शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

कवि की हत्या

- गणेश पाण्डेय

गोरखपुर में मेरी आँखों के सामने ही एक कवि की हत्या कर दी गई और मैं उस कवि को कविता और कवि के हत्यारों के पास जाने, बल्कि उन सबके साथ रहने से रोक नहीं पाया। दरअसल हत्यारों की वह मंडली थी ही ऐसी, जिसमें सरदार से अधिक किसी भी प्रतिभा वाले का मरना तय था। मरने की विधि ओैर प्रकार सब बहुत स्वाभाविक होता था। कोई माई का लाल कह नहीं सकता था कि हत्या की गयी है। सब समझते कि अपने आप मर गया है। यह न लगे कि हत्या की गयी है। यह भी न लगे कि ख़ुदकुशी की गयी है। कोई दुर्धटना, लूट, ज़हरखुरानी या रंजिश वगैरा, ंकोई वजह कहीं दिखे ही नहीं। वे सब अधिक प्रतिभा वाले को अचानक झटका देकर नहीं मारते थे, धीमा ज़हर देते थे। इतना धीमा ज़हर देते थे कि सत्तर-पचहत्तर पार करने के बाद साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने का उसका नंबर आए, तब उसे और शहर के बाक़ी लोगों को पता चले कि अरे अकादमी का अध्यक्ष तो उस कवि को कवि ही नहीं मानता है। मृत कवि मानता है। सार्वजनिक रूप से कहना भी शुरू कर देता, जिससे उस पर लांछन न लगे कि जो प्रतिभाशाली कवि उसके बहुत निकट होता है, उसके गैंग में होता है, कोई पैंतालीस-पचास साल गैंग की सेवा में देता है, सरदार का फ़रमाबरदार होता है, वह उसकी हत्या कर देता है। इसलिए कि वह उससे अधिक प्रतिभाशाली होता है। जिस प्रतिभाशाली कवि की बात कर रहा हूं, उसके केस में भी यही हुआ था। 

      इस हत्याकांड से बहुत पहले की, इस कवि की बहुत अच्छी याद से बात फिर से शुरू करते हैं। मैं उन दिनों अपने प्यारे तेतरी बाज़ार में रहता था। जो अब सिद्धार्थनगर जनपद का मुख्यालय है। उससे कोई दस किलोमीटर दूर उस्का बाज़ार में एक कवि सम्मेलन का आयोजन था। जिसमें शामिल होने के लिए तेतरी बाज़ार से जाने वालों में डॉक्टर सच्चिदानन्द मिश्र, डॉक्टर अबू शहमा सिद्दीकी, मैं और मेरी उम्र के कुछ और युवा कवि शामिल थे। कविता पढ़ने और कविता लिखने के लिए किन-किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, उसी समय पता चला। हम उपलब्ध कराई गई जिस जीप में सवार होकर कविता पढ़ने के लिए उसमें बैठकर जा रहे थे, रास्ते में ही उसने हमारे छक्के छुड़ाने शुरू कर दिए। थोड़ी दूर चलती, फिर बंद हो जाती और इस तरह कोई पाँच-छः बार मैं और दूसरे युवा कवि मित्र धक्का देते फिर जीप स्टार्ट होती। चूँकि डॉक्टर सच्चिदानन्द मिश्र मेरे प्रथम साहित्य गुरु थे और डॉक्टर अबू शहमा सिद्दीकी उनके मित्र थे, इसलिए ज़ाहिर है कि धक्का देने का काम हमें ही करना था। इस बीच कविता-सविता भूलकर यह सोचता रहा कि अभी और कितनी बार धक्का देना पड़ेगा। ख़ैर, कविता के लिए धक्का देने का अंत तो अभी नहीं हुआ था, लेकिन हम सब उस शामियाने में पहुँच गए थे, जहाँ मंच पर चटक रोशनी में कवि गण बैठे हुए थे और बस सरस्वती वंदना पढ़ने के लिए कोई कवि खड़ा ही हुआ था। हम भी मंच पर बैठे। मुझ पर जीप के धक्के का असर आज तक इतना है कि मैं भूल गया हूँ कि मैंने उस कवि सम्मेलन में अपनी कौन सी कविता पढ़ी थी। ख़ैर, ग़ज़ब तब हुआ और मेरी चेतना तब वापस लौटी, जब गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से आए प्राध्यापक अनन्त मिश्र कविता पढ़ने के लिए माइक के सामने खड़े हुए। क्या सुदर्शन मुखमंडल था, क्या लंबी धज थी, क्या गोरा रंग था, फुल्ले-फुल्ले गाल का ज़िक्र तो अभी किया ही नहीं और ज़ुल्फ़ें किसी हीरो की तरह। आवाज़ जैसे दिलीप कुमार की तरह। खनकती हुई। उठती-गिरती हुई। एक-एक शब्द पर जैसे किसी फ़िल्म के सुकोमल नायिका के सुंदर पैर ठिठक-ठिठक जाते हों। उस कवि की एक ही कविता ‘पगड़ी’ मुझे घायल करने के लिए काफ़ी थी। यह कहने में कोई संकोच नहीं कि उस रात वह कवि मेरे लिए कविता का हीरो था। फ़िल्म थोड़ी लंबी है, इसलिए थोड़ा-थोड़ा और आगे-पीछे करके बताता चलूँगा। फ़िल्मों के अंतिम दृश्य में जैसे कुछ हीरो मर जाते हैं, जैसे ‘आनंद’ फ़िल्म में आनंद को, बाबू मोशाय बचा नहीं पाता है। कुछ-कुछ वैसी ही कहानी उस कवि की और उससे मेरे रिश्ते की है। मैं भी कहां बचा पाया, अनंत मिश्र को। गोरखपुर के अपने समय के कवियों पर बहुत पहले की मेरी एक बहुत छोटी कविता है- 

यहीं देखा
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कई 
कवि देखे
कई तरह के 
कवि देखे
कोई मधुकर था यहाँ
कोई काला था, कोई दिलवाला
कोई परमानंद, कोई विश्वनाथ।

देवेंद्र कुमार को यहीं देखा
अपनी हीर कविता के लिए राँझा बनते।

यहीं देखा फक्कड़ अनन्त को
कविता राधा को देखते और देखते रह जाते।

यहीं जाना मैंने 
क्या होता है कविता के लिए मर मिटना।

    देवेंद्र कुमार कविता के अनन्य प्रेमी थे। वह अपनी कविता की बहुत इज्जत करते थे, उसे दूसरे कवियों की तरह ले जाकर दिल्ली के बाजार में खड़ा नहीं कर देते थे। आओ मेरी कविता की अदा देखो, कमर देखो, लिपिस्टिक देखो, काजल देखो, गोरी-गोरी कलाई देखो, आओ घूंघट उठाकर देखो, नथ उतारकर देखो। मेरी कविता को ले लो, मुझे साहित्य अकादमी पुरस्कार दे दो। वे अपनी कविता से बहुत प्रेम करते थे। उसकी इज्जत का कभी सौदा नहीं करते थे। अपने सीने से लगाकर रखते थे। एक-एक शब्द सुई-धागे से ख़ुद सिलते थे, किसी दर्जी के पास नहीं जाते थे। देवेंद्र कुमार इस लेख के मुख्य विषय नहीं हैं। कविता में नाम आया है और अनन्त मिश्र से उनका प्यारा रिश्ता रहा है, इसलिए कुछ कह गया। अनन्त मिश्र को देवेन्द्र कुमार अपने बाद इस शहर के सबसे अधिक संभावनाशील कवि के रूप में देखते थे। संत कबीर छात्रावास के कमरा नंबर सात में देवेंद्र कुमार अक्सर आते थे। उनके दफ़्तर जाने और दफ़्तर से लौटने का रास्ता ही वही था। उनका दफ़्तर पास में था। कभी मैं उनकी तरफ़ निकल जाता था। देवेन्द्र कुमार, मुझसे अनन्त मिश्र की ग़ैरमौजूदगी में कहते थे कि अनन्त मिश्र बहुत अच्छा लिखते हैं। कविता की वजह से निकटता स्वाभाविक थी। परीक्षाओं में अनन्त जी की ड्यूटी मेरे कमरे में लगती या आसपास, अनन्त जी जब भी गदेली पर तम्बाकू रखकर चूना मिलाते, एक बार मेरी ओर देख लेते और उत्तरपुस्तिका से एक क्षण के लिए मेरा ध्यान भंग करके हथेली मेरी ओर बढ़ा देते। उन दिनों मेरे लिए यह कितना अच्छा था, इस समय बता नहीं सकता। प्रसंग अनन्त जी की कविता का है। हालाँकि बाद में बच्चों ने पान-तम्बाकू सब छुड़ा दिया। ख़ैर।


    वह बहुत अच्छा लिखने वाला कवि कब विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के षड्यंत्र का शिकार हुआ, यह बहुत बाद में पता चला। अनन्त जी, जब अस्सी के पास पहुँचे। उनके जन्मदिन पर आयोजित एक भव्य समारोह में विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने सार्वजनिक रूप से अनन्त जी कविताओं को तुरंता कहा, अधपकी कहा, कच्ची कहा। अलबत्ता शब्द दूसरे थे, लेकिन आशय यही था। ओह, यह सब अनन्त जी के लिए कितना तकलीफ़देह रहा होगा। इस समय जब कविता की जान लेने के सौ तरीक़े का यह चौथा अध्याय लिख रहा हूँ, अस्वस्थ हूँ और बहुत दुःख का अनुभव कर रहा हूँ। मेरी तबीयत ख़राब हो गई थी, सिस्टॉलिक ब्लड प्रेशर काफ़ी बढ़ गया था। अलग से ब्लड प्रेशर कम करने की दवा दी गई। अभी भी डरा हुआ हूँ। नाश्ते में नमक बिल्कुल कम लेना है। बच्चों को पता नहीं है कि लैपटॉप छूने की मनाही है तो मोबाइल पर क्या लिख रहा हूँ। ख़ैर। सबकुछ माता सरस्वती के हवाले छोड़कर आलोचक-धर्म का निर्वाह कर रहा हूँ। किसी को तो साहित्य का सच पूरा का पूरा कहना पड़ेगा। आज जब हिन्दी के आलोचक, हिन्दी का काम करने की जगह गांधी और नेहरू पर पोथा लिख रहे हैं, चाहे विमर्श-विमर्श खेल रहे हैं, मैं वह सब लिख रहा हूं, जो शायद कभी लिखा नहीं जाता। यों तो अनन्त जी के कुछ शागिर्दों ने उन पर कुछ लिखा भी है, तो बहत औसत। न डूबकर लिखा है, न उनकी कविता का सच लिखा है। सेहत की वजह से अनन्त जी की तमाम कविताओं पर लिखने की स्थिति में नहीं हूं। वैसे भी किताब के विषय को ध्यान में रखकर जो बहुत ज़रूरी है, कह रहा हूं। कवि की हत्या कैसे की गयी, किसने की, यह सब बताने से पहले आपकों कवि की दुनिया में ले चलना ज़रूरी है। असल में किसी भी कवि की किसी भी कविता के संसार में प्रवेश करने से पहले कवि के व्यक्तित्व और उसकी निजी दुनिया का साक्षात्कार जरूरी होता हैं तभी हम किसी कवि को और उसकी कविता को पूरी तरह खोल पाते हैं। अनन्त जी की एक बहुश्रुत कविता मकान को आलोचक अरविंद त्रिपाठी अभाव की कविता के रूप में देखते हैं, लेकिन मुझे यह कविता एक प्रेम कविता के रूप में दिखती है-
मकान
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आदमी के ऊपर छत होनी ही चाहिए
वह घरेलू महिला
हमेशा मिलने पर कहती है
उसका बंगला नया है
उसके नौकर उसके लान की सोहबत ठीक करते हैं
और वह अपने ड्राइंगरूम को
हमेशा सजाती रहती है।
मैंने नीले आसमान के नीचे
खड़े हो कर अनुभव किया
कि छत मेरे सिर से शुरू होगी
या मेरे सिर के कुछ ऊपर से
जब मैं मकान बनाऊँगा,
अब मैं मकान हो गया था
और मेरी इंद्रियाँ जँगलों की तरह
प्रतीक्षा करने लगी थीं
मैंने सोचा
यह रहे मेरे नौकर-चाकर
मेरे हाथ और पाँव
यह रहा मेरा दरवाजा मेरा चेहरा
यह रहा मेरा डायनिंग रूम
मेरा पेट
यह रहा मेरा खुला हुआ बरामदा
मेरी छाती
यह रहे कैक्टस कँटीले
मेरी दाढ़ी-मूँछ
और यह रहा मेरा दिल
मेरा ड्राइंगरूम
मैंने पूरा मकान मिनटों में
खड़ा कर लिया था,
और अब मैं आराम से
सैर पर जा सकता था
जेब में मूँगफली भरे हुए
और चिड़ियों से मुलाकात करते हुए।

    इस कविता की एक-एक ईंट अलग करके देखें, उसकी नींव तक जाएँ, नींव की एक-एक ईंट निकालें और उसकी निर्मित में छुपे ख़ज़ाने को खोलें। वह घरेलू महिला हमेशा मिलने पर कहती है। वह हमेशा क्यों मिलती है या मिलने पर हमेशा मकान बनाने की बात क्यों करती है। कहना चाहिए कि वह क्यों चाहती है कि उसके पास एक छत होनी ही होनी चाहिए। वह ऐसे ही दरबदर मारा-मार न फिरे।
आखिर वह गृहिणी कौन है, उससे उसका कया रिश्ता है। वह कब से उस घर की गृहिणी है, मालकिन है, अपने नौकर-चाकर पर हुक्म बजाती है और सारा दिन घर की सजावट और ख़ुद को क़ीमती इत्र-फुलेल वगैरा से सजाने-सँवारने में लगी रहती है। गृहिणी होने के पहले क्या थी? किसी विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की छात्रा थी, उसकी सहपाठी थी। क्या थी, क्यों हमेशा उसे मकान बनाने के लिए कहती है? कोई ऐसे ही किसी को हमेशा कुछ भी कहता है? वह घरेलू महिला, जब न धरेलू थी और न महिला, बल्कि युवती थी, तब कितनी सुंदर थी, इतनी ही सुंदर थी या इससे अधिक? कोई तो मन ही मन चाहता रहा होगा, जैसे प्रकटप्रेमी रहा होगा? किसकी प्रेमिका रही होगी, यह रूपगर्विता धनाढ्य स्त्री? कई बार प्रेम में ऐसा भी होता है कि कोई सखी अपनी सखी के भूतपूर्व प्रेमी से अप्रकट प्रेम करने लगती है। कई बार ऐसा भी होता है कि कोई आहत प्रेमी, प्रेम की पीर से उबरने के लिए किसी अन्य स्त्री में अपना प्यार ढूँढने लगता है। प्रेम के विराट आश्रय से बाहर कर दिया गया प्रेमी किसी अन्य स्त्री से प्रेम का एक टुकड़ा छत चाहने लगता है, जिसमें ज़िंदा रह सके। कभी मिलता है, कभी नहीं मिलता है। साधारण प्रेमियों के लिए कई बार प्रेम आयी-गयी बात हो सकती है, लेकिन घनानंद से लेकर आज तक के सभी कवियों के लिए तो नहीं, क्योंकि आज के अधिकांश कवि व्यभिचारी होते हैं, कुछ कवि होते हैं, जो अपने प्रेम को भूल नहीं पाते हैं। बहुत पहरा न हो और प्रेम सार्वजनिक न हो पाया हो तो मिलने की भी कोशिश करते हैं। जिनका प्रेम सार्वजनिक हो जाता है, दोस्त-यार कवि की पत्नियों को भी बता देते हैं, उनके प्रेम की पीर घनानंद से भी बड़ी होती है। ख़ैर, तो थोड़ी देर के लिए मान लें कि इस कविता की गृहिणी, कविप्रिया है या कविप्रिया की प्रतिमूर्ति है, छाया है, तो अर्थ का एक अनन्त आकाश खुलता है। कविता में गृहिणी अपने नौकर-चाकर या मुनीम और ख़ज़ांची या रसोई का काम देखने वाले महाराज से नहीं कहती है कि आदमी के सिर पर एक छत होनी चाहिए। वह तो उस बेरोज़गार या अल्पआयवर्ग के प्रेमी युवक से कहती है, जो उससे मिलने आता रहता है। कहना चाहिए कि देखने के लिए आता रहता है। वह युवक कवि भी हो सकता है या कोई और युवक भी हो सकता है, जिसकी काया में कवि कल्पना की दुनिया में परकाया प्रवेश करता है। वह सुंदर और धनाढ्य महिला चाहती है कि यह प्रेम का मारा युवक सड़कों पर आवारा मारा-मारा न फिरे, शायद मजाज लखनवी की तरह या किसी और की तरह, इसलिए इसका पक्का अपना ठौर-ठिकाना हो। किराए के मकान का मालिक रोज़-रोज़ इसे तंग न करे। इसका अपना एक मकान हो। एक छत हो। वह सुंदर स्त्री प्रेम की छत-वत की दुनिया से बाहर निकल चुकी है, दुनियादारी को निकट से देख रही है। पैसा ही उसके समय का सत्य है। प्रेम-व्रेम या पार्टटाइम प्रेम, दिल बहलाव है। किसी कवि का किसी स्त्री को दिया गया एक घंटे का ट्यूशन। आओ-बैठो, चाय पिओ और घर जाओ। यह तो कवि का बावलापन है, जो इस थोड़ी देर की परायी दुनिया को अपना समझकर उसके पास चला जाता है। रोज़-रोज़ वह स्त्री समझाती है कि कुछ उद्योग करो ईंट-बालू-सीमेंट का घर-वर बनाओ। जीवन जीने के लिए एक भौतिक छत की ज़रूरत होती है। कल्पना की छत फूल-पत्तियों और किसी मुखड़े से बनाकर उसमें अपनी आँखें रखने भर की भी जगह नहीं पाओगे, ख़ुद को और अपने बाल-बच्चों को कहाँ रखोगे। कवि को उस स्त्री की बात कुछ-कुछ समझ में आती है, लेकिन कवि कल्पना की दुनिया से पूरी तरह बाहर निकल जाए, यह उस कवि के लिए संभव नहीं है। प्रेम का मारा कवि है। वह चाहता तो है कि उसका मकान हो, लेकिन फाँकामस्ती के दौर में संभव कैसे हो सकता है। यह कवि कोई ग़ालिब तो है नहीं कि क़र्ज़ की मय की तरह, मकान बनाने के लिए क़र्ज़ मिल जाए। ओह, कितना साधु, संतोषी और आत्मसंचयी है कवि। न किसी सेठ का ताला तोड़ने की बात करता है, न सेठानी के आभूषण चुराकर महल बनाने की बात सोचता है। उसे पता है कि ग़ालिब की तरह उसकी भी फाकामस्ती एक दिन रंग लाएगी-
क़र्ज़ की पीते थे मय, लेकिन समझते थे कि हाँ 
रंग लाएगी हमारी फाकामस्ती एक दिन।
      इस कविता में कवि क़र्ज़ की शराब नहीं पी रहा है, कहना चाहिए कि उसके पास इतना भी क़र्ज़ का पैसा नहीं है कि कोई क़ीमती चीज़ खा-पी सके। दो पैसे की मूँगफली और चुटकी भर नमक का संसार ही उसका संसार है। उसे मय का नशा नहीं चाहिए, वह तो प्रेम के नशे में सिर से पैर तक डूब जाना चाहता है, बेसुध होकर गिर पड़ना चाहता है, प्रिया के संग लेट जाना चाहता है। दरअसल वह अपनी प्रियतमा को ईंट-गारे के घर में नहीं, अपने भीतर, अपने सीने में, हृदय के तल में और उसकी धड़कनों के बीच, उसे बैठाएगा, उसका शृंगार करेगा, उसे प्यार करेगा। इसीलिए वह अपनी देह को मकान में बदलते समय दिल को डराइंगरूम बनाता है। जिसमें बैठकर उसकी प्रिया उससे बातें करें और कभी बाहर जाए ही नहीं।  
      सवाल उठता है कि कवि उस सुंदर और धनाढ्य महिला से, जो उसकी प्रेमिका या उसकी प्रेमिका की सखी या कोई नयी-नयी प्रेमिका हो सकती है अर्थात जिससे उसका प्र्रेम का रिश्ता है, उससे क़र्ज़ लेकर मकान क्यों नहीं बना लेता! यह सवाल बहुत आसान नहीं है। कई पेंच हैं। बस इतना समझ लीजिए कि कोई गृहिणी इतनी स्वतंत्र नहीं होती है कि गृहस्वामी को बताकर या छुपाकर कुछ कर सके। धनाढ्य वर्ग तो पैसे से पैसा कमाता है। गृहिणी थोड़ा बहुत गाहे-बगाहे कुछ मदद तो कर सकती है, लेकिन किसी अल्पआयवर्ग के कवि के लिए न ताजमहल बनाकर दे सकती है, न कोई साधारण मकान। ऐसे में कवि बेचारा ज़मीन पर मकान नहीं बना पाता है तो कल्पना की ज़मीन पर अपनी देह को ही मकान में बदलकर इस दायित्व से मुक्त हो जाता है। कवि और कर भी क्या सकता है, कोई धन्नासेठ तो है नहीं, जो रुपये और हीरे-जवाहरात जगह-जगह धरे हों, जेब में नोटों की गड्डियाँ लेकर चलता हो। वह जेब में मूँगफली लेकर सड़कों पर आवारा मारा-मारा फिरने वाला कवि है। असल में यह उन दिनों की भी कविता है, जब बैंकों से बहुत आसानी से गृहऋण सुलभ नहीं था। दस तरह की दिक़्क़तें होती थीं। यह एक साधारण मनुष्य के मकान न बना पाने की कविता अर्थात धन के अभाव की कविता है तो दूसरी ओर उस कवि की कविता है, जिसके पास कल्पना और प्रकृति के संसार का अकूत धन है। प्रेम के आकाश में उड़ती हुई चिड़ियों को निहारते चला जा रहा है। 

    इस कविता को आध्यात्म और योग के चक्रों से जोड़कर देख पाना मेरे लिए संभव नहीं है। केवल ‘इंद्रियों’ शब्द के आधार पर दूर की कौड़ी लाना असंभव है। गृहिणी भी माया नहीं लगती। कवि भी आध्यात्मिक मुक्ति नहीं ढूँढता है। मुक्ति तो किसी तरह की नहीं ढूँढता है। ऐसा करना एक अच्छी प्रेम कविता की हत्या करना होगा। भला आधुनिक काल का कोई कवि मूलाधार, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्ध चक्र, आज्ञा चक्र, सहस्रार चक्र के चक्कर में क्यों पड़ेगा! यह अनन्त जी की साधारण सी दिखने वाली कविता, एक फक्कड़ कवि की असाधारण आशय की कविता है। हर कवि, अपनी कविता का निष्कर्ष अपने स्वभाव के अनुसार रखता है। ज़रूरी नहीं कि हर कवि अभाव को क्रांति में बदल दे। 

     अनन्त मिश्र का स्वभाव, देवेन्द्र कुमार बंगाली के स्वभाव से एक हद तक ही मेल खाता है। दोनों साधु-स्वभाव के है। देवेन्द्र कुमार बंगाली की कविता में चिंगारियाँ फूटती हैं। देवेन्द्र कुमार का स्वभाव साधु था, लेकिन विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के अनुयायी नहीं बने। एक स्वतंत्र कवि-व्यक्तित्व था उनका। केदारनाथ सिंह से उनके मधुर संबंध थे, लेकिन अनुयायी उनके भी नहीं थे। अनन्त जी की मुश्किल यह थी कि वे विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के बिना साहित्य में एक डग भी नहीं भरते थे। शायद उनके स्वभाव में ही धीरे चलने का, पीछे चलने का तत्व शामिल हो गया था। गोरखनाथ की तरह ‘हबकि न बोलिबा, ठबकि न चालिबा, धीरैं धारिबा पांव।’ की स्थिति में पहुँच गए थे। फिर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जैसे तेज़ चलने वाले, गरब करने वाले घमंडी मानुष के साथ अनन्त जी का कवि कैसे नाभिनालबद्ध हो गया!  अनन्त मिश्र जीवन की भागती सड़कों पर जहाँ-जहाँ पुल कमज़ोर थे, अंधे मोड़ थे, अपनी कविता ‘कृपया धीरे चलिए’ में चेतावनी तख़्ती पर लिखे हुए इन तीन शब्दों की तरह तेज़ रफ़्तार में भागती दुनिया को समझाने के लिए खड़े थे और कोई समझ नहीं रहा था। विश्वनाथ जी के कान के पास उनका मुख का और विश्वनाथ जी सुनकर भी सुन नहीं रहे थे। विश्वनाथ जी को महाकाव्य नहीं लिखना था, साहित्य की सत्ता के सिंहासन पर बैठना था। उन्हें न तो देवेंद्र कुमार बनना था, न गोबर गणेश, उन्हें तो बादशाह सलामत बनना था। अनन्त जी साहित्य में विश्वनाथ जी के पीछे-पीछे कृपया धीरे चलिए का बोर्ड बनकर चलते रहे। विश्वनाथ जी साहित्य में दंद-फंद वाले आदमी थे, उन्हें सब जल्दी चाहिए था और इसके लिए हज़ार जतन करते थे। उन्हें विद्यानिवास मिश्र से बड़ा बनना था, विद्यानिवास मिश्र साहित्य अकादमी का चुनाव हार गए थे, तो इन्हें जीतना था, विद्यानिवास जी को पद्मश्री मिली, तो इन्हें भी लेना था, विद्यानिवास जी सांसद मनोनीत हुए, इन्हें भी होना है; लेकिन क्या विद्यानिवास जी के ललित निबंधों की तरह कुछ भी इनके पास कविता और आलोचना में अविस्मरणीय है?  यहाँ विश्वनाथ जी मुख्य विषय नहीं हैं। अनन्त मिश्र हैं, लेकिन अनन्त मिश्र के कवि की हत्या में जिस शख़्स का प्रमुख हाथ है या कह लें कि जो मास्टर माइंड है, निश्चय ही विश्वनाथ जी हैं। मुझे याद है, कैसे हिन्दी विभाग के स्टाफ़ रूम में अनन्त जी की चुटकुने पर लिखी कवितानुमा कुछ पंक्तियों पर विश्वनाथ जी की टीम के सदस्य भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगते थे, उनका परम प्रिय शिष्य जो विश्वनाथ जी का सबसे प्रिय हो गया था, अनन्त जी को महाकवि और उस चुटकुने पर लिखी कविता को महाकाव्य बताने लगता था। विभाग में नियुक्त होने के दो-तीन साल बाद ही मैं अनन्त जी से कहने लगा था कि आप विश्वनाथ जी का साथ छोड़िए। दस्तावेज़ की तरह अपनी पत्रिका निकालिए। अनन्त जी सुनते और फिर दूसरी बात करने लगते। एक आज का दिन है, अनुभव करते होंगे कि उनके गैंग से अलग रहकर मैंने कितना अच्छा किया। विश्वनाथ जी के साथ-साथ अनन्त जी ने देशभर में न जाने कितनी यात्राएँ की होंगी, ज़ाहिर है अपने पैसे से। बाद में अकादमी में विश्वनाथ जी के पदाधिकारी होने पर अलबत्ता उन्होंने अकादमी के आयोजनों के निमित्त कुछ यात्राएँ कराईं। क्या विश्वनाथ जी ने अनन्त जी की कविताओं में कभी कुछ कमी का अनुभव किया? उसे ठीक करने की कोशिश की? यदि कोई कमी नहीं थी तो दस्तावेज में उनकी कविताओं पर दो-चार लेख छपवाए? ख़ुद उन पर लंबा संपादकीय लिखा? उनकी षष्ठी पूर्ति पर दस्तावेज का कोई खास अंक निकाला? पचहत्तर का होने पर अनन्त जी पर कोई विशेषांक निकाला? साहित्य अकादमी में पन्द्रह साल राज करने के बावजूद अनन्त जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार दिलाने की कोशिश की?  अनन्त मिश्र, अनामिका, बद्री, गगन गिल वगैरा से बहुत कमज़ोर कवि थे? उनकी कविताएँ मौलिक नहीं थीं? स्तरीय नहीं थीं? अनामिका, गगन गिल वगैरा हमारे समय की कविता महारानियां थीं और अनन्त मिश्र उनके महल के दरबान? बद्री कविता का युवराज था और अनन्त मिश्र, बद्री के घोड़ों की देखभाल करने वाले सईस? ये सब असली कवि थे और अनन्त मिश्र नक़ली कवि थे? क्यों अनन्त मिश्र के कवि को विश्वनाथ जी ने धीमा ज़हर देते-देते एक दिन मार दिया। दृश्य से ओझल कर दिया? यह विश्वनाथ जी की खास अदा है, अपने से अधिक प्रतिभाशाली कवियों को मार देने की। अस्सी में पहुँचे अनन्त मिश्र के जन्मदिन के भव्य आयोजन में सबके सामने माइक पर विश्वनाथ जी ने अनन्त जी को अच्छा कवि नहीं कहा। पहले ड्राफ्ट का कवि कहा। अभिधा का कवि कहा गया। क्या अनन्त जी की कविताएँ कूड़ा हैं? ऐसा है, तो मैं अनन्त जी की कविताओं पर क्यों लिख रहा हूँ! दरअसल विश्वनाथ जी कभी चाहा ही नहीं कि दस्तावेज़ से गोरखपुर का कोई कवि उनसे बड़ा हो जाए। नामवर सिंह ने आलोचना से धूमिल को चमकाया, लेकिन विश्वनाथ जी ने अनन्त के कवि को सीमाओं में बाँध दिया। उन्हें चमकाया नहीं, धूमिल किया। अनन्त जी की मूल समस्या यह थी कि अकेला होना उनके लिए अधिक सर्जनात्मक होने का सबब नहीं था, बल्कि उनमें भय उत्पन्न करता था। साहित्य में जो लेखक अकेला होने का जोखिम नहीं उठा सकता है, वह अपने समय का बड़ा लेखक नहीं हो सकता है। जो चुनौती दे नहीं सकता और स्वीकार नहीं कर सकता, वह बड़ा काम नहीं कर सकता है। हमारे समय में कोई बड.ा लेखक है ही नहीं। ये सब साहित्य अकादमी पाने वाले चिरकुट लेखक हैं। पुरस्कार के बिना न दो कदम चल सकते हैं, न जी सकते हैं। इनपया सबके आगे या पीछे से पुरस्कार हटा दो तो सब कौड़ी के हैं। कम से कम अनन्त जी के साथ ऐसी बात नहीं। देवेंद्र कुंमार के साथ ऐसी बात नहीं थी। जिस कवि में कुछ मौलिक होता है, वह पुरस्कार के पीछे नहीं भागता है। विश्वनाथ जी में कुद मौलिक नहीं था, इसलिए पुरस्कार के पीछे एक सौ बीस किलोमीटर की रफतार से भागते थे। अनन्त जी के भीतर उनका अपना सब असली था। घी का लड्डू। बावजूद इसके अनन्त जी आज हमारे सामने चेतावनी तख्ती की तरह खड़े हैं- कृपया धीरे चलिए!
‘जहाँ-जहाँ पुल कमजोर थे
जहाँ-जहाँ जिंदगी की
भागती सड़कों पर
अंधा मोड़ था
त्वरित घुमाव था
घनी आबादी को चीर कर
सनसनाती आगे निकल जाने की कोशिश थी
बस्ता लिए छोटे बच्चों का मदरसा था
वहाँ-वहाँ लोकतांत्रिक बैरियर की तरह
मुझे लिखा गया
’कृपया धीरे चलिए’
आप अपनी इंपाला में
रुपहले बालोंवाली
कंचनलता के साथ सैर पर निकले हों
या ट्रक पर तरबूजों की तरह
एक-दुसरे से टकराते बँधुआ मजदूर हों
आसाम, पंजाब, बंगाल
भेजे जा रहे हों
मैं अक्सर दिखना चाहता हूँ आप को
’कृपया धीरे चलिए’
मेरा नाम ही यही है साहब
मैं रोकता नहीं आपको
मैं महज मामूली हस्तक्षेप करता हूँ,
प्रधानमंत्री की कुर्सी पर
अविलंब पहुँचना चाहते हैं तो भी
प्रेमिका आप की प्रतीक्षा कर रही है तो भी
आई.ए.एस. होना चाहते हों तो भी
रुपयों से गोदाम भरना चाहते हों तो भी
अपने नेता को सबसे पहले माला
पहनाना चाहते हों तो भी
जिंदगी में हवा से बातें करना चाहते हों तो भी
आत्महत्या की जल्दी है तो भी
लपककर सबकुछ ले लेना चाहते हों तो भी
हर जगह मैं लिखा रहता हूँ
’कृपया धीरे चलिए’
मैं हूँ तो मामूली इबारत
आम आदमी की तरह पर
मैं तीन शब्दों का महाकाव्य हूँ
मुझे आसानी से पढ़िए
कृपया धीरे चलिए।
      कविता की दुनिया में धीरे-धीरे चलने वाला यह कवि, सबसे कहता है कि अपनी हवस की रफतार कम करो। चीजों को पाने की नैसर्गिक गति का पालन करो। गर्यादा में रहो, सीमा में चलो, यह दुनिया तम्हारे लिए ही तो है, ठहरकर देखभाल कर चलो। अच्छा करना तो अच्छे से करो, बुरा करना है तो भी कोशिश करो कि अच्छे से करो। दूसरों के सिर पर पैर रखकर आगे मत बढ़ो। कवि सबको दुर्धटना से बचने की सीख देता है, दूसरों पर गाड़ी चढ़ा देने से बचने की सीख देता है। यहां तक कि प्रेमिका प्रतीक्षा कर रही है, तो उससे भी मिलने के बहुत तेज रफतार में मत भागो कि उसका प्यार छिन जाए। असल में यह कवि सबको बचाने वाली कविता लिखता है। कवि और कविता, दोनों को बचाने वाली कविता। यह कवि ऐसा कवि है, जो महाकाव्य तो नहीं लिखता है, लकिन हमारे समय की कविता में जो ख़ुद एक महाकाव्य की तरह खड़ा है, अपने मूल्यांकन की प्रतीक्षा में। हमारे समय की आलोचना में 99़ प्रतिशत से ज्यादा आलोचना प्राध्यापकीय है, अतिप्रशंसामूलक है, ठस है, झूठ बोलती है और आज का आलोचक मशहूर लेखकों के मल-मूत्र को भी महान रचना और महान आलोचना कहता है। प्रकाशक जानता है कि हिन्दी के पाठक और लेखक कितने बड़े मूर्ख हैं, कुछ भी खरीद लेगे। आलोचना के नाम पर आलोचक की पाद भी अगर किताब में बंद करके बेचेंगे, तो उसे भी ख़रीद लेगे। बिक ही रहा है। आज कौन आलोचना लिख रहा है? आलोचना जब लीद में बदल जाएगी, तो सोने की रचना भी उसमें छिप जाएगी। जैसे गद्य को जीवन संग्राम की भाषा कहा गया है, उसी तरह आलोचना भी रचना के संघर्ष को सामने लाने वाली मर्दाना भाषा है। लेखक के आत्मसंघर्ष को कोई आलोचक छू नहीं सकता है, तों स्त्रैण आलोचक है। आलोचना के इस अंधकार में कई स्वाभिमानी लेखकों की पगड़ी अलक्षित है। अंधेरे में है। बुरे से बुरे समय में भी कुछ अचछे लोग आते है। यह सृष्टि का नैसर्गिक नियम है। साहित्य का भी नियम यही है। लोग आएंगे, अनन्त मिश्र का मूल्यांकन करेंगे। मैं यहां उनके पूरे काव्य-संसार की विवेचना नहीं कर रहा हूं। मैं तो अनन्त मिश्र के कवि के हत्याकांड की विवेचना करने वाला किसी थाने के पुलिस अधिकारी की तरह विवेचना करने के उपरांत चार्जशीट पेश कर रहा हूं। दरअसल यह हिन्दी कविता का इकलौता हत्याकांड नहीं है। कई कवियों के कवि और उनकी कविताओं की हत्या इसी तरह की गयी है। हत्या की विधि और प्रकार में अंतर हो सकता है। दुर्भाग्य यह कि जैसे गोरखपुर के आलोचकों को अनन्त मिश्र की चिंता नहीं थी कि कैसे उनके कवि की हत्या करके किसी खाई में फेंक दिया गया है, उसी तरह देशभर में ऐसे ही हुआ है। हमारे समय के हिन्दी के आलोचकों को दंडित किया जाना चाहिए। गोखपुर में सौभाग्यवश मेरा कवि बच गया, योजना तो उसके लिए भी बनायी गयी थी, कि उस कवि को गुप्त कवि बनाकर मार दो, कोई जानने ही न पाए कि गणेश पाण्डेय भी कविता लिखता है। मेरी पीठ में मेरे धनिष्ठ मित्र ने ही खंजर घोंपा कि शहर का हिन्दी का डान ख़ुश होगा, उसे बख्शीश देगा। दिया भी। ख़ैर। बात अनन्त मिश्र की कविता की, उनके कवि कि सिर की पगड़ी की, जिसे तार-तार किया गया। अनन्त जी की कविता पगड.ी की घुंघली सी याद है। कवि कहता है कि मेरी पगड.ी मत उछालो, मैं अपनी पगड़ी तुम्हारे कदमों में रख दूंगा। यह पगड़ी दरअसल हर मनुष्य के स्वाभिमान की पगड़ी है, उसका मस्तक है, पगड़ी माथा है, उसका वुजूद है, उसकी लाज है। एक मनुष्य और एक मनुष्येतर प्राणी में मूल्य का अंतर है, विचार का अंतर है, मर्यादा का अंतर है, एक के पास है और दूसरे के पास नहीं है। जब कोई मनुष्य, दूसरे मनुष्य को नंगा करता है, तो वह बहुत आहत होता है। किसी का सम्मान कोई छीनता है, तो कभी कोई दुखी होता है तो कोई पलटकर जवाब देता है। साहित्य में दुर्भाग्यवश प्रतिरोध का बुलडोजर नहीं है, उसे राजनीति में किराए पर लगा दिया गया है। हिन्दी के बेईमानो, निर्लज्जों और गुंडों के समय में न जाने कब तक सीधे-सादे कवियों की पगड़ी मठाधीशों के पैरों में पड़ी रहेगी। गोरखपुर में कुछ दूसरे कवि भी हैं, जिनकी पगड़ी विश्वनाथ जी के पैरों में पड़ी हुई है। फिलहाल अनन्त जी की कविताएं पढ़ी जाएं और इस नजरिए से पढी जाएं कि ये मौलिक कविताएं हैं। विश्वनाथ जी की कविताएं बनावटी हैं, विश्वनाथ जी खुद बनुआ कवि है। दिल्ली तो बनुआ लेखकों की खान है। जो जितना दिल्ली जाता है, उतना ही नकली कवि है, नकली लेखक है। आज हिन्दी कविता आलोचना में मौलिकता को हेय दृष्टि से देखा जाता है। ज़ाहिर है, मौलिकता को हेय दृष्टि से देखने वाले हिन्दी के लेखक नहीं हैं, कीट-पतंग हैं। 











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