रविवार, 29 जून 2014

बच्चों को बताएँ कि सिर्फ एक फूल क्यों नहीं

-गणेश पाण्डेय
 
कुछ राजे-रजवाड़े या रईस लोगों के बच्चों की तरह मेरी प्रारंभिक शिक्षा घर पर विशेष शिक्षकों की देख-रेख में नहीं हुई और न तो बहुत नामी-गिरामी अर्थात किसी दूसरी जगह के अमीरों के बच्चों वाले स्कूल में हुई। कविता का सबसे पहला पाठ घर पर नीम की छड़ी से ,  जो पिता जी के हाथ में थी। मैं स्कूल जाना नहीं चाहता था, बहुत से बच्चों की तरह खेलने- कूदने को ही जीवन की सबसे बड़ी शिक्षा समझता था। असल में यह उम्र ही ऐसी थी। तब स्कूल भी ऐसे कहाँ थे जिनमें सबसे छोटी कक्षा में जाने पर चॉकलेट मिलती ? हाँ, उस वक्त मेरे बहुत छोटे-से कस्बे में जो एक ग्रामसभा थी, दो स्कूल थे, एक प्राइमरी स्कूल था जो सरकारी था और एक गैर सरकारी। उस गैर सरकारी स्कूल के कर्ताधर्ता तेलिया पंडिज्जी थे, हम सब उन्हें इसी नाम से जानते थे। साँवला चेहरा, दरमियाना कद, धोती-कुर्ते की पोशाक और कड़क आवाज, बाद में ऐसी ही एक शानदार आवाज सबसे ऊँची कक्षा में दुबले-पतले और नाटे कद के एक कवि-आलोचक गुरु में दिखी थी। तेलिया पंडिज्जी की आवाज तो बहुत अच्छी थी ही, ज्ञान-वान की पहचान भला हम बच्चों को उस वक्त कहाँ थी, पर सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली बात उनकी लिखावट थी। श्यामपट्ट पर क्या मोती जैसे सुंदर अक्षर लिखते थे। उन्हीं सुंदर अक्षरों ने कुछ सीखने के लिए प्रेरित किया। वे हाथ पकड़कर भी पटरी पर खड़िया मिट्टी से लिखवाते थे। भाषा को सीखना ही मेरे लिए कविता के देश में जाने का पहला पासपोर्ट था। हालाँकि कविता लिखना कुछ और वक्त बाद शुरु किया। उठो लाल अब आँखें खोलो जैसी कविताओं से होते हुए आगे बढ़े। तेलिया पंडिज्जी के स्कूल में सिर्फ कक्षा चार तक की पढ़ाई होती थी, पाँचवीं में दाखिले के लिए प्राइमरी स्कूल में जाना पड़ा। वहाँ रामप्रकाश पंडिज्जी मिले। कड़क वे भी थे। सामने रेलवे लाइन थी और बगल में स्टेशन। पाँचवीं के बच्चे शरारती इतने थे कि रेल पर बिना टिकट बैठ कर पश्चिम के स्टेशन चिल्हिया नंबर एक करने चले जाते थे तो कभी पूरब के स्टेशन उस्का दो करने। रामप्रकाश पंडिज्जी ने एक ऐसे ही शरारती बच्चे को पीठ पर रेल की पटरी के पत्थर से जरा-सा ही कस कर मारा था और उसके आसपास के बच्चे ंके बस्ते भीग गये थे। कहना यह कि ऐसे ही बच्चों के बीच से निकल कर जब कस्बे के इंटर कालेज में दाखिला लिया तो वहाँ के प्रधानार्य आरछी सिंह तो बहुत धाकड़ प्रिसिंपल थे, पर मेरा ध्यान उनकी जगह हिन्दी के अध्यापक रमेश सिंह गुरु जी की तरफ आकर्षित हुआ। पहली बार जब मैंने ग्रामजीवन पर निबंध लिखा और उस पर रमेश गुरु जी ने जो तीन शब्दों का एक छोटा-सा वाक्य टीप के रूप में दर्ज किया, कई दिनों तक उस कापी को अपने सीने से लगाए रहा।  इसके तनिक पहले ही कविता लिखने की कोशिश में तुकबंदी शुरु कर दी, पर असल में कविता के प्रति अनुराग और प्रगाढ़ कस्बे में होने वाले मुशायरों और कविसम्मेलनो से हुआ। मेरे लिए पारंपरिक स्कूल ही नहीं साहित्य के पारंपरिक आयोजन भी साहित्य के स्कूल बने। किशोर जीवन में कृष्णबिहारी नूर जैसे शायर के शेरों ने मेरे भीतर न सिर्फ कविता, बल्कि जीवन के प्रति नजरिया भी बदला-
मैं एक कतरा हूँ मेरा वुजूद तो है
हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है।
  राहुल सांकृत्यायन की ‘दर्शन-दिग्दर्शन ने भी जीवन को देखने की नयी दृष्टि दी। बुद्ध का घर मेरे घर से कुछ कोस की दूरी पर था। एक सबसे बड़ी चीज थी रात में गर्मियों में नीम के पेड़ के नीचे चारपाई डालकर सोना पड़ता था, कस्बे में किसी के घर बिजली थी नहीं, हाँ, सिंचाई विभाग की कॉलोनी में कोई बड़ा-सा जनरेटर था, जिससे सड़कों पर स्ट्रीट लाइट जल जाती थी। एक खम्भा मेरे घर के सामने भी था। बस रात में कागज-कलम लेकर बिस्तर पर लेटे-लेटे कुछ लिखता रहता। हालाँकि कविता सोचने की कुछ ऐसी जगहें भी होती थीं, जिनका जिक्र नहीं किया जा सकता। आशय यह कि पारंपरिक स्कूलों ने और गैर पारंपरिक स्कूलों ने कविता के प्रति रुचि पैदा की। भक्तिकाल और आधुनिककाल की कविताओं ने ही नहीं, मुशायरों और कविसम्मेलनों की कविताओं ने भी काव्यरचना के लिए प्ररित किया। मेरे कस्बे में कविता के लिए कोई कार्यशाला नहीं लगती थी। कुछ संस्थाएँ बनी जिन्होंने कवितायात्रा के अगले पड़ाव तक पहुँचाया। मैं, नजीर, सत्यप्रकाश, असलम और दूसरे कई साथियों ने मिलकर एक संस्था बनायी, एक छोटी-सी पत्रिका निकाली, पर यह सब साहित्य के मेरे पहले गुरु जो पेशे से चिकित्सक हैं, श्रद्धेय डा. सच्चिदानंद मिश्र के संरक्षण में हुआ। कविता लिखने की शुरुआत आदिकवि की तरह क्रौंच पक्षी के वध जैसी किसी घटना को देखकर नहीं हुआ, बल्कि जीवन की एक स्वाभाविक गति में आप से आप। हालाँकि एक तथ्य यह भी है कि मेरी कुंडली में कवि होना लिखा भी था। मेरे पिता जी ने जब एक जानकार को मेरे सामने ही दिखाया तो मैंने भी सुना। बहरहाल कुंडलियों में बहुत-सी बातें होती हैं, सब सही होतीं तो कोई बेरोजगार या दुखी रहता ? निराला जी की कुंडली में दो विवाह लिखे ही थे, पर हुआ ? कविजीवन के निर्माण की अपनी प्रक्रिया होती है, कुछ धीमी होती है।
        असल में कविजीवन का अपना वैशिष्ट्य होता है। पहला तो यह कि कवि की आँख उसे बेचैन करती रहती है, दूसरा उसका दिल। विशेष ये आशय सिर्फ यह कि दिखे सबकी तरह और हो तनिक-सा हटकर। हर कवि अपने जीवन में एक अर्थ में अपनी कविता का ही जीवन जीता है। कवि का जीवन और कविता का जीवन, दोनों में संगति ही अच्छी कविता को संभव करती है। हाँ, अच्छी कविता की समझ बनने में भी वक्त लगता है। मैं भूलता नहीं हूँ कि बहुत पहले एक बार विश्वनाथ जी पूछा कि अच्छी कविता लिखने के लिए क्या करना चाहिए ? उन्होंने बड़ी सहजता और विनम्रता से उत्तर दिया था कि अरे गणेश जी, यह सब लिखते-लिखते अपने आप हो जाता है। क्यों प्रश्न को टाल गये, इसका जवाब उनकी चिर-परिचित जासूस मुस्कान में ढ़ूँढ़ना चाहिए था,सोचता हूँ किसी दिन उनके घर जाऊँ और फिर से ढ़ूँढ़ू ? बहरहाल, यह विनोद ऐसे ही।
          मैं अपने बच्चों को कक्षा में कविता भिन्न प्रकार से पढ़ाता हूँ। आचार्यों की बात कहना जरूरी होता है तो भी कोशिश करता हूँ कि ऐसे कहूँ कि मेरी बात उन तक पहुँच जाय। उनके जीवन के आसपास की चीजों को उठाकर उन्हें बताना चाहता हूँ। ऐसा इसलिए कि पूर्वांचल के बच्चे, जेएनयू के बच्चे नहीं होते हैं। यहाँ तो सबसे ऊँची उपाधि लेने के बाद भी बच्चा एक साधारण प्रार्थना-पत्र ठीक से नहीं लिख पाता है। जिस अंचल में पीएचडी करके बच्चे पाँच-सात हजार की नौकरी करेंगे, वहाँ पढ़ाई का माहौल और स्तर भला क्या होगा ? जहाँ विश्वविद्यालयों के आचार्य हिन्दी की उन्नति की जगह ईर्ष्या-द्वेष और संस्थान की राजनीति में लगे रहेंगे तो यह सब नित्य देखकर बच्चे अच्छे कैसे बनेंगे ? हाँ तो कह रहा था कि कविता को कैसे समझाएँ! कोलरिज की इस बात को समझाने के लिए कि कविता उचित शब्दों का उचित क्रम है, उदाहरण देता हूँ कि नाई तुम्हारे बाल कैसे बनाता है, कान के बिल्कुल पास बहुत छोटा, फिर ऊपर थोड़ा-सा बड़ा, फिर ऐसे ही वह बालों को उचित क्रम देता है। यह भी बताता हूँ कि वह कितनी बार कैंची चलाता है, कितनी बार हाथ उठाता है, कितनी बार बाएँ-दाएँ, आगे-पीछे होता है। यह भी बताता हूँ कविता पान की पीक की तरह एकबार में बाहर नहीं हो जाती है, समय देना होता है। घुलाना होता है। पान की पीक है भी नहीं कविता, बहुत खास चीज है। बताता हूँ कि तुम्हारे जैसे बच्चे कितनी बार शीशे के सामने खड़े होकर कंघा करते हैं
           एकबार में जब कंघा नहीं हो पाता है तो कविता कैसे ? कई बार लड़के बिजली की गति से हजार बार कंघे को आगे-पीछे ले जाते हैं। इतना ही नहीं, जब वे पूरी तरह आश्वस्त हो जाते हैं और जूते पैरों में डाल कर निकल रहे होते हैं, उस वक्त भी मुड़कर अपने बालों को एकबार फिर देख लेते हैं। बच्चों को यह भी बताता हूँ कि कोई-कोई बच्चे रात में सोने के पहले भी एक बार कंघा करना पसंद करते हैं। ऐसे बनती है कविता। इतना समर्पण , इतनी दीवानगी और सुदर दिखने की इतनी इच्छा से ही कविता भी सुदर बनती है। केवल आचार्य शुक्ल का ‘कविता क्या है’ निबंध ही नहीं महावीर प्रसाद द्विवेदी के  निबंध ‘कवि-कर्तव्य’ को भी ध्यान में रखना पड़ता है।
          जहाँतक बात लेखन कार्यशालाओं की है, इसे बहुत अच्छा माध्यम मानता हूँ, लेकिन जैसे कविता को जनता से जोड़ने के माध्यम मुशायरों और कविसम्मेलनों का पतन हुआ है, उसी तरह आज कविता की कार्यशालाएँ भी वह नहीं कर पा रही हैं जो उन्हें करना चाहिए। देखिए अपवाद भी है। कुछ कार्यशालाएँ अच्छी भी होंगी। मैं मानता हूँ कि छोटे बच्चों के लिए कार्यशालाएँ जिस रूप में चल रही है, उसके कुछ अच्छे परिणाम भी आ रहे हैं, लेकिन किशोर या युवा कवियों के लिए, कविता की रचना-प्रक्रिया पर ही नहीं कविजीवन की रचना-प्रक्रिया पर भी कुछ बताना चाहिए। बताना चाहिए कि कवि भी भ्रष्ट और गंदा हो सकता, ऐसा होने से बचने के तरीके क्या हैं, ऐसे गंदे लोगों को कविता का प्रवक्ता या प्रशिक्षक बनने से कैसे रोकें, जिसे साहित्य अकादमी मिल गयी वह कविता का मान्य प्रशिक्षक कैसे बन गया ? जिसने जीवन भर इंजीनियरी करके खूब धंधा किया, करोड़ों कमाए और सड़के और भवन सब खराब बनाया, वह अच्छी कविता कैसे सिखएगा, जो अस्सी साल के बाद बच्चों का पुरस्कार पाने के लिए मचलेगा, वह अच्छी कविता कैसे बताएगा ? वह कैसे बताएगा कि अच्छी कविता के लिए एक कवि को नौ महीने तक प्रसव के लिए की गयी प्रतीक्षा की तरह घैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करना पड़ता है। वह कैसे बताएगा कि आलोचना के लिए ही नहीं, कविता के लिए भी ईमान, धीरज और साहस की जरूरत होती है ?
      सच तो यह कि आज सृजनात्मकता के विकास के लिए ऐसी कार्यशलाओं की जरूरत है, जो बच्चों और युवाओं में कविता या रचना की किसी भी विधा के चरित्र और स्वभाव को ही नहीं, लेखक के चरित्र और स्वभाव से भी परिचित कराएँ। बताएँ कि बच्चों जब तुम्हारे माता पिता ने तम्हें जन्म देते समय किसी पुरस्कार की कामना नहीं की, बल्कि माना कि तुम्हारा आना ही उनके जीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार है तो ये गंदे कवि अपनी कविता के लिए पुरस्कारकामना में मरे क्यों जाते हैं ? बताएँ कि अच्छा कवि अपनी कविता को ही कविजीवन का सच्चा पुरस्कार मानता है। पुरस्कार में सिर्फ एक कलम क्यों नहीं ? सिर्फ एक फूल क्यों नहीं ? सिर्फ पाठक का प्यार क्यों नहीं ?

(श्री महेश पुनेठा के बच्चों की कार्यशाला और पत्रिका के बहाने)







1 टिप्पणी:

  1. बहुत अच्छा लगा यह पढ़ते हुए और इस बात की कल्पना करते हुए कि कितना बाँवला महसूस करूँगा मैं खुद को आपकी कक्षा में इस आनन्द की अनुभूति करते हुए

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