सोमवार, 30 जुलाई 2018

भीड़ तथा अन्य कविताएं

- गणेश पाण्डेय

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बेवकूफो
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तुम
इनाम से दूर
जिन्दा नहीं रह सकते हो
वे
कुर्सी के लिए
किसी की भी जान ले सकते हैं
बेवकूफो
तुम्हारी भी।
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तुम्हें शर्म क्यों नहीं आती
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जिसे
तुम्हारा पाठक होना चाहिए था
देखो कैसे मारकाट कर रहा है
सड़क पर किस चीज के लिए
उसके हाथ में
तुम्हारी किताब होती
तो कितना अच्छा होता
लेकिन तुम्हें यह फिक्र क्यों नहीं है
जिसे
एक आदर्श नागरिक बनना था
जिसे क्रांति करना चाहिए था
तुम्हारी कविताएं पढ़कर
वह भी
आखिर तुम जैसा निकला
लालची चापलूस बिना रीढ़ का
सत्ता का मामूली पुर्जा
तुम्हें
शर्म क्यों नहीं आती
जन की चिंता क्यों नहीं करते
तुच्छ चीजों के लिए जीते हो
और आए दिन नाटक करते हो
प्रतिरोध का।
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भीड़
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पहले
हम कितने बड़े बेवकूफ थे
समझते थे कि भीड़ है तो आदमी
भीड़ में बिल्कुल सुरक्षित है
कहां चली गयी
वह प्यारी-सी सालों पुरानी बेवकूफी
जिसमें हमारे बच्चे सुरक्षित रहते थे
आखिर
अब आदमियों की भीड़ में
कैसे आ जाते हैं भेड़िए
कितना मुश्किल हो गया है
भीड़ के बीच से भीड़ के सामने से
भीड़ के पास से भीड़ के इलाके से
किसी भले आदमी और औरत
किसी बच्चे और बूढ़े का
गुजरना
और तो और
इस भीड़ में एक बकरी तक
सुरक्षित नहीं रह गयी है
यह कैसा विकासशील देश है
नहीं-नहीं
यह आदमियों की भीड़
नहीं हो सकती है
यह आदमियों के मुखौटे में
पशुओं की भीड़ हो सकती है
कैसे कह दूं कि इस मुल्क को
इस अतार्किक अवैज्ञानिक
अमानवीय असंवेदनशील
असभ्य अधर्मी
हिंसक भीड़ से कोई खतरा नहीं है!


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