शनिवार, 4 अप्रैल 2015

गाय का जीवन

- गणेश पाण्डेय

वे गुस्से में थे बहुत
कुछ तो पहली बार इतने गुस्से में थे


यह सब
उस गाय के जीवन को लेकर हुआ
जिसे वे खूँटे से बाँधकर रखते थे
और थोड़ी-सी हरियाली के एवज में
छीन लिया करते थे जिसके बछड़े का
सारा दूध


और वे जिन्हें नसीब नहीं हुई
कभी कोई गाय, चाटने भर का दूध
वे भी मरने-मारने को तैयार थे
कितना सात्त्विक था उनका क्रोध


कैसी बस्ती थी
कैसे धर्मात्मा थे,
जिनके लिए कभी
गाय के जीवन से बड़ा हुआ ही नहीं
मनुष्य के जीवन का प्रश्न ।

(‘अटा पड़ा था दुख का हाट’ से)








3 टिप्‍पणियां:

  1. आज के समय को रेखांकित करती हुई कविता .जहां गाय मनुष्य के जीवन से ज्यादा जरूरी हो गयी है .

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  2. अत्यंत सामयिक, महत्वपूर्ण कविता

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