मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

ओ केरल की उन्नत ग्रामबाला

-गणेश पाण्डेय

कहां फेंका था तुमने
अपना वह माउथआर्गन
जिस पर फिदा थीं तुम्हारी सखियां
कहां गुम हुईं सखियां किस मेले-ठेले में
किसके संग

कैसे तहाकर रख दिया होगा तुमने
अपना प्यारा-प्यारा स्लेटी स्कर्ट
किस खूंटी पर फड़फड़ा रहा होगा
वह बेचारा लाल रिबन

सब छोड़-छाड़ कर
कैसे प्रवेश किया होगा तुमने
पहलीबार
भारी-भरकम प्रभु की पोशाक के भीतर

यह क्या है तुममें
जे बज रहा है फिर भी मद्धिम-मद्धिम
कहां हैं तुम्हारी सखियां
कोई क्या करे अकेले
इस राग का

देखो तो आंखें वही हैं
जिनमें छिपा रह गया है फिर भी कुछ
जस के तस हैं काले तुम्हारे वही केश
होठों में गहरे उतर गया है नमक
कुछ भी तो नहीं छूटा है
वही हैं तुम्हारे प्रियातुर कान
किस मुंह से जाओगी प्रभु के पास

ओ केरल की उन्नत ग्रामबाला
कैसे करोगी तुम ईश का ध्यान
जब बजने लगेगा कहीं
मद्धिम-मद्धिम
माउथआर्गन।

(चौथे संग्रह ‘परिणीता’ से।)





3 टिप्‍पणियां:

  1. ओ केरल की उन्नत ग्रामबाला
    कैसे करोगी तुम ईश का ध्यान
    जब बजने लगेगा कहीं
    मद्धिम-मद्धिम
    माउथआर्गन।

    वाकई लाजवाब वर्णन करती हुई कविता.... क्या सूक्ष्म दृष्टि से कार्य किया है..

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  2. यह माउथआर्गन....बहुत गहरे तक उतर कर भावों को अभिव्यक्त किया है आपने ...!

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  3. आपकी कविताओं पर अपनी टिप्पणी तुच्छ लगती है ,
    बेहद सुन्दर ||

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