मंगलवार, 4 जून 2013

ये हिंदी वाले

- गणेश पाण्डेय

    जिसे आप चेहरे की किताब कहते हैं, उसे मैं आपका अखबार कहता हूँ। इस अखबार की दुनिया में कुछ सचमुच के अखबार वाले भी हैं और इनमें अच्छे लोग भी हैं। अब कुछ कम अच्छे लोग कहाँ नहीं मिल जाते हैं। हर अखबार में कुछ चेहरे ऐसे दिख जाते हैं। यहाँ भी कुछ कम अच्छे चेहरे मुझे नजर आते हैं। हालाकि वे हमेशा कम अच्छे नहीं होते हैं। किन्हीं क्षणों में बहुत अच्छे भी होते हैं। जैसे खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है, उसी तरह ये भी सामने वाले को देखकर, कभी-कभी बहुत अच्छा काम छोड़कर कम अच्छा काम करने लगते हैं। असल में ये हिंदी के नये वाले हैं। ये आज के हिंदी वाले हैं। मैं समझता तो यही हूँ, ये हों या न हों, इनकी मर्जी है। ये अपनी मर्जी के मालिक हैं। यों कुछ-कुछ ये हिंदी के मालिक हैं या खुद को ऐसा महसूस करते हैं और अपनी ओर से जो कुछ हो सकता है, करते भी हैं। कभी-कभी बहुत अच्छा भी करते हैं। मेरा क्या मैं हिंदी की चींटी। मुझे तो अब तक पता ही नहीं था कि कोई सीआईए जी और केजीबी जी हैं और इन्होंने हिंदी की बड़ी सेवा की है, आचार्य रामचंद्र शुक्ल आज होते तो जाहिर है कि दुबारा हिंदी साहित्य का इतिहास लिख रहे होते और उसमें सीआईए जी और केजीबी जी की हिंदी सेवा का जिक्र जरूर करते। मुझे ठीक पता नहीं है कि इन दोनों जी लोगों ने हिंदी की बड़ी सेवा किस प्रकार की है। हिंदी के पाठक बनाए हैं, आलोचक तैयार किये हैं, कवियों को आगे बढ़ाया है। हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता को समृद्ध किया है ! किसी भवन या व्यक्ति को कुछ चंदा-वंदा दिया है। यह सब इसलिए कि मैं तह तक जाना चाहता हँू कि वास्तव में इन दोनों जी लोगों ने हिंदी का भला या बुरा किस तरह किया है ? हिंदी में बीती सदी में या नयी सदी में भ्रष्टाचार की गंगा में सैलाब लाने वाले भागीरथी यही हैं या दूसरे लोग ?
       आज हिंदी में पाठक नहीं हैं या कुछ हैं तो कविता या आलोचना उन तक पँहुच क्यों नहीं रही है ? आलोचना पढ़ी क्यों नहीं जा रही है ? जैसे तमाम गैर जरूरी सवालों से टकराने को आज की तारीख में जरूरी काम समझने की बेवकूफी अक्सर करता रहता हूँ। आज हिंदी की दुनिया में खासतौर से  रचना और आलोचना में भेड़ियाधसान क्यों है ? सब एक ही दिशा में , एक ही तरह ? अपनी कोई छाप नहीं। सब एक महासीरीज हो जैसे। जिसमें कुछ अच्छा है तो बहुत कुछ महाखराब है। यह हमारी चिंता में नहीं है। फिर नाम उसी का। मार्क्सवादी मुक्तिबोध की कविता में उनकी अपनी छाप नहीं है ? कला का विचारधारा से से कोई विरोध नहीं है। विचारधारा भी जब साहित्य की दुनिया में डग भरती है तो कला की आँख हमेशा खुला रहती है। कविता और आलोचना में आखिर सामूहिक विवाह का दृश्य क्यों है ? साहित्य जिस जनमन और गण की चिंता करता है, आखिर उनसे दूर ही नहीं, बल्कि बहुत दूर क्यों होता है ? कौन हैं जो साहित्य और समाज के बीच दूरियाँ बढ़ाने का काम करते हैं ? क्या ये साहित्य और जन के मित्र हैं ? उस जन के, जिसके नाम पर संगठन खड़ा करते हैं ? जिसके नाम पर किसी को सीआईए का एजेंट कहते हैं तो किसी को महाखराब संपादक ? एक युवा ने एक दिन पूछा भी कि कोई केजीबी के बारे में भी कुछ कहेगा ? आप केजीबी को कुछ कहिए या सीआईए से, इससे आज क्या फर्क पड़ता है, यह भी बताते रहिए कि इस मुद्दे से यह-यह भला होगा आज की तारीख में हिंदी का ? यह छिपाना बहुत मुश्किल है कि आज साहित्य में आपकी राजनीति क्या है ? आप हिंदी के लिए सचमुच बहुत चिंतित हैं कि कला के लिए कला की तरह सिर्फ बहस के लिए बहस करते रहते हैं ? हिंदी आपके रास्ते में कहाँ है ? आपके पैर में जूते की जगह भी उसे नसीब है या नहीं ? कहीं आप खुद साहित्य के किसी अंगद के पैर तो ढ़ूँढ नहीं रहे हैं ? 
      कई बार आप में तनिक-सी कमजोरी दिख जाती है। कमजोरी यह दिखती है कि आप जरूरत से नहीं बल्कि शैकिया भिडते हैं। जैसे हमारे यहाँ बहसुए होते हैं। सूत न कपास, जुलाहोें में लट्ठम-लट्ठ की तरह बहस पर बहस करते रहते हैं। बहस भी क्या, आँय-बाँय-साँय। एक संपादकजी भी अपनी उम्र और ओहदे को भूलकर युवा मित्रों से मल्लयुद्ध की मुद्रा में होते हैं। दिक्कत तब होती है जब कुछ संजीदा वरिष्ठ साहित्य की चिंता से जुड़कर ऐसी बहसों में शामिल हो जाते हैं और ईमान और साहस जैसे आज साहित्य के लिए दुर्लभ गुण रखने के बावजूद आँख मूँद की मार्क्सवाद का विरोध करने वाले लेखकों या संपादक इत्यादि से सम्मान की जगह दुख पाते हैं। एक वरिष्ठ मित्र ने अपने स्टेटस में लिखा है- 
           बुद्ध से आनंद ने पूछा था कि आप इस निरंतर गाली दे रहे व्यक्ति की बातों पर मुस्करा क्यों रहे हैं, और जवाब क्यों नहीं दे रहे हैं? इस पर भी बुद्ध ने फिर मुस्कराकर कहा, जिसके पास जो होगा वही तो देगा. अब यह तुम पर है कि उसे स्वीकार करो/न करो. कोई तुम्हें धन देना चाहता है, और तुम लेने से इन्कार करदो, तो वह धन कहां रहेगा? देने की कोशिश करने वाले के पास ही न? तो इसी तरह मैं इसक...ी गालियों को नहीं ले रहा हूं, तो ये भी इसी के पास लौटकर चली जाएंगी न? मैं इसीलिए मुस्करा रहा हूं, और मेरी मुस्कान के साथ इसका क्रोध बढता जा रहा है. खीझ भी. क्रोध और खीझ आत्मघाती होते हैं क्योंकि ये इसके तनाव और अवसाद को बढाएंगे.
तो मित्रों, पिछले पांच-सात दिनों में मुझे जो गालीनुमा ख़िताब("शोहदों" और "पंडों" का "गॉड फ़ादर", "फ़ेसबुक-बाबा", "बाबा फेलूनाथ") एक विद्वान सदाशयी संपादक और पिछले दिनों बहु-सम्मानित साहित्यकार ने दिए हैं, उन्हें मैं आनंद की मार्फ़त मिली सीख के अनुरूप, मुस्कराकर लौटा रहा हूं. कहने की ज़रूरत है क्या कि अब ये ख़िताब किसके खज़ाने की शोभा बढाएंगे ..
        आखिर इस पीड़ा के मायने क्या हैं ? बहस किसी को पीड़ा पहुँचाने के लिए या तर्क से किसी सुचिंतित ठिकाने पर पहुँचने के लिए ? या अपने को विद्वान प्रमाणित करने के लिए ? आपने अधिक रट रखा है या उद्धरणवमन की बीमारी है ? आप वही बात अपने ढ़ंग से कहेंगे तो आपकी बात को महत्व नहीं देंगे ? यह भय किसलिए ? इसी भय के सहारे आप हिंदी का भला करना चाहते हैं ? सीआईए ने यह छपवाया और केजीबी ने यह, क्या फर्क पड़ता है आज इस बात से ? इन गुप्तचर संस्थाओं के खतनाक गुप्तचरों से भी बड़े-बड़े गुप्तचर आज हिंदी की दुनिया में काम कर रहे हैं। ये गोरखपुर से दिल्ली या दिल्ली से सिद्धार्थनगर की या ऐसे ही तमाम रूट की गुप्तयात्राएँ करते रहते हैं। ये अपने जनपद के स्वभिमानी लेखकों के साहित्यिक कत्ल की साजिश करते हैं। अपने जनपद से गद्दारी करते हैं। करने के नाम पर सुरा और सुरा या अभूतपूर्व चम्पी से प्रसन्न होकर हिंदी की दुनिया में अनेक भ्रष्टाचार करते हैं। ये बहसुए इनका विरोध नहीं करते हैं। इनके विरोध में डर है, किसी पुरस्कार के कटने का चाहे किसी कार्यक्रम में जाने के टिकट से वंचित होने का। इसलिए सीआईए का विरोध करते हैं कि इससे इनके साहित्य के लक्ष्य में कोई जोखिम नहीं है। पुरस्कार और कार्यक्रम का टिकट दोनों तरफ है। क्या वाम, क्या गैर वाम। दिक्कत यह है कि बहसुए साहित्य की सत्ता से टकराने और बहस करने का जोखिम नहीं उठाते। राजनीति की सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध का परचम खूब लहराते हैं पर जैसे ही सामने साहित्य की सत्ता आ जाती है, प्रतिरोध का परचम झुक जाता है। बहसुए की व्यंजना हाँकने में हैं। ये हाँकते भी खूब हैं। गैसवाले गुब्बारे की तरह आसमान में खूब ऊपर उड़ते हैं। एक नन्हा-सा काँटा मुश्किल पैदा कर देता है। 
       बहस करने वाले भी क्या-क्या बहस करते हैं। कुछ गाली-गलौज करते हैं तो कुछ गाली-गलौच। च और ज में फँसी रहती है इनकी जान। हिंदी की जान किसके पंजे में फँसी है, इससे इन्हें कोई मतलब नहीं। हिंदी की जमीनी दिक्कत क्या है, इससे इन्हें कुछ नहीं लेना-देना। मेरे कहने का मतलब यह नहीं कि आप प्राध्याकीय आलोचना की तरह प्राध्यापकीय बहस मत कीजिए। वह भी कर लीजिए कभी-कभी। कभी-कभी जमीनी मुश्किलों की ओर भी देखिए। एकदिन मैंने भी भाषा से जुड़ा एक सच्चा चित्र स्टेटस में दिया है- इस हिंदी पर भी विचार करें...
     उच्चशिक्षा से जुड़े हिंदी के एक शिक्षक की भाषा का उदाहरण देखें। यह हिंदी को समृद्ध करने की कोशिश है या उसे नुकसान पहुँचाने का काम है ? यह आज की तारीख में लिखा निमंत्रण पत्र है या मारणमंत्र ? यह कौन-सी हिंदी है ? लोकतांत्रिक हिंदी है ? आचार्य जब ऐसी हिंदी लिखेंगे और बोलेंगे तो विद्यार्थी कैसी हिंदी लेकर घर लौटेंगे ? भाषाविमर्श में लगे हुए मित्र जरूरी समझें तो इस हिंदी पर भी विचार करें...
‘‘                आमंत्रण
लोकतंत्री धाम का निधान दिनांक...को किया जाना है। इसकी सँझवाती और संगमनी उछाह में आप सादर आमंत्रित हैं। इस अवसर का पूतान्न पाने में हम आपका साथ चाहते हैं।
                               निवेदक...
समयः      स्थानः                                    

कई मित्रों की टीप के बाद लिखा-हिंदी की इस दुर्दशा के पीछे शिक्षक तो हैं ही, लेखक और संपादक भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। पिछले दिनों एक शिक्षक और एक संपादक भाषाविमर्श के नाम पर गाली-गलौज और गाली-गलौच करते रहे। जिम्मेदार होने की जगह जिम्मेदार और जिम्मेवार की कब्र खोदते रहे। उन्हें इस बात की चिंता नहीं थी कि हिंदी की जान कहाँ अटकी है। जिनकी वर्तनी शुद्ध नहीं है, वह बाद में शुद्ध कर लेंगे, पर आप उनका क्या करेंगे जो किसी शब्द या अक्षर की टाँग नहीं तोड़ रहे हैं, बल्कि प्रोफेसरी, लेखकी और संपादकी के घोड़े पर सवार होकर अपनी दुधारी तलवार से सीधे भाषा का गला काट रहे हैं। कुछ प्रोफेसर, लेखक और संपादक अपने को झूठमूठ में बड़ा दिखाने के लिए विमर्श के नाम पर बौद्धिकता का आतंक खड़ा करते हुए एक नकली, अति पेंचदार और बेस्वाद भाषा से हिंदी के जीवन को नुकसान पहुँचा रहे हैं। दिक्कत यह कि आज भाषा और साहित्य के जीवन की चिंता लेखकों और संपादकों को कम है, अपने जीवन को पुरस्कार और पद से खुशहाल बनाने की चिंता अधिक है। भाषा के जीवन को बचाने से हिंदी के पाठक बचेंगे। पाठक बचेंगे तो साहित्य बचेगा।
   बहसुए मित्रो की चिंता में हिंदी साहित्य है या विचारधारा है या लेखक संगठन है या अन्य गिरोह है या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा ? आखिर कमलेश जी आज की हिंदी कविता के पथप्रदर्शक हैं क्या ? कि अशोक जी  हिंदी साहित्य के भगवान हैं ? कि ओम  जी सरस्वती के संपादक हैं ? एक गैर जरूरी बात को लेकर इतना हंगामा ? सीआईए... सीआईए...सीआईए...ठीक है, वह एक बात है पर आज की तारीख में जरूरी बात है ? ये महानुभाव हिंदी साहित्य को 99 वर्ष के लिए सीआईए को लीज पर दे रहे हैं क्या ? अरे छोड़ो उस एक पंक्ति को। ये देखो कि कहीं कोई तुम्हें इस्तेमाल तो नहीं कर रहा है, अपना उत्पाद बेचने के लिए ? इस चर्चा-कुचर्चा में किसे अधिक फायदा है ? यह देखो। अगर कोई युवा यह सोचता है कि इससे प्रसिद्धि मिलेगी तो ध्यान देना चाहिए कि प्रसिद्धि भी एक दिन मर जाती है, रचनाएँ ही रहती हैं। रचना पर ध्यान दें। आलोचना पर ध्यान दें। हिंदी पाठक पर ध्यान दें। साहित्य के भ्रष्टाचार पर ध्यान दें। विचारधारा पर भी ध्यान दें, मैं मना नहीं कर रहा हूँ। क्या एक छोटा-सा प्रश्न नहीं बनता है कि आपकी विचारधारा जन की है तो चिंता अभिजन की क्यों ? सीआईए का इस तरह का विरोध बचकाना है, करना है तो हिंदी साहित्य के बड़े पूँजीपतियों का विरोध करो। आपस में नाहक मत लड़ो। अच्छे या बुरे जैसे भी हो , हिंदी वाले हो भाई। ये देखो कि तुम्हारा या तुम्हारी विचारधारा वाला साथी कहाँ कमजोर पड़ रहा है, उसकी मदद करो। उसे बहादुर बनाओ। हिंदी के जन के लिए सोचो और लड़ो। हिंदी के लिए लड़ो।


























                                                                  


15 टिप्‍पणियां:

  1. सही दिशा में सही बात कही आपने...

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  2. आपसे ऐसे ही सार्थक पहल की उम्‍मीद थी.....

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  3. थोड़ी देर से पर सार्थक व सही दिशा देनेवाली पहल

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  4. बड़ी चिंताओं की ओर सबका ध्यान दिलाया है आपने. आपकी पहल और बात, दोनों में दम है.

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