गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

एक अछूत कवि की आत्मकथा तथा अन्य कविताएं


- गणेश पाण्डेय
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एक अछूत कवि की आत्मकथा

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मैं कट्टर मार्क्सवादी नहीं हूं
मेरे लिए यह बिल्कुल बुरी बात नहीं है
मैंने ऐसे लोगों को साहित्य की सड़क पर
चलते और दौड़ते हुए नहीं 
बाकायदा रेंगते और जगह-जगह
मत्था टेकते हुए देखा है

आप 
कट्टर मार्क्सवादी हैं तो यह
आपके लिए बहुत अच्छी बात है
ईश्वर करे कि आप ऐसा बन जाएं
कि आपको देखकर मेरा भी मन
मार्क्सवादी हो जाना चाहे

मैं किसी लेखक संघ का 
सदस्य या पदाधिकारी नहीं हूं
मुझे इससे कोई परेशानी नहीं है
लिखने-पढ़ने में कोई समस्या नहीं है
ईश्वर करे कि आपका लेखक संघ 
चिरकुटों की जगह 
स्वाभिमानी लेखकों का संघ बन जाए
और मेरा मन उसमें शामिल होना चाहे

मैं किसी 
साहित्य अकादमी-फकादमी में 
न जाता हूं न जाने के लिए जान देता हूं
उससे मेरे रचना और आलोचना कर्म में
किसी भी प्रकार की न कोई रुकावट होती है 
न कोई खेद होता है
मेरे लिए वह जगह कमज़ोर लेखकों का
हवाईअड्डा है भकभकअड्डा बसअड्डा है 
शराबियों-कबाबियों नशेड़ियों का अड्डा है
जिसका प्रबंध 
हिंदी के अलेखकों के हाथ में है
सड़क छाप लोगों के हाथ में है
आप वहां जाते हैं तो शौक़ से जाएं 
अपनी कविताओं का ब्रीफकेस 
चाहे गठरी चाहे बटुआ लेकर 
कविता के स्वर्ग की यात्रा करें
आपकी यात्रा मंगलमय हो
मुझे कविता का स्वर्गीय नहीं होना है

मैं साहित्य के
किसी करोड़पति फाउंडेशन के 
चेयरमैन का न सगा हूं न उसका संगतकार हूं 
न उसका नाती-पोता वगैरह हूं
इस तरह की किसी भी 
प्राइवेट लिमिटेड संस्थाओं में
आने-जाने और प्रोग्राम करने का
इच्छुक नहीं हूं

मैं अपने शहर के किसी आयोजन में नहीं जाता हूं
वहां कोई न कोई दो कौड़ी का 
ब्राह्मण अलेखक मंच पर बैठा होता है
और लेखक ख़ुशी-ख़ुशी सामने चटाई पर 
बैठे हुए ताली बजा रहे होते हैं
ताली बजाने वाले लेखक कहां नहीं होते हैं
मैं बाहर के किसी आयोजन में भी 
नहीं जाना चाहता हूं 

मैं साहित्य का कार्यकर्ता हूं बालम नहीं
किसी भी लेखिका से मर्यादित दूरी रखता हूं
किसी भी लेखिका का अपमान नहीं करता हूं
अलबत्ता उनमें कमी देखूं तो उन्हें भी डांटता हूं
पता नहीं कहां से आ गया है 
मुझमें इतना ज़्यादा ग़ुस्सा 
जैसे हिंदी की गंद को साफ़ करने का काम
सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे ज़िम्मे हो
जैसे ही कोई बुरा दृश्य देखता हूं
नाराज़ हो जाता हूं

निराला ने अपनी कविता में
ख़ुद को ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत कहा है
मैंने भी इस शहर में 
हिंदी के ब्राह्मणोँ के समाज में 
अब तक अछूत का जीवन जिया है
मेरे ब्राह्मण गुरु ने शुरू में ही मुझे
नगरनिगम के कूड़ापात्र में फेंक दिया था
कि हिंदी के दो जर्मन शेफ़र्ड मुझे कच्चा
नोंच-नोंच कर खा जाएं
मैं निराला नहीं था फिर भी बच गया
और आज आप सबके सामने
हिंदी की इस सबसे सरल कविता में
हाथ जोड़कर खड़ा हूं
अपनी कहानी सुना रहा हूं
देखिए कितनी नम हैं
मेरी आंखें

मेरे नाम में ब्राह्मण लगा था
फिर भी इस शहर में देवेंद्र कुमार ने
मुझे अपनी गोद में उठाया प्यार दिया
वे दलित थे मैं ब्राह्मण यह कैसा रिश्ता था
वे इस शहर के 
अपने समय के सबसे अच्छे कवि थे
आज भी सबसे अच्छे कवि वे ही हैं
मैं उन्हें गोरखपुर के ब्राह्मण कवियों का
ताऊ समझता था आज भी समझता हूं
मैंने अपनी कविता में लिखा भी है :
’कोई मधुकर था यहाँ
कोई काला था, कोई दिलवाला
कोई परमानंद, कोई विश्वनाथ ।
देवेंद्र कुमार को यहीं देखा
अपनी हीर कविता के लिए राँझा बनते।’
देवेंद्र कुमार हीर कविता के राँझा थे
ख़ुद को उन्होंने कभी दलित कवि नहीं समझा
वे मनुष्य, समाज प्रकृति और देशकाल के
प्रतिनिधि कवि थे पूर्ण कवि थे 
आज भी प्रतिनिधि कवि हैं पूर्ण कवि हैं 
मैंने देवेंद्र कुमार जैसे 
कविता के संत को नहीं देखा होता 
तो परमानंद और विश्वनाथ की गति को
प्राप्त होता
कवि नहीं कविता का व्यापारी होता

मैं कविता की रसमलाई
और माखनभोग नहीं खाता हूं
नमक-रोटी खाकर
कविता की ड्यूटी बजाता हूं
बहुत ख़ुश हू़ बहुत से बहुत
कविता के ब्राह्मण समाज में
एक अछूत कवि की ड्यूटी बजाता हूं
ब्राह्मणों के सिर पर रोज़ बजाता हूं
उनके सीने पर फन काढ़कर लोटता हूं
उनके कानों में पिघले हुए शीशे की तरह
उतरती हैं मेरी कविताएं
यह सौभाग्य सबको कहां मिलता है
कविता के बाज़ार में आज अधिकांश
भाड़े के टट्टू हैं बजरबट्टू हैं।

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ईश्वर आए आए आए
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ईश्वर का 
गुणगान करने वाले आए
उसका संदेश लाने वाले आए
उसकी पूजा करने वाले आए
भव्य इबादतगाह बनाने वाले आए
उसके नाम पर हिंसा करने वाले आए
पोथियों को सिर पर लादने वाले आए
अपनी जड़ता पर गर्व करने वाले आए
उसके नाम पर राजनीति करने वाले आए
ख़ुद इनाम के कीचड़ में धंसकर
उसकी कड़ी आलोचना करने वाले 
दो दिन के मशहूर लेखक आए
ईश्वर को मानने वाले आए 
न मानने वाले आए
न मानने वाले भी मंदिर जाने वाले आए
मानने वाले मंदिर कम जाने वाले आए
ईश्वर मेरे तेरे उसके सपने में भी आए
जब-जब मुश्किल में फंसे ख़ूब याद आए
आज दुनिया कितनी मुश्किल में है
मंदिर मस्जिद चर्च गुरुद्वारे मुश्किल में हैं
सारे धर्मग्रंथ मुश्किल में हैं
देखो मेरे बच्चो
ईश्वर आए तो कोई और रूप धरकर नहीं
सफ़ेद लिबास में डाक्टर-नर्स
और ख़ाकी वर्दी में पुलिस बनकर आए
ईश्वर आए आए आए।

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कवियों के तीन तल
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भूतल पर 
वे कवि रहते हैं, 
जो कविता के राजपाट से मुक्त होते हैं
राजपाट के अंधेरे से मुक्त होते हैं
हर दासता से मुक्त होते हैं
और उन्हें इस मुक्ति का
बोध होता है

मध्यतल पर 
वे कवि रहते हैं जिन्हें ऊपर से 
कुछ न कुछ द्रव्य और आभूषण इत्यादि
समय-समय पर मिलता रहता है 
और वे नित्य ऊपर की ओर देखकर
लिखित और वाचिक गुणगान 
करते रहते हैं

आकाश तल पर 
कविता के देवता कवि रहते हैं
सुंदर, गौरवर्ण और कभी-कभार
श्यामाच्छादित काव्य रचते हैं
उन्हें कोई रोग नहीं होता है
कोई शोक नहीं होता है

उनके लिए 
पृथ्वी का बड़े से बड़ा दुख 
स्त्री की जंघा पर एक सुंदर-सा 
नन्हा-सा उभरता हुआ फोड़ा है 
किसी चांद की तरह
किसी ब्रह्मांड सुंदरी की तरह
अंतरिक्ष में पतंग उड़ाते बच्चे की तरह
आकाश की गलियों में 
साइकिल चलाती हुई लड़की की तरह
सुंदर बहुत सुंदर बहुत से बहुत सुंदर

मध्यतल के
सारे के सारे कवि 
आकाशतल की सैर करना चाहते हैं
कविता का देवता बनना चाहते हैं
कम से कम देवता का संगतकार
चाहे सहायक संगतकार
बनना ही बनना चाहते हैं

भूतल का कवि 
आकाशतल पर ज़बरदस्त
पत्थर फेंककर मारना चाहता है
मध्यतल के असंख्य कवियों की पीठ
बारबार सामने आ जाती है
ग़ुस्से में अपनी मुट्ठियां भींचता है, 
कविता की दीवार पर घूंसा मारता है 
और लहूलुहान होता है

ऊपर
आकाश तल का देवता कवि
मध्यतल के कवियों के इस गुण पर
मंद-मंद मुस्काता है 
और कुर्ते की जेब से निकालकर
जादुई बतासे बरसाता है।

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सोहन हलवा
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साहित्य का 
थोक मिष्ठान्न भंडार
राजधानी के सिवा
और कहां हो सकता है

आलोचक
सोहन हलवा बना रहा है
कवि सोहन हलवा पर
चांदी का वर्क सजा रहा है

दोनों 
सबको दोने में हलवा
परोस रहे हैं कह रहे हैं
खाइए-खाइए
कराची से अच्छा हलवा
दिल्ली का सोहन हलवा

सुंदर है
अजी स्वादिष्ट है
जो सुंदर है वही स्वादिष्ट है
जो स्वादिष्ट है वही सुंदर है
जो सुंदर और स्वादिष्ट है
वही कविता है वही आलोचना है

अचानक 
साहित्य मिष्ठान्न भंडार के सामने
एक देहाती-भुच्चड़ पागल 
लट्ठ लेकर खड़ा हो जाता है

ललकारता है-
सालो कोरोना फैला रहे हो
तुम्हारा
सोहन हलवा
कविता और आलोचना है
तो छोटे सुकुल की लट्ठ क्या है!

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कवियो
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सब 
एक जैसा तुम्हारी भाषा में
सोचें देखें बोलें सुनें यह संभव नहीं है

कवियो
अपनी कहो सबसे
लेकिन किसी पर थोपो नहीं
और हां किसी से पहेलियां न बुझाओ

उन्हें देखो जो कम कविता जानते हैं
या जानते हुए भी कविता का मुकुट
छिपाते हैं किसी ग़रीब पाठक के सामने

और
जिनसे कोई दर्द साझा करना होता है
उनके लिए कविता महारानी को
उनकी फूआ काकी आजी बनाते है
कविता में कहूं तो कविता को 
एक बात बनाने का ख़तरा
मोल लेते हैं

यह मैं हरगिज़ नहीं कहता 
कि आज उन्हें कविता का महाराज
समझने की कोई बेवकूफ़ी की जाय
अलबत्ता यह कहता हूं कविता में
दिल्ली स्कूल का तरीक़ा जनविरोधी है

यह भी कहना ज़रूरी है
आज अगर देश से कुछ कहना है
चाहे बचे-खुचे कविता के लोगों से
कुछ कहना है तो उनकी भाषा में कहो
किताब की भाषा में नहीं

कवियो
बड़ी कृपा होगी देश पर
कविता की बारीक़ियों के 
कम जानकार लोगों के लिए
उन्हीं के मुहावरे में साफ़-साफ़ कहो।

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एक वरिष्ठ नागरिक की हंसी
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कभी
रोज़ हंसी-ठट्ठा
बैठकबाज़ी और दोस्तों संग
मौज़-मस्ती करते थे

बहुत से बहुत
पहले की बात है याद है
तब हम किसी से ईर्ष्या नहीं करते थे
दोस्तों के लिए जो हो सकता था
सब करते थे

धीरे-धीरे
दोस्त अपने-अपने काम में लग गये
किसी ने साइकिल की दुकान कर ली
कोई वकील बन गया कोई मुंशी
कोई डाक्टर बन गया कोई इंजीनियर
सब कहीं गुम हो गये

किसी के पास फ़ुरसत नहीं
बीवी-बच्चे मां-बाप की देखरेख में
खो गये उनका खोना बुरा नहीं लगा
हमारी सबसे क़ीमती चीज़ खो गयी
दुख इस बात का है आज ज़्यादा है

वह निश्छल और उन्मुक्त हंसी
कहां गयी कहां गयी कहां गयी
शरीर के जिस हिस्से में
जहां रहती थी पहले हंसी बेफ़िक्री
और ख़ुशी का ख़ज़ाना
उस जगह पता नहीं कैसे इन दिनों
कोई डर रहने आ गया है

बेटा बेटियां बहू 
दामाद सब कहते रहते हैं आजकल
पापा जी बाहर घूमने मत निकलिएगा
पापा जी दूध सब्जी लेने मत जाइएगा
आपको बीपी है डायबिटीज है ख़तरा है
ये मत कीजिएगा वो मत कीजिएगा
अपना ख़याल रखिएगा

अब इस उम्र में
किन बातों का ख़याल रख पाऊंगा
मुझसे एक हंसी क्या गुम हुई
कुछ याद नहीं रहता बस एक डर है
इन दिनों साथ रहता है।

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बुरे वक़्त में
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मनुष्य के रोम-रोम में 
प्रवेश कर गया है भय

ओह कितना 
असहाय है मनुष्य

बुरे वक़्त में प्रभु से
न कहें तो किससे कहें

शक्तियां हों न हों
जितनी भी हों

हे ईश्वर कुछ भी करके
बचाना सबको।

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विषाणु 
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इतने देवदूत आए
इतने धर्म और वांग्मय
यीशु आए बुद्ध आए मोहम्मद आए
महावीर आए मार्क्स आए गांधी आए
और आती रहीं विपदाएं आपदाएं
मानवजाति के नाश की आशंकाएं

विस्मय की बात यह कि किसी के पास 
प्रकृति को वश में करने का मंत्र नहीं है 
कितना निहत्था है आज मनुष्य
अपने असंख्य परमाणुओं और
डालर और रुपये के ढेर पर बैठा
सूक्ष्म विषाणुओं के सामने

कितना बुरा समय है
मनुष्य के ज्ञान-विज्ञान जीवन
सभ्यता और संस्कृति की यात्रा
ओह कितनी अधूरी है
कहां है मनुष्य का अहंकार
और विश्वविजेता बनने का स्वप्न

कहां है हिंदी के लेखक का पुरस्कार
और अमर होने के लिए उसकी
हजार नीचताएं
विश्व की कितनी महाशक्तियां
आज एक विषाणु के सामने खड़ी हैं
एक पैर पर अभी कितनी दूर है
दूसरा पैर।

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नया कवि
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माना
नये कवि के हाथ में
सोना-चांदी फूल-पत्ती 
कुछ नहीं है अनगढ़ पत्थर है 

लेकिन 
कविता के सभासदो देखो तो
उसने तुम्हारे राजा के महल के
कांच पर कैसे दे मारा है दनादन।







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