- गणेश पाण्डेय
दिल्ली जाऊँगा
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मई-जून में
दिल्ली में कितनी गर्मी रहती होगी
वहाँ के लेखक बाहर धूप में
निकलते होंगे या नहीं निकलते होंगे
निकलते होंगे तो उनका माथा
कितना गर्म रहता होगा
सोचता हूँ गर्मियों में
बच्चों के पास एनसीआर जाऊँ
जाऊँ तो सबसे पहले
उस लेखक से मिलूँ
जिसका माथा हमेशा ठंडा रहता हो
और जो दिल्ली में रहकर भी
सादादिल हो सादामिज़ाज हो
और जिससे मिलने के बाद
आग बरसाती हुई दोपहरी में भी
रूहअफ़ज़ा शर्बत पीने जैसी
ताज़गी मिलती हो
दूसरे लेखकों से मिलने के लिए
कौन सा दिन और वक़्त सही होगा
किससे स्वागत की उम्मीद करूँगा
कौन मुँह लटकाकर मिलेगा
किसे कुर्सी का घमंड होगा
किसे नहीं होगा
किससे मिलना ज़रूरी होगा
किससे ग़ैर-ज़रूरी
किससे मिलकर
वज़नी होकर लौटूँगा
किससे लुट जाऊँगा
किसी से मिलूँ तो कितना झुकूँ
कितना मुँह खोलूँ कितनी चाय पिऊँ
सुड़कूँ या ख़ामोशी से पिऊँ
नमकीन खाऊँ या नहीं खाऊँ
अव्वल तो मेट्रो में अकेले
चढ़ नहीं पाऊँगा गिर जाऊँगा
कोई सामान चुरा लेगा
मोबाइल पर्स पानी की बोतल
एक गमछे से इतनी बड़ी दिल्ली में
ऐन दोपहरी में लू के थपेड़ों से
कैसे बच पाऊँगा मुश्किल होगी
फिर भी दिल्ली जाऊँगा
पहली बार गर्मियों में कुछ हफ़्ते
एनसीआर में रहने की मजबूरी हो
तो मुझे क्या करना चाहिए
और क्या नहीं करना चाहिए
मदद करो ओ दिल्ली वालो
ओ दिल्ली आने-जाने वालो
इकहत्तर
पार कर चुका हूँ
एक बार दिल्ली के दिल को
एकदम से मेरे दिल से मिला दो
दोनों एक-दूसरे का सुख-दुख
जान लें
आग बरसती हो या पानी
चाहे चलती हो आँधी
जब दिल्ली आऊँगा ही तो
दिल्ली के मज़े मुझे भी चखा दो
लेखकों की रंगीन शामें महफ़िलें
और रक़्स दिखा दो दिखा दो
मुझे भी थोड़ी-सी
पिला दो पिला दो पिला दो
उनकी तरह
एक बूढ़ी रक़्क़ासा बना दो
लेकिन
रक़्स ख़त्म होने के बाद
देर रात मुझे रास्ता कौन बताएगा
मुझे मेरे बच्चों के पास
कौन पहुँचाएगा
मेरी मदद कौन करेगा
मैं वापस अपने ठिकाने पर अकेले
देर रात कैसे लौट पाऊँगा
नहीं-नहीं मैं दिल्ली की
रंगीन रातों को देखने के लिए
क़तई रुक नहीं पाऊँगा
दिन ढलने से पहले लौट आऊँगा।

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