मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

इतनी अच्छी क्यों हो चंदा

- गणेश पाण्डेय                           

तुम अच्छी हो
तुम्हारी रोटी अच्छी है
तुम्हारा अचार अच्छा है
तुम्हारा प्यार अच्छा है
तुम्हारी बोली-बानी
तुम्हारा घर-संसार अच्छा है
तुम्हारी गाय अच्छी है
उसका थन अच्छा है
तुम्हारा सुग्गा अच्छा है
तुम्हारा मिट्ठू अच्छा है
ओसारे में
लालटेन जलाकर
विज्ञान पढ़ता है
यह देखकर
तुम्हें कितना अच्छा लगता है
तुम
गुड़ की चाय
अच्छा बनाती हो
बखीर और गुलगुला
सब अच्छा बनाती हो
कंडा अच्छा पाथती हो
कंडे की आग में
लिट्टी अच्छा लगाती हो
तुम्हारा हाथ अच्छा है
तुम्हारा साथ अच्छा है
कहती हैं सखियां
तुम्हारा आचार-विचार
तुम्हारी हर बात अच्छी है
यह बात कितनी अच्छी है
तुम अपने पति का
आदर करती हो
लेकिन यह बात
बिल्कुल नहीं अच्छी है
कि तुम्हारा पति
तुमसे
प्रेम नहीं करता है
तुम हो कि बस अच्छी हो
इतनी अच्छी क्यों हो चंदा
चुप क्यों रहती हो
क्यों नहीं कहती अपने पति से
तुम उसे
बहुत प्रेम करती हो।

( चौथे संग्रह ‘परिणीता’ से। )







                                                                                        
                                                                                        










4 टिप्‍पणियां:

  1. चंदा ....
    आपकी लेखनी अधिक अच्छी है या चंदा ......सोच में हूँ .....

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    1. मैं जिनके लिए कविताएँ लिखता हूँ, उन तक मेरी कविताएँ पहुँचती हैं, इससे बड़ी खुशी मेरे लिए कुछ और नहीं हो सकती। आपकी फेसबुक वाली कविता कुमाऊँनी में होने के बावजूद मुझे बहुत पसंद आयी। यह मैं आपसे पहले ही कह चुका हूँ।

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  2. सरल-सहज बानी में बहती कविता की यही अभिव्यक्ति हमें भा गई... समय की कमी ही मजबूरी हैं... क्या करें हम .... पंकज त्रिवेदी

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    1. त्रिवेदी जी! धन्यवाद। आपकी साहित्यिक व्यस्तता को पसंद करता हूँ। आप ऐसे ही हिंदी और गुजराती साहित्य की सेवा करते रहें।

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