सोमवार, 17 अक्तूबर 2016

पांच छोटी कविताएं

- गणेश पाण्डेय

अकड़ 1

हे प्रभु
हिन्दी में ऐसा वक्त भी आये
जब कवि की अकड
कहीं और नहीं
साहित्य की सत्ता के सामने
दिखे।

अकड़ 2

हे प्रभु
आये जरूर आये
हिन्दी में ऐसा भी वक्त
जब आलोचक अपनी अकड़
निरीह कवि के सामने नहीं
साहित्य की सत्ता के सामने
दिखाए।

अकड़ 3

हे प्रभु
आप हो तो ठीक है
न हो तो भी
हिन्दी में ऐसा वक्त जरूर आये
जब पाठक ही पाठक हों
और पाठक के पास इतना बल हो
कि कवि और आलोचक की अकड़
तोड़कर उसकी जेब में डाल दें।

लज्जा

हे प्रभु
माइक के सामने
अखबार के बयान में
कविता लिखते हुए
अकड़ गयी है कवि की रीढ़
जहां-जहां झगड़ना था मीठा बोला
जहां-जहां तनकर खडा होना था झुका
जहां-जहां उदाहरण प्रस्तुत करना था छिपकर जिया
हे प्रभु
उसे सुख-शांति दीजिए न दीजिए
थोडी-सी सचमुच की लज्जा जरूर दीजिए।

फर्क

वे
साहित्यपति थे

उन्होंने कहा -
झण्डा लेकर चलो

मैंने कहा -
डण्डा लेकर चलो।


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