रविवार, 16 मार्च 2014

हमलोग नाटक बहुत करते हैं ...

-गणेश पाण्डेेय 
राजनीति कल्पना है या यथार्थ ? जाहिर है कि मेरी छोटी-सी बुद्धि से यथार्थ है। इसलिए हमारे समय की राजनीति मेरी समझ से नींद का महास्वप्न या दुःस्वप्न नहीं है। इसे हमने बनाया है। हमने रचा है यह पिजड़ा अपने इर्दगिर्द। हम भला इससे बच कैसे सकते हैं ? राजनीति कोई प्रेम कविता नहीं, जीवनसंग्राम का ऐसा पथ है, जिससे राहें फूटती हैं। सड़क चाहिए तो, नौकरी चाहिए तो, सुरक्षा चाहिए तो और अन्न चाहिए तो शिक्षा चाहिए तो, चहुँमुखी विकास चाहिए तो, सरकार और व्यवस्था की प्रक्रिया से गुजरने के लिए इसकी जरूरत पड़ती है। मनुष्य जीवन के लिए जैसे साँस जरूरी है, उसी तरह राजनीति। साहित्य के बिना मनुष्य जीवित रह सकता है, राजनीति के बिना नहीं। पशु राजनीति के बिना जीवन जी सकता है, पर मनुष्य नहीं। आशय यह कि जब यह इतना जरूरी है तो इसके प्रति हमारा अर्थात लेखकों, कलाकारों, पत्रकारों इत्यादि का दृष्टिकोण कभी-कभी बहुत संकुचित क्यों दिखता है ? यहाँ स्पष्ट करना जरूरी है कि मैं व्यावहारिक राजनीति की बात कर रहा हूँ, लाइब्रेरी में बंद या साहित्य की तमाम रचनाओं में बंद महान राजनीति की बात नहीं कर रहा हूँ। उस महान राजनीति की बात करने वालों को भी जीवन में हजार ऐसी मुश्किलों का सामना करना पड़ता, जहाँ लाइब्रेरी और साहित्य और विचार की किताबों में बंद राजनीति तिनके जितना भी मदद नहीं करती है। वहाँ काम आते हैं, कोई विधायक जी, कोई सांसद जी, कोई मंत्री जी, किसी पार्टी के कोई नेता जी, क्या यह झूठ है ? जिसके पारस यह नहीं होता है, वे पत्रकार मित्रों की मदद लेते हैं, पर उनकी शक्ति का केंद्र भी वहीं हैं। 
    साहित्य का प्रयोजन भी क्या समाज को सुंदर बनाना नहीं है ? क्या समाज को संुदर बनाने के लिए सुरक्षा और विकास इत्यादि का रास्ता राजनीति से होकर नहीं जाता है ? यह जो तमाम साहित्य अकादमी इत्यादि संस्थाएँ हैं, इन्हें भी पैसा वगैरह सब उसी सरकार से आता है। फिर पुरस्कारों और चर्चा इत्यादि के लिए जहाँ-तहाँ नाक रगड़ने वाले तमाम लेखकों के लिए राजनीति बड़ी गंदी जगह क्यों है ? जबकि वे खुद उससे अधिक गंदगी के शिकार होते हैं ? इस समय के चुनाव में एक अच्छी खबर यह कि मेधा पाटेकर समेत कई सामाजिक कार्यकर्ता चुनाव लड़ रहे हैं। पहले भी कई लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता चुनाव लड़ते रहे हैं। 
    मैंने दो छोटे-छोटे स्टेटस लिखकर हमारे समय की राजनीति और साहित्य के जानकार मित्रों से- जो अक्सर समस्याओं पर बहुत अच्छे-अच्छे विचार व्यक्त करते हैं-यह जानना चाहा किः ‘‘राजनीति में जाना जरूरी हो तो कहाँ जायें ? ...चुनाव सिर पर है। कभी-कभी यह सोचकर हैरान होता हूँ कि यदि हिन्दी के लेखको और पत्रकारों के लिए किसी एक राजनीतिक दल में शामिल होना अनिवार्य हो तो ये लोग जाएँगे किधर ? प्राथमिकता के आधार पर दलों का नाम किस क्रम में लिखेंगे ? या किसी एक दल या दो दल का नाम लिखेंगे ? प्राथमिकता के आधार पर पत्रकार लोगों के दलों का क्रम क्या होगा ? दरअसल इस सवाल के पीछे यह विचार सक्रिय है कि हम जिस व्यवस्था में है, कभी न चाहते हुए भी ऐसी कोई स्थिति किसी के साथ आ सकती है। यदि ऐसी कोई स्थिति आयी तो वे केजरीवाल की तरह जनता की राय लेंगे या दलों का चुनाव खुद करेंगे ? या कोई नयी पार्टी बनाएँगे ? बहरहाल दलों का क्रम तय करके रखना बेहद जरूरी है, क्या पता कब किसे चुनाव लड़ना पड़ जाय या ऐसे ही बिना मतलब या किसी बड़ी जरूरत की वजह से या किसी आंतरिक विवशता की वजह से एक दल चुनना ही पड़ जाय। पूर्वी उत्तर प्रदेश में तो वाम का न कोई मजबूत जनाधार इस वक्त है और न निकट भविष्य में संभव दिखता है। चुनाव की दृष्टि से वाम का भविष्य कमोबेश हर जगह निराश करने वाला है। ले-देकर कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा और कुछ दूसरे छोटे दल हैं। क्या सचमुच इन दलों में जाना लेखक की खुदकुशी होगी ? क्या पहले इन दलों में लेखक नहीं जाते रहे हैं ? या लेखक को हरगिज किसी दल में जाना ही नहीं चाहिए ? सक्रिय राजनीति से उसे दूर रहना चाहिए ? अरे भाई जब साधु-संत राजनीति के संग रास रचाने के लिए अक्सर आतुर होते हैं तो लेखक ही क्यों सक्रिय राजनीति से परहेज करे ? ऐसा इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि साधु संग लेखक भी वही काम करे जो साधु करते हैं। लेखक क्या कुछ बेहतर नहीं कर सकता है ? जरूरी है कि दलों की स्वीकार्यता के लिए विमर्श हो। यदि यह सब कुछ भी नहीं तो फिर विकल्प होगा क्या ? कितना और कब प्रभावी होगा ? फिलवक्त मैं खुद कहीं किसी दल में जा नहीं रहा हूँ, लेकिन क्या पता कोई लेखक मित्र तैयारी में हो ही़़़...’’ तुरत इस पर तीर की तरह चुभता हुआ एक दोटूक सच अपनी प्रतिक्रिया में रविकेश मिश्र ने कहा- ‘‘कि राजनीतिक स्थिति तो ये है श्रीमान दक्षिण वाम या पूरब पश्चिम का कोई अर्थ रह ही नहीं गया है। किसी वैचारिकता से दलों को कुछ लेना-देना नहीं, आदमी जिताऊ, टिकाऊ और कमाऊ हो तो हजार विद्वानों से बेहतर है। क्या करेंगे सैद्धांतिक बकवासी लेकर ? अब चिड़िया की आँख में तीर मारने वाला चाहिए और वफादार हो। ये पढ़े-लिखे लोग नाटक बहुत करते हैं, हालाकि चारित्रिक रूप से ये भी खोखले ही होते हैं, मौका पा जाये ंतो कौन है जो दो-चार अरब इधर-उधर न कर दे ?’’ इस प्रतिक्रिया के बरक्स संजय कुमार मिश्र की प्रतिक्रिया थी कि ‘‘ मेरे विचार मौजूदा स्थितियों को देखते हुए है कि सचमुच के एक लेखक को किसी भी राजनीतिक में न जाते हुए अपने साहित्य के माध्यम से ऐसा माहौल बनाया जाना चाहिए ताकि एक लेखक के लिए सक्रिय राजनीति दलदल न लगे, राजनीति का एजेंडा इतना सकारात्मक बन जाय कि कोई किसी भी दल में जा सके और अपना योगदान कर सके...कोई यह कह सकता है कि क्या यह संभव है तो मैं यही कह सकता हूँ कि हम लेखक है, साहित्यकार हैं, हमें बसंत के इस मनोहारी मौसम में सपने देखने की पूरी आजादी है।’’ कुछ और मित्रों ने भी बिना लागलपेट के अपने हिस्से का सच कहा, लेकिन मुझे जानना था कि वे मित्र क्या सोचते हैं जो नित्य, बल्कि क्षण-प्रतिक्षण अपनी राजनीतिक जागरूकता का परिचय देते हैं। कुछ मित्र तो यहाँ राष्ट्रीय अखबारों के संपादक-पत्रकार हैं तो कुछ नामी-इनामी लेखक, मैं चाहता था कि वे साफ-साफ बताएँ कि उनकी दृष्टि में कौन दल कितना खराब है या कितना अच्छा ? फिर पहले के स्टेटस को साझा करते हुए मैंने लिखा कि ‘‘इस देश में कोई एक पार्टी बहुत खराब है या दो पार्टियां बहुत खराब हैं ? या तीन या सब ? सब खराब हैं तो सिर्फ एक या दो सरकार न बनाएँ ,बाकी बनाएँ, ऐसा क्यों ? क्या कोई पार्टी सचमुच किसी सिद्धांत और विचारधारा इत्यादि की बहुत पक्की है या सब अवसरवाद या व्यवहारवाद की विचारधारा के साथ ? ऐसे में कहने के लिए लेखकों और पत्रकारों के पास पूरा सच क्या है ? इस माध्यम पर रोज राजनीतिक टिप्पणियां दिखती हैं, पर उनमें पूरा सच क्यों नहीं देख पाता ? सब एक खेल नहीं है तो और क्या ? कोई अभिव्यक्ति का खेल खेलने में माहिर है तो कोई विचार का खेल खेलने में माहिर है तो कोई व्यवहार का ? सब खेल ही है, तो कहीं हम खुद, जाने-अनजाने इस खेल में शामिल तो नही ंहैं ? सोचता था कि मित्रों के बीच समस्या रखने पर विकल्पों की बारिश होगी, पर दिग्गज पत्रकारों और लेखकों ने रास्ता दिखाया ही नहीं ? कितना अच्छा होता कि वे बताते कि सबसे खराब पार्टियों का क्रम ये है और अच्छी पार्टियों का क्रम ये है, पर अफसोस कि महाजन मौन हैं। कुछ मित्रों ने जरूर अपनी राय दी है। कैसे कहूँ कि ये बड़े भोले लोग हैं, जो बिना किसी लागलपेट के कुछ कहते हैं।
 मित्रो, इस पीड़ा को साझा करने की वजह सिर्फ यह है कि उन लोगों को अपना रूख पहले से साफ रखना चाहिए जो आज या कल किसी लेखक के किसी दल से या किसी दल के नेता से जुड़ने या उसके हाथ से कोई पुरस्कार इत्यादि लेने पर पर सबसे पहले नाक-भौं सिकोड़ेंगे। उन्हें चाहिए कि बताएँ कि कौन सा दल खराब है और कौन अच्छा या कम अच्छा ? क्यों कोई एक पार्टी सत्ता में न आये और क्यों दूसरी कोई पार्टी सत्ता में आए ? क्या हमें एजेंडे के आधार पर नहीं सोचना चाहिए ? क्या हमें सिर्फ भ्रष्टाचार के आधार पर सोचना चाहिए ? आज की तारीख में कौन-सी पार्टी है जो गरीब और अमीर के बच्चे को एक छत के नीचे पढ़ाई और दवाई देना चाहती है ? क्यों अलग-अलग दुनिया है ? क्यों कुछ स्त्रियाँ गैस के चूल्हे पर खाना बनाएँ और भारत की शेष स़्ित्रयाँ गीली लड़की के धुएँ में अपनी आँखें फोड़ें ? साहित्य के अँधेरे के खिलाफ लड़ना जितना जरूरी है, उतना ही समाज के अँधेरे के खिलाफ लड़ना भी जरूरी है। आजादी की लड़ाई के दिनों में लेखक की जो भूमिका थी, क्या आज वह भूमिका नहीं होनी चाहिए ? फिर सक्रिय राजनीति से परहेज क्यों ? लेखक संगठन भी इस दिशा में अपनी नयी भूमिका तय कर सकते हैं, बशर्ते वे लेखकों के पुरस्कार और चर्चा की राजनीति को छोड़ दें और समाज को संुदर बनाने और राजनीति की दुनिया में बदलाव लाने के लिए अपने आग्रहों से मुक्त हों।  बहरहाल बड़े लेखकों और पत्रकारों को किसी एक नेता या पार्टी का विरोध या समर्थन करने की जगह अपने हिस्से का पूरा सच जरूर कहना चाहिए।

               

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