-गणेश पाण्डेय
पृथ्वी पर
एक विशाल काली छाया
उतर आयी है पास और पास
बरगद पर पीपल पर
मंदिर पर मस्जिद पर चर्च पर
ऊंची-ऊंची
बहुमंजिली इमारतों से लेकर
फुटपाथ की गुमटियों पर
झोपड़ियों पर
वायुयान पर साइकिल पर
मिसाइल पर फाउंटेन पेन पर
माल पर सब्जी की दुकान पर
नाई के सैलून पर आटाचक्की पर
अमरीका पर
इटली पर स्पेन पर जर्मनी पर
ईरान पर पाकिस्तान पर
दिल्ली पर कोलकाता पर
मुंबई पर श्रीनगर पर
राजस्थान पर मध्यप्रदेश पर
उत्तर प्रदेश पर बिहार पर
नेपाल पर बांग्लादेश पर
चीन पर जापान पर
देश पर विदेश पर
धरती पर आकाश पर
काली से भी काली छाया
महा से भी महा काली छाया
बूढ़े अधेड़ जवान बच्चे
स्त्री पुरुष किन्नर सब पर
छायी है यह अनाहूत
अप्रिय अवांछित
छाया
कोई जादू है इसके पास
सबको फांस लिया अपने पाश में
काला जादू है किसी जादूगर का
जादूगर अदृश्य है छाया दृश्य है
अनुभवजन्य है
कोई जानकार
माथे का ताप देखकर बता सकता है
छाया अमुक शरीर के भीतर है
उतर रही है छाया उसके गले से
उसके फेफड़े में शनैः शनैः
हवाईअड्डे पर रेल्वे स्टेशन पर
बस अड्डे पर गायिका के बड्डे पर
अस्पताल की सफेद चादर पर
मिट्टी के फर्श पर संगमरमर पर
छाया का साम्राज्य है
यह छाया जितनी प्रकट है
उतना राज़ है काला जादू है
कोई कहता है
शी जिनपिंग का कालाजादू है
वुहान से निकलती है यह प्रेतछाया
पूरी दुनिया पर छा जाती है
बीजिंग शंघाई को छोड़ देती है
आख़रि शी उसका कौन है
शी कहता है यह कालाजादू
डोनाल्ड ट्रंप का है
पूरी दुनिया हलकान है
इन दोनों की शरारतों से
दुनिया बंद है
किसी शहर और मुहल्ले की तरह
एक छोटी-गुमटी की तरह
माचिस की डिबिया की तरह बंद
एक विश्वव्यापी कर्फ़्यू है इमरजेंसी है
भय की एक पूरी दुनिया है
पता नहीं यह काली छाया
कहां-कहां अपने विशाल पग धरेगी
कहां-कहां कोमल उंगलिया फिराएगी
महासुंदरी के घने लंबे केशों में
उसके रक्ताभ कपोलों पर अधरों पर
किस सुंदरी के प्राणप्रिय पतिदेव को
सहसा कहीं से खींचकर
अपने तम के पाश में सुला लेगी
अपने अरूप रूप से बेसुधकर
किसी सुगंध की तरह उसके सांसों में
बस जाएगी
किसी पिता को
राशन चाहे सब्जी की दुकान पर
पकड़ लेगी कोई भी रूपधर
चाहे बालरूप धरकर
चलती चली आएगी उंगली पकड़कर
किसी के घर
किसी के भाई की मोटरसाइकिल पर
बैठकर चाहे उसकी कलाई पर
राखी की तरह चिपक कर
बेटी हो या बहन पत्नी हो या मां
कोई उसे अपनी आंखों से
देख नहीं पाएगी मति मारी जाएगी
निश्चिंत हो जाएगी
उसे पता ही नहीं चलेगा
कि थैले के ऊपर गोभी पर मूली पर
मिठाई के डिब्बे पर बर्फी पर बैठकर
कौन आ गया है उसके घर
किसी को मालूम नहीं
किसी समारोह में किसी भीड़ में
किसी जुटान में किसी के संग
कब किसकी देह से कूदकर
बैठ जाएगी किस पर
आधा दृश्य और आधा अदृश्य
इस काली छाया को कभी
चश्मा लगाकर भी
कोई देख नहीं पाएगा
कभी नंगी आंखों से आप से आप
कोई छाया आसपास दिख जाएगी
चलती-फिरती नाचती
कानों के पास भनभनाती
एक बुजुर्ग के कानों में
काली छाया की यह गूंज बढ़ते-बढ़ते
पृथ्वी के महासन्नाटे को चीरती हुई
विस्फोट में बदल जाती है
पूरे ब्रह्माण्ड में यह आवाज़
बादलों
और बिजली की गड़गड़ाहट की तरह
गरज उठती है- कोरोना कोरोना कोरोना
सूर्य-चंद्र और दूसरे ग्रह-उपग्रह
सब चकित सारे देवी-देवता स्तब्ध
ओह पृथ्वी महासंकट में है
किसी के पास नहीं है कोई उपाय
पृथ्वी के किसी धर्म किसी ग्रंथ
किसी के पास नहीं है
विपदा का दूर करने का कोई मंत्र
सारे मंदिर-मस्जिद-चर्च-गुरुद्वारे बंद
बड़े-बड़े धर्माचार्यों के फूले हैं
हाथ-पांव
दिन हो रात हो सब एक जैसा है
टीवी के एक-एक चैनल पर
एक-एक एंकर के लिपे-पुते चेहरे पर
काली छाया की एक मोटी परत है
महिलाओं एंकर की लिपिस्टिक
होती है लाल और दिखती है काली
और काजल पर काली छाया की छाया है
टीवी के सामने बैठे बूढ़े
समाचार नहीं मृत्यु देखते हैं
पृथ्वी पर महामृत्यु का नंगानाच देखते हैं
हर चीज में
चील की तरह मंडराती काली छाया देखते है
पूरी दुनिया
एक विशाल शवगृह में बदल गयी है
मृत्यु का एक महाठंडाघर जिसमें
बैठकर यह काली छाया खाएगी
एक-एक शव नोच-नोच कर
दुनिया के किसी दारोगा के पास
इतनी हिम्मत नहीं होगी कि उससे पूछे
यह क्या कर रही है काली बुढ़िया
अभी और कितने शव चाहिए तुझे
कह दो
कह दो कह दो दुनिया से कह दो
कोई नहीं है अब यहां महाशक्ति
सब मिट्टी के खिलौने हैं
पुतले हैं पुतलें सारे एंटीमिसाइल
नहीं है कोई लड़ाकू जहाज और टैंक
जो रोक सके काली छाया की आंधी
बच्चो और युवाओ
इस समय पृथ्वी पर सबसे भयभीत हैं बूढ़े
इसलिए नहीं कि काली छाया को
पके हुए देह बहुत प्रिय है
उन्हें खा जाएगी
उन्हें डर है कि उनके बहाने
उनका घर देख लेगी
उनके बच्चों को देख लेगी
बूढ़े
बहुत से बहुत डरे हुए हैं बच्चो
वे अपने नन्हे-नन्हे पोतों को
उठाकर गोद में नहीं ले रहे हैं
दिल बहुत मचलता है
उनके नन्हें होंठ चूम नहीं पा रहे हैं
इसलिए कि काली छाया उनकी खोज में
तमाम समुद्र तमाम आकाश को छानकर
एक कर रही है
एक दादी है
जरा-सा छींक आ जाए तो इस उम्र में
पूरे घर में पोंछा लगाने लगती है
बच्चों को खुद से दूर भगाने लगती है
काम वाली बाई को हटा दिया है
दूध लेने बाहर नहीं जाती है
अपने बूढ़े को भी बिस्तर पर
दूसरी करवट सोने के लिए कहती है
यह कैसी काली छाया है
अभी खाएगी कितने घर
कब जाएगी अपने देश अपने घर
कहां है इसका घर
क्या वुहान है इसका घर
जहां भी हो इसका घर
जाए अपने घर
दादी कहती है चाहे अपने
शी जिनपिंग के सिर पर
चाहे किसी समुद्र में फाट पड़े
टीवी तो नहीं फटती है
लेकिन टीवी के सामने बैठे बुजुर्गों का
रोज़-रोज़ कलेजा फट रहा है
जो बच्चे घर पर हैं उनके लिए भी
जो बाहर हैं उनके लिए तो और भी
बड़ी बिटिया किस हाल में होगी
छोटी कैसे होगी
सबकी बेटियां और बेटे कैसे होंगे
देश बंद है
जहाज बंद है रेल बंद है
आना-जाना सब बंद है फिर भी
कुछ मज़दूर हैं मजबूर हैं
जिनके पास कोई ठिकाना नहीं
चल पड़े सब पैदल अपने घर
अपने गांव
शायद गांव की गोद बचा ले उन्हें
इस काली छाया से
सरकारें जाग रही हैं
खजाने की तोप का मुंह पूरा खोलकर
खाकी वर्दी
और सफेदपोशाक की फौज बनाकर
सड़कों और अस्पतालों में
काली छाया से
सफेद तरीके से रोज लड़ रही हैं
ये तो काली छाया है छद्मयुद्ध कर रही है
छिप-छिपकर पीछे से
किसी का भी कालर पकड़कर खीच ले रही है
दूसरे के कंधे पर बंदूक रखकर चला रही है
धोखा देकर किसी भी देश में किसी भी राज्य में
किसी भी घर में घुस जा रही है
एक
पैंतालीस और चालीस साल का
बेहद ख़ूबसूरत जोड़ा
काली छाया की गिरफ्त में
नाउम्मीद होकर
सबके सामने
पृथ्वी का श्रेष्ठ चुंबन ले रहा है
अपने जीवन को चूम रहा है
अपने प्रेम को चूम रहा है
पृथ्वी को चूम रहा है
एक
साठ साल का बुज़ुर्ग
काली छाया की मृत्युकारा से
पांच मिनट का पेरोल लेकर
अपने घर के गेट के सामने
कांच की दीवार के उस पार
अपने भरे-पूरे परिवार को
निहार रहा है
छाया का
न कोई धर्म है न ईमान
अभी-अभी इस क्रूर छाया ने
एक अड़तीस साल के युवा को
खींचकर अपना आहार बना लिया है
जिसकी बीवी रात के भोजन पर
उसकी प्रतीक्षा कर रही है
और उसकी नन्ही बच्ची
इंतजार करते-करते सो गयी है
जबकि छाया को ऐसा नहीं करना था
उस युवा के बुजुर्ग पिता कभी भी
छाया का भोजन बनने के लिए
प्रस्तुत थे
एक स्त्री
अपनी चूड़िया तोड़ रही है
अपना सिर दीवार पर मार रही है
अटूट विलाप कर रही है
पर्वत रो रहे हैं नदियां आंसू बहा रही हैं
फूले हुए सुर्ख़ गुलमोहर
और पीले अमलतास रो रहे हैं
गुलाब असमय अपनी टहनियों से
मुरझाकर गिर रहे हैं
प्रकृति रो रही है
काली छाया हंस रही है
डायनासोर की तरह पृथ्वी को
रौंद रही है
दर्प में चूर निर्वस्त्र हो रही है
वीभत्स हो रही है
कई राजाओं महाराजाओं
और राष्ट्रध्यक्षों के सिर पर पैर रखकर
अहंकार में नाच रही है
यह विहसना ठीक नहीं है छाया
पृथ्वी से यह क्रूरता ठीक नहीं है छाया
मनुष्य से यह शत्रुता ठीक नहीं है छाया
यह एक ऐसा युद्ध है
सभी देशों की सरकारें एक साथ जाग रही हैं
और इस काली छाया के नाश के लिए
सारा विश्व एक है
घर-घर में
जितना भय है उससे ज़्यादा रोष है
दुनियाभर की असंख्य मांएं विकल हैं
दुनियाभर के असंख्य पिताओं के सीने में आग है
दुनियाभर के असंख्य बेटे
कुछ सोच रहे होंगे कुछ कर रहे होंगे
यह काली छाया आज है कल नहीं रहेगी
नहीं रहेगी नहीं रहेगी नहीं रहेगी
पृथ्वी रहेगी पृथ्वी मां है सबकी
इसी धरती के असंख्य लाल जुटे होंगे
अपनी मां को बचाने के काम में जी-जान से
कोई दौड़कर बांस काट रहा होगा
कोई बंदूक में गोली भर रहा होगा
कोई म्यान से तलवार निकाल रहा होगा
कोई काली छाया का झोंटा पकड़ने के लिए
अपनी भुजाओं को तैयार कर रहा होगा
कोई काली छाया को वश में करने के लिए
किसी प्रयोगशाला में कोई प्रयोग कर रहा होगा।
- गणेश पाण्डेय
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चांदी की थाली में झिलमिल मुखड़ा
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थोड़े से
कुछ युवा दिन मिल जाएं
तो हो जाना चाहूंगा बिल्कुल
तुममय स्नेहसिक्त अद्वितीय अनुरक्त
क्या
हो पाऊंगा
तुम-सा कोमल
स्पंदित तरल मधुमय शीतल
सांगीतिक विद्यापति का गान
कहां से लाऊंगा
दीर्घग्रीवा और उसके चहुंओर
काले से भी काले घुंघराले ख़ूब घने
लंबे से भी लंबे स्निग्ध सुवासित केश
छाप पाऊंगा जैसे तुम
आकाश को संध्या की तरह नित
छाप लेती हो कोई राग गाती हो
ब्रह्मांड में
उन्मीलित विस्फारित
पलकों वाली चितवन को केश से
चाहे मृदुल हथेलियों से ढांप पाऊंगा
क्या फिर से
नदी के जल में तैरती
चांदी की थाली में झिलमिल मुखड़ा
गुजरती हुई रेल से देख पाऊंगा
रेल की खिड़की से
रेल की छुक-छुक से भी मीठी आवाज में
तुम्हें पुकार पाऊंगा उसी पुराने पुल से
तुम्हे संबोधित करके
तुम्हारे अधरों पर एक उंगली रखकर
तुम्हारे दोनों कर्णफूल आंखों से छूकर
फिर से
प्रेम कविता लिखना चाहूं तो
चाहकर भी क्या लिख पाऊंगा
तुम्हें पूरा का पूरा नख से शिख तक
तुम्हारी आत्मा से फूटता
भाषा का कलकल करता वह झरना
कहां से लाऊंगा पता नहीं समय का
कितना पानी बह गया होगा
इन खुरदुरी उंगलियों से
असंख्य बेवाई फटे पैरों से दौड़कर
तुम्हारे धवल मसृण द्युतिमान तीव्रगति
शशक जैसे शब्द पकड़ कैसे पाऊंगा
फिर छूट जाऊंगा
तुम्हारे आंचल की छोर से
खुल जाएगी प्रीत की गांठ उसी तरह
जीवन की इस सांझ में
गोधूलि से धुंधले हृदय के आकाश में
आए बिना चली जाओ चली जाओ
मेरे युवा दिनों की तुम।
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आलोचक का कर्तव्य 1
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आलोचक को
पहले अपनी आंख धुलना चाहिए
आलोचक को
फिर अपना चश्मा साफ करना चाहिए
तब रचना को सतह के ऊपर कम
और नीचे से ज्यादा देखना चाहिए
फिर लेखक को उलट-पलट कर
आगे से और पीछे से देखना चाहिए
जुगाड़ी लेखक की किताब हो तो
ठीक से चीर-फाड़ कर देखना चाहिए
कुत्ते की तरह पूंछ हिला-हिला कर
आलोचना कभी नहीं करना चाहिए
आज भी कुछ लोग हैं जिनकी तरह
निडर आलोचना लिखना चाहिए।
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आलोचक का कर्तव्य 2
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चापलूस कवियों को
कान के पास नहीं आने देना चाहिए
और सिर पर चंपी करके हरगिज
खुश करने का मौका नहीं देना चाहिए
साष्टांग दण्डवत वाले कवियों को
चरणरज से काफी दूर रखना चाहिए
देखते रहना चाहिए लेकर जाने न पाएं
कहीं पैर ही उठाकर लेकर न चले जाएं
आलोचक को अपने समय के प्रसिद्ध
कवियों के रथ के आगे-पीछे नहीं चलना
चाहिए चंवर नहीं डुलाना चाहिए
जयकार नहीं करना चाहिए
रथ को गुजर जाने देना चाहिए
धूल बैठ जाने देना चाहिए
फिर उनकी कृतियों को
ईमान की रोशनी में
पढ़ना चाहिए
आलोचक को
कवि की नौकरी नहीं
अपना काम करना चाहिए
अपने लिखे पर अपने अंगूठे का
निशान लगाना चाहिए
आलोचक को
नचनिया कवियों की भीड़ में
खुद नचनिया आलोचक नहीं होना चाहिए
आलोचना को अपने साहित्य समय का
मनोरंजन नहीं संग्राम समझना चाहिए।
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आलोचक का कर्तव्य 3
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आलोचक को
मठों का कुत्ता नहीं बनना चाहिए
साहित्य के भ्रष्ट किले और गढ़
तोड़ना चाहिए
आलोचक को
साहित्य को पुरस्कार के वायरस से
बचाना चाहिए दूर करना चाहिए
लिखने से पहले बीस सेकेंड
साबुन से हाथ जरूर धुलना चाहिए
आलोचक को
फरमाइश पर कुछ भी
लिखने से बचना चाहिए
लिखे बिना जिंदा न रह पाओ
तो अपनी बेचैनी कहो
आलोचकों के लिए
सबसे जरूरी बात यह है
कि हिंदी के बागी लेखकों के साथ
कुछ दिन रहो लेखक किसे कहते हैं
देखो फिर आलोचना लिखो।
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मनुष्य
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ये राजपाट
धरा का धरा रह जाएगा
सारा विज्ञान और विचार
किसी काम नहीं आएगा
दुनियाभर के धर्माचार्यों
दार्शनिकों और लेखकों से
कुछ नहीं हो पाएगा
जब मनुष्य के भीतर का
मनुष्य ही मर जाएगा।
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पिद्दी लेखकों का मेला
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अपने वक़्त के
हिंदी के सभी लेखकों की जाति
उलट-पलट कर देख चुका हूं
बहुत थोड़े से लेखक हैं
गिने-चुने हैं जिन्हें गिनता हूं
जिनकी इज़्ज़त करता हूं
बाक़ी सब के सब
नाम-इनाम के नाबदान में
बहने वाले हिंदी के कीड़े-मकोड़े हैं
लेखिकाओं के बारे में
कोई सख़्त टिप्पणी नहीं करूंगा
कम अच्छी हों तो भी बहन मानूंगा
भाई होने के नाते जरूर कहूंगा
ख़ुद को ठीक करना कुतर्क मत करना
साहित्य को सिंगार-पटार मत समझना
आज हिंदी में
पिद्दी लेखकों का मेला है जिसे देखो
अमर होने का खिलौना ख़रीद रहा है
अबे कुछ करके जाना चाहता है
तो बूढ़ी दादी हिंदी के लिए लोहे का
चिमटा ख़रीद
आख़रि मैं भी तो एक दिन
हिंदी के कार्यकर्ता के रूप में जाऊंगा
देखो मुझमें रत्तीभर यशेषणा है कहीं।
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हाथी और बच्चा 1
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बच्चा
बड़ी मेहनत से
हाथी पर बैठा था
उसे हाथी से
बल और छलपूर्वक
उतार दिया गया
बच्चा
रूठकर
गधे पर बैठ गया
तो बच्चा
फासिस्ट हो गया
और हाथी से उतारने वाले
घुटे-घुटाए दो बूढ़े पक्के
मार्क्सवादी हो गये!
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हाथी और बच्चा 2
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हाथी से
उतार दिए गये बच्चे को
क्या करना चाहिए था
हाथी के पैर के नीचे
लेट जाना चाहिए था
हाथी के पीछे-पीछे
जीवनभर
ताली बजाना चाहिए था
या बुड्ढों को मरते दम तक
राजनीति में ऐयाशी
करने देना चाहिए था
या गधे पर बैठकर
जनता के पास जाना चाहिए था
राजनीति के गधों का अहंकार
तोड़ना चाहिए था
या हाथी से
उतार दिए गये बच्चे को
फासिस्ट कहने वालों को
हिंदी का गधा कहना चाहिए था।
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हाथी और बच्चा 3
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हाथी से उतारे गये
बच्चे को मत कोसो
अक्ल है तो महल को
कुतर-कुतर कर
जर्जर बनाने वाले
पचहत्तर के
चूहों को देखो
महल को बचाना है
तो मदहोश रानी को
युवराज और राजकुमारी के
कारनामों को देखो
अपने हाथ से अपना महल
ढहाने वालों को देखो
भाग्यशाली हो
क्रांतिकारियो अपनी आंख से
व्यावहारिक राजनीति में
अपना पक्ष ढहते हुए देख रहे हो
और कुछ नहीं कर पा रहे हो
राजघराना मदहोश है
और तुम उस पर फिदा हो
काश पहले गाली-गलौज
और चिल्लाना छोड़कर
अपने राजनीतिक मोर्चे को
मजबूत कर पाते।
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हाथी और बच्चा 4
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हाथी से
उतार दिया गया बच्चा
राजनीति का ज्योतिरादित्य है
हिंदी का कोई लेखक नहीं
हिंदी के
असंख्य ज्योतिरादित्य
नित आलोचकों संपादकों
अकादमियों के अध्यक्षों
पुरस्कारप्रदाताओं मठाधीशों
और विभागाध्यक्षों का
पृष्ठप्रक्षालन करते-करते
हाथी के पीछे-पीछे ताली बजाते
हो-हो करते नाचते-गाते
अंत में दांत चियारकर
मर जाते हैं
राजनीति की दुनिया में
जोखिम है संघर्ष है साहस है
साहित्य की दुनिया में दिल्ली से
गोरखपुर तक सब लिबलिब है
हां हां लिबलिब है लिबलिब है।
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हाथी और बच्चा 5
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मैं भी कभी
साहित्य में बच्चा था
मुझे भी इसी गोरखपुर में
कान पकड़कर हाथी से
उतार दिया गया था
फिर भी उतार दिया जाना
मेरे लिए रत्तीभर बुरा नहीं था
रंज का सवाल ही नहीं पैदा होता था
बुरा तो तब लगा गुस्सा तो तब आया
जब मेरी जगह मेरे सामने ही
हिंदी की हाथी पर
हिंदी के सचमुच के गधों को
बैठा दिया गया था
मैंने कुछ नहीं कहा
कहा भी तो खुद से सिर्फ इतना
कि छोड़ो गधों की पार्टी को
और आगे बढ़ो
अपने वक्त के
किसी ऊंट की तरफ नहीं देखा
किसी घोड़े की तरफ नहीं देखा
हिंदी के किसी गधे की तरफ देखने का
कोई सवाल ही नहीं पैदा होता था
हिंदी के किसी चूहे से भी नहीं कहा
कि मेरा तो नाम ही गणेश है मुझे
अपनी पीठ पर बैठा लो
खुद पर भरोसा किया
अपनी भुजाओं पर भरोसा किया
अपने पैरों पर भरोसा किया
और चल पड़ा हिंदी के बीहड़ में
चलता रहा चलता रहा
तमाम साल चलता रहा
पैदल
इतना आगे निकल आया हूं
कि पीछे मुड़कर देखने पर
न किसी का हाथी दिखता है
न हाथी पर बैठा हुआ
कोई शख्स दिखता है।
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दोस्त 1
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वह
मेरा दोस्त है
और मेरे दुश्मन का
ज़रख़रीद ग़ुलाम है
ओह
मेरे ईश्वर
इस जीवन में मुझे
क्या-क्या देखना पड़ेगा।
---------
दोस्त 2
---------
मेरा
एक दोस्त
कामयाब दलाल है
उसके पास काफी सम्पत्ति है
फिर भी
वह मेरी ज़मीन को
गिद्ध की तरह नोच-नोच कर
खा जाना चाहता है।
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दोस्त 3
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मेरे
कुछ दोस्त कवि हैं
कुछ कथाकार हैं कुछ आलोचक
शुरू में
सब साथ थे प्यार करते थे
आना-जाना मिलना-जुलना था
जैसे ही मैं एक साथ
तीनों हुआ मुझमें सींग निकल आए
और वे सींग से दूर रहने लगे हैं।
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दोस्त 4
---------
मेरे
कुछ दोस्त
बहुत से बहुत भोले हैं
कोई भी कुछ भी
उनके कान में कहभर दे
वे कान में कही गयी हर बात को
आंखों देखी समझ लेते हैं
मेरे
ये लोकल दोस्त
लोकल ट्रेन से भी लोकल हैं
बिछी हुई पटरियों पर
दौड़ते रहने के अलावा कुछ और
कर ही नहीं सकते।
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दोस्त 5
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होली में
आज एक-एक कर
दोस्तों की याद आ रही है
असल में
मेरे जितने भी दोस्त हैं
हैं और नहीं हैं
कह सकते हैं
सबके सब मित्रता की खोल में
डरे हुए लोग हैं
कह सकते हैं
केंचुए हैं लोमड़ी हैं
दोस्त नहीं किसी के जासूस हैं
मेरे दोस्त
तब भी वही थे आज भी वही हैं
तब तरह-तरह के रंग पोत लेते थे
अब उनके सारे रंग उतर चुके हैं।
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झूठ बोलना छोड़ दो
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न मंचों पर
कविता पढ़ने के लिए
जुगाड़ करो
न कभी इनाम के लिए
नाक रगड़ो न क़ुबूल करो
सब ठीक हो जाएगा
तुम्हारी
दुआ क़ुबूल हो जाएगी
वतन ख़ुशहाल हो जाएगा
तंगनज़री दूर हो जाएगी
बस
तुम सुधर जाओ
आदमी बन जाओ
गैंग-फैंग से
फ़ौरन से पेश्तर
नौ दो ग्यारह हो जाओ
झूठ बोलना छोड़ दो तो
ये नेता-फेता चुटकियों में
सुधर जाएंगे।
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गलत कबीर थे कि तुम हो
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पूरब और पश्चिम
चाहे उत्तर और दक्षिण
दंगे में दोनों तरफ से पत्थर
क्यों चलते हैं
आखिर
एक तरफ से पत्थर
और दूसरी तरफ से लाल गुलाब
क्यों नहीं चलते
हद है
खून के प्यासे दोनों तरफ हैं
बस शुरू होने की देर है
एक शुरू होगा तो दूसरा
आप से आप शुरू हो जाएगा
जहर
तो दोनों तरफ के दिमागों में
कूट-कूटकर भरा गया है
तुम्हीं बताओ कबीर गलत थे
कि तुम गलत हो।
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शिक्षक
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एक कक्षा में
अगर दो गुट हों
तो दोनों बदमाशी करते हैं
एक शिक्षक
दोनों पर नजर रखता है
सब पर नजर रखता है
वक्त आने पर
दोनों को मुर्गा बनाता है
कभी अलग-अलग
कभी साथ-साथ
कबीर की तरह
दोनों की पीठ पर
ईंट पर ईंट भी रखता है
आज
एक लेखक को भी
यही सब करना होता है
लेकिन वह कर नहीं पाता है
बेचारा
कभी पार्टी की
तो कभी लेखकसंघ की
ईंट ढोता है।
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दंगाई
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दंगाई
आमतौर पर
आदमी नहीं होता है
किसी गैंग का आदमी होता है
किसी पार्टी का कारकुन होता है
उसकी पीठ पर किसी का हाथ होता है
सात चूहे खाकर
एक से एक पार्टियां
बिल्ली की तरह छुपी होती हैं
पर्दे की आड़ में
वहीं से मुहैया कराती हैं
गंदे से गंदे विचार बंदूक पेट्रोल वगैरह
लेखक सब जानते- बूझते हुए
इन्हीं पार्टियों की चाकरी करते हैं
एक को दंगाई कहते हैं दूसरे को
अल्ला मियां की गाय
इस तरह तो
भारत कभी दंगामुक्त नहीं होगा
क्या राजनीति ने दोनों तरफ
दंगाई सांड़ पैदा नहीं किये हैं
तो क्या ये दंगाई आसमान से
फाट पड़े हैं।
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काश
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लेखकों को चाहिए
हाथ जोड़कर सभी पार्टियों से
नत मस्तक होकर विनती करें
हे पार्टियो
अब बस करें
देश को एक जून खाकर
एक चुल्लू पानी पीकर
टूटी-फूटी खाट पर चैन से सोने दें
अपना खेत-खलिहान
मेहनत-मजदूरी करने दें
नंग-धड़ंग बच्चों प्यार करने दें
एक जोड़ी कपड़े में इज्जत से
बिटिया को विदा करने दे
हे पार्टियो
जनता को ईश्वर-अल्ला
हिंदू-मुसलमान के नाम पर
मारकाट में न फंसाएं
देखना
कहीं तुम्हारी सत्ता की भूख
जनता तो जनता
देश को न खा जाए
काश
देश के लिजलिजे लेखक
इतनी-सी सीधी-सादी बात को
समझ पाएं और उठ जाएं।
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बेचारे थोड़े से लोग
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ज्यादातर लोग
कट्टर सेकुलर हैं
उनकी आंखें दिनरात
सिर्फ फासिस्ट देखती हैं
ज्यादातर लोग
कट्टर फासिस्ट हैं
उनकी आंखें दिनरात
सिर्फ सेकुलर देखती हैं
बेचारे
थोड़े से लोग हैं क्या करें
उनकी आंखें दिनरात
दोनों को देखती हैं।
-----------
विडम्बना
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इसे
न गाकर हराया जा सकता है
न सड़क बंद कर हराया जा सकता है
न विश्वविद्यालयों और गोष्ठियों में
गालियां देकर हराया जा सकता है
जो भी कुर्सी पर बैठता है
उसकी चमड़ी मोटी हो जाती है
न इसे साबुन धुल सकती हैं
न कलाई पर राखी बांधकर
इसे हराया जा सकता है
बहनो
और बच्चो और बच्चों के चच्चो
इसे सिर्फ चुनाव में हराया जा सकता है
और यह काम बहुत मुश्किल है
जो तुम्हे़ पीछे से
साथ देने की बात करते हैं
और सामने नहीं आते
उन्हें तुम्हारी नहीं अपनी पड़ी है
अपनी कुर्सी की पड़ी है
और उनके पीछे सीबीआई
और दूसरी एजेंसियां पड़ी हैं
सबको कुर्सी चाहिए
सबको प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री बनना है
दस एमपी वाला बीस वाला
जब पीएम बनना चाहेगा तो भला
पचास वाला क्यों नहीं चाहेगा
इस देश में बड़े बदलाव के रास्ते का
असल रोड़ा यही है
तुम्हारा धरना
तुम्हारी आत्मा और ईमान का धरना है
तुम्हारे वक़ार का सत्याग्रह है
इस देश से तुम्हारी मोहब्बत का
अफ़साना है
अपनी मांओं-बहनों से कहने के लिए
उनके पोशीदा आंसुओं को पोछने के लिए
मेरे पास कुछ नहीं है कुछ नहीं
इस वक़्त न मेरे पास कोई रूमाल है
न कोई टूटा-फूटा शब्द
यह कैसी विडम्बना है।
- गणेश पाण्डेय
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ओ ईश्वर
----------
ओ ! ईश्वर तुम कहीं हो
और कुछ करते-धरते हो
तो मुझे फिर
मनुष्य मत बनाना
मेरे बिना रुकता हो
दुनिया का सहज प्रवाह
ख़तरे में हो तुम्हारी नौकरी
चाहे गिरती हो सरकार
तो मुझे
हिन्दू मत बनाना
मुसलमान मत बनाना
तुम्हारी गर्दन पर हो
किसी की तलवार
किसी का त्रिशूल
तो बना लेना मुझे
मुसलमान
चाहे हिन्दू
देना हृष्ट-पुष्ट शरीर
त्रिपुंडधारी भव्य ललाट
दमकता हुआ चेहरा
और घुटनों को चूमती हुई
नूरानी दाढ़ी
बस
एक कृपा करना
ओ ईश्वर !
मेरे सिर में
भूसा भर देना, लीद भर देना
मस्जिद भर देना, मंदिर भर देना
गंडे-ताबीज भर देना, कुछ भी भर देना
दिमाग मत भरना
मुझे कबीर मत बनाना
मुझे नजीर मत बनाना
मत बनाना मुझे
आधा हिन्दू
आधा मुसलमान ।
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गाय का जीवन
----------------
वे गुस्से में थे बहुत
कुछ तो पहली बार इतने गुस्से में थे
यह सब
उस गाय के जीवन को लेकर हुआ
जिसे वे खूँटे बाँधकर रखते थे
और थोड़ी-सी हरियाली के एवज में
छीन लिया करते थे जिसके बछड़े का
सारा दूध
और वे जिन्हें नसीब नहीं हुई
कभी कोई गाय, चाटने भर का दूध
वे भी मरने-मारने को तैयार थे
कितना सात्त्विक था उनका क्रोध
कैसी बस्ती थी
कैसे धर्मात्मा थे, जिनके लिए कभी
गाय के जीवन से बड़ा हुआ ही नहीं
मनुष्य के जीवन का प्रश्न ।
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गुरु सीरीज
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गुरु-1/
जब मुझे गुरु ने डसा
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न रोया
न दर्द हुआ, न कोई निशान
न रक्त बहा, न सफेद हुआ
जब मुझे गुरु ने डसा।
इस तरह
मैं पहली परीक्षा पास हुआ।
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गुरु-2/
जब मुझे मेरे गुरु ने बरखास्त किया
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मैं तनिक भी विचलित नहीं हुआ
न पसीना छूटा, न लड़खड़ाए मेरे पैर
सब कुछ सामान्य था मेरे लिए
जब मुझे मेरे गुरु ने बरखास्त किया
और बनाया किसी खुशामदी को अपना
प्रधान शिष्य।
बस इतना हुआ मुझसे
कि मैं बहुत जोर से हँसा।
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गुरु-3/
गुरु ने मुझसे कुछ नहीं माँगा
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चलो अच्छा हुआ
न मुद्रा, न वस्त्र, न अन्न
न अँगूठा, न कलेजा, न गर्दन
गुरु ने मुझसे कुछ नहीं माँगा
मैं खुश हुआ।
सहसा लिया मुझसे सभाकक्ष में
मेरे गुरु ने दिया हुआ शब्द।
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गुरु-4/
जब गुरु ने मेरे विरुद्ध मिथ्या कहा
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कोई पत्ता नहीं खड़का
मंद-मंद मुस्काते रहे पवन
आसमान के कारिंदों ने
लंबी छुट्टी पर भेज दिया मेघों को
जब गुरु ने मेरे विरुद्ध मिथ्या कहा।
अद्भुत यह, कि
पृथ्वी पर भी नहीं आयी कोई खरोंच।
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गुरु-5/
गुरु से बड़ा था गुरु का नाम
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गुरु से बड़ा था गुरु का नाम
सोचा मैं भी रख लूँ गुरु से बड़ा नाम
कबीर तो बहुत छोटा रहेगा
कैसा रहेगा सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
अच्छा हो कि गुरु से पूछूँ
गजानन माधव मुक्तिबोध के बारे में।
पागल हो, कहते हुए हँसे गुरु
एक टुकड़ा मोदक थमाया
और बोले-
फिसड्डी हैं ये सारे नाम
तुम्हारा तो गणेश पाण्डेय ही ठीक है।
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गुरु-6/
कच्चे थे कुछ गुरु जी के कान
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सुंदर केश थे गुरु जी के
चौड़ा ललाट, आँखें भारी
लंबी नाक, रक्ताभ अधर
उस पर गज भर की जुबान।
गजब का प्रभामण्डल था
कद-काठी, चाल-ढ़ाल
सब दुरुस्त।
जो छिप कर देखा किसी दिन
कच्चे थे कुछ गुरु जी के कान।
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गुरु - 7/
निकटता का पाठ मेरे कोर्स में था ही नहीं
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कैसे हो सकता था
कि जो गुरु के गण थे, नागफनी थे
जड़ थे कितने कार्यकुशल थे।
आगे रहते थे, निकट थे इतने
जैसे स्वर्ण कुण्डल, त्योंरियाँ, हाथ।
क्या खतरा था उन्हें मुझसे
तनिक भी दक्ष नहीं था मैं
निकटता का पाठ मेरे कोर्स में था ही नहीं।
क्यों रोकते थे वे मुझे कुछ कहने से
जरूर हुई होगी कोई असुविधा
इसी तरह वैशम्पायन के गुरुकुल में
याज्ञवल्क्य से।
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गुरु-8/
खूब मिले गुरु भाई
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खूब मिले गुरु भाई
सन्नद्ध रहते थे प्रतिपल
कुछ भी हो जाने के लिए
मेरे विरुद्ध।
बात सिर्फ इतनी-सी थी
कि मैं कवि था भरा हुआ
कि टूट रहा था मुझसे
कोई नियम
कि लिखना चाहता था मैं
नियम के लिए नियम।
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गुरु-9/
खीजे गुरु
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पहला बाण
जो मारा मुख पर
आंख से निकला पानी।
दूसरे बाण से सोता फूटा
वक्षस्थल से शीतल जल का।
तीसरा बाण जो साधा पेट पर
पानी का फव्वारा छूटा।
खीजे गुरु
मेरी हत्या का कांड करते वक्त
कि आखिर कहाँ छिपाया था मैंने
अपना तप्त लहू।
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गुरु-10 /
सद्गुरु का पता
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अच्छा लगता था पाठशाला में
कबीर को पढ़ते हुए
अच्छा लगता था जीवन में
कबीर को ढूँढ़ते हुए
अच्छा लगता था सपने में
कबीर से पूछते हुए
सद्गुरु का पता।
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ऋण है मुझ पर
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उस खेत का, उस बीज का
उस धूप का, उस पानी का
उस किसान का ऋण है
मुझ पर
उस हवा का, उस जगह का
उस चौखट का, उस छत का
उस दुलार का ऋण है
मुझ पर
उस छड़ी का, उस किताब का
उस पाठशाला का, उस विचार का
उस गुरु का ऋण है
मुझ पर
उस चरण का, उस आशिष का
उस मोतीचूर का, उस हृदय का
उस बुआ का ऋण है
मुझ पर
उस भाई का, उस मित्र का
उस साथ का, उस चाह का
उस अपनत्व का ऋण है
मुझ पर
उस चितवन का, उस स्पर्श का
उस गंध का , उस स्मृति का
उस प्यार का ऋण है
मुझ पर
उस शत्रु का, उस वरिष्ठ का
उस घात का, उस कायर का
उस नाग का ऋण है
मुझ पर
उस आक्रोश का, उस ललकार का
उस साहस का, उस दर्प का
उस रक्त का ऋण है
मुझ पर
उस धारा का, उस यकीन का
उस शक्ति का, उस पृथ्वी का
उस अभिन्न संगिनी का ऋण है
मुझ पर
कोई देखे कितना सुख है
अपने होने की खोज में
कितनी तृप्त है मेरी आत्मा
अपनी इस अतिशय दरिद्रता में।
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तुम्हें कैसा लगता है प्रधानमंत्री
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देखो तो कितना सलोना है दस बरस का लड़का
अखबार लहराते हुए हवा से बात करता है किस तरह
हर सुबह करतब दिखाता है लड़का
अपने से अधिक उम्र की साइकिल पर।
देखो तो छूकर कितनी नन्ही-नन्ही हैं उँगलियाँ
हाथ की रेखाएँ पढ़ो, क्या लिखा है
जिनसे बाँटता है संसद में प्रधानमंत्री की घोषणाएँ
और दुनियाभर की खबरें।
देखो तो पुतलियाँ नचाते हुए लड़का
किस तरह देखता देखता है घरों को
सुनो तो कितना सुरीला है लड़के का कंठ
मुर्गे की तरह बाँग देता हुआ-‘पेपर’।
तुम्हें कैसा लगता है प्रधानमंत्री,
अखबार बाँटता हुआ दस बरस का लड़का
बहुत अच्छा, बहुत प्यारा
अभी-अभी इधर से निकला है हवा में लहराते हुए
राष्ट्रपति का अभिभाषण।
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यह देश जो हमारा है
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कितना दम है मान्यवर
आपकी बूढ़ी हड्डियों में
अभी और आगे ले जाएँगे आप
इस देश को
कितना भरोसा है आप पर
कितना बोझ है आपकी आत्मा पर
माननीय प्रधानमंत्री जी
कितने दृढ़-प्रतिज्ञ हैं आप
आखिरी साँस तक ले जाएँगे अपने संग
इस देश को अभी और कितनी दूर ।
यह देश जो हमारा है
और हमसे दूर होता जा रहा है ।
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यह देश
---------
यह देश मेरा भी है
यह देश आपका भी है
एक मत मेरे पास है
एक मत आपके पास भी है
एक अरब आपके पास है
एक सौ मेरे पास है
यह देश आपको प्यारा है
मुझको भी जान से प्यारा है
एक छोटी-सी जिज्ञासा है
मान्यवर, यह देश
कितना आपका है कितना हमारा है ।
-------------------------
एक अफवाह है दिल्ली
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कोई तो होगा मेरे जैसा
जो कह सके शपथपूर्वक
चालीस पार किया
गया नहीं दिल्ली
नई कि पुरानी
देखा नहीं कनाट प्लेस
बहादुरशाह जफर मार्ग
चाँदनी चौक, मेहरौली
अलकनंदा, दरियागंज
मुझे अक्सर लगा
एक डर है दिल्ली
किसी शहर का नाम नहीं
जो फूत्कार करता है
लेखकों की जीभ पर
हृदय के किसी अंधकार में
जब-जब बताते रहे एजेंट सगर्व
दिल्ली दरबार के किस्से
लेखकों की जुटान के ब्योरे
कैसे बँटती हैं रेवड़ियाँ
और पुरस्कार
हाय! सुनता रहा किस्सों में
कैसे मचलते हैं नये कवि
किसी उस्ताद की कानी उँगली से
एक डिठौने के लिए
और
नाचते हैं कैसे आज के किस्सागो
किसी दरियाई भालू के आगे
उसकी एक फूँक के लिए
निछावर करने को आतुर
अपना सब कुछ
बेशक होता रहा हाँका
कुल देश में कि खैर नहीं
मार दिये जायेंगे वे
जो जायेंगे नहीं
दिल्ली
मैं हँसता रहा
कि दिल्ली से
दिल्ली के लिए उड़ायी गयी
एक अफवाह है दिल्ली
देखो तो
बचा हुआ है गणेश पाण्डेय
गोरखपुर में साबूत।
-----------------------
ख़ुश है गणेश पाण्डेय
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चलो माना
सब कुछ दिल्ली में
गोरखपुर को क्या
कवियों के मीनार
क़ुतुब से बड़े
आलोचकों के फाटक
जैसे इण्डिया गेट
साहित्य
संपादकों के क़िले
लाल-पीले
क़ाबा-काशी
अख़बारों के लेनिनग्राद
सब दिल्ली में
तो क्या
ख़ुश है गणेश पाण्डेय
गोरखपुर में।
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वहां मैं नहीं जा रहा था
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उस भागती हुई बस में निश्चिंत थे सब
अपने-अपने ठिकाने को लेकर
कुछ स्कूली लड़के थे खेल की मस्ती में डूबे हुए
कुछ किसान थे जो बाजार जा रहे थे ऊँघते हुए
अपने साथ प्याज का गट्ठर लिए
कुछ मारवाड़िनें थीं
बनीं-ठनीं इतनी कि हाय
दुनिया भर की खुशबू लिए
अपने पश्मीने में बंद
जैसे कभी अस्वस्थ हो ही नहीं सकती थीं
थोड़े से बुजुर्गवार थे जो खास रहे थे लगातार
अपने गमछे और कनटोप कसे हुए
मैं था शशि सिंघानिया की याद में दंदाया
और मेरे बाजू में वह थी जो वह नहीं थी।
गांव थे, बाजार थे आते-जाते
धरती थी लगातार नाचती
प्रयाण और पहुंच के बीच
बस के शीशे के बाहर
सरसों के कुछ फूल खिले थे।
वह जो थी
नई नई औरत हुई औरत
उसकी आंखों में था शीत-वसंत
चमकते हुए दांत थे उसके, ताजे सेव से दबे हुए
थिरकती हुई मुस्कान थी बेतहाशा उसके पास
आदिम गंध से लैस थी उसकी देह
नहीं था तो उसके पास कोई कार्डिगन
बड़े जतन से छिपाए हुए थी
फिर भी आंचल के नीचे कुछ
बार-बार
सर्द हवाएं थीं शीशे को चीरती हुई
और साल का पहला हफ्ता था
कंपकंपी छोड़ता हुआ उसके आगे
वह नई औरत मेरे बाजू से सटी हुई
कहीं जा रही थी
जाहिर है कि वहां मैं नहीं जा रहा था।
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दरअसल वे पिछड़े थे
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जिनके पास पीने भर का साफ पानी नहीं था
जिनके पास दो जून का मनचाहा अनाज नहीं था
जिनके पास मुर्दे की तरह लेटने भर की जगह नहीं थी
जिनके पास नियम में छेद करने का कोई औजार नहीं था
जिनके पास जीने भर का कुछ भी नहीं था
जिनका कभी किसी संसद में आना जाना नहीं था
जिनके लिए किसी भी तरह का बाजार
एक लंबी और अंतहीन दौड़ का डरावना सपना था
सबसे खराब बात यह कि जिनके पास
कोई खतरनाक शब्द नहीं था
दरअसल वे पिछड़े थे।
वे पिछड़े थे कि उनके प्रतिनिधि तनिक भी नहीं पिछले थे।
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पूरे शरीर से
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कई बार पसीजती हैं हथेलियां
कहना चाहती हैं कि बस
मुझे विदा करो
कई बार दृश्य के विरुद्ध
उद्यत होती हैं
आंखें
कई बार उठते हैं हाथ
कि पूरा चाहिए अपना
राज्य
कई बार
बाजार से लौटकर
सीधे लाम पर जाना चाहते हैं
पैर
कई बार मचलता है मेरा दिल
और पूरे शरीर से होती है
बम होने की इच्छा।
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उठा है मेरा हाथ
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मैं जहां हूं
खड़ा हूं अपनी जगह
उठा है मेरा हाथ
रुको पवन
मेरे हिस्से की हवा कहां है
बताओ सूर्य
किसे दिया है मेरा प्रकाश
कहां हो
वरुण कब से प्यासी है मेरी आत्मा
सुनो विश्वकर्मा
मेरी कुदाल कल तक मिल जानी चाहिए
मुझे जाना है संसद कोड़ने।
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यह दुनिया 1
--------------
वे किन्हीं ग्रहों और नक्षत्रों से नहीं आए थे
जिनसे रूपाकार हुए, कहीं और से नहीं लाए थे
उन्नत बीज अधिक उपजाऊ धरती
मीठा-मीठा पानी ठंडी-ठंडी हवा
और निरंतर जलने वाली आग
वे बेहद निष्ठावान और कर्मठ लोग थे
जो चलाना चाहते थे इतनी बड़ी दुनिया को
कुछ पूज्य पोथियों से।
और यह दुनिया
एक बहुधंधी दुनिया थी, जो थी
कुछ-कुछ संवेदनशील कुछ काठ की
कुछ-कुछ प्रेम की तो बहुत कुछ मारकाट की।
एक दुनियादार मां थी यह दुनिया जो सबकी थी
झरनों की तो पहाड़ों की, खेतों की तो कारखानों की
कुछ-कुछ कवियों की तो बहुत कुछ ढोंगियों की
कुछ-कुछ बैल की तरह जुते हुए किसानों की
तो कुछ भूखे-नंगे फटे हाल किसानों की
कुछ-कुछ अन्याय के विरुद्ध संघर्षरत नौजवानों की
तो बहुत कुछ नोट की तरह
दुनिया को अपनी जेब में ठूंसने वाले हत्यारों की।
पोछना चाहती थी सब के आंसू और गुस्सा
यह दुनिया, जो बिल्कुल अकेली थी
असंख्य दुनिया ओं की मां होते हुए
महाविध्वंस, अनंत विस्फोट
और हत्यारों की क्रूरतम अट्टहास के बीच
जो कहते थे
दुनिया का निचोड़ हैं उनकी किताबें
उन्हीं की मुट्ठी में बंद हैं
धरती और मनुष्य और समाज के
सभी ग्रह और नक्षत्र और चक्र।
वे कहना चाहते थे और कहते थे।
और वे भी जो कहते थे
जीवन कोई पदार्थ नहीं है
और भूख की चौहद्दी में
रोटी के अलावा कुछ और भी होता है
थोड़ी-सी चैन की नींद थोड़े से सपने
एक अदद खुली हुई खिड़की, किसी का प्यार
और थोड़ी सी ताजा हवा।
चले गए वे।
और वे भी गए जो चूर थे दर्प से
कांख में दबे हुए ईश्वर महान की पोथी
और जो कहते थे दुनिया की भलाई के लिए
खास उनके पास उतरी हैं पवित्र आसमानी किताबें
और जो बेचैन थे, किसी भी तरह
दुनिया पर लागू करने के लिए
अपने नियम और विश्वास।
वे सब
किन्हीं ग्रहों और नक्षत्रों की ओर नहीं गए
यहीं कहीं किसी घाट की राख में
किसी दरख्त की छाया में
कहीं भी धरती के पेट में
विलीन हुए इस तरह अचानक।
वे
जो कुछ जानते थे
और बहुत कुछ नहीं जानते थे-
सभी पोथियों की मां है यह दुनिया
जो जीना जानती अपने ढंग से
और मरना चाहती है अपनी उम्र
वे नहीं जानते थे।
वे नहीं जानते हैं।
--------------
यह दुनिया 2
--------------
वे कोई देवदूत जैसे थे
कुछ कुछ हुक्काम जैसे थे
तो कुछ-कुछ लुटेरे जैसे
कुछ-कुछ हातिमताई जैसे थे
तो बहुत कुछ आतमतायी जैसे।
वे क्या थे और क्या नहीं थे
वे जो जानते थे उतना ही सच मानते थे
वे जो भी थे
और जहां भी थे
जिस वक्त भी थे
दुनिया के किसी भी कोने से
फरमान जारी कर सकते थे।
वे जानते और मानते थे, बेशक
तमाम मुल्कों की बागडोर संभाल सकती थीं
औरतें
फतह कर सकती थीं सागरमाथा
लिख सकती थीं अच्छी कविताएं
सोच सकती थीं दुनिया के बारे में
खूब
एक अपने बारे में नहीं।
यही ऊपर का हुक्म था
ऐसा ही वे सोचते जानते और मानते थे
वे जानते और मानते थे, अच्छा नहीं होता
औरतों का इस तरह रंगों से मेलजोल।
क्रूर प्रतिबंध और नियम की धार से
वे खुरच देना चाहते थे
औरतों के शरीर से
पहनावे और उनके जीवन से
लाल हरे पीले नारंगी जैसे
चटकीले रंग।
वे थे तो बड़े ताकतवर
बहुत कुछ कर सकते थे
बैठे-बैठे कुछ भी बदल सकते थे
अच्छे खासे आदमी को भेड़
और भेड़ को आदमी कर सकते थे।
बस शरीर के भीतर का रंग नहीं बदल सकते थे
वह, जो बहता चला आया था
शुरू से उन औरतों के शरीर में
उसी तरह लाल चटक।
दरअसल वे
किन्हीं उसूलों के बड़े पाबंद थे
बड़े भोले लोग थे
कुछ-कुछ हिंदुस्तानियों जैसे थे
नहीं-नहीं, पाकिस्तानियों जैसे थे
नहीं-नहीं ईरानियों जैसे थे
नहीं-नहीं तुर्कियों जैसे थे
नहीं नहीं ...
वे थे तो इसी दुनिया के।
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छोड़ो भारत
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क्यों तने हो
आसमान के सामने
इतना
इतराते क्यों हो
झूमते हो किस बात पर
जीभर हवाओं के संग
क्यों लेते हो इतनी अंगड़ाइयां
जुलाई की झमाझम बरसात में
सोचते हुए कि सारा जहां तुम्हारा
ओ गोरे चिट्टे यूकिलिप्टस
किस काम के हो तुम
खूब खाते हो खूब पीते हो
क्या करते हो दूसरों के लिए
ओ खुदगर्ज साहबजादे
जरा अमरूद को देखो
कैसे झपट्टा मारती हैं
ये बड़ी-बड़ी लड़कियां
आम को देखो
कैसे मचल उठते हैं लाल
और इस नीम को देखो
कैसे बतियाते हैं बूढ़े इसके नीचे
दोतों में फंसे सुख-दुख
गुलजार घरों को देखो
चौखट देखो खिडत्रकियां देखो
ये शीशम ये सागौन
ये अपना काला-कलूटा
जामुन देखो
देख सको तो सबसे पहले
छप्पर में खुंसी हुई
लाठी देखो
मैं कहता हूं हट जाओ
हट जाओ मेरे सामने से
ओ गोरे चिट्टे यूकिलिप्टस
छोड़ो भारत
छोड़ो सृजन-संसार।
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अटा पड़ा था दुख का हाट
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देखा वे जल्दी में थे
उन्हें जाना था बाजार खरीदने
थैले थे दोनों हाथों में
दुख की भुजाएं, छाती और नितंब
सब उपलब्ध थे वाजिब दामों पर
अटा पड़ा था दुख का हाट
कोई-कोई सस्ते में बेच रहा था दुख
बिल्कुल मुफ्त
कुछ तो लौट रहे थे हंसी ठट्ठा करते हुए
सिर पर लादे दुख का गट्ठर
कुछ थे
जो मस्ती में थे जीवन पर गीत गाते हुए
मना रहे थे दुख पर्व
दिखी एक सुंदरी मंदस्मित
जिसकी वेणी में गुंथा हुआ था अंतहीन दुख
एक नृत्यांगना दिखी अपनी विद्या में लीन
इसकी गति से फूट रहा था दुख-प्रपात
और जब कार से उतरा तो देखा
एक रूप गर्विता स्त्री ने ढंग से छिपा रखा था
अपनी चितवन में कंटीला दुख
मैं जल्दी में था मित्रो
मुझे बुद्ध पर भाषण के लिए जाना था।
000
(प्रथम संग्रह ‘अटा पड़ा था दुख का हाट’
प्रथम संस्करण 1996/ प्रत्यूष प्रकाशन, गोरखपुर)
-गणेश पाण्डेय
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ओ केरल की उन्नत ग्रामबाला
--------------------------------
कहां फेंका था तुमने
अपना वह माउथआर्गन
जिस पर फिदा थीं तुम्हारी सखियां
कहां गुम हुईं सखियां किस मेले-ठेले में
किसके संग
कैसे तहाकर रख दिया होगा तुमने
अपना प्यारा-प्यारा स्लेटी स्कर्ट
किस खूंटी पर फड़फड़ा रहा होगा
वह बेचारा लाल रिबन
सब छोड़-छाड़ कर
कैसे प्रवेश किया होगा तुमने
पहलीबार
भारी-भरकम प्रभु की पोशाक के भीतर
यह क्या है तुममें
जो बज रहा है फिर भी मद्धिम-मद्धिम
कहां हैं तुम्हारी सखियां
कोई क्या करे अकेले
इस राग का
देखो तो आंखें वही हैं
जिनमें छिपा रह गया है फिर भी कुछ
जस के तस हैं काले तुम्हारे वही केश
होठों में गहरे उतर गया है नमक
कुछ भी तो नहीं छूटा है
वही हैं तुम्हारे प्रियातुर कान
किस मुंह से जाओगी प्रभु के पास
ओ केरल की उन्नत ग्रामबाला
कैसे करोगी तुम ईश का ध्यान
जब बजने लगेगा कहीं
मद्धिम-मद्धिम
माउथआर्गन।
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एक चांद कम पड़ जाता है
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कई बार एक जीवन कम पड़ जाता है
एक प्यार कम पड़ जाता है कई बार
कई बार हजार फूलों के गुलदस्ते में
चंपे का एक फूल कम पड़ जाता है
एक कोरस ठीक से गाने के लिए
एक हारमोनियम कम पड़ जाता है
कई बार।
सांसें लंबी हैं अगर
और हौसला थोड़ा ज्यादा
तो तबीअत से जीने के लिए
एक रण कम पड़ जाता है
जो है और जितना है उतने में ही
एक दुश्मन कम पड़ जाता है।
दिल से हो जाय बड़ा प्यार अगर
तो कई बार
एक अफसाना कम पड़ जाता है
एक हीर कम पड़ जाती है
ठीक से बजाने के लिए
सितार का एक तार कम पड़ जाता है
एक राग कम पड़ जाता है।
कई बार
आकाश के इतने बड़े शामियाने में
एक चांद कम पड़ जाता है
दुनिया के इस मेले में देखो तो
एक दोस्त कहीं कम पड़ जाता है
एक छोटी-सी बात कहने के लिए
कई बार एक कागज कम पड़ जाता है
एक कविता कम पड़ जाती है।
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सफेद दाग वाली लड़की
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कोई
आया नहीं
देखने कि कैसी हो
कहाँ हो मिट्ठू
किस हाल में हो
न तो पास आकर छुआ ही उसे
कोई नब्ज
दिल का कोई हिस्सा
कि बाकी है अभी उसमें कितनी जान
किस रोशनाई और किन हाथों का
है उसे इन्तजार
कहाँ-कहाँ से बह कर आता रहा
गंदा पानी
किसी को हुई नहीं खबर
किस-किस का गर्द-गुबार आ कर
बैठता रहा उस पर
सब अपने धंधे में थे यहाँ
चाहिए था काफी और वक्त था कम
उसके सिवा
मरने की फुर्सत न थी किसी के पास
यह जानने के लिए तो और भी नहीं
कि कैसे हुई अदेख
पृथ्वी के एक कोने में
जमानेभर से रूठकर लेटी हुई
कुछ-कुछ काली
और बहुत कुछ सफेद दाग वाली
कुछ लाल कुछ पीली
एक लंबी नोटबुक
औंधेमुँह
कैसे अपने एकांत में
सिसकते और फड़फड़ाते रहे
पन्ने सब सादे
कैसे उसके संग
उदास कागज
एक छोटी-सी प्रेम कविता की उम्मीद में
सारी-सारी रात और सारा-सारा दिन
जागते हुए
कोई आए उसे फिर से जगाए।
--------
वर्दी में
-------
कई थीं
ड्यूटी पर थीं
कुछ तो बिल्कुल नई थीं
अंट नहीं पा रही थीं वर्दी में
आधा बाहर थीं आधा भीतर थीं।
एक की खुली रह गयी थी खिड़की
दूसरी ने औटाया नहीं था दूध
झगड़कर चला गया था तीसरी का मरद
चौथी का बीमार था बच्चा कई दिनों से
पांचवीं जो कुछ ज्यादे ही नई थी
गपशप करते जवानों के बीच
चुप-चुप थी
छठीं को कहीं दिखने जाना था
सातवीं का नाराज था प्रेमी
रह-रह कर फाड़ देना चाहता था
उसकी वर्दी।
--------
कबाड़
--------
वे दो थे
भाई जैसे थे छोटे-बड़े
लड़के थे जाने किस धातु के
लोहा थे पीतल थे कि सोना थे चाँदी थे
जो थे जैसे थे खुश थे उस कबाड़ में
जिधर देखते थे कबाड़ ही कबाड़ देखते थे
कबाड़ दुनिया देखते थे।
कंधे से उतारते थे अपना थैला मैला
खोलते थे मुँह और उठाते थे टिफिन बॉक्स
डिब्बी-डिब्बे, टुकड़े प्लास्टिक के
सब थैले में गड़प।
देखते थे छागल का कोई लंबा टुकड़ा
हँसते थे उस बाई की भूल पर
जिसने फेंका होगा।
उठाते थे किसी का लाल रिबन
और चल देते थे गले में बाँधकर
एक कबाड़ से दूसरे कबाड़ में।
--------------
बाबू क्लीनर
--------------
बाबू क्लीनर
इतने गंदे क्यों रहते हो
क्यों खाते हो हरदम पान
बात-बात पर हँसते क्यों हो
हो-हो।
हर गाने पर
मूड़ी खूब हिलाते क्यों हो
लगता है तुम सचमुच
इस गाड़ी के मालिक हो।
कुछ तो बोलो
बाबू क्लीनर
खुश दिखने का भेद तो खोलो
हँसकर दर्द छुपाते क्यों हो।
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किसका है यह पेंसिलबॉक्स
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जिस किसी का हो
आये और ले जाये
अपना यह पेंसिलबॉक्स
जो मुझे अभी-अभी मिला है
पागल पहिये और पैरों केबीच।
जिस पर कुछ फूल बने हैं
कुछ तितलियाँ हैं उड़ती-सी
और कम उम्र उँगलियों की ताजा छाप है
जिसका भी हो आये और ले जाये
अपना यह पेंसिलबॉक्स।
जिसके भीतर साबुत है आधी पेंसिल
और व्यग्र है उसकी नोंक
किसी मानचित्र के लिए
एक दूसरी पेंसिल है जो उससे छोटी है
बची हुई है उसमें अभी थोड़ी-सी जान
और किसी का नाम लिखने की इच्छा
मिटने से बचा हुआ है एक चौथाई रबर
काफी कुछ मिटा देने की उम्मीद में
किसी तानाशाह का चेहरा
किसी पैसे वाले की तोंद।
किसका है यह
किस दुलारे का किस अभागे का
किस रानी का किस कानी का
जिसका भी हो आये और ले जाये
अपना यह पेंसिलबॉक्स।
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बोर्ड परीक्षा का पहला दिन
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मेरी सीट
ओ मेरी सीट
कहां है मेरी सीट
उचक-उचक कर ढ़ूढते हैं
इतने सारे बच्चे एक साथ
हाईस्कूल बोर्ड परीक्षा के पहले दिन
नोटिस बोर्ड पर अपनी सीट का पता
मिलते हैं अन्दर घुसते ही कमरे में
एक तुनकमिजाज और कड़कआवाज
अजीब तरह के मास्टर जी
उसपर एक ढ़िलपुक मेज
और आगे-पीछे होती कुर्सी
और
उसके बाद मिलते हैं
परचे के जंगल में कुछ खरहे जैसे प्रश्न
कुछ होते हैं चीते की तरह आक्रामक
और कुछ हाथी जैसे भारी-भरकम
जिसके उत्तर में
निकालकर रख देना पड़ता है
एक पिता का कांपता हुआ कलेजा
और एक मां का आसभरा
और धड़कता हुआ दिल
देखो तो परचे के आगे-पीछे
पंक्तियों के बीच में लुका-छिपी करता है
एक मासूम सवाल-
कैसे करता है करतब
यह सब इतना कोई किशोर
पहली दफा
कोई बताए
तो सौ में दो सौ पाए !
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अभी
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बची हुई है अभी थोड़ी-सी शाम
बची हुई है अभी थोड़ी-सी भीड़
नित्य उठती-बैठती दुकानों पर
रह-रह कर सिहर उठती है
रह-रह कर डर जाती है
नई-नई लड़की
छोटी-सी
श्यामवर्णी
जिसके पास बची हुई है अभी
थोड़ी-सी मूली
और
मूली के पत्तों से गाढ़ा है
जिसके दुपट्टे का रंग
जिससे ढाँप रखा है उसने
आधा चेहरा आधा कान
अनमोल है
जिसकी छोटी-सी हँसी
संसार की सभी मूलियाँ
जिसके दाँतों से
सफ़ेद हैं कम
और
पाव-डेढ़ पाव मूली
एक रुपए में देकर
छुट्टी पाती है
मण्डी से
ख़ुश होती है काफ़ी
एक रुपये से कहीं ज्यादा
मण्डी से लौटते हुए
मुझे लगता है-
मूली से छोटी है
अभी उसकी उम्र
और मूली से बीस है
अभी उसकी ताज़गी
घर में घुसता हूँ तो होता है-
अरे!
ये तो मूली में छिपकर
घुस आई है नटखट
मेरे संग
अभी-अभी
शामिल हो जाएगी
बच्चों में ।
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धर्मशाला बाजार के आटो लड़के
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वे दूर से देखते थे और पहचान लेते थे
मद्धिम होता मेरा प्याजी रंग का कुर्ता
थाम लेते थे बढ़कर कंधे से
मेरा वही पुराना आसमानी रंग का झोला
जिसे तमाम गर्द-गुबार ने
खासा मटमैला कर दिया था
वे मेरे रोज के मुलाकाती थे
मैं चाचा था उन सबका
मेरे जैसे सब उनके चाचा थे
कुछ थे जो दादा जैसे थे
इस स्टैंड से उस स्टैंड तक
फैल और फूल रहे थे
छाते की कमानियों की तरह
कई हाथ थे उनके पास
रंगदारी के रंग कई
दो-दो रुपये में
जहां बिकती थी पुलिस
वे तो बस
उसी धर्मशाला बाजार के
आटो लड़के थे हंसते-मुस्कराते
आपस में लड़ते-झगड़ते
एक-एक सवारी के लिए
माथे से तड़-तड़ पसीना चुआते
पेट्रोल की तरह खून जलाते
वे मुझे देखते थे
और खुश हो जाते थे
वे मेरे जैसे किसी को भी देखते थे
खुश हो जाते थे
वे मुझे खींचते थे चाचा कहकर
और मैं उनकी मुश्किल से बची हुई
एक चौथाई सीट पर बैठ जाता था
अंड़सकर
वे पहले आटो चालू करते थे
फिर टेप-
किसी खोते में छिपी हुई
किसी अहि रे बालम चिरई के लिए
फुल्ले-फुल्ले गाल वाले लड़के का
दिल बजता था
उनका टेप बजता था
आटो में ठुंसे हुए लोगों में से
किसी की सांसत में फंसी हुई
गठरी बजती थी
किसी की टूटी कमानियों वाला
छाता बजता था
किसी के झोले में
टार्च का खत्म मसाला बजता था
और अंधेरे में
किसी बच्चे की किताब बजती थी
किसी छोटे-मोटे बाबू की जेब में
कुछ बेमतलब चाबियां बजती थीं
कुछ मामूली सिक्के बजते थे
किसी के जेहन में-
धर्मशाला बाजार की फलमंडी में
देखकर छोड़ दिया गया
अट्ठारह रुपये किलो का
दशहरी आम
और कोने में एक ठेले पर
दोने में सजा
आठ रुपये पाव का जामुन बजता था
और घर पर इन्तजार करते बच्चों की आंखें
बजती थीं सबसे ज्यादा।
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खेलो छोटे बहादुर
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आओ बहादुर
बैठो बहादुर
खाओ बहादुर
ये खुरमा
ये सेवड़ा
ये देखो रंग-वर्षा
खेलो छोटे बहादुर।
छोड़ो बहादुर
सम्भ्रांत पंक्ति का
पनाला
रहने दो आज जाम
बहने दो जहाँ-तहाँ
छोड़ो कुदाल
फेंको बाँस
लो खुली साँस।
आओ छोटे बहादुर
बताओ छोटे बहादुर
क्या कर रही होगी
इस वक्त पहाड़ पर माँ
माँ के मुख-रंग बताओ
छोटे बहादुर।
कितनी दूर है
तुम्हारा पर्वत-प्रदेश
मुझे ले चलो अपने घर
अकलुष आँख की राह
आओ छोटे बहादुर
अपने अगाये कंठ से
बोलो छोटे बहादुर
मद्धिम क्यों है आज
मुखाकृति।
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आप सौ साल जियें पापा
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छोड़ दीजिए पापा
पान के बीड़े चबाना
और तरह-तरह के जर्दे की
गमकने वाली खुशबू।
तम्बाकू-चूना मलना, ठोंकना
और होंठ के भीतर दाबकर
चुनचुनाहट के मजे लेना
बंद की जिए पापा बंद।
मुझे नहीं पसंद है पापा
मम्मी को नहीं पसंद है पापा।
ये लीजिए पापा सौंफ
इलायची लीजिए पापा
आप सौ साल जियें पापा।
सफेद फ्रॉकों वाली गुडिया जैसी
दस बरस की बिटिया
करती है प्रार्थना।
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मुश्किल काम
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यह कोई मुश्किल काम न था
मैं भी मिला सकता था हाथ उस खबीस से
ये तो हाथ थे कि मेरे साथ तो थे पर आजाद थे।
मैं भी जा सकता था वहाँ-वहाँ
जहाँ-जहाँ जाता था अक्सर वह धड़ल्ले से
ये तो मेरे पैर थे
जो मेरे साथ तो थे पर किसी के गुलाम न थे।
मैं भी उन-उन जगहों पर मत्था टेक सकता था
ये तो कोई रंजिश थी अतिप्रचीन
वैसी जगहों और ऐसे मत्थों के बीच।
मैं भी छपवा सकता था पत्रों में नाम
ये तो मेरा नाम था कमबख्त जिसने इन्कार किया
उस खबीस के साथ छपने से
और फिर इसमें उस अखबार का क्या
जिसे छपना था सबके लिए और बिकना था सबसे।
मैं भी उसके साथ थोड़ी-सी पी सकता था
ये तो मेरी तबीयत थी जो आगे-आगे चलती थी
अक्सर उसी ने टोका मुझे-‘पीना और शैतान के संग’
यों यह सब कतई कोई मुश्किल काम न था।
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सलाम वालैकुम
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सब साहिबान को सलाम
जो मुझे छोड़ने आए थे सिवान तक
उन भाइयों को सलाम जो अड्डे तक आए थे
मेरी छोटी-छोटी चीज़ों को लेकर ।
उन चच्चा को ख़ासतौर से सलाम
जिन्होंने मेरा टिकट कटाया था
और कुछ छुट्टे दिए थे वक़्त पर काम आने के लिए।
बचपन के उन साथियों को सलाम
जिन्होंने हाथ हिलाया था
और जिन्होंने हाथ नहीं हिलाया था ।
अम्मी को सलाम
जिन्होंने ऐन वक़्त पर गर्म लोटे से
मेरा पाजामा इस्त्री किया था और जल गई थी
जिनकी कोई उँगली ।
आपा को सलाम
जिनके पुए मीठे थे ख़ूब और काफ़ी थे
उस कहकशाँ तक पहुँचे मेरा सलाम
जो मुझे कुछ दे न सकी थी
खिड़की की दरार से सलाम के सिवा ।
उस याद को सलाम
जिसने ज़िन्दा किया मुझे कई बार
उस वतन को सलाम
जो मुझे छोड़कर भी मुझसे छूट नहीं पाया ।
रास्ते की तमाम जगहों और उन लोंगो को सलाम
जिन्होंने बैठने के लिए जगह दी
और जिन्होंने दुश्वारियाँ खड़ी कीं
उस वक़्त को सलाम
जिसने मुझे मार-मार कर सिखाया यहाँ
किसी आदमी को रिश्तों से नहीं
उसकी फितरत से जानो ।
ऐ ज़िंदगी तुझे सलाम
जो किसी काम के वास्ते तूने चुना
किसी गरीब को ।
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एक भिण्डी
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यह जो छूट गई थी
थैले में अपने समूह से
अभी-अभी अच्छी भली थी
अभी-अभी रूठ गई थी
एक भिण्डी ही तो थी ।
और एक भिण्डी की आबरू भी क्या
मुँह फेरते ही मर गई ।
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एकता का पुष्ट वैचारिक आधार
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एक वीर ने उन्हें तब घूरा
जब वे सच की तरह कुछ बोल रहे थे ।
एक वीर ने उन्हें तब टोका
जब वे किसी की चमचम खाए जा रहे थे ।
एक वीर ने उन्हें तब फटकारा
जब वे किसी मोढ़े की परिक्रमा कर रहे थे ।
असल में
एक वीर ने दम कर रखा था
उनकी उस अक्षुण्ण नाक में
जिसे तख़्ते-ताउस की हर गंध
एक जैसी प्यारी थी ।
एक दिन वे एकजुट हुए
क्योंकि एकता का पुष्ट वैचारिक आधार
उनके सामने था ।
पाठ्यक्रम समिति की उस बैठक में
लिया उन्होंने निर्णय
कि ‘सच्ची वीरता’ को
जीवन से निकाल दिया जाय ।
नोट : ’सच्ची वीरता’ अध्यापक पूर्ण सिंह का प्रसिद्ध निबंध है।
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कम कविता के दिन थे
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कुछ करने के दिन न थे
कविता के लिए मरने के दिन न थे
जो मरे मारे गये, कोई न पूछ थी कहीं।
रोशनी का काम उनके जिम्मे न था
जिनके पास कुछ ढँका-छिपा न था।
गजब का मंजर था सामने
टुटही हरमुनिया थी
वक्त-बेवक्त राग जैजैवन्ती गवैया थे
वही झाँझ-करताल वही बजवैया थे
बड़े-बड़े घुटरुन चलवैया थे
कुछ थे जो
बाहरी जहाजों पर कूद-कूद चढ़वैया थे
कई तो अपने ऊपर ग्रंथ छपवैया थे।
रटन्त विद्या के दिन थे
एक कविता दौर के अन्तिम दिन थे
दृश्य उन्हीं का था
जिनके जीवन में कोई संग्राम न था
जीवन छोटा था
कम कविता के दिन थे
फिर भी कुछ पागल थे बचे हुए
जिनके हौसले थे कि कम न थे।
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दूसरा संग्रह ‘जल में‘
नमन प्रकाशन नई दिल्ली/ प्रथम संस्करण-1999
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- गणेश पाण्डेय
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लोकतांत्रिक गालियां
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कुछ लोग
ऐसा क्यों चाहते हैं
कि मैं सिर्फ भाजपा को गालियां दूं
मैं क्यों सिर्फ भाजपा को गालियां दूं
और बाकी पार्टियों के गले में
बड़े वाले गेंदे का बड़ा-सा हार पहनाऊं
क्यों भाई क्यों बाकी पार्टियां कैसे
अच्छी हैं दूध से धुली हैं
मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकता
मुझे जहां-जहां छेद दिखेगा
टांग अड़ाऊंगा फटकारूंगा
बेहतरी की बात करूंगा
हां भाजपा में मुंहफटे हैं
तो तुम्हारी पसंद की पार्टियों में
क्या-क्या फटे नहीं हैं
मैं भी चाहता हूं
कि ऐसा लोकतंत्र हो
जहां योग्यता और प्रतिभा का
सम्मान हो ईमान की पूजा हो
कोई दूजा तो हो
जिससे बड़ी उम्मीद तो हो
जब तक ऐसा नहीं होता
मैं सबको गालियां दूंगा
हालांकि गालियों के मामले में
भाजपा को बहुत बड़ा नुकसान होगा
उसके हिस्से में एक गाली जाएगी
तो विपक्ष के हिस्से में
इसको उसको-उसको मिलाकर
कुल दस जाएंगी
मेरा भी क्या कम घाटा है
कि आखिर एक तरफ गाली वाली
एक गोली चलाऊं
और दूसरी तरफ गाली की
दस गोलियां चलाऊं
लोकतंत्र भी बेचारा तन्हा
खड़ा-खड़ा क्या सोचता होगा
इस बर्बादी पर।
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बुरे लोग सत्ता में इसलिए आते हैं
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बुरे लोग
सत्ता में इसलिए नहीं आते हैं
कि वे बुरे हैं
बुरे लोग
सत्ता में इसलिए आ जाते हैं
कि अच्छे लोगों में बुराई आ जाती है।
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अच्छाई का मुरझा जाना
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बुराई
कई तरह की होती है
कुछ पाने की उम्मीद में
बोलने की जगह चुप रहना बुराई है
अच्छाई को जहां खिलने की जरूरत हो
सहसा उसका मुरझा जाना बुराई है
जोखिम उठाने के साहस का
कम होते जाना आज बड़ी बुराई है
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जब लोकतंत्र कमजोर हो जाता है
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जब राजनेता
कमजोर होने लगते हैं
तो उनकी जगह दूसरे लोग आ जाते हैं
गुंडे आ जाते हैं कातिल आ जाते हैं
धर्माचार्य आ जाते हैं सौदागर आ जाते हैं
जब लोकतंत्र
कमजोर हो जाता है
तो अखबारों और चैनलों पर
डरपोक लालची बेवकूफ
पत्रकार आ जाते हैं
गली के गुंडे भी पत्रकार बन जाते हैं
और फिर पत्रकार लोग भी लोकतंत्र को
नोचने-खसोटने के काम में लग जाते हैं।
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लेखक नाम का प्राणी
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ये लेखक नाम का प्राणी भी
साला कितना बड़ा बेईमान है
खुद लाख मौकों का
फायदा उठाए तो सब ठीक है
दूसरा वैसा कुछ एक बार कर ले
तो बेईमान है फासिस्ट है
अरे भाई पहले साहित्य का
एक घोषणा-पत्र तो जारी कर लो
कब कहां किसका पत्तल चाटना है
किस मंच पर जाना है इनाम लेना है
किसे राजनेता को कब तक गाली देना है
किस राजनेता का कब पैर पकड़ लेना है।
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कबीर का कुत्ता
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बहुत कम पढ़ना हुआ
सिर्फ कबीर को थोड़ा-बहुत पढ़ा
ढाई आखर से कभी आगे नहीं बढ़ पाया
इसीलिए अपने समय में कभी सिर्फ
दाएं बाजू की गंदगी को नहीं देखा
कभी एकतरफा जुलूस नहीं निकाला
ठोंक-पीट कर किसी तरह
बाएं बाजू की टूटी-फूटी हड्डियों पर भी
थोड़ा-बहुत कच्चा प्लास्टर लगाया
इससे ज्यादा भला
कबीर का कोई कुत्ता क्या कर पाता
अलबत्ता कबीर होते तो चैले से दागते।
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रामराज्य
-----------
रामराज्य
न हिंदू राज्य हो सकता है
न मुसलमान राज्य हो सकता है
रामराज्य
न मौलवियों का राज्य हो सकता है
न धर्माचार्यों का राज्य हो सकता है
रामराज्य
न आज किसी राजा का राज्य हो सकता है
न किसी राजघराने का राज्य हो सकता है
रामराज्य
सभी नागरिकों का
सभी नागरिकों के लिए
एक आदर्श राज्य हो सकता है
रामराज्य
सिर्फ महाजनों के लिए नहीं
देश के सभी नागरिकों के लिए
स्वास्थ्य और मंगल का राज्य हो सकता है
समता और बंधुत्व का राज्य हो सकता है
रामराज्य पर
न कांग्रेस का पेटेंट हो सकता है
न भाजपा न सपा न बसपा न आप
न माकपा न भाकपा न अन्य पार्टियों का
सिर्फ भारत की जनता का पेटेंट हो सकता है
जनता का रामराज्य
गांधी का रामराज्य हो सकता है
और गांधी का रामराज्य ही सच्चा
अच्छा और टिकाऊ रामराज्य हो सकता है।
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उन्नत लोकतंत्र का स्वप्न
----------------------------
कितना अच्छा होता
सारे जहां से अच्छे भारत में
शहर-शहर कस्बा-कस्बा गांव-गांव
नागरिकता अस्पताल होता
सारे बच्चे
और सभी प्राणियों के बच्चे
वहीं पैदा होते और तुरत
जन्म प्रमाण-पत्र की जगह
सीधे नागरिकता प्रमाण-पत्र लेकर
घर चाहे जंगल में जाते
कहीं और कोई जांच-पड़ताल नहीं
पुरखों के कागज की झंझट नहीं
हर पैदाइश आनलाइन होती
सब कुछ बहुत सरल होता
ऐसी मशीनें पैदा कर ली गयी होतीं
कि खून की एक बूंद से कुल-गोत्र
हिंदू-मुसलमान की पहचान होती
धर्म इतना उन्नत हो गया होता
कि मनुष्येतर प्राणियों में भी
हिंसक विभाजन हो गया होता
हिंदू की मुंडेर पर हिंदू चिड़िया बैठती
और मुसलमान की छत पर
मुसलमान चिड़िया
मुसलमान बच्चे
मुसलमान गाय का दूध पीते
हिंदू बच्चे हिंदू गाय का
क्या पता तब तक हमारा लोकतंत्र
पृथ्वी का सबसे उन्नत लोकतंत्र बन जाता
भारतीय सभ्यता सूर्य और चंद्रमा पर
घर बना चुकी होती
और भारत में मनुष्येतर प्राणियों को भी
मताधिकार मिल चुका होता।
- गणेश पाण्डेय
----------
महाराज
----------
जैसे
पड़ोसी मुल्क में
हिंदू बेटियों के लिए
आपके हृदय में दर्द का समुद्र है
महाराज
होना भी चाहिए
आखिर विश्वभर के हिंदुओं के
आप ही संरक्षक हैं
महाराज
आप महाबली हैं
आपने पड़ोसी मुल्क को
कई बार धूल चटाया है
थर-थर कांपते हैं आपसे
आततायी
ये कौन घुस आए
छः फरवरी की रात
गार्गी कालेज में
बेटियों के उत्सव में
कैसे बेखौफ लोग थे
बेटियों की लाज
तार-तार कर रहे थे
उन्हें न पुलिस का डर था
न आपकी सरकार का
न फौज-फक्कड़ का
ये आदमी नहीं थे
इन्हें अपनी बहनों
और मांओं का भी
डर नहीं था
घट-घट में कंठ-कंठ में
विराजते जय श्रीराम का
डर नहीं था
आपकी राजधानी में
आपके प्रासाद से कुछ दूरी पर
बस आपकी नाक के नीचे
कालेज की बेटियों के लिए
दर्द का समुद्र नहीं न सही
नदी सही नाला सही तालाब सही
एक बूंद सही, फौरन दिखे तो
महाराज
आप पर भरोसा है महाराज
बस आपके चाहने की बात है
उन बेटियों को अपनी बेटी
देश की बेटी समझने की बात है
आप स्वयं ज्ञानी हैं महावीर हैं
भला आपको कोई क्या खाकर
समझा सकता है
महाराज।
----------------------------------
ईंट और पत्थर का सिलसिला
----------------------------------
जो लोग
विपक्ष में रहते समय
ईंट खाते हैं
वही लोग
सत्ता में आने के बाद
पत्थर खिलाते हैं
लोकतंत्र में
यह किस्सा भरथरी से
चल रहा है
वाह रे
हिन्दी के विद्वान
समझकर भी समझ नहीं रहे
बड़ी-बड़ी बातें बाद में
पहले ईंट और पत्थर का
सिलसिला बंद कराओ।
---------------------
राजनीति में भाषा
---------------------
प्रधानमंत्री के उम्मीदवार की भाषा
नेहरू लोहिया वाजपेयी जैसी न हो
तो भी कोई बात नहीं
कम से कम और उससे भी कम
अपनी ही पार्टी के दूसरे वक्ताओं से तो
अच्छी होनी ही चाहिए क्यों भाई
अब यह मत कह देना कि वक्त बुरा है
भावी प्रधानमंत्री की भाषा और उतावलापन
छात्रनेताओं जैसा है तो भी चलेगा
बिल्कुल नहीं चलेगा चुनाव सभाओं में
गंभीरतापूर्वक भाषण देने में दिक्कत है
तो लिखित भाषण तो पढ़ सकते हैं
हद है भाई
आप खुद कुछ सीखने के लिए
चींटी की मुंडी के बराबर तैयार नहीं हैं
चाहते हैं कि देश आपको कहे मुताबिक
हाथी की मुंडी के बराबर समझने के लिए
तैयार हो जाए।
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आत्मविश्वास
----------------
लेखक हो या राजनेता
उसे आत्मविश्वास अर्जित करना पड़ता है
जिन्हें पार्टी पद-प्रतिष्ठा-पुरस्कार वगैरह
किसी की गोद में बैठने से मिल जाता है
वे जरा-सा ऊबड़खाबड़ आते ही
लुढ़क जाते हैं
धूल-मिट्टी में लोटकर बड़े हुए बच्चों से
न पंजा मिला पाते हैं न आंख।
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भारत मां को नोचने-खसोटने वाले
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देश बर्दाश्त कर लेगा
हिन्दू-मुसलमान की राजनीति
दस साल बीस साल पचास साल
लेकिन आखिर कब तक
स्त्रियों की लाज न बचाने वाले
राजा को बर्दाश्त करेगा
देश कैसे बर्दाश्त कर सकता है
कि राजा बलात्कारी को बचाए
और हत्यारे को मदद पहुंचाए
न्याय से वंचित निराश-हताश
लड़कियों को आत्महत्या के लिए
अपने कारनामों से उकसाए
समझ रहे हो
भारत मां को नोचने-खसोटने वाले
सत्ता के मद में चूर राजाओ
पीछे-पीछे जयकार करने वाले गुंडों को
लड़कियों को अपमानित करने की
छूट देने का अंजाम जानते हो
राजाओ भूल गये हो जहां
स्त्रियों की पूजा की जगह
गुंडाराज होता है वहां क्या होता है
वहां के राजा का क्या होता है
वहां के राजवंश का क्या होता है
उसके लाव-लश्कर का क्या होता है
जनता सब याद रखती है
और वक्त आने पर बहुत कुछ करती है
तुम्हारे साथ भी जनता वही करेगी
वही जो तुमसे पहले के सभी अहंकारी
राजाओं के साथ करती आयी है
घसीटकर उतारेगी सिंहासन से।
- गणेश पाण्डेय
मैं हिंदू हूं
मेरा तो नाम ही गणेश है
इससे अच्छा नाम भला
उस दिन और क्या हो सकता था
जिस दिन मेरा जन्म हुआ
मां गणेश चतुर्थी का व्रत थीं
मैं भारत में पैदा हुआ हूं
बुद्ध के इलाके का हूं
बुद्ध के घर का हूं
कैसे कह दूं कि मेरे पुरखे
प्राचीन कपिलवस्तु की सीमा में नहीं
जर्मनी में रहते थे
कैसे कह दूं
कि बुद्ध को नहीं मानता हूं
कि बचपन से मुझ पर
बुद्ध का प्रभाव नहीं है
मेरे गुरु
सच्चिदानंद अनीश्वरवादी हैं
सिद्धार्थनगर में रहते हैं
उनके पुरखे भी यहीं रहते थे
बचपन में मां ने
सिंहेश्वरी देवी के चरणों में
अनगिनबार मेरा शीश नवाया
फिर मैं आप से आप करने लगा
किशोर जीवन में कविता ने
मुझे गुरु सच्चिदानंद से मिलाया
धीरे-धीरे गुरु ने मां के संस्कारों को
पूरा का पूरा तो नहीं पर
किसी हद तक धोने-पोंछने का काम किया
प्रगतिशील हिंदी और उर्दू कविता से मिलाया
मुझे कुछ का कुछ बना दिया
विश्वविद्यालय में आना
मेरे जीवन की बड़ी घटना थी
गुलमोहर और अमलतास के फूलों ने
मुझे एक नये रंग में रंग दिया था
यहां मुझे
हिंदी की एक बड़ी दुनिया मिली
देवेंद्र कुमार बंगाली मिले
और मैं कविता बदलकर
कुछ का कुछ हो गया
चालीस साल से
गोरख और कबीर की छाया में
रह रहा हूं मेरी कर्मभूमि है गोरखपुर
कैसे कह दूं कि मुझे प्रेमचंद
और फिराक पसंद नहीं हैं
वह फिराक जो कहता है कि कविता
तरकारी खरीदने की भाषा में लिखो
मैं प्रगतिशील हूं
लेकिन हिंदी के भ्रष्ट मार्क्सवादियों को
बिल्कुल पसंद नहीं करता
मुक्तिबोध को पसंद करता हूं
मुक्तिबोध के ईमान को पसंद करता हूं
मैं न केवल पुरस्कारविरोधी हूं
बल्कि पुरस्कारों का धंधा करने वाले
लेखक संगठनों और अकादमियों का
विरोधी हूं
मंच माइक माला विरोधी हूं
मैं हिंदी का सफाई वाला हूं
वक्त ने मुझे क्या से क्या बना दिया
कहने के लिए हिंदी का पांडे हूं
और हिंदी के भ्रष्ट लेखकों का
रोज मैला ढोता हूं
रोज गालियां देता हूं
चूंकि मैं भी
कबीर की तरह
मार्क्सवादी कवि नहीं हूं
किसी लेखक संगठन में नहीं हूं
आधा सच और आधा झूठ नहीं बोलता हूं
कबीर की तरह निरंकुश हूं
सबको ठोंकता रहता हूं क्या इसीलिए
आज की तारीख में हिंदी का फासिस्ट कवि हूं।