शनिवार, 23 जून 2018

गाय पर तीन कविताएं

- गणेश पाण्डेय 
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मैं उस गाय को जानता हूं
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मैं उस गाय को जानता हूं
जो मेरी मां की सखी थी
ठीक मेरी मां की तरह
गोरी और सीधी

मां जैसे ही 
उस गाय के पास 
छोटी-सी बाल्टी
चाहे भगोना लेकर पहुंचती थी

वह गाय 
जान जाती थी कि अब
सखी की छातियों से
दूध नहीं उतरता

गाय बोलती 
कि ले लो सखी जितना चाहो
अपने बड़कू और छोटकू के लिए
मौसी का दूध

मां
उसके लिए 
पुआ गुलगुला बखीर
सब लाती थी

मैं कई बार
अपनी दाल-भात की कटोरी
बछड़े के सामने रख देता

मैं बहुत छोटा था
मौसी को छूता था
चूमता था प्यार करता था
उसके बछड़े से 
पक्की दोस्ती हो गयी थी मेरी
मैं उसके संग खेलता था

मैं 
उस गाय को जानता हूं
जिसकी छातियों को 
सिर्फ मां छू सकती थी

और 
एक दिन
जिस गाय के न रहने पर
उसके गले से लिपट कर
रोती रही मां रातभर

वह गाय
मां की बहुत प्यारी सखी थी
मां ने उससे कभी नहीं पूछा
तुम्हारा नाम क्या है
तुम हिन्दू हो कि मुसलमान

वह गाय
न संस्कृत बोलती थी
न हिन्दी-उर्दू चाहे अरबी-फारसी

लेकिन उसके पास
प्रेम की अद्भुत भाषा थी
वह अल्ला मियां की गाय थी।
(2018)

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हे गाय माता
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हे गाय माता 
आप हम हिन्दुओं की
सचमुच की माता क्यों नहीं हुईं
आपने बछियों और बछड़ों को
क्यों जन्म दिया

हे गाय माता
आपने हम हिन्दुओं पर 
यह कृपा क्यों नहीं की
आपने हमें और हमारे पूर्वजों को
अपनी कोख से क्यों नहीं पैदा किया

हे गाय माता
हम जो आपका
जन्म देने वाली अपनी मांओं से 
कहीं ज्यादा खयाल रखते हैं
हम जो आपकी हत्या के बाद
मामूली शक की बिना पर
पलक झपकते
मुसलमानों की जान ले लेते हैं
आपके सगे बच्चे क्यों नहीं हुए

हे गाय माता
हम मनुष्यों को जन्म देने वाली
अपनी माताओं और बहनों के संग
होने वाली हजार हिंसाओं पर
एक चुप हजार चुप रहते हैं

हे गाय माता
ये लोग रिश्ते में आपके कौन हैं 
जो हमें आपके लिए
छोटी-बड़ी जनसभाओं से लेकर 
विश्वविद्यालयों तक में 
जान लेने-देने की शिक्षा देते हैं

हे गाय माता
हम आपके लिए किसी को
थाना-पुलिस-सरकार के सामने
पीट-पीट कर मार क्यों डालते हैं
कहीं हम भी मनुष्य की जगह
सचमुच बैल तो नहीं हो गये हैं!
(2018)

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गाय का जीवन
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वे गुस्से में थे बहुत
कुछ तो पहली बार इतने गुस्से में थे

यह सब
उस गाय के जीवन को लेकर हुआ
जिसे वे खूँटे बाँधकर रखते थे
और थोड़ी-सी हरियाली के एवज में
छीन लिया करते थे जिसके बछड़े का
सारा दूध

और वे जिन्हें नसीब नहीं हुई
कभी कोई गाय, चाटने भर का दूध
वे भी मरने-मारने को तैयार थे
कितना सात्त्विक था उनका क्रोध

कैसी बस्ती थी
कैसे धर्मात्मा थे, जिनके लिए कभी
गाय के जीवन से बड़ा हुआ ही नहीं
मनुष्य के जीवन का प्रश्न ।
(1996)



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