मंगलवार, 4 जुलाई 2017

इतनी अच्छी क्यों हो चंदा

- गणेश पाण्डेय                                

तुम अच्छी हो
तुम्हारी रोटी अच्छी है
तुम्हारा अचार अच्छा है
तुम्हारा प्यार अच्छा है 
तुम्हारी बोली-बानी 
तुम्हारा घर-संसार अच्छा है
तुम्हारी गाय अच्छी है
उसका थन अच्छा है
तुम्हारा सुग्गा अच्छा है
तुम्हारा मिट्ठू अच्छा है
ओसारे में 
लालटेन जलाकर
विज्ञान पढ़ता है
यह देखकर 
तुम्हें कितना अच्छा लगता है
तुम 
गुड़ की चाय
अच्छा बनाती हो
बखीर और गुलगुला
सब अच्छा बनाती हो
कंडा अच्छा पाथती हो
कंडे की आग में 
लिट्टी अच्छा लगाती हो
तुम्हारा हाथ अच्छा है
तुम्हारा साथ अच्छा है
कहती हैं सखियां 
तुम्हारा आचार-विचार
तुम्हारी हर बात अच्छी है
यह बात कितनी अच्छी है
तुम अपने पति का 
आदर करती हो
लेकिन यह बात 
बिल्कुल नहीं अच्छी है
कि तुम्हारा पति 
तुमसे
प्रेम नहीं करता है
तुम हो कि बस अच्छी हो
इतनी अच्छी क्यों हो चंदा
चुप क्यों रहती हो
क्यों नहीं कहती अपने पति से
तुम उसे 
बहुत प्रेम करती हो।

(‘‘परिणीता’’ से)





2 टिप्‍पणियां:

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  2. दोनों कविताओं में प्रवाह एक-सी है । परन्तु संवेदनात्मक वैल्यू के मामले में गणेश पाण्डेय त्रिलोचन से आगे जाते हैं । त्रिलोचन जहां अशिक्षित चंपा को शिक्षा और सरोकारों से जोड़ने प्रयत्न करते हैं तो गणेश पाण्डेय चंदा के बहाने उसके (जो है जैसी है) गुणों का बखान कर उसके वैल्यू को स्थापित करते हैं । जैसा कि गणेश पाण्डेय ने मानक कवि की कविता के परस्पर रचना और उसकी चुनौती के संदर्भ में कहा , बिल्कुल सही कहा । मह बड़ा जोखिम कार्य है । परन्तु यदि कोई रचनाकार यह जहमत उठाए तो ; प्रयास करें कि वह आगे जाए । गणेश पाण्डेय इसमें समर्थ हैं ।

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