शनिवार, 19 जनवरी 2013

गिरोह का लेखक बनाम प्रतिरोध का लेखक

- गणेश पाण्डेय

बंधुवर, आपके दर्द के साथ हूँ। सच तो यह कि आज हिंदी की दुनिया में हर वह आदमी दुखी है, जो हिंदी का लेखक नहीं है या मौजूदा दौर के हिंदी साहित्य का नया या पुराना धंधेबाज नहीं है। हिंदी साहित्य के परिदृश्य को लेकर दुखी तो आज वह लेखक भी है जो मौजूद दौर के अनेक लेखक गिरोहों में से किसी का सदस्य नहीं है। कहना चाहूँगा कि जो आज की तारीख में साहित्य का बुरा आदमी नहीं है। पहले ही बात साफ कर दूँ कि अब इस उम्र में बात-बात पर गुस्सा नहीं करूँगा। कोई चाहे तो मुझे अप्रिय कहकर भी देख ले। बस मैं यह देखूँगा कि यह जो मेरे सामने है, इसने अब तक हिंदी की दुनिया में किया क्या है ? इसकी हथेली की छाप कहाँ है ? चाहे उसके अँगूठे का निशान कहाँ है ? चाहे खूबसूरत दस्तखत कहाँ है ? कहाँ है उसकी अपनी छाप ? उसके पास सचमुच उसकी अपनी कोई छाप है या ऐसे ही फिल्म के हीरो की तरह शर्ट के बटन खोल कर घूमता है ? अभी यह हिंदी की दुनिया में ढ़ंग से जवान हुआ भी है या नहीं ? भला ऐसे लोगों की बात का क्या बुरा मानना  ? दिक्कत तब होती है, जब कोई हिंदी का अच्छा आदमी हो और उसे हिंदी के गुंडे तंग करना शुरू कर दें। ऐसा देखने में आता है। हिंदी का अच्छा आदमी आँख नम कर ले, यह मेरे लिए काफी तकलीफ की बात है। क्या हिंदी ‘‘सिर्फ’’ उनकी बपौती है जो कविता करते हैं या कहानी लिखते हैं या आलोचना लिखते हैं या हिंदी की पत्रिका निकालते हैं ? हिंदी आखिर किसकी है ? क्या हिंदी बोलने और लिखने वाले या हिंदी का साहित्य पढ़ने वाले उसके बेटे नहीं हैं ? उन्हें अपनी हिंदी की बेहतरी के बारे में बोलने का कोई हक नहीं है ? कक्षा में कई बार बच्चों से कहता हूँ कि तुम सब पृथ्वी के सबसे बड़े महाकाव्य हो। तुम हो तो महाकाव्य है, तुम नहीं हो साहित्य कुछ भी नहीं है। बड़े से बड़ा लेखक तुम्हारे बिना मुर्दा है। बड़ी से बड़ी किताब तुम्हारे (साहित्य के पाठकों के ) बिना पत्थर है। जैसे भगवान भक्त के बिना हो ही नहीं सकता। ऐसे में कोई हिंदी पुत्र दुखी हो जाये तो भाई मुझे तो दुख होगा। किसी और को न हो तो कोई बात नहीं।
अपने बहुत पुराने मित्र के उस दर्द को भी बताना जरूरी है, जिससे दुख हुआ-‘‘...आप आलोचक हैं।  कविगण आपकी कृपादृष्टि के आतुर. कहें तो वे आपके चरणों में मेरा सिर काट के रख देंगे इस उन्माद भारी बात के बात. आप इतने बेवकूफ नहीं कि "अधिकांश कवि" और "हिंदी के कवि" में आप को फर्...क नहीं पता हो. लेकिन भाजपाइयों की तरह ऐसा करके अपनी दुकान चमकाने में आपको परहेज नहीं. आपको सर चाहिए, ले लीजिये मेरा. मैं न कवि हूँ न आलोचक. पाठक हूँ. आप कहें तो तौबा कर लूं हिंदी साहित्य से
यह भी १९९० के बाद की फितरत है- साहित्य में लंठई और गुंडई. कोई बाहरी न घुसे.
कवि कविता लिखें, आलोचक आलोचना लिखें, तीसरे की क्या मजाल जो चूं-चपड़ करे....‘‘
       यह सब जिनकी वजह से हुआ, उन्हें मैं कुछ नहीं कहना चाहूँगा। क्योंकि मैंने उन्हें अभी किसी वयस्क रचना या बड़े काम के साथ नहीं देखा है। जिसदिन देखूँगा नतमस्तक होकर उनके काम को प्रणाम करूँगा। मैं यहाँ सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि ऐसा क्यों है कि बहस से तर्क को विदा कर दिया जाय ? या कहने वाले की सदिच्छा को नजरअंदाज किया जाय ? या किसी को अकेला पाकर दलबल के साथ हमला किया जाय ? सही जगह पर तो चोट अकेले भी की जा सकती है। फिर गिरोह या गिरोहबंदी की क्या जरूरत ? यह तो और भी बुरा कि लेखक गिरोह बना कर रहे। गिरोह का लेखक होना भी कोई लेखक होना है ?
    अरे भाई सिर पर विचारधारा का हिमालय है और समझ नहीं कि प्रतिरोध का लेखक होना ही सच्चे अर्थों में लेखक होना है। पहले भी कुछ-कुछ लेखक गिरोह बनाते थे। आज अधिकांश लेखक गिरोह में रहते हैं। क्या बायाँ बाजू क्या दायाँ बाजू। पहले के दिग्गज लेखक अपने समय के लेखकों से टकराते थे। वैचारिक और व्यावहारिक असहमतियाँ व्यक्त करते थे। इस नाचीज ने भी अपने ढ़िलपुक दोस्त के बारे में काफी कुछ कहा है। अपने शहर के लोगों के बारे में कहा है। नाराजगियाँ मोल ली हैं। अकेला कर दिया गया हूँ। फिर भी साहित्य का सच कहने में कोई कोताही नहीं की। साठ के आसपास हूँ और एक नये पैसे का पुरस्कार और सम्मान इत्यादि मेरे नाम नहीं है। फिर भी रहता हूँ किस तरह, यह किसे पता नहीं है। अवसर है तो बात साफ कर दूँ कि कोई यह न समझे कि पुरस्कार नहीं है तो पुरस्कारों का विरोध करता हूँ। अरे भाई पुरस्कार लो, एक नहीं हजार पुरस्कार लो पर पुरस्कारों के पीछे भागो नहीं, पुरस्कार तुम्हारे पीछे भागे। क्या आज यह दृश्य नहीं है कि हिंदी का लेखक पैदा होते ही मुँह से जिस शब्द का उच्चारण करता है, वह है-पुरस्कार। पैदा होते ही पहला डग जिस दिशा में भरता है, वह है दिल्ली। आज कितने युवा लेखक साहित्य की राजधानी से दूर रहना पसंद करते हैं ? जो राजधानी से बाहर रहते हैं वे भी बराबर राजधानी के संपर्क में रहते हैं। कुछ ही समय पहले अपने एक नोट में कहा है कि-‘‘ मित्रो! विडम्बना यह कि समाज का ही नहीं, साहित्य का भी अपना एक मध्यवर्ग है। साहित्य का यह मध्यवर्ग भी समाज के मध्यवर्ग की तरह अपने उच्च वर्ग की खुरचन, कृपा और जूठन से खुद को परमतृप्त अनुभव करता है। छोटे-बड़े पुरस्कारो और थोड़ी-बहुत चर्चाओं से खुद को अघाया हुआ जीव समझता है। उसकी शक्ति और सीमा और प्रतिभा से कहीं अधिक (झूठमूठ का) मान-सम्मान पा जाने की यह प्रवृत्ति, उसे साहित्य का जीहुजूरिया और लंठ और एक अर्थ में लठैत भी बनाती है। लठैत कहने से यह भ्रम न हो जाये कि यह वीरता के अर्थ में प्रयुक्त है, इसलिए यह बात साफ कर दूँ कि लठैत का जीवन और कार्यव्यापार मूल्यकेंद्रित नहीं होता है बल्कि वह तो अपने आकाओं का गुलाम होता हैं। वहीं एक वीर का जीवन और कार्य मूल्यकेंद्रित और स्वाधीन होता है। दुर्भाग्यवश जैसे समाज और राजनीति में एक निम्नवर्ग होता है, उसी तरह साहित्य में भी एक निम्नवर्ग होता है। जाहिर है कि निम्नवर्ग के लोग हाशिए का जीवन जीते है। कहना न होगा कि यह हाशिए का जीवन उन्हें बहुत-सी जीवनोपयोगी चीजों से वंचित तो करता है पर उनके जीवन को मूल्य और विचार से संपृक्त करता है और अपने हक के लिए संघर्ष की ताकत भी देता है। साहित्य में भी कुछ लोग हाशिए का जीवन जी रहे हैं। पर अपनी इच्छा से। वे भी चाहते तो कूद कर साहित्य के मध्यवर्ग के डिब्बे में बैठ सकते थे। बस एक अदद या एकाधिक गॉडफादर बनाने की देर थी। गॉडफादर आज सबसे अधिक हिंदी साहित्य में सुलभ हैं। वे तो इसीलिए पैदा ही हुए हैं, अच्छा और अविस्मरणीय लिखने के लिए नहीं। हर शहर के उच्चवर्ग में ये मिल जाएँगे। पर ज्यादातर लेखक राजधानी में गॉडफादर चुनते हैं। क्योंकि वहाँ उनका एक नेटवर्क होता है। गुट होता है। गिरोह होता है। जिसमें कई तरह के प्रभावशाली लोग, संपादक-पत्रकार, संस्थाएँ, अखबार, पत्रिकाएँ और बड़े प्रकाशनकेंद्र होते हैं।
    इस मध्यवर्ग के उड़नखटोले में बैठे हुए वे तमाम लोग हाशिए का जीवन जीने वाले और प्रतिरोध की आवाज पैदा करने वाले लेखकों को बर्दाश्त नहीं कर कर पाते हैं। विडम्बना यह कि उनसे टकरा भी नहीं पाते हैं। वे जो साहित्य में हाशिए का जीवन आज जी रहे हैं, रचना और आलोचना में बेहतर कर रहे हैं। अपने हिस्से का पूरा सच कह रहे हैं। अपने जीवन के ताप से जो रच रहे हैं, वह उन मध्यवर्गीय लेखकों से अच्छा ही नहीं बल्कि नया भी है। इसीलिए ये हाशिए का जीवन जीने वाले, जिन्हें हाशिए का जीवन जीने वाले उपेक्षित और वंचित जन की तरह किसी पुरस्कार और यश की इच्छा नहीं है, वे तो बस साहित्य की धरती के लिए लड़ रहे है। साहित्य के अरण्य के लिए रण कर रहे हैं। आने वाली पीढ़ी के लिए लड़ रहे हैं।
    जैसा कि पहले कहा गया कि अपने-अपने गाफडफादरों और उप गॉफडफादरों के ‘जीहुजूरिया और लठैत’ टाइप के छोटे-बड़े लेखक साहित्य में हाशिए का जीवन जीने वाले लेखकों को अभी साहित्य का नक्सली नहीं कह रहे हैं। ये कुछ भी कहें क्या फर्क पड़ता है....पता नहीं साहित्य के सांगठनिक क्रांतिकारी साथियों को कोई फर्क पड़ता है या नहीं!
     बहरहाल मैं बात अपने मित्र के दर्द की कर रहा था। मुझे ही नहीं मेरे मित्र को भी दर्द है कि आज हिंदी के कवि बिकाऊ क्यों हैं ? जब वे कहते हैं कि-‘‘ समकालीन कविता का संकट क्या है... अधिकांश कवि तो खुद को पाँच पौंड में बेचने पर आमादा हैं ।’’
    मुझे तनिक भी बुरा नहीं लगता। आज जो बड़े-बड़े कवि दृश्य पर हैं, उनमें कई अमुक-अमुक पुरस्कार के लिए अमुक-अमुक के दरबार में नाक रगड़ चुके हैं ? क्या पुरस्कारों के लिए जुगाड़, राजनीति, तिकड़म और अपनी इज्जत गिरवीं रखना छिपी हुई बात है ? कथित बड़े पुरस्कारों की बात छोड़िए, उस जमाने के पाँच पौंड की बात भी छोड़िए, किसे यह पता नहीं कि आज पाँच सौ रूपये के पुरस्कार के लिए क्या करना पड़ता ? पुरस्कार की पहली शर्त है कि लेखक अपनी जीभ काट कर सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए उनके  चरणों में नहीं, सत्ता के शिखर पुरुष को या उनके दरबारियों के चरणों में सौंप देगा या अपने आचरण के माथे पर चिपका देगा और कभी साहित्य की सत्ताओं के खिलाफ एक शब्द नहीं कहेगा। प्रतिरोध की नकली कविता खूब लिखेगा, राजनीति और समाज और धर्म आदि की सत्ता के विरुद्ध आग उगलेगा पर साहित्य की सत्ता के सामने सू-सू कर देगा। क्या पहले के लेखक यही करते थे ? फिर  आज का युवा लेखक यह सब क्यों करता है ? युवा तो बेचारे हैं, जिन्हें कथित बड़े पुरस्कार मिल चुके हैं, वे भी साहित्य के भ्रष्टाचार के खिलाफ एक शब्द नहीं कहते। साहित्य के इन अघाये हुए लोगों और राजनीति के माननीयों में क्या फर्क है ?
  राजनीति में जैसी भी है, जितनी भी ताकतवर है, एक जनता है। जब भी मौका मिलता है अच्छा करने की कोशिश करती है। जो तख्त है उसी को हरबार उलटती-पलटती है। कभी यह तो कभी यह। पर कुछ करती है। अलबत्ता राजनीति की जनता अभी अपने लिए नया तख्त नहीं बना पा रही है। पर ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन यही जनता अपने लिए नया तख्त बना लेगी। निकाल बाहर करेगी इस-उस गिरोह को। लेकिन भाई साहित्य में जनता कहाँ है ? साहित्य की जनता को कच्चा खा जाने वाले कौन लोग हैं ? आज साहित्य में जनता है तो बची-खुची, बहुत कम है। जो हैं उनके लिए तो मौजूदा तख्त को उलटना-पलटना तो दूर, छूकर बदलाव का एक शब्द कहना तक मुश्किल है। शायद इसी वजह से मित्र को दर्द हुआ और कहा कि लो साहित्य के माननीयों मेरा सिर काट लो...
 यह सब ऐसे चलता रहा तो यह बची-खुची जनता एक दिन अपने लिए गिरोह के लेखकों से इतर दूसरे लेखक चुन लेगी। हजार तिकड़म से जिन्हें पुरस्कार मिल गया है, उन्हें भी तज देगी साहित्य की जनता। हमारे समय में ही पुरस्कारों के लिए रोने वाले लेखक भी मौजूद हैं और पुरस्कारों के शोरगुल से दूर रहकर काम करने वाले लेखक भी। अफसोस यह कि नये लेखक कभी-कभी अच्छे और पुरस्कारों के पीछे न भागने वाले लेखक को बहुत देर बाद पुरस्कार मिलने में पर प्रसन्नता तो व्यक्त करते हैं पर यह सवाल नहीं करते कि भाई इस बुजुर्ग कवि को पुरस्कार देने वाले गलत हैं या मुँह में चम्मच लेकर घूमने वाले कवियों को पुरस्कार देने वाले गलत थे ? क्या सवाल नहीं बनता है ? लेकिन वे क्यों सवाल करेंगे जो खुद फौरन से पेश्तर एक अदद पुरस्कार चाहते हैं ? ऐसे वक्त में जब साहित्य सच का सखा नहीं, झूठ का मित्र है,
मैंने अपने मित्र से कहा:
कम कविता के दिन थे
कुछ करने के दिन न थे
कविता के लिए मरने के दिन न थे
जो मरे मारे गयेए कोई न पूछ थी कहीं।
रोशनी का काम उनके जिम्मे न था
जिनके पास कुछ ढ़का.छिपा न था।
गजब का मंजर था सामने
टुटही हरमुनिया थी
वक्त.बेवक्त राग जैजैवन्ती गवैया थे
वही झाँझ.करताल वही बजवैया थे
बड़े.बड़े घुटरुन चलवैया थे
कुछ थे जो
बाहरी जहाजों पर कूद.कूद चढ़वैया थे
कई तो अपने ऊपर ग्रंथ छपवैया थे।
रटन्त विद्या के दिन थे
एक कविता दौर के अन्तिम दिन थे
दृश्य उन्हीं का था
जिनके जीवन में कोई संग्राम न था
जीवन छोटा था
कम कविता के दिन थे
फिर भी कुछ पागल थे बचे हुए
जिनके हौसले थे कि कम न थे।...
(‘‘जल में’’ से)
     कम कविता के दिनों में कुछ भी कहना खतरे से खाली नहीं। फिर साहित्य में होने का मतलब कुछ लोगों के लिए खतरे उठाना भी है। हाँ जिनके लिए हलवा-पूड़ी खाना है, वे अपने काम में जुटे रहें....




10 टिप्‍पणियां:

  1. जिन्हें इए तीखे, बेधक और सच्ची व्यथा को संप्रेषित करने वाले लेख को पढ़ना, और इससे कुछ सीखना चाहिए, वे इसकी तरफ़ तवज्जो नहीं देंगे. कि कहीं इन विचारों से उनका वर्षों की मेहनत से साधा व्यक्तित्व-चरित्र बदल न जाए. बहुत धारदार लिख रहे हैं, लगातार ! यह बेहद सुख और सुकून देने वाली बात है कि इस बुरे समय में भी ऐसे लोग हैं जो आंख में उंगली डालकर सच दिखाने की जोखिम उठा रहे हैं. सलाम !

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  2. आपकी पीड़ा में बराबर की साझीदार हूँ। बेहद क्षोभ की बात है कि लेखक वर्ग अपने समीकरणों की सिद्धि के लिए चलाई गई मुहीम को अपनी क्रांतिकारिता के रूप में प्रदर्शित करते और प्रतिबद्धता के रूप में बखान करते हैं। हिन्दी का सामान्य पाठक तो क्या कई लेखक तह इन समीकरणों को समझ न पाने के चलते इसे उनकी क्रांतिकारिता मान बैठते हैं व साथ खड़े हो जाते हैं, एक गुट का हिस्सा बन जाते हैं। निर्गुटों के लिए कोइ स्थान नहीं। सब साहित्य के मठाधीश हो जाने के अभियान में लगे हैं। गन्दगी इतनी अधिक है कि कहने के लिए शब्द कम पड़ जाएँ और धिक्कारने के लिए ग्लानि ! इन धूर्तों की शक्ति नियमित बढ़ती ही चली जा रही है, इसे सुगम पथ मान कर सब के सब इस प्रेयमार्ग पर दौड़े चले जाने में अपना हित ( इसे स्वार्थ पढ़ा जाए) समझते हैं।

    प्रश्न यह भी है कि निषेध का उपाय क्या हो ..... केवल सिर पकड़ पर बार-बार बैठ जाती हूँ, इस से तो कोई समाधान नहीं हो सकता। आप लोग वरिष्ठ हैं, कुछ अन्य वरिष्ठों के साथ मिलकर युक्ति तो निकालनी होगी।

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  3. बिलकुल सही नब्ज़ पर हाथ रखा है आपने ..........वास्तव में आज हिंदी में आप जैसे लोगो की बेहद कमी है जो बिना किसी लोभ और स्वार्थ के सच बोलने और कहने का जज्बा रखते है ......असल में ऐसा सच कहने का साहस बहुतेरो में इसलिए भी नहीं है वेह भी इस गलिज़ता के हिस्से बन चुके हैं .........

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  4. इस आलेख के लिए धन्यवाद. हमारा समय कडवी बातें करने और अलगाव झेलने की माँग करता है.
    समकालीन साहित्य के परिसर में व्याप्त साहित्येतर और साफ-साफ कहें तो साहित्यहंता प्रवृतियों को ले कर आप की चिन्ता और क्षोभ का साझीदार हूँ गणेश जी.कविता अब नहीं लिखता लेकिन अनाम-अनजान कवियों से लेकर विश्व कविता के अक्षर हस्ताक्षरों तक से जुड़ा हूँ. कई बार लगता है कि हाँ, यही तो कहना था मुझे जो मुझसे बहुत ज्यादा बेहतर ढंग से कह दिया गया, तो उस रचना को अपनी-पराई सोचे बिना प्रचारित करता हूँ और एक पाठक का कर्त्तव्य निभाता हूँ. साहित्य की साहित्येतर चर्चाएँ जो अक्सर असभ्य और असाहित्यिक रूप में सामने आती हैं, उसकी एक झलक मैंने भी पंडाल में घुस के देख ली. ये सस्ती सतही चीजें अपने आप भूकंप की तरह नहीं आयी हैं. यह एक विनाशलीला है जिसे चतुर्दिक संकटग्रस्त व्यवस्था के साहित्यिक कारिंदों ने रची है. पुरस्कर्ता और प्रकाशक साहित्य में मनचाही प्रवृतियों का पालन-पोषण, संवर्धन कर रहे हैं और सहज ही इस हड़बोंग में शामिल कुछ लेखक लंठ और लठैत की भूमिका में उतर रहे हैं.
    जिस तरह आसानी से रातोंरात अरबपति बनने के लिए माफिया सरगनाओं ने गिरोहबंदी की, जिसका जीवन्त इतिहास पूर्वांचल ने भी देखा-भोगा, वही शायद थोड़े में महान बनने की ख्वाहिश के चलते साहित्य में गिरोह बंदी के रूप में सामने आ रही है.
    सबके बावजूद साहित्य का उजला पक्ष भी है और वह ज्यादा चमकीला, ज्यादा आशान्वित करनेवाला है.

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  5. आज पहली बार आपके ब्‍लॉग पर आया, लेकिन बहुत कुछ पाया...आपकी कलम और 'आग' को प्रणाम, दादा !

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  6. यही हमारे समय का सच है । आज आप का ये लेख पढ़ने के बाद ये कहना चाहती हूँ कि शुरुआत में मैं इन गिरोह बन्द घेरे को पहचान नहीं पाई और खूब बकवास सुनती रही । जैसे जैसे आगे अनुभव का दायरा बढा इनकी लंगोट तक उतर गयी । अकेले रहना बेहतर लगता है अब ।

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