रविवार, 24 मार्च 2013

चाँद और चींटी

-गणेश पाण्डेय 

      शायद, यह एक शहर के उस अकेले लेखक की बेवकूफी है कि वह मुक्तिबोध को बेवकूफ नहीं समझता है। इस शहर के और बाहर के भी कुछ समझदार लोगों को लगता है कि वह अपने महाखराब साहित्यिक जीवन में निरंतर एक बड़ी नासमझी कर रहा है। महानासमझी यह कि दूर के ही नहीं बल्कि अपने बिल्कुल पास के चाँद को भी प्रेमियों की तरह या भक्तों की तरह पूजाभाव से नहीं देखता है। चाँद की नाक चपटी करके या थोड़ी-सी उठाकर, कान को फूँक मारकर या उमेठ कर और जुल्फें घुमाफिरा कर देखना पसंद करता है। दिग्गजों की नाक से पोटा तो कान से खूँट और जुल्फों से जुएँ निकालने की हिमाकत करता है। हालाकि वह कसम खाकर कहता है कि मैं ऐसा कुछ अव्वल तो करता नहीं हूँ और अगर मेरी जानकारी के बिना ऐसा कुछ हो गया हो तो इसमें मेरी कोई दुर्भावना नहीं है। फिर अपने आप नींद में उससे ऐसा कुछ कैसे हो जाएगा ? जरूर कोई बात होगी। कहता है कि मुक्तिबोध होते तो पूछने के लिए उनके पास जरूर जाता। आखिर मुक्तिबोध ने ही तो पहले चाँद के मुँह को टेढ़ा कहा था। क्यों कहा था ? क्या उसकी तरह वे भी बेवकूफ थे ? अच्छे-भले प्रेम के सम्राट को महानायक के सिंहासन से कान पकड़ कर नीचे उतार दिया और दुनिया के सबसे बड़े खलनायक पूँजीवाद के स्टूल पर बैठा दिया कि लो देख लो अपने चाँद की अस्ल सूरत...। बहरहाल मुक्तिबोध, मुक्तिबोध थे, इसलिए हिंदी के नये समझदारों ने उन्हें डाँटा-फटकारा नहीं। कहा तो सीधे उस अपने शहर के अकेले लेखक के बारे में भी नहीं। बहुत डर कर, बहुत दूर से इशारे में कुछ कहा। मोटर साइकिल पर बैठ कर जैसे कुछ लोग थूकते चलते हैं और किसी पर कुछ फुहारें पड़ जाती हैं। बाँह पर, मुँह पर या पीठ पर, कहीं भी। 
        इधर हिंदी साहित्य में नये किस्म के लठैतों का प्रादुर्भाव हुआ है। ये अपने जमींदार के पैरों में बैठकर  वहीं से जिस-तिस के मुँह पर थूकने का काम करते हैं। ताकि जमींदार अपने सामने उन्हें दुश्मनों के मुँह पर थूकते हुए देख ले। असल में इनकी जुबान पर विद्या का नहीं, थूक का वास होता है। ये बहादुर, लठैत तो होते हैं, वीर नहीं होते हैं। वीर मूल्य से जुड़ा होता है, लठैत स्वार्थ से। हिंदी के लठैतों का स्वार्थ साहित्य की अकादमियों के कार्यक्रमों में आने-जाने से लेकर बड़े पुरस्कार ही नहीं ,मुहल्ला स्तर के चिरकुट पुरस्कारों और चर्चा इत्यादि से भी जुड़ा होता है। इसलिए ये हर उस आदमी पर थूकने की कोशिश करते हैं जो इनकी तरह लठैत नहीं होता है, वीर होता है। बहरहाल किसी शहर का हिंदी का अकेला गरीब लेखक भला चाँद पर थूकने की हिमाकत कैसे कर सकता ? हाँ, इतना अपराध तो जरूर है कि अपनी आँखों को चाँद में दाग देखने से मना नहीं करता। असल में उसे कोई पुरस्कार के पीछे थोड़े भागना है कि अपनी हिंदी की आँखें फोड़ ले। चाहे पुरस्कार प्रदाता के चरणों में लाठी की अदृश्य नोंक से अपने राजीवनयन निकालकर अर्पित कर दे। असल में जो छुटभैये चाहे दिग्गज लेखक किसी गिरोह में शामल होते हैं, ये लोग हिंदी के बेटे कहाँ होते हैं ? पुरस्कार के बेटे होते है चाहे कार्यक्रम के बेटे होते हैं ? ये समझते हैं कि वीर-झटीर चाहे जितना कूँद-फाँद लें अन्त में पुरस्कार प्रदाताओं चाहे प्रमोटरों के आगे उन्हीं की तरह नतमस्तक होंगे। जो उनकी तरह नहीं हैं, बुद्धू हैं कि समझदार का मतलब समझदार समझते हैं। इन लठैतों ने समझदार शब्द का अर्थ परिवर्तन और संकुचन अपने हिसाब से कर लिया है। समझदार अर्थात दुनियादार। आप ही बताएँ कि आज तक किसी कोश में समझदार का मतलब दुनियादार लिखा है ? पर इनके पास अपना कोश होता है। हिंदी के ये लठैत मानते हैं कि वह व्यक्ति कभी अच्छा या सच्चा या तनिक भी बड़ा नहीं हो सकता है, जो अकेला होगा, किसी का लठैत नहीं होगा या कई जमींदारों का एक साथ लठैत नहीं होगा, जो किसी गिरोह में नहीं होगा, जो किसी को अपना गॉडफादर नहीं बनाएगा। इनकी दृष्टि में वह तो कतई कुछ भी नहीं हो सकता है, साहित्य के बाड़े में भी नहीं घुस सकता है जो गॉडफादर ही नहीं पादड़ी वाला फादर तक किसी को नहीं मानेगा। ये लठैत मानते हैं कि सच्चा या अच्छा या वीर या महान वही होगा जो अपने पड़ोसियों से अच्छे संबंध रखेगा, जिन लोगों के साथ काम करता है, वहाँ सबसे अच्छे संबंध रखेगा। अच्छे संबंध का मतलब इनके लिए यह है कि किसी का विरोध मत कीजिए, असहमति मत व्यक्त कीजिए, किसी को भूल कर भी नाराज मत कीजिए। इनका मानना है कि जो भी मुहल्ले में है अच्छा है। खराब कोई मुहल्लों में रहता ही नहीं है। ये इतने समझदार हैं कि इस बात को मानते ही नहीं कि पड़ोसी भी ईर्ष्यालु, द्वेषी, कई तरह से बुरे हो सकते हैं। छलिया हो सकते हैं। सहकर्मी भी छलिया , ईर्ष्यालु और द्वेषी हो सकते हैं। ये हिंदी के नये लठैत मानते हैं कि एक नहीं हजार रावण पड़ोस में बस जाए तो भी समुद्र की महिमा नहीं घटेगी या हिंदी की दुनिया में रावण होते ही नहीं हैं। अकेला रहने वाला लेखक लाख कहता रहे कि ये देखो हिंदी की लंका...ये सुनो रावण के जूते से निकलने वाली दर्पघ्वनि...ये मचमच की आवाज...। असल मे ये हैं तो लठैत भी नहीं। बने फिरते हैं। चूहा भी नहीं। हैं तो बस कीट-पतंग। साहित्य के कँटीले पथ के राही नहीं है। राजपथ पर चलना चाहते हैं, पैर नहीं हैं तो बैसाखी के सहारे, बैसाखी नहीं है तो गोद में बैठ कर या कंधे पर चढ़ कर। ये सीढ़ी के बिना एक भी मंजिल पर नहीं पहुँच सकते हैं। ये साहित्य के अपने छत्तीस करोड़ देवी-देवताओं की ही नहीं, उनके भी असंख्य सेवकों को प्रसन्न करके साहित्य के शिखर पर पहुँचना चाहते हैं। असल में ये साहित्य में कई तल की चापलूसी में थ्रू प्रापर चैनल जाना चाहते हैं, सबके आगे मत्था टेकते हुए। अकेला लेखक कहता है कि वह अपराधी है तो है। वह लंबे समय से अपने समय के स्थानीय और बाहर के, हर जगह के दिग्गजों को खुश करने के लिए उनके दरबार के अनेक स्तर के घुरहुआओं और निरहुआओं को खुश करने से इंकार करता है तो पूरी ताकत से इंकार करता है। कहता है कि लठैतों तुमने साहित्य के कितने पिलिपिले जमींदारों की लठैती से इंकार किया है ? तुम्हारा तो साहित्य की दुनिया में सीधा-पानी सब जमींदारों की कृपा से चलता है। पुरस्कार का दो कौड़ी का मुकुट लेकर जाओं बच्चों की पिपिहरी की तरह घूम-घूम कर बजाओ। फुलरे की तरह दिखाओ। जाओ, ले जाओ साहित्य का यह राजपाट। मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं कुछ नहीं हूँ। कुछ होना भी नहीं चाहता हूँ। राजा, हाथी, घोड़ा, गधा, कुछ भी नहीं हूँ मैं। मैं खुश हूँ कि मेैं हिंदी की एक मतवाली चींटी हूँ-

मैं चींटी हिंदी की मतवाली

मेरा क्या
मैं हिंदी की चींटी
चले गये सब हिंदीपति
योद्धा बड़े-बड़े
कुछ अप्रिय कुछ मीठा लेकर

उस पथ पर
मैं चींटी हिंदी की मतवाली

क्यों छेड़े कोई मुझको
कोई हाथी कोई घोड़ा
चाहे कोई और।

( दूसरा संग्रह ‘जल में’ से)
  
         मित्रो, अच्छी बात यह कि सारे लेखक या लेखकनुमा लोग लंठई और लठैती में मगन नहीं हैं। कुछ हैं जो जीवन में संघर्ष कर रहे हैं। साहित्य में आत्मसंघर्ष के दौर से गुजर रहे हैं। अभी कल एक लेखक ने एफबी पर, एक मकान के पास से गुजरते हुए लिखा कि ‘‘अपने ही शहर के इस इलाके में आते ही मैं बहुत भावुक हो जाता हूँ। यादें मुझे 30 बरस पीछे लिये जाती हैं तो एक अजीब सिहरन-सी दौड़ जाती है.......यही है एक घर, जिसमें कभी दूसरी मंजिल का निर्माण कार्य चल रहा था.........उन दिनों बोर्ड की फीस जमा कराने के भी पैसे नहीं थे घर में.......मैं रिश्ते के एक चाचा के साथ इस मकान पर मजदूर की तरह काम करने के लिए आया था...........फीस के लायक पैसे होते ही मैंने काम छोड दिया..........मकान मालिक एक सरकारी अफसर थे ..... उनके आग्रह के बाद मैंने कहा कि मुझे बस इतने ही पैसे चाहिए थे....वे साहब कुछ नहीं बोले, बस इतना ही कहा कि तुम्हारे जैसा लड़का नहीं देखा......फिर उन्होंने ईश्वर का नाम लेंकर शुभकामनाएँ दीं.....’’ दूसरे लेखक ने जब लिखा कि नम आँखों से उस मकान को देखना और छूना चाहता हूँ तो फिर पहले लेखक ने लिखा ‘‘ पिछले दिनों संयोग से लगातार उधर तीन-चार बार जाना हुआ, लेकिन मेरी खुद की हिम्मत नहीं हो रही, उस मकान के सामने जाने की....अभी भी, ये पंक्तियाँ लिखने के बाद मन इस कदर विह्वल है कि मेरी आँखें भर आई हैं......कई बार सोचा कि पोस्ट ही हटा दूँ...... लेकिन फिर भगत सिंह याद आये...... सातवीं कक्षा से ही वही मेरे प्रेरक रहे........कल सुबह उधर से गुजरा था और आज भगत सिंह की याद ने फिर मजबूर कर दिया......’’ इस पर फिर दूसरे लेखक ने लिखा ‘‘ फिर लिखा कि ‘ अपना रास्ता खुद बनाने वाले ही साहित्य में स्वाभिमान और आत्मसंघर्ष की इबारत लिखते हैं। उनमें ही थोड़ी-बहुत आग होती है। आप, मैं बौर कई ऐसे हैं, जिन्होंने अपना रास्ता खुद बनाया है। ’’ जैसे जीवन में कुछ अच्छे लोग भी होते हैं, उसी तरह साहित्य की दुनिया में भी कुछ अच्छे लोग होते हैं। ये अच्छे लोग सच के साथ होते हैं। ये अच्छे लोग हिंदी के साथ होते हैं, किसी कुर्सी और किसी अकादमी के आगे-पीछे नहीं होते हैं। ये अच्छे लोग ढ़िलपुक नहीं होते हैं। ये अच्छे लोग साहित्य का सच फटकार कर कहते हैं। ये अच्छे लोग निडर होते हैं, साहित्य की तोपों और तमंचों से डरते नहीं। साहित्य के लंठों और लठैतों को साहित्य का मच्छर समझते हैं। इनके पास चाहे इनके पीछे अपने समय की साहित्य की तोपोें और तमंचों की ताकत नहीं होती है। आत्मसंघर्ष की ताकत होती है। यह आत्मसंघर्ष ही उसे एक लेखक के जीवन और लेखन की मुश्किलों और व्याधियों से बचाता है। यह आत्मसंघर्ष ही उसे साहित्य में असली या नकली किसी भी केदार या किसी भी फलाना-ढ़माका का नकलची नहीं बनने देता। अपना रास्ता खुद बनाने की ताकत देता है। मित्रो जिस लेखक के पास आत्मसंघर्ष सिरे से गायब होता है, जो बाऊ साहब या पंडिज्जी के डिठौने से या उनकी गोद में या उनके कंधे पर बैठ कर साहित्य का सफर तय करता है, उसके पैर रचयिता के दृढ़ पैर नहीं होते हैं, साहित्य के किसी चोट्टे के पैर हों तो कह नहीं सकता। रचयिता के दृढ़ पैर शायद ये  हैं-
‘‘मैं भी जा सकता था वहाँ-वहाँ
जहाँ-जहाँ जाता था वह अक्सर धड़ल्ले से
ये तो मेरे पैर थेे जो मेरे साथ तो थे 
पर किसी के गुलाम न थे।’’
( दूसरा संग्रह ‘जल में’ से)
      
        अंत में निवेदन यह कि जो लेखक या लेखकनुमा लोग साहित्य में लंठ और लठैत की भूमिका में हैं, कृपया अपने बाड़े में रहें और इस जीवन का सारा सुख भोगें। दूसरे तरह के लेखकों को साहित्य के नये चाँद के बारे में न बताएँ। क्योंकि नये चाँद के जन्नत की हकीकत हम नजदीक से जानते है।

                                       





1 टिप्पणी:

  1. लंठों, लठैतों और ज़मींदारों का रूपक बड़ा प्रभावी है. इनके कुकृत्यों को रोज़-रोज़ देखने-झेलने को हम सब अभिशप्त हैं, ऐसा लगता है कितनी ही बार. बहरहाल...

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