गुरुवार, 2 जुलाई 2020

बीसवीं शताब्दी के नवनिर्वाचित श्रेष्ठ कवियों का शपथग्रहण तथा अन्य कविताएं


- गणेश पाण्डेय

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बीसवीं शताब्दी के नवनिर्वाचित श्रेष्ठ कवियों का शपथग्रहण
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हिंदी का कवि 
बहुत अधिक परिश्रमी है
वैश्विक चिंता उसका स्थायी भाव है
कितना बोझ है हिंदी के कवि पर
क्या पता विश्व के बाक़ी कवि 
लंबी छुट्टी पर हों

जो भी हो
हिंदी का कवि इस महादेश का प्रहरी है 
लोकतंत्र का सबसे सच्चा रखवाला है 
संसद और जनता का शुभचिंतक है 
समता और न्याय का महागायक है 

हिंदी भाषा और साहित्य का
लाडला है राजकुमार है महाराज है
हिंदी के सारे मंच सारे पुरस्कार
सारे कवितापाठ सारे लाइव
सारे संगठन सारी अकादमियां
सारी सुंदर कविताएं
सब उसकी हैं 

बस एक कमी है
उसका नज़दीक का चश्मा टूट गया है
इस वजह से वह सतह पर
चाहे ज़मीन के नीचे हिंदी का
हाथी जैसा नुक्स भी देख नहीं पाता है
उसके लिए सत्य एक अनुमान है इसीलिए
उसे हिंदी में कुछ भी चिंताजनक नहीं दिखता है
वह सिर से पैर तक मार्क्सवादी होकर भी 
हिंदी में पूर्ण रामराज्य देखता है 
शेर और बकरी का शुभविवाह होते देखता है
किसी की पीठ में किसी को छुरा भोंकते नहीं देखता है
किसी को किसी का इनाम लेकर 
भागते नहीं देखता है 

वह 
सिद्धावस्था का कवि है
हिंदी का अंतर्यामी है उसे जो प्रिय है 
जो उसके मन और आचरण में बसा है
वही उसके लिए पूर्ण सत्य है शेष असत्य है
उसने मान लिया लिया है
हिंदी का उसका संगी-साथी कोई कवि
किसी कवि की गठरी नहीं चुराता है
सारे कवि दूध के धुले हैं 
कोई विश्वकविता से कुछ नहीं लेता है
उसके प्रशंसक हिंदी के सारे कवि मौलिक हैं

उसे गर्व है
अपने आठवें दशक का कवि होने पर
हिंदी कविता की महान परंपरा में
सत्य हरिश्चंद्र की औलाद होने पर
कबीर निराला मुक्तिबोध ही नहीं
नौमीनाथ केदारनाथ आदि की भी
औलाद होने पर
उसके लिए यह विस्मय का नहीं
अपनी कविताओं के प्रति आश्वस्ति का कारक है
उसे एक साथ सबका
उत्तराधिकारी होने का गौरव प्राप्त है
हिंदी का भविष्य ऐसे हाथों में सुरक्षित है
उसने अपने अथक श्रम से
हिंदी में विश्व का सबसे स्वस्थ लोकतंत्र रचा है
अभी हाल में सबने
आठवें दशक के इन कवियों को निर्विरोध
बीसवीं शताब्दी का श्रेष्ठ कवि चुना है
बहुत थोड़े से कवि हैं 
उंगलियों पर गिने जाने लायक
जो दिल्ली से बहुत दूर हैं
पागल हैं इस चुनाव को 
निरस्त करने की मांग करते हैं
लेकिन नक्कारख़ाने में 
चंद तूतियों की आवाज़
भला कौन सुनता है

फिर भी शपथग्रहण के रंग में
कोई भंग न पड़े इसलिए बात
काफ़ी ऊपर तक ले जायी गयी है-
हे कविता के अंतरराष्ट्रीय देवताओं
हे अनुवादप्रिय हे प्रभावप्रिय हे सत्कारप्रिय 
हे अंग्रेजीप्रिय इन पागलों को देखिए 
एक तो बड़ा ही ज़बरदस्त पागल है 
ग़ुस्से में अपना कुर्ता-पाजामा फाड़ लेता है
उसे हिंदी कविता की परंपरा का 
रत्ती भर ज्ञान नहीं है कहता है- 
हिंदी की दुनिया में जो इनामी है 
कवि नहीं डाकू है
हे विश्वकविता के छत्तीस करोड़ देवी-देवताओं
आप ही बताएं ऐसा कैसे हो सकता है
हिंदी का कवि चोर तो हो सकता है
डाकू कैसे हो सकता है
और इन कवियों को ऊपर से
हरी झंडी भी मिल गयी है

हिंदी के बाक़ी दशकों के
सुकवि अतिप्रसन्नतापूर्वक लकदक
बीसवीं शताब्दी के नवनिर्वाचित 
श्रेष्ठ कवियों के
शपथग्रहण की भव्य तैयारियों में
जोर-शोर से लगे हुए हैं
ओह इनके पास तो नंबर एक तक
करने की फुरसत नहीं है 
ऐसा उत्साह ऐसा उत्सव 
क्या किसी अन्य भाषा में 
संभव है

हिंदी के इन
कनिष्ठ कवियों जैसी निष्ठा 
विश्व की दूसरी भाषाओं में 
विरल है विरल है विरल है।

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लाउडस्पीकर
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(लोग हैं लागि कवित्त बनावत
मोहि तौ मोरे कवित्त बनावत।
याद आए अनन्य प्रेमी घनानंद)

मुझे हिंदी में
चींटी की मुंडी के बराबर भी
मान नहीं मिला न चाहिए था
न अब चाहिए

अकादमी तो अकादमी
अपने शहर का चाहे मुहल्ले का
कोई इनाम नहीं मिला न चाहिए था

किसी शहर किसी संस्था
किसी सरकार किसी बेकार का
कोई तमगा मुझे नहीं मिला
न कभी चाहिए

मैं ही था 
जिसे मौक़ा नहीं मिला
वक़त पर एकल काव्यपाठ का
बुड्ढों ने जगह ही नहीं खाली की
मरते दम तक पढ़ते रहे कविता

अब पैंसठ की उम्र में
मुझे कविता पढ़ना भी नहीं है
बिना पढ़े मैंने खाली कर दी थी जगह
अपने बाद के लोगों के लिए
काफ़ी पहले

मैंने शुरू में ही
इधर-उधर देखने की जगह
ख़ुद पर भरोसा किया ख़ुदमुख़्तार बना
और मुझमें कुछ अजीब बदलाव हुए

ख़ासतौर से
मेरे सिर पर निकल आयीं थीं
ख़ूब लंबी-लंबी बैलों जैसी कई सींगे 
कोई आशीर्वाद देने के लिए डर के मारे
हाथ ही नहीं रख पा रहा था

हिंदी में कृपा बरसाने वाले
दूर से नहीं बरसाते थे पास बुलाते थे
बिल्कुल पास झुकाते थे कृपा बरसाते थे
मुझे पास नहीं बुलाते थे
मेरे पास सींग थी

मेरा चेहरे से नूर नहीं टपकता था
मेरे गाल गोरे नहीं थे मुस्कराता नहीं था
चट्टान की तरह सख़्त था चेहरा
सारे बड़े लोग और उनके चमचे साले
दूर से भगा देते थे

मैं क्या करता
मेरे पास न भाग्य था न सीढ़ी
मैं ख़ुद ही लंबी-लंबी छलांगे लगाने लगा
किसी के भी सिर तक कूदकर जाने लगा

मुझे देखते ही सब चिल्लाने लगते
हटाओ-हटाओ इस देहाती-भुच्चड़ को
कोई-कोई मुझे मां-बहन की गाली देते
असल में मैं उन लोगों का कुछ भी
बिगाड़ नहीं सकता था

न मैं गाली देता था 
न उन पर डंडे बरसाता था
न ही उनका कुर्ता-पाजामा 
कमीज-पतलून वगैरह फाड़ता था 
जबकि ऐसा आसानी से कर सकता था

मुझे 
उन लोगों से कुछ नहीं चाहिए था
न की गयी चोरियों-डकैतियों में हिस्सा
न स्त्रियों संग दुराचरण में सहभागिता
मैं अपनी पत्नी को बहुत प्रेम करता हूं

मैं तो सिर्फ़ दूर से 
लाउडस्पीकर लगाकर
साहित्य की अवनति के विरुद्ध
रोज़ बोलता था उनसे प्रश्न करता था
यह सब भी उनके लिए असह्य था
जो उनके लिए असह्य था
मेरे लिए प्रिय था और है
और रहेगा

देखिए 
क्या-क्या किया गया है मेरे साथ
हाय मेरे लाउडस्पीकर को देखिए
इसे तोड़ने-फोड़ने की कोशिश की गयी 
फिर भी मैं चुप नहीं हुआ 
तो मुझे हिंदी के सबसे बड़े कूड़ेदान में
ज़बरदस्ती उठाकर फेंक दिया गया है
और मैं वहीं से उनके मुंह पर 
रोज़ थूकता हूं।

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अंगरखे में सुर्ख़ गुलाब
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नेहरू ने 
ठीक कहा था आराम हराम है
सिर उठाकर जिस शान से कहते हैं 
हिंदी के ये क्रांतिकारी लेखक

काश 
उसी तरह कह पाते ये लेखक
बुलंदतर आवाज़ में इनाम हराम है
और प्रलय तक विद्यमान रहती 
इनकी गूंज दिशाओं में

और ये लेखक
हिंदी को जन-जन तक ले जाते
उसे उनके सरोकारों से जोड़ पाते
काश ये हिंदी के नेहरू बन पाते

इनाम की जगह 
अपने अंगरखे में सुर्ख़ गुलाब टांकते
हिंदी के बच्चों के चाचा कहलाते

मुझ जैसे को
रातों में नींद कहां दिन में चैन कहां
हिंदी के बच्चों की चिंता में अब
इस जीवन में आराम कहां।

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कितनी अच्छी सरकार है
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कितनी आज़ादी है
कोई इमरजेंसी नहीं लगायी गयी है
फ़ासिस्टों के विरोध में एक-एक कवि
हज़ार-हज़ार टन कविताएं
लिख सकता है

सरकार ने 
किसी को मना नहीं किया है
कि अपना आदर्श मार्क्स को मत बनाओ
गांधी या लोहिया को बनाओ
साहित्य की काशी न जाओ 
मगहर जाओ

सरकार ने 
किसी भी गिरोहबंद लेखक का नाम 
किसी कालीसूची में नहीं डाला है
हिंदी का कोई लेखक नज़रबंद नहीं है
कोई भी किसी भी स्त्री को
बुरी नज़र से देख सकता है

कोई पाबंदी नहीं है
कोई भी किसी का भी चरणरज ले सकता है
किसी भी तुच्छ लेखक की पादुका
जिह्वा से स्वच्छ कर सकता है

कितनी अच्छी सरकार है
किसी को भी दूसरे के हिस्से का पुरस्कार
मंच माइक माला छीनने की
कोई मनाही नहीं है
लेखक कुछ भी कर सकता है
कोई आचारसंहिता ही नहीं है
कोई लेखक आयोग भी नहीं है

हमारी प्यारी सरकार ने 
कविता की नकल चोरी गैंग बनाने
या साहित्यिक क़त्ल रोकने के लिए
कोई अध्यादेश नहीं पारित कराया है

फिर भी आप कवि लोग
सरकार के लोगों को कितनी गालियां देते हैं
सरकार ने हिंदी के कवियों को
कितनी छूट दे रखी है
सभी प्रकार के व्यभिचार करने की
छूट दे रखी है

सरकार ने
साहित्य की काशी में मोक्ष के लिए
टिकट के बिना उड़कर 
जाने की अनुमति दे रखी है
लेखकों की लाइन लगी हुई है
अकादमियों के गेट खुले हुए हैं
धड़ाधड़ लेखक मशहूर हो रहा है
साहित्य की कच्ची शराब के नशे में
चूर हो रहा है

बस सरकार 
सिर्फ़ मगहर जाने वालों पर 
बहुत से बहुत सख़्त है
मेरी तो हालत पस्त है
जिस पागल लेखक को 
वहां जाना है पैदल ही जाए
इकतालीस डिग्री की धूप में 
सिर से पैर तक पसीना बहाए
फिर कबीर का दास कहलाए।

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कोमलांगी कवियो
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एक तो हिंदी में 
मेरी किस्मत पहाड़ जैसी सख़्त 
और उतनी ही बेजान है

उस पर 
मेरी दीवार ज़बरदस्त कँटीली
उस पर मेरी बर्छी जैसी कविताएं 
और गद्य आए दिन चस्पा होते रहते हैं

ओह
कोमलांगी कवियों 
और आलोचकों को 
कितनी दिक़्क़त होती होगी
एहतियात के तौर पर तो उन्हें 
सौ गज दूर से इस बघनखे लेखक को
देखना पड़ता होगा

यह सोचकर
कि चलो हमारे समय में है साला
इस साले को भी दूर से जीभर देख लो
क्या लगता है कुछ नहीं लगता है
कुछ मां-बहन की गालियां भी देते होगे
मैं बुरा नहीं मनाता कोमलांगी लेखको

मैं ऐसा शुरू में नहीं था
रीफ़ जैसे दस उपन्यास लिख सकता था
ओ केरल की उन्नत ग्रामबाला जैसी 
हज़ार से ज़्यादा कविताएं लिख सकता था
कई सौ शुद्ध शाकाहारी लेखों का 
पहाड़ खड़ा कर सकता था

ये तो हिंदी के राक्षस थे
जिन्होंने मुझे ऐसा करने नहीं दिया 
चलती हुई ट्रेन के सेकेंड क्लास के डिब्बे से 
मुझे पूरी तबीअत से ठोकर मारकर 
बाहर कर दिया 
मेरे साथ भी ऐसा होना था

तुम्हीं बताओ 
कोमलांगी लेखको
मेरे पास हिंदी के इन ज़ालिमों के इशारे पर 
चलती हुई ट्रेन पर पत्थर बरसाने के अलावा 
और क्या विकल्प था
क्या मैं ट्रेन की पटरी पर लेट जाता
और इन ज़ालिमों की धड़धड़ाती हुई ट्रेन को
अपने ऊपर गुज़र जाने देता

अब तो मेरा यह हाल है
कि जहां-जहां हिंदी के ज़ालिम दिखते हैं
आप से आप मेरे हाथों से जादू की तरह
तेजी से पत्थर छूटते हैं बर्छी छूटती है

अच्छा करते हो 
जालिमों के घराने से ताल्लुक रखने वाले 
हिंदी के कोमलांगी लेखको
जो मेरी दीवार से दूर रहते हो

तुम्हारे लिए
बहुत अच्छा हुआ
कि तुम्हें वज्र जैसी छाती नहीं मिलीं
एक साथ दसों दिशाओं में अहर्निश
तलवार चलाने वाली बलिष्ठ 
भुजाएं नहीं मिलीं

तुम्हें तो 
सारे के सारे अंग अतिकोमल मिले हैं
हिंदी के विधाताओं ने हाय तुम्हें
कितनी फुरसत से गढ़ा है
तुमने वह सब सीखा जो चाहा
सारी कलाएं भी चतुराई भी

तुमने कव्वे की तरह 
जब-जब जितना सिखाया गया 
उससे भी ज़्यादा होशियारी सीख ली है
अपना सिर सलामत रखना ख़ूब जानते हो
यह भी जानते हो कि जिस राह पर तुम हो
गद्दी और मुकुट सब मिलना तय है

कुसूरवार तो मैं हूं
मैंने ही तय रास्तों पर 
शुरू में ही चलना छोड़ दिया नहीं तो 
तुम्हें मुझ जैसे आत्मघाती लेखक से
कभी कोई शिकायत नहीं होती।

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साहित्य में तीन सौ सत्तर
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वाजपेयी जी चाहते हैं
राजनेता प्रतिदिन दुग्धस्नान करें
पूरे शरीर पर चंदन का गाढा लेप करें
धवल वस्त्र धारण करें

मिश्र जी जोशी जी पाण्डेय जी 
बाऊ साहब लाला जी भी चाहते हैं
फ़ासिस्टों का समूल नाश कर दिया जाय
नाश न हो पाने तक पूरी मुस्तैदी के साथ
उन्हें रोज़ पटककर कचर-कचर कर
डिटर्जेंट से सुबह-शाम साफ़ किया जाय
दिन में चार बार और रात में तीन बार
गुलाबजल में नहलाया जाय

ये लेखक लोग मिलकर
संयुक्त वक्तव्य जारी करते हैं-
चूंकि देश में समाज में कोने-अंतरे में
हर जगह बुरे लोग राजी-खुशी रहते हैं
लेखकों को भी ठीक उसी तरह 
राजी-खुशी रहने दिया जाय

यहां तक 
सब ठीक चल रहा था
लेकिन जैसे इन सब लोगों ने
वक्तव्य में पुनश्च करके जोड़ा
कि उन्हें नहाने के लिए न कहा जाय
उन्हें वस्त्र पहनने के लिए न कहा जाय
उनके उच्च विचार और आदर्श जीवन
केवल उनके साहित्य में देखा जाय

एक पागल लेखक
उछलकर उनके पास पहुंच गया
नटई पकड़कर घसीटते हुए चिल्लाया
तुम सब लेखक हो तो तुम्हारे लिए
साहित्य में अलग से कोई धारा
तीन सौ सत्तर की तरह
क्यों चाहिए क्यों।
















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