मंगलवार, 14 मार्च 2017

यह कौन है जो हमें अच्छा करने से रोकता है

-गणेश पाण्डेय

मेरे गाँव से सिवान तक
उसके सिवान से उसके गाँव तक
दूर-दूर तक खेतों की छाती डबडब पानी से जुड़ाएगी नहीं 
चाहे उर्वरधरा की अनगिन दिनों की लंबी प्यास बुझेगी नहीं
जड़ों में पहुँचेगी नहीं गोबर की खाद चाहे यूरिया - स्यूरिया 
तो कैसे लहलहाएंगी फसलें 
कैसे झूमेंगी नाचेंगी गाएंगी धान की लंबी-लंबी बालियां छातियों से ऊँचीं
कैसे रास्ता रोक कर बाबूजी जी को बताएंगी अपनी बहादुरी के किस्से 
कैसे गेहूँ हाथ मिलाएगा छूकर स्कूल जाते बच्चों से एक-एक करके 
कुछ चीजें बहुत जरूरी होती हैं आदमी के जीने के लिए 
जैसे मजबूत से मजबूत फेफड़े के लिए मुट्ठीभर हवा 
अँजुरीभर मीठा पानी दो कौर दालभात 
औकातभर दवाएं
बस  
और क्या चाहिए किसी गरीब को जमाने से 
राजा-महाराजा से किसी मंत्री-संत्री से और क्या चाहिए
इतना भी नहीं देते तो किसलिए होते हैं राजा और महाराजा
अपना पेट भरने के लिए कि अपनी तिजोरी
राजा का बेटा खाए दूधभात 
हमारा एक मुट्ठी कोदो-साँवा
राजा के बेटे के लिए आकाशमार्ग 
हमारे बेटे के लिए लीक भी ठीक नहीं
धन्नासेठ की बीवी का जन्मदिन दो सौ करोड़ में
हमारी बीवी का कोई जन्मदिन ही नहीं
कौन हैं जो सच को चोर की तरह छिपाकर रखना चाहते हैं
ये लेखक, विद्वान, आचार्य और अखबारनवीस 
सब धन्नासेठ और राजा के पालतू इनामी कुत्ते
अक्सर किसी झूट्ठे को राजा-महाराजा बनाकर रखना चाहते हैं
हम क्यों देखते हैं दूसरों के मुखारविंद
यह कौन है जो हमारे भीतर छुपा है और हमें कुछ अच्छा करने से रोकता है
कोई लालच का पुतला है
कि कोई डर। 

(यात्रा 12)


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