गुरुवार, 10 अगस्त 2017

मगरमच्छ

- गणेश पाण्डेय

ओ ईश्वर
अगले जन्म में
मुझे साहित्य में मत भेजना

मुझे हिन्दी का कोई चूतिया कवि
चाहे कोई मूढ़ कवयित्री मत बनाना
बनाना भी तो दिल्ली हरगिज मत भेजना

गंगा में
उतने मगरमच्छ नहीं होंगे
जितने साहित्य की इस गंगा में होते हैं

वे कभी आलोचक के भेस में मिलेंगे
तो कभी बहुपुरस्कृत कवि के भेस में
कभी लेखक संगठनों की मुंडेर पर

ये मगरमच्छ
दिखने में जितने सुंदर होंगे
उतने ही वशीकरण के पक्के आचार्य

आंखें
बिल्कुल गिद्ध जैसी
दूर तक मार करने वाली

पाजामा होगा
तो मोरी पतली होगी
धोती होगी तो घोड़ा छाप

इनसे बचना
किसी भी कवि के लिए
काफी से काफी मुश्किल होगा

कवि जैसे ही पैर छुएगा
उसकी रीढ़ की हड्डी छूकर
उसमें कोई चिप डाल देंगे

कवयित्री जैसे ही झुकेगी
उसकी कोमल-निर्मल पीठ पर
अपना खुरदुरा हाथ रख देंगे खच्च से

इन मगरमच्छों के हाथ
बहुत से बहुत लंबे होते हैं खूब फैले
दिल्ली से यूपी और पूरा बिहार तक

कहां-कहां से भागे चले आते हैं
यश: प्रार्थी कवि अपनी रीढ़ सौंपकर
कवि होने का प्रमाण-पत्र लेने के लिए
कोई-कोई तो आजीवन सेवादार बन जाते हैं

कवयित्रियां नाचती-गाती
दूर-दूर से खिंची चली आती हैं
पूजा की थाली लिए अपने नाम के नीचे
एक सीधी लंबी रेखा खींचे जाने के लिए

देशभर में
हिन्दी के मगरमच्छों का राज्य है
सबका भाग्य उनके जबड़े में कैद है

कविता के दादाओं परदादाओं ने
हिन्दी के ऐसे मगरमच्छों का जिक्र
कभी किया ही नहीं

मैं कैसे मान लेता
कि कवि बनने के लिए
किसी मगरमच्छ का आशीष जरूरी है

मैं कैसे मान लेता कि
कोई मगरमच्छ प्रमोट करेगा तभी मैं जिंदा रहूंगा
खुद तो अमर होकर दिखाता पहले नीच

मेरे समय में
पूरे देश में भगदड़ थी
चूतिये कवियों का दौड़ते-दौड़ते बुरा हाल था

बेचारी कवयित्रियां
महाकवयित्री बनने के लिए व्याकुल थीं
अब नहीं तो कभी नहीं कुछ भी हो पा लो

ओ ईश्वर
मुझसे यह सब देखा नहीं जाता है
कुछ करो कुछ तो करो

कवयित्रियों से पूछो
मीरां और महादेवी को
किस ज्ञानपीठ विजेता ने प्रमोट किया था

तुम्हारे समय में ही
आखिर क्यों जरूरी हुआ
कोई बाऊ साहब कोई पंडिज्जी

तुम्हारी पीठ
कच्छप की पीठ बनने की जगह
क्यों बनी इनके लिए चरागाह

तुम खुद क्यों नहीं
अपने समय का पहाड़ बनकर
मगरमच्छों पर अरराकर टूट पड़ी

ओ ईश्वर
मेरे बच्चों और मेरी बच्चियों से कहो
कि मुझे देखें आखिर मैं जिंदा हूं कैसे

और मगरमच्छों के पीछे से
उनके पीछे चलने वाली फौज के पीछे से
कैसे धुआं निकालता रहता हूं!

                                            

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

इतनी अच्छी क्यों हो चंदा

- गणेश पाण्डेय                                

तुम अच्छी हो
तुम्हारी रोटी अच्छी है
तुम्हारा अचार अच्छा है
तुम्हारा प्यार अच्छा है 
तुम्हारी बोली-बानी 
तुम्हारा घर-संसार अच्छा है
तुम्हारी गाय अच्छी है
उसका थन अच्छा है
तुम्हारा सुग्गा अच्छा है
तुम्हारा मिट्ठू अच्छा है
ओसारे में 
लालटेन जलाकर
विज्ञान पढ़ता है
यह देखकर 
तुम्हें कितना अच्छा लगता है
तुम 
गुड़ की चाय
अच्छा बनाती हो
बखीर और गुलगुला
सब अच्छा बनाती हो
कंडा अच्छा पाथती हो
कंडे की आग में 
लिट्टी अच्छा लगाती हो
तुम्हारा हाथ अच्छा है
तुम्हारा साथ अच्छा है
कहती हैं सखियां 
तुम्हारा आचार-विचार
तुम्हारी हर बात अच्छी है
यह बात कितनी अच्छी है
तुम अपने पति का 
आदर करती हो
लेकिन यह बात 
बिल्कुल नहीं अच्छी है
कि तुम्हारा पति 
तुमसे
प्रेम नहीं करता है
तुम हो कि बस अच्छी हो
इतनी अच्छी क्यों हो चंदा
चुप क्यों रहती हो
क्यों नहीं कहती अपने पति से
तुम उसे 
बहुत प्रेम करती हो।

(‘‘परिणीता’’ से)





रविवार, 14 मई 2017

कवि की पोशाक

- गणेश पाण्डेय


हाथी को दिक्कत नहीं होती है
घोड़े को दिक्कत नहीं होती है
गधे को दिक्कत नहीं होती है
आदमी कपड़ा क्यों पहनता है

इस शहर के कवियों को
दिक्कत होती है कि एक कवि
उनकी तरह कपड़ा क्यों नहीं पहनता है
उनकी तरह उठता-बैठता क्यों नहीं है
महाजनों के पीछे-पीछे चलता क्यों नहीं है

क्यों एक कवि शेष कवियों की तरह रहे
बाकी कवि जी लोग ही 
आखिर उस अकेले कवि की तरह 
क्यों नहीं रहते!

जरूरी नहीं 
कि वह गीतों में फर्जी क्रांति लिखे
कविता में जमीनी लड़ाई भी तो कर सकता है

कवि जी लोग 
आप परेशान क्यों होते हैं
वह धोती नहीं पहनना चाहता है
विनम्रता का नाटक नहीं करना चाहता है
तो आपको समस्या क्यों है

वह पतलून नहीं पहनना चाहता है
वह चापलूस नहीं बनना चाहता है
तो आप बेचैन क्यों हैं 

वह 
चूड़ीदार पाजामा नहीं पहनना चाहता है
बहुत पेंचदार जीवन नहीं जीना चाहता है
एक सीधी सरल रेखा खींचना चाहता है

सलवार-समीज नहीं पहनना चाहता है
जंग के मैदान से 
आधी रात में भागना नहीं चाहता है
तो आपको एतराज क्यों है

वह युद्ध की पोशाक में रहना चाहता है
साहित्य अकादमी को उड़ा देना चाहता है
कविता के लिए जमाने से लड़ना चाहता है
आखिरी सांस तक
तो आपको जूड़ीताप क्यों है

उसका इस शहर में होना 
और अलग पोशाक में होना
आखिर आपको 
हरगिज-हरगिज बर्दाश्त क्यों नहीं है

वह क्यों आपकी पोशाक में रहे
वह क्यों आपकी तरह चोटी बनाए
वह क्यों आपकी तरह श्रृंगार करे
आप वजह तो बताएं 

क्यों नहीं पसंद है आप लोगों को
उसकी प्रिय पोशाक 

कवि जी लोग 
कुछ तो बताएं साफ-साफ
आखिर चाहते क्या हैं आप लोग
एक अकेला कवि साहित्य के इस अरण्य में
शेर की तरह घूमे नंग-धड़ंग।



                            






बुधवार, 10 मई 2017

शहर बदर

गणेश पाण्डेय

एक को
मैं इसलिए पसंद नहीं था
कि मैं कोई श्रीवास्तव नहीं था

दूसरे को
मैं इसलिए पसंद नहीं था
कि मैं कोई ओबीसी नहीं था

तीसरे को
मैं इसलिए पसंद नहीं था
कि मैं किसी लेखक संघ में नहीं था

चौथे को
मैं इसलिए पसंद नहीं था
कि मैं किसी मठाधीश का भक्त नहीं था

पांचवें को
मैं इसलिए पसंद नहीं था
कि मैं अपना टेढ़ा मुंह
दिल्ली की ओर नहीं कर पाता था

छठे को
मैं इसलिए पसंद नहीं था
कि मैं उसकी तरह नीची आवाज में
बोल और लिख नहीं पाता था

सातवें को
मैं इसलिए पसंद नहीं था
कि मैं उसकी तरह महाजनों की हरबात पर
चाहे पाद पर खुशी से हो-हो नहीं कर पाता था

आठवें को
मैं इसलिए पसंद नहीं था
कि मैं अपनी गर्दन को उसकी तरह
छिपाकर नहीं रख पाता था

नौवें को
मैं इसलिए पसंद नहीं था
कि मैं उसकी तरह नाच-गा नहीं सकता था

दसवें को
मैं इसलिए पसंद नहीं था
कि मैं अकादमी की आलोचना करता था

ग्यारहवें को
मैं इसलिए पसंद नहीं था
कि मैं प्रेमचंद शामियाना हाउस का बेगार नहीं था

बारहवें को
मैं इसलिए पसंद नहीं था
कि मैं मर्दाना कविता लिखता था

तेहरवें को
मैं इसलिए पसंद नहीं था
कि मैं मर्दाना आलोचना लिखता था

चौदहवें को
मैं इसलिए पसंद नहीं था
कि मैं पांच फुट आठ इंच का था

पन्द्रहवें को
मैं इसलिए पसंद नहीं था
कि मैं शहर के लेखकों को उनका कद बताता था

सोलहवें को
मैं इसलिए पसंद नहीं था
कि मैं साहित्य का राजा बेटा नहीं था

सत्रहवें को
मैं इसलिए पसंद नहीं था
कि मैं मंच माइक माला का विरोधी था

अट्ठारहवें को
मैं इसलिए पसंद नहीं था
कि मैं इनाम लेने-देने वालों को गालियां देता था

उन्नीसवें को
मैं इसलिए पसंद नहीं था
कि मैं हर बात में बीस क्यों था

बीसवें को
मैं इसलिए पसंद नहीं था
कि मैं उसकी तरह खबीस नहीं था

कई को
मैं इसलिए पसंद नहीं था कि गणेश पाण्डेय था
आशादेवी नहीं था

उन सबने पहले मुझे
बारी-बारी से ब्राह्मण नहीं अछूत कहा
और उसके बाद सर्वसम्मत से शहर बदर कर दिया

बहुत लंबा वक्त लगा दोस्तो
तब कहीं जाकर यह नाचीज शहर बदर हुआ
फिर भी अभी हूं लच्छीपुर खास में हूं।




शुक्रवार, 5 मई 2017

प्रिय कवि सीरीज

- गणेश पाण्डेय

प्रिय कवि 1/
प्रिय कवि की कारस्तानी
-------------------------------
वह बहुचर्चित कवि
जो बहुभाषी कविता पाठ के मंच पर
अपने पाठ से ठीक पहले
बड़ी विनम्रता से देर तक हाथ जोड़े खड़ा था
नहीं दिखने के बावजूद कई दशकों से 
दिल्ली दरबार में वैसे का वैसा खड़ा था
क्या आप समझ सकते हैं
अपने प्रिय कवि की कारस्तानी!

प्रिय कवि 2/
पहले के प्रिय कवि
-----------------------
पहले 
प्रिय कवि होना 
बहुत सरल था
कोई भी अच्छा कवि हो
उसके पास बहुत अच्छी कविताएं हों
और उसका कविजीवन बेदाग हो
जाहिर है कि और कुछ नहीं चाहिए था
प्रिय कवि होने के लिए

पहले के प्रिय कवि
मांग कर खाते थे मसीत में सोते थे
चाहे कपड़ा बुनते थे जूता गांठते थे
न राजा के पास जाते थे
न धौंस में आते थे
न किसी लालच में फंसते थे
बस पूरी तबीअत से बजाते थे
कविता की ड्यूटी
इसीलिए
सबके प्रिय कवि होते थे।

प्रिय कवि 3/
प्रिय कवियों की बहुलता का समय है
--------------------------------------------
आज 
प्रिय कवि होने के लिए
कुछ खास नहीं करना होता है

हट्ठे-कट्ठे 
चाहे क्षीणकाय कवि को
पहले स्थानीय फिर राजधानी के
मठाधीश से दो बार 
कर्णछेदन कराना पड़ता है
फिर प्रधान आचार्य सेे
लंबा-सा डिठौना लगवाना पड़ता है

प्रिय कवि की उपाधि पाने के लिए
किसी परीक्षा में नहीं बैठना पड़ता है
बस 
बड़ी अकादमी का
चाहे साहित्य के किसी दरबार का 
एक मजबूत पट्टा बांधना पड़ता है
और तीन में से किसी एक लेखक संघ का
बैज लगाना पड़ता है
जागते तो जागते सोते समय भी 
खास तरह का चश्मा लगाना पड़ता है

कम से कम अच्छी कविता से भी 
कम से कम मजबूत कविता से भी
कविता की जगह ठस गद्य से भी
प्रिय कवि हुआ जा सकता है
बहुत अच्छी कविता की जरूरत नहीं
सिर्फ सुंदर कविता से भी
प्रिय कवि हुआ जा सकता है

गजब यह कि 
आज हर कविता-प्रेमी की जेब में
उसका प्रिय कवि है
यह अलग बात है कि कविता से ज्यादा
वह कवि दूसरी वजहों से उसे प्रिय है
इस वक्त के कुछ बेवकूफ कवियों को छोड़ दें
तो यह प्रिय कवियों की बहुलता का समय है।

प्रिय कवि 4/
जो मंच पर है वही प्रिय कवि है
--------------------------------------
क्या आप प्रिय कवि हैं
आइए, आइए मंच पर बैठिए
क्या आप भी प्रिय कवि हैं
आइए, आइए मंच पर
आप भी
आइए आइए मंच पर बैठिए 
सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण कीजिए

माइक के सामने खड़े होकर
देखिए, देखिए सभागार
जहां-जहां आप देख पा रहे हैं
जिसे-जिसे आप देख पा रहे हैं
सब आपकी जागीर है
सब आपकी प्रजा हैं

जो मंच पर है
वही कवि है प्रिय कवि है
अच्छी कविता के बावजूद
बाकी सिर्फ श्रोता हैं

देखिए 
आपको सुनने के लिए लोग
दोनों कान साफ कराकर आए हैं
आपको देखने के लिए 
आंखों को धुलकर आए हैं
जिन उंगलियों से आप लिखते हैं
उसे छूने के लिए 
हाथों में साबुन लगाकर आए हैं
जिस मुख से आप करते हैं काव्यपाठ
उसे चूमने के लिए ब्रश करके आए हैं
आप कोई भी कैसी भी कविता पढ़ें
वाह-वाह करने के लिए 
पैदल चलकर आए हैं

दो हजार सत्रह में 
प्रिय कवियों के सिर्फ प्रिय श्रोता होते हैं
आलोचक भी आलोचक नहीं होते हैं
प्रिय कवि की कविताओं के सिर्फ प्रशंसक होते हैं
प्रशंसक ही आलोचक होते हैं।

प्रिय कवि 5/
जो किसी का प्रिय कवि नहीं बन पाते हैं
-------------------------------------
जो किसी का 
प्रिय कवि नहीं बन पाते हैं
चुप रहकर जीवनभर 
लांछन और अपमान पीते हैं
शहर के लेखकों की घृणा
और आचार्यों की उपेक्षा को
मृत्युपर्यन्त घूंट-घूंट पीते हैं

कोई नहीं पूछता है
उनका दुख
कोई नहीं जानना चाहता
कि बावला क्यों देना चाहता है
कविता के लिए जान

अप्रिय कवि को
प्रिय कवियों के सुख से 
रत्तीभर ईर्ष्या नहीं
वे तो अपनी मर्जी से
दुख की चाय सुड़क-सुड़क कर
अक्सर पीते हैं
जैसे किसी गुमनाम गली का कुत्ता
नाली का पानी सुड़क-सुड़क कर पीता है
देखते सब हैं 
पर साफ पानी कौन उसे देता है

जो किसी का 
प्रिय कवि नहीं बन पाते हैं
अपनी उदासी और एकांत को
अपनी पत्नी के कंधे पर सिर रखकर
खारे पानी के साथ पीते हैं।

प्रिय कवि 6/
प्रिय कवि की मुर्गियां
--------------------------
प्रिय कवियों को 
मुर्गियां पालने का बहुत शौक होता है
रोज एक अंडा और रोज कुकड़ूकूं
प्रिय कवि दाना-पानी की जगह
प्रेम कविताएं फेंकते हैं
प्रिय कवियों की कविताएं इत्र छोड़ती हैं
मुर्गियां दूर से बेसुध होकर दौड़ पड़ती हैं
मुर्गियां आगे-पीछे होती हैं
तो प्रिय कवि का दिमाग पहले खराब होता है
नीयत बाद में
आज की तारीख में
प्रिय कवियों के पास जितनी शक्ति है
कहते हैं कि भगवान के पास भी उतनी शक्ति नहीं है
भगवान मुर्गियों से 
कविताएं नहीं लिखवा सकते हैं
प्रिय कवि मुर्गियों से कविताएं लिखवा सकते हैं
मुर्गियां प्रेम कविताओं की मुंडेर पर बैठकर
कुकड़ूकूं कर सकती हैं
भला मुर्गियां 
ऐसे परोपकारी प्रिय कवियों को
अपना आलंबन क्यों न बनातीं
प्रिय कवि जब और जितनी बार चाहें
उनकी गर्दन तक हाथ ले जा सकते हैं
खूब-खूब सहला सकते हैं
प्रिय कवि खुश हैं
कि मुर्गियां खुश हैं
वे जब चाहें अंडा
और जब चाहें कविताएं दे सकती हैं।

प्रिय कवि 7/
प्रिय कवि का नागिन डांस
---------------------------------
कई धोती वाले प्रिय कवि 
कविताएं तो अच्छी लिखते ही हैं
नाचते भी बहुत से बहुत अच्छा हैं
कोई-कोई तो धोती खोलकर नाचते हैं
मेरी बात पर यकीन न हो 
तो दिल्ली दरबार के कुत्ते-बिल्ली से पूछ लें

उम्रदराज प्रिय कवियों के
अतीत के चल-चित्र देख लें
अपने शहर से अपना लाव-लश्कर लेकर
दिल्ली के दरबार में जब नाचने पहुंचे 
तो नाचा खूब घुंघरू तोड़ दिया
और जब सरदार के बोलने की बारी आयी
तो पहले तो उसने माइक थोड़ा ऊंचा किया
फिर खखार कर गला साफ किया
और बुलंद आवाज में कहा-
जब गीदड़ की मौत आती है तो शहर में आता है...

लेकिन क्या आपने 
कविता के किसी गीदड़ को
लाज से मरते देखा है
देखा होगा तो सिर्फ 
प्रिय कवि बनते देखा होगा

आपने कभी
धोती वाले प्रिय कवियों को 
तलवार के साथ नहीं देखा हो
मामूली से मामूली 
छड़ी के साथ तो देखा नहीं होगा
जब भी देखा होगा
गदेली पर सुर्ती मलते देखा होगा
मंद-मंद मुस्काते देखा होगा
चाहे विनम्रता की ऊंची मूर्ति बनते देखा होगा
चाहे साजिश करते हुए किसी को 
छिपकर आंख मारते देखा होगा
चाहे दिल्ली दरबार में 
नागिन डांस करते देखा होगा

यों तो धोती वाले प्रिय कवि 
कभी-कभी साड़ी भी पहनते थे
लाल-लाल
बड़ी-सी गोल टिकुली भी लगाते थे
लेकिन शायद आपने नहीं देखा होगा।

प्रिय कवि 8/
प्रिय कवि का तिलिस्म
---------------------------
पाजामा बहुत कम ढ़ीला पहनते थे
कुर्ता भी कुछ-कुछ टाइट रहता था
और कविता एकदम चूड़ीदार लिखते थे
प्रगतिशीलों में बहुत से बहुत प्रगतिशील थे 
कलावादियों में बहुत से बहुत कलावादी 
प्रिय कवि दिल्ली से अक्सर आते थे 

यों तो शेर पर खूब लंबा लिखते थे 
लेकिन खरगोश की तरह बहुत छोटा जीते थे
और रम तो कम पीते ही नहीं थे
कवि तो कवि गधों और बैलों के संग पी सकते थे

इस शहर में ज्यादातर
सिर्फ हेली-मेली से मिलते थे
यों कुत्ते-पिल्ले से भी मिलने में 
उन्हें कोई दिक्कत नहीं थी
बस एक मर्द कवि से नहीं मिलते थे
पता नहीं कैसे कवि थे 
कि कवि होकर कवि से मिलने से डरते थे
कवि थे भी कि कविता के भांड़ थे

एक आलोचक को फोन करते थे
और वह दौड़े चले जाते थे
मैं आजतक नहीं समझ पाया 
कि छुटभैये कवि ही नहीं आलोचक भी
कैसे किसी प्रिय कवि का सेवादार बन जाते थे
है कोई बंदा जो बता सके कुछ
खोल सके प्रिय कवि का तिलिस्म।

प्रिय कवि 9/
प्रिय कवि को आईना दिखाना हिमाकत है
----------------------------------------------
प्रिय कवि सुंगध छोड़ते हैं
अप्रिय कवि पसीने की बदबू

प्रिय कवि कुछ भी लिखे उसे सुभाषित कहते हैं
और अप्रिय कवि की अच्छी कविता को गालियां

प्रिय कवि अपने समय में अमर होते ही होते हैं
किसी प्रमाण की जरूरत नहीं होती

अप्रिय कवि फंदे पर लटक कर
साबित करते हैं कि मौत से नहीं डरते

प्रिय कवि को आईना दिखाना हिमाकत है
अप्रिय कवि पर जूते भी बरसाये जा सकते हैं

प्रिय कवियों का गैंग होता है
अप्रिय कवि अकेला होता है

प्रिय कवि की तीव्र आलोचना कर भर दे
तो अप्रिय कवि पर कुत्ते छोड़ दिये जाते हैं

प्रिय कवियों के लठैत अपने मालिक के लिए लड़ते हैं
अप्रिय कवि वीर होते हैं अपने लिए खुद लड़ते हैं

प्रिय कवि सुई की नोंक बराबर जमीन नहीं देना चाहते हैं
अप्रिय कवि लड़ते हैं लड़ते-लड़ते मर जाना चाहते हैं।

प्रिय कवि 10/
मैं किसी का प्रिय कवि नहीं हूं
--------------------------------
कविता की दुनिया में 
यहां कोई नहीं है मेरा
मैं किसी का कुछ नहीं हूं
मैं किसी का प्रिय कवि नहीं हूं

जिस दौर में
यह शहर कविता का किन्नरलोक हो
मैं कैसे किसी का प्रिय कवि हो सकता हूं
हरगिज-हरगिज नहीं

बस
कविता एक मामूली कार्यकर्ता हूं
एक बहुत मामूली सेवक हूं
कविता के लिए खून जलाता हूं
पसीना बहाता हूं
बदले में कुछ नहीं चाहता हूं

कविता से प्रेम है
कविता में होना 
मेरे लिए जिंदा होना है
दरबारों में
नाचना-गाना चाहे मसखरी नहीं
साहित्य की सत्ता से टकराना है

मुझे कुछ नहीं होना है
अपने समय का प्रिय कवि नहीं होना है
मंच माइक माला कुछ नहीं चाहिए
अपना काम करना है 
झाड़ू ठीक से लगाना है
और चले जाना है चुपचाप

नाम नहीं चाहिए 
इनाम नहीं चाहिए
विदेश यात्रा नहीं चाहिए
न खोने को कुछ है न पाने को कुछ

न भ्रष्ट 
साहित्य अकादमी में जाना है
चाहे नेहरू ने अकादमी को 
हिन्दी के बेटों के लिए ही बनवाया हो 
हिन्दी के हरामजादों के लिए नहीं

साफ-साफ कहता हूं
किसी की गोद में पैदा हुआ 
आज का कोई प्रिय कवि नहीं हूं
सीधे हिन्दी की सख्त जमीन पर फाट पड़ा हूं 
इसीलिए अपने पैरों पर खड़ा हूं
और साहित्य में हरामजदगी के खिलाफ हूं

किसी दिन पकड़ूंगा 
सबसे बड़े हरामजादे की टांग और चीर दूंगा 
धोती की तरह चर्र से।










सोमवार, 24 अप्रैल 2017

एक कवि और शेष कवि

- गणेश पाण्डेय

एक कवि
अपने वक्त में
साहित्यनीति के लिए
लड़ रहा था

मठों और किलों से
टकरा-टकरा कर
अपना सिर
लहूलुहान कर रहा था

था एक पागल कवि
साहित्य की दुनिया में
खुदकुशी कर रहा था

शेष कवि
अपनी कमीज की आस्तीन मोड़कर
लिखने की मेज पर
बड़ी अदा से कोहनी टिकाये
राजनीति
और समाजनीति पर
धुआंधार
क्रांतिकारी कविताएं लिख रहे थे

शेष कवि
चीख-चीख कर कहते थे
कि वे किसी भी चुने हुए
तानाशाह और उसकी फौज से नहीं डरते थे
अलबत्ता
अकादमी अध्यक्ष की पिस्तौलछाप धोती से
थर-थर-थर कांपते रहते थे

यह
दो हजार सत्रह का
बहुत बुरा साल था
एक कवि
कविता के लिए अपनी जान दे रहा था

शेष कवि
उत्सवपूर्वक
हजार प्रकार से
गऊ जैसी कविता की जान ले रहे थे।



शनिवार, 8 अप्रैल 2017

जैसा हूं वैसा हूं

- गणेश पाण्डेय

हूं
गुरुद्रोही हूं

नहीं हूं
साहित्यद्रोही नहीं हूं

जो भी हूं
बिल्कुल पारदर्शी हूं

हूं
गरीब प्रेमचंद हूं

नहीं हूं
अमीर इनामचंद नहीं हूं

जैसा हूं वैसा हूं
हिन्दी के हरामजादों जैसा नहीं हूं

हूं
बहुत से बहुत ज्यादा पागल हूं।








शुक्रवार, 31 मार्च 2017

हिन्दी के नये सुमनों से

- गणेश पाण्डेय

मैंने पूछा कि तुम हिन्दी के कवि हो
उसने कहा कि वह हिन्दी का नया मार्क्सवादी कवि है 

मैंने कहा कि तुम हिन्दी के कवि हो
उसने कहा कि हो सकता हूं पर उसके मूल विचार हिन्दी के नहीं हैं

मैंने कहा कि फिर भी तुम हिन्दी के कवि हो
उसने कहा कि हां-हां, क्यों नहीं, पर वह हिन्दी में सिर्फ लिखता है

मैंने पूछा तुम्हारी कविता का मुहावरा हिन्दी का है न ?
उसने कहा कि उसे पता नहीं कि मुहावरे कहां-कहां से आते हैं

मैंने पूछा कवितासम्राट, नये ज्ञानमार्गी हो कि नये प्रेममार्गी या मेरी तरह कुछ और
उसने कहा बस ईमानमार्गी नहीं हूं, बाकी क्या है पृथ्वी पर जो मैं नहीं हूं

मैंने पूछा कि हिन्दी के सुघरकवि, तुम आखिर रहते कहां हो, किस मुहल्ले में
उसने कहा कि वह बड़ी अकादमी के पिछवाड़े अपनी बस्ती में रहता हैे

मैंने कहा कि अच्छा-अच्छा, तुम फासिस्ट को सिर्फ संसद से क्यों जोड़ते हो
उसने कहा कि साहित्य में फासिस्ट नहीं होते हैं, जो होते हैं मार्क्सवादी होते हैं

मैंने पूछा कि कविता में विश्वविजय की आकांक्षा, जनाकांक्षा है
उसने कहा दूसरे कवियों के साथ षड्यंत्र फासिस्ट हरकत नहीं है

मैंने पूछा कि कविता के लोकतंत्र में मुकुट और राज्याभिषेक क्या है
उसने कहा कि उसे मालूम नहीे कि कोई कवि इसके बिना कैसे जिंदा रह सकता है

मैंने पूछा कि पाठकों की सामूहिक हत्या हिन्दी का फासिज्म नहीं तो और क्या है
उसने कहा कि वह पहले प्रकाशकों और आलोचकों से पूछेगा, फिर बताएगा

मैंने पूछा कि नये मार्क्सवादी कवि, सिर्फ फासिस्ट पर लिखी कविताएं क्यों अच्छी हैं
उसने कहा कि बीमारी या कत्लेआम में मारे गये बच्चों के बारे में आलोचकों से पूछिये

मैंने कहा कि तुम हिन्दी के इनामी कवि हो, कीमती चश्मा लगाते हो
उसने कहा कि नहीं वह चर्चित लेखक है और पैंट साफ पहनता है

मैंने कहा कि तुम्हारी सारी बटनें टूटी हुई क्यों है 
उसने कहा कि हवाओं को रोकना फासिस्ट हरकत है

मैंने पूछा कि निठल्ले लेखक संगठन में क्यों हो, आरएसएस में क्यों नहीं जाते
उसने कहा कि लेखक संघ अच्छा है, आरएसएस और उसकी सरकार फासिस्ट

मैंने कहा कि तुम भले कवि हो कुछ छुपाते नहीं हो, दमक रहा है मुखड़ा 
उसने कहा कि वह बेवकूफ नहीं है, हिन्दी के अपराध के बारे में कुछ नहीं बोलेगा

मैंने कहा कि सिर्फ फासिस्ट का विरोध क्यों जरूरी है, लालटेन जलाओ
उसने कहा कि इस हिन्दी से जनता को जगाना पहाड़ पर सिर पटकना है

मैने कहा कि निराश क्यों होते हो हिन्दी के लेखक हो इंकिलाब तुम्हें ही करना है
उसने कहा कि माफ करो, पहले मुझे कविता में किसी तरह इंकिलाब करने दो

मैंने पूछा कि हिन्दी के लेखक हो मुंह खोलो जुबान का नट-बोल्ट दिखाओ
उसने कहा कि खबरदार जो मेरी किसी जुबान को हाथ लगाया

मैंने पूछा कि अच्छा इतना तो बता दो भाई कि मैं हिन्दी का लेखक हूं या नहीं
उसने अपने तीन नेत्रों और दो जिह्वाओं से प्रचुर अग्नि छोड़ते हुए कहा, चूतिया लेखक हो

मैंने कहा कि क्षमा करो हिन्दी के नये सुमनो, मैं तो तनिक भी चतुर नहीं हूं
अपनी इस अतिशय दरिद्रता पर झुका हुआ है मेरा शीश, कलम कर दो।

(यात्रा 12)



गुरुवार, 30 मार्च 2017

सिया

- गणेश पाण्डेय

सिया
तुम मेरी प्रिया नहीं हो तो क्या हुआ
उस युग की सिया नहीं हो तो क्या हुआ
कितनी सुघड़ हो सलोनी हो
कितनी अच्छी हो अपनी इस कृशता में
कोई परिधान हो रंग कोई 
समय कोई भी 
चाँद के सामने हो जैसे कोई 
कोमल ऐसी कि छूकर नत हो जल
वाणी से नित चूता है जिसके राब 

तुमसे भी प्यारा है सिया तुम्हारा जिया
तुम्हारा यह लव और तुम्हारा यह कुश 
मीठा इतना कि पूछो मत 
चूम कर देखे कोई उनके रसभरे कपोल 
कैसे खिलखिल करते हैं नटखट 
जब वे तुम्हें देख मुस्काते हैं  
कैसे उनके संग नाचती हो
अपने एकाकी जीवन की रानी तुम

कैसा है यह तुम्हारा मरियल पति 
जिसकी मद्धिम से मद्धिम पुकार पर 
छोड़छाड़ कर सब द्रुतदौड़ लगाती
कैसे दिनभर खटती हो अपने छोटे से घर में
हजार काम वाली हाथगाड़ी में अकेले जुती
परमेश्वर पति से 
खाती हो डाँट कभी तो मार कभी
कभी नमक के लिए तो इस्त्री के लिए कभी
जूते की धूल की तरह झाड़ी जाती हो 
हजार बार 
दुखी होकर अकेले में रोती हो सिया
जानता हूँ सब जानता हूँ

रोज शाम को पीकर घोड़े पर आना 
उस परमेश्वर का 
सजधज कर चौखट से टिककर 
तुम्हारा लग जाना
आँखों में काजल के नीचे थरथर करती रोज 
तुम्हें देखा है
ऐसे ही छिपकर अपने भीतर रहते देखा है।

तुम्हीं कहो
कैसा है यह पति निर्दयी कसाई
जो अपनी परिणीता को रोज डराता है
तुम भी कैसी सिया हो किसकी हो बेटी  
कुछ तो बोलो कहाँ रहते हैं माँ-बाप
अवध की हो कि मिथिला की 
कि भोजपुरिया
क्यों नहीं आते हैं यहाँ
हँसकर फोन पर क्यों सब अच्छा कहती हो

यह तुम कैसी सिया हो सिया जिसका पति तुम्हें 
अपने भीतर के किसी दूसरे बुरे आदमी से बचाता नहीं है
खसी की तरह रोज बाँध कर उसके आगे कर देता है पराये शहर में
एक भली स्त्री की आहत आत्मा को क्षत-विक्षत करने के लिए

किस युग का पति है यह 
क्या लंका से आया है
किस ग्रह से आया है बोलो 
ढ़ूँढ़ता रहता है तुममें नुक्स पर नुक्स
इसे तुम जैसी सिया पर हाथ उठाते देखता हूँ
दुखी हो जाता हूँ

कैसी सिया हो 
तुम्हें फिर हँसते-मुस्कराते हुए
उसके पीछे-पीछे भागते देखता हूँ

यह कैसा जीवन है सिया
इस अग्नि में तुम्हें क्षण-प्रतिक्षण
धू-धू कर जलते हुए देखता हूँ 
हाँ देखता हूँ 
आज की सिया को देखता हूँ
अपने ही घर में 
अपने परमेश्वर की आज्ञा से
अकेले वनवास काटते हुए देखता हूँ 

देखता हूँ 
समय के माथे से बहते हुए सिंदूर के झरने के नीचे
सोलहसिंगार करके बैठी हुई सिया का अस्थिपंजर देखता हूँ

नहीं चाहिए मुझे इस तरह
किसी स्त्री को पिटते हुए देखने का पैसा
नहीं देखना है मुझे 
किसी सिया का इस तरह रोज-रोज आहत होना
दो दिन में
खाली कर दे राक्षस किराये का यह मकान
इससे पहले कि मैं कुछ कर बैठूँ ...
पर जाओगी कहाँ सिया
कहाँ ले जायेगा यह राक्षस तुम्हें
कौन देखेगा तुम्हें इस तरह
तुम्हारा दुख किसे छुएगा...

(यात्रा 12)



सोमवार, 27 मार्च 2017

विचारधारा तथा अन्य कविताएं

-गणेश पाण्डेय

विचारधारा

विचारधारा
सोने की मुर्गी नहीं
मुर्गी का अंडा भी नहीं विचारधारा
बहुत सोचा-विचारा फिर पाया
कि पैंट, पाजामा या हॉफपैंट नहीं है विचारधारा
जवाहर जैकेट और गाँधी टोपी कुच्छ नहीं विचारधारा
चचा होते तो कहते आज खखारकर गला-
इक आग का दरिया
उनके लिए जो इसमें डूब-डूब जाना चाहते हैं
बुझने नहीं देना चाहते हैं जो इक आग
जिन लेखकों के लिए रसरंजन है विचारधारा
उनकी बात न करें जनाब वे पीकर मूत देते हैं बात-बात पर
गोरखपुर से लखनऊ तक और लखनऊ से दिल्ली तक
कहाँ-कहाँ नहीं है विचारधारा की सुपारी लेने और खाने वाले आलोचक
मेरी तो बात ही छोड़िये श्रीमान जी ऐसे लेखक से बेलेखक भला
जब धरी की धरी रह जाएगी सोने की यह दुनिया
क्या करूँगा नाम और इनाम लेकर
किसकी जेब में रखूँगा किसके डिब्बे में डालूँगा
मेरे लिए विचारधारा जब तक मेरे पास है शुद्ध हवा है
साफ पानी है
मेरा प्यार है मेरा घर-संसार है मेरे बेटें बेटियाँ मेरा अड़ोस-पड़ोस
और घड़कन है विचारधारा
इंकिलाब हो न हो जीने की ताकत है विचारधारा।



पुरस्कार

सोने का मृग देखा है कभी
सुना है कभी रामकथा में उसका जिक्र
राम के जीवन में एक सीता आती हैं
फिर एक स्वर्णमृग आता है
कथावाचक कहता है कि किसी राक्षस के छिपने के लिए
सोने से अच्छी जगह भला और कौन हो सकती है 
सीता के दुख के मूल में सोने का वही मृग था
जो राम की इच्छा में था
और जब मैंने कथावाचक महाशय से पूछा-
राम कथा रचने वाले कवियों के दुख का मूल क्या सोना नहीं
बोले कथावाचक, नहीं-नहीं श्रीमन् पहले की बात नहीं जानता पर आज
कवि के फँसने के लिए तो सोने की भी जरूरत नहीं
चाँदी-सादी तांबा-पीतल भी नहीं
वह तो चमड़े के एक चिथड़े पुरस्कार के लिए भी फँस सकता है
आप ही बताएँ कि हजार -पाँच सौ में कितना सोना मिलता है
कितना चाँदी
मैंने कहा-जी आप रामकथा कहें, कवि कथा मुझे कहने दें।
बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में और उसके बाद कवियों ने 
जहाँ-जहाँ और जिस-जिस सड़क पर लिखी थी कविता 
उसकी जगह लिख दिया पुरस्कार
और कहा-फर्क नहीं पड़ता 
कि मैं तुलसी या कि सूर या कि कबीर-सबीर का वंशज नहीं हूँ
कहा कि मैं कविता का डाकू हूँ कोई वाल्मीकि नहीं
और तुम कैसे अहमक हो
जो नहीं जानते जंगल और जेएनयू का फर्क
भाड़ में जायें तुम्हारे तुलसी के राम डूब मरें कबीर-सबीर के राम
उन सबसे सुखी अपने राम ये देखो ये सोने का है ये चाँदी का यह रहा नकदी
जिंदाबाद-जिंदाबाद पुरस्कृत कवि जिंदाबाद-जिंदाबाद।


अच्छाई 

अच्छाई का घर अच्छे-अच्छे विचारों के पिछवाड़े नहीं होता है
अच्छी से अच्छी किताबें हों मुफ्त में नहीं सिखाती हैं अच्छाई
अच्छाई आकाश से नहीं झरती है शरद पूर्णिमा की रात
अच्छाई शहर के किसी मँहगे मॉल में 
या गाँव की छोटी-सी दुकान में सस्ते में बिकने वाली चीज नहींे
अच्छाई कोई लैपटॉप नहीं जिसे बाँटती फिरें सरकारें
कोई भभूत नहीं है अच्छाई कोई प्रसाद नहीं 
जिसे हलवा-पूड़ी के बदले में दें धर्माचार्य
अच्छाई माँ-बाप से विरासत में मिलने वाली सम्पत्ति नहीं
खेत-खलिहान, मकान 
और कल-कारखाने में गड़ा हुआ धन नहीं है अच्छाई
पृथ्वी की सबसे सुंदर प्रेमिका की झील से भी गहरी आँखों में 
अच्छाई का बेशकीमती खजाना छिपा नहीं होता है
किसी मंदिर या मस्जिद की नींव में भी नहीं रखी गयी होती है अच्छाई
पूजा की ईंट की तरह
अच्छाई तो सिर्फ अपने खून-पसीने से कमाई जाती है दोस्तो।

बुराई

बुराई 
कोई मिठाई नहीं जो बिकती हो किसी मिष्ठान्न भण्डार पर
अखबार में छपी हुई कोई कविता भी नहीं जिसे पढें़ सब
वेद की कोई ऋचा भी नहीं बुराई
कोई इत्र नहीं है बुराई कोई सूट-बूट नहीं है बुराई
बड़े बजट की कोई लटके-झटके वाली फिल्म नहीं है बुराई
किसी स्कूल किसी कॉलेज की सर्टिफिकेट नहीं है बुराई
कद-काठी में कोई हेडमास्टर नहीं है बुराई
शक्ल-सूरत और शैतानी के मामले में
यूनिवर्सिटी के किसी एचओडी का थोबड़ा नहीं है बुराई
किसी खद्दर के सूत या सफेद रंग
या पार्टी के झण्डे-सण्डे की तरह दिखती नहीं है बुराई
बुराई किसी अदालत के हुक्म पर फाँसी का फंदा भी नहीं

बहुत सुंदर बहुत प्यारी बेसुध कर देने वाली
अपनी भुजाओं में कसकर हर लेती है प्राण
मुई छोटी से छोटी बुराई
मन के किसी तहखाने में होता है उसका राज
उसका तख्त और ताज 
जिसे एक कमजोर आदमी छिपकर पहनता है
और भेस बदलकर बाहर निकलता है
घड़ी-घड़ी बदलता रहता है अपना चेहरा
अपनी आँखें अपनी आवाज अपनी चाल
वह अपनी बुराई के बारे में एक शब्द भी नहीं बोलता है
और बुराई उसके बारे में कुछ नहीं छुपाती है।

(यात्रा 12 से)

मंगलवार, 14 मार्च 2017

यह कौन है जो हमें अच्छा करने से रोकता है

-गणेश पाण्डेय

मेरे गाँव से सिवान तक
उसके सिवान से उसके गाँव तक
दूर-दूर तक खेतों की छाती डबडब पानी से जुड़ाएगी नहीं 
चाहे उर्वरधरा की अनगिन दिनों की लंबी प्यास बुझेगी नहीं
जड़ों में पहुँचेगी नहीं गोबर की खाद चाहे यूरिया - स्यूरिया 
तो कैसे लहलहाएंगी फसलें 
कैसे झूमेंगी नाचेंगी गाएंगी धान की लंबी-लंबी बालियां छातियों से ऊँचीं
कैसे रास्ता रोक कर बाबूजी जी को बताएंगी अपनी बहादुरी के किस्से 
कैसे गेहूँ हाथ मिलाएगा छूकर स्कूल जाते बच्चों से एक-एक करके 
कुछ चीजें बहुत जरूरी होती हैं आदमी के जीने के लिए 
जैसे मजबूत से मजबूत फेफड़े के लिए मुट्ठीभर हवा 
अँजुरीभर मीठा पानी दो कौर दालभात 
औकातभर दवाएं
बस  
और क्या चाहिए किसी गरीब को जमाने से 
राजा-महाराजा से किसी मंत्री-संत्री से और क्या चाहिए
इतना भी नहीं देते तो किसलिए होते हैं राजा और महाराजा
अपना पेट भरने के लिए कि अपनी तिजोरी
राजा का बेटा खाए दूधभात 
हमारा एक मुट्ठी कोदो-साँवा
राजा के बेटे के लिए आकाशमार्ग 
हमारे बेटे के लिए लीक भी ठीक नहीं
धन्नासेठ की बीवी का जन्मदिन दो सौ करोड़ में
हमारी बीवी का कोई जन्मदिन ही नहीं
कौन हैं जो सच को चोर की तरह छिपाकर रखना चाहते हैं
ये लेखक, विद्वान, आचार्य और अखबारनवीस 
सब धन्नासेठ और राजा के पालतू इनामी कुत्ते
अक्सर किसी झूट्ठे को राजा-महाराजा बनाकर रखना चाहते हैं
हम क्यों देखते हैं दूसरों के मुखारविंद
यह कौन है जो हमारे भीतर छुपा है और हमें कुछ अच्छा करने से रोकता है
कोई लालच का पुतला है
कि कोई डर। 

(यात्रा 12)


रविवार, 5 मार्च 2017

बस यह जरा-सा बुरा वक्त है लड़ लूँ इससे

- गणेश पाण्डेय

कोई सेवक मुल्क लूटता है कोई सूबा और कोई शहर
कोई सोना लूटता है कोई हीरे-जवाहरात कोई कुछ 
मैं चाहता हूँ अपने पसीने की इतनी कीमत 
जिससे खरीद सकूँ अपने बच्चों के खाने-पीने और पहनने-ओढ़ने के लिए 
कुछ चीजें और थोड़ी-सी खुशियां 
इससे ज्यादा कामयाबी और नसीब नहीं चाहिए मुझे 
नहीं चाहिए मुझे दूसरे के मुँह का निवाला और दूसरे के हिस्से का प्यार 
नहीं चाहिए मुझे मेरे पड़ोसी के पैरों के नीचे की जमीन 
मुझे अपने छप्पर के लिए सिर्फ उसका हाथ चाहिए 
उसका साथ चाहिए 
नहीं चाहिए मुझे जरायम की काली दुनिया की अकूत कमाई 
अपनी गरीबी के उजाले में अपनी आत्मा को तृप्त करना आता है मुझे 
अपने बच्चों को अँधेरे के राक्षस से बचाना आता है मुझे 
उनकी आँखों में सच्चाई और संघर्ष के सपने बसाना आता है मुझे 
बस यह जरा-सा बुरा वक है लड़ लूँ इससे 
फिर कर लूँगा सब आता है मुझे 
बस यह जरा-सा बुरा है वक्त बिल्कुल जरा-सा 
और कितने हैं हमलोग इतने सारे लोग।

(यात्रा 12)






मारे जाने की असल वजह अच्छाई क्यों है

- गणेश पाण्डेय

यह बुराई 
नये जमाने की बुराई है जनाब 
बला की खूबसूरत देखिये तो
ताकत में बेजोड़ और उतनी ही मिलनसार और दिलकश
आसान और सस्ती इतनी कि जो चाहे उसकी हो जाए
रात-बिरात कहीं भी चली जाए किसी के संग 
क्या राजा की सभा क्या उसका रनिवास 
क्या ईश का मंदिर और क्या महंत का भुंइधरा 
क्या कचहरी क्या अस्पताल क्या अखबार का दफ्तर 
और क्या विश्वविद्यालय-सिद्यालय
हवा में मिली हुई खुशबू की तरह पसर जाए दसों दिशाओं में
सबके दरवाजे की सांकल बजाए
कहाँ कहाँ नहीं चली जाए
जिसके पास हो
समय का पारस हो
छू दे तो कुर्सी सोने की हो जाए
जेब में हो तो पलभर में दुनिया अपनी हो जाए
कवि की मुश्किल यह कि कहे तो क्या कहे
जिसके पास हो इस समय का महाकवि हो जाए
जादू है जादू छोटी से छोटी बुराई 

पहले जेब में छिपाकर रखते थे बुराई की चाँदी का एक रुपया
अब दिखाकर रखते हैं सिर पर उसका भारी-भरकम मुकुट
पहले अच्छाई सहज थी 
साँस की तरह आप से आप आती-जाती थी
अब बुराई की हल्दी बाँटी जाती है घर-घर
ऐसा क्यों है बाबा गोरख 
अच्छाई अति कठिन तप क्यों बुराई क्यों सरल अजपाजाप
राजनीति की संसद में पहुंचना सरल अति
अध्यात्म की ऊंचाई पर समाधि लेना अति कठिन
यह सोचकर डर लगता है कि ऐसे बुरे वक्त में 
जिन लोगों के पास सोने और चाँदी का चश्मा नहीं है 
ऐसे लोगों के मारे जाने की असल वजह भूख और बीमारी की जगह
अच्छाई क्यों है ?

(यात्रा 12)






शनिवार, 14 जनवरी 2017

जासूस छोड़ जाऊँगा

- गणेश पाण्डेय

छोड़कर जाऊँगा
तो अपने सबसे अच्छे जासूस छोड़ जाऊँगा हरामजादो
नाम और इनाम जैसी दो कौड़ी की चीजें होतीं
तो उन्हें भी अपनी लंगोट में छिपाकर नहीं ले जाता लो
अपनी बेशकीमती आँखें छोड़ जाऊँगा बिजली के खम्भे पर
लट्टू की तरह लटकाकर
यह देखने के लिए कि मेरे जाने बाद कब तक करते हैं साजिश
अपनी भाषा, अपने साहित्य और अपने उस समाज के खिलाफ
जिसने पैदा किया इतने अच्छे उन जैसे हिन्दी के हरामजादे
अपने कान छोड़ जाऊँगा चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस की छतरी पर
जहाँ से सुनायी देती रहेंगी चीखें, भिड़न्त और रोने की आवाजें
एक गरीब लेखक की कातर पुकार जरूर सुनायी देंगी
सुनायी देगा किसी के कत्ल के बाद कातिलों का अट्टहास

मैं नहीं चाहता कि मेरे बच्चे 
मेरे सबसे भेरोसेमंद जासूसों को भी मेरे साथ मेरी चिता पर जला दें
फालतू कागज-पत्तर चाहे कबाड़-सबाड़ समझकर

एक सेंकेंड के लिए भी बिना डरे और बिना रुके चलने वाली
सच और निडरता की सखी
अपनी सबसे प्यारी जुबान छोड़ जाऊँगा खून से तरबतर
पूरे शहर का चक्कर लगाते रहने के लिए दिनरात
अपना लहजा अपनी बारूद अपने विचार छोड़ जाऊँगा हरामजादो
हाँ अपने हाथ भी छोड़ जाऊँगा डालकर निकालने के लिए
आगे-पीछे छिपाकर रखे गये हजार-हजार के कड़क नोट
जो उन्हें मिलते ही रहते हैं हिंदी की किड़नी के धंधे में

मर रहा है हिन्दीप्रदेश ऐसे ही रहा तो एक दिन मर जाएगा
हिंदी के लाडलों का भविष्य
फिर भी नहीं मरेंगे हिंदी के ये खूँख्वार हत्यारे
जब तक नहीं मरेगा इनका डॉन
जब तक बमबारी नहीं होगी इनके ठिकानों पर
तब तक नहीं खिलेंगे इस अंचल में नन्हे-नन्हे चाँदनी के फूल
अचिरावती तब तक नहीं धुलेगी अपने मटमैले केश
तब तक नहीं तोड़ेगी अपने बेटों के लिए निर्जलाव्रत
तब तक नहीं बनेगा हिन्दी का बच्चा
देश के ताज और तख्त का वारिस
तब तक नहीं बनेगा फिर से हिंदी का बेटा
फटकार कर सच बोलने वाला नन्हा कबीर 

मेरे बेटो
मेरे मरने के बाद एक दिन ये भी मरेंगे
पर मेरी तरह कहाँ मरेंगे मृत्युशय्या पर अपनी ललकार के साथ
किसी गली में किसी श्वानमुद्रा में मरेंगे ये मुँहबाये।

(यात्रा 12 से)