मंगलवार, 25 मार्च 2014

ज़मीनख़ोर

-गणेश पाण्डेय

वे ज़मीनख़ोर थे  
चाहते थे
औने-पौने दाम पर 
कस्बे की मेरी पुश्तैनी ज़मीन
मेरा पुराना दुमंजिला मकान
वे चाहते थे
मैं उच्छिन्न हो जाऊं यहां से
अपने बीवी-बच्चों 
पेड़-पौधों 
फूल-पत्तियों
गाय-कुत्ता समेत
वे चाहते थे मैं छोड़ दूँ 
धरती मइया की गोद
हटा दूं अपने सिर से 
उसका आंचल 
वे चाहते थे बेच दूँ 
खुद को 
रख दूँ
अपने मजबूर हाथों से 
उनकी आकाश जैसी असीम
लालची हथेली पर
अपनी जन्मभूमि 
अपना ताजमहल
और 
जीवन की पहली 
अनमोल किलकारी का 
सौदा कर लूँ
वे चाहते थे कर दूँ 
उसे नंगा और नीलाम
भूल जाऊं 
अपने बचपन का 
एक-एक डग 
पहली बार 
धरती पर 
खड़ा होना 
गिरते-पड़ते
पहला डग भरना
वे चाहते थे
बाबा बुद्ध की तरह
चुपचाप निकल जाऊं
अपनी धरती छोड़कर 
किसी को करूँ न खबर 
वे तो चाहते थे 
कि जाऊँ तो ऐसे
कि फिर लौट कर आने का 
झंझट ही न रहे 
वे मेरे मिलने-जुलने वाले थे 
मेरे पड़ोसी थे
कुछ तो बेहद करीबी थे 
और मेरे ही साथ 
मेरी धरती के साथ
कर रहे थे राजनीति  
खटक रहा था उन्हें
मेरा अपनी जमीन पर बने रहना
वे चाहते थे कि देश-विदेश
अनन्त आकाश में कहीं भी
चाहे उसी जमीन के नीचे
जल्द से जल्द चला जाऊं
पाताल में।

( ‘जापानी बुखार’ से)




1 टिप्पणी:

  1. BAHUT HI MARMSPARSHI KAVITA HAI ..1990 KE JABRIYA VISTHAPAN KE BAAD YAHAN JAMMU MEIN HAMARE PUSHTAINI PADOSI ISI TARAH AATE RAHE HAINN /AATE HAIN KASHMIRI VISTHAPITON KII ZAMEENEE AADI KHAREEDNE HETU..THEEK ESE HI ..

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