नहीं पाया

समय का चाकू 
मज़बूत से मज़बूत जोड़ को
एक झटके में अलग कर देता है 
कोई नहीं बचा पाता है फ़रवरी भी
हम बचने के लिए बने ही नहीं थे 
हमें इसी तरह टूट-फूट जाना था
मिट्टी के राजा
और मिट्टी की रानी की तरह।



मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

गंगाजल तथा अन्य कविताएँ

- गणेश पाण्डेय

हमारा प्यार 
-------------

तुम चाहती तो 
मेरा घर तोड़ सकती थी 

मैं तो चिता से भी उठकर 
तुम्हारे साथ भाग सकता था 

मैं चाहता तो 
तुम्हारा घर तोड़ सकता था 

तुम्हारे घर के आसपास
दीवारों पर तुम्हारा नाम लिखकर 

प्यार में कोई किसी को 
नुक़सान कैसे पहुँचा सकता है 

हम तो अपने प्यार को तमाम 
वक़्त के थपेड़ों से बचाते रह गये 

दिल के किसी पोशीदा तहखाने में 
यादों की संदूक में उसे रखा 

यही था यही था हमारा प्यार 
राख में बची हुई चिनगारी की तरह।

पोती पूछेगी 
------------

तीन दिन फोन पर बात नहीं हुई तो 
पोती ने कहा, बाबा कहाँ चले गये थे
बाबा ने कहा, मेरी तबीयत ख़राब थी 
पोती ने पूछा, तबीयत क्यों ख़राब थी
काश, उसके बाबा कभी बीमार न हों
काश, पोती की आँखों के सामने से 
उसके बाबा कभी ओझल ही न हों
पोती पूछेगी परेशान होगी।


फ़ज़ीहत के बाद 
-----------------
मुफ़्त सलाह देना 
समझदारी की बात नहीं थी 
नहीं देना चाहिए था कभी नहीं 
जहाँ मुफ़्त में देना बहुत ज़रूरी था 
वहाँ से भी बिना दिए चुपचाप 
हट जाना चाहिए पाँडे जी को 
अक़्ल आयी तो लेकिन तमाम
फ़ज़ीहत के बाद।

गंगाजल 
--------

बेटा 
दूसरे देश में नौकरी करता है
बुज़ुर्गवार कहीं गये ही नहीं 
यहीं पैदा हुए इसी मिट्टी में 
जवान हुए यहीं काम किया 
माँ-बाप की सेवा की 
बूढ़े हुए बीमारियाँ हुईं 
खाँसते-थूकते-जागते
बीतती है अब
सारी-सारी रात
बाबूजी की बनवायी बेंच पर 
तो कभी 
जिस आम के पेड़ को लगाया था 
उसके नीचे बैठकर 
रास्ता देखते-देखते दिन कटता है 
बेटा कभी आता है तो 
मरने के टाइम पर बिस्तर पर 
गू-मूत साफ़ करने के सपने 
दिखा जाता है 
बुज़ुर्गवार कभी नहीं पूछते
चारोधाम कब कराओगे 
बुज़ुर्गवार को अक्सर अपने 
बचपन की याद आती है 
किशोर जीवन की याद आती है 
पिता की याद आती है 
याद आता है अपने 
पिता का हाथ-पैर दबाना 
उनकी पीठ खुजलाना
नल के नीचे बैठाकर नहलाना 
बुज़ुर्गवार तो अपने 
बेटे की बड़ाई करते नहीं थकते 
बाहर रहता है दिरहम कमाता है 
उसकी कोई बुराई तो किसी से 
करते ही नहीं 
अलबत्ता 
जब कोई आसपास नहीं होता 
आसमान में देखकर कहते हैं 
मरते समय गू-मूत नहीं उठाओगे 
तो भी मर जाऊँगा बेटा 
कोई नहीं रोक पाएगा मरने से 
मरते समय क्या गू-मूत 
क्या गंगाजल 
जीते जी 
थोड़ा सा सुख मिल जाता तो
शायद थोड़ा और जी जाते।