- गणेश पाण्डेय
शुरू में ही स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं धर्म के सकारात्मक पहलू की इज़्ज़त करता हूँ। कोई भी धर्म हो। धर्म मनुष्य के उन्नयन का मार्ग है। धर्म का काम मनुष्य और मनुष्य में भेद करना नहीं है। धर्म का काम राजनीति करना नहीं है। भक्तिकाल में भक्ति किसी की सरकार को गिराने या बनाने का ज़रिया नहीं है। भक्तिकाल में जिस मुक्ति की बात की गई है, वह कोई साधारण मुक्ति नहीं है, असाधारण है। आध्यात्मिक मुक्ति है। उस मुक्ति के लिए धर्म का नकारात्मक इस्तेमाल नहीं किया गया है। न धर्म की राजनीति की गई है, न धर्म को दंगा-फसाद का ज़रिया बनाया गया है। इसी काल में सामाजिक मुक्ति की भी बात की गयी। धर्म के आडम्बर और अंधविश्वास की तीव्र आलोचना की गयी। भक्तिकाल के कवियों के सामने कविता के बहुत ऊँचे उद्देश्य थे। वे कवि न तो पाँच सौ रुपये के भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार के लिए कविता लिख रहे थे, न साहित्य अकादेमी के लखटकिया पुरस्कार के लिए, न उन्हें किसी लिटफेस्ट के मंच पर पहुँचने की जल्दी थी, न किसी लेखक संगठन या रज़ा फाउंडेशन में भर्ती होने की। वे आज के दो कौड़ी के चुत्थड़ साहित्य-प्रभुओं को जानते ही नहीं थे। साहित्य के केंद्रों में मत्था टेकने नहीं पहुँव जाते थे। दो कौड़ी के जलेस, प्रलेस, जसम की चटाई पर बैठने के लिए मरे नहीं जाते थे। इन लेखक संगठनों के पदाधिकारियों, हाथी जैसे राजकमल प्रकाशन के घोडे जैसे पुस्तक संपादकों और आलोचना पत्रिका और उसके कविता के कातिल संपादकों को भी नहीं जानते थे। वे तो सच्चे शब्द-साधक थे, जीवन की उच्चतर भाव-भूमि के प्रेमी। वे तो सपने में भी नहीं सोच सकते थे कि कभी किसी दौर में युवा कवियों को कविता की सही राह दिखाने की जगह गुमराह भी किया जा सकता है।
क्या कविता का काम किसी एक धर्म और किसी एक जाति को नायक और दूसरे को खलनायक बनने का है क्या यह सच है की कोई एक खास धर्म है या कोई एक खास जाति है जिसमें आक्रामकता है, सांप्रदायिकता है, कट्टरता है और दूसरी जाति बिल्कुल दूध की धुली है? क्या ऐसा है? जाहिर है कि ऐसा नहीं है। ऐसा नहीं है कि अल्पसंख्यक बहुत बुरे हैं और बहुसंख्यक बहुत अच्छे हैं या बहुसंख्यक बहुत बुरे हैं और अल्पसंख्यक बहुत अच्छे हैं। ऐसा मानना दृष्टिहीनता और ईमान की सीमा का परिचायक है। जाहिर है कि ऐसा मानने वाला लेखक, लिखने की मेज पर स्वतंत्र नहीं होता है बल्कि जिस लेखक संगठन से जुड़ा होता है, उसके कार्यकर्ता के रुप में काम कर रहा होता है। उसे पता ही नहीं होता है कि विचारधारा पहले भी थी, लेखक पहले भी थे। क्या रामविलास शर्मा मार्क्सवादी समझ नहीं रखते थे? रामविलास शर्मा को छोड़ो। कबीर तो मार्क्स से बहुत पहले ही पैदा हो गए थे? और आज क्या लेखक संगठनों से दूर मार्क्सवादी समझ वाले या प्रगतिशील दृष्टिसंपन्न लेखक नहीं हैं?
ओह, कितने ऐसे आलोचक हैं जो सचमुच साहित्य का सच फटकार कर कहना चाहते हैं या कह सकते हैं मुझे तो देखने में आता है कि हिंदी के अधिकांश आलोचक साहित्य का सच कहने की पात्रता ही नहीं रखते हैं रचना के सच और आलोचना के सच से उनका कोई वास्ता ही नहीं हैं वे झूठ के पुतले हैं। ऐसे मुश्किल वक्त में एक ईमानदार आलोचक का क्या काम है? वही जो कभी कबीर जैसे कई का काम था। लटृठ उठाओ और बरसाओ तब से बेईमान समझेंगे। यह बातों से नहीं समझेंगे। डांटना-डपटना पड़ेगा, फटकारना पड़ेगा तब शायद कुछ समझें।
पिछले 50 साल की आलोचना संबंधों के आधार पर लिखी गई आलोचना है। मैंने एक बार अपने एक आलोचक मित्र से कहा कि तुम जिस रास्ते पर हो उसे रास्ते पर परमानंद श्रीवास्तव से आगे नहीं जा सकते हो, अगर तुम्हारी सीमा वही है अगर तुम्हारा उद्देश्य वही है अगर तुम्हारी क्षमता वही है तो फिर तुम गादर बैल हो, मेरे साथ नहीं चल सकते। हालाँकि परमानंद श्रीवास्तव कोई मील का पत्थर नहीं हैं, बल्कि उनका उदाहरण आलोचना की सीमा को बताने के लिए है। परमानंद जी ने मुझे पढ़ाया है। बहुत अच्छे अध्यापक थे। गोरखपुर के हिन्दी विभाग के संदर्भ में आसपास के लेखकों में दो बहुत अच्छे और बहुत ख़राब अध्यापकों का नाम उदाहरण के रुप में देना हो तो अच्छे में परमानंद श्रीवास्तव का नाम लूँगा और ख़राब में विश्वनाथ प्रसाद तिवारी का। विश्वनाथ जी पर कहीं और किसी और प्रसंग में याद करेंगे। यहाँ बात परमानंद जी की। परमानंद जी की आलोचना भाषा जहाँ पूर्वार्द्ध में जलेबी जैसी गोल-गोल घुमावदार है, वहीं उत्तरार्द्ध में वे अपनी आलोचना की भाषा को माँजते हैं, लेकिन आलोचना के सरोकार वही रहते हैं। वही संबंधों के आधार पर की गयी प्रशंसामूलक आलोचना। आगे चलकर सभी नये आलोचकों ने भी प्रशंसामूलक आलोचना की पताका फहराने का काम किया। कुछ ने तो ऐसी बंद अर्थात जपाट भाषा में प्रशंसामूलक आलोचना लिखते समय आलोचना की ही नहीं, जिसकी कविता की आलोचना की है, उसकी भी टाँगे तोड़ दी है। सविता सिंह की कविताओं पर रविरंजन का मनोरंजन देख सकते हैं। सुना है, उन्होंने कई मामूली से भी नीचे के कुछ और कवियों पर ए आई की कृपा से ़त्रैलोक्य-विकंपित आलोचना लिखी है। दस पंकि्ंतियों बहुत औसत कविताओं पर सौ-सौ पेज की आलोवना जैसी चीज़ लिखी है। इतना फैलकर तो रामविलास शर्मा ने निराला की कवितओं पर नहीं लिखा है। उदाहरण भी देते चलना ज़रूरी होता हैं। ख़ैर। आगे बढ़िए। आलोचना के धर्म पर बातें भी होंगी, लेकिन कविता में आतंकवादियों की तरह घुसपैठ करने वाले धर्म के ख़तरनाक रंग पर बात करना इस ममय सबसे ज़़रुरी है।
कोई कवि हिन्दुओं की माँ-बहन करने लगे या कोई बिल्कुल नया कवि हामिद की तरह इस उम्र में कविता के मेले में चिमटा ख़रीदने की समझदारी दिखाने जगह जालीदार टोपी पहनकर ंअरबी-फारसी के कठिन शब्दों की तलवार चमकाने लगे या हिन्दुओं की स्त्रियों नंगा करने लगे तो उस पर बोलना बहुत ज़रुरी है। कविताओं पर ऐसे ही बोलकर आगे बढ़ जाना और उदाहरण न देना बेईमानी होगी। ज़ा़हिर है कम से कम किसी एक कवि का नाम भी देना ज़़रुरी होगा। संयोग देखिए, नाम की पर्ची भी निकली तो राजकमल प्रकाशन के संपादकीय विभाग के एक सदस्य की। नही-नहीं, मैं सत्यानंद निरूपम का नाम नहीं ले रहा हूँ। पता नहीं वे कुछ लिखते भी हैं या नहीं, उन्हें तो मैं हिन्दी के अलेखक के रुप में जानता हूँ। हिन्दी में उनके काले कारनामों पर फिर बात करेंगे। यहाँ आर चेतनक्रांति और उनकी एक कविता ‘हिन्दू देश में यौन क्रांति’ पर बात करुँगा। हिन्दी के बड़े संयोगों में से एक संयोग और राजकमल प्रकाशन के नाम है। असल में जिस ‘शोकनाच’ सुंग्रह में ‘हिन्दू देश में यौन क्रांति’ कविता शामिल है। यह कविता निश्चय ही हिन्दू-विरोधी कविता है। हिन्दुओं को लज्जित करने वाली कविता है। हिन्दुओं की माँ-बहन करने वाली कविता है। इस कविता को देखने के बाद कोई भी ईमानदार आलोचक ख़ुद को ग़़ंस्सा होने से रोक नही सकता। इसका मतलब यह नहीं कि किसी कवि को नुकसान पहुँचाने के लिए ऐसा कह रहा हूँ। यहाँ सिर्फ ऐसी कविताओं से बनने वाली प्रवृŸा पर चोट करना है। आर चेतनक्रांति को राजकमल प्रकाशन की नौकरी से बर्ख़ास्त करने की माँग करना उद्देश्य नहीं है। जैसा कि कुछ अपराधी प्रवृŸा के लेखकों ने पिछले दिनों अविनाश मिश्र के संदर्भ में किया था। मैं न तो राजकमल प्रकाशन का शत्रु हूँ, न राजकमल प्रकाशन के संपादकीय विभाग के सदस्यों का शत्रु हूँ। अलबŸा, यह ज़रूर चाहता हूँ कि अशोक महेश्वरी इस बात पर ध्यान दें कि उनकी छवि कैसी बन रही है? क्या उन्होंने जानबूझकर अपने प्रकाशन की हिन्दू-विरोधी छवि बनने दी है? बहरहाल आर चेतनक्रांति की कविता ‘हिन्दू देश में यौन क्रांति’ देखिएः
हिन्दू देश में यौन-क्रांति
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मर्दों ने मान लिया था
कि उन्हें औरतें बाँट दी गईं
और औरतों ने
कि उन्हें मर्द
इसके बाद विकास होना था
इसलिए
प्रेम और काम, और क्रोध और लालसा और स्पर्द्धा,
और हासिल करके दीवार पर टाँग देने के पवित्र इरादे के पालने में
बैठकर सब झूलने लगे
परिवारों में, परिवारों की शाखाओं में
कुलों और कुटुंबों में जातियों-प्रजातियों में
विकास होने लगा
जंगलों-पहाड़ों को
म्याऊँ और दहाड़ों को
रौंदते हुए क्षितिज-पार जाने लगा
इतिहास के कूबड़ में
ढेरों-ढेर गोश्त जमा होने लगा
पत्थर की बोसीदा किताब से उठकर डायनासोर चलने लगा
कि यौवन ने मारी लात देश के कूबड़ पर और कहा
रुकें, अब आगे का कुछ सफ़र हमें दे दें
पहले स्त्री उठी
जो सुंदर चीज़ों के अजायबघर में सबसे बड़ी सुंदरता थी
और कहा, कि पेडू में बँधा हुआ यह नाड़ा कसता है
कि क़ीमतों का टैग आप कहीं और टाँग लें महोदय
इस अकड़ी काली, गोल गाँठ को अब मैं खोल रही हूँ
सुंदरता ने असहमति के प्रचार-पत्र पर
सोने की मुहर जैसा सुडौल अँगूठा छापा और नाम लिखाकृअतृप्ति
कूबड़ थे जिनमें अकूत धन भरा था
कुएँ थे जिनमें लालसा की तली कहीं न दिखती थी
पर सुंदरता का दावा न था कि वह इस असमतलता को दूर करेगी
इरादों की ऋजुरैखिक यात्रा में वह थोड़ी अलग थी
उसने एक नई धरती की भराई शुरू की
जो सितारे की तरह दिखती थी
चाँद की तरह
जिसकी मिट्टी में गुरुत्व नहीं था
जिसके ऊपर, नीचे, दाएँ, बाएँ आसमान था
तो भी घर-घर में एक इच्छा जवान होती थी
कि बेशक अमेरिका के बाद ही
पर एक दिन हम भी वहाँ जाकर रहेंगे
आँगन-आँगन कामना का इस्पात घिसता था
बुझी-गीली राख में रात-दिन
और तश्तरी की धार तेज़ होती जा रही थी
तश्तरी घूमती थी और काटती थी
घूम-घूमकर काटती कतरती थी ककड़ियों-खरबूजों की तरह
हिंदू देश में हिंदुओं को
अपनी सांस्कृतिक दुविधाओं में खड़े
वे खच-खच कटते थे
अपनी विविधताओं में बुझे मोतियों से जड़े
धर्म के सुविधाजनक-उपेक्षित पिछवाड़े पड़े
वे चमार, लुहार, कुम्हार
ब्राह्मण, बनिये, सुनार
कहीं न थी पूरी तलवार
केवल धार
सड़क पर चिलचिलाती धूप में लहराती
निमिष-भर को दिखती
और खरबूजों-तरबूजों की तरह फले-फूले
और पाला खाई टहनियों-से सूखे-तिड़के
मर्दों के मेदे में उतर जाती
मनु का देश काँखता खड़ा रह जाता
और वह अगली धूप में पहुँच जाती
सारे पांडव, सारे कौरव, सारे राम, सारे रावण
अपने रचयिताओं को पुकारते युद्ध से बाहर हुए जाते थे
दूर खड़े अपने हथियार चमकाते
चरित्रवान आत्माओं को जगाते कहते,
यौवन ने मचा दिया ध्वंस
कल तक कैसे शांत खड़ी लहराती थी संयम की फ़सल
आह, इतने आक्रामक तो न थे हिंदू आदर्श
ये तो रास्ता छेंककर खड़ी हो जाती है
ये कौंधती टाँगें,
ये सुतवाँ नितंब, ये घूरते स्तन, ये सोचती-सी नाभि
सर्वत्र प्रस्तुत कि जैसे हाथ बढ़ाओ, छू लो, खा लो
पर इरादा कर बढ़ो तो... अरे सँभालो...
यही क्या हिंदू सौंदर्य है!
चकित थे हिंदू
बलात्कार की विधियाँ सोचते, घूरते, घात लगाए, चुपचाप देखते, सन्नद्ध
कि भीम के, द्रोण के देश में जनखापन छाया जाता है
कि एक ही आकृति में स्त्री आती है और पौरुष जाता है
कि दृश्य यह अद्भुत है
पूछते विधाता से हाथ जोड़कर प्रार्थना में
और शाखा में पवन-मुक्तासन बाँधकर संचालकजी से
कि इस दृश्य का लिंग क्या है, प्रभो!
इससे पहले कि मैं इस कविता पर कुछ और कहूँ, वरिष्ठ आलोचक शिवकिशोर तिवारी, इस कविता को किस नज़रिए से देखते हैं, आप भी देखिए- ‘आज एक मित्र ने यह कविता भेजी। आपको खुफिया तौर पर बता रहा हूँ , यह कविता काक्रोच जनता पार्टी का दस्तावेज है। आदिकाल से लेकर इस काल तक का वर्णन इस कविता में किया गया है। यह वर्णन हिन्दू जाति पर केन्द्रित है, अर्थात् विवाह- संस्था, परिवार, क्लैन, कास्ट आदि की अवधारणाएं केवल हिन्दुओं में पैदा हुईं। फिर कैपटलिज्म भी पहले हिन्दुओं में आया - “ इतिहास के कूबड़ में ढेर-ढेर गोश्त’। फिर क्रांति आई जिसका उपोद्घात हिन्दू नारियों के नाड़ा खोलने से हुआ। फिर स्त्री-पुरुष की बायनरी खतम हो गई; जैसे चेतन नामक मर्द और क्रांति नामक स्त्री गड्डमड्ड हो गये - तब काक्रोच आन्दोलन का जन्म हुआ - हमारा लिंग, हमारी च्वाइस! इस तरह हिन्दुओं को ठीक कर दिया गया। अब आर एस एस वाले परेशान हैं!’ असल में तिवारी जी का यह कथन दो मित्रों के बीच कुछ-कुछ गंभीर और कुछ-कुछ व्यक्तिगत बातचीत जैसा है। उन पर अधिकार है। जानता हूँ, तिवारी जी की साहित्य-निष्ठा और शुभचिंता असंदिग्ध है। मेरा ध्यान तिवारी जी के इस हिस्से पर है कि आदिकाल से लेकर इस काल तक का वर्णन इस कविता में किया गया है। यह वर्णन हिन्दू जाति पर केन्द्रित है, अर्थात् विवाह- संस्था, परिवार, क्लैन, कास्ट आदि की अवधारणाएं केवल हिन्दुओं में पैदा हुईं। फिर कैपटलिज्म भी पहले हिन्दुओं में आया - “ इतिहास के कूबड़ में ढेर-ढेर गोश्त’। फिर क्रांति आई जिसका उपोद्घात हिन्दू नारियों के नाड़ा खोलने से हुआ।
मुझे भी कहना यही है कि यह कविता हिन्दुओं पर केंद्रित है। हिन्दू स्त्रियों के विरोध लिखी गयी है, बल्कि कहना चाहिए कि इस कविता में हिन्दू स्त्रियों की भयंकर तौहीन की गयी है। हिन्दू स्त्रियों को इस कविता में नंगा कर दिया गयाः
‘यौवन ने मारी लात देश के कूबड़ पर और कहा
रुकें, अब आगे का कुछ सफ़र हमें दे दें
पहले स्त्री उठी
जो सुंदर चीज़ों के अजायबघर में सबसे बड़ी सुंदरता थी
और कहा, कि पेडू में बँधा हुआ यह नाड़ा कसता है
कि क़ीमतों का टैग आप कहीं और टाँग लें महोदय
इस अकड़ी काली, गोल गाँठ को अब मैं खोल रही हूँ
ये कौंधती टाँगें,
ये सुतवाँ नितंब, ये घूरते स्तन, ये सोचती-सी नाभि
सर्वत्र प्रस्तुत कि जैसे हाथ बढ़ाओ, छू लो, खा लो
पर इरादा कर बढ़ो तो... अरे सँभालो...
यही क्या हिंदू सौंदर्य है!’
आगे कवि हिन्दूओं के पवन-मुक्तासन पर ख़ास बल देता हैः
‘चकित थे हिंदू
बलात्कार की विधियाँ सोचते, घूरते, घात लगाए, चुपचाप देखते, सन्नद्ध
कि भीम के, द्रोण के देश में जनखापन छाया जाता है
कि एक ही आकृति में स्त्री आती है और पौरुष जाता है
कि दृश्य यह अद्भुत है
पूछते विधाता से हाथ जोड़कर प्रार्थना में
और शाखा में पवन-मुक्तासन बाँधकर संचालकजी से
कि इस दृश्य का लिंग क्या है, प्रभो!’
हद है कि कवि के दिमाग़ में हिन्दू पुरुष और स्त्रियाँ तो घुसी ही घुसी हैं, शाखा संचालक जी की पाद भी घुस गयी है। शायद कवि कहना चाहता है कि यह संसार की एकमात्र पाद है, कोई और ऐसी पाद नहीं पाद सकता। शायद कवि यह कहना चाहता है, कामरेड कभी ऐसी पाद नहीं पादते। हिन्दी के मार्क्सवादी लेखक और लेखक संगठन के लोग ऐसी पाद कभी पाद ही नहीं सकते है। मतलब यह कि संचालक जी की पाद, पाद है, बाकी सब इत्र छोड़ते हैं। अरे भाई मैंने हिन्दी की दुनिया में हिन्दी के मार्क्सवादी लेखकों को सबसे ख़तरनाक हवा छोड़ते हुए देखा है। हिन्छी की दुनिया बस्सा रही है। सूप बोले तो बोले चलनी क्या बोले जिसमें बहŸार छेद। इस पाद-विचार की ज़रूरत यह बताने के लिए पड़ी कि लेखक अपने गिरोह, अपने गैंग में प्रतिष्ठा अर्जित करने के बहुत प्याज खाने लगता है। आँख, कान, मुँह, हर जगह से मार्क्सवादी प्याज खाने लगता है। हिन्दुओं को जितनी गाली दो, जितना बुरा कहो, उतना ही सम्मान मिलेगा, अवसर मिलेगा, लेखक संगठनों का प्यार मिलेगा। हिमाकत देखिए, हिन्दुओं की यौन-क्रांति दिखती है, अन्य धर्मों की यौन-क्रांति नहीं। जैसे नितंब, स्तन, नाभि आदि अंग किवल हिन्दू स्त्रियों के शरीर में होते हैं, बाकी अन्य धर्मों स्त्रियों के के शरीर में इनकी जगह लोहा-लक्कड़ होता है।
हिन्दू विरोधी मार्क्सवादी लेखकों ने कविता की हत्या करने से पहले अपने कव्यविवेक की हत्या की है। हिन्दी कविता के भविष्य की हत्या की है। नये कवियों के भविष्य की हत्या की है। कोई कवि तत्सम के कुछ शब्द अपनी कविता में ले आए तो, उसे दौड़ा लेंगे और कोई मुसलमान कवि अरबी-फारसी हिन्दी में लाए तो उसका स्वागत करेंगे। मेरा मतलब आमफहम शब्दों को लाने से नहीं है। अरबी-फारसी के कठिन शब्दों को लाने से है। बिल्कुल युवा कवि अदनान कफील दरवेश का नाम लेना नहीं चाहता था, लेकिन हिन्दी कविता के साथ दिल्ली का एक गैंग जो कर रहा है, उसे बताने के लिए उदाहरण के रूप में नाम लेना पड़ रहा है। मैं इस युवा कवि की प्रतिभा पर संदेह नहीं कर रहा हूँ, बल्कि यह देख रहा हूँ कि उसकी कविता में क्या दिक्कत पैदा हो रही है। उसे हिन्दी के रंग में रंगने से कौन रोक रहा है। उसकी कविता में एक ओर बोली के बहुत प्यारे शब्द- नइहर, सईंतते, सम्हारते, लीपते आते हैं तो दूसरी ओर अरबी-फ़ारसी के कठिन शब्द- बोसीदा, फलक बोस, सब्ज बुर्ज, जाँ-कनी, अजदहा, बयाज, मुलव्विस, शीरफाम, रूहखस मकीन, मुतवज्जेह, नशेब, सरगोशिया, क़दीमी, आहन, क़िबला आदि, मुहावरे में कहूँ तो हजारों। कहना ज़रूरी है कि अरबी-फ़ारसी के कठिन शब्दों की भरमार, अदनान की एक मुस्लिम कवि की छवि बनाते हैं। अदनान को इससे बचने की ज़रूरत है। हिन्दूपन और मुसलमानपन, जीवन में हो तो ठीक, कविता में नहीं। जालीदार टोपी लगाइए या शिखा रखिए, चलेगा। हाँलाकि र्घामक होते हुए भी प्रगतिशील हुआ जा सकता है। लोग होते ही हैं। कविता में, ख़ासतौर से उसकी भाषा में हिन्दूपन और मुसलमानपन की गुंजाइश नहीं है। अशोक वाजपेयी जैसे कविता के जरजरात शत्रु की कविताओं में तत्सम की अति, मेरा मतलब हिन्दूपन को पसंद नहीं करता। विडम्बना कहिए या मार्क्सवादी लेखकों की मूर्खता, ऐसे व्यक्ति को अपना नायक बना लेते हैं, प्रतिरोध का नायक बना लेते हें। हद है। बहरहाल बात कविता की भाषा में हिन्दूपन और मुसलमानपन की कर रहा हूँ। भाषा कोई बिना दरवाजे और बिना खिड़कियों का भुतहा मकान नहीं है। उसमें दूसरी भाषाओं के शब्दों की आवाजाही होती है, लेकन उन शब्दों की जो लोक के रास्ते से आते है। हिन्दी में ढलकर आते है। इन युवा कवियों को अपने मुसलमानपन से बचने की जरूरत है। अरबी-फारसी के कठिन शब्दों का आतंक फैलाने से बचने की जरूरत है। हिन्दी को ग़ालिब जैसे कवि की ज़रूरत नहीं है, जायसी , रसखान, रहीम वगैरा जैसे कवियों की ज़रूरत है। जो हिन्दी में आए तो हिन्दी के रंग में रंग जाए। लगे ही नहीं कि कोई और है। जायसी की अवधी, तुलसी की अवधी से कम नहीं है। फ़िराक़ भी उर्दू में काम करते हैं तो हिन्दी के कठिन शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते हैं-
तमोलियों की दुकानें कहीं कहीं हैं खुलीं
खड़ा है ओस में चुपचाप हर सिंगार का पेड़
दुल्हन हो जैसे हया की सुगंध से बोझल
कवियों को कविता से ही नहीं, कथाभाषा से भी सीखना चाहिए। कैसे राही मासूम रज़ा ने आधागाँव उपन्यास में कथाभाषा को समृद्ध किया है। उर्दू और भोजपुरी के मेल से कमाल किया है। मीठी ज़बान उर्दू में मीठी बोली भोजपुरी को मिलाकर कैसे चकित करते है। श्रीलाल शुक्ल के रागदरबारी में ट्रक के वर्णन और केदारनाथ सिंह के एक टूटा हुआ ट्रक को एक साथ रखकर देख सकते हैं। भाषा की दृष्टि से नहीं। किसी कविता के स्रोतों की पड़ताल की दृष्टि से। असल में अब सीखना बंद हो गया, मशहूर होने की लालसा ने युवा कवियों को एक अंधी दौड़ में दौड़ते-दौड़ते खत्म हो जाने के लिए छोड़ दिया गया है।
मुश्किल यह है कि अदनान जैसे तमाम नए कवि पुरस्कार, अवसर और चर्चा के लिए लेखक संगठनों और साहित्य के शक्तिकेंद्रों की ओर जाते हैं और फिर कभी अपनी मिट्टी में लौट नहीं पाते हैं। अदनान ही नहीं, चेतनक्रांति जैसे तमाम कवि भी इन्हीं लालसाओं की वजह से अपने काव्यविवेक को तजकर लेखक संगठनों की शरण में चले जाते हैं। बड़ा और बड़ा कवि बनने की लालसा में फँस जाते हैं। लेखक संगठन वालों को ऐसे ही वरिष्ठ और युवा लेखक चाहिए, उनकी दुकान चलाने के लिए। उदाहरण देकर बात करनी हो, तो कहना चाहूँगा कि आलोचना के संपादक आशुतोष कुमार बहुत प्यार से भी ऐसे कवियों को डाँट नहीं सकते हैं, कुछ समझा नहीं सकते हैं। क्योंकि यह उनकी रणनीति का हिस्सा नहीं है। उन्हें कविता की भाषा से कुछ लेना-देना नहीं है। आलोचना में एक दूसरे संपादक हैं संजीव कुमार, उनके बारे में कम जानता हूँ; बहुत कम, अलबत्ता इतना जानता हूँ कि अरुंधति राय के भक्त हैं। उनका इंटरव्यू लिया है। शायद सत्यानंद निरुपम के साथ। अरुंधति जी ने हिन्दी को क्या दिया है, हिन्दी में उनका योगदान क्या है, हिन्दी के लिए अनिवार्य क्यों हैं? बुकर पाने के पहले से उनकी पूजा हिन्दी में शुरू हुई है या बाद में ? ओह ये कैसे जाहिल हिन्दी में आ गए हैं, हिन्दी के धंधे में आ गए है, पुरस्कार से लेखक का कद तय करते हैं। अरे मूखों, हिन्दी या किसी भी भाषा की परंपरा में कृतियों और लेखक के मूल्यांकन के लिए पुरस्कार को कसौटी नहीं माना गया है। सत्यानंद निरुपम जैसे पुस्तक-संपादकों ने पुरस्कार का इतना बड़ा हव्वा खड़ा कर दिया है कि जो पुरस्कृत लेखक है, वही बड़ा लेखक है, वही जीवित है, कालजीवी है। बुकर तो बुकर, साहित्य अकादमी पुरस्कार उनके लिए तोप है, है तो भारतभूषण पुरस्कार भी तोप ही का पुरस्कार । भारतभूषण पुरस्कार पा गया, तो कविता संग्रह छाप दो। हद है। कविता की समझ नहीं है, आलोचना की समझ नहीं है, उपन्यास की समझ नहीं है, पुरस्कार की समझ से राजकमज प्रकाशन समूह का धंधा चल रहा है। हिन्दी को कौन नुक़सान पहुँचा रहा है, यह कुछ-कुछ जानता हूँ। हिन्दी कविता का टेंटुआ, ऐसे ही संपादकों के पंजे में फँसा हुआ है। पिछले पन्द्रह वर्षों में जिस तरह के पुस्तक-संपादकों का प्रादुर्भाव हुआ है, ये हिन्दी कविता ही नहीं, हिन्दी आलोचना और उपन्यास की भी जान लेकर मानेंगे। एक ओर राजकमल प्रंकाशन समूह के पुस्तक संपादकों, आलोचना पत्रिका और लेखकसंगठनों से जुड़े कुछ लोगों का गैंग है, तो देशभर में फैले लेखक संगठनों से जुड़े लेखकों का भय, उनका साहित्य-विवेक च्युत होना, पुंरस्कार और चर्चित होने की तीव्र लालसा ने उन्हें हिन्दीद्रोही बना दिया है। मुश्किल यह कि जो नये कवि उनके साथ हैं, उनकी कमियों को दूर करने, उन्हें और सजाने-सँवारे की ज़िम्मेदारी भी उन्हीं पर है। जबकि यह सब करने की स्थिति में वे आज नहीं हैं। कहना उन्हें चाहिए था, कह मैं रहा हूँ। प्यार से डाँट मैं रहा हूँ, यह काम उन्हें करना चाहिए था। संपादक की ज़िम्मेदारी बहुत बड़ी है, आज महावीर प्रसाद द्विवेदी सरस्वती निकाल रहे होते, मैथिलीशरण गुप्त जैसे कवियों से कविता का पथ सँवार रहे होते, अरुंधति के पीछे इसलिए नहीं भागते कि बुकर मिला है और बुकर मिलने से देश की सबसे बड़ी लेखक हो गई हैं। मैं अरुंधति का विरोधी नहीं हूँ, उनका शत्रु नहीं हूँ, लेकिन हिन्दी के लेखकों के हिस्से का मान उन्हें दे दिया जाए, यह स्वीकार्य नहीं है। हिंदी का संसार मेरी प्राथमिकता में है। हिन्दी कविता के लिए लाखों के बोल सह सकता हूँ, नुक़सान उठा सकता हूँ, किताबें छपवाए बिना मर सकता हूँ, मशहूर हुए बिना मर सकता हूँ। मुझे हिन्दी के बुरे लागों से कुछ नहीं चाहिए। साहित्य में जिस बात को ग़लत समझता हूँ, तो उसे ग़लत कहूँगा। यह एक बहुत बुरा समय है। कुछ लोग हर समय में होते हैं, जिन्हें जोखिम उठाकर साहित्य का सच कहना ही होता है।
(कविता की जान लेने के सौ तरीके का दूसरा अध्याय)

आपका अलेख ( पुस्तक का एक अध्याय?) पूरा पढ़ा। उसके किसी बिंदु से कोई असहमति नही।
जवाब देंहटाएंलेकिन कुछ इतर कहना चाहता हूँ।
व्यक्ति की, किसी भी व्यक्ति की, फ़ितरत (स्वभाव और चरित्र) को बदला नहीं जा सकता। कोई भी विचारधारा, कोई भी धर्म, कोई भी बौद्धिक कसरत नहीं बदल सकती। मनुष्य जीनोम के साथ लिए लिए आता है और लिए लिए चला जाता है।
तो संसार में नानाविध लोग हैं। पुरखों ने सत्व, रज और तम में वर्गीकरण किया किंतु यह नहीं जोड़ा कि मात्रा में सत्व रज से और रज तम से बहुत कम रहेगा। हमेशा। इस बाह्य सीमा के भीतर समयानुसार तीनों का अनुपात बदलता रहेगा किंतु सकल की मात्रा का यह क्रम हमेशा बना रहेगा। कारण, स्थूल मात्रा में सूक्ष्म से बहुत कम होता है। स्थूल शरीर के इतने विशाल और इतने जटिल तानेबाने से सूक्ष्म चेतना उत्पन्न होती है जो अदृश्य है, लगभग अज्ञेय है। अद्यतन क्वांटम भौतिकी में चेतना की भूमिका के चलते ही अनिश्चितता का सिद्धांत आया है। तुलसी को कहना पड़ा—बिधि प्रपंच गुन अवगुन साना। यह एक्ज़िस्टेंश्यल गिवेन है। इसकी स्तुति या निंदा से कुछ हो पायेगा? मुझे संदेह है।
नमस्कार। कहा नहीं जा रहा था। सच को कहना ज़रूरी था। इसलिए कहा है। सादर।
हटाएंगणेश पाण्डेय
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