शनिवार, 17 मार्च 2012

आलोचना की दास परंपरा

                                           
               - गणेश पाण्डेय
बात कहीं से भी शुरू की जा सकती है। छायावाद से भी कि छायावाद आधुनिक हिंदी कविता की सबसे ऊँची मंजिल है। लेकिन जरूरी नहीं कि इस बात से या किसी बात से सब सहमत हो। क्योंकि यह एक ऐसा समय है जब हिंदी के अनेक स्वनामधन्य आचार्य अपने काव्य विवेक से अधिक अपने समय के नामी-गिरामी आलोचकों के काव्यविवेक या किसी अन्य आग्रह पर अधिक भरोसा करते हैं। भरोसा ही नही बाकायदा उनकी पूजा करते हैं। हो सकता है कि ऐसे काव्यालोचक कहें कि प्रगतिवाद सबसे उंची मंजिल है। पर मेरे देखने में अच्छाइयों के बावजूद प्रगतिवाद आधुनिक कविता की सबसे ऊँची मंजिल नहीं है। मैं ही नहीं और भी कई लोग ऐसा ही अनुभव करते हैं। पर हो सकता है कि ग्लोकोमा की वजह से मैं इससे अधिक देख न पा रहा होऊँ। असल में हिंदी साहित्य में यह भ्रम जोरों पर है कि सूरदास तो सिर्फ कविता में होते हैं और वह भी आज के जमाने में सिर्फ लच्छीपुर खास में होते हैं, आलोचना में हरगिज-हरगिज नहीं होते हैं। जबकि मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि हिंदी साहित्य के मौजूदा परिदृश्य पर आलोचना में सूरदासों की भरमार है। सूरदास ही नहीं बल्कि इनमें गजब-गजब के दास होते हैं। कोई अपने समय की आलोचना के शिखर पुरुष के श्रीचरणों के परम आनंद में डूबा हुआ डूबादास होता है तो कोई अपने बाहुबल और साहित्य के छलबल से विश्वभ्रमण पर निकला संसारी दास। कोई नया-नया दासानुदास। कोई एक नहीं। अनेक दासानुदास। बाकायदा आलोचना की सुदीर्घ दास परंपरा मौजूद है। ये कब कहां कैसे क्या करते हैं, यह सब बताने की बात नहीं है। बस इतना समझ लीजिए कि ये किसी नयी बात से या किसी बात को नयी तरह से देखने से डायबिटीज के मरीजों की तरह सख्त परहेज करते हैं। ऐसे आलोचक या आचार्य कविता की विकास यात्रा को किस दृष्टि से देखते हैं, यह दुर्भाग्यवश किसी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं हो सकता है। आधुनिक हिंदी कविता के पाठ्यक्रम में छायावाद ही नहीं छायावादोŸार कविता का भी विशिष्ट स्थान है। लेकिन जैसा कि कहा गया कि छायावाद आधुनिक कविता का शिखर है, तो इसके पुष्ट आधार हैं। छायावादी कविता द्विवेदीयुग की कविता की तरह टेढ़ामेढ़ा लड्डू नहीं है। बल्कि संुदर, स्वादिष्ट और सुपाच्य, कविता का नायाब प्रसाद है। कविता की उर्वर और श्रेष्ठ कल्पना का असीम आकाश ही नहीं है बल्कि अनुभव का अद्वितीय लोक है। कवि अपने पूरे वुजूद के साथ कविता का सहचर और भोक्ता है। एक ऐसी काव्यभूमि है जहां प्रकृति सिर्फ नई ही नहीं होती है बल्कि कुछ और भी बन जाती है, एक जीती जागती और प्रेयसि जैसी प्रिय स्त्री। छायावाद में स्त्री बिल्कुल नये रूप में सामने आती है। स्त्री की चिंता भी कहीं ज्यादा ईमानदार है। एक और राम की शक्तिपूजा में सीता की मुक्ति की चिंता है तो दूसरी ओर देवी जैसी रचना में अति साधारण और हाशिये की स्त्री के जीवन और सरोकारों की चिंता। विधवा स्त्री की भी चिंता कवि को उसी तरह विकल करती है। प्रायः कवियों ने नयी स्त्री को देखने की कोशिश की है। इन कवियों की स्त्री एक ओर देवि, सहचरि, मां है तो दूसरी ओर इष्टदेव के मंदिर की पूजा-सी विधवा और पत्थर तोड़ती मजदूरनी भी। निराला कविता को जब परिवेश की पुकार कहते हैं तो उनके सामने जाहिर है कि छायावाद की कविता होती है। आचार्य शुक्ल ने छायावाद को जब चित्रभाषा शैली कहने  साथ-साथ उसे बाहर से आया बतलाया तो उनके इस आग्रह को स्वीकार करने में जिन कारणों से दिक्कत हुई, स्पष्ट है। रहस्यवाद छायावादी कविता का एक छोटा-सा अंश है पूरा छायावाद नहीं। इस तरह का रहस्यवादी छायावाद पहले रवींद्रनाथ की कविताओं में फिर वहां से हिंदी में आया, इसे भी स्वीकार करने में मुश्किल हुई। यदि इसे ही छायावाद मान लेंगे तो फिर स्वाधीनता संधर्ष जैसे साहित्य के वृहत्तर उद्देश्य का क्या होगा ? क्या उससे बड़ा कविता का सरोकर कहा जायेगा - बीसवीं सदी और अब नयी सदी में - छायावाद का रहस्यवादी सरोकार ? यह ठीक है कि छायावादी कविता का पाट जिन दो छोरों से बनता है, उसमें एक ओर विराट का साक्षात्कार है तो दूसरी ओर लघुता के प्रति दृष्टिपात ही नहीं बल्कि उनके और विशेषरूप से देश के लिए संघर्ष चेतना की प्रतिष्ठा है। कविता का शाश्वत परिसर तो है ही। जाहिर है कि कविता की सलिला जिन दो पाटों के बीच बहती है उनमें एक है प्रकृति और दूसरा है अपने समय के समाज का परिदृश्य। छायावाद में प्रकृति पहलीबार जीती-जागती और किसी सुंदर और सौम्य स्त्री की तरह बहुत नयी-नयी और बेहद आत्मीय और अंतरंग लगती है। आगे कुछ कवियों के यहां तो अल्हड़ और नितांत अपनी लगती है। कविता में निजता का तत्व कविता का विरोधी नहीं है। बल्कि कविता को और विश्वसनीय और तरल बनाने वाला तत्व है। यह तरलता ही कविता को पठनीयता और सम्प्रेषणीयता जैसे आलोचनात्मक प्रश्नों से मुक्त करती है। वैयक्तिकता और सामाजिकता के प्रश्न छायावादी कविता को अशक्त नहीं करते हैं, बल्कि ताकत देते हैं। निराला लिखते है- ‘मैंने मैं शैली अपनायी’ और दूसरी ओर कहते हैं कि ‘कविता परिवेश की पुकार है’। जाहिर है कि परिवेश केवल प्रकृति का आंगन नहीं है। उसके भीतर आसपास का सब शामिल है। आसपास का ही नहीं, बल्कि हमारी चेतना के भीतर जो कुछ भी अंट सकता है, सब शामिल है। क्या समाज और क्या देश। क्या यहां और क्या वहां। क्या इस पार और क्या उस पार। छायावादी कविता की श्रेष्ठता का आधार उसके कवियों का महत्वपूर्ण अवदान है। कोई भी काव्यांदोलन, काव्यांदोलन ही नहीं बल्कि कोई भी साहित्यिक आंदोलन अपने आग्रहों और अपनी वैचारिकी से महत्वपूर्ण नहीं होता है, बल्कि उसे उससे जुड़े लेखकों के कद और योगदान के आधार पर याद किया जाता है। कभी-कभी बिना किसी घोषित काव्यांदोलन के एक कालखण्ड विशेष के भीतर के लेखकों में आप से आप अपने समय और परिवेश की पुकार के आधार पर मिलती-जुलती काव्य प्रवृत्तियां दिखने लगती हैं। सच बात तो यह कि कोई सजग कवि जब कविता रच रहा होता है तो उस समय वह पुलिस की परेड नहीं कर रहा होता है। उसकी अपनी काव्यदृष्टि बहुत-सी चीजों को तय करती है। उदाहरण के लिए कह सकते हैं कि इसीलिए हिंदी के सारे मार्क्सवादी कवि मुक्तिबोध से छोटे हैं। छोटा या बड़ा होना किसी सीमित अर्थ में लेने से कभी-कभी अनर्थ भी हो जाता है। छायावादी कविता के बड़े होने के अपने पुष्ट अकाट्य आधार हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि बाद की कविता अवांछित या महत्वहीन है। छायावादोŸार कविता एक अर्थ में छायावादी कविता का ही विकास है। द्विवेदीयुग की कविता की प्रतिक्रिया में छायावाद के लिए स्थूल के विरुद्ध सूक्ष्म का स्वागत जैसा सूक्ष्म के विरुद्ध स्थूल जैसी कोई चीज नहीं। न तो उसकी भयंकर प्रतिक्रिया में अलग से कविता की दृष्टि से कोई क्रांतिकारी चीज है। इंकिलाब है तो कथ्य के स्तर पर पहले के जन सरोकारों के स्वर की तीव्रता तक सीमित है। हिंदी के प्रिय विद्यार्थियों और भविष्य के कर्णधारों से विनती है कि वे छायावादोŸार कविता को आधुनिक हिंदी कविता के विकासक्रम में अगले और एक छोटे पड़ाव लेकिन महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखने की कृपा करें। इसे एक ऐसे पड़ाव के रूप में लें कि जहाँ कविता के पाठकों को गला तर करने के लिए एक छोटा-सा कुआँ है, एक छोटी-सी रस्सी है और एक छोटा-सा घड़ा है। थोड़ी-सी मौज है थोड़ी-सी मस्ती है। प्यास का थोड़ा-सा दीवानापन है। यों तो एक अध्यापक रूप मेे अपने विद्यार्थियों से कहना हो तो कहेंगे कि छायावाद के बाद हिंदी कविता मोटेतौर पर जिन दो रास्तों पर आगे बढ़ती है, उनमें पहला रास्ता प्रगतिवाद कहलाता है जिसे कुछ लोग अज्ञानवश बंद गली का आखिरी मकान भी कहते हैं। दूसरा रास्ता प्रयोगवाद कहलाता है जिसे वही कुछ लोग बंद गली के आखिरी मकान के बगल से दाहिने निकला हुआ रास्ता कहते हैं। वे यह भी कहते हैं कि जब प्रगतिवाद में कविता के तत्वों की बहुत अनदेखी होने लगी तो कुछ कवियों ने कविता के पक्ष में और एक अर्थ में कुछ कवियों ने जनता के पक्ष में खड़ी होने वाली कविता के पक्ष में खड़े होने की कोशिश की। पर आगे बढ़ने से पहले छायावादोŸार या उŸार छायावाद जैसी छतरी के नीचे मौजूद कुछ ताकतवर कवियों की कविता पर भी गौर करना जरूरी होगा। ये सीधे और उन अर्थों में प्रगतिवादी तो नहीं कहलाये पर जिनकी रचनाओं में जनपक्षधरता के स्वर मौजूद हैं। लेकिन ऐसे भी कवि हैं जो समाज के वृहŸार दुख को दूर करने या सामाजिक सौहार्द के शर्तिया इलाज के लिए मयखाने में बैठना ज्यादा जरूरी समझते हैं। आधुनिकता की वैचाारिकी से इस मयखाने का रिश्ता या मय की ताजपोशी समझना औरों के लिए भले ही मुश्किल चीज हो पर हिंदी आलोचकों के लिए अतिसरल है। मधु तो छायावाद में भी है पर शाला का निर्माण तो छायावादोŸार या कहें कि छायावाद से थोड़ा आगे और प्रगतिवाद से थोड़ा पहले के मील के पत्थर के पास जन अरण्य में ही संभव होता है। निराला की कविताओं में सामान्यजन की प्रतिष्ठा और उनके पक्ष में डटकर खड़े होने का जैसा जज्बा मौजूद है, बाद की कविताओं में संधर्ष के दृश्य उनसे अलग नहीं बल्कि उनके स्वर के आलाप हैं। आशय यह नहीं कि छायावादोŸार कवियों का उपक्रम कहीं से कम है या नगण्य है। कहना चाहिए कि नगण्य और वंचितों की चिंता का स्वर उनके यहाँ तीव्र है। प्रगतिवाद के कवियों में कथ्य की सबलता और स्वर की तीव्रता ने जाहिर है कि कविता के तत्वों की अनदेखी की तो कविता के तत्वों की मजबूती के लिए प्रयोगवाद से जुड़े कवियों को आगे आना पड़ा। उनमें भी अज्ञेय तो जैसे आगे की कविता का सारा कील-कांटा जानते थे सो उन्हें सबसे आगे रहने के लिए प्रयोगवाद एक अवसर था। हालाकि वे वादी कहलाने के पक्ष में नहीं थे। पर जिन्हें उन्हें वादी कहना था, उन्होंने वादी कहा। तार सप्तक का प्रकाशन सचमुच गौरतलब है। सप्तक के कवियों के बारे में दिलचस्प यह कि ये कवि विचारधारा के स्तर पर एक नहीं थे। उनमें फर्क था। दूसरी बात यह कि ये कवि युवा थे पर कविदृष्टि वयस्क थी। तीसरी बात यह कि इस संकलन में शामिल कवियों की कविताएं, उन कवियों की सर्वोत्तम कविताएं नहीं थीं। सर्वोत्तम क्या प्रतिनिधि कविताएं भी नहीं थीं। इसके बावजूद संकलन के कवियों और उनकी कविताओं ने नई राह के अन्वेषण को संभव किया। यही इस संकलन का शायद उद्देश्य भी था। तार सप्तक के बाद दूसरा सप्तक फिर तीसरा सप्तक आया। सप्तकों ने और जो भी किया हो, कविता को नई कविता का एक खुला आसमान दिया। कहने को तो अज्ञेय चौथा सप्तक भी लेकर आये पर वह चौथा ही बनकर रह गया। सात तो दूर एक भी तार ठीक से बज नहीं पाया। जबकि तीसरे सप्तक तक के कवियों में कई कवि ऐसे हुए जिन्हांेने अपने समय की कविता को तो प्रभावित किया ही है बाद की कविता को भी प्रभावित किया है। कविता की यात्रा हो या साहित्य की किसी भी विधा की विकास यात्रा,  कम प्रतिभा के ऐसे कवियों की भरमार रहती है जो किसी भी तरह उछल-कूद करके अमर हो जाने के लिए विकल रहते हैं। आलोचक या संपादक को खुश करने के लिए कुछ भी करने को तो तैयार रहते ही हैं, कविता या रचना की हत्या करने तक के काम को करने में तनिक भी दुखी नहीं होते। कविता मरती है तो मर जायें, बस ये अमर हो जायें। कविता की सुफरफास्ट रेलगाड़ी के दरवाजे पर हैंडिल को कस कर पकड़कर या बिना टिकट बर्थ पर लेटकर सफर करने वाले ऐसे कातिलों को आज भी देखा जा सकता है। साहित्य में कई आंदोलन ऐसे मीडियाकर अमर होने की आकांक्षा में चलाते हैं। कई संपादक अपनी पत्रिका या खुद को संपादक के रूप में स्थापित करने के लिए भी ऐसे प्रायोजित आंदोलन खड़ा करते रहते हैं। पर बिना अच्छी रचना के कोई भी आंदोलन जीवित नहीं रहता है। कईबार अपने समय की कविता या कवियों को चर्चित करने या अंधेरे में रखने में प्रतिष्ठित आलोचक भी कम बेईमानी या कम बड़ी चूक नहीं करते हैं। कुछ वक्त पहले एक नामचीन आलोचक ने  एक इंटरव्यू में कहा था कि फणीश्वरनाथ रेणु के महत्व को समझने में देर हुई। शायद यह आधा सच है। यह सच है कि उन्होंने रेणु के महत्व को देर से स्वीकार किया। पर यह सच नहीं लगता कि हमारे समय का कोई नामचीन आलोचक रेणु जैसे लेखक के महत्व को देर से समझ पायेगा। यह सिर्फ एक उदाहरण है। हिंदी आलोचना में आज कई ऐसे आलोचक हैं जो अपने समय की कविता और आलोचना को इसी तरह कलंकित करते हैं। दुर्भाग्य यह कि हमारे समय की युवा आलोचना कभी अपने पैरों पर खड़ी ही नहीं हुई। लेकिन सौभाग्य से हिंदी कविता की निर्मल आत्मा कभी भी ऐसी कुचेष्टाओं से मलिन हुई ही नहीं। शुरू में ही ंिहदी कविता की नींव इतनी मजबूत बनी कि कोई आलोचक या दंद-फंद में लगा हुआ कवि  अपनी दबंगई या बुरी नजर से उसे हिलाना तो दूर, छू भी नहीं सकता है। कविता की आत्मा के पास पहुंचते ही अपात्र सूर्य जैसे ताप में राख हो जाता है। लेकिन कई बार एक पूरा का पूरा दौर ही आंख पर पट्टी बांध लेता है। किसी महाजन की जगह किसी महादुर्जन के फतवे को ही अपने समय का सत्य समझ लेता है। पर जब समय का सारा पानी बह जाता है तो रेत की तरह सच सामने होता है। अपने समय के सब चर्चित भुला दिये गये होते हैं। याद रहते हैं वे जिनकी कविताओं में कुछ होता है। कभी-कभी कुछ वाले भी अपने समय में अपनी हैसियत से अधिक पा जाते हैं।
नई कविता और नई कहानी दोनों आधुनिक काल का महत्वपूर्ण पड़ाव है। कविता में नई कविता के बाद कुछ पानी के बुलबुले जैसे काव्यांदोलन भी आते हैं। पर कविता के एक समृद्ध और मजबूत देश में अकविता के लिए कितनी गुंजाइश हो सकती है। सो आये और गये की तरह कविता और कहानी में ऐसे आंदोलन कहने के लिए आये और चले गये। साठ के बाद कविता के मिजाज में जो परिवर्तन दिखता है, वह अचानक और किसी एक कवि के प्रादुर्भाव से नहीं होता है। यह सोचना नासमझी होगी कि एक धूमिल के आने से साठ के बाद की कविता चमकी। वह एक ऐसा कालखण्ड था जब देश की परिस्थितियों में काफी कुछ नाउम्मीदी और विकलता और विश्वास का संकट युवा लेखकों को मथ रहा था। बाहर और भीतर काफी कुछ टूट रहा था। नई कविता के कई कवियों में अपने समय के दंश और उसकी तीव्रता का अनुभव मौजूद है। जहां तक राजनीतिक कविता का प्रश्न है, यह कहने में संकोच नहीं कि मुक्तिबोध के बाद रधुवीर सहाय ध्यान खींचते हैं। साठोत्तरी कविता में जिसे मोहभंग की कविता भी कहा गया, राजनीति और खासतौर से लोकतंत्र और समाजवाद को लेकर कविता में बहुत बोलने वाली मुहावरेबाज कविता का एक दौर आता है। जिसमें कविता की भाषा को धरना-प्रदर्शन में चीखने वाली भाषा में बदलने की छटपटाहट दिखती है। धूमिल के लिए एक नामचीन आलोचक इतने व्यग्र होते हैं, शायद उतना कभी अपने बच्चों के लिए भी विकल नहीं हुए होंगे। धूमिल एक प्रतिभाशाली कवि हैं। इसमें कुछ खास बुरा नहीं है किसी पत्रिका में उन्हें किस तरह और उनकी कविता को कैसे करके छापा गया होगा। संपादक एक अभिभावक की तरह होता है। नये रचनाकार को अपने बच्चे की तरह सजाता और संवारता है। लेकिन किसी संपादक या  आलोचक को दूसरे बच्चे दिखें ही नहीं, यह बुरा है। साठोत्तरी कविता में धूमिल के अलावा लीलाधर जगूड़ी और देवेंद्र कुमार जैसे कवि भी शामिल हैं। पटना के युवा लेखक सम्मेलन में धूमिल ने जिस देवेंद्र कुमार की काव्य भाषा को अपनी काव्यभाषा से बेहतर बताया था, दुर्भाग्य यह कि हम पूर्वांचल में धूमिल को तो पढ़ाते हैं पर देवेंद्र कुमार की कविता को नहीं। ऐसा क्यों ? क्या इसलिए कि देवेंद्र कुमार न तो श्रीवास्तव थे न तिवारी ? या कि तिवारियों और श्रीवास्तवों की कविता से पहले किसी अन्य जाति में जन्म लेने वाले कवि की कविता पूर्वांचल में पढ़ाने में कोई साहित्यिक या नैतिक बाधा है ? या विश्वविद्यालयों के आचार्य कभी अपने कूपों से बाहर निकलेंगे ही नहीं ? आखिर ये आचार्य अपने कूपों से बाहर कब निकलेंगे ? या.... जब ये आचार्य चले जायेंगे और नये आचार्य आयेंगे, जो कूपों में नहीं बल्कि कविता के खुले परिसर में बैठेंगे, तब देवेंद्र कुमार ही नहीं देवेंद्र कुमार की कविता के भी बाद के जो सच्चे सपूत होंगे, उनकी कविता पढ़ाएंगे। जब हमारा समय बीत जायेगा और हम बीत जायेंगे तो शायद कुछ और लोग आयेंगे जो आज की दरिद्र युवा आलोचना को समृद्ध, ताकतवर और भरोसेमंद बनाएंगे। तब तक शायद न नामचीन आलोचक रहेंगे और न उनका डर। आज की मुश्किल यह कि हर शहर में एक-दो नामचीन रहते हैं। जो लेखक अपने समय के नामचीनों से डर कर लिखते हैं। जाहिर है कि वे लिखते नहीं हैं, बल्कि कुछ और करते हैं। आठवें दशक की कविता और उसके बाद की कविता की अपनी मुश्किलें हैं। अच्छे कवियों को निरंतर तनाव में रहना पड़ता है। कम अच्छे कवियों को साहित्य की अनेक अकादमियाँ रेवड़ी की तरह पुरस्कार बाँटती हैं। नवें दशक की कविता हो या अंतिम दशक की कविता और या नई सदी की कविता, इस पूरे दौर की कविता को एक अदद आलोचक की दरकार है जो सच को फटकार कर कह सके और राजधानी की ओर मुंह करके फटकार सके। लेकिन फटकारेगा कौन ? फटकारेगा वह जिसके पास एक टका ही सही, उसका अपना हो। अंत में कहना चाहूंगा कि फटकारने वाले आलोचक का प्रादुर्भाव नहीं होता है तो न सही। अच्छी कविता में आत्मरक्षा का गुण अनिवार्य रूप से होता है। अच्छी कविता किसी आलोचक का मुंह नहीं देखती। एक आलोचक को ही अच्छा आलोचक बनने के लिए अच्छी कविता के पास जाना पड़ता है। मैं यह मान नहीं सकता कि तुलसीदास आचार्य शुक्ल के पास गये थे। अच्छा कवि आलोचक के पास नहीं जाता है। आचार्य शुक्ल ही तुलसीदास और सूरदास और जायसी के पास गये थे। फिर आज के कवि क्यों दौड़-दौड़ कर राजधानी जाते हैं ? हिंदी कविता की यात्रा से जो लोग परिचित हैं जानते होगे कि अच्छी कविता राजधानी से दूर रहती है। कविता अपना जासूस आप होती है। किसी भी दौर की कविता हो, छायावाद की कविता हो या छायावादोत्तर कविता या उसके बाद की कविता अपनी खूबियों और खामियों को छुपाकर रख नहीं सकती है। इसे आप कविता की देवी का वरदान कहें या शाप, पर यह है और सौ फीसदी है।

                                                                 गणेश पाण्डेय

2 टिप्‍पणियां:

  1. समकालीन आलोचना की मनोवृत्ति को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण लेख. ऐसी बेबाकी विरल है. क्या यह 'दास परंपरा' से बगावत को उकसाता नहीं है? समकालीन रचना शीलता को यह बगावत करनी ही होगी. आपने उकसाया है, यह आपके आलोचकीय विवेक और निर्भीकता का नमूना है.

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    1. आपके इस ईमान के लिए बधाई और धन्यवाद।

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