सोमवार, 13 जुलाई 2020

आलोचकनामा

- गणेश पाण्डेय

1

हिंदी का आलोचक है
हमारे समय का पुराना घाघ आलोचक है
इसके सुनहले फ्रेम के चश्मे पर मत जाइए
इसके भोले-भाले चेहरे पर मत जाइए
इसकी दुर्घटनाग्रस्त टूटी-फूटी आत्मा देखिए
उसे न देख पा रहे हों तो इसे ज़रा ग़ौर से देखिए
कैसे इसके रंग-बिरंगे कपड़े हैं देखिए
लालछींट का कुर्ता देखिए जैसे ख़ून के दाग़ हों
ओह बेढंगा पाजामा देखिए
कितना ढीला-ढाला है जैसे शहर का नाला है
थोड़ा नज़दीक से देखिए कुर्ता उठाकर देखिए
अरे इस नाशुकरे के पास तो ईमान का नाड़ा ही नहीं है।

2

हिंदी का आलोचक है
कैसी शक़्ल है इसकी गर्दन बिल्कुल शुतुरमुर्ग जैसी 
जिसे उठाकर और ऊपर और उसके ऊपर मुँह करके
उफ़ कैसे ज़ोर-जोर से थूकता है बारबार कोई नाम लेकर
और अपनी जगह से टस से मस नहीं होता है
एक बार भी सोचता नहीं कि सब उस पर ही पड़ता है
ओह कितना नशा है इसे अपने आलोचक होने पर
बेशर्मी देखिए पिटाई को प्रशंसा समझता है
जैसे नागार्जुन उसे धंधा करने का लाइसेंस दे गये हों -
अगर कीर्ति का फल चखना है आलोचक को ख़ुश रखना है
ओह कैसे शान से खोल रखा है उसने अपने शहर में
शुद्ध देशी घी का कीर्ति लड्डू भण्डार
उसने अपने कीर्ति लड्डू भण्डार के बाहर 
पुरोहिताई का अलग से एक स्टाल लगाकर 
कवि के गर्भाधान से लेकर 
अंत्येष्टि तक के सोलह संस्कारों के लिए
बाकायदा रेटलिस्ट टांग दिया है
आज्ञा से त्रिलोचन और साथ में यह लिखकर -
आलोचक है नया पुरोहित उसे खिलाओ
सकल कवि-यशःप्रार्थी, देकर मिलो मिलाओ
और सचमुच ऐसे मुग्ध कवियों का मेला लगा हुआ है
इस चोट्टे की दुकान के सामने।

3

हिंदी का आलोचक है
बड़ा पढ़ाकू है जी पट्ठे ने ख़ूब पढ़ रखा है
सोलह दर्जा पढ़ने के बाद सोलह दर्जा और पढ़ रखा है
कुल बत्तीस दर्जा पढ़ रखा है शायद उससे भी ज़्यादा
न न न सिर नहीं पैर धंसाकर पढ़ा है सिर से हो नहीं पाता
जितना पढ़ रखा है उससे एक इंच भी इधर-उधर नहीं होता है
असल में पट्ठे के दिमाग़ में दिमाग़ की जगह
आलमारियों पर किताब की तरह किताबें जमा हैं
सो दिमाग़़ में दिमाग़़ रखने के लिए जगह ही नहीं बची है
इसलिए कोई बीसेक साल से ख़ुद से कुछ सोचता ही नहीं है
बस आप समझ लें कि बंदा हिंदी का आलोचक-सालोचक नहीं 
हमारे समय की आलोचना की सिलाई कढ़ाई का कोई कारीगर है
दिमाग़ बंदकर और आंख मूंदकर धड़ल्ले से आलोचना कर रहा है।

4

हिंदी का आलोचक है
आलोचक क्या है पूरा रंगरेज़ है
आलोचना करता नहीं बस काग़ज़ रंगता है
फूल-पत्ती नदी-नाले गाँव-साँव बनाता है
उसके लिए यही कविता का लोक और जीवन है
उसके लोकजीवन में 
न किसान आंदोलन है न मज़दूर
पट्ठे को यह भी नहीं पता कि लोकजीवन में
महामारी की छाया भी है मलेरिया भी है 
जापानी बुख़ार भी है कोरोना भी है
पोलियो भी है कालाजार भी है
इतनी छोटी सी बात जानता नहीं आलोचक बनता है 
चरणरज लेने वालों को कवि समझता है महाकवि समझता है
जबकि ख़ुद दिल्ली के मठाधीशों के सामने
साष्टांग लेटकर चरणरज लेता है
जिस आलोचक का विकास केंचुए की तरह होगा 
वह हिंदी का आलोचक कैसे हो सकता है नहीं हो सकता है
ज़रूर यह आलोचना का संदिग्धकाल है।

5

हिंदी का आलोचक है
जिधर सब लोग जमा होते हैं उसी ओर भागता है
और वहीं उसी भीड़ में घुसकर तमाशा देखता रहता है
चाहे जो हो जाए चाहे सिर पर कुछ भी पड़ जाएं हज़ार
कोई कुछ भी कह ले बंदा हटने का नाम नहीं लेता है
उसका अपने आप से वादा है आलोचक का तमगा लिए बिना
ऐसी जगहों से हटना नहीं है
उसे मंच पर चढ़ना ही चढ़ना है पर्चा पढ़ना ही पढ़ना है
माइक पकड़कर मंच पर झूमना ही झूमना ही है
इस तरह आलोचक होना ही होना है
और अनंतकाल तक आलोचक बने रहना है
असल में वह इस बात को मान ही नहीं सकता है
कि आलोचक बनने के लिए भी ठोस वजह का होना ज़रूरी है।

6

हिंदी का आलोचक है
इसीलिए चिरकुट बना फिरता है मारा-मारा जगह-जगह
साहित्य के महाजनों और उप महाजनों के पीछे-पीछे
इसकी गठरी उसकी गठरी चोर-उचक्कों तक का सामान ढोता है
बंदे को कोई भला आदमी कुछ कह दे तो उस पर खौंखियाता है 
असल में उसके पास 
अपना कुछ ढोने के लिए है ही नहीं
आलोचना में दूस़रे का ढोना ही एक प्रकार से उसकी जीविका है।

7

हिंदी का आलोचक है
बड़ा ज़बर आलोचक है किसी को कुछ समझता ही नहीं है
ख़ुद को कवियों का मालिक बनता है सब उसके हिसाब से उठें-बैठें
जैसा कहे कविता लिखें माठा कर रखा है समझिए
कि कोई चूहा शेर के पास जाकर उसके कान में कह रहा हो
खड़े हो जाओ और फटाफट अपनी कविता दिखाओ
वह तो कहिए कि इस सदी में है निराला बाल-बाल बच गये
पिछली सदी में रहा होता तो निराला को छड़ी से कोंचकर जगाता
और कहता कविता दिखाओ यह अलग बात है कि निराला 
जागते बाद में पहले उसे जूते से लाल कर देते फिर कहते 
’हिंदी के सुमनों के प्रति पत्र’ लिखता हूं तो तेरे बाप क्या जाता है बे
अबे सुन बे गुलाब लिखता हूं तो अबे तेरा क्या जाता है
आलोचक नाम का यह जीव उस समय क्या करता 
या निराला इसे क्या करके लौटाते अनुमान का विषय है
फ़िलहाल तो पट्ठा कहता फिर रहा है
कि आज की कविता में वसंत का अग्रदूत वही होगा 
जो दिल्ली दरबार की गोद में पला-बढ़ा होगा
बाहर सुदूर प्रकृति की गोद में
धूल-मिट्टी में लोटने और आँधी-पानी में बड़े होने वाले कवि 
वसंत के अग्रदूत क्या झँटुही कवि भी नहीं हो सकते हैं
मैं पूछता हूं कि अबे कवियों का सुपरवाइजर
तुझे बनाया किसने है पहले उसे बुला
उसको जीभर कर दुरुस्त कर लूं
फिर तुझे बताता हूं उलटा लटकाकर डंडा करता हूं
अब आप लोग ही बताएं कि ऐसे 
नामाकूल आलोचक के साथ क्या-क्या किया जाय 
जिसे यह नहीं पता कि रामविलास शर्मा को आखि़र
निराला की साहित्य साधना लिखते समय
भाग एक लिखने की ज़रूरत क्यों पड़ी
कविता के साथ कवि का जीवन देखना क्यों ज़रूरी है
सच तो यह कि आलोचक का जीवन भी
उसके मूल्यांकन के लिए देखना उतना ही ज़रूरी है
यह न समझें कि हरामज़ादे आलोचकों को बर्दाश्त करना 
कविता की मजबूरी है।

8

हिंदी का आलोचक है
ये वाला और ये मेरी पीढ़ी का है
कहता है कि मैंने अपनी ख़राब कविताओं से
हिंदी कविता का इकलौता रजिस्टर भर दिया है
और अच्छी कविताओं को लिखने के लिए जगह नहीं बची है
अब कहाँ जाएंगे भला अच्छी कविता लिखने वाले कवि
अरे भाई माना कि मैंने रजिस्टर भर दिया है
अभी तुम्हारी पूरी कमीज पूरा पतलून
तुम्हारी ओढ़ने और बिछाने की चादर तुम्हारा तकिया 
तुम्हारी रूमाल और तुम्हारे आँगन का आसमान
तुम्हारी दीवारें और छत और पानी की टंकी
और तुम्हारे शरीर के कुछ हिस्से भी तो
अनलिखे बचे हैं अभी
वहाँ मेरी ख़राब कविता न सही
अपने प्रिय कवियों से हज़ारों
अच्छी कविताएं तो लिखवा ही सकते हो
अरे आलोचना के मुंशियों अच्छी कविता वह है ही नहीं
जिसके लिखे जाने में कोई बाधा खड़ी हो सकती हो
पहाड़ तोड़कर नदियों को पाटकर
यहाँ तक कि मर्द कवि की अपनी छाती पर
फूल की पंखुड़ियों पर तितलियों के परों पर
कहीं भी कभी भी जो कविता लिख दी जाय
वही अच्छी कविता है
अच्छी कविता भीख में काग़ज़ माँगकर नहीं लिखी जाती है
अच्छी कविता दरेरा देकर लिखी जाती है
जैसे मैं लिखता हूं ख़राब कविताएँ।

9

हिंदी का आलोचक है
मैं इसको और उसको और उन सबको अच्छी तरह
आगे से भी पीछे से भी ऊपर से भी नीचे से भी जानता हूं
किस-किस की पांच फुट तीन इंच की कद-काठी में
किस-किस मठाधीश और किस-किस उपमठाधीश 
और उनके झाड़ू-पोछा करने वाले तक का
ठप्पा कहाँ-कहाँ छपा हुआ है
साफ़-साफ़ लिखा हुआ है पुट्ठे पर बाजू पर
ललाट पर गाल पर वगैरह
कि यह आलोचक किस-किस 
बाऊ साहब और पंडिज्जी जी की गाय है
इस गाय में अलबत्ता एक भारी नुक़्स यह है 
कि उनके लिए मरकही गाय है जिनके पुट्ठे पर
बाऊ साहब और पंडिज्जी की छाप नहीं है
इन आलोचकों को गाय ही होना था
तो अल्ला मियाँ की गाय नहीं हो सकते थे।

10

हिंदी का आलोचक है
किसी तरह छोटे-मोटे काम करके गुज़ारा करता है 
रोज़़ एक-दो तो पुस्तक समीक्षा कर लेता है
अक्सर किसी किताब का लोकार्पण है तो आगे बढ़कर
ख़ुद ही कहकर आलेख-वालेख लिखकर पढ़ देता है
आजकल फेसबुक पर टिप्पणियों से भी पट्ठा
कुछ न कुछ कमा लेता है 
बस घर चला लेता है।

11

हिंदी का आलोचक है
अपने शहर के और बाहर के भी
महारथियों के रथ खींचता है रथियों के भी रथ खींचता है
जिनके पास रथ नहीं है उनकी पालकी ढोता है 
उतनी ही निष्ठा उतने ही समर्पण के साथ
अब तो रथ खींचने और पालकी ढोने में
इतना प्रवीण हो गया है कि यह सब 
किये बिना उसे नींद नहीं आती है
उसे रोज़ एक रथ या पालकी चाहिए
महाजन नहीं तो महाजन के पीछे का रथ
दिल्ली की नहीं तो अपने शहर की पालकी
रथ खींचने वालों का रथ
पालकी ढोने वालों की पालकी
ज़रूर से ज़रूर चाहिए उसे रोज़
एक रथ चाहे पालकी कुछ भी
यहां तक कि आदमी तो आदमी उसे
चूहे के रथ चाहे पालकी से भी 
सुकून और चैन मिल जाता है
उसे उम्मीद है ऐसे ही हिंदी आलोचना में
उसे एक दिन मोक्ष भी मिल जाएगा।

12

हिंदी का आलोचक है
हिंदी के सफल लेखकों के साथ
अपनी डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाता है
इस तरह सफल आलोचक कहलाता है
आलोचना के शेयर मार्केट का पक्का
दलाल है दलाल 
कवियों के नाम उछालता है भाव बढ़ाता है
हिंदी का आलोचक है वक़्त मौक़ा देखकर चलता है
कवि युवा है तो आगे-आगे चलता है
कवि बुज़ुर्ग है तो पीछे-पीछे चलता है
कह सकते हैं कि है तो आदमी पर
बुद्धि और कारनामे हैं किसी लोमड़ी की।

13

हिंदी का आलोचक है
अरे यह वाला तो रचनावलीबाज़ है
और यह वाला लेखक पर केंद्रित किताबबाज़ है
अरे यह बंदा तो एक नंबर का अकादमीबाज़ है
और यह जुल्फ़ रंगके और लहराके निकलने वाला 
पक्का तिकड़मबाज़ है
संपादक-प्रकाशक का ख़ुशामदबाज़ है 
आज की आलोचना का मशहूर दग़ाबाज़ है।

14

हिंदी का आलोचक है
देखो तो इसका घमंड इसके पतलून से चू रहा है
मिडिलस्कूल के हेडमास्टर की तरह
लेखकों से उठक-बैठक कराना चाहता है
ख़ुद कुछ किया नहीं दूसरों से सब कराना चाहता है
कहता है रामचरित मानस लिखो
तुलसीदास बनो कबीर बनो जायसी बनो
जैसी कविता लिखी जा रही है वैसी कविता मत लिखो
उपदेश और नीति की चौपाई लिखो
किसी कवि-आलोचक का चीरहरण मत करो
इन कुकर्मियों को छुट्टा साँड़ की तरह
ऊधम करने दो
बस कविता में राम भजो सीताराम भजो
राधाकृष्ण भजो चाहे सीधे 
बिहारी की तरह मकरध्वज घोलो
कुछ भी करो लेकिन कविता में
दुष्ट कवियों और आलोचकों की सर्जरी मत करो
हिंदी का आज का नक़ली आलोचक
सबको सीख देता फिरता है कि कैसी कविता लिखो
भू-अभिलेख निरीक्षक और लेखपाल की तरह
पैमाइश करके बताना चाहता है
कि आज सभी कवि लोग
उसकी बतायी जमीन पर कविता लिखें
पट्ठे को पता नहीं है कविता की परंपरा
और आलोचक बना जगह-जगह फिरता है
रामचंद्र शुक्ल ने तुलसी को बताया था
कि हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कबीर को
फिर तुम क्यों बावले हुए जा रहे हो
निराला ने छंद तुमसे पूछकर तोड़ा था
कि कुकुरमुत्ता झींगूर डटकर बोला
या गर्म पकौड़ी तुमसे पूछकर लिखा था
मुक्तिबोध को तुमने बताया था
कि मार्क्सवाद में ईमानवाद को
कैसे मिलाएं
छोटे केदार ने 
परमानंद से पूछकर लिखा था
औरों की नहीं जानता स्वयंभू आलोचक
मैं वही लिखूंगा जो अब तक 
नहीं लिखा गया है या कम लिखा गया है
गाँंठ में बाँध लो चाहे चुटिया में
चाहे हाफपैंट की जेब 
या पीटी शू के सफेद मोजे में 
छिपाकर रख लो मेरी बात
तुम मेरे आलोचक नहीं हो सकते हो
मेरा आलोचक 
अभी दूध पी रहा है बादाम खा रहा है
अखाड़े में अपनी देह पर मिट्टी मल रहा है
पसीना-पसीना ख़ूब दण्ड पेल रहा है
आएगा ज़रूर आएगा आलोचना का सोटा लेकर
बहुत बाद में आते हैं
ऐसे निडर ईमानदार और मज़़बूत आलोचक
तुम हमारे समय की कविता की आलोचना के
लिपिक हो सकते हो चाहे मुंशी जी हो सकते हो
हरगिज़-हरगिज़ आलोचक नहीं हो सकते हो।

(लंबी कविता : 5.7.20)







5 टिप्‍पणियां:

  1. आलोचक की धज्जियां बिखर गईं। अधिकांश आलोचकों ने ख़ुद को ऐसा ही बना रखा है। ख़ुद को रचनाकार से बहुत ऊपर की चीज़ बताते हैं।
    कविता अच्छी है, बधाई।

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  2. इस तरह से इतनी संख्या में ऐसे विषय पर हिंदी में और शायद किसी और भाषा में भी कविताएं नहीं लिखी गईं। यह आलोचना का समाजशास्त्र है।

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  3. यह आलोचना का संदिग्ध काल है
    ----++++---+++++---+++++
    वरिष्ठ कवि-आलोचक गणेश पाण्डेय जी की14खंडों में लिखी यह कविता आज के तथाकथित आलोचकों के साथ साथ उन कवियों को भी नंगा कर देती है जो कविता और आलोचना को संदिग्ध बनाते हैं। आलोचना के लिए जिस ईमानदारी,साहस, और दृष्टि विवेक की जरूरत होती है,आज के तथाकथित आलोचकों में उसका अभाव है। उसके पास शुष्क किताबी ज्ञान है, दृष्टि संपन्नता नहीं। वह मठाधीशों की चाटुकारिता में लगा है,फतवे जारी करता है, उसका आलोचना कर्म से कुछ भी लेना देना नहीं है। आलोचकीय दायित्व से विमुख केवल मंच और माला की जुगाड़ में जुटे आज के स्वयंभू आलोचकों के इस रूप को देखकर क्षुब्ध हैं,कवि-आलोचक गणेश जी, यही वह पीड़ा है जो उन्हें इस लम्बी कविता,आलोचकनामा, लिखने को बाध्य करती है और पाठकों को सोचने पर मजबूर भी।
    यह केवल कविता नहीं है, उनके मन का दर्द है। काश!आज के तथाकथित आलोचक इसे समझ पाते।
    आलोचना केंद्रित इस शानदार, धारदार कविता के लिए बधाई देना तो बनता है।

    जितेन्द्र धीर
    कोलकाता।

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  4. मैंने आपके ब्लाग पर जाकर पूरी कविता पढ़ी। मेरी दृष्टि में यह 'पोलेमिकल' कविता है - प्रत्याख्यान की कविता । इसका मूल्यांकन न कथ्यों के आधार पर हो सकता है न सौंदर्यशास्त्रीय पद्धति से। इसका मूल्यांकन केवल पाठक पर इच्छित प्रभाव डालने की क्षमता से ही हो सकता है जो कि इसका वास्तविक उद्देश्य है। इस दृष्टि से यह कविता विशिष्ट है। पाठक को अपनी वाग्मिता और सशक्त प्रवाह में बहा ले जाती है। यह कविता आलोचना के संकट के बारे में विलाप नहीं करती, आलोचकों पर आक्रमण करती है और उन पर अभियोग लगाती है। ज़बर्दस्त रचना!

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